Monthly Archives: October 2015

तुला मास अनुभव – महद्योगी आलवार – मून्ऱाम् तिरुवंतादी

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

यह लेख महदयोगी आलवार के मून्ऱाम् तिरुवंतादी के लिए श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा लिखे गए अवतारिका (प्रस्तावना) का सीधा अनुवाद है। श्री कलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा रचयित इन व्याख्यानों को खोजने, उनके प्रकाशन और इन अद्भुत व्याख्यानों पर सुगम तमिल निरूपण प्रदान करने के अथक प्रयासों के लिए श्री यू.वे. एम. ए. वेंकटकृष्णन स्वामी को धन्यवाद।

कृपया सरोयोगी आलवार के मुदल तिरुवंतादी के अवतारिका का अध्ययन करने के लिए https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/10/21/thula-anubhavam-poigai-azhwar/ पर देखें।

कृपया भूतयोगी आलवार की इरण्डाम तिरुवंतादी के अवतारिका का अध्ययन करने के लिए https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2015/10/22/thula-anubhavam-bhuthathazhwar/  पर देखें।

नम्पिल्लै- तिरुवेल्लिक्केनी

नम्पिल्लै- तिरुवेल्लिक्केनी

महद्योगी आलवार बताते है कि सरोयोगी आलवार और भूतयोगी आलवार की कृपा से उन्हें भगवान के दिव्य दर्शन प्राप्त हुए, जो श्री महालक्ष्मीजी के प्रिय पति है और जो रत्नाकर के समान है (रत्नाकर अर्थात सागर – यहाँ भगवान का वर्णन रत्नाकर के रूप में किया गया है – जैसे सागर अनेकों रत्नों से युक्त होता है, भगवान भी उसी प्रकार अपार दिव्य गुणों से परिपूर्ण है)। इस तिरुवंतादी के दिव्य अनुभवों को पूर्ण रूप से समझना अत्यंत दुष्कर है, क्यूंकि श्रीलक्ष्मीजी के साथ भगवान के दिव्य दर्शन करने के पश्चाद, यह प्रबंध, महद्योगी आलवार के त्वरित स्फूर्त भावनात्मक बहाव (जो क्रमानुसार नहीं है) की अभिव्यक्ति है। इस सहज वाक्-शैली के कारण उन्हें पेयर भी कहा जाता है (वह जो अपने वचनों में संसक्त नहीं है और विचित्र प्रतीत होते है)। कुलशेखर आलवार बतलाते है कि “पेयरे एनक्कू यावरुम् यानुमोर पेयने एवर्क्कुम …..पेयनायोळीन्तेन एम्बिरानुक्के” – भौतिवादी मनुष्यों का सांसार के प्रति मोह, आलवार को अत्यंत विचित्र प्रतीत होता है और सांसारिक मनुष्यों को आलवार का व्यवहार विचित्र प्रतीत होता है क्यूंकि वे केवल भगवान के ही आश्रित है।

तिरुक्कोवलुर पुष्पवल्ली तायार और देहालिसा भगवान

तिरुक्कोवलुर पुष्पवल्ली तायार और देहालिसा भगवान

भगवान द्वारा की गयी दिव्य कृपा से जनित निष्कपट ज्ञान (जो भक्ति में परिवर्तित हुआ) का परिणाम है – सरोयोगी आलवार की मुदल तिरुवंतादी (यह पर-भक्ति की अवस्था है)। भूतयोगी अलावार इरण्डाम तिरुवंतादी के अंतिम पासूर में दर्शाते है “एनरान अलवंरै यानुदैय अनबू” – यहाँ आलवार भगवान से प्रार्थना करते है कि “आपके प्रति मेरा भक्तिमय प्रेम स्वयं मुझसे भी बृहत है” – यह अवस्था पर-भक्ति की चरम अवस्था को दर्शाती है (जो पर-ज्ञान की अवस्था का प्रारंभ है)।

स्वाभाविक रूप से, अगली अवस्था भगवत साक्षात्कार है (पर-भक्ति का परिणाम)। महद्योगी आलवार बताते है कि भगवान ने स्वयं ही कृपा करके श्री लक्ष्मीअम्माजी सहित अपने दर्शन प्रदान किये।

सरोयोगी आलवार ने बताया है कि भगवान, नित्य (पारलौकिक जगत) और लीला (लौकिक जगत) दोनों विभूतियों के स्वामी है। भूतयोगी आलवार ने बताया है कि सकल जगत के स्वामी सिर्फ नारायण ही है। यहाँ, महद्योगी आलवार बताते है कि नारायण में “श्रीमत्” उक्ति का प्रयोग करने पर ही भगवान श्रीमन्नारायण कहाए।

वैयम तगली ” (मुदल तिरुवंतादी का प्रथम पासूर) इस ज्ञान को दर्शाता है कि भगवान ही सभी के नाथ है और अन्य सभी भगवान के दास है, उनके अधीन है। “अन्बे तगली” (इरण्डाम तिरुवंतादी का प्रथम पासूर) यह ज्ञान की उस परिपक्व दशा को समझाता है, जो है पर-भक्ति (चरम प्रेममय भक्ति)। और मून्ऱाम् तिरुवंतादी इसकी अगली अवस्था को समझाती है जो है भगवत साक्षात्कार प्राप्त करना (दिव्य दर्शन)।

सरोयोगी आलवार ने भगवान के स्वभाविक स्वरुप – शेषी (स्वामित्व) को समझाया है (वे सकल जगत के नियंत्रक है)। भूतयोगी आलवार ने जीवात्मा के स्वभाविक स्वरूप – शेष-भूत (दासत्व) को समझाया है (जीवात्मा भगवान के अधीन है)। महद्योगी आलवार, श्रीलक्ष्मी अम्माजी के स्वभाव को समझाते है, जो भगवान और जीवात्मा के गुणों की निमित्त अर्थात श्रीलक्ष्मीजी यह सुनिश्चित करती है कि भगवान सभी की रक्षण करें और जीवात्मा अपना स्वाभाविक स्वरुप समझकर भगवान के चरणाश्रित हो जाये – इसलिए यहाँ इस प्रबंध में श्रीलक्ष्मी अम्माजी का भगवान से संबंध समझाया गया है।

जिस प्रकार भगवान द्वारा सागर मंथन किये जाने के फल स्वरुप देवताओं को अमृत की प्राप्ति हुई, उसी प्रकार महद्योगी आलवार भी सरोयोगी आलवार और भूतयोगी आलवार के दीप प्रज्वलित करने के प्रयासों से समृद्ध हुए और भगवान संग अम्माजी के अमृतमय स्वरूप के दर्शन किये।

इस प्रकार श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा लिखी मून्ऱाम् तिरुवंतादी की अवतारिका पूर्ण हुई।

