चरमोपाय निर्णय – श्री रामानुज स्वामीजी ही उद्धारक है – 2

 

॥ श्री: ॥

॥ श्रीमते रामानुजाय नमः ॥
॥ श्रीमद्वरवरमुनयेनमः ॥
॥ श्रीवानाचलमहामुनयेनमः ॥
॥ श्रीवादिभीकरमहागुरुवेनमः ॥

एक बार श्रीदेवराज मुनि के शिष्य अनंतालवान, इचान, तोंडनूर नम्बी और मरुधुर नम्बी श्री रामानुज स्वामीजी से पूछने लगे कि “ जीवात्मा के लिए आचार्य एक ही रहते है या अनेक, इस शंका का समाधान कीजिये ”। रामानुज स्वामीजी ने कहा आप हेमाम्बाजी ( धनुर्दासजी की पत्नी ) के पास जाइये, आपके शंका का समाधान होगा ।

 

हेमाम्बाजी के पास जाकर वे लोग कहते है कि रामानुज स्वामीजी ने आपके पास भेजा है और हमारा प्रश्न है कि “आचार्य एक होते है या अनेक” ।हेमाम्बाजी ने अपने बालों को पूर्ण रूप से खोला वापस इकट्टा करके बांध दिया । ऐसा करके बोले की मुझे कुछ नहीं आता इसका उत्तर तो आपको रामानुज स्वामीजी ही देगें । ऐसा कहकर एक केसरीया धागे को नीचे से उठाकर अपने सिर पर रख वहाँ से चली गयी। सभी लोग निराश होकर वहाँ से प्रस्थान करके रामानुज स्वामीजी के पास आये । रामानुज स्वामीजी ने पूछा क्या हुआ, तब उन्होने ने कहा कि आपके पास ही इसका उत्तर मिलेगा ऐसा उन्होने कहा । रामानुज स्वामीजी ने पूछा उस वक्त उनका अनुकरण कैसा था, तब उन्होने पूर्ण दृष्टान्त को सुनाया। दृष्टान्त को सुनकर स्वामीजी ने कहा उनके अनुकरण द्वारा उन्होने आपके प्रश्न का उत्तर दे दिया, आप लोग समझ नहीं पाये । उन्होने रामानुज स्वामीजी से विवरण करने के लिए कहा। स्वामीजी ने कहा “ जब वे अपने पूर्ण बालों को खोली इसका यह मतलब है कि जीवात्मा के लिए अनेक विचार वाले अनेक आचार्य है, बाद में उन्होने बालों को इकट्टा करके बांध दिया इसका मतलब यह है कि मोक्ष देनेवाले आचार्य एक ही है, अंत में उन्होने केसरीया धागे को नीचे से उठाकर अपने सिर पर रखा, इसका मतलब है उद्धारक आचार्य श्री रामानुज स्वामीजी है । जो सब आचार्यों के आचार्य है, सन्यासी भी है , जिनका स्थान ऊंचा है । उनको सदैव अपने हृदय में विराजमान कराकर सदैव उनका स्मरण करते रहना चाहिये ।

यहाँ पर हेमाम्बाजी द्वारा रामानुज स्वामीजी अपने उद्धारकत्व को दर्शाते है ।

 

एक बार रामानुज स्वामीजी एकांत में विराजमान थे, उस समय गोविंदाचार्य स्वामीजी और आंध्रपूर्ण स्वामीजी आये और उन्होने पूछा मधुरकवि स्वामीजी कहते है “देवु मररियेन …………..” याने मुझे एक शठकोप स्वामीजी को छोड़कर दूसरे कोइ भी देव मालूम नहीं हैं । मधुरकवि स्वामीजी पूर्ण रूप से श्री शठकोप स्वामीजी को आचार्य, उपाय, उपेय, उद्धारक मानते है । उन्होने कहा हम भी इसी तरह पूर्ण रूप से प्रथम पर्व ( भगवान ) की अपेक्षा चरम पर्व ( आचार्य ) में अपनी निष्ठा बढ़ाये , ऐसी कृपा हम लोगो पर कीजिये । रामानुज स्वामीजी ने कहा मेंने आप लोगो में वैसी निष्ठा बनादी है जैसे मधुरकवि स्वामीजी को शठकोप स्वामीजी के प्रति है । ऐसी निष्ठा सदैव बनी रहे ऐसी विनती उन्होने किया ।

 

रामानुज स्वामीजी अत्यंन्त प्रसन्न होकर कहे “ उपाय उपेय भावेन तमेव शरणम व्रजे ”,याने अपने आचार्य को उपाय और उपेय के रूप में मानना, जैसे मै इस संसार में और परमपद में उपाय और उपेय के रूप में हूँ और आप मुझे “देवु मररियेन …………..” के रूप में स्वीकार करो । यह संबंध आगे बढनेवाला है, जो भी आपके आत्मबन्धु है उनको भी मोक्ष मिलनेवाला है ।

