चरमोपाय निर्णय – “श्री रामानुज स्वामीजी के आचार्य द्वारा श्री रामानुज स्वामीजी में उद्धारकत्व को दर्शाना”

॥ श्री: ॥
॥ श्रीमते रामानुजाय नमः ॥
॥ श्रीमद्वरवरमुनयेनमः ॥
॥ श्रीवानाचलमहामुनयेनमः ॥
॥ श्रीवादिभीकरमहागुरुवेनमः ॥

“श्री रामानुज स्वामीजी के आचार्य द्वारा श्री रामानुज स्वामीजी में उद्धारकत्व को दर्शाना”

आचार्य दिव्यसूक्तियों द्वारा रामानुज स्वामीजी के उद्धारकत्व का निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है ।

श्री महापुर्ण स्वामीजी

महापुर्ण स्वामीजी रामानुज स्वामीजी को मधुरांतकम में पंच संस्कार से समाश्रित करते है,

श्री कूर्म पुराण के अनुसार“ चक्राधिधारणम पुसंम परसम्भन्दवेदणम ”, इसका अर्थ है शंख चक्र धारण करना यह भगवान के सम्बन्ध को दर्शाता है, जैसे पतिव्रता स्त्री का मंगलसूत्र पति के साथ सम्बन्ध दर्शाता है । और

प्रपन्नामृत के अनुसार

“एवम प्रपद्ये देवेचम आचार्य कृपा स्वयम ।

अध्यापेन मन्त्रार्थम सर्शीछन्धोधी देवताम ॥”

याने “आचार्य कृपा करके शंख चक्राकिंत करते हुये भगवत संबंध बनाते है और बाद में मंत्रोपदेश करते हैं। ” और

 

श्री महापुर्ण स्वामीजी कहते है कि “ मै आचार्य बनने के लिए समाश्रयण नहीं कर रहा हूँ, तुम मेरे आचार्य श्री यामुनाचार्य के परम आप्त हो । श्री शठकोप स्वामीजी ने स्वयं कहा है कि आप के अवतार से कली का नाश होगा, इन सभी वैभवों को सुनते हुये मै भी आप के साथ सम्बन्ध बनाना चाहता हूँ। ”

जैसे भगवान श्रीराम के अवतार से सूर्य वंश का वैभव बड़ा था, सीता माताजी के अवतार से राजा जनकजी के कुल का वैभव बड़ा था, उसी तरह आपके अवतार से अनेक जीवात्माओं पर कृपा होगी और श्रीवैष्णव संप्रदाय का वैभव बड़ेगा। आप सबके उद्धारक है । इस बात पर मुझे पूर्ण भरोसा है और में इसका अनुभव करता रहता हूँ ।

 

श्री शैलपूर्ण स्वामीजी

श्री शैलपूर्ण स्वामीजी केसानिध्य में रहकर श्री रामानुज स्वामीजी एक वर्ष तक श्री वाल्मीकि रामायण का अध्ययन किया। श्री शैलपूर्ण स्वामीजी हर दिन तिरुमला में भगवान की जल सेवा करने के बाद श्री रामानुज स्वामीजी को अध्ययन कराने के लिए तिरुपति आते और पुनः शाम के समय तिरुमला जाते थे । ऐसा उन्होने पूर्ण एक वर्ष तक किया।

श्री शैलपूर्ण स्वामीजी रामायण के इस श्लोक का वर्णन कर रहे थे, तब श्रीरामानुज स्वामीजी ने शैलपूर्ण स्वामीजी से एक प्रश्न किया ।

“ यस्य रामे न पश्येथू यंच रामो न पश्यती

निन्धितस वासेश्लोके स्वथ माप्येन विगर्हथे ”

 

जिसका अर्थ है जिसने श्रीराम का दर्शन नहीं किया और जिसको श्रीराम ने नहीं देखा वह बहुत ही भाग्यहीन है ।

इसे सुनते ही श्रीरामानुज स्वामीजी शैलपूर्ण स्वामीजी से पुछतें है कि ऐसे भाग्यहीन जीवात्माओं का उद्धार कैसे होगा, तब श्री शैलेपूर्ण स्वामीजी कहते है कि आपके ( जो नित्य सुरियों के नेता ) कृपा कटाक्ष से उन भाग्यहीन जीवात्माओं का उद्धार होगा।”