अब हम संक्षेप में कुरुगै कावलप्पन द्वारा रचित मून्ऱाम् तिरुवंतादी की तनियन देखते है। तनियन प्रायः प्रबंध के रचयिता और उस प्रबंध के वैभव को दर्शाती है।

महदयोगी आलवार - म्यलापुर

महदयोगी आलवार – म्यलापुर

सिरारुम माडत तिरुक्कोवलुर अधनुल
कारार करुमुगिलैक काण्प पुक्कु
औरात तिरुक्कण्देन एन्रू उरैत्त सिरान कलले
उरैक काण्डाय नेनज्छु उगंदू

शब्दार्थ: कुरुगै कावलप्पन अपने मन से कहते है “है मन ! कृपया महद्योगी आलवार के चरणकमलों की महिमा का प्रसन्नता से गुणगान कर, जिन्होंने अत्यंत सुंदर तिरुक्कोवलुर दिव्यदेश में सुंदर काले मेघ के समान श्यामल स्वरुप श्रीमन्नारायण के दिव्य दर्शन प्राप्त किये”।

आइये अब हम इन अवतारिकाओं के सार को संक्षेप में देखते है। यहाँ मुख्य विषय भक्ति की तीन विभिन्न अवस्थायें –परभक्ति, परज्ञान और परम भक्ति को समझाने से सम्बंधित है। जैसा की स्वयं नम्पिल्लै/ श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी ने समझाया है कि, यद्यपि सभी अलावारों ने इन सभी अवस्थाओं को अपने में प्रकट किया (क्यूंकि वे सभी भगवान द्वारा प्रदत्त विशुद्ध ज्ञान से परिपूर्ण है), तथापि भक्ति की इन तीन अवस्थाओं को तीनों दिव्य प्रबंध के प्रथम पसूरों में समझाया गया है। यह श्रीशठकोप आलवार द्वारा प्रत्येक दिव्यदेश के अर्चावतार भगवान के किसी विशेष गुण का अनुसंधान करने के समान है यद्यपि भगवान के सभी अर्चावतारों में सभी दिव्य गुण निहित है। (कृपया इसके संक्षिप्त विवरण के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2012/11/archavathara-anubhavam-nayanar-anubhavam.html पर देखें और विस्तृत विवरण के लिए  https://docs.google.com/file/d/0ByVemcKfGLucWnNuNVJiRkdXa0E/edit?usp=sharing पर देखें)। हम अगले खण्डों में भक्ति की इन तीन अवस्थाओं के गहरे अर्थों को अपेक्षाकृत विस्तृत रूप में समझ सकेंगे।)

अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार ने भक्ति की तीनों अवस्थाओं के विषय में आचार्य ह्रदयं नामक अपने सुंदर ग्रंथ में समझाया है, जो श्रीशठकोप आलवार के दिव्य ह्रदय को दर्शाती है।

श्रीशठकोप आलवार (कांचीपुरम) - नायनार (एक चित्रपट) - श्रीवरवरमुनि स्वामीजी (कांचीपुरम) श्रीशठकोप आलवार (कांचीपुरम) – नायनार (एक चित्रपट) – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी (कांचीपुरम)

वे तीन अवस्थाओं को चूर्णिका 233 में निम्न प्रकार से समझाते है।

इवै ज्ञान दर्शन प्राप्ति अवस्तैगल।

शब्दार्थ: परभक्ति, परज्ञान और परम भक्ति का संबंध ज्ञान (भगवान के विषय में विशुद्ध ज्ञान), दर्शन और प्राप्ति (एक क्षण के लिए भी भगवान का वियोग सहन करने में असमर्थ) से है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपने ग्रंथ शरणागति गद्य में श्रीभाष्यकार की दिव्य प्रार्थना और श्री रंगनाथ द्वारा उसके प्रतिउत्तर का उल्लेख करते हुए, इस सिद्धांत को अत्यंत सुंदरता से समझाया है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बताते है कि – श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान रंगनाथ से प्रार्थना करते है “परभक्ति परज्ञान परमभक्ति एक स्वभावं माम् कुरुष्व ” – कृपया मुझ पर कृपा कर परभक्ति, परज्ञान और परमभक्ति से परिपूर्ण कीजिये। श्रीरंगनाथ भगवान उन पर कृपा कर उनसे कहते है “मतज्ञान दर्शन प्राप्तिशु निस्संशयस्सुखमास्व ” – बिना किसी संशय के आपको सदा ज्ञान, दर्शन और प्राप्ति का सुख प्राप्त होगा। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, इन तीनों अवस्थाओं की अत्यंत स्पष्ट व्याख्या करते है:

  • पर भक्ति – ज्ञान – भगवान की सन्निधि में रहने पर प्रसन्न होना और उनके वियोग में उदास होना।
  • पर ज्ञान – दर्शन – अपने मन में भगवान के स्वभाव, स्वरुप, गुण, धन आदि का दिव्य दर्शन करना।
  • परम भक्ति – प्राप्ति – अन्तः दर्शन के आनंद के पश्चाद, भगवान से वियोग को सहन करने में असमर्थ होकर त्वरित अपने प्राणों का परित्याग करना।

इस तरह हमने मुदलालावारों के गौरवशाली जीवन और तीनों तिरुवंतादियों के लिए नम्पिल्लै/ श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी के अवतारिका के माध्यम से उनके दिव्य प्रबंधनों की झलक देखी।

मुदल आलवारों के चरित्र और वैभव को https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2014/06/04/mudhalazhwargal/ पर देखा जा सकता है।

मुदल आलवारों के अर्चावतार अनुभव को http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-azhwars-1.html पर देखा जा सकता है।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/10/aippasi-anubhavam-peyazhwar.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

तुला मास अनुभव – भूतयोगी आलवार – इरण्डाम तिरुवंतादी

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

यह लेख भूतयोगी आलवार के इरण्डाम तिरुवंतादी के लिए श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा लिखे गए अवतारिका (प्रस्तावना) का सीधा अनुवाद है। श्री कलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा रचयित इन व्याख्यानों को खोजने, उनके प्रकाशन और इन अद्भुत व्याख्यानों पर सुगम तमिल निरूपण प्रदान करने के अथक प्रयासों के लिए श्री यू.वे. एम. ए. वेंकटकृष्णन स्वामी को धन्यवाद।

कृपया सरोयोगी आलवार के मुदल तिरुवंतादी के अवतारिका को पढने के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2013/10/aippasi-anubhavam-saroyogi-azhwar.html पर देखे।

