तुला मास अनुभव – पिल्लै लोकाचार्य – तत्वत्रय

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर “व्याख्यान अवतारिका”(व्याख्यान पर परिचय) के माध्यम से अब हम अत्यंत कृपालु पिल्लै लोकाचार्य और उनकी दिव्य रचना तत्वत्रय के विषय में चर्चा करेंगे।

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श्रीरामानुज स्वामीजीपिल्लै लोकाचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – तिरुप्पवल वण्णम्

तत्व त्रय ग्रंथ को कुट्टी भाष्य (अर्थात लघु श्रीभाष्य) के रूप में भी जाना जाता है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने ब्रह्म सूत्र के लिए विस्तृत व्याख्यान की रचना की जो श्रीभाष्य के रूप में प्रख्यात है और इसके रचयिता श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीभाष्यकार के रूप में प्रख्यात है। श्रीभाष्य में उल्लेख किये गए हमारे विशिष्ठाद्वैत सिद्धांत के सभी प्रमुख सिद्धांतों का विस्तृत विवरण तत्व त्रय ग्रंथ में सुलभ तमिल स्तोत्रों के माध्यम से किया गया है। यह ग्रंथ तीन प्रमुख तत्वों के विषय में चर्चा करता है – चित (जीवात्मा), अचित (अचेतन/जड़ वस्तु) और ईश्वर। इस ग्रंथ का संक्षेप विवरण http://ponnadi.blogspot.in/p/thathva-thrayam.html पर देखा जा सकता है।

इस भूमिका के साथ, अब हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित तत्व त्रय के अद्भुत परिचय खंड के अनुवाद का अवलोकन करते है।

जैसे कि कहा गया है “अनादी मायया सुप्त:” अर्थात अनंत समय से, जीवात्माएँ इस संसार में अचेतन वस्तुओं के प्रति अपने संबंध/लगाव के कारण, अज्ञानवश (अन्धकार) और अपनी बुद्धि से मलित होकर, यह जाने बिना ही जीवन यापन कर रहे है कि उनका स्वरुप अचेतन जड़ वस्तुओं से भिन्न है अर्थात जीवात्मा ज्ञान और परमानंद से परिपूर्ण है और उसका अस्तित्व मात्र भगवान के आनंद/मुखोल्लास के लिए ही है।

उचित रूप से समझे बिना ही,जीवात्मा विचार करता है,

  • देवोहम् मनुष्योहम्” (मैं देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ) और इस निर्जीव शरीर का ही आत्मा के रूप में बोध करता है
  • यद्यपि वह यह जान भी जाता है कि आत्मा और शरीर एक दुसरे से भिन्न है, तथापि “ईश्वरोहम् अहं भोगी” (मैं ही संचालक हूँ और मैं ही भोगता हूँ), अर्थात वह यह विचार प्रारंभ कर देता है कि वह पुर्णतः स्वतंत्र है
  • यद्यपि वह अपने स्वरुप को समझते हुए यह भी जानता है कि वह भगवान का दास है, तथापि नित्य कैंकर्य में संलग्न होने के बदले वह सांसारिक सुखों में ही डूबा रहता है

जैसा कि कहा गया है “योन्यथा संतमानम् अनन्यता प्रतिपत्यधे, किम् तेन न कृतं पापं चोरेनात्माबहारिणा“, जीवात्माएँ स्वयं के स्वरुप को न जानकर, सबसे बड़ा पाप कर रहां है (जो अन्य पापों का कारण है), अर्थात वह उस जीवात्मा की चोरी कर रहा है, जो भगवान की संपत्ति है (भगवान की संपत्ति को स्वयं अपना समझना ही पाप है) और तुच्छ और क्षण भंगुर/अस्थायी सांसारिक सुखों के भोग में लिप्त है।

जैसा कि कहा गया है “विचित्रा देह संपत्तिर् ईश्वराय निवेदितुम्, पूर्वमेव कृता ब्राह्मण हस्तपाधाधि संयुता“, जब जीवात्माएँ अति सूक्ष्म अवस्था (प्रलय के समय) में रहती है, उस अचेतन/जड़ वस्तु के समान (मलित बुद्धि से), जो विवेक/ देह से हीन है और सांसारिक सुखों का आनंद लेने अथवा मोक्ष के प्रयासों में असमर्थ है, तब अत्यंत कृपालु सर्वेश्वर, जीवात्माओं को विवेक/ शरीर आदि प्रदान करते है जिसके उपयोग से वह जीवात्मा भगवान के युगल चरण कमलों की और अग्रसर हो।

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श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरंगनाथ के “व्यूह सौहार्दम्” (सभी जीवात्माओं के हितैषी) नामक दिव्य गुण का अनुभव करते हुए