इसके बाद उन्होने अपने शिष्य श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी को श्री रामानुज स्वामीजी को सोंप दिया और कहा कि “आपको मुझसे ज्यादा श्री रामानुज स्वामीजी का स्मरण करना है, उनके चरणारविन्दो का आश्रय लेना है, इनका अवतार जीवात्माओं के उद्धार हेतु हुआ है, मेरा सम्बन्ध श्रीरामानुज स्वामीजी से इस कालक्षेप द्वारा हुआ है, इनका इतना वैभव है कि श्री यामुनाचार्य स्वामीजी बहुत दुखी थे की उनका सम्बन्ध श्री रामानुज स्वामीजी के साथ नहीं हुआ। इन सभी दृस्टांत को याद रखते हुये कभी भी श्री रामानुज स्वामीजी के चरणारविन्दो से बिछुड़ना नहीं।”

श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी

जब श्री गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी ने श्री रामानुज स्वामीजी को चरम श्लोक का मंत्रार्थ प्रदान किया । तब गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने रामानुज स्वामीजी ने कहा गलत मत समझना मैने तुम्हें बहुत तकलीप दी है, मंत्र के रहस्य के महत्व को दर्शाने के लिए इतना कष्ट पहूँचाया। आप का अवतार संसारीयों को मोक्ष देने के लिए हुआ है। आप श्री नाथमुनी स्वामीजी के हृदय मे सदैव विराजमान रहते हो । आपके साथ मेरा सम्बन्ध रहने के कारण मुझे परमपद प्राप्ति की कोई चिन्ता नहीं है।

श्री यामुनाचार्य स्वामीजी के अनेक शिष्यजन थे जो की सम्प्रदाय को आगे बढ़ा सकते थे। लेकिन उन्होने श्री वरदराज भगवान से विनती किया कि श्री रामानुज स्वामीजी हीसम्प्रदाय का नेतृत्व करे । जब श्री यामुनाचार्य स्वामीजी परमपद के लिए प्रस्थान कर रहे थे, वे बहुत दुःखी थे की आप से वार्तालाप नहीं हो पाया । यह श्रीवैष्णव सम्प्रदाय आपके नाम से ( श्री रामानुज सम्प्रदाय ) जाना जायेगा और इसका वैभव बहुत बड़नेवाला है।

श्री मालाधार स्वामीजी

श्री गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी की आज्ञानुसार श्री मालाधार स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी को श्री सहस्त्रगीति का कालक्षेप करते थे। कालक्षेप के समय श्री मालाधार स्वामीजी और श्री रामानुज स्वामीजी में अलग विचार प्रगट हुये, तो श्री मालाधार स्वामीजी ने कालक्षेप बंद कर दिया। यह सुनकर गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी श्रीरंगम से आये और कहा की तुम यह   मत समझीये कि मै उनको यह सीखा रहा हूँ जो उनको कुछ मालूम नहीं है । श्री यामुनाचार्य स्वामीजी के विचारो को ही वे प्रगट करेगें । जैसे श्री कृष्ण भगवान ने वेदाध्ययन सांदीपनीजी के पास किया था, वैसे ही वे इस सहस्त्रगीति का अध्ययन आप से कर रहे है । श्री गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी और श्री महापुर्ण स्वामीजी कि उपस्थिति में श्री मालाधार स्वामीजी ने पुनः कालक्षेप प्रारम्भ किया ।

“ पोलिग पोलिग ”, पासूर के समय “कलियुम केड़ुम” का विवरण होते ही गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी रामानुज स्वामीजी कितरफ देखते हैं,तब रामानुज स्वामीजी पूछते है कि आप मेरी तरफ ऐसे क्यों देख रहे है। गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी ने पूछा आप ऐसे क्यों पूछते हो आप श्री शठकोप स्वामीजी के वचनों को प्रमाणित करने के लिये अवतरीत हुये हैं । आप ( जो प्रपन्न कुल के शिरोधार है ) ही इस पाशूर के भाव है। आप जीवात्माओं को मोक्ष देने के लिये आये हैं, यह सुनकर श्री मालाधार स्वामीजी अत्यन्त आनंदित होते हैं और कहते है कि मै आज से आपको हीश्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के रूप में स्वीकार करता हूँ,मेरे मोक्ष प्राप्ति के लिये आप ही उपाय है। ”

