तुला मास अनुभव – पिल्लै लोकाचार्य –श्री वचन भूषण- तनियन

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमद वरवरमुनये नम:
श्री वानाचल महामुनये नम:

तुला मास के पावन माह में अवतरित हुए आलवारों/आचार्यों की दिव्य महिमा का आनंद लेते हुए हम इस माह के मध्य में आ पहुंचे है। इस माह की सम्पूर्ण गौरव के विषय में पढने के लिए कृपया https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thula-masa-anubhavam/ पर देखें। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के सुंदर “व्याख्यान अवतारिका”(व्याख्यान पर परिचय) के माध्यम से अब हम अत्यंत कृपालु पिल्लै लोकाचार्य और उनकी दिव्य रचना श्री वचन भूषण के विषय में चर्चा करेंगे। इस ग्रंथ की अवतारिका (परिचय) को देखने के पूर्व, पिल्लै लोकाचार्य के इस अद्भुत प्रबंध के वैभव को हम उसकी तनियन के माध्यम से समझते है।

यह श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र हमारे सत-संप्रदाय के सिद्धांतों को स्थापित करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्य है। पिल्लै लोकाचार्य के इस उत्कृष्ट रचना के वैभव का प्रचार करने के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने उपदेश रत्न माला नामक एक सुंदर प्रबंध की रचना की है।

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  • हमारे संप्रदाय में श्रीरामानुज स्वामीजी के विशेष स्थान और सत-संप्रदाय और विशिष्ठाद्वैत सिद्धांत की सुदृढ स्थापना हेतु उनकी महान भूमिका का वर्णन करते है।

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  • तदन्तर, वे तिरुवाय्मौली के सभी व्याख्यानों और उनके रचयिताओं की महिमा को दर्शाते है।
  • तद्-पश्चाद वे दर्शाते है कि किस प्रकार नम्पिल्लै/श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के ईदू व्याख्यान का संरक्षण किया गया और आचार्य परंपरा के माध्यम से उसे आगे बढ़ाया गया।

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 नम्पिल्लै/श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की कालक्षेप गोष्ठी

  • इसके पश्चाद वे पिल्लै लोकाचार्य के वैभव और उनके श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के विषय में बताते है।

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 पिल्लै लोकाचार्य की कालक्षेप गोष्ठी

  • फिर वे श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के सारतत्व को अत्यंत संक्षिप्त और सुंदर शैली में दर्शाते हुए, अपने आचार्य के चरणाश्रित होने के महत्त्व को समझाते है।
  • अंततः, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने पूर्वाचार्यों के उपदेशों को सम्पूर्ण हृदय से स्वीकार करने और विशुद्धतापूर्वक उनके प्रचार/प्रसार करने के महत्त्व को दर्शाया है।
  • यह भी समझाया गया है कि पूर्वाचार्यों के विशुद्ध निर्देशों का अनुसरण करने के परिणामस्वरूप हमें उच्चतम लाभ की प्राप्त होगी – अर्थात श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपापात्र होकर हमारा कल्याण होगा।
  • एरुम्बी अप्पा, उपदेश रत्न माला के अंत में एक अत्यंत सुंदर पासूर का समावेश करते है जो यह दर्शाता है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण संबंध मात्र से जीव स्वतः ही अमानव (परमपद के वाहक) द्वारा स्पर्शित होकर, विरजा नदी पार कर, सुगमता से परमपद धाम पहुँचेगा।

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श्रीवरवरमुनि स्वामीजी  – श्रीरंगम

इस प्रकार हम समझ सकते है की उपदेश रत्न माला का सम्पूर्ण उद्देश्य, श्रीवचन भूषण में समझाए गए सिद्धांतों को प्रदर्शित करना और उसके वैभव का प्रचार करना है।

अब हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के इस दिव्य रचना के कुछ पसूरों का अनुभव करेंगे:

पिल्लै लोकाचार्य  – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

पासूर – 53
अन्न पुगल मुदुम्बै अण्णल उलगासीरियन
इंनरूलाल सेयद कलै यावैयिलुम
उन्निल थिगल वसन भूडणत्तिन सिरमै ओंरुक्किल्लै
पूगलल्ल इववार्त्तै मेय इप्पोदु