नम्पिल्लै/ श्री कलिवैरीदास स्वामीजी - तिरुवल्लिक्केणि

नम्पिल्लै/ श्री कलिवैरीदास स्वामीजी – तिरुवल्लिक्केणि

मुदल (प्रथम) तिरुवंतादी में, सरोयोगी आलवार ने दर्शाया है कि भगवान, द्वय विभूतियों – नित्य और लीला विभूति के स्वामी है।यह देखते हुए भूतयोगी आलवार बताते है कि वे भगवान के सच्चे सेवक है और उनका वह ज्ञान भक्ति की दशा में परिपक्व हो गया है। मुदल तिरुवंतादी, ज्ञान पर केन्द्रित है; और इरण्डाम तिरुवंतादी, भक्ति पर केन्द्रित है। यह दिव्य प्रबंधन, आलवार की भक्ति की बहुलता को प्रदर्शित करता है। क्या इसका अभिप्राय यह है कि सरोयोगी आलवार ने भगवान की भक्ति नहीं की थी? नहीं – उनमें भी भक्ति भाव निहित था। यह अभिव्यक्ति की विभिन्न दशाएं है – एक कारण है और दूसरा उसका प्रभाव है। सरोयोगी आलवार, भगवान की नित्य और लीला विभूतियाँ का मनन करते हुए, ज्ञान की दशा को प्रदर्शित करते है। वहीँ भूतयोगी आलवार भक्ति की दशा को प्रदर्शित करते है (जो ज्ञान की परिपक्व दशा है)। भूतयोगी आलवार, मुदल तिरुवंतादी में बताई गई भगवान की दिव्य संपत्ति का ध्यान करते है और उस अपरिहार्य श्रद्धा के फल स्वरुप, इन पसूरों की उत्पत्ति हुई, जिन्हें इरण्डाम तिरुवंतादी नामक दिव्य प्रबंधन के रूप में जाना गया।

मुदल तिरुवंतादी में, परमात्मा के विषय में चर्चा की गयी है, अर्थात भगवान समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी है और ब्रह्माण्ड का अस्तित्व भगवान के लिए ही है। यह भी समझाया गया है कि, यही ज्ञान भगवान की प्राप्ति का साधन है। सामान्यतः, यहाँ यह देखा गया है कि उपाय और उपेय भिन्न भिन्न है। फिर यह कैसे संभव है कि भगवान ही उपाय (साधन) है और भगवान ही उपेय (लक्ष्य) है? यह इसलिए क्यूंकि वे सर्वव्यापी (सभी कार्यों को करने में सक्षम) है, वे ही उपाय है और उपेय भी है। कारण को 3 पक्षों द्वारा समझाया गया है।

  • उपादान कारण – वह पदार्थ जो निर्णायक परिणाम में परिवर्तित होता है। उदहारण के लिए, मिट्टी से पात्र बनाये जाते है – यहाँ मिट्टी उपादान कारण (मूल-भूत कारण) है और पात्र उसका कार्य (प्रभाव) है।
  • निमित्त कारण – फलोत्पदक कारण– वह व्यक्ति जो उस पदार्थ में परिवर्तन करता है। उदहारण के लिए, कुम्हार उस मिट्टी को पात्र का रूप देता है।
  • सहकारी कारण – सहायक कारण – वह उपकरण जो उस परिवर्तन में सहायक होते है। उदहारण के लिए, कुम्हार एक छड़ी और चक्र की सहायता से उस मिट्टी को पात्र का रूप देता है।

भगवान - सभी कारणों के कारण

भगवान – सभी कारणों के कारण

सामान्यतः, इस संसार में हम देखते है कि लौकिक जगत में तीनों कारण सदा भिन्न होते है। क्यूंकि भगवान सर्वव्यापी है (सभी कार्यों को करने में सक्षम है), वे स्वयं ही सभी तीन प्रकार के कारण है (अनुवादक की टिपण्णी : उपादान कारण – चित (चेतन) और अचित (अवचेतन) जो पदार्थ है भगवान के गुण है; निमित्त कारण- स्वयं उनका संकल्प (अभिलाषा/प्रतिज्ञा); सहकारी कारण – उनका ज्ञान, शक्ति, आदि)। इसलिए वे स्वयं इस व्यक्त ब्रह्माण के तीनों कारण है। क्यूंकि वे सम्पूर्ण ब्रह्माण में अन्तर्यामी है और क्यूंकि भूतयोगी आलवार इस ब्रह्माण के एक अंश है, वे चरम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए स्वयं भगवान को ही उपाय रूप मानते है।

जो भी सामान्य परिस्थिति में दिखाई देता है, वह विशिष्ट परिस्थिति में भी दिखाई देगा। श्रीरामानुज स्वामीजी गद्य में बताते है कि क्यूंकि भगवान “अखिल जगत स्वामिन्” – सम्पूर्ण ब्रह्माण के स्वामी है, वे “अस्मद् स्वामिन ” – मेरे स्वामी भी है। क्यूंकि भगवान ही साधन (उपाय) है, हमें धीरता से ज्ञान को समृद्ध होने देना चाहिए (और जब ज्ञान का उदय होगा तो स्वतः ही भगवान लक्ष्य देने की कृपा करेंगे)। परमेश्वर मंगलत्तु आण्डान, कुरुगै कावलप्पन (जो श्रीनाथमुनि स्वामीजी के शिष्य है) के समक्ष जाकर पूछते है कि “जगत (ब्रह्माण) और ईश्वर (भगवान) में क्या संबंध है?” तो कुरुगै कावलप्पन उनसे पुनः प्रश्न करते है “कौन सा जगत और कौन सा ब्रह्माण?” – परमेश्वर मंगलत्तु आण्डान उस उत्तर से संतुष्ट हुए। यहाँ यह समझाया गया है कि ब्रह्माण भगवान का शरीर है और भगवान उसकी अन्तर-आत्म है (वह दोनों अविभाज्य है)। जैसे शरीर जीवात्मा के अधीन है, सम्पूर्ण ब्रह्माण भगवान के अधीन है। सरोयोगी आलवार, भगवान का ध्यान करते हुए कहते है “पतिम् विश्वस्य”- सम्पूर्ण ब्रह्माण के स्वामी, जैसा की तैत्रिय उपनिषद में समझाया गया है। यह सिद्धांत भूतयोगी आलवार पर भी प्रयोज्य होता है। इसलिए, भूतयोगी आलवार, इरण्डाम तिरुवंतादी में इस सिद्धांत पर मनन करते है।