श्रीवररंगाचार्य स्वामीजी

श्री रामानुज स्वामीजी श्रीवररंगाचार्य स्वामीजी की विशेष प्रेममय सेवा करते थे ।श्रीवररंगाचार्य स्वामीजी श्री रामानुज स्वामीजी को चरमोपाय के रहस्य को (आचार्य ही सर्वस्व है) बताते हैं। कहते हैं कि यद्यपि0 मैंने यह सब आपको बताया है, यह सब रहस्यार्थ आप पर आधारीत है,इस रहस्य ज्ञान को हमें श्री नाथमुनी स्वामीजी ने ही दिया है, इस   कारण हम लोगो को आप पर परिपूर्ण विश्वास है कि आप हम लोगो पर और अनेक जीवात्माओं पर कृपा करके मोक्ष देगें ।

पांचों आचार्यों ने श्री रामानुज स्वामीजी को सारतम विषयों का उपदेश दिया, लेकिन सभी आचार्य जनों ने रामानुज स्वामीजी को ही अपना उद्धारक माना ।

गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी ने अपनी पुत्री को रामानुज स्वामीजी के चरणारविन्दो का आश्रय लेने के लिये कहा। श्री रामानुज स्वामीजी विशेष कृपा करके अपने चरणारविन्द दिखाये और कहा कि पूर्ण रूप से इन चरणारविन्दो पर ही अवलम्ब रहना ।

गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी अंतिम समय मे अपनी पुत्री से पूछते हैं,“तुम क्या सोच रही हो ?”,

पुत्री ने कहा “ मेरे आचार्य की निर्हेतुक कृपा के कारण आप परमपद के लिये प्रस्थान कर रहे हो ”

श्री गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी अत्यन्त प्रसन्न  होकर श्री भविष्यदाचार्य के श्री विग्रह को अपनी पुत्री को प्रदान करते हैं, जो कि यामुनाचार्य स्वामीजी द्वारा प्रदान किया गया था । “ येम्पेरूमानार तिरुवडिगले शरणम ” कहकर उन्होने परमपद के लिये प्रस्थान किया। इस दृष्टांत से जान सकते है की गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी ने निसंकोच होकर रामानुज स्वामीजी के उद्धारकत्व को स्थापित किया ।

 

श्री कांचीपूर्ण स्वामीजी श्री वरदराज भगवान को रोज रात में पंखी की सेवा करते थे ।

एक दिन भगवान ने स्वामीजी से पूछा “ नम्बी (कांचिपूर्ण स्वामीजी),तुम कुछ पूछना चाहते हो ”

स्वामीजी कहते है कि “श्री रामानुज स्वामीजी को कुछ शंका है उनका समाधान कीजीये ”

भगवान कहते है कि “मै क्या कहूँगा जो की श्री रामानुज स्वामीजी को मालूम नहीं है । जैसे मैंने श्री कृष्णावतार में सांदीपनीजी से वेदाध्ययन किया था वैसे ही श्री रामानुज स्वामीजी है । वे सभी शास्त्रों के मर्मज्ञ है, सर्वज्ञ है, नित्य सुरियों के नेता है, संसारी जीवात्माओं को मोक्ष देनेवाले है, उनको कहने लायक कुछ नहीं है।”

 

श्री वरदराज भगवान कांचिपूर्ण स्वामीजी को ६ प्रश्नों का उत्तर देते हुये

यहाँ पर प्रश्न उठता है कि श्री रामानुज स्वामीजी ५ आचार्यों के शिष्य हैं । वे आचार्य हैं और रामानुज स्वामी शिष्य है । यह कैसे हो सकता है कि उनका सम्बन्ध रामानुज स्वामीजी से होने के कारण उनको मोक्ष मिलेगा ?सामान्यतः शिष्य का संबंध गुरु से होने मोक्ष मिलता है लेकिन यहाँ पर आचार्य का संबंध शिष्य से होने के कारण अत्यन्त विशेष माना गया है। जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण का सम्बन्ध हो जाने के कारण विश्वामित्र और सांदीपनीजी को विशेष लाभ पहूँचा।

 

श्री रामायण में “किंकरौ समुपस्थितौ ”, याने “ओ, विश्वामित्रजी, हम आपकी सेवा में हाजिर है”। और

“तत्वम दासभूतोस्मी किमध्य कारवन्निथे” याने “में आपका सेवक हूँ, आपके लिए क्या कर सकता हूँ।”

