जीयर तिरुवडिगले शरणम्

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

मूल लेखक (तमिल) श्री उभय वेदान्त विभूषित रामकृष्ण ऐयंगार

आल्वार तिरुनगरी तिरुमलै नल्लान चक्रवर्ती श्री उभय वेदान्त विभूषित रामकृष्ण ऐयांगर स्वामीजी एक ग्रेट उभय वेदान्त विद्वान हुये जो इस लीला विभूति में पिछले शतक में बिराजें।उनका तमिल और संस्कृत भाषाओंपर अद्वितीय प्रभुत्व था।अपने वाचिक कैंकर्य में उन्होने श्रीवैष्णव संप्रदाय के अधिकतम गहरे तत्त्वोंपर अनेक कालक्षेप किए हैं।उन्होने पूर्वाचार्योंके दो दिव्य ग्रंथोंपर व्याख्यान भी लिखे हैं।प्रथम “स्वर्ण कुंचिका” जो श्री पाराशर भट्टर स्वामीजी के “गुण रत्न कोषम्” पर उत्कृष्ट व्याख्यान है। द्वितीय “अमूध विरून्थु”है श्री तिरुवरंगथु अमूधनार स्वामीजी के “श्री रामानुज नूट्रन्दादि/प्रपन्न गायत्री”का विस्तृत विश्लेषण है। श्री स्वामीजी के ये दोनों ग्रंथ हमारे सत संप्रदाय के सार को प्रदर्शित करते हैं।

उन्होने तमिल में छोटे लेख भी लिखे हैं। उनका एक लेख पढ़नेका भाग्य हुआ, जो लेख तिरुवल्लीकेन्नि मंत्र पुष्प भाष्य ऐयंगार स्वामीजी के शताभिषेक माला स्मरणिका में छपा था। अति पवित्रता, सरल तमिल भाषा, उत्कृष्ट शब्द प्रवाह, और अति महत्त्वपूर्ण विषय ये सब उस लेख को विशेष बनाते हैं और हमारे आचार्य कोईल सेल्वा श्री वरवरमुनी स्वामीजी के वैभव का परम आनंद हमे प्राप्त होता है।दास सभी के लाभ के लिए इस लेख को हिन्दी में भाषांतरित करनेका प्रयत्न कर रहा है। श्री स्वामीजी के अपने सुंदर शब्दोंमें लेख पढ़ने का अनुभव करनेकी तुलना इस भाषांतरित लेख से नहीं हो सकती। फिर भी यह भाषांतर से पाठक गण कम से कम मूल लेखक का भाव समझने का प्रयास कर सकेंगे यह आशा है।

श्री शठकोप स्वामीजी, श्री रामानुज स्वामीजी, श्री वरवरमुनी स्वामीजी के “सहसरगिती” से संबन्धित विशेष वैभव का वर्णन इस लेख में सुंदर रीति से वर्णित है। यह लेख श्री रंगनाथ भगवान का अपने परम प्रिय आचार्य श्री वरवरमुनी स्वामीजी के प्रति परम अनुरक्ति तथा कृतज्ञता को प्रदर्शित करता है।

मूल लेख देखें: मूल लेख और् http://ponnadi.blogspot.in/2013/02/jiyar-thiruvadigale-charanam.html

इस प्रस्तावना के पश्चात अब लेख की ओर बढ़ेंगे:

श्रीमन्नारायण ही सर्वोच्च भगवान है । सभी संवेदनशीलजीवों के पिता है । लेकिन अनेक दिनों से किसी को पिता के रूप में अपनाना चाहते थे । दशरथजी के पुत्र के रूप में अवतार लेकर उनकी इच्छा पूर्ति हुयी । जगत पिता रहते हुये भी दशरथजी के पुत्र के रूप में अवतार लेकर चक्रवर्ती श्रीराम के नाम से प्रसिद्ध हुये । भगवान सभी गुणों से परिपूर्ण है । भगवान स्वयं दशरथजी को पिता के रूप में स्वीकार किये है तो हम लोग दशरथजी के गुणों का वर्णन कैसे कर सकेगें ? कालीदासजी एक श्लोक के द्वारा दशरथजी का वर्णन करते है,“अनेना कथिता राज्ञ गुनना दशरथस्य ही; प्रसूधिं चकमैयस्मिन त्रैलोक्य प्रभावोपीयत”

