आचार्य निष्ठा

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

e-book – https://1drv.ms/b/s!AiNzc-LF3uwygn9RD8hEBmJPCroZ

प्रस्तुत लेख को, प्रारम्भ मे श्रीरामानुज दर्शन ई-पुस्तिका के सम्पादकीय मे सम्पादित किया था | विभिन्न भाषाओं मे, गुरु-परम्परा के वैभव सूची का संग्रहण, इस लिन्क http://acharyas.koyil.org/ पर उपलब्ध किया गया है | कृपया इस लिन्क पर क्लिक कर इसका दर्शन करे |

प्रस्तुत लेख – ” आचार्य निष्ठा “, श्रीवैष्णव सत्साम्प्रदाय का, बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विषेश तत्त्व है | कृपया अब हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन चारित्र से, इस विषय पर चर्चा करते हुए इसका रसपान करेंगे |

थाई मास अनुभवम्

थाई मास मे, हम श्री वैष्ण्व जन, तिरुमलिशै आल्वार (श्रीभक्तिसार स्वामीजी), कुरुहै कावलप्पन, कूरेश स्वामी, एम्बार (श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी) का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते है । यहाँ हम अब श्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के सम्बन्ध से देखेंगे ।

हमने पिछले महिने कि पत्रिका में आचार्य निष्ठा का सुन्दर तत्त्व को श्रीगोदाम्बाजी, श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्रीरामानुज स्वामीजी में देखा। यहा हम अब श्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के सम्बन्ध में देखेंगे।

श्रीकुरेश स्वामीजी अपना सारा धन दान किया और श्रीरामानुज स्वामीजी कि शरणागति कि और आजीवन माधुकरम का अभ्यास किया। वह पुनरेकिकरण के मानवीकरण थे। उन्होने धनवान होने के बावजूद अपने आचार्य के साथ रहकर उनकी सेवा करने के लिये एक क्षण भी नहीं सोचा और अपना सारा धन दान कर दिया। वह बहुत बड़े ज्ञानी थे परन्तु कभी भी अपने आचार्य या किसी के सामने अपने ज्ञान कि बढाई नहीं कि। वह हमेशा नम्रता से रहते थे। इसलिये तिरुवरंगत्तु अमुधानार अपने श्रीरामानुजनूत्तंदादि में उनकी इस तरह प्रशंसा करते है “मोळियैक् कडक्कुम पेरुम् पुघळान्” (उनकी प्रशंसा शब्दो से नहीं कि जा सकती)। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने यतिराज विंशति में भी यही समझाते है “वाचामगोचर महागुणदेशिकाग्रचकूराधिनाथ”।

श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी भी एक बड़े आचार्य निष्ठा वाले थे। वह श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी के शिष्य थे। एक बार उन्होंने अपने आचार्य के लिये बिछोना लगाया और स्वयं उसे जाचने के लिए उसपर सोये। श्रीरामानुज स्वामीजी ने यह देखकर चकित हो गये। उन्होंने श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी से पूछा “आपकी हिम्मत कैसे हुयी अपने आचार्य के बिस्तर पर सोने कि? यह गलत है”। श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी ने शान्त रीती से उत्तर दिया “मे यह निश्चिंत करना चाहता हूँ कि मेरे आचार्य का बिस्तर आराम दायक है- इसलिये मैंने उसपर स्वयं पहिले सोकर जाँचकर देखा। अगर इसके लिये मुझे पाप भी लगता है तो ठीक है”। अपने को पाप लगाने के डर से भी उन्होंने अपने आचार्य के आराम का पूर्ण ध्यान रखा। यह सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी सुखद हो गये। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला में यही तत्त्व कहते है “ तेशारूम् शिष्चनवन् शीर् वड़िवै आशयुड़न् नोक्कुमवन ” – सबसे श्रेष्ठ शिष्य अपने आचार्य का पवित्र देह कि सेवा / सुरक्षा प्रेम से करेगा।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

माघ मास अनुभवम्

माघ महिने में हम श्रीकुलशेखर स्वामीजी, श्रीराममिश्र स्वामीजी, श्रीमालाधार स्वामीजी, श्रीकांचीपूर्ण स्वामीजी, श्रीधनुर्दास स्वामीजी का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं। आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम श्रीमालाधार स्वामीजी और श्रीधनुर्दास स्वामीजी के आनंदमय रूप को देखेंगे ।