अर्थ: पिल्लै लोकाचार्य, जो बहुत प्रसिद्ध है और जो मुदुम्बै नामक ग्राम के एक परिवार से संबंधित है, उन्होंने अपनी निर्हेतुक कृपा से हमें बहुत से दिव्य ग्रंथ प्रदान किये। उन सभी में से, श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की महानता अतुलनीय है – यह मात्र महिमा वर्णन नहीं अपितु शाश्वत सत्य है।

पासूर  – 54
मुन्नम् कूरवोर मोलिंद् वसनंगल तन्नै 
मिगक कोण्डू कट्रोर तम् उयिर्क्र्कु
मिन्नणियाच सेरच समैत्तवरे
श्रीवसनभूडणम् एन्नुम पेर इक्कलैक्कु इट्टार पिन 

अर्थ: पिल्लै लोकाचार्य ने इस अद्भुत साहित्य की रचना हमारे पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों द्वारा की है। महान विद्वानों के लिए, यह श्रीवचन भूषण शास्त्र उस आभूषण के समान है जो उनकी आत्मा का श्रृंगार है और उनका अत्यंत प्रिय है। स्वयं पिल्लै लोकाचार्य ने इस सुंदर ग्रंथ को “श्रीवचन भूषण” नाम प्रदान किया, जिसका अभिप्राय एक आभूषण से है जो पूर्वाचार्यों के दिव्य वचनों से सुसज्जित है।

पासूर  – 55
आर् वसन भूडणत्तिन आल्पोरुल् एल्लाम अरिवार
आरदु सोल नेरिल अनुट्टीप्पार् 
ओर् ओरुवर उणडागिल अत्तनै काण उल्लमे
एल्लार्क्कुम अणडाददंरो अदु

अर्थ: श्रीवचन भूषण महा शास्त्र के गहन अर्थों को कौन भली प्रकार से समझता है? जीवन में कौन इन महान सिद्धांतों का प्रत्यक्ष अनुसरण कर सकता है? यद्यपि कोई एक मनुष्य भी इस ग्रंथ को समझकर इसका अनुसरण कर सके – तथापि वह अत्यंत प्रशंसनीय है क्यूंकि यह सभी के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। पिल्लै लोकम जीयर, अपने व्याख्यान में दर्शाते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ही एक मात्र ऐसे महानुभाव है जिन्होंने इस वैभवशाली साहित्य को पूर्ण रूप से समझा और उसके अनुसार ही अपना जीवन निर्वाह किया।

पासूर – 61
ज्ञानं अनुष्ठानं इवै नंरागवे उडैयनान्
गुरुवै अडैन्दक्काल्
मानिलत्तीर् तेनार् कमलत तिरूमामगल् कोलुनन्
ताने वैकुन्तम् तरुं

अर्थ: एक बार जब मनुष्य, श्रीआचार्य के चरणशरण हो जाता है, जो सभी महत्वपूर्ण सिद्धांतों में सुविज्ञ है और जो स्वयं इन सिद्धांतों का सम्पूर्ण श्रद्धा से अनुसरण करते है, तब हे संसार के मनुष्यों ! श्री महालक्ष्मीजी, जो सुंदर कमलपुष्प पर विराजी है, श्रीमन्नारायण भगवान जिनके पति है, वे भगवान स्वतः ही हमें परमपद में उनकी नित्य सेवा प्रदान करेंगे।

श्रीवचन भूषण के अध्ययन से पूर्व, निम्न तनियन का गान करने का प्रचलन है। आइये अब हम अपने वैभवशाली आचार्यों और जन कल्याण हेतु रची गयी उनकी रचनाओं का संक्षिप्त वर्णन देखते है।

प्रथमतय श्रीशैलेश दयापात्रं…….. भूतं सरस्च तानियों का गान किया जाता है। उनके पश्चाद निम्न तनियों का गान किया जाता है।

लोकगुरुं गुरुबिस्सह पुरवै: कूर कुलोत्तम् दासं उदारं
श्रीनगपति अभिराम वरेसु दिप्रसयम् गुरुंच भजेहं (दिप्रसयम् वरयोगी नमिदे भी गया जाता है)

