Monthly Archives: February 2016

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका – पाठकों हेतु मार्गदर्शिका

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका

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आधारभूत प्राविधिक शब्दावली (श्रीवैष्णव परिभाषा):

  • आचार्य, गुरु – आध्यात्मिक गुरु – सामान्यतः तिरुमंत्र उपदेश प्रदान करने वाले गुरूजी से सम्बंधित
  • शिष्य – अनुयायी
  • भगवान – श्रीमन्नारायण भगवान
  • अर्चा – मंदिर, मठों और घरों में विराजे भगवान का कृपामय दिव्य विग्रह
  • एम्पेरुमान्, पेरुमाल, ईश्वर – मेरे स्वामी/ नाथ, भगवान
  • एम्पेरुमानार – भगवान से भी अधिक करुणामय – श्री रामानुज स्वामीजी
  • पिरान् – वह जो अनुग्रह प्रदान करे / उपकार करे
  • पिराट्टी, तायार – श्री महालक्ष्मीजी
  • मुलवर – भगवान के पावन विग्रह जो मंदिरों के भीतर स्थिरता से विराजे है
  • उत्सवर – भगवान के वह विग्रह जो उत्सवों/ शोभा यात्राओं में बाहर मार्ग में ले जाये जाते है
  • आलवार – श्रीवैष्णव संत, जो पुर्णतः भगवान के कृपापात्र थे/ भगवान से हिले मिले थे और द्वापर युग के अंत से कलि युग के प्रारंभ तक दक्षिण भारत में रहते थे. आलवार अर्थात वह जो सदा भक्ति में निमग्न हो
  • पूर्वाचार्य – श्रीमन्नारायण भगवान से लेकर श्री वैष्णव परंपरा में आने वाले आध्यात्मिक गुरु
  • भागवत, श्रीवैष्णव – वह जो भगवान का दास है
  • अरैयर – श्रीवैष्णव जो भगवान के समक्ष संगीत और मुद्राओं के साथ दिव्य प्रबंधन का गान करते है
  • ओराण वालि आचार्य – पेरिय पेरुमाल से मणवाल मामुनिगल पर्यंत, एक विशिष्ट आचार्य श्रेणी– जिन्होंने एक के बाद एक संप्रदाय का नेतृत्व किया-
  • दिव्य प्रबंध – आलवारों के पासूर (श्लोक्) जिन्हें अरुलिच्चेयल के नाम से भी जाना जाता है
  • दिव्य दंपति – श्रीमन्नारायण और श्रीमहालक्ष्मीजी
  • दिव्य देश – आलवारों द्वारा महिमा-मंडित भगवान के क्षेत्र/ स्थल
  • दिव्य सूक्ति, श्री सूक्ति – भगवान/ आलवारों/ आचार्यों के वचन
  • अभिमान स्थल – भगवान के क्षेत्र जो पूर्वाचार्यों के अत्यंत प्रिय है
  • पासूर – छंद/ श्लोक
  • पधिगम् – दशक (10 पसूरों का संकलन)
  • पत्तु – शतक (100 पसूरों का संकलन)

सामान्य शब्दावली – विशिष्ट अर्थ (श्रीवैष्णव संदर्भ में सामान्यतः उपयोग किये जाने वाले)