जो अपने इस शरीर को देते है वे पिता है । जो स्वरूप ज्ञान कराते है वे आचार्य है । आचार्य पिता से भी ज्यादा सराहनीय है । पिता द्वारा दिया गया शरीर अनित्य है और आचार्य द्वारा दिया गया स्वरूप ज्ञान नित्य है । श्रीमन्नारायण भगवान भी आचार्यों में एक है , जो की अपने गुरु परम्परा में प्रथम स्थान पर विराजमान है । भगवान के कोई आचार्य नहीं थे , इसलिये भगवान अपने लिये आचार्य बनाना चाहते थे । वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार करके अपनी इच्छा को पूर्ण किया । जो पूर्ण जगत के आचार्य है , सर्वज्ञ है , ऐसे भगवान वरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य बन गये है, तो वरवरमुनि स्वामीजी का वैभव कितना होगा ?

भगवान के अनेक अवतारों में पिता तो थे, लेकिन उनके वचनों के अनुसार “ पीतरम रौचयामास तधा दशरथम नृपम ”, अत्यन्त आनन्द के साथ दशरथजी को पिता के रूप में स्वीकार किया । वैसे ही भगवान के आचार्य तो थे ( जैसे वशीष्ठजी , सान्दिपनीजी ) लेकिन वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार करने के लिये अत्यन्त उत्सुकता थी इसलिये अपने अर्चावतार के स्वरूप में अर्चा समाधी को भी भंग कर दिया ।

वामन भगवान कश्यप ऋषी के पुत्र के रूप में अवतार लिये , महाबली से भीक माँगने के लिये अपने पिता को छोड़कर चले गये । दशरथजी के पुत्र श्रीराम उनके साथ ही रहते हुये सेवा किया करते थे । वशीष्ठजी के साथ गुरुकुल में रहते हुये 12 वर्ष की आयु तक उन्होने अध्ययन किया । चित्रकूट में रहते हुये अपने गुरु वशीष्ठजी की अयोध्या लौटने की आज्ञा का उल्लंघन करते हुये उनके साथ तर्क भी किया । कृष्ण भगवान ने सान्दिपनी ऋषि के आश्रम में रहकर 64 दिनों में 64 कलाओं को सीखा । शिष्य को आचार्य के सन्निधि में रहने की मर्यादा को बनाये रखने के लिये मात्र उन्होने कुछ दिनों तक सान्दिपनी ऋषि के आश्रम में वास किया और बाद में वहाँ से चले गये । कुछ दिनों तक आचार्य के सन्निधि में थे लेकिन उनको उत्सुकुता नहीं थी और वहाँ पर रहते हुये उन्होने अपनी श्रेष्ठता को दिखाया ( अपने आचार्य के पुत्र को लाकर )। सान्दिपनीजी को गुरु दक्षिणा के रूप में उनके पुत्र को देकर अत्यन्त विशेष कार्य किया ।

लेकिन जब रंगनाथ भगवान ने वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार किया तब पूर्ण रूप से सहस्त्रगीति के ईडु ( द्वय महामंत्र का विस्तार रूप से पूर्ण व्याख्यान है ) कालक्षेप को एक वर्ष तक अत्यन्त श्रद्धा के साथ सुना । वेदांताचार्य न्यास तिलकम में कहते है “ दत्ते रंगी निजमपी पदमं देशिक आदेशकांक्षी ” ,श्री रंगनाथ भगवान अपने आचार्य की आज्ञा और इच्छानुसार अपने चरणारविन्दो ( परमपद ) को अनेक लोगो के लिये उपलब्ध कराया । कृष्ण भगवान ने सांदीपनी ऋषि के आश्रम में अध्ययन के लिये रहने का सिर्फ नाटक किया , लेकिन रंगनाथ भगवान ने अर्चावतार में ऐश्वर्य आदि गुणों को ध्यान न देते हुये अत्यन्त श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ एक शिष्य की तरह कालक्षेप सुना ।