श्रीराममिश्र स्वामीजी अपने आचार्य श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी के साथ रहते थे और उन्होने १२ वर्ष तक उनकी निरन्तर सेवा कि। उस समय श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी कि धर्मपत्नी परमपद धाम को पधार गयी – इसीलिये श्रीराममिश्र स्वामीजी ने अपने आचार्य कि तिरुमाली और उनके बच्चो का पूर्ण रूप से ध्यान रखा। एक बार जब श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी कि कन्याये कावेरी नदि से स्नान कर लोट रही थी तो रास्ते में किचड़ आ गया और वह आगे बढ़ने से डर गयी। उसी वक्त श्रीराममिश्र स्वामीजी वहाँ सीधे लेट गये और उनको अपने उपर से जाने को कहकर किचड़ पार करवाया। यह सुनकर श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें बड़े प्यार से आशिर्वाद प्रदान किया। श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजीने बहुत प्रसन्न होकर श्रीराममिश्र स्वामीजी को पूछा की उन्हें क्या चाहिये और श्रीराममिश्र स्वामीजी कहा की उन्हें अपने आचार्य कि सेवा चाहिये। यह सुनकर बहुत प्रसन्न होकर श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी ने उन्हें द्वय महामन्त्र का अर्थ सहित उपदेश किया क्योंकि जब भी आचार्य अपने शिष्य के बर्ताव से प्रसन्न होते है तो उन्हें यह उपदेश देते है, यह प्रचलित है।

श्रीधनुर्दास स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा पात्र थे। वह और उनकी पत्नी हेमाम्बाजी श्रीरंगनाथ भगवान के बड़े भक्त हुए और श्रीरामानुज स्वामीजी के आदर्श शिष्य हुए। दोनों श्रीरामानुज स्वामीजी को पूर्णत: समर्पित थे और यह बतलाया कि कैसे एक आदर्श पति-पत्नी गृहस्थाश्रम में रहते हुए भगवद-भागवत-आचार्य का कैंकर्य कर सकते है। श्रीधनुर्दास स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को बहुत प्रिय थे और यह कहा जाता है कि जब भी श्रीरामानुज स्वामीजी स्नान कर कावेरी नदी से लौटते तो इन्हीं के हाथ का सहारा लेकर आते थे। श्रीधनुर्दास स्वामीजी का बड़े बड़े विद्वानों और भक्त जैसे श्रीकुरेश स्वामीजी गुण गान करते थे। हेमाम्बाजी भी बड़ी विद्वान थी और अपने सिद्धान्तों को अच्छी तरह जानती थी और बहुत बार इसका प्रदर्शन भी किया।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

फाल्गुन मास अनुभवम्

फाल्गुन महिने में हम श्रीरंगनायकी अम्माजी, तिरुवरंगत्तु अमुधनार, श्रीवेदांती स्वामीजी, आदि का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं। उत्तरफाल्गुन वह दिन है जब दोनों श्रीरंगनाथ भगवान और श्रीरंगनायकी अम्माजी हम पर कृपा करते है और श्रीरामानुज स्वामीजी कि शरणागति उनके तरफ सब के उद्धार के लिये याद कराती है।

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम तिरुवरंगत्तु अमुधनार और श्रीवेदान्ति स्वामीजी के आनंदमय रूप को देखेंगे।

तिरुवरंगत्तु अमुधनार श्रीरंगम में श्रीरंगनाचियार सन्निधि मे सेवा करते थे। श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीकुरेश स्वामीजी के जरिये उन्हें नियुक्त किया, सुधारा और बाद में उन्हें श्रीकुरेश स्वामीजी का शिष्य बनाया। अमुधनार ने पूरी तरह बदल जाने के बाद श्रीरामानुजनूत्तंदादि को संकलित किया। प्रबन्ध के प्रारंभ  मे श्रीवरवर मुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ को प्रपन्न गायत्री ऐसे गुणगान किया। यह प्रबन्ध श्रीरामानुज स्वामीजी का ही गुणगान करता है और यह बताता है कि श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमल ही हमारा अंत मे उद्धार करेंगे। अमुधनार नाहीं आल्वार थे और नाहीं उनके प्रबन्ध भगवान का गुणगान करते थे फिर भी यह प्रबन्ध दिव्यप्रबन्ध का एक भाग माना गया है और आल्वारों के पाशुरों के बराबर माना गया है। अमुधनार कि श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति निष्ठा उनके शब्द (श्रीरामानुजनूत्तंदादि) और उनके काम (तायार सन्निधि कि पूर्ण सेवा श्रीरामानुज स्वामीजी को देना) दोनों से समझा जा सकता है।