    • कोयिल – श्रीरंगम
    • तिरुमला – तिरुवेंकटम्, तिरुमालिरुन्चोलै को भी तिरुमालाकहा जाता है
    • पेरुमाल कोयिल – कांचीपुरम
    • पेरुमाल– श्रीराम
    • इलैय पेरुमाल – लक्ष्मण
    • पेरिय पेरुमाल – श्रीरंगनाथ (मुलवर – मूल मूर्ति)
    • नम्पेरुमाल – श्रीरंगनाथ (उत्सवर – उत्सव मूर्ति)
    • आलवार – नम्माल्वार/ श्रीशठकोप स्वामीजी
    • स्वामी – श्री रामानुज स्वामीजी
    • जीयर, पेरिय जीयर – मणवाल मामुनिगल/ श्री वरवरमुनि स्वामीजी
  • स्वरुप – सच्चा स्वभाव/ प्रकृति
  • रूप – आकार/ आकृति
  • गुण – मंगलमय विशिष्ट लक्षण
    • परत्वं – प्रभुत्व/ सर्वोच्चता/ प्रधानता
    • सौलभ्यम् – सुगमता से प्राप्य/ सुलभ
    • सौशील्यं – उदारता
    • सौंदर्यं – सुंदरता / बाह्य शोभा
    • वात्सल्यं – माता के समान सहनशीलता/ धैर्यता
    • माधुर्यं – मधुरता
    • कृपा, करुणा, दया, अनुकम्पा – कृपा
  • शास्त्र – प्रमाणिक लेख जो हमारे पथ प्रदर्शक है – वेद, वेदांत, पांचरात्र, इतिहास, पुराण, आलवारों के दिव्य प्रबंध, आचार्यों की रचनाएँ – स्तोत्र, व्याख्यान.
  • कर्म – कार्य/ क्रिया, पुण्य (सदाचार) और पाप (दोष) से भी सम्बंधित
  • मोक्ष – मुक्ति – बंधन से मुक्ति
    • भगवत कैंकर्य मोक्ष – संसार बंधन से मुक्ति के पश्चाद परमपद में नित्य कैंकर्य में संलग्न होना
    • कैवल्य – बंधन से मुक्ति के पश्चाद, स्वयं की आत्मा का भोग/ नित्य आत्मानुभूति
  • कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग – भगवान को प्राप्त करने के साधन
  • प्रपत्ति, शरणागति – समपूर्ण समर्पण/आश्रय– मात्र भगवान को ही उन्हें प्राप्त करने का साधन स्वीकार करना प्रपन्न, जिन्होंने आचार्य चरण कमलों में समर्पण किया है, उन्हें आचार्य निष्ठावान कहा जाता है
  • आचार्य निष्ठा – आचार्य के प्रति सम्पूर्ण समर्पण
  • आचार्य अभिमान – आचार्य द्वारा स्नेहपूर्ण संरक्षण
  • पञ्च संस्कार (समाश्रयं) – किसी मनुष्य को कैंकर्य (इस संसार और परमपद) के लिए तैयार करने की परिशोधक प्रक्रिया- इसके अंतर्गत पांच तत्वों का अनुसरण किया जाता है
    • ताप – शंख चक्र लांचन – हमारे कन्धों/ बाहू पर शंक और चक्र की गर्म छाप। यह दर्शाता है कि हम भगवान की संपत्ति है –उसी प्रकार जैसे एक पात्र पर उसके स्वामी के चिह्न अंकित किये जाते है, हमें भगवान के चिह्नों से अंकित किया जाता है
    • पुण्ड्र (चिह्न) – द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करना – शरीर के द्वादश (12) स्थानों पर ऊर्ध्व पुण्ड्र (तिरुमण और श्रीचुर्ण) धारण करना
    • नाम – दास्य नाम – आचार्य द्वारा प्रदत्त नया दास्य नाम (रामानुजदास, मधुरकवि दास, श्रीवैष्णव दास)