सांदीपनी ऋषि के पुत्र जिनकी मृत्यु अनेक वर्षों पूर्व हुयी थी उनको भगवान कृष्ण ने पुनः लौटाया । रंगनाथ भगवान ने अपनी वर्चस्व को भूलकर अपने आचार्य वरवरमुनि स्वामीजी को अत्यन्त सुन्दर तनियन का निवेदन किया , जिसका प्रारम्भ “ श्रीशैलेश दयापात्रम …..” से होता है , भगवान तनियन का निवेदन करते हुये अत्यन्त भावुक हो गये और अन्य किसी वस्तु को भेंट करना भूल गये । यह तनियन रामानुज स्वामीजी के तनियन   “ योनित्यमच्युत…….” के जैसे बड़ी नहीं है । वरवरमुनि स्वामीजी के द्वारा सहस्त्रगीति के कालक्षेप को सुनकर भगवान श्रीरंगनाथ परमानन्द से अत्यन्त भावुक होकर पिघल गये और एक बड़े श्लोक की भी रचना नहीं कर सके ।

वशिष्ट और सांदीपनी ऋषि भगवान के विभवावतार में आचार्य बने । वरवरमुनि स्वामीजी अर्चावतार भगवान के आचार्य बनकर विशेष उदाहरण दिया । अनेक आल्वार और आचार्य अर्चावतार भगवान के आचार्य बने लेकिन वरवरमुनि स्वामीजी जैसे विशेष उदाहरण कोई भी नहीं है ।

श्री शठकोप स्वामिजी

आचार्य हृदय में अजगीय मणवाल पेरुमाल नायनार कहते हैं की श्री शठकोप स्वामिजी सहस्रगिती (जो अर्चावतार भगवान पर केन्द्रीकृत है)में भगवान को निर्देश देते हैं और भगवान एक योग्य शिष्य के रूप में श्रीशठकोप स्वामीजी के निर्देश का पालन करते है । गोदम्बाजी कृष्ण भगवान को उत्थापन के बाद कहती है “ उनक्के नामाल्शे य्वोम् ” याने “हम सिर्फ आपके ही शेषी है ।” अभी तक भगवान को वरवरमुनि स्वामीजी की तरह कोई भी पूर्ण ग्रंथ का कालक्षेप नहीं किये है ।

तिरुक्कनमंगई भक्तवत्सल भगवान परकाल स्वामीजी के पासूरों ( जो की संगीत के साथ जोड़े गये है ) “ निंत नक्कूम कुरीप्पागिल कर्कालाम कवियीन पोरुल्थनै ” आल्वार कहते है “अगर आपको इच्छा है तो मेरे पासूरों को सीख सकते है ” और भगवान को सलाह देने की इच्छा भी व्यक्त करते है । पेरियावाचन पिल्लै अपने व्याख्यान में कहते है “ क्या भगवान आलवार से सीखना नहीं चाहते है ?” पेरियावाचन पिल्लै के दिव्य वचन –
स्वतः सर्वज्ञानाय इरुणमातिरुन्ताई पौगातू इन्नौडे अधीकारीक्किल अरीयलाम । ओरु

वशिष्ठनौड सान्दीपनीयौड़े तलनीनरु अधीकारीक्कक्कदव अवनुक्कू

तिरुमंगै आल्वारोड़े अधिकारिक्कै तल्वो ?

अगर आप गर्व से अपने आप को सर्वज्ञ ( जो सब कुछ जानता है ) समझते है तो , आप मुझसे कुछ भी नहीं जान सकते है । अगर आप में विनम्रता है तो आप मुझसे जान सकते है । भगवान विनम्रता से वशिष्ठजी , सान्दीपनी ऋषि से ( जो स्वयं अपने बल पर ज्ञान प्राप्त किये है ) अध्ययन किया था तो आलवारों के ( जिनको भगवान की कृपा से ज्ञान प्राप्त हुआ ) द्वारा अध्ययन करने से उनके चरित्र को