जब यह केवल ज्ञान/ भक्ति की विभिन्न दशाओं का बहाव है, क्या इन तिरुवंतादियों को एक ही प्रणेता द्वारा नहीं रचा जाना चाहिए था? फिर क्यूँ इन्हें पृथक पृथक आलवारों द्वारा बनाया गया – मुदल तिरुवंतादी, सरोयोगी आलवार द्वारा और इरण्डाम तिरुवंतादी, भूतयोगी आलवार द्वारा? त्रिमुनिव्याकरण की रचना तीन ऋषियों द्वारा की गयी है (पाणिनि, वररूचि और पतंजलि), फिर भी उन्हें एक ही शास्त्र के रूप में जाना जाता है क्यूंकि वे सभी समान विषय में चर्चा करते है। जैमिनी ने पूर्व मीमांसा (प्रथम 12 अध्याय) की रचना की है और व्यास ने उत्तर मीमांसा (4 अध्याय) की रचना की है- फिर भी, क्यूंकि वे दोनों ही समान ब्रह्म के विषय में बात करते है (पूर्व मीमांसा ब्रह्म की आराधना के विषय में बात करती है और उत्तर मीमांसा ब्रह्म के गुण और स्वरुप के विषय में गहरी जानकारी देती है), उन्हें एकाकी शास्त्र के रूप में जाना जाता है। उसी प्रकार ये प्रबंधन भी ऐसे ही जाने जाते है।

मुदल तिरुवंतादी में, भगवान को “विचित्र ज्ञान शक्ति युक्त” होना बताया गया है (जिनमें अद्भुत ज्ञान का वास है और जो पुर्णतः सभी कार्यों को करने में सक्षम है), जगत कारण-भूत (सम्पूर्ण ब्रह्माण के कारण) और शंखचक्रगदाधारण (वे जो शंख, चक्र और गदा को धारण करते है)। यह केवल भगवान के प्रति भक्ति के कारण समझाया गया है। यहाँ तक कि भक्ति का बीज भी केवल भगवान द्वारा रोपित किया गया है (क्यूंकि यह आलवार में पहले नहीं था)। क्यूंकि भगवान ही उपाय है, इसलिए वे ही ह्रदय में भक्ति की भावना को प्रज्वलित करते है (अर्थात यह हमारा स्व-प्रयास नहीं है, जिसने भक्ति के बीजों को रोपित किया है)। यहाँ, आलवार कहते है जैसे भगवान द्वारा बहुरंगी जगत का संचालन अत्यंत अद्भुत है, उसी प्रकार भगवान द्वारा आलवार के ह्रदय में भक्ति के बीजों का रोपा जाना भी अद्भुत है।

क्या सरोयोगी आलवार को मात्र परमात्मा का ही ज्ञान है? नहीं, सभी आलवारों में पूर्ण ज्ञान और भक्ति निहित है – परंतु ध्यान देने योग्य वहीँ है जिन पहलुओं पर स्वयं आलवारों ने ध्यान केन्द्रित किया है। क्यूंकि सभी आलवार एक दुसरे की दिव्य भावनाओं को भली प्रकार से समझते है, उन्होंने एक समान सिद्धांतों को अपने अपने दिव्य प्रबंधनों में प्रदर्शित किया है। जैसे श्रीआदिशेष का एक कंठ और सहस्त्र शीश है, उसी प्रकार से वे आलवार भी समान सिद्धांत समझाते है परंतु वे उसे भिन्न व्यक्तित्व और भिन्न प्रबंधनों द्वारा प्रदर्शित करते है।

इस प्रकार नम्पिल्लै/ श्री कलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा लिखी इरण्डाम तिरुवंतादी की अवतारिका पूर्ण हुई।

अब हम संक्षेप में तिरुक्कुरुगै पिरान पिल्लान द्वारा रचित इरण्डाम तिरुवंतादी की तनियन देखते है। तनियन प्रायः प्रबंध के रचयिता और उस प्रबंध के वैभव को दर्शाती है।

BhudhatAzhwar

एन पिरवी तीर इरैन्जिनेन इन्नमुदा
अनबे तगली अलित्तानै 
नंपुगल सेर सिधत्तार  मुत्तुक्कल सेरुम
कडल मल्लैप भूतत्तार पोंनान्गज्हल

शब्दार्थ: इस संसार के जन्म चक्र से मुक्त होने के लिए, में भूतयोगी आलवार के स्वर्णिम चरण कमलों में प्रार्थना करता हूँ, जिन्होंने मधुरता युक्त इरण्डाम तिरुवंतादी प्रदान कर हम पर कृपा की और जिनका जन्म तिरुक्कडलमल्लै में हुआ, जो अत्यंत वैभवशाली और शीतल मोतियों का समूह है (मोती – क्यूंकि यह दिव्य देश समुद्र तट पर है कृत्रिम रूप से उनका अर्थ सीप के मोतियों से है परंतु उसका गहरा अर्थ है भगवान के परम सात्विक भक्त जन)।

मुदल आलवारों के चरित्र और वैभव को https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2014/06/04/mudhalazhwargal/ पर देखा जा सकता है।

मुदल आलवारों के अर्चावतार अनुभव को http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-azhwars-1.html पर देखा जा सकता है।

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/10/aippasi-anubhavam-bhuthathazhwar.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

तुला मास अनुभव – सरोयोगी आलवार – मुदल तिरुवंतादी

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

यह लेख सरोयोगी आलवार के मुदल तिरुवंतादी के लिए श्रीकलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा लिखे गए अवतारिका (प्रस्तावना) का सीधा अनुवाद है। श्री कलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा रचयित इन व्याख्यानों को खोजने, उनके प्रकाशन और इन अद्भुत व्याख्यानों पर सुगम तमिल निरूपण प्रदान करने के अथक प्रयासों के लिए श्री यू.वे. एम. ए. वेंकटकृष्णन स्वामी को धन्यवाद।

नम्पिल्लै- श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी - तिरुवल्लिक्केणीनम्पिल्लै- श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी – तिरुवल्लिक्केणी

प्रथम तीन आलवार (सरोयोगी आलवार, भुत्योगी आलवार और महद्योगी आलवार) भगवान की असीम कृपा से भगवत विषय में पुर्णतः विज्ञ थे। उनका संसार (लौकिक संसार) में रहना, उन मुक्त जीवात्माओं के समान है (मुक्त जीव, जो प्रथमतः संसार में थे, और कालांतर में परमपद में प्रस्थान किया और जिनका ज्ञान परमपद में पूर्ण रूप से समृद्ध हुआ) जो अवतरित हुए और संसार में रहे है। वे उन लोगों में से भी है, जो प्रथमतय भगवत विषय में संलग्न हुए। क्यूंकि अन्य आलवारों की तुलना में वे भगवत विषय में अधिक संबद्ध थे, इन तीन आलवारों को नित्यसूरियों (परमपद में भगवान के नित्य सेवक) के समान माना जाता है। श्री शठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मौली 7.9.6 में मुदल आलवार की प्रशंसा करते हुए कहते है “इन्कवि पादुम परम कविगल” (श्रेष्ठ कवि जिन्होंने मधुर कवितों का गान किया) और तिरुमंगै आलवार पेरिय तिरुमौली 2.8.2 में उनकी प्रशंसा करते हुए कहते है “चेंतमिल पाडुवार ” (वह जो विशुद्ध तमिल में गान करते है)। वे भगवान के विभिन्न आविर्भावों जैसे परत्व से अर्चावतार तक सभी के प्रति अत्यंत अनुरक्त थे (http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-parathvadhi.html) और उनका ज्ञान और भक्ति, इन्हीं आविर्भावों में विस्तारित थी। फिर भी, जैसे बाड़ के समय में नदी में जल सब तरफ होता है परंतु वह एक ही दिशा में बहती है, उसी प्रकार उनकी भक्ति भी विशेष रूप से भगवान के त्रिविक्रम अवतार (विभवावतारों में) और तिरुवेंकटमुदैयाँ (अर्चावतारों में) पर केन्द्रित है।