    • मंत्र – मंत्रोपदेश – आचार्य से रहस्य मंत्र का ज्ञान प्राप्त करना; मंत्र अर्थात वह जिसके ध्यान करने वाले को सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है – तिरुमंत्र, द्वयं और चरम श्लोक जो हमें संसार से मुक्ति प्रदान करते है। अधिक जानकारी के लिए कृपया http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/rahasya-thrayam.html पर देखें.
    • याग – देव पूजा – तिरुवाराधना/ पूजा विधि का ज्ञान प्राप्त करना
  • कैंकर्य – भगवान, आलवारों, आचार्यों, भागवतों के प्रति सेवा
  • तिरुवाराधना – भगवान की आराधना/ पूजा
  • तिरुवुल्लम – दिव्य ह्रदय/ अभिलाषा
  • शेषी – स्वामी/ नाथ
  • शेष – सेवक
  • शेषत्वं – भगवान के सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना (लक्ष्मणजी के समान जो सदा श्रीराम की सेवा के लिए उद्यत रहते थे)
  • पारतंत्रियम् –सम्पूर्णत: भगवान और उनके दासों के अधीन/ नियंत्रण में रहना (भरत आलवान के समान जो सदा श्रीराम के वचनों का अनुसरण करते थे और श्रीराम की आज्ञा से उनके वियोग में रहना भी स्वीकार किया)।
  • स्वातंत्रियम् – स्वाधीनता/ स्वतंत्रता
  • पुरुषकारं – सिफारिश / अनुशंसा/ मिलाप कराना– श्री महालक्ष्मीजी भगवान से सिफारिश करती है कि यद्यपि वे अयोग्य है तथापि आप जीवात्माओं को स्वीकार करें। इस संसार में आचार्यों को पिराट्टी (श्रीमहालक्ष्मीजी) के प्रतिनिधि के रूप में संबोधित किया जाता है। पुरुष्कार करने वालों में मुख्यतः 3 गुण होते है-
    • कृपा – संसार में पीड़ित/ दुखी जीवात्माओं पर कृपा
    • पारतंत्रियम् – भगवान पर सम्पूर्ण आश्रय/ निर्भरता
    • अनन्यार्हत्वम् – सम्पूर्णत: भगवान के अधीन/ नियंत्रण में रहना
  • अन्य शेषत्वं – भगवान और भागवतों के अतिरिक्त किसी भी अन्य की सेवा में लगना
  • विषयान्तरम् – सांसारिक सुख – अर्थात कैंकर्य के अतिरिक्त सभी कुछ विषयान्तर है
  • देवतान्तरम् – सच्चे देव श्रीमन्नारायण है। उनके अतिरिक्त कोई भी अन्य जीवात्मा जिसे भ्रमवश देव समझा जाये यही देवतान्तर है (बहुत सी जीवात्माओं को भगवान ने इस लौकिक जगत के कार्य-कलापों के लिए नियुक्त किया है। वे भी इस संसार में कर्म से बंधे हुए है)।
  • स्वगत स्वीकारम् – हमारा भगवान/ आचार्य को स्वीकार करना (“मैं” की उपस्थिति– अहंकार)
  • परगत स्वीकारम् – भगवान/ आचार्य का स्व-इच्छा से बिना कहे हमें स्वीकार करना
  • निर्हेतुक कृपा – अकारण ही कृपा – भगवान की सतत करुणा/कृपा जो जीवात्मा द्वारा प्रदीप्त नहीं है
  • सहेतुक कृपा– जीवात्मा के स्व-प्रयास द्वारा प्रदीप्त भगवान की कृपा
  • नित्य – नित्य सूरी जो परमपद (और जहाँ भी वे विराजते है) में भगवान की नित्य सेवा करते है – नित्य सूरी सदैव पवित्र और अनादी से मुक्त है
  • मुक्त – वह जीवात्मा जो लौकिक संसार में बद्ध थे परंतु अंततः परमपद प्रस्थान करके पवित्र हुए और भगवान के सेवक हुए
  • बद्ध – वह जो वर्तमान में इस लौकिक संसार में बंधे हुए है जिन्हें संसारी भी कहते है
  • मुमुक्षु – वह जो मोक्ष की अभिलाषा करता है