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी ने श्रीवेदान्ति स्वामीजी को सुधारा। अंत मे सब कुछ छोड़कर वह श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के शिष्य हुए और उनकी पूर्ण सेवा में लग गये। बहुत से दृष्टांतों  में उन्होंने पूर्ण शरणागति और एक शिष्य का उसके आचार्य के तरफ आचरण प्रदर्शित किया हैं। सन्यास आश्रम ग्रहण करने के पश्चात उनको एक प्रश्न आया कि अगर उनका यह आश्रम उन्हें उनके आचार्य (जो गृहस्थ थे) सेवा से वंचित रखेगा तो उन्होंने उत्तर दिया कि ऐसा हैं तो आचार्य सेवा के लिये वह यह आश्रम हीं छोड़ देंगे।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

चैत्र मास अनुभवम्

चैत्र महिने में हम श्रीमधुरकवि स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीदाशरथी स्वामीजी, श्रीअनंताल्वान स्वामीजी, श्रीबालधन्वी गुरु (इलयविल्ली), श्रीप्रणतार्तिहराचार्य स्वामीजी, श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी, श्रीएंगलाज़्हवान, श्रीनदातुर अम्माल, श्रीपिल्लै लोकं जीयर, आदि का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं।

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम इनके महान आनंदमय रूप को देखेंगे।

उपदेश रत्नमाला में १० आल्वारों के बारें में चर्चा करने के पश्चात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीगोदाम्बाजी और श्रीमधुरकवि स्वामीजी के बारें में चर्चा करते हैं। १० आल्वार भगवान से कि गयी भक्ति कि स्तुति करते थे, जबकी श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्री गोदाम्बाजी उनके आचार्य श्रीशठकोप स्वामीजी और श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी से कि गयी भक्ति कि स्तुति करते थे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी को भी उनके आचार्य श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी और श्रीमहापुर्ण स्वामीजी के प्रति भक्ति के कारण इसी आचार्य निष्ठा कि श्रेणी में रखा है।

श्रीरामानुज स्वामीजी के सभी शिष्य महान थे उनकी श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति आचार्य निष्ठा महान थी। श्रीदाशरथी स्वामीजी केवल श्रीरामानुज स्वामीजी की आज्ञा पाकर एक सहायक के रूप में श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के पुत्री के तिरुमाली गये। श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी भी श्रीरामानुज स्वामीजी कि आज्ञा पाकर तिरुमला गये और वहाँ भगवान वेंकटेश कि पुष्पसेवा की। श्रीबालधन्वी गुरु (इलयविल्ली) ने श्रीरामानुज स्वामीजी का परमपद समाचार प्राप्त कर तुरन्त अपने प्राण त्याग दिये। श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी भगवान से ज्यादा श्रीरामानुज स्वामीजी कि प्रशंसा करते थे। श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी का सम्मान कड़े धुप में हो रहा था यह श्रीप्रणतार्तिहराचार्य स्वामीजी सहन नहीं कर सके और उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी को उपर उठा लिया इसलिये श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी का रसोईय्या नियुक्त किया। यह हमारे लिये आचार्य निष्ठा के उत्तीर्ण उदाहरण हैं।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

वैशाख मास अनुभवम्

वैशाख महिने में हम श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीलक्ष्मीनारायण भगवान, श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी, श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी, श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी, श्रीवेदव्यास भट्टर स्वामीजी, श्रीशैलेश स्वामीजी आदि का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं।

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम इन के महान आनंदमय रूप को देखेंगे।

अंतिमोपाय निष्ठा में श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के जीवन चरित्र से एक सुन्दर प्रसंग दर्शाया गया है – एक बार जब श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी से यह पुछते है “उन्हें कुछ अच्छे उपदेश दिजीए जिसके शरण वो हो सके”। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कुछ समय के लिये आंखे बन्द करते है और कहते है “हम श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के पास शिक्षा ले रहे थे। जब स्वामीजी नदी मे स्नान करके उपर आते थे तब उनकी पीठ का पिछला हिस्सा चमकते हुए ताम्बे के बर्तन जैसे दिखाई देता था। मैं कभी भी उस दिव्य तेज दृष्टी मे ही शरण लेता था। तुम भी उसी को अपना शरण मानो” – यह घटना बहुत प्रसिद्ध है और यह दर्शाता हैं कि शिष्य को आचार्य के दिव्य रूप का ही ध्यान करना चाहिये। यह कहा जाता है कि तिरुक्कोष्टीयूर मंदिर के गोपुर के उपर रहकर श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी हमेशा श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी का ध्यान करते थे और यामुनैतुरैवर यह मंत्र का जाप करते थे।