अर्थ: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा गाया हुआ। मैं अपने पूर्वाचार्यों, अत्यंत उदार पिल्लै लोकाचार्य, कूर कुलोत्तम दासर, तिरुमलै आलवार (तिरुवाय्मौली पिल्लै/ श्रीशैलेश स्वामीजी) , अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के नानाश्री) और तिगलक्कीडन्तान तिरुनावीरूडैय पिरान तातर (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पिताश्री) की आराधना करता हूँ। टिपण्णी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पिताश्री ने सत-संप्रदाय के सिद्धांतों का अध्ययन अपने ससुरजी कोट्टीयुर अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै की सन्निधि में किया, जो पिल्लै लोकाचार्य के प्रिय शिष्य थे।

लोकाचार्याय गुरवे कृष्णपादस्य सूनवे
संसार भोगी संदष्ट जीव जीवातवे नम:

अर्थ: इयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाल द्वारा गाया हुआ (नम्पिल्लै/श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के शिष्य इयुण्णि माधव पेरुमाल के पुत्र)। मैं पिल्लै लोकाचार्य नामक आचार्य के चरणों में प्रणाम करता हूँ, जो वडक्कू तिरुविधि पिल्लै के पुत्र है और जो संसार रूपी सर्प द्वारा ग्रसित बद्ध जीवात्माओं के लिए जीवन रक्षण औषधि के समान है।

लोकाचार्य कृपापात्रं कौन्टिन्य कुलभूषणं
समस्तात्म गुणावासं वन्दे कूर कुलोत्तमं

अर्थ: तिरुवाय्मौली पिल्लै/ श्रीशैलेश स्वामीजी द्वारा गाया गया। मैं कूर कुलोत्तम दासर की आराधना करता हूँ, जो पिल्लै लोकाचार्य के कृपापात्र है, जो कौन्तिन्य वंश में शिखर मणि है और जो सभी कल्याण गुणों के सागर है।

नम: श्रीशैलनाथाय कुन्तिनगर जन्मने
प्रसादलब्ध परम प्राप्य कैंकर्य शालिने

अर्थ: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा गया गया। मैं श्रीशैलनाथ (तिरुमलै आलवार-तिरुवाय्मौली पिल्लै) की आराधना करता हूँ, जो श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा कृपापूर्वक प्रदान की गयी कैंकर्यश्री (सेवा की संपत्ति) की उज्वलता से दीप्तिमान है और जिनका जन्म “कुन्तिनगर” (आज का कोंथगै नगर) नामक क्षेत्र में हुआ।

लोकाचार्य पदाम्भोज राजहंसायितान्तरम्
ज्ञान वैराग्यजलधिम वन्दे सौम्य वरं गुरुं

अर्थ: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा गया गया। मैं अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै (उनके नानाश्री) की आराधना करता हूँ, जो एक दिव्य हंस (जो कमलपुष्प के अनुरक्त होता है) के समान पिल्लै लोकाचार्य के चरण कमलों के अनुरक्त है और जो ज्ञान और विरक्ति के साग़र है।

श्री जिह्वा वतधिशदासं अमलं अशेष शास्त्रवितं
सुंदरगुरुवर करुणाकंदलित् ज्ञानमंदिरम् कलये

अर्थ: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा गया गया। मैं तिगलक्कीडन्तान तिरुनावीरूडैय पिरान की स्तुति करता हूँ, जिनके विवेक का उदय अलगिय मणवाल पेरुमाल पिल्लै की कृपा से हुआ जो सभी शास्त्रों में निपुण थे और निष्कपट थे।

श्रीवचन भूषण के लिए विशिष्ट तनियन

श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में 6 प्रकरण (भाग) और 9 प्रकरण (भाग) होना बतलाया गया है। इस प्रबंध के 2 विविध वर्गीकरण को निम्न तनियों के द्वारा समझाया गया है।

पुरुष्कार वैभवं च साधनस्य गौरवं
तदधिकारी कृत्यं अस्य सतगुरूप सेवनं
हरिदयाम अहैतुकिम् गुरोरुपायथांच यो
वचनभूषणेवदज जगदगुरुं तमाश्रये

अर्थ: मैं पिल्लै लोकाचार्य के चरणों का आश्रय लेता हूँ, जिन्होंने कृपापूर्वक निम्न सिद्धांतों को श्रीवचन भूषण शास्त्र में समझाया।