  • प्रपन्न – वह जो भगवान को समर्पित है – मुमुक्षु के समान ही
    • आर्त प्रपन्न – प्रपन्न, जो लौकिक संसार के दुखों से अविलंभ मुक्ति चाहते है
    • द्रुप्त प्रपन्न – वह जो समर्पित है परंतु पहले इसी संसार में रहकर भगवान और भागवतों की सेवा करना चाहते है और अंत में परमपद में सेवा चाहना करते है
  • तीर्थ – पवित्र जल
  • श्रीपाद तीर्थ – चरणामृत –आचार्य के चरणकमलों को धोने के लिए उपयोग किया हुआ जल
  • भोग – भोजन (या अन्य पदार्थ) जो भगवान को अर्पण करने के लिए तैयार है
  • प्रसाद – भोजन (या अन्य पदार्थ) जो भगवान को अर्पित किया गया है और फिर जिसका उपभोग श्रीवैष्णव जन कर सकते है
  • उच्चिष्टम् – प्रसाद के लिए अन्य शब्दावली (अन्य अर्थ- शेष भोजन), अन्य अवसर पर इसका अर्थ दूषित भोजन से भी हो सकता है (अन्य के होटों से छुआ गया भोजन) – किस संदर्भ में उपयोग हो रहा है उस पर निर्भर है
  • पडि – भोग के लिए उपयोग होने वाली शब्दावली
  • सात्तुप्पडि – चन्दन की लकड़ी का लेई
  • शठारी, श्री शठकोप, आदि – श्रीमन्नारायण भगवान के चरणकमल। नम्माल्वार को श्रीशठकोप भी कहा जाता है क्यूंकि उन्हें भगवान के चरणकमल के रूप में संबोधित किया जाता है
  • मधुरकविगळ – नम्माल्वार के चरणकमल
  • श्री रामानुजम् – आलवार तिरुनगरी में नम्माल्वार के चरणकमल
  • श्री रामानुजम् – सभी आलवारों के चरणकमल
  • मुदलियाण्डान – श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणकमल
  • पोन्नदियां सेंकमलम् – मामुनिगल के चरणकमल
  • सामान्यतः विश्वासपात्र शिष्य को चरण कमल के रूप में संबोधित किया जाता है। उदहारण के लिए, पराशर भट्टर एम्बार के चरणकमल है, नन्जीयर भट्टर के चरणकमल है, नम्पिल्लै नन्जीयर के चरण कमल है, आदि
  • विभूति– संपत्ति/ वैभव
  • नित्य विभूति (परमपद/श्रीवैकुंठ – अलौकिक जगत)
  • लीला विभूति (संसार – लौकिक जगत जहाँ हम अभी रहते है)
  • अडियेन, दास – स्वयं का संबोधन विनयपूर्वक करना (मैं का प्रतिस्थान) – विनम्र स्वयं
  • देवरिर, देवर, श्रीमान् – अन्य श्रीवैष्णव को संबोधित करना – आपकी कृपा
  • एलुन्दरलुतल् – आना, बैठना
  • कण् वलरुतल् – निद्रा
  • नीराट्टम् – नहाना
  • शयनं– शयन करना
  • श्रीपादम् – भगवान/ आलवार/ आचार्यों को पालकी में ले जाना
  • तिरुवड़ी – चरण कमल (हनुमानजी को भी कहा जाता है)
  • व्याख्यान – टिपण्णी/ समीक्षा/ विवरण/ भाष्य
  • उपन्यास – उपदेश
  • कालक्षेप – मूल विषय को क्रमानुसार पढ़कर उसका उपदेश और मूल विषय पर आधारित व्याख्यान
  • अष्ट दिक्-गज – श्री वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा स्थापित 8 आचार्य, अनुयायियों को श्रीवैष्णव संप्रदाय में दीक्षित करने और सत-संप्रदाय का प्रचार करने हेतु
  • 74 सिंहासनाधिपति – श्री रामानुज स्वामीजी द्वारा स्थापित 74 आचार्य, अनुयायियों को श्रीवैष्णव संप्रदाय में दीक्षित करने और सत-संप्रदाय का प्रचार करने हेतु