उसी तरह श्रीशैलेश स्वामीजी भी कूर कुलोत्तमा धासर से जुड़े हुए थे जिन्होंने उन्हें श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के निर्देश अनुसार हमारे सम्प्रदाय के बहुत से मुख्य तत्त्व सिखाये है।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

आषाढ़ मास अनुभवम्

आषाढ़ महिने में हम श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी, श्रीनाथमुनि स्वामीजी, श्रीतिरुक्कण्णमंगैयांडान्, श्रीकृष्णपाद स्वामीजी और वाधि केसरी अझगिया मणवाल का वार्षिक तिरुनक्षत्र मनाते है।

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम इन महान जन के बारें में देखेंगे ।

श्रीकृष्णपाद स्वामीजी श्रीलोकाचार्य स्वामीजी के समर्पित शिष्य थे। वह पूर्णत: अपने आचार्य को समर्पित थे और उनकी हमेशा सेवा करते थे। हालाकि वें ग्रहस्त थे परन्तु उनको अपने वैवाहिक जीवन में बिल्कुल भी रुचि न थी। इस चिन्ता से श्रीकृष्णपाद स्वामीजी कि माताजी श्रीलोकाचार्य स्वामीजी के पास जाकर यह बात समझायी। श्रीलोकाचार्य स्वामीजी अपने शिष्य को वैवाहिक जीवन व्यतित करने और धार्मिक बच्चे को जन्म देने को कहते है। श्रीलोकाचार्य स्वामीजी और श्रीरंगनाथ भगवान कि कृपा से श्रीकृष्णपाद स्वामीजी कि पत्नी ने दो दिव्य पुत्र को जन्म दिया। दोनों आजीवन ब्रह्मचारी रहे और केवल आचार्य और आल्वारों के दिव्य तत्त्व विचार से हमारे सत सम्प्रदाय को बहुत उच्च स्थान तक लेगये।

उसी तरह वाधि केसरी अझगिया मणवाल जीयर शुरू में बहुत सीधे और श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै (जो श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी के एक प्रिय शिष्य थे) के ज्यादा शिक्षित शिष्य में न थे। श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै कि निर्हेतुक कृपा से वाधि केसरी अझगिया मणवाल जीयर एक बहुत बड़े विद्वान बन गये और श्रीसहस्त्रगीति, भगवद गीता का शब्द श: अर्थ लिखा और कई ग्रन्थ का भी।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

कर्कट मास अनुभवम्

इस कर्कट मास में हम श्रीगोदाम्बाजी, श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी और प्रतिवादि भयंकर अण्णा स्वामीजी का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं। आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम इन के महान आनंदमय रूप को देखेंगे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सभी आल्वारों और श्रीरामानुज स्वामीजी के तिरुनक्षत्र और अवतार स्थल को उपदेश रत्न माला में दर्शाया है। इस तरह करते समय वें श्रीगोदाम्बाजी के साथ श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्रीरामानुज स्वामीजी कि भी चर्चा करते है यह जानकर भी कि वह स्वयं भू-देवी का अवतार है। तीनों ही आचार्य निष्ठा है (पूर्णत: आचार्य पर निर्भर)। श्रीगोदाम्बाजी नाचियार तिरुमोलि में यह कहती है “वित्तुचित्तर तंगल देवराई वल्लपरिसु वरुविप्परेल अतु काण्दुमे” (जब श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी अपने भगवान को उनके सन्मुख लायेंगे तब में उनके दर्शन करूंगी)। श्रीमधुरकवि स्वामीजी कि श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति आचार्य निष्ठा भी सब जानते है और श्रीरामानुज स्वामीजी कि अपनी आचार्य श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी और खासकर श्रीमाहापूर्ण स्वामीजे के प्रति समर्पण सब जानते है।

