चरमोपाय निर्णय – स्मरण एवं प्रार्थना

॥ श्री: ॥

॥ श्रीमते रामानुजाय नमः ॥
॥ श्रीमद्वरवरमुनयेनमः ॥
॥ श्रीवानाचलमहामुनयेनमः ॥
॥ श्रीवादिभीकरमहागुरुवेनमः ॥

 

 

श्री नायनाराच्चान् पिल्लै   स्वामीजी का तनियन

श्रुत्यर्थ सारजनकं स्मृतीबालमित्रम 

पद्मोंल्लसद् भगवदङ्ग्रि पूराण बन्धुम

ज्ञानाधिराजम अभयप्रदराज पुत्रम

अस्मदगुरुम परमकारुणिकं नमामी ||

 

श्रीनायनाराचान पिल्लैजिन्होने श्री वेदों की सारतम बातों को बताया,जो सूर्य के समान तेजोमय हैं, जो पुष्प के समान कोमल हैं, जिनका सम्बन्ध श्रीमन्नारायण भगवान के साथ है, जो सच्ची और सारतम बातों के राजा है और श्री श्रीपेरियावाचन पिल्लै के पुत्र है, उनको मै प्रणाम करता हूँ, वंदन करता हूँ ।

अभयप्रदपाद देशीकोद्भवम,

गुरुमिडे निजमादरेन्न चाहं |

या इहाकीललोक जीवनादर,

चरमोपाय विनिर्णयं चक्र ||

 

श्री नायनाराचान पिल्लै जो श्रीपेरियावाचन पिल्लै के पुत्र है और जिन्होने इस संसार के भव बंधन को छुड़ाने के लिए श्री चरमोपाय निर्णय ग्रंथ की रचना की है,उनके चरणारविन्दो का वंदन करता हूँ ।

यह ग्रंथ चार श्लोकों की रचना के द्वारा प्रारंभ होता है, जिसमेंश्रीपेरियावाचन पिल्लै का वैभव और इस ग्रंथ रचना का उदेश्य बताया गया है ।

अभयपप्रद पादाख्यं अस्मदेशिकमाश्रये  ।

यत्प्रसादाद अहं वक्ष्ये चरमोपाय निर्णयम ।।

मै पेरियावाचन पिल्लै स्वामीजी की शरणागति करता हूँ, जो की मेरे आचार्य भी है और जिन्हे अभयप्रदपादर भी कहा जाता है, ( भगवान की शरणागति की महीमा का वर्णन करने के कारण अभयप्रदपादर कहा जाता है ) । उनकी कृपा से मै इस चरमोपाय निर्णय ग्रंथ की रचना कर रहा हूँ ।

अस्मज्जनककारुण्य सुधा सन्धुक्षितात्मवान ।

करोमी चरमोपायनिर्णय मत्पिता यथा ॥

मेरा जन्म मेरे पिताजी पेरियावाचन पिल्लै की कृपा से हुआ है । मै उनके पथ प्रदर्शित मार्ग पर चलते हुये मोक्ष प्राप्ति के अंतिम और सुलभ उपाय जो “ चरमोपाय ” है, उसकी स्थापना करता हूँ ।

अस्मदुत्तारक वन्दे यतिराज जगद्गुरूम |

यत्कुपाप्रेरित: कुर्मी चरमोपाय निर्णयम ||

 

मै श्री यतिराज स्वामीजी को प्रणाम करता हूँ, जो की पूरे जगत केआचार्य है और उनकी कृपा के द्वारा चरमोपाय

निर्णय को बता रहा हूँ ।

 

पूर्वापरगुरूक्तेश्च स्वप्नवृतैर्यतिशभाक ।

क्रियतेद्य मया सम्यक चरमोपाय निर्णयम॥

श्री रामानुज स्वामीजी के अवतार के बाद और पहले अवतार लिए हुये आचार्यो के श्रीसूक्ति द्वारा (वचनों)

एवं अनेक महापुरुषों के स्वप्नों से यह सिद्ध करता हूँ कि श्री रामानुज स्वामीजी के चरणारविन्द ही मोक्ष प्राप्ति का अंतिम उपाय है । मोक्ष प्राप्ति के चरम उपाय का वर्णन करने के कारण इस ग्रंथ का नाम “ चरमोपाय निर्णय ” कहा गया है ।

श्री वैष्णव अपने आचार्य में पूर्ण निष्ठा रखते हैं और पूर्ण भरोसा है कि इस दुख रूपी संसार से उनके आचार्य मोक्ष दिलायेगें । लेकिन सभी आचार्य कहते हैं श्री रामानुज स्वामीजी कि कृपा को ही मोक्ष प्राप्ति का उपाय मानिये । इससे यह सिद्ध होता है कि श्री रामानुज स्वामीजी मात्र इस संसार से मोक्ष दिलाकर परमपद में भगवान के चरणारविन्दो की सेवा के अधिकारी बनाते हैं ।