तिरुमंगै आलवार पेरिय तिरुमौली 11.8.9 पासूर में बताते है कि “आन विदैयेल अन्रादर्त्तार्क्कू आलानार अल्लातार मानीडवर अल्लर एन्रू एन मनत्ते वैत्तेन” – मनुष्य जन्म लेने पर भी, जो श्रीकृष्ण (जिन्होंने 7 बैलों का वध किया) के शरणागत नहीं हुआ, मैं उसे मनुष्य ही नहीं मानता। जिनका भगवान के प्रति सेवा भाव नहीं है, मुदल आलवारों के अनुसार वे लोग मनुष्य कहलाने के योग्य नहीं है। “एन मनत्ते वैत्तेन “ – “मैं इस प्रकार मानता हूँ”, ऐसा कहकर वे निम्न पक्ष पर बल देते है – सर्वेश्वर अत्यंत दयालु ही नहीं वरन् पूर्णतः स्वतन्त्र भी है – इसलिए यदि वे हमारा उद्धार करने से मना कर दे, तो इसमें कोई अचम्भा /आश्चर्य नहीं है। परंतु सभी आलवार इतने दयालु है कि स्वयं भगवान द्वारा परित्याग किये गए जीव पर भी कृपा करके, वे उसका उद्धार करते है – अपितु आलवार (अत्यंत कृपालु) भी उन जीवों का परित्याग करते है, जिन्हें भगवान के प्रति कोई चाहना नहीं है। इसलिए पाषाण और ताम्बे की पट्टियों पर यह लिखा गया है कि जिन्हें भगवान के प्रति अनुराग नहीं वे मनुष्य कहलाने के योग्य नहीं है।

कुलशेखर आलवार पेरुमाल तिरुमौली 3.8 में कहते है “पेयरे एनक्कू यावरुम यानुमोर पेयने यवर्क्कुम”।  जो प्राणी भगवत विषय में संलग्न नहीं है, वे मुझे अपरिचित प्रतीत होते है। और क्यूंकि मैं उनके समान (सांसारिक सुखों में लिप्त) नहीं हूँ, उन्हें मैं अपरिचित प्रतीत होता हूँ। जैसा कि इराण्दाम तिरुवंतादी 44 में बताया गया है “चिरंतार्क्कू एलुतूनैयाम चेंगण्माल नामं मरनतारै मानिदमा वैयेन– ये तीनों आलवार (मुदल आलवार), उन्हें सभ्य ही नहीं मानते, जो भगवान के आश्रित नहीं है। इसलिए वे मानते है कि बुद्धिमान प्राणी के रूप में जन्म लेने पर भी जो मनुष्य भगवान के प्रति बैर रखते है, उनके बीच रहने से तो जंगल में रहना हितकर है। वहां भी, वे एक ही स्थान पर नहीं रहते – जहाँ वे संध्या समय में होते, वहीँ वे अपनी रात्रि भी बिताते और पृथक-पृथक एक दुसरे को बिना जाने वहीँ घूमते।

तिरुक्कोवलुर पुष्पवल्ली तय्यार और देहालिसा पेरुमालतिरुक्कोवलुर पुष्पवल्ली तायार और देहालिस भगवान

मुदल आलवार -तिरुक्कोवलुरमुदल आलवार -तिरुक्कोवलुर

भगवान की दिव्य प्रेरणा से,  सभी 3 आलवार, एक तूफानी रात में तिरुक्कोवलुर क्षेत्र में एकत्रित हुए। प्रथम सरोयोगी आलवार, मृगण्दु महर्षि की कुटिया के बरामदे में प्रवेश करते है। उनके पश्चाद भूतयोगी आलवार भी वहां आते है और द्वार खटखटाते है। सरोयोगी आलवार भीतर से ही कहते है कि “मैं यहाँ लेटा हूँ और अब यहाँ कोई स्थान शेष नहीं है”। भूतयोगी आलवार कहते है “जिस स्थान पर एक व्यक्ति लेट सकता है, दो व्यक्तियों के बैठने के लिए वह स्थान पर्याप्त है। इसलिए कृपया द्वार खोलिए “। ऐसा सुनकर, सरोयोगी आलवार विचार करते है कि “इस संसार में जहाँ अधिकांश लोग किसी अपरिचित के श्वास के स्पर्श मात्र को पसंद नहीं करते , अर्थात अपरिचित व्यक्तियों के साथ निकटता नहीं चाहते, यदि यह महानुभाव ऐसा कहते है, तो वे निश्चय ही साधारण जीवात्मा नहीं है” और तद पश्चाद सरोयोगी आलवार भुतयोगी आलवार के लिए द्वार खोल देते है और वे दोनों वहां आराम से बैठ जाते है। उसी समय, महदयोगी आलवार वहां आते है और द्वार खटखटाते है। सरोयोगी आलवार और भूतयोगी आलवार भीतर से कहते है “हम दो लोग यहाँ पर बैठे है, अब यहाँ और कोई स्थान शेष नहीं है” तब महदयोगी आलवार बाहर से कहते है “जिस स्थान पर दो व्यक्ति बैठ सकते है, तीन व्यक्तियों के खड़े रहने के लिए वह स्थान पर्याप्त है”। वे कोई साधारण जीवात्मा नहीं है, यह समझते हुए, वे उन्हें भीतर लेते है और अब वे सभी आराम से वहां खड़े हो जाते है। जैसा कि मुदल तिरुवंतादी 86 में बताया गया है, “नियम तिरुमगलूम निणरायाल ” (उस समय परम कृपालु भगवान और अम्माजी संग में वहां उपस्थित है), सर्वेश्वर भगवान अपनी प्रिय सहचरी के साथ वहां पधारते है, जिससे उनके बीच ऐंठन उत्पन्न होती है। उनमें से एक आलवार अचम्भे से कहते है “यह क्या हो रहा है? हमें लगा था कि यहाँ मात्र हम तीन ही है? परंतु अब लगता है यहाँ और भी लोग है। यहाँ और कौन है, यह देखने के लिए हमें यहाँ एक दीपक प्रज्वलित करना चाहिए।” (अपने भक्तों के अकेले होने पर भी भगवान उनसे बहुत प्रेम करते है, तब उन्हें साथ में देखकर तो उनके आनंद की सीमा ही क्या होगी)? सरोयोगी आलवार, यह दर्शाते हुए दीपक प्रज्वलित करते है कि भगवान दोनों विभूतियों – लौकिक और अलौकिक संसार के स्वामी है, भूतयोगी आलवार, भक्ति/श्रद्धा का दीपक प्रज्वलित करते है और महद्योगी आलवार उस दीपक के प्रकाश में भगवान की छवि के दर्शन करते है। यह इस प्रकार है, जिस प्रकार सभी तीन चरण एक ही व्यक्तित्व में घटित हो रही हो।