अभी तक अर्चावतार में भगवान ने आलवारों द्वारा अध्ययन करने की इच्छा को प्रकट किया है लेकिन अध्ययन किया है या नहीं मालूम नहीं । ( अनुवादक टिप्पणी : तिरुक्कनमंगई भगवान कि अभिलाषा पूर्ति करने के लिये कलिवैरिदास स्वामीजी कलियन के अवतार और पेरियावाचन पिल्लै को कृष्ण भगवान के अवतार बताये गये जो विभवातार में हुये है अर्चावतार में नहीं हुये है ।)

रामानुज स्वामीजी

रामानुज स्वामीजी को आलवारों कि गोष्ठी में समान स्तर पर माना जाता है । अर्चावतार में भगवान अनेक संदर्भों में रामानुज स्वामीजी के शिष्य बने है । तिरुमला में वेंकटेश भगवान रामानुज स्वामीजी द्वारा संस्कृत वेद के सार को सुना , जो कि वेदार्थ संग्रह के रूप में संग्रहीत है । तिरुमला मंदिर में अभी भी हम लोग रामानुज स्वामीजी के दर्शन ज्ञान / उपदेश मुद्रा में करते है । रामानुज स्वामीजी वेंकटेश भगवान को शंख चक्र प्रदान करके शिष्य के रूप में स्वीकार किया ।

तिरुक्कुरुगुंडी में भगवान ने रामानुज स्वामीजी द्वारा शिष्य के रूप में द्वय महा मंत्र का उपदेश सुना और श्रीवैष्णव नम्बि के नाम से जाने जाते है ।

वदवेंकटवन ( द्राविद देश के उत्तर भाग के वेंकटेश भगवान ) संक्षेप में संस्कृत वेद के सार को सुना । तेन्नरंगन ( द्राविड देश के दक्षिण भाग के रंगनाथ भगवान ) द्राविड वेद के सार को अत्यन्त विस्तार से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा सुना जो कि 36000 ईडु व्याख्यान के रूप में प्रसिद्ध हुआ । अनेक संदर्भों में हम देखते है श्रीरंगनाथ भगवान श्री रामानुज स्वामीजी द्वारा गद्यत्रय का व्याख्यान सुने थे , वे सहस्त्रगीति की व्याख्या भी सुन सकते थे , लेकिन क्यों नहीं सुने ?

ईडु व्याख्यान जो द्रामीडोपनिषद के नाम से प्रसिद्ध है उस समय उपलब्ध नहीं था । ईडु व्याख्यान को कलिवैरीदास स्वामीजी के द्वारा भी सुन सकते थे , लेकिन नहीं सुना । क्योंकि वे वरवरमुनि स्वामीजी के द्वारा ही इस व्याख्यान का आनंद लेना चाहते थे । वरवरमुनि स्वामीजी ने श्रीरंगनाथ भगवान की अनेक दिनों की इच्छा को पूर्ति किया ।

श्री वरवरमुनी स्वामीजी

हम समझ सकते है की भगवान के संकल्पानुसार सहस्त्रगीति के व्याख्यान को सुनने की इच्छा पूर्ति करने के लिये रामानुज स्वामीजी का अवतार द्रविड़ देश के उत्तर भाग में श्रीपेरुम्बूदूर में हुआ और उन्होने वेदान्त के सार को स्थापित किया, वरवरमुनि स्वामीजी का अवतार द्रविड़ देश के दक्षिण भाग में आलवार तिरुनगरी में हुआ और उन्होने द्राविड वेद को प्रस्तुत किया, वरवरमुनि स्वामीजी के आचार्य श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी ने द्राविड वेद पर ध्यान देने के लिये आज्ञा कि थी ।

वरवर मुनि स्वामीजी का वैभव अवर्णनीय है , स्वयं श्री रंगनाथ भगवान ईडु महाव्याख्यान के कालक्षेप को स्वामीजी द्वारा श्रवण किया । अब रंगनाथ भगवान अंतिम दिन शातुमुरै के समय में तनियन का निवेदन कैसे किये देखेगें ।

