श्रीभगद्विषय उत्सव ( ईडु उत्सव )

 ॥ श्रीमते रामानुजाय नमः ॥            ॥ श्रीमद् वरवरमुनये नमः ॥               ॥ श्री वादिभिकरमहागुरुवेनमः ॥

srisailesa-thanian

एक समय पवित्रोत्सव समाप्ति के दिन श्रीरंगनाथ भगवान श्रीमद्वरवरमुनीन्द्रजी को सम्बोधित करके तीर्थ, माला, श्रीशठकोप आदि सत्कारपूर्वक यह आदेश सुनाये – “हमारे श्रीमहामण्डप में श्रीशठकोपसूरि के सहस्त्रगीति प्रबन्ध का, छत्तीस हजार ( ईडु – भगद्विषय ) व्याख्या और अन्य व्याख्या के साथ, उपदेश दीजिये।” श्रीमद्वरवरमुनीन्द्रजी स्वरूपानुरूप नैच्यानुसन्धानपूर्वक इस आज्ञा को स्वीकार करके प्रभु का वात्सल्य को भूरि भूरि प्रशंसा करके उपदेश देना शुरू कर दिये । श्रीरंगनाथ भगवान ने, उस व्याख्यान के बीच विच्छेद न हो जाय इसके लिये एक संवत्सर तक अपने सभी उत्सवों को बन्द करके अपनी दिव्यमहिषी, अनन्त, गरुड, विष्वक्सेन आदि सकल परिजन, श्रीशठकोपसूरि आदि आल्वाराचार्यसहित गरुडमण्डप में विराजमान हो कर कालक्षेप सुनने लगे । आचार्यश्री भी अपने विशदवाक्शिखामणित्व को प्रकट करते हुये भगवव्दिषय का उपदेश कर रहे थे जिसमें श्रुतिस्मृतीतिहास – पुराण श्रीभाष्य आदि का समन्वय भी करते थे । इस प्रकार एक साल कालक्षेप चलता रहा । समाप्ति के दिन एक विशेष घटना हुई । भगवान अर्चकमुख से बहुमान के लिये थालियों में पीताम्बर, फल, ताम्बूल आदि गोष्ठी में रखवायें । कालक्षेप समाप्त होते ही अचानक एक चार साल का रंगनायक नाम का अर्चक बालक बार बार मना करने पर भी थालियों के आगे बढ़कर श्रीसौम्योपयन्तृमुनि के सम्मुख भगवान तथा उनके बीच खड़ा हो गया । सब लोग इसमें कोई विशेषण होगा यह समझकर चकित थे। इसी वक्त वह बालक हाथ जोड़कर विनयपूर्वक श्रीरम्यजामातृयोगीन्द्रविषय के

श्रीशैलेशदयापात्रं धीभक्त्यादिगुणार्णवम् ।

यतीन्द्रप्रवणं वन्दे रम्यजामातरं मुनिम् ॥

 

यह श्लोक बोला । अर्थात श्रीशैलेशाचार्य के पूर्णकृपापात्र एवं ज्ञान, भक्ति आदि गुणों के सागर तथा यतीन्द्र श्रीरामानुजाचार्य के अनन्यानुरागी श्रीरम्यजामातृमुनि स्वामीजी की मै वन्दना करता हूँ । इस श्लोक का निवेदन कर वह बालक वहाँ से भाग गया । इसमे सन्देह ही नहीं कि भगवान रंगनाथ ही श्रीवरवरमुनीन्द्र को सर्वश्रेष्ठ आचार्य सिद्ध करने के लिये उस बालक में आविष्ट होकर उनका तनियन ( स्तुतिपद्य) बनाये ।

इसके बाद भगवान रंगनाथ श्रीवैष्णवगोष्ठी के सामने ही उस श्लोक को तालपत्र पर लिखाकर और हरिद्रा लगवाकर आचार्य के श्रीचरणों में समर्पित कराये ।

तत्पश्च्यात् उस अर्चक बालक को पुनः बुलवाकर भगवान ने उस को द्राविडभाषा में आचार्य के विषय में मंगलाशासन पद्य पढ़ने का आदेश दिया । उस बालक के मुख मे मंगलाशासन का पद्य निकला –

वालितिरुवाय् मोलि प्पिल्लै मादग वाल् वाड़ुम मनवाल मा मुनिवन् ।

वालियवन् मारन् तिरुवाय् मोलि पोरुलै मानिलत्तोर तेरुम् वलि यूरैक्कुम् शीर ॥ १ ॥

 

शेय्यत्तामरै तालिणै वालिये ।

शेलै वालि तिरुनाभि वालिये ।

तुय्यु मारवुं पूरिनुलूम् वालिये ।

सुन्दर तिरूत्तोलिणै वालिये ।

कैयु मेन्दिय मुक्कोलुम् वालिये ।

करूणै पोंगीय कण्णिणै वालिये ।

पोय्यिलाद मणबाल मामुनि पुन्दि वालि पूगल वालि वालिये ।। २ ॥

अङियार्गल् वाल अरंगनगर् वाल ।

शठकोपण तन् तमिल् नुलवाल ।

कड़ल् शूलन्द् मन्नूलगम् वाल ।

मनवाल मा मुनिये इन्नु मोरू नुत्तण्डिरूम् ॥ ३ ॥

 

फिर भगवान श्रीविष्वक्सेनजी का आज्ञापत्र श्रीवेंकटाद्री, श्रीकांची, श्रीयादवाद्री आदि दिव्यदेशों को भिजवाये कि “ आज से सभी श्रीवैष्णव मठ मन्दिरों में तथा घरों में गुरुपरम्परापाठ तथा दिव्यप्रबन्धों के पाठारम्भ आदि में श्रीमद्वरवरमुनीन्द्र के विषय में मेरे द्वारा रचित

“ श्रीशैलेशदयापात्रं धीभक्त्यादिगुणार्णवम् ।

यतीन्द्रप्रवणं वन्दे रम्यजामातरं मुनिम् ॥”

 

इस श्लोक कि नियमितरूप से अनुसन्धान करें । और अन्त में “ वालि तिरुवाय् मोलिप्पिल्लै ” इत्यादि मंगलाशासन पद्यों का पाठ करके समाप्ति करें ।

 

तत्पश्च्यात् श्रीरंगनाथ भगवान विशेष सत्कार करके छड़ी, चंवर आदि सकलपरिच्छद और मन्दिर के परिजनों के साथ श्रीमद्वरवरमुनीन्द्रजी को मठ जाने के लिये आज्ञा दि ।

 

आज भी यह उत्सव मिथुन मास मुला नक्षत्र के दिन सभी दिव्य देशों में अत्यन्त विशेष रूप से मनाया जाता है ।

 

आलवार येम्पुरूमानार जियर तिरुवडिगले शरणम

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