  1. पिराट्टी का वैभव, जो जीवों पर पुरुष्कार करती है (भगवान के समक्ष जीवात्मा को स्वीकार करने की सिफारिश करती है)
  2. सिद्धोपाय की महानता – भगवान ही सदा सिद्ध उपाय है
  3. ऐसे अधिकारीयों (योग्य जीवात्मा) का मनोभाव/ व्यवहार, जिन्होंने भगवान को उपाय रूप में स्वीकार किया है
  4. उस जीवात्मा की अपने आचार्य के प्रति अभिवृत्ति और कैंकर्य
  5. भगवान की निर्हेतुक कृपा की महिमा
  6. आचार्य चरण ही चरम उपाय (अन्तिमोपाय)

सांगाकिल द्रविड़ संस्कृतरूप वेद सारार्थ संग्रह महारस वाक्यजातं
सर्वज्ञ लोक गुरु निर्मितं आर्य भोगं वन्दे सदावचनभूषण दिव्य शास्त्र

अर्थ: मैं श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की निरंतर स्तुति करता हूँ, जिसकी रचना सर्वज्ञ पिल्लै लोकाचार्य ने की है, जो प्रबुद्ध विद्वानों के लिए अत्यंत आनंददायी है, जो वेद-वेदांत आदि के सार को कुशलता से प्रदर्शित करता है और जिसमें सुंदर उक्तियों और वाक्यों के बहुत से समोह निहित है।

अकूणटोत्गणट वैकुंटप्रियाणाम् कण्टभूषणं
गुरुणाजगतां उक्तं व्याप्तं वचन भूषणं

अर्थ: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र, जो उन मुमुक्षुओं के गले का सुन्दर आभूषण है जो श्रीवैकुंठ (परमपद) जाने के अभिलाषी है, जहाँ अनंत आनंद का निवास है और सभी जगह फैला हुआ है। ऐसे अद्भुत प्रबंध की रचना पिल्लै लोकाचार्य ने की है।

पेरू तरुविक्कूमवल् तन् पेरुमै (1) आरू (2) पेरुवान मुरै (3) 
अवन् कूरु गुरुवैप्पनुवल (4) कोल्वतिलैयागीय कुलिर्न्त अरुल्तान (5)
मारिलपुगल नर्गुरुविन वणमै (5) योड़ेलाम वचन भूडणमतिल
तेरिड नमक्करुल मुडुम्बै इरैयवन कलल्गल चेरेन्मनने

अर्थ: हे प्रिय ह्रदय! कृपया मुदुम्बै के स्वामी (पिल्लै लोकाचार्य) का आश्रय ग्रहण करना, जिन्होंने हमारे हितार्थ श्रीवचन भूषण शास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांतों को स्पष्टता से दर्शाया। इस प्रबंध में दर्शाए गए छः सिद्धांत निम्न है:

  1. पिराट्टी का वैभव, जो जीवों पर पुरुष्कार करती है (भगवान के समक्ष जीवात्मा को स्वीकार करने की सिफारिश करती है)
  2. सिद्धोपाय की महानता – भगवान ही सदा सिद्ध उपाय है
  3. ऐसे अधिकारीयों (योग्य जीवात्मा) का मनोभाव/ व्यवहार, जिन्होंने भगवान को उपाय रूप में स्वीकार किया है
  4. उस जीवात्मा की अपने आचार्य के प्रति अभिवृत्ति और कैंकर्य
  5. भगवान की निर्हेतुक कृपा की महिमा
  6. आचार्य चरण ही चरम उपाय (अन्तिमोपाय)

    தீதில் வானவர் தேவன் உயிர்களை, ஏதுமின்றி எடுக்கும்படியையும் (8)
    மன்னியவின்பமும் மாகதியும் குருவென்னு நிலை பெறும் இன்பொருள் தன்னையும்
    அசைவிலாதவேதமதனுள் அனைத்தையும் (9) வசனபூடண வழியாலருளிய
    மறையவர் சிகாமணி வண்புகழ் முடும்பை இறையவன் எங்கோன் உலகாரியன்
    தேன்மலர்ச்சேவடி சிந்தைசெய்பவர் மாநிலத்து இன்பமது எய்தி வாழ்பவரே