दर्शन-शास्त्र से सम्बंधित शब्दावली

  • विशिष्टाद्वैतं – दर्शन-शास्त्र, जो एक सर्वोच्च/उत्तम/श्रेष्ठ ब्राह्मण (भगवान) को समझाता है, चित्त और अचित जिसके अंग है
  • सिद्धांत – हमारे सिद्धांत/ नियम
  • मिथुन – दंपति – भगवान और महालक्ष्मीजी
  • एकायनं – भगवान नारायण के परत्व को स्वीकार करना परंतु उनके श्रिय:पतित्वं (श्रीमहालक्ष्मीजी के स्वामी) को उचित महत्त्व न प्रदान करना
  • मायावादम् – दर्शन-शास्त्र, जो केवल एक ब्राह्मण के विषय में समझाता है, जिसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष सभी भ्रम है
  • आस्तिक – जो शास्त्रों को प्रमाण के रूप में स्वीकार करते है
  • नास्तिक – जो शास्त्रों को अस्वीकार करता है
  • बाह्य – जो शास्त्रों को अस्वीकार करता है
  • कुदृष्टि – वह जो शास्त्रों को स्वीकार करते है परंतु अपनी सुविधानुसार उसकी अशुद्ध व्याख्या करते है
  • आप्त – विश्वसनीय स्त्रोत
  • प्रमा – वैध/ सच्चा ज्ञान
  • प्रमेयं – सच्चे ज्ञान का उद्देश्य
  • प्रमाता – सच्चे ज्ञान का परित्राता
  • प्रमाण – सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने का साधन
    • प्रत्यक्ष – इन्द्रियाँ (कान, आँख, आदि) जिनके द्वारा प्रत्यक्ष का अनुभव होता है
    • अनुमानं – पूर्व अनुभवों पर आधारित प्राप्त ज्ञान
    • शब्द – शाश्त्र के वचन/ विश्वसनीय स्त्रोत
  • तत्व त्रय – तीन सत्यता/ वास्तविकताएँ जिसे प्रपन्न द्वारा समझा जाना अनिवार्य है। अधिक जानकारी के लिए कृपया  http://ponnadi.blogspot.in/p/thathva-thrayam.html पर देखें
  • रहस्य त्रय – तीन रहस्य मंत्र/ विषय– पञ्च संस्कार में आचार्य द्वारा निर्देशित। अधिक जानकारी के लिए कृपया http://ponnadi.blogspot.com/2015/12/rahasya-thrayam.html पर देखें।
    • तिरुमंत्र – अष्टाक्षर महा मंत्र
    • द्वयं – द्वय महा मंत्र
    • चरम श्लोक – अर्थात “सर्व धर्मान् परित्यज्य”- गीता श्लोक। राम चरम श्लोक (सकृदेव प्रपन्नाय) और वराह चरम श्लोक (स्थिते मनसी) भी चरम श्लोक कहे जाते है।
  • अर्थ पंचक – पांच आवश्यक सिद्धांत – पञ्च संस्कार में आचार्य द्वारा निर्देशित। अधिक जानकारी के लिए कृपया http://ponnadi.blogspot.com/2015/12/artha-panchakam.html पर देखें।
    • जीवात्मा – चेतन जीव
    • परमात्मा – भगवान
    • उपेयं, प्राप्यं –प्राप्त करने योग्य उद्देश्य – कैंकर्य
    • उपायं – लक्ष्य प्राप्ति के साधन
    • विरोधी – उदेश्य प्राप्ति में बाधाएं
  • आकार त्रय – तीन आवश्यक गुण जो सभी जीवात्मा में होना चाहिए
    • अनन्य शेषत्वं – भगवान ही को एक मात्र स्वामी स्वीकार करना
    • अनन्य शरणत्वं – भगवान ही को एक मात्र आश्रय स्वीकार करना
    • अनन्य भोग्यत्वं – सामान्यतः इसका अर्थ है “भगवान का रसानंद”, परंतु अति-उच्च सिद्धांत है –“आनंद प्राप्त करनेवाले एक मात्र भगवान ही है” अर्थात “हम मात्र भगवान के आनंद के लिए है”
  • सामानाधिकरण्यं – सामानाधिकरण्यं अर्थात एक से अधिक तत्व के लिए एक समान आधार। इसका अर्थ यह भी है कि दो या अधिक शब्दों द्वारा एक विषय का व्याख्यान। इसका उदहारण है- मृद घटं (मिट्टी का पात्र)। यहाँ घट (पात्र) के विषय में बात की जा रही है जो आधार है और जिसमें दो गुण है – मृद/ मिट्टी से निर्मित और घटत्व (उसका पात्र होना)। अन्य उदहारण है “शुक्ल: पत:” (श्वेत वस्त्र)। यहाँ पत (वस्त्र) के विषय में बात की गयी है जो आधार है और जिसके दो गुण है – शुक्ल (श्वेत रंग) और पतत्व (उसका वस्त्र होना)। उसीप्रकार, ब्राह्मण/भगवान सभी रचनाओं के आधार है यह सामानाधिकरण्यं के सिद्धांत के द्वारा समझाया गया है। यह एक पृथक और विस्तृत विषय है जिसे प्रबुद्ध विद्वान द्वारा समझा जा सकता है, जो संस्कृत व्याकरण और वेदांत में निपुण है।
  • वैयधिकरण्यं  – वैयधिकरण्यं अर्थात एक से अधिक तत्वों के लिए विभिन्न आधार। उदहारण, एक कुर्सी को धरती धारण करती है और एक फूलदान को एक मेज धारण करती है। इसका अर्थ यह भी है कि दो या अधिक शब्दों द्वारा विभिन्न विषयों का व्याख्यान।
  • समष्टि सृष्टि – भगवान पञ्च भूतों (पांच तत्व) तक सृष्टि की रचना करते है और जीवात्मा को ब्रह्मा के पद पर नियुक्त करते है। इस चरण तक, इसे समष्टि सृष्टि कहा जाता है।
  • व्यष्टि सृष्टि –ब्रहमा, ऋषियों, आदि में अन्तर्यामी रुप लेकर भगवान उन्हें विभिन्न रूपों में सृष्टि रचना के अधिकार प्रदान करते है। इस चरण को व्यष्टि सृष्टि कहा जाता है।
  • व्यष्टि संहारम् –रूद्र/ शिव, अग्नि आदि (में अंतर्यामी होकर) उन्हें लौकिक जगत के संहार का अधिकार प्रदान करते है।
  • समष्टि संहारम् – पञ्च भूतों और अन्य सृष्टि रचनाओं को भगवान स्वयं में समाहित कर लेते है।

अधिक जानकारी के लिए देखें: http://kaarimaaran.com/downloads.html

-अदियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/readers-guide/

श्रृंखला का अगला लेख >>

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ७

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देखे सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ६

 श्रीरामानुज स्वामीजी और  श्री वंगी पुरत्तु नम्बी

 

३४(शयन विरोधी – शयन में बाधाएं

शयन यानि निद्रा, विश्राम और आराम करना। श्रीवैष्णव परिभाषा में इसे इस तरह कहते है “कण् वळर्गै” स्नान करने के समान कहते है जैसे “नीराट्टम्”। कुछ बाधाएं इस विषय में यहाँ बतायी गयी है। हम उन्हें देखेंगे।