अर्थात, प्रथम हम वास्तविक ज्ञान प्राप्त करते है, फिर वह ज्ञान, भक्ति के रूप में परिपक्व होता है और अंततः वह दिव्य दृष्टि प्रदान करता है। व्याकरण में, पणिनी ऋषि, वररुचि ऋषि और पतंजलि ऋषि ने व्याकरण के सूत्र (स्त्रोत), वृत्ति (संक्षेप विवरण) और भाष्य (व्याख्यान) को लिखा है, परंतु क्यूंकि वे सभी समान विषय पर चर्चा करते है, उन सभी को ज्ञान का एक ही खंड माना जाता है और उन्हें तिरुमुनी व्याकरण (व्याकरण के तीन चरण) कहा जाता है। उसी प्रकार, भले ही यहाँ कर्तु भेदं अर्थात 3 तिरुवंतादियों के 3 विभिन्न रचयिता है, उन्हें एक ही कहा जा सकता है।

सरोयोगी आलवार यह विचार करते हुए दीपक प्रज्वलित करते है कि “भगवान के सिवाय सभी, भगवान के लिए संपत्ति है और भगवान ही उसके स्वामी है “। भूतयोगी आलवार, भक्ति का दीपक प्रज्वलित करते है, जो ज्ञान से प्राप्त हुई है। महद्योगी आलवार उस भक्ति के परिणाम का आनंद भगवत साक्षात्कार (भगवान के दिव्य दर्शन) के रूप में लेते है। उन्होंने न केवल स्वयं उस अद्भुत भगवत विषय का आनंद लिया अपितु उन्होंने अपने अनुभवों को 3 दिव्य प्रबंधनों – मुदल तिरुवंतादी, इरण्दम तिरुवंतादी और मुनराम तिरुवंतादी के रूप में लिपिबद्ध किया और सभी के उद्धार के लिए उसे सभी के साथ साझा किया।

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आइये अब हम इन शब्दों का अर्थ समझते है, तगली – मिट्टी का दीपक, नेय- घृत और विलक्कू- प्रकाश। जगत (संसार) को “सावयत्वात कार्यं” के रूप में समझया गया है – वह जिसके भाग है जिन्हें प्रभाव कहा जाता है । यदि”प्रभाव” है, वह निश्चय ही किसी के द्वारा बनाया गया होगा। क्यूंकि प्रभाव अत्यंत विचित्र और अद्भुत है, तो उस प्रभाव के रचयिता (कारण) भी बहुत शक्तिशाली और अद्भुत होंगे। यहाँ भगवान के लिए कहा गया है – वे जो हस्त कमल में शंख और चक्र धारण करते है। यहाँ एक प्रश्न उत्पन्न होता है। ब्रह्म सूत्र 1.1.3 “शास्त्रयोनित्वात” के व्याख्यान को समझाते हुए भाष्यकार श्री रामानुज स्वामीजी ने अनुमानिकर (वह जो ब्रह्म्-परमात्मा का निर्णय अनुमान के द्वारा करते है) की आलोचना की है और समझाया है कि ब्रह्म् का निर्णय केवल शास्त्र द्वारा ही किया जा सकता है। फिर सरोयोगी आलवार ब्रह्म का निर्णय अनुमान के आधार पर क्यों कर रहे है (अर्थात क्यूंकि यहाँ विभिन्न प्रकार की रचनाएँ है, निश्चित ही कोई अत्यंत शक्तिशाली रचयिता भी होंगे)? इसे मनु स्मृति 12.106 के माध्यम से समझा जा सकता है “अर्षम धर्मोपदेशं च वेदशास्त्रविरोधिना, यस्तर्केणानुसंधत्ते सधर्मं वेद नेतर:”  अर्थात वह जिसने वेदों, जिन्हें ऋषि-मुनियों द्वारा समझा गया है और स्मृतियां, जो धार्मिक रीतियों को स्थापित करती है, का विश्लेषण किया है – केवल वही मनुष्य धर्म को समझ सकता है और कोई नहीं। इसलिए वेद शास्त्रों के विरुद्ध किये गए अनुमान की आलोचना की गयी है। परंतु वेद शास्त्रों द्वारा स्वीकार्य अनुमान ही उपयुक्त है। इस प्रकार यहाँ ब्रह्म का आशय शास्त्र सन्मत है और इसलिए स्वीकार्य है। श्रीभाष्य के प्रारंभ में यह कहा गया है कि “न्याय अनुगृहीतस्य वाक्यस्य अर्थात निश्चायकतवात – केवल वही वाक्य जो न्याय-संगत है वास्तविक अर्थ दर्शाने की योग्यता रखती है।

इस प्रकार श्री कलिवैरीदास स्वामीजी द्वारा लिखी मुदल तिरुवंतादी की अवतारिका पूर्ण हुई।

अब हम संक्षेप में श्रीदाशरथी स्वामीजी द्वारा रचित मुदल तिरुवंतादी की तनियन देखते है। तनियन प्रायः प्रबंध के रचयिता और उस प्रबंध के वैभव को दर्शाती है।

सरोयोगी आलवार - तिरुवेक्का

सरोयोगी आलवार – तिरुवेक्का

कैधै सेर पुम्पोळिल् सुळ् कच्ची नगर वन्दुदीत्ता
पोय्गैप् पिरान कविंज्ञार पोरेरु
वैयत्तु अड़ियवरगल वाळ अरुन्तमील नुररन्तादि
पडिविलंगाच चैधान परिन्दु

शब्दार्थ : सरोयोगी आलवार अत्यंत सुंदर कांचीपुरम (तिरुवेक्का) दिव्य देश में प्रकट हुए, जो बागीचों से के बीच स्थित है। भगवान के श्रीमन्नारायण के भक्तों के प्रति प्रेम और उनके हित के लिए, कवियों में अग्रणी, उन्होंने दिव्य सिद्धांतों को विस्तृत प्रकार से स्थापित करने के लिए अन्तादी शैली में तमिल में 100 सुंदर पासूरों की रचना की।

मुदल आलवारों के चरित्र और वैभव को https://guruparamparaihindi.wordpress.com/2014/06/04/mudhalazhwargal/ पर देखा जा सकता है।

मुदल आलवारों के अर्चावतार अनुभव को  http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-azhwars-1.html पर देखा जा सकता है।