इस श्लोक के अनुसार आचार्य के परिपूर्ण रूप से लक्षण श्री रामानुज स्वामीजी में विद्यमान है। श्री आन्ध्रपूर्ण स्वामीजी भी यही कहते है कि “आचार्य पद” एक विशेष उपाधि है जो कि सिर्फ श्री रामानुज स्वामीजी में विद्यमान है ।

विष्णु शेषी तदीय शुभगुण नानिलयो विग्रह श्री शठारी

श्रीमन रामानुजार्य पदकमलयुगम भाथी रामा तदीयम ।

तस्मिन रामानुजार्ये गुरुरीथीच पदम भाथी नान्यत्र

तस्मद शीष्ठम श्रीमदगुरुनाम कुलमधी माकीलम तस्य नाथस्य शेष ॥

 

भगवानविष्णु जगत पिता है ,श्री शठकोप स्वामीजी जो विशेष गुणों से परिपूर्ण है, भगवान के श्री चरणारविन्दो के रूप मे विराजमान हैं।श्री रामानुज स्वामीजी श्री शठकोप स्वामीजी के श्री चरणारविन्द है ।ऐसे श्री रामानुज स्वामीजी पर पूर्ण गुरु परम्परा आधारित है ।

 

श्री रामानुज स्वामीजी के अवतार के पहिले सभी आचार्यों को भविष्य में क्या होनेवाला है यह मालूम था,क्योंकि श्री शठकोप स्वामीजी ने सहस्त्रगीति (५.२.१) में कहा है कि“ कलियुम केडूम ”, कली का विनाश श्री रामानुज स्वामीजी के अवतार से होगा ।सभी आचार्यों को भगवान में और अपने आचार्य में परिपूर्ण विश्वास था ,तो भी वे श्री रामानुज स्वामीजी के साथ जो सम्बन्ध होनेवाला था उसका अनुभव करते हुये, उनके “ उद्धारकत्व ” गुणका सदैव स्मरण करते थे ।संबंध दो प्रकार से होता है, आरोहण और अवरोहण ।आरोहण याने नीचे से ऊपर वर्तमान आचार्य, अस्मदाचार्य, परमाचार्य । अवरोहण याने ऊपर से नीचे याने शिष्य, उनके शिष्य ।इन दोनों क्रमो में श्री रामानुज स्वामीजी प्रधान स्थान पर विराजमान है। आरोहण क्रम मे श्री भगवान अंत में आते है, जो की प्रथम आचार्य है । और अवरोहण क्रम का कोई अंत नहीं है वह परम्परा बडती ही रहेगी । यह परम्परा श्री रामानुज स्वामीजी पर केंद्रीकृत है ।

हम अपने गुरु परम्परा में देखते हैं कि श्री भगवान से प्रारम्भ होकर श्री वरवर मुनि स्वामीजी तक हैं, जिसमे श्री रामानुज स्वामीजी बीच मे बिराजमान है ।जैसे एक मोती के हार में हीरा बीच में विराजमान होकर दोनोऔर के मोतियों की शोभा बडाता है, वैसे ही श्री रामानुज स्वामीजी बीच में विराजमान होकर पूर्ण गुरु परम्परा की शोभा को बढ़ा रहे हैं ।

जैसे अष्टाक्षर मंत्र में नमः पद बीच में विराजमान होकर उपाय को संबोंधित करता है वैसे ही श्री रामानुज स्वामीजी श्री आचार्य रत्न हार के बीच में विराजमान है और नमः पद की तरह उपाय को संबोंधित करते है ।

अरवनयशो यत पदा सरसीजध्वन्धम आश्रित पूर्वे

मूर्ध्ना यस्यन्वयम उपगता देशिक मुक्तिमापुः ।

सोयं रामानुज मुनीर अपी स्वीय मुक्तिम करस्थं

यत संबन्धम अमनुथ कथम वर्णीयते कुरनाथ  ॥

श्री रामानुज स्वामीजी के बाद में जो आचार्य हुये हैं वे ऐसा मानते हैं कि श्री स्वामीजी के चरण सम्बन्ध से हमें मोक्ष मिलेगा और पहिले जो आचार्य हुये हैं वे ऐसा मानते हैं कि श्री स्वामीजी के सिर (तिरुमुडी) के सम्बन्ध से मोक्ष मिलेगा । श्री रामानुज स्वामीजी मानते थे कि कुरेश स्वामीजी के साथ सम्बन्ध रहने के कारण मुझे मोक्ष मिल रहा है । ऐसे महान श्रीकुरेश स्वामीजी की महिमा का वर्णन कैसे कर पायेगें?