  • सांसारीक मनुष्य के घर में विश्राम करना विरोधी है। मुमुक्षु यानि जो मोक्ष कि अभिलाषा करता है। संसारी यानि जो मोक्ष कि अभिलाषा नहीं करता है। श्रीशठकोप स्वामीजी संसारी कि जीवन मृत्यु को तिरुविरुत्तम के पहिले पाशुर में समझाते है “पोय्न निन्र ञानमुम पाल्ला आलुक्कुडम्बुम” – अज्ञानता से बाहर वही पापों को दोहराना और उसके परिणाम स्वरूप सांसारिक देह लेकर फिर से जन्म लेना।
  • सांसारिक लोगों के साथ बैठना या सोना।
  • सांसारिक लोगों के बिछौना पर विश्राम करना।
  • उनके चरणों के नजदीक सोना।
  • सांसारी के बिछौने से भी नीचे सोना (उदाहरण: वो बिछौना पर विश्राम करें और हम जमीन पर)।
  • उन्हें विश्राम के लिये स्थान देना।
  • सांसारी विश्राम किये हुए स्थान को पवित्र नहीं करना।
  • श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में विश्राम नहीं करना। अनुवादक टिप्पणी: जब भी अवसर प्राप्त होता है हमें श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में विश्राम करना चाहिये यह विचार करके कि यह उत्तम सौभाग्य है।
  • यह विचार करके कि वें हमारे समान है उनके साथ विश्राम करना। अनुवादक टिप्पणी: हमें अन्य श्रीवैष्णवों को हमसे उच्च समझना चाहिये।
  • बिना उनको सम्मान दिये उनके पवित्र बिछौने पर हम विश्राम करना।
  • उनके चरण कमलों के समीप विश्राम करने से हिचकिचाना।
  • उनसे भी उच्च स्थान पर विश्राम करना (उदाहरण: वों जमीन पर विश्राम करें और हम बिस्तर पर)।
  • बिना उन्हें उचित स्थान दिये हमारा विश्राम करना।
  • उनके सोये हुए स्थान को उनके उठने के पश्चात उसे पवित्र करना। अनुवादक टिप्पणी: यह एक सामान्य दस्तुर है जहाँ हम पिछले रात को विश्राम किये उस स्थान को अगले दिन जल से धोकर पवित्र करें। परन्तु जब हम अन्य श्रीवैष्णवों को पवित्र समझते है हमें उनके विश्राम स्थान पर ऐसे पवित्र करने का कार्य नहीं करना चाहिये।
  • विहित विषयं यानि आनन्द जो शास्त्र में माना / नियत किया गया है – यहीं भी एक बाधा है। यहाँ एक श्रीवैष्णव कि पत्नी ऐसा दर्शाया गया है (श्रीवैष्णवी के लिये उसका पति)। कोई भी यह विचार कर अपनी पत्नी के साथ नहीं सोता कि यह समागम शास्त्र में आज्ञा किया गया है और इसका आनन्द लेना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के १०१ वें सूत्र में समझाते है “मट्रैयिरुवर्क्कुम् निषिद्ध विशय निव्रुत्तिये अमैयुम्; प्रपन्ननुक्कु विहित विशय निव्रुत्ति तन्नेट्रम्” – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस उच्च तथ्य को अपने सुन्दर तरिके से समझाते है। वह जो सांसारिक लाभ से जुड़े है और वह जो उपायन्तर (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग) के पीछे है – दूसरों कि स्त्रियों से अलग हो गये है यह पर्याप्त है (सामान्यता दूसरों कि स्त्रियों की लालसा करना शास्त्र में निन्दक है)। दूसरे अपने स्वयं कि स्त्री के साथ समागम का आनन्द लेते है अपने धर्म को पूर्ण करने हेतु, परन्तु प्रपन्नों के लिये ऐसे समागम उनके स्वरुप विरोधी है, इसलिये इससे भी बचना चाहिये। आगे और भी अन्य ग्रन्थों में समझाया गया है जैसे एरुम्बी अप्पा द्वारा रचित विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णयं कि हमारे पूर्वाचार्य जो उच्च प्रपन्न थे फिर भी इस समागम में कुछ दिनों के लिये रहते थे ताकि एक या दो उच्च श्रीवैष्णव को जन्म दे सके बिना स्वयं के आनन्द और पश्चात पूर्णत: इस कार्य को त्याग कर देते और अपना पूर्ण समय केवल भगवद विषय में लगा देते। यह एक पेचिदा विषय है और सभी को इसके तथ्य अपने आचार्य से सुनना चाहिये।