तिरुमामगल् तन् सिररुलेट्रमुम् (1) तिरुमाल् तिरुवडी सेर्वली नन्मैयुम् (2)
अव्वली ओलिन्तन अनैत्तिन् पुन्मैयुम् (3) मेयवलियूंरिय मिक्कोर् पेरुमैयुम् (4)
आरणम् वल्लवर् अमरु नन्नेरीयैयुम् (5) नारणन्राल तरु नर्गुरुनीदियुम् (6)
सोतिवानरुल तूयमागुरुविन् पादमामलर् पणिबवर् तन्मैयुं (7)
तिदिल् वानवर् देवन् उयिर्गलै, एतुमिनरी एडुक्कुम् पडीयैयुम् (8)
मन्नीयविनभमुं मागतियुम् गुरुवेन्नु निलै पेरुम् इन्पोरुल तन्नैयुं
असैविलातवेदमदनुल अनैत्तैयुं (9)वचनभूडण वलियालरूलिय
मरैयवर शिखामणि वणपुगल मुडुम्बै इरैयवन एन्गोन् उलगारियन्
तेन्मलर्च्चेवडी चिन्तैचेयभवर मानीलत्तु इन्भमतु एय्ती वालभवरे

अर्थ: वह जो मेरे स्वामी पिल्लै लोकाचार्य के शहद के समान चरण कमलों का ध्यान करते है, जो मुदुम्बै के स्वामी है, जो वेदों में श्रेष्ठ विद्वानों के मुकुट में शिखरमणि के समान है और जो श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के माध्यम से शास्त्रों के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का वर्णन करते है – ऐसे मनुष्य इसी संसार में रहकर अत्यंत महान आनंद (भगवत/ भागवत अनुभव और कैंकर्य) की अनुभूति करेंगे। पिल्लै लोकाचार्य ने इस प्रबंध में मुख्यतः नौ सिद्धांतों का वर्णन किया है।

  1. श्रीमहालक्ष्मीजी की महिमा जो भगवान से जीवात्मा को स्वीकार करने की सिफारिश करती है (जिस प्रकार एक माता निरंतर अपने बालक का प्रतिनिधित्व पिता के समक्ष करती है)
  2. भगवान को प्राप्त करने के उपाय (साधन) स्वरूप स्वयं भगवान की महानता
  3. अन्य उपायों/ मार्गों जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग आदि की कठिनता
  4. एक मात्र भगवान को उपाय स्वरुप स्वीकार करने वाले प्रपन्न की महिमा
  5. ऐसे प्रपन्नों के व्यवहार और दैनिक गतिविधियाँ
  6. एक सच्चे आचार्य के आदर्श गुण और उनका व्यवहार
  7. एक सच्चे शिष्य के आदर्श गुण
  8. जीवात्माओं के कल्याण के लिए भगवान (जो नित्यसूरियों के स्वामी है) द्वारा किये गए प्रयत्न और उनकी निर्हेतुक कृपा और
  9. चरम सिद्धांत जो बतलाता है कि आचार्य चरण ही उपाय और उपेय है (चरम पर्व निष्ठा)

लोकाचार्य कृते लोकहिते वचनभूषणे
तत्वार्त्त दर्शिनो लोके तन्निष्टास्च सुदुर्लभा:

अर्थ: मात्र जीवात्माओं के कल्याण के लिए रचित श्रीवचन भूषण में समझाए गए सिद्धांतों को समझने और उनका अपने जीवन में अनुसरण करनेवाले मनुष्य दुर्लभ है।

जगदाचार्य रसिते श्रीमदवचनभूषणे
तत्वज्ञानांच तन्निष्टाम देहिनाथ यतित्रमे

अर्थ: हे यतिराज (श्रीरामानुज स्वामीजी)! कृपया मुझ पर कृपा करे जिससे मैं पिल्लै लोकाचार्य द्वारा रचित श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में दर्शाए गए सिद्धांतों को समझकर उनका अनुसरण कर सकूँ।

इस प्रकार श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की तनियन का अनुवाद समाप्त हुआ, जो पिल्लै लोकाचार्य और इस अद्भुत प्रबंध की महिमा का प्रदर्शन करता है।

अगले अंक में हम श्री वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा रचित इस श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के अवतारिका (व्याख्यान का परिचय) का अनुवाद देखेंगे।

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/11/aippasi-anubhavam-pillai-lokacharyar-srivachana-bhushanam-thanians.html

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