श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी भी अपने स्तोत्ररत्न में नाथमुनि स्वामीजी के प्रति पूर्णत: समर्पण कि घोषणा करते है। शुरू में “नाथमुनयेत्र परत्र चापि” (मैं इस संसार और दूसरे संसार में श्रीनाथमुनी स्वामीजी के प्रति समर्पित हूँ)। और अन्त में यह कहकर समाप्त करते है “अकृत्रिमत्व… पितामहं नाथमुनिं… ” (मुझे मेरे दादाजी श्रीनाथमुनि स्वामीजी के लिये स्वीकार करो नाहीं मेरे कर्मों के लिये)।

अन्त: में प्रतिवादि भयंकर अण्णा स्वामीजी भी यह बताते है श्रीवरवर मुनि स्वामीजी को कि वह जो श्री विशिष्टाद्वैत को ललकारेंगे उनको पीड़ा पहूंचाएंगे परंतु श्रीवैष्णवों के अधीन रहेंगे।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

श्रावण मास अनुभवम्

इस श्रावण मास में हम श्रीरंगनाथ भगवान, श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै, श्रीनायनाराच्चान पिल्लै और अप्पन तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर स्वामीजी का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम श्रीरंगनाथ भगवान कि आचार्य निष्ठा को देखेंगे।

श्रीमन्नारायण स्वतन्त्र होने के बावजूद अनेक आचार्य / गुरु को अपनाया दूसरों को मार्ग दिखाने हेतु। भगवद्गीता में उन्होंने एक गुरु कि आवश्यकता, उनकी सेवा करना और उनसे सत्य सिखने पर विशेष ज़ोर दिया। उन्होंने यह सब अवतार लेकर कर बताया।

श्रीराम का अवतार लिया तो उन्होंने श्रीवशिष्ठजी और श्रीविश्वामित्रजी के पास शिक्षा ग्रहण किया। वह भी उन्हें संतुष्ट कर न सका। कृष्णावतार में साण्डिपनी मुनि से शिक्षा ग्रहण किया। यह भी उन्हें संतुष्ट कर न सका। श्रीरामानुज स्वामीजी के समय श्रीरामानुज स्वामीजी ने तिरुवेंकटमुडैयान (श्रीनिवास) को शंख/चक्र प्रधान किया जब तर्क वितर्क हो गया उनके पहिचान को लेकर (इस तरह भगवान ने श्रीरामानुज स्वामीजी को आचार्य रुप में स्वीकार किया क्योंकि शंख/चक्र लेना पञ्च संस्कार का एक भाग है जो जीवात्मा को अपना पहिचान देती है)। तिरुक्कुरुंगुड़ी नम्बी भी श्रीरामानुज स्वामीजी को अपना आचार्य माना और उनसे मंत्रोपदेश ग्रहण किया और श्रीवैष्णव नम्बी के नाम से प्रसिद्ध हुए। फिर भी भगवान श्रीरंगनाथ पूर्ण रुप से संतुष्ट न हुए क्योंकि उनमें शिष्य के पूरे गुण प्राप्त नहीं हुए। जब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगम पधारे श्रीरंगनाथ भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए यह सोचकर कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनके लिए सर्वश्रेष्ट आचार्य होंगे। इसलिये उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को आज्ञा दि कि उन्हें श्रीसहस्त्रगीति पर प्रवचन (व्याख्या) करें ताकि एक प्रामाणिक आचार्य के पास रहकर वह सत्य को सीख सके। प्रवचन के समापन के पश्चात (आनि तिरुमूलम के समय) श्रीरंगनाथ भगवान ने अपने आचार्य को “श्रीशैलेश दयापात्रं” तनिया से संभोधित किया। यह भी नहीं उन्होंने यह तनियन का प्रचार प्रसार किया और यह आज्ञा किये कि दिव्य प्रबन्ध के शुरू और अन्त में इस तनियन को बोलना है। उन्होंने सबसे बहुमूल्य धन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को प्रधान किया – सेश पर्यंगम। क्योंकि यह परम्परा है शिष्य अपनी बहुमूल्य वस्तु अपने आचार्य को प्रधान कर उनका गौरव करता है। अत: श्रीरंगनाथ भगवान श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य रुप में स्वीकार कर बहुत संतुष्ट हुए।

इसलिये, हम सभी पूर्वोक्त, आचार्य निष्ठा, की प्रार्थना, स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान से करेंगे ।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2015/08/acharya-nishtai.html

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