  • यह सोच कर कि हमारी पत्नी भी एक श्रीवैष्णव है हमें उसके साथ कोई मन में सुख कि भावना लेकर नहीं सोना चाहिये। ऐसे विचार नहीं होना विरोधी है।
  • ऐसे विचारों के साथ नहीं सोना चाहिये जिससे विषय आनन्द मन में उत्पन्न हो।
  • भगवान का विचार किये बिना विश्राम करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सोने जाने के पहिले सभी को इन पाशुरों को गाना चाहिये जैसे श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कि तिरुमोली “उरगल् उरगल्”, “पनिक्कडलिल् पळ्ळि कोळै”, “अरवत्तमळियिनोडुम्”, आदि। पञ्च काल परायण के लिये विश्राम करना जीवात्मा और परमात्मा के लिये समागम है (वैधिक दिन को ५ भागों में बाटा जाता है और अंतिम भाग को योग कहते है) – भगवान के नाम, रूप, गुण, आदि को विश्राम से पहिले याद करने को बहुत महत्त्व है।
  • अपने आचार्य और पूर्वाचार्य को स्मरण किये बिना विश्राम करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें आचार्य कि तनियन, वाळि तिरुनामम् (ध्यान श्लोक्), आदि को विश्राम से पहिले कहना चाहिये ताकि हमको भगवान से जोड़ने में आचार्य का हमारे उपर जो उपकार है उसे हमें यह स्मरण करा सके।
  • हमारे शारिरीक कार्य के विषय में विचार करते हुए विश्राम करना बाधा है।
  • आत्मा और उसके स्वभाव के बारें में विचार करते हुए आराम नहीं करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी को आत्मा को भगवान और भागवतों का दास मानना चाहिये और अत: ऐसे रवैये का विचार करना चाहिये।
  • सोते समय हमें अपने पैर भगवद, भागवत और आचार्य कि ओर नहीं पसारना चाहिये।
  • सोते समय मन्दिर, अपने तिरुमाली के तिरुवाराधन कमरे कि और आचार्य के मठ कि ओर नहीं पसारना चाहिये।
  • जब हम आचार्य का कैंकर्य करते है तब हमें विश्राम नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य के विश्राम से पहिले हमें नहीं सोना चाहिये।
  • आचार्य के उठने के पश्चात भी हमें नहीं सोना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: सोने को एक सामान्य कार्य समझ सकते है। परन्तु सभी कार्य में हमें ध्यान पूर्वक सभी कार्य का विश्लेषण करना चाहिये। जैसे पहिले बताया गया है वैधिका यानि एक दिन को पाँच भाग में बाटा जाता है – अभिगमनं (उठना और सुबह के कार्य), उपाधानं (तिरुवाराधन के लिये सामग्री इकट्ठा करना), इज्जा (अपने तिरुमाली के भगवान कि तिरुवाराधन), स्वाध्यायम (उभय वेदान्त को सिखना और सिखाना) और योगम (विश्राम करना – जीवात्मा और परमात्मा का समागम)। योगम भाग को हम सामान्यत: विश्राम करना मानते है और जब विश्राम को अच्छी तरह नियंत्रण में रखेंगे तो तमोगुण कम होगा और सत्वगुण बढ़ेगा। अधिक सोना यानि तमोगुण का सीधा बढाना और हमें अपने दिनचर्या को सुधार कर सुबह जल्दी उठकर और शरीर और मन को भगवद / भागवत कैंकर्य में लगाकर इसको सुधारणा है ।
३५) उत्थान विरोधी उठने में बाधाएं