सहस्त्रगीति में श्री रंगनाथ भगवान का वैभव प्रकाशित होता है । हम लोगो के लिये सहस्त्रगीति के भीतरी अर्थ को समझना कठीन है । मधुरकवि स्वामीजी शठकोप स्वामीजी द्वारा सहस्त्रगीति को सीधा सुना था । उनके बुद्धिमान प्रकृति के कारण वे सहस्त्रगीति के सार को जान सके । लेकिन मधुरकवि स्वामीजी कहते है शठकोप स्वामीजी के विशेष कृपा के कारण सहस्त्रगीति का सार जान पाये । उनके दिव्य वचन “ वेधात्तीन उतपोरुल निर्कपाड़ी एन्नेन्यचूल निरुत्तिनान ” याने शठकोप स्वामीजी ने मेरे हृदय में वेद के सार को स्थापित किया है । पूर्ण वेदो का अर्थ ही भगवान है जैसे “ वैदप पोरुलेयन वैंगतवा ” वेदो का सार भगवान के भक्त ( भागवत ) है । मधुरकवि स्वामीजी को ज्ञात हुआ की शठकोप स्वामीजी भागवतों के दास बनाना चाहते है । शठकोप स्वामीजी को भागवत के रूप में जानकर मधुरकवि स्वामीजी उनके दास बन गये ।

मधुरकवि स्वामीजी कहते है शठकोप स्वामीजी को छोड़कर वे दूसरे किसी को जानते भी नहीं है । सहस्त्रगीति के समापन में “ आलवार तिरुवडिगले शरणम ” बोला जाता है । इसका अर्थ है मै आलवार के चरणारविन्दो का ही आश्रय लेता हूँ । यामुनाचार्य स्वामीजी कहते है “ परत्र चापि,नित्यं यदीय चरणो शरणम प्रपद्ये ” याने इस लोक में और अन्य लोक मै श्री नाथमुनी स्वामीजी के चरणो की शरण ग्रहण करता हूँ । मधुरकवि स्वामीजी के बाद नाथमुनी स्वामीजी ने शठकोप स्वामीजी द्वारा सहस्त्रगीति को सीखा, प्रपन्न कुल के सामने उसको प्रस्तुत भी किया और सहस्त्रगीति के अंत मेँ “ आलवार तिरुवडिगले शरणम ” अनुसंधान करने की प्रथा को प्रारम्भ किया ।

रामानुज स्वामीजी ने सहस्त्रगीति के ऊपर व्याख्यान लिखने की प्रथा ( पिल्लान को व्याख्यान करने के लिये आज्ञा दी ) को प्रारम्भ किया । सहस्त्रगीति पर कालक्षेप गोष्ठी भी किया । उस समय रामानुज स्वामीजी को शठकोप के चरणारविन्दो के रूप मेँ स्वीकार किया । शठकोप स्वामीजी के चरणारविन्दो पर अपने जीवन को केन्द्रित किया । रामानुज स्वामीजी को वेदो के सार रूप मेँ भी स्वीकार किया । प्रबंध गोष्ठी के समापन मेँ “ आलवार तिरुवडिगले शरणम ” के साथ “येम्पुरमानार तिरुवडिगले  शरणम ” बोलने की प्रथा को प्रारम्भ किया । वेदान्तदेशिक स्वामीजी कहते है प्रपन्नों के लिये भगवान से ज्यादा रामानुज स्वामीजी मुख्य है ।

आज के दिनों मेँ शठकोप स्वामीजी और रामानुज स्वामीजी के वैभव वर्णन के साथ “ जीयर तिरुवड़ीगले शरणम ” भी अनुसंधान किया जाता है ,जिसका अर्थ है वरवरमुनि स्वामीजी के चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ । यह प्रथा श्रीरंगनाथ भगवान को अत्यंत प्रिय है क्योंकि भगवान ने स्वयं श्री वरवरमुनि स्वामीजी की तनियन का निवेदन किया और आज्ञा किया की जहाँ पर भी प्रबंध गोष्ठी का अनुसंधान होता है वहाँ पर प्रारम्भ और अंत मेँ तनियन का निवेदन होना चाहिये ।

जीयर ( बिना किसी उपसर्ग के ) याने वरवरमुनि स्वामीजी को संबोधित करता है ।  कई बार वनमामलै जीयर , पट्टरपिरान जीयर से अलग समझने के लिये पेरीय जीयर ( बड़े / महान ) भी कहा जाता है ।