आचार्य दो प्रकार के होते है , स्वानुवृत्ती प्रसन्नाचार्य और कृपामात्र प्रसन्नाचार्य ।

जो आचार्य अपने शिष्यों की परीक्षा लेकर उनको रहस्य ग्रन्थों के अर्थ को बताते है उन्हे स्वनुवृत्ती प्रसन्नाचार्य कहते है। संसार में डुबे हुये अपने शिष्य पर विशेष कृपा करके रहस्य ग्रन्थों के अर्थ को बताते है उन्हे कृपामात्र प्रसन्नाचार्य कहते है ।

एक समान्य शिष्य के मोक्ष के लिये कृपामात्र प्रसन्नाचार्य का आश्रय ग्रहण करना चाहिये,क्योंकि स्वानुवृत्ती प्रसन्नाचार्य कि कृपा का पात्र बनने के लिये शिष्य को अपने आचार्य पर पूर्ण विश्वास और शास्त्र के अनुकूल आचरण एवं अनुष्ठान करना अत्यन्त आवश्यक है।इस बात कि पुष्टि श्रीदाशरथी स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी अपनी वार्ता में करते हैं,तब श्रीकुरेश स्वामीजी बताते हैं कि सिर्फ कृपामात्र प्रसन्नाचार्य ही समान्य जीवों को इस संसार के भव बन्धन से छुड़ा सकते हैं ।

 

श्री पेरियावाचन पिल्लै, “ज्ञानसारम” के ३६वें पासूर का वर्णन करते हुये बताते हैं किकृपामात्र प्रसन्नाचार्य कृपा करके शिष्यों के सिरपर अपने चरणारविन्द को रखकर इस संसार के भव बंधन से छुड़ा देते हैं ।जैसे शरणागति में स्वगत शरणागति की अपेक्षा परगत शरणागति को श्रेष्ठ बताया गया है, वैसे ही चरमोपाय ( आचार्य निष्ठा) में आचार्य अपनी निर्हेतुक कृपा द्वारा शिष्य को अपनाना ज्यादा श्रेष्ठ बताया गया है । “उद्धारकत्व”गुण पूर्ण रूप से कृपामात्र प्रसन्नाचार्य में विद्यमान रहता हैं ।

 

सोमसियाण्डान अपने आचार्य वैभव ग्रंथ के गुरु गुणावली में बताते हैं की

यस्सपराधन स्वपधाप्रपन्नन स्वकीयकारूण्य गुन्नेण पाती ।

स एव मूख्यो गुरूराप्रमेयस तदैव शब्धि परीकीर्त्यादेही ॥

जो आचार्य अपनी निर्हेतुक कृपा से शरण में आये हुये शिष्य की पूर्ण रूप से रक्षा करते हुये उसको स्वरूप ज्ञान करवाते हैं, ऐसे आचार्य का बहुत महत्व बताया गया है । ऐसे कृपामात्र प्रसन्नाचार्य में उद्धारकत्व एवं कृपामय गुण भी होता है । यह उद्धारकत्व गुण पूर्ण रूप से रामानुज स्वामीजी में विद्यमान है ।

  • उन्होने स्वयं कष्ट सहन करके श्री गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी को प्रसन्न किया और चरम श्लोक के रहस्य अर्थों को ग्रहण किया । लेकिन अपनी निर्हेतुक कृपा से रहस्य अर्थों को सभी इच्छुक श्रीवैष्णवों को प्रदान किया ।इस दृष्टांत में स्वामीजी का कारुण्य गुण प्रकाशित होता है ।
  • राजा महेन्द्र पेरुमाल अरयर नामक एक अरयर स्वामी थे, उनका एक अरंगमालिका नाम का पुत्र था । वह पुत्र उनकी बात को नहीं सुनता था और मित्रता दुष्ट लोगों के साथ थी। इस बात को सुनकर श्री रामानुज स्वामीजी अपने एक शिष्य को भेजकर अपने पास बुलाया और कहा “ ओ मेरे पुत्र तुम मुझे छोड़कर गये तो भी मै तुम्हें नहीं छोड़ूँगा ”। यह बताकर अपने अर्चा विग्रह भगवान के दर्शन कराये और रहस्य अर्थों को प्रदान किया । अपने चरणारविन्दो को अरंगमालिका के सिर पर रखकर कहा कि सदैव इन चरणारविन्दो पर ही अवलंब रहना । अगर और किसी दूसरी चीज का आश्रय लिया तो नरक में डाले जाओगे । इसके बाद अरंगमालिका ने श्री रामानुज स्वामीजी के चरणारविन्दो का आश्रय कभी नहीं छोड़ा ।

 

इन दोनों दृष्टांतो से हम जान सकते है की उद्धारकत्व एवं कृपामय गुण श्री रामानुज स्वामीजी में परिपूर्ण रूप से  विद्यमान है ।

 

– अडियेन सम्पत रामानुजदास,

– अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास

 

SOURCE :  http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-invocation.html

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