( यहाँ पर यामुनाचार्य स्वामीजी और नाथमुनी स्वामीजी के संबंध का विवरण किया गया है । )

“ इस संसार में रहते हुये आचार्य को उपाय मानते है, जिससे हम लोग परमपद के अधिकारी बनकर, निवासी भी बन जाते है। नित्य कैंकर्य में लगने के बाद उपाय ( आचार्य ) की क्या आवश्यकता है ?” श्री रामानुज स्वामीजी स्तोत्र रत्न के दूसरे श्लोक में बताते है ,

तस्मै नमो मधुजिदड्घ्रिसरोजतत्व

ज्ञानानुरागमहिमातिशयान्तसीम्ने

नाथाय नाथमुनयेत्र परत्र चापि

नित्यं यदीयचरणौशरणं मदीयम्॥

 

मधु राक्षस को मारने वाले श्री भगवान के चरणकमल के तत्व, ज्ञान, प्रेम और अपार महिमाके सीमांत मूर्ति श्री नाथमुनी स्वामीजी को नमस्कार करता हूँ । उनके दोनों चरण इस लोक में और परलोक में भी मेरे लिये सदैव आधार है ।

विष्णु पुराण में भी कहा गया है “ साध्यभावे महाभाओ साधने किम प्रयोजनम ”याने

ऐसे उपाय कि क्या जरूरत है जो हमे नित्य कैंकर्य कि प्राप्ति नहीं करा सकता है ?

यद्यपि उपाय नित्य कैंकर्य कि प्राप्ति करवाता है, तो नित्य कैंकर्य मिलने के बाद उपाय कि क्या आवश्यकता है ।

लेकिन भट्टर स्वामीजी कहते है उपाय और उपेय दोनों भगवान में विद्यमान है ( रंगराज स्तव,८८ श्लोक )

उपादत्ते सत्तास्थितिनियमनादौश्चिदचितौ

स्वमुदिश्य श्रीमानीति वदती वागौपनिषदी

उपयोपेयत्वे तदीह तव तत्वं न तू गूणौ

अतस्त्वां श्रीरंगेशय ! शरणमव्याजमभजम ||८८||

हे रंगनाथ भगवान ! उपनिषद घोषित करते हैं कि श्रीमन्नारायण भगवान श्रुष्टि, स्थिति, नियमन द्वारा चित और अचित से सेवा लेते है। चेतनों के लिये उपाय और उपेय दोनों आप ही है, इसलिये मैं पूर्ण रूप से आप पर ही निर्भर रहता हूँ । जब हम परमपद पहुँचते हैं तब उपेय मुख्य हो जाता है लेकिन उपाय गौण हो जाता है ।

उपर के श्लोक और अन्य प्रमाणों द्वारा सिद्ध होता है कि उपाय और उपेय दोनों भगवान ही है, क्या आचार्य को भी उपाय और उपेय बना सकते है ?

हाँ, जैसे हमने पहले देखा है , “ उपाय उपेय भावेन तमेव शरणम व्रजेत ”, एक शिष्य अपने आचार्य को उपाय और उपेय के रूप में स्वीकार कर सकता है । यहाँ पर तमेव में ‘एव’ शब्द यह सम्बोंधित करता है कि “ सिर्फ ” उद्धारक आचार्य ही अपने शिष्य को मोक्ष कि प्राप्ति करा सकते है । ( भगवान आचार्य को पूर्ण रूप से अधिकार देते है जैसे रामानुज स्वामीजी को दोनों विभूतियों का अधिकार दिया था )

अब आगे, प्रथम पर्व ( भगवान ) से चरम पर्व ( आचार्य ) को श्रेष्ठ बताया गया है ।

  • भगवान का आश्रय लेने पर चिंता रहती है कि भगवान अपने स्वतंत्र गुण के कारण हम लोगो को परमपद में या संसार में भी रख सकते है । आचार्य का आश्रय लेने पर चिंता नहीं रहती है क्योंकि आचार्य भगवान के परतंत्र है और निर्हेतुक कृपा करके अपने शिष्य को परमपद में पहूँचाते है ।
  • भगवान जीवात्मा को आचार्य के द्वारा ही स्वीकार करते हैं, आचार्य कृपा करके किसी को भी अपना लेते है और जीवात्मा के साथ भगवत संबंध बनाते है ।
  • जब आचार्य जीव को स्वीकार करते हैं तब वे जीव से भगवत विषय में रुचि कि अपेक्षा नहीं करते है , वे स्वयं कृपा करके सब कुछ बताते है । लेकिन जीव का आचार्य संबंध होने पर ही भगवान कृपा कर उसको स्वरूप ज्ञान प्रदान करते हैं ।
  • जब हमारा संबंध श्री रामानुज स्वामीजी के साथ है, जो हमे मोक्ष देनेवाले है, तो हम लोग भी मधुरकवि स्वामीजीकि तरह “ देवु मररियेन ” ( मुझे शठकोप स्वामीजी को छोड़कर दूसरे कोइ भी देव मालूम नहीं है )बोल सकते है ।