शठकोप स्वामीजी , रामानुज स्वामीजी और जीयर ये तीनों भागवत है , जो की वेदों का सार है ( द्राविद वेद और संस्कृत वेद ) । रामानुज स्वामीजी शठकोप स्वामीजी के चरणारविन्द के स्वरूप मेँ है , वरवरमुनि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी के अवतार है , इन तीनों की महिमा समान स्तर पर है । इसलिये वरवरमुनि स्वामीजी के समय के विद्वानों ने इन तीनों को वेदों के सार रूप मेँ जानकर प्रबंध गोष्ठी के अंत मेँ “ आलवार तिरुवडिगले शरणम, येम्पुरमानार तिरुवडिगले शरणम ,जीयर तिरुवड़ीगले शरणम ” अनुसंसधान करना प्रारम्भ किया ।

शठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति को जन्म देनेवाली माता है , “इनरा मुथल ताय ” , रामानुज स्वामीजी सहस्त्रगीति को पालन पोषण करनेवाली माता के रूप मेँ है , “वलार्थत इधथाय ” और वरवरमुनि स्वामीजी सहस्त्रगीति का विस्तार से व्याख्यान करने वाले माता के रूप मेँ है , “ इत्तुप पेरुक्कर ”। इनके वैभव को जानते हुये प्रबंध गोष्ठी के अंत मेँ इन तीनों महाभागवतों के महिमा के सार का अभिवादन करने लगे ।

इसके अलावा भगवान, भागवत और आचार्य ही वेदो का उदेश्य है, भगवान वेदों का बाहरी अर्थ है और भागवत / आचार्य भीतरी अर्थ है । “ गुरुदेव परब्रम्ह ” के अनुसार सभाविक रूप से आचार्य और भागवत भी है । इस प्रकार आचार्य, भगवान , भागवत और आचार्य के रूप मेँ है । अन्य आचार्यों से यह आचार्य भिन्न भी है । यह तीनों आचार्य विशेष रूप से उद्धारक आचार्य ( जो हमे इस संसार से निकालकर परमपद मेँ पहुंचाते है ) । पूर्ण जानकारी के लिये “चरमोपाय निर्णय उद्धारक आचार्य”  और “चरमोपाय निर्णय” देखे । विद्वानों द्वारा इन तीनों आचार्यों को वेदों का सार बताया गया है ।

“ आलवार येम्पुरमानार जीयर तिरुवड़ीगले शरणम ” ऐसे भी अनुसंसधान किया जाता है । जीवन चरित्र से समझकर वर्णन किया जाता है की तीनों आचार्यों के अवतार स्थल आलवार तिरुनगरी है । सहस्त्रगीति के 5.2.1 पाशूर मेँ शठकोप स्वामीजी रामानुज स्वामीजी का वर्णन करते है “ पोलिग पोलिग पोलिग ……. कलियुम केड़ुम कंडु कोणमिन ”। शठकोप स्वामीजी मधुरकवि स्वामीजी को अपने अर्चा विग्रह प्रदान करने के पहिले भविष्यदाचार्य का अर्चा विग्रह प्रदान किया और मधुरकवि स्वामीजी ने उस रामानुज स्वामीजी के अर्चा विग्रह की सेवा किये । वररमुनी स्वामीजी ने भविष्यदाचार्य के अर्चा विग्रह को अलग मंदिर बनाकर सेवा किये । आज भी दर्शन कर सकते है । आलवार तिरुनगरी ( जिससे भगवान, आलवार और आचार्यों का संबंध है ) में रामानुज स्वामीजी ने भविष्यदाचार्य के रूप मेँ 4000 वर्ष पूर्व श्री पेरुम्बुदूर के पहिले ही अवतार लिया । ( अनुवादक टिप्पणी : शठकोप स्वामीजी और वरवरमुनि स्वामीजी का अवतार आलवार तिरुनगरी मेँ हुआ है )