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/10/aippasi-anubhavam-poigai-azhwar.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्रीवानाचलमहामुनये नमः
श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देखे सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २

१७) उपाय विरोधी उपायों मे बाधा

श्री रंगनाथ भगवान के चरण कमल- प्रपन्नों के लिए केवल यहीं उपाय

उपाय के संदर्भ और सही तरिके से समझाने के लिये निम्न लिखीत को बाधा ऐसा समझाया गया है।

  1. यह पहिले हीं बताया गया है कि “भगवान जो उच्च उपाय है और सिद्धोपायम है उनमें मोक्ष प्राप्ति के लिये पूर्ण विश्वास होना चाहिये”। इसलिये एक सिद्धोपाय निष्ठा वाले (प्रपन्न) को भगवान के अलावा जैसे कर्म योग आदि को उपाय नहीं समझना चाहिये। ऐसी क्रियाओं को स्वयं में उपाय समझना विरोधी है।
  2. कर्म योग आदि को ध्यान में रख कर सिद्धोपाय एक बड़ा विरोधी है। (अनुवादक टिप्पणी: हम अपने पिछले लेख में देख चुके है कि यह अन्य उपाय अचेत है और भगवान हीं सर्व श्रेष्ठ है इसमें कोई दूसरा प्रश्न नहीं है और भगवान उपाय है यही आनंदमय है)।
  3. “भगवान को उपाय” स्वीकार करना यह भी भगवान कि निर्हेतुक कृपा हीं से है। इसे यह सोचना कि यह हम पर लादा गया है यह विरोधी है।
  4. सामान्यत: हमारा “भगवान को उपाय” स्वीकार करना यह “सर्व मुक्ति प्रसंग परिहार्त्तं” इस तरह समझाया गया है, इसका यह मतलब है कि यह सोचना कि “भगवान उन्हें स्वीकार कि आशा किये बिना सब को मोक्ष प्रदान करते है फिर तो सब को मोक्ष प्राप्त होना चाहिये। इसलिये वह उन्हें मोक्ष प्रदान करते है जो उन्हें उपाय रूप में स्वीकार करते है”। यह पूर्वाचार्यों के व्याख्या और रहस्य ग्रन्थ में समझाया गया है। श्रीशठकोप स्वामीजी अपने श्रीसहस्त्रगीति में इस तत्त्व को समझाते है “ellIrum vIdu peRRAl ulagillai” (अगर संसार में सब को मोक्ष प्राप्त हो जाये तो शास्त्र कि कोई आवश्यकता हीं नहीं है) जहाँ श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी यह समझाते है कि शास्त्र का महत्त्व भगवान के पास है कि सब को मोक्ष प्रदान नहीं करते। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भी मुमुक्षुपड़ी में यह तत्त्व को दर्शाते है। परन्तु केवल इसे विशिष्ट कारण बताना विरोधी है। (सर्व मुक्ति प्रसंग को दूर करने के लिये वह मोक्ष को आशीर्वाद रूप में उनको प्रदान करते है जो उन्हें उपाय रूप में स्वीकार करते है) (अनुवादक टिप्पणी: भगवान सर्वतंत्र स्वतंत्र है उन्हें कोई कारण से बांधा नहीं जा सकता, इसलिये हम केवल यह सोच नहीं सकते सर्व मुक्ति प्रसंग से दूर रहने के लिये वह केवल उनको मोक्ष प्रदान करते है जो उन्हें उपाय रूप में स्वीकार किया है)।
  5. भगवान वह है जो बिना यह सोचे कि हमने भगवान को उपाय रूप में स्वीकार किया है या नहीं चित और अचित कि रक्षा करता है। “भगवान को उपाय” रूप स्वीकार करना जीवात्मा को अचित से अलग करता है। जीवात्मा वह है जिसके पास ज्ञान है। अचित अज्ञानी होता है। यह स्वाभाविक है जीवात्मा भगवान को उपाय रूप में स्वीकार करता है। यह स्वाभाविक भेद को उपाय समझना विरोधी है। (अनुवादक टिप्पणी: किसी को भी यह विचार नहीं करना चाहिये कि “मेरा स्वीकार करना” उपाय है – भगवान उपाय है, हमारा स्वीकार करना यह स्वाभाविक समझ है)।
  6. अचित जैसे जीवात्मा भी भगवान के पूर्णत: विधान में है। कोई यह विचार कर नहीं सकता कि जीवात्मा अकेले हीं भगवान को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। (अनुवादक टिप्पणी: अगर भगवान चाहते है तो वह आसानी से कोई भी आत्मा पर दबाव डाल सकते है)।

अत: उपाय को अच्छी तरह समझने के लिये जो विरोधी उसे उपर बताया गया है ।

१८) उपेय विरोधी – उपेय में बाधा

उपेय यानि वह जो उपाय के अनुसरण से सम्पन्न हुआ है। उपाय को सही तरिके से समझने के लिये निम्न बाधाओं से बताया गया है ।