यहाँ पर प्रश्न उठता है कि रामानुज स्वामीजी के पहिले और बाद में सभी आचार्यों के उद्धारक रामानुज स्वामीजी है तो यामुनाचार्य स्वामीजी ने नाथमुनी स्वामीजी को उपाय क्यों माना ।

आलवंदार के श्लोक में

“ नाथायनाथमुनयेत्रपरत्रचापि ”

“ पितामहं नाथमुनीं विलोक्य प्रसिद मद्वृत्तमचिन्तयित्वा ”

 

इसका विश्लेषण देखते है, नाथमुनी स्वामीजी ने सभी रहस्य अर्थों को स्वप्न में श्री भविष्यदाचार्य को प्रदान किया और भविष्यदाचार्य के विग्रह को श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी को प्रदान किया और कहा कि आगे होनेवाले मेरे पौत्र श्री यामुनमुनी को सब रहस्य अर्थों को बताकर विग्रह को प्रदान करना ।

 

यामुनाचार्य स्वामीजी के अवतार के पहिले ही पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी का प्रस्थान हो गया, इसलिए उन्होने राममिश्र स्वामीजी को सभी रहस्य अर्थ को प्रदान किया और यामुनाचार्य स्वामीजी को बताने कि आज्ञा दि ।

 

राममिश्र स्वामीजी ने यामुनाचार्य स्वामीजी को रहस्य अर्थ बताया और भविष्यदाचार्य के श्री विग्रह को प्रदान किया ।

 

यामुनाचार्य स्वामीजी नाथमुनी स्वामीजी का उपकार मानते हैं, क्योंकि उनके अवतार के पहिले ही उन पर पूर्ण विश्वास किया, संप्रदाय के रहस्य अर्थों को बताया, भविष्यदाचार्य के श्रीविग्रह को प्रदान किया, उनकी कृपा के कारण कांची में श्री रामानुज स्वामीजी के साक्षात दर्शन हुये । इन सभी कारणों से यामुनाचार्य स्वामीजी का नाथमुनी स्वामीजी के प्रति विशेष प्रेम और लगाव था । स्तोत्र रत्न में कहा कि मेरे उपाय और उपेय दोनों श्री नाथमुनी स्वामीजी ही है । लेकिन उनके हृदय मे श्री रामानुज स्वामीजी के प्रति भी विशेष प्रेम और लगाव है जैसे नाथमुनी स्वामीजी के साथ है । स्तोत्र रत्न के ५वें श्लोक में रामानुज स्वामीजी के प्रति अपनी आत्मीयता को दर्शाते है ।

 

मातापितायुवतयस्तनया विभूतिः

सर्वं यदेव नियमेन मदन्वयानाम्

आदस्य नः कुलपतेर्वकुलाभिरामं

श्रीमत्तदड़िघ्रयुगलं प्रणमामी मुर्ध्ना ॥

मैं श्रीशठकोप स्वामीजी के चरणारविन्दों ( श्री रामानुज स्वामीजी को शठकोप स्वामीजी के चरणारवीन्द कहते है ) का वन्दन करता हूँ , जो कि श्रीवैष्णवों के मुख्यस्थ है, सुन्दर पुष्पों से अलंकृत हुये है। मेरे और मेरे शिष्यों के लिए माता, पिता, स्त्री, पुत्र, धन सभी श्री रामानुज स्वामीजी ही है ।

यहाँ पर यामुनाचार्य स्वामीजी, शठकोप स्वामीजी के चरणों को ही सब कुछ मानते है, जो साक्षात श्री रामानुज स्वामीजी ही है । स्तोत्ररत्न के दूसरे श्लोक में यामुनाचार्य स्वामीजी नाथमुनी स्वामीजी का उपकार मानते हुये सिर्फ अपने उपाय – उपेय ( नाथमुनी स्वामीजी ) के बारे में कह रहे हैं । लेकिन ५ वें श्लोक में ‘ मेरे और मेरे शिष्य ’ के उपाय – उपेय के बारे में कहते हैं । इससे यह सिद्ध हो जाता है कि रामानुज स्वामीजी ही सबके उद्धारक हैं ।

– अडियेन सम्पत रामानुजदास,

– अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास

source : http://ponnadi.blogspot.in/2012/12/charamopaya-nirnayam-ramanujar-our-saviour-2.html

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