रंगनाथ भगवान सहस्त्रगीति के आरंभ मेँ प्रकट होते है ऐसा बाह्य अर्थ है । सहस्त्रगीति का भीतरी अर्थ है की वरवरमुनि स्वामीजी ही सर्वश्रेष्ठ है । रंगनाथ भगवान के चरणारविन्द ( जिससे पूर्ण ब्रम्हान्ड को मापा ) बाह्य अर्थ का सार है और वरवरमुनि स्वामीजी के श्रीचरणारविन्द भीतरी अर्थ का सार है । वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा बाह्य और भीतरी अर्थ के सार को सुनने के बाद रंगनाथ भगवान आश्चर्य चकित होते है की “ इससे भी सरल अर्थ मेँ कैसे वर्णन किया जा सकेगा ।” शठकोप स्वामीजी की सराहना करते हुये आभार भी व्यक्त नहीं कर सके और शातूमूरै के समय मेँ “ श्रीशैलेश दयापात्रम ” तनितन का निवेदन किया ( जो की सभी मंत्रो का आभूषण है ) श्री देवराज स्वामीजी द्वारा वरवरमुनि स्वामीजी शतकम के 63 वें श्लोक में है ।

आत्मा णात्मब्रमितिविरहात् पत्युरत्यण्तदूरः

गोरे तापत्रिदयगुहरे कूर्न्णमाणोजणोयम्

पादच्चायाम् वरवरमुने! प्रापितोयत्प्रसादात्

तस्मै देयम् तदिहकिमिव स्रीणिदेर् वर्त्तते ते

श्री वरवरमुनि स्वामीजी को आभार व्यक्त कैसे करेगें जिन्होने संसारियों को ( जो अपने आप को भगवान से दूर रखते है , जिन्हे शरीर और आत्मा मेँ अंतर मालूम नहीं है , इस संसार के त्रिविध ताप से पीड़ित है ) श्रीरंगनाथ भगवान के श्रीचरणों का आश्रय लेने के लिये प्रोत्साहित किया । श्रीरंगनाथ भगवान भी वरवरमुनि स्वामीजी की कृपा का बदला नहीं चुका सकते है । देवराज स्वामीजी कहते है भगवान इतने भावुक हो गए थे की तनियन का निवेदन छोड़कर और कुछ निवेदन भी नहीं कर पाये ।

इस श्लोक मेँ “ पद छाया ” शब्द उसमे पद याने श्री चरण जो उपाय को और छाया जो उपेय को संबोधित करते है । यहाँ पर रंगनाथ भगवान के श्रीचरणों को उपाय और शांत छाया जो की हमारे सभी दर्द मिटाकर आराम देनेवाले उपेय के रूप मेँ है । पहले सहस्त्रगीति के बाह्य अर्थ मेँ भगवत शेषत्व (भगवान के शेष बनाकर रहना) को बताया गया । “ पद छाया ” के द्वारा सहस्त्रगीति के भीतरी अर्थ में भागवत शेषत्व ( भागवत / आचार्य के शेषी बनकर रहना ) को बताया गया है । जो अत्यंत पढे लिखे विद्वान है वे भीतरी अर्थ मेँ वरवरमुनि स्वामीजी को संबोधित करते है । श्लोक के रूप में कहा गया है “ विष्णु शेषी तदीय शुभगुणानिलयो विग्रह श्रीशठारी : श्रीमान रामानुजार्य पदकमलयुगम बाती रमयम तदीयम ”,शठकोप स्वामीजी को भगवान के दिव्य अवतार के रूप मेँ जाना जाता है , रामानुज स्वामीजी को शठकोप स्वामीजी के श्रीचरणों के रूप मेँ जाना जाता है और रंगनाथ भगवान के श्रीचरणों के रूप मेँ भी जाना जाता है । श्रीवरवरमुनि स्वामीजीको रामानुज स्वामीजी पर अपार निष्ठा और निर्भरता है । यतीन्द्र प्रवणर ( वरवरमुनि स्वामीजी जो रामानुज स्वामीजी से संलग्न है ) रामानुज स्वामीजी के छाया के समान है ।

इस प्रकार श्री रंगनाथ भगवान ने “ श्रीशैलेश दयापात्रम ……….” तनियन की रचना करके समर्पित किया ।