एकांतिक कैकर्य दिव्य दंपति को सबसे उत्तम उपेय है
  1. भगवद उपाय – प्रपन्न जो भगवान को हीं उपाय समझता है। उसे भगवान का कैंकर्य करना ही अपना लक्ष्य मानना चाहिये। भगवान से सांसारिक लाभ, आदि मांगना इसे इस तरह समझाया गया है की “कल्प तरु से कटि वस्त्र मांगना” और वह अयोग्य है। भगवान से अन्य लाभ को चाहना विरोधी है।
  2. भगवान के पास कर्म, ज्ञान, भक्ति योग जैसे उपाय के जरिये पहूंचना विरोधी है। (अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा जो भगवद दास है उसका भगवान को उपाय मानना स्वाभाविक है। स्व-प्रयत्न करना सृष्टी के खिलाफ है। )
  3. भगवद कैंकर्य करते समय किसी को यह विचार नहीं करना चाहिये कि “मैं स्वयं यह कैंकर्य कर रहा हूँ”। भगवान भगवद् गीता ३॰२७ में कहते है “अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ताहमिति मन्यते” – अहंकार से घबड़ा कर जीवात्मा यह मूर्खता से सोचता है कि वह यह कार्य स्वयं कर रहा है। ऐसा अहंकार विरोधी है।
  4. स्वयं को अकर्ता समझकर हमें कैंकर्य से रुचि नहीं हटाना चाहिये। (अनुवादक टिप्पणी: जैसे श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाया गया है कि कैंकर्य शास्त्र और आचार्य के निर्देशानुसार पूरी इच्छा और समर्पण भाव से करना चाहिये)।
  5. भगवान / आचार्य के कैंकर्य से प्राप्त आनन्द को स्वयं का मानना। जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति में समझाते है “thanakkEyAga enaik koLLumIthE” आनन्द पूर्णत: भगवान के लिये हीं होना चाहिये। “भोक्ता” यानि जो अपने कार्य का फल का आनन्द लेता है। भगवान हीं यथार्थ भोक्ता है। इसलिये जीवात्मा को स्वतन्त्र रूप से रस लेने का अधिकार हीं नहीं हैं। जीवात्मा को ऐसे स्वतन्त्र रूप से भोग करना विरोधी हैं।
  6. भोग्यम यानि जिसे आनंदित होता है। भगवान के पूर्ण अनुभव के लिये जीवात्मा को अपने आपको पूर्णत: भगवान को समर्पित करना चाहिये। जब भगवान खुश होते है और उसे अपने मुखारविंद पर दिखाते है तब जीवात्मा को इस खुशी को पुन: बताना चाहिये। श्रीकुलशेखर स्वामीजी पेरूमाल तिरुमोलि में समझाते है “पाडियाय क्किडन्दु उन पवलवाय काणबेने” – मैं आपके सन्निधि में एक कदम आगे रहूँगा (जैसे अचित को कुछ समझ नहीं है) और खुश होऊंगा (जैसे चित जिसे समझ है) जब में आपके होठो पर मुस्कुराहट देखुंगा। अनुवादक टिप्पणी: (यह हमारे सम्प्रदाय का सर्वोच्च भाव जिसे “अचित्वत पारतंत्रियम” कहते है – भगवान के शरण होकर अचित जैसे रहना और फिर भी जब भगवान अपना हर्ष प्रगट करते है तब आनन्द का भाव प्रगट करना)। यह तत्त्व द्वय महामन्त्र के दूसरे भाग में (अपने पर केन्द्रित आनन्द को मिटाना) “नम:” शब्द में समझाया गया है। श्रीआलवंदार अपने स्तोत्र रत्न ४६ में इसी तत्त्व को समझाते है  –   “कदा …प्रहर्षयिष्यामि” – भगवान को आनंदित रखने की लालसा होनी चाहिए। जीवात्मा जब भगवान की खुशी को आपस मे बदलता है, तब भगवान सम्पूर्ण: आनंदित होते है। उनकी खुशी सिर्फ हमारा कर्म रूपी कैंकर्य है। दूसरे किसी भी मार्ग के बारे मे सोचना बाधा है।

१९) उपेयत्री विरोधी – उपेय में अधिक बाधा

पिछले व्याख्या को आगे बढाते हुए कुछ और बाधाएँ है। उपेय उपाय का परिणाम है। एक श्रीवैष्णव के लिये भगवान ही उपाय और उपेय दोनों है। भगवान उपेय है यानि भगवान के परमपदधाम पहूंचना आनन्द का अनुभव करना, भगवान के प्रति प्रेम भाव बढ़ाना और अंत में उनका प्रेम पूर्वक कैंकर्य करना। इसे “भगवद् अनुभव जनित प्रिती करिता कैंकर्यं”। यही अन्तिम उपेय है। अब हम इसके परिणाम के बाधाएँ देखेंगे।

श्रीरामानुज स्वामीजी के यात्रा के समय चैलाचल अम्बाजी सुन्दरता से भागवत कैंकर्य करते हुए

  1. एक विशेष लक्ष्य कि इच्छा करना (पिछले समझाये कैंकर्य को छोड़)। यह भाव श्रीवैष्णवों के लिये सही नहीं है। यह विरोधी है।
  2. दृष्ट फलं कि इच्छा करना (सांसारिक लाभ – जो जीवन में देखा और अनुभव किया जा सकता है) जैसे धन, अन्न, कपड़े, घर, पत्नी, बच्चे, प्रतिष्ठा आदि। भगवान कि सेवा से जो हर्ष मिलता है उसके परिणाम में यह तुच्छ है। इसलिये इस तरह का लगाव विरोधी है।
  3. अदृष्ट फलं कि इच्छा करना (दूसरे दुनिया का लाभ – जो इस जीवन में देखा या अनुभव नहीं किया जा सकता)। इसे दो श्रेणी में किया जा सकता है:
    • स्वर्ग के आनन्द कि इच्छा करना (ब्रह्मा, शिव, इन्द्र आदि का निवास स्थान)। यह विरोधी है।
    • परमपदधाम में भगवान कि सेवा कि इच्छा करना जहाँ हर्ष कि कोई सीमा नहीं है। ऐसे परिस्थिति कि इच्छा न करना विरोधी है – यानि हमें नित्य कैंकर्य कि इच्छा और चाह करनी चाहिये।
  4. भगवद् कैंकर्य तक रुकना विरोधी है। तदियाराधानम (तदिय कि पुजा करना – भगवान के भक्त) जिसे भागवत कैंकर्य कहते है जो भगवद् कैंकर्य (भगवान का कैंकर्य) से भी उच्च है। तदियाराधनम का अर्थ केवल भागवतों को प्रसाद पवाना नहीं है – यह उससे भी उच्च है जैसे कि उनकी सेवा करना और उनका अच्छा ध्यान देना।
  5. भगवद् कैंकर्य से भागवत कैंकर्य को तुच्छ समझना सबसे बड़ी बाधा है।
  6. थोड़े से आचार्य कैंकर्य से संतुष्ट होना बाधा है। आचार्य सबसे उच्च भागवत है। कोई कभी भी पूर्णत: संतुष्ट हो नहीं सकता – हममें निरन्तर आचार्य कैंकर्य करने कि लालसा होनी चाहिये। जैसे एक भूखा मनुष्य जो उसे परोसा गया है उसे कुछ भी पाने के लिये तत्पर रहता है और जो भी पका है उसे खाने के लिये उत्सुक रहता है। एक शिष्य को अपने आचार्य के लिये हर सम्भव कैंकर्य करना चाहिये। यह सोचना कि मैंने अपने आचार्य के लिये बहुत किया है यह बाधा है।

श्रीमधुरकवि स्वामीजी अपने आचार्य श्रीशठकोप स्वामीजी के कैंकर्य निरंतर तत्पर रहते थे।

श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी पूर्णत: श्रीरामानुज स्वामीजी के कैंकर्य में

सारांश यह है कि किसी को भागवत कैंकर्य से कभी भी नहीं भागना चाहिये। – भागवत कैंकर्य में निरन्तर उन्नतिशील परिवर्तन होना चाहिये। और सभी को अपने आचार्य जो प्रथम भागवत है उनकी सेवा बहुत उत्सुक्ता से करनी चाहिये। यह कण्णिनुण शिरुत्ताम्बु के ९वें पाशुर में श्रीमधुरकवि स्वामीजी ने समझाया है “च्चडगोपन एन नम्बिक्कु आट्पुक्क कादल अडिमै प्पयनन्रे” –मेरे आचार्य श्रीशठकोप स्वामीजी कि सेवा करना जिनमें पूर्णत: शुभ गुण है यह मेरे स्वभाव के लायक हैं ।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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