जीवात्माएँ, विवेक/ शरीर का उपयोग अपने कल्याणार्थ भगवान को प्राप्त करने के लिए न करते हुए, श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा तिरुवाय्मौली 3.2.1 में बताये गए “अन्नाल नी तंत आक्कैयीं वालि उलल्वेन“, “सांसारिक सुखों” में लिप्त हो जाते है, जिस प्रकार एक व्यक्ति को नदी पार करने के लिए बेडा उपलब्ध है, परंतु वह उस बड़े का उपयोग न करके, नदी के साथ उसकी दिशा में बहते हुए सागर में गिरता है, ठीक उसी प्रकार संसार सागर से तरने के लिए जीवात्माओं को जो ज्ञानेन्द्रियाँ भगवान द्वारा प्रदान की गयी है, वह उनका अनुचित उपयोग संसार में और अधिक संलग्न होने में कर रहा है। जीवात्मा ने अनंत समय से, अज्ञानता वश, अनंत पुण्य और पाप कर्मों के परिणाम स्वरुप संसार में असंख्य जन्म लिए है। उन जन्मों में, उसने अत्यंत अधम कष्टों को भोगा है (ताप त्रय – 3 प्रकार की पीड़ाएं) और उनके परिणाम के विषय में बिना समझे, कर्मों में प्रवृत्त होकर, गर्भ (उदार में रहना), जन्म, बाल्य (बालक होना, जो स्वयं अपनी देखभाल नहीं कर सकता), यौवन (युवा अवस्था जो इन्द्रियों के रस-स्वादन में आसक्त), वृद्ध, मरण (मृत्यु) और नरक (नारकीय स्थानों में जीवन) जैसे अनंत कष्ट सहन करते है। यह देखकर कि जीवात्मा, इस संसार सागर में अनंत कष्टों को भोग रहे है, सरस ह्रदयवाले अत्यंत कृपालु भगवान, जो सभी के कल्याण की अभिलाषा करते है और निरंतर जीवात्माओं के उद्धार के लिए प्रयासरत है, उन्हें कष्टों में देखकर उन पर कृपा करते है, जैसे की कहा गया है “एवं सम्श्रुती चक्रस्त्ते ब्राम्यमाने स्वकर्मभि: जीवे दुक्खाकुले विष्णो: कृपा कापी उपजायते“। अपने ह्रदय में उत्पन्न महान कृपा और करुणा के फल स्वरुप, “जायमानं ही पुरुषं यं पश्येन् यं पश्येन् मधुसुदन: सात्विकस् स् तु विज्ञेयस् स् वै मोक्षार्थ्थ चिन्तक:“, अर्थात भगवान, जन्म के समय जीवात्माओं को ज्ञान/विवेक प्रदान करते है जिस के परिणाम स्वरुप वह इस संसार सागर से तरने/ उद्धार का मार्ग खोजना प्रारंभ करता है। एक मुमुक्षु के लिए, सही ज्ञान के अभाव में मोक्ष प्राप्त करना असंभव है।

सच्चे ज्ञान को दो प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है: शास्त्रों के द्वारा अथवा आचार्यों/ गुरुओं के उपदेश के द्वारा।

प्रथमतय, शास्त्रों से अध्ययन करने की कुछ सीमाएं है:

      • शास्त्र ज्ञानं बहु क्लेशं” – क्यूंकि शास्त्र अनंत है और उनके बहुत से कथन विरोधाभासी प्रतीत होते है, एक सामान्य मनुष्य के लिए शास्त्रों का अध्ययन करना और उनका अभिप्राय समझना अत्यंत दुष्कर है। इसीलिए इसका अनुसरण करना कठीन है।
      • यद्यपि मनुष्य शास्त्रों के अध्ययन की कठनाइयों को सहन करने के लिए तत्पर भी हो, तथापि जैसा कि कहा गया है “अनंतभारं बहुवेदित्वयम् अल्पच्चा कालो भहवच्च् विघ्ना:“, अर्थात प्राप्त करने के लिए ज्ञान अत्यधिक है, परंतु  जीवात्माओं (बद्ध जीव) का विवेक और जीवन अवधि सिमित है और इस शास्त्र के अध्ययन के प्रयासों में अनेक बाधाएं है।
      • अंततः, यद्यपि स्त्रियों और बालकों को मुमुक्षु बनने की योग्यता है तथापि उन्हें शास्त्रों के अध्ययन की योग्यता नहीं है

द्वितीय यह कि , गुरु/आचार्य से अध्ययन करने में उपरोक्त कोई भी बाधाएं नहीं है (क्यूंकि वे शास्त्रों के सार और अभिप्राय को भली भांति समझते है और सुगम भाषा में उसे अपने शिष्यों/ अनुयायिओं को प्रदान करते है)।

