श्री वैष्णव लक्षण – १

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

बाह्य स्वरूप

vilancholai-pillai

अपने पूर्वाचार्यों के बहुत से ग्रन्थो में बहुत से जगह श्री वैष्णवों के लक्षणो के बारे में उल्लेख किया है। इसी संर्दभ में हमें अपने पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में बहुत से उधारण मिलेंगे।

पद्म पुराण में एक मौलिक प्रमाण दिया गया है जिसे हमारे पूर्वाचार्यों ने अपने ग्रंथों में उपयोग किया है

ये कण्ठ लग्न तुलसी नलिनाक्ष माला ये बाहुमूल परिच्रिन्हत शंख चक्रा |
ये वा ललाट पटले लसदुर्ध्वपुण्ड्रा ते वैष्णवा भुवनमाशु पवित्र यन्ति ॥

यह पूरा श्लोक हमें स्पष्ट से बताता है कि एक श्रीवैष्णव का पूर्ण बाह्य स्वरूप किस तरह होता है और कैसे वह उस जगह को और वहाँ रहनेवाले मनुष्य दोनों को शुध्द करता है।

जिसके गले में तुलसी और कमलाक्ष की माला, (भगवान, पूर्वाचार्य, आचार्य, आल्वार इनके द्वारा धारण किये गये पवित्र माला) जिनके कंधों में भगवान श्रीमन नारायण के चिन्ह शंखचक्र अंकित है (पञ्चसंस्कार की एक विधी) और ललाट पर सच्छिद्र ऊर्ध्वपुण्ड्र विराजमान है (मतसम्प्रदाय के गुरू का दिया हुवा चिन्ह गौरव सहित धारण करना चाहिए। श्री वैष्णवों को (मृतिका) पासा का सुन्दर सच्छिद्र अपने ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करके उसको अलंकृत करने के लिये (बीच में) हरिद्रा का श्री धारण करना चाहिए। ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक में ये खडी दोनो रेखाये शरणागती का प्रतीक हैं। ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक भगवान के श्रीचरण कमल हैं और बीच में स्थित लक्ष्मीजी का स्थान है। हमारे पूर्वाचार्य तो हमेशा द्वादश तिलक धारण करते थे और करते आये हैं । ऎसे श्री वैष्णव, वातावरण को और वहाँ रहनेवाले मनुष्य दोनों को शुध्द करता है।

हमारे पूर्वाचार्यों ने सदैव अपने बाह्य स्वरूप को मुख्य स्थान दिया है और सदैव यह खयाल रखा है कि किसी भी परिस्थिती में अपने स्वरूपानरूप बाह्य स्वरूप का पूरा ध्यान रखें। बाह्य स्वरूप ही श्रीवैष्णवों की मुख्य पहचान है, सिर्फ एक परम श्रीवैष्णव ही दूसरे वैष्णवों को बिना बाह्य स्वरूप की आंतरिक स्वरूप से पहचान सकता है (इसके लिये कृपा के दिव्य दृष्टी की जरूरत है जो परम भागवतो में होती है, सामान्य जन में नहीं!)

इस शुरुवात के साथ हम अपने पूर्वाचार्यों के अनेक ग्रन्थों से श्री वैष्णव लक्षण के प्रमाणो को देखेंगे।

अडियेंन  केशव रामानुज दासन

पुनर्प्रकाशित : अडियेंन जानकी  रामानुज दासि

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-lakshanam-1.html

संग्रहीत : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय – http://koyil.org
प्रमाण  – http://granthams.koyil.org
प्रमाता – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा / बाल्य पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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