भगवान अपने आचार्य कि सन्निधि में शिष्य के रूप में रहे लेकिन विश्वामित्रजी और सांदीपनीजी को ही उस सम्बन्ध से लाभ हुआ था । इसी प्रकार ५ आचार्यों को रामानुज स्वामीजी के सम्बन्ध से लाभ हुआ ।

भगवान मनुष्य रूप धारण करके शिष्य बनते हैं और आचार्य से अध्ययन करते है । ऐसे समय में आचार्य भी भगवान के स्वरूप को समझते है। वे सर्वज्ञ रहते है, उनको अध्ययन भी नाममात्र के लिए कराते है । शिष्य होने पर भी उन आचार्यों के लिये भगवान ही उद्धारक है ।

 

भगवान के इस स्वरूप के कुछ प्रमाण इस प्रकार है –

महाभारत में “ विष्णु मनुष्य रूपेण चाचर वासूदैवते ”, याने भगवान विष्णु मनुष्य रूप धारण करके जगत में भ्रमण करते है ।

विष्णुपुराण में आता है “ इदनमपी गोविन्दा लोकानाम हितकम्य, मानुषम वपुरस्थय,द्वारवत्यम ही तिष्ठसे ”

ओ गोविन्दा, इस जगत उद्धारण के लिये आप द्वारका में विराजमान हो ।

 

भगवान के इस इन आचार्यों को भगवान के सम्बन्ध द्वारा ही लाभ हुआ । इसी सिद्धान्त को रामानुज स्वामीजी के लिये भी अपना सकते हैं । यहाँ पाँच आचार्यों ने श्री रामानुज स्वामीजी के वैभव को जानते हुये उनसे अपना संबंध बनाने के लिये उनके आचार्य बने, श्री नाथमुनी स्वामीजी द्वारा रामानुज स्वामीजी के वैभव को जानकर आचार्य परम्परा में सभी आचार्य परिपूर्ण रूप से श्री रामानुज स्वामीजी को ही उद्धारकत्व के रूप में दर्शाते है ।

 

यदि श्री रामानुज स्वामीजी अपने गुरू परम्परा के पहिले आचार्य (भगवान) के उद्धारक है तो हम उनके उद्धारकत्व गुण को परीपूर्ण रूप से हर एक के लिये मान सकते है । उद्धारकत्व याने “जो अपना स्वरूप और स्वभाव को भूल गया है उसको स्वरूप ज्ञान करवाना और उसके स्वभाव को बदलकर उसका उज्जीवन करना है।”

बौद्ध और जैन लोग वेद को प्रमाण नहीं मानते है और अद्वैती लोग जो वेद को प्रमाण मानते है लेकिन उसकी व्याख्या कुछ गलत करते है, ये लोग भगवान के स्वरूप और स्वभाव को बदल दिये थे। श्री रामानुज स्वामीजी ने बौद्ध, जैन और अद्वैतीयों को वेद के प्रमाण द्वारा उनको पराजय किया और भगवान के स्वरूप और स्वभाव को पुनः स्थापित करके भगवान का उद्धार किया।

 

 

श्रीनारदमुनि ने कहा,“गोपालन यादव वंशम, स्वयं मग्नम अभ्यूधरीष्यती” याने भगवान गोपाल के रूप में अवतार लेकर यादव वंश का उद्धार करेगें।

श्री शठकोप स्वामीजी ने श्री रामानुज स्वामीजी के अवतार की भविष्यवाणी करते हुये कहा कि “कलियुम केड़ुम कंडु कोन्मीण”, आपका अवतार होगा जिससे कली का नाश होगा, प्रपन्न जनों का वैभव बड़ेगा और श्रीवैष्णवता का प्रचार प्रसार होगा ।

 

इन सभी वैभव के कारण श्री वैष्णव सम्प्रदाय कोआचार्यों द्वारा श्री रामानुज संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है। ७४ पीठाधीशों के द्वारा संप्रदाय का वैभव हर दिन “वर्धताम अभिवर्धताम” हो रहा है, जिनमे अनेक सन्यासी, ज्ञानी, वैरागी श्रीवैष्णव प्रयत्न कर रहे है।

 

– अडियेन सम्पत रामानुजदास,

– अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास

 

SOURCE : http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-ramanujars-acharyas.html

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