इन्हीं को ध्यान में रखकर, सभी शास्त्रों में निपुण अत्यंत कृपालु श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने जीवात्माओं के कल्याणार्थ, तीन तत्वों (चित, अचित और ईश्वर) के सच्चे गुण और प्रकृति को अत्यंत सुगमता से समझाया है। ध्यान करें कि यह सिद्धांत शास्त्रों में उल्लेखित है, परंतु प्रत्येक प्राणी के लिए यह सुलभता से उपलब्ध नहीं है – इसिलिए अपनी महान कृपा से पिल्लै लोकाचार्य ने उन्हें अपने इस प्रबंध में संकलित किया (तत्व त्रय)।

पूर्वाचार्यों जैसे नडुविल तिरुविधि पिल्लै भट्टर, पेरियावाच्चान पिल्लै, आदि द्वारा इन अत्यंत जटिल सिद्धांतों को सुलभ शैली में लिखने का उद्देश्य यही है कि प्रत्येक जीवात्मा के कल्याण के लिए अत्यंत सुगमता से इस यथार्थ ज्ञान का प्रस्तुतीकरण हो। यहाँ कुछ प्रश्न उत्पन्न होते है –

हमारे पूर्वाचार्य,

  • पूर्णतः अहंकार से मुक्त,
  • सदैव सभी जीवात्माओं के कल्याण के विषय में विचार करनेवाले,
  • किसी भी व्यक्तिगत प्रसिद्धि के विषय में विचार न करनेवाले थे।

तब ऐसी स्थिति में अनेक आचार्यों ने समान विषय पर व्याख्या क्यों की?  क्या वे सभी प्रथम वर्णित ग्रंथ को स्वीकार करके उसी के माध्यम से सिद्धांतों का विवेचन नहीं कर सकते थे? (इस विषय पर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अत्यंत सुंदर व्याख्यान को पढ़े)

  • यद्यपि आलवारों को एकगण्तर कहा गया है (एक देह और अनेकों मुख अर्थात वे सभी समान सिद्धांतों के विषय में चर्चा करते है), अनेकों आलवारों द्वारा एक ही सिद्धांत के कथन पर, वह सिद्धांत विश्वसनीय हो जाता है – जब बहुत से विश्वसनीय महानुभाव एक विशेष विषय की महिमा करते है, वह विषय स्थापित हो जाता है। उसी प्रकार, आचार्यों भी एकगण्तर के समान ही विभिन्न ग्रंथों के समान सिद्धांतों को समझाते है जिससे अत्यंत अल्प बुद्धि का प्राणी भी यह देखकर कि अनेकों महानुभाव भी एक ही सिद्धांत की विवेचना करते है उस सिद्धांत की वैद्यता के विषय में अस्श्वस्त हो जाते है।
  • इसके अतिरिक्त, एक ग्रंथ में संक्षिप्त में समझाया गया सिद्धांत ही अन्य ग्रंथ में विस्तार से समझाया गया है। इसीलिए सभी विविध ग्रंथ एक दुसरे के पूरक है।

यही सिद्धांत वहां भी लागू होता है जहाँ एक ही आचार्य द्वारा एक ही सिद्धांत पर कई ग्रथों की रचना की गयी है। ये सभी सिद्धांत पूर्णतः स्थापित हैं और विभिन्न ग्रंथों एक दूसरे के पूरक है।

3.PL-mamunigalपिल्लै लोकाचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजीभूतपुरी

इस प्रकार, तत्व त्रय का अत्यंत भव्य परिचय खंड यहाँ समाप्त होता है।इस ग्रंथ की सुप्रसिद्धि इसी बात में है कि इसने हमारे विशिष्ठाद्वैत सिद्धांत के सभी प्रमुख/जटिल सिद्धांतों को सुगमता से प्रकट किया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर और संक्षिप्त विवरण के साथ, यह हमारे लिए एक महान निधि है। इस ग्रंथ को किसी आचार्य के द्वारा सुनना और समझाना ही हितकर है। हम भी ऐसे महान आचार्य चरण कमलों में प्रणाम करें और उनकी कृपा को प्राप्त करें।

चित (जीवात्मा), अचित (पदार्थ) और ईश्वर इन तीन सिद्धांतों के विषय में सुगम रूप में हम पूर्व में चर्चा कर चुके है और इन्हें http://ponnadi.blogspot.in/p/thathva-thrayam.html पर देखा जा सकता है।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/10/aippasi-anubhavam-pillai-lokacharyar-tattva-trayam.html

pramEyam (goal) – http://koyil.org
pramANam (scriptures) – http://srivaishnavagranthams.wordpress.com
pramAthA (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
srIvaishNava Education/Kids Portal – http://pillai.koyil.org

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