उत्थानम यानि बिछौने से उठना। हम इस विषय में बाधाएं देखेंगे।

  • जब आचार्य या अन्य श्रीवैष्णव हमें उठाते है तो बहुत धीरे से उठना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवैष्णव हमें उठाते है तो हमें दु:ख प्रगट करना चाहिये की उन्हें हमें उठाना पड़ा। नाकि उनके सन्मुख हम पहिले हीं उठकर बैठ गये। अत: उनके उठाते हीं हमें एक हीं क्षण में बड़े उत्साह के साथ उठना चाहिये।
  • जब सांसारिक लोग उठाते है तब तुरन्त उठना ।
  • भगवान और आचार्य के कीर्ति को याद किये बिना उठना बाधा है। ज्ञानी जन “हरी: हरी:” का जप करते उठते है। “हरिर् हरति पापानि” श्लोक और द्वय महामन्त्र का जप करते हुये उठना हर एक के लिये अच्छा है। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में ब्रम्ह मुहूर्त में उठने का नियम है (४ बजे) और उठते ही भगवान श्रीमन्नारायण कि महिमा को स्मरण करें। सामान्यत: बड़ो में यह देख जाता है कि उठते हीं गुरु परम्परा का मन्त्र “अस्मद् गुरुभ्यो नम: से लेकर श्रीधराय नम: … ”, रहस्य त्रय (तिरुमंत्र, द्वय मन्त्र, चरम श्लोक), आचार्य तनियन, “हरिर् हरति पापानि” श्लोक्, “कौसल्या सुप्रजा” श्लोक, नदातूर अम्माल का परमार्थ द्वय श्लोक, गजेन्द्र मोक्ष और परत्ववादि पञ्च श्लोक गाते है।
  • जब आचार्य या श्रीवैष्णव हमारी प्रतिक्षा कर रहे हो तो अपने अनुसंधान जैसे दिव्य प्रबन्ध, स्तोत्र, इतिहास, पुराण या जप पर हीं ध्यान देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवैष्णव हमारे तिरुमाली में आते है तो हम हमारे नित्य पाठ का अनुसंधान करते हुए उनको प्रतिक्षा नहीं कराना चाहिये। उसे जल्द समाप्त कर उनकी सेवा में लगना चाहिये और फिर अनुसंधान कर सकते है।
  • जब आचार्य किसी के भी गोद पर विश्राम कर रहे हो तो हमें तुरन्त नहीं उठना चाहिये यह कहकर कि मेरा पाव दु:ख रहा है। हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी का संयोग को स्मरण कर सकते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य) श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी (शिष्य) के गोद पर अपना माथा रखकर विश्राम कर रहे थे – श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी बिना हिले बहुत समय तक वैसे हीं बैठे रहे और जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी निद्रा से उठे तो उन्होंने श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी कि उनके आचार्य कि सेवा के कारण और उनके इच्छाशक्ति के कारण बहुत प्रशंसा कि। हम कर्ण का उनके आचार्य श्रीपरशुराम के साथ हुई घटना को भी स्मरण कर सकते है। जब कर्ण श्रीपरशुराम के निकट धनुष बाण कि शिक्षा ग्रहण कर रहा था तो एक दिन परशुराम कर्ण के गोद पर सर रखकर विश्राम करने लग गये। उस समय एक बिच्छु आकर कर्ण को काटने लगा। वह फिर भी नहीं हिला। यह घटना महाभारत में मिल जाती है।
  • जब भी श्रीवैष्णवों कि गोष्ठी चल रही हो तो मध्य में उठकर वहाँ से निकल कर जाना अपचार है और यह गोष्ठी के लिये भी अपमान माना जाता है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य प्रबन्ध या कालक्षेप कि गोष्ठी में कभी भी पहिले आकर और अन्त तक रहना चाहिये। लोगों का मध्य में आना और जाना दूसरों के लिए विघ्न है।
  • श्रीवैष्णवों को उन पर चिल्लाकर जगाना बाधा है। श्रीवैष्णवों को जगाना या उनको एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने के लिये बड़े विनम्रता से कहना चाहिये।
  • बिना कार्य आचार्य को जगाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें अपने आचार्य के उठने से पहिले उठना चाहिये और उनके जागने कि प्रतिक्षा करनी चाहिये। आचार्य को कोई जागने के लिए विवश नहीं सकता। हम श्रीपराशर भट्टर के जीवन में यह देख सकते है। यह आय् जनन्याचार्य कि तिरुप्पावै के ८वें पाशुर के ४००० पड़ी व्याख्या में दिखाया गया है कि सभी श्रीवैष्णवों को सुबह जल्दी उठना चाहिये, स्वयं को तैयार होना है, और जाकर श्रीपरशर भट्टर स्वामीजी के दरवाजे के पास देखे और धीरे से उन्हें जगाये। क्योंकि वें श्रीकुरेश स्वामीजी और आण्डाल अम्माजी के प्रिय पुत्र थे और श्रीरंगनाथ भगवान / श्रीरंगनाचियार के गोद लिये हुए संतान थे और बहुत बड़े ज्ञानी और सम्प्रदाय के सेनापति थे, उनके शिष्य उनकी बहुत प्रशंसा करते और उनकी सेवा करते थे।
  • आचार्य के उठाने से पहिले नहीं उठना बाधा है। हमें आचार्य के विश्राम के पश्चात विश्राम करना चाहिये और उनके जगने से पहिले जगना और यह सुनिश्चित करें कि उनको कोई तकलीफ तो नहीं है।
  • आचार्य के अन्य शिष्यों को “सब्रम्हचारी” कहते है। उनका बड़ा सम्मान करना चाहिये। उनके समक्ष जम्हाई नहीं लेना, उनके सामने पैर पसार कर नहीं बैठना आदि। इन्हें अपचार समझा जाता है और इससे बचना चाहिये।
  • इन सब्रम्हचारी का आदर करना चाहिये। उनके प्रणाम करने से पूर्व हमें “अड़िएन” कहना चाहिये और प्रणाम करना चाहिये। ऐसे न करना अपचार है।
  • सभी को आचार्य के प्रति, उनके पत्नी के प्रति और उनके पुत्रों के प्रति आदर रखना चाहिये। उठते हीं उनको प्रणाम कर उनकी सेवा करनी चाहिये। ऐसे न करना अपचार है।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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