  • वरवरमुनि स्वामीजी के वैभव को स्थापित किया , जिन्होने अनेक लोगो में परिवर्तन लाया है , जो की इस संसार में लिप्त थे, जिनको शरीर और आत्मा में अंतर मालूम नहीं था उनको शास्त्र के सारतम भाग याने भागवतों के परतंत्र कर दिया ( पूर्ण रूप से भागवतों पर अवलम्ब रहना )
  • वरवरमुनि स्वामीजी को अपनी कृतज्ञता व्यक्त किया ( कालक्षेप सुनकर आचार्य के रूप में स्वीकार किया )

प्रबंध गोष्ठी के प्रारम्भ में और अंत में इस तनियन का अनुसंधान करने के लिये रंगनाथ भगवान ने आज्ञा कि ।

“ हरि ” ही वेदों का सार है इसे संकेत करने के लिये संस्कृत वेद के प्रारम्भ में और अंत में हरी का निवेदन किया जाता है । द्राविड वेद का भीतरी अर्थ भागवत शेषत्व है, रमज्यामातृ मुनि जो कि भागवत शेषत्व का प्रतीक है । इसलिये भगवान कि इच्छानुसार द्राविड़ वेद के प्रारम्भ और अंत में तनियन का अनुसंधान किया जाता है । संस्कृत वेद सब लोगों के लिये समान है । इसलिये बाहरी अर्थ याने “ हरी ” है , उसको प्रारम्भ में और अंत में निवेदन किया जाता है । परम सात्विक लोग ( परम वैष्णव ) वेद के भितरि अर्थ को जानने के लिये हरि और प्रणव के गहराई तक जाते है । (सामान्य लोग भगवान का स्मरण करके रुक जाते है ) पूर्ण द्राविड वेद का उदेश्य सिर्फ परम वैष्णवों के लिये ही है , इसलिये भगवान श्रीवैष्णवों को आज्ञा करते है की वरवरमुनि स्वामीजी की तनियन को प्रारम्भ में और अंत में निवेदन करना । संस्कृत वेद सिर्फ भगवान को ही बताता है क्योंकि उसमे संसार और मोक्ष दोनों वर्णित है । द्राविड वेद में सिर्फ भगवत कैंकर्य को केन्द्रित करता है । यहाँ पर रम्यजामात्रुमुनी को आभार प्रकट करना उचित है क्योंकि वे सिर्फ मोक्ष के मार्ग को ही बताते है ।

श्री वरवरमुनी स्वामीजी ने अपने आप को शास्त्रोंके सारतम ज्ञान का मुख्य स्रोत इस रूप में कभी भी सामान्य जनोंमें प्रकाशित नहीं किया, परन्तु जो शिष्य उनसे शिक्षा प्राप्त किए थे उन्हे यह पूर्ण रूप से ज्ञात था। उन्होने वो गुह्यतम ज्ञान अपने आप में सुरक्षित रखा। परम कृपानिधान श्री रंगनाथ भगवानने भविष्य में भी सभी को श्री वरवरमुनी स्वामीजी का दिव्य वैभव का ज्ञान हो इस उद्देश्य से श्री वरवरमुनी स्वामीजी को तनियन अर्पण की,“श्रीशैलेश दयापात्रं …” और आदेश भी दिया की यह तनियन द्रविड़ वेदोंके पाठ के पूर्व और अंत में निवेदन करना चाहिए। (हमारे उज्जीवन के लिए)

फलत:, आज भी श्री रंगनाथ भगवान के दिव्य आदेश से हम सभी दिव्य प्रबंध (तथा दिव्य प्रबंध संबन्धित ग्रंथ जैसे व्याख्यान, रहस्य ग्रंथ, ई.) के पाठ के सम्पन्न होनेपर “जीयर तिरुवडिगले शरणम” ऐसा निवेदन करते हैं।

“जीयर तिरुवडिगले शरणम”

ऐसा निवेदन करते हैं।

इसी तरह श्री महा विद्वान अलवार तिरुनगरी तिरुमलै नल्लान चक्रवर्ती का यह सुंदर लेख सम्पन्न हुआ।

श्री उ. वे. रामकृष्ण ऐयंगार स्वामी

Source: http://ponnadi.blogspot.in/2013/02/jiyar-thiruvadigale-charanam.html

अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास

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