विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ७

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देखे सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ६

 श्रीरामानुज स्वामीजी और  श्री वंगी पुरत्तु नम्बी

 

३४(शयन विरोधी – शयन में बाधाएं

शयन यानि निद्रा, विश्राम और आराम करना। श्रीवैष्णव परिभाषा में इसे इस तरह कहते है “कण् वळर्गै” स्नान करने के समान कहते है जैसे “नीराट्टम्”। कुछ बाधाएं इस विषय में यहाँ बतायी गयी है। हम उन्हें देखेंगे।

  • सांसारीक मनुष्य के घर में विश्राम करना विरोधी है। मुमुक्षु यानि जो मोक्ष कि अभिलाषा करता है। संसारी यानि जो मोक्ष कि अभिलाषा नहीं करता है। श्रीशठकोप स्वामीजी संसारी कि जीवन मृत्यु को तिरुविरुत्तम के पहिले पाशुर में समझाते है “पोय्न निन्र ञानमुम पाल्ला आलुक्कुडम्बुम” – अज्ञानता से बाहर वही पापों को दोहराना और उसके परिणाम स्वरूप सांसारिक देह लेकर फिर से जन्म लेना।
  • सांसारिक लोगों के साथ बैठना या सोना।
  • सांसारिक लोगों के बिछौना पर विश्राम करना।
  • उनके चरणों के नजदीक सोना।
  • सांसारी के बिछौने से भी नीचे सोना (उदाहरण: वो बिछौना पर विश्राम करें और हम जमीन पर)।
  • उन्हें विश्राम के लिये स्थान देना।
  • सांसारी विश्राम किये हुए स्थान को पवित्र नहीं करना।
  • श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में विश्राम नहीं करना। अनुवादक टिप्पणी: जब भी अवसर प्राप्त होता है हमें श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में विश्राम करना चाहिये यह विचार करके कि यह उत्तम सौभाग्य है।
  • यह विचार करके कि वें हमारे समान है उनके साथ विश्राम करना। अनुवादक टिप्पणी: हमें अन्य श्रीवैष्णवों को हमसे उच्च समझना चाहिये।
  • बिना उनको सम्मान दिये उनके पवित्र बिछौने पर हम विश्राम करना।
  • उनके चरण कमलों के समीप विश्राम करने से हिचकिचाना।
  • उनसे भी उच्च स्थान पर विश्राम करना (उदाहरण: वों जमीन पर विश्राम करें और हम बिस्तर पर)।
  • बिना उन्हें उचित स्थान दिये हमारा विश्राम करना।
  • उनके सोये हुए स्थान को उनके उठने के पश्चात उसे पवित्र करना। अनुवादक टिप्पणी: यह एक सामान्य दस्तुर है जहाँ हम पिछले रात को विश्राम किये उस स्थान को अगले दिन जल से धोकर पवित्र करें। परन्तु जब हम अन्य श्रीवैष्णवों को पवित्र समझते है हमें उनके विश्राम स्थान पर ऐसे पवित्र करने का कार्य नहीं करना चाहिये।
  • विहित विषयं यानि आनन्द जो शास्त्र में माना / नियत किया गया है – यहीं भी एक बाधा है। यहाँ एक श्रीवैष्णव कि पत्नी ऐसा दर्शाया गया है (श्रीवैष्णवी के लिये उसका पति)। कोई भी यह विचार कर अपनी पत्नी के साथ नहीं सोता कि यह समागम शास्त्र में आज्ञा किया गया है और इसका आनन्द लेना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के १०१ वें सूत्र में समझाते है “मट्रैयिरुवर्क्कुम् निषिद्ध विशय निव्रुत्तिये अमैयुम्; प्रपन्ननुक्कु विहित विशय निव्रुत्ति तन्नेट्रम्” – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस उच्च तथ्य को अपने सुन्दर तरिके से समझाते है। वह जो सांसारिक लाभ से जुड़े है और वह जो उपायन्तर (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग) के पीछे है – दूसरों कि स्त्रियों से अलग हो गये है यह पर्याप्त है (सामान्यता दूसरों कि स्त्रियों की लालसा करना शास्त्र में निन्दक है)। दूसरे अपने स्वयं कि स्त्री के साथ समागम का आनन्द लेते है अपने धर्म को पूर्ण करने हेतु, परन्तु प्रपन्नों के लिये ऐसे समागम उनके स्वरुप विरोधी है, इसलिये इससे भी बचना चाहिये। आगे और भी अन्य ग्रन्थों में समझाया गया है जैसे एरुम्बी अप्पा द्वारा रचित विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णयं कि हमारे पूर्वाचार्य जो उच्च प्रपन्न थे फिर भी इस समागम में कुछ दिनों के लिये रहते थे ताकि एक या दो उच्च श्रीवैष्णव को जन्म दे सके बिना स्वयं के आनन्द और पश्चात पूर्णत: इस कार्य को त्याग कर देते और अपना पूर्ण समय केवल भगवद विषय में लगा देते। यह एक पेचिदा विषय है और सभी को इसके तथ्य अपने आचार्य से सुनना चाहिये।
  • यह सोच कर कि हमारी पत्नी भी एक श्रीवैष्णव है हमें उसके साथ कोई मन में सुख कि भावना लेकर नहीं सोना चाहिये। ऐसे विचार नहीं होना विरोधी है।
  • ऐसे विचारों के साथ नहीं सोना चाहिये जिससे विषय आनन्द मन में उत्पन्न हो।
  • भगवान का विचार किये बिना विश्राम करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सोने जाने के पहिले सभी को इन पाशुरों को गाना चाहिये जैसे श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कि तिरुमोली “उरगल् उरगल्”, “पनिक्कडलिल् पळ्ळि कोळै”, “अरवत्तमळियिनोडुम्”, आदि। पञ्च काल परायण के लिये विश्राम करना जीवात्मा और परमात्मा के लिये समागम है (वैधिक दिन को ५ भागों में बाटा जाता है और अंतिम भाग को योग कहते है) – भगवान के नाम, रूप, गुण, आदि को विश्राम से पहिले याद करने को बहुत महत्त्व है।
  • अपने आचार्य और पूर्वाचार्य को स्मरण किये बिना विश्राम करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें आचार्य कि तनियन, वाळि तिरुनामम् (ध्यान श्लोक्), आदि को विश्राम से पहिले कहना चाहिये ताकि हमको भगवान से जोड़ने में आचार्य का हमारे उपर जो उपकार है उसे हमें यह स्मरण करा सके।
  • हमारे शारिरीक कार्य के विषय में विचार करते हुए विश्राम करना बाधा है।
  • आत्मा और उसके स्वभाव के बारें में विचार करते हुए आराम नहीं करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी को आत्मा को भगवान और भागवतों का दास मानना चाहिये और अत: ऐसे रवैये का विचार करना चाहिये।
  • सोते समय हमें अपने पैर भगवद, भागवत और आचार्य कि ओर नहीं पसारना चाहिये।
  • सोते समय मन्दिर, अपने तिरुमाली के तिरुवाराधन कमरे कि और आचार्य के मठ कि ओर नहीं पसारना चाहिये।
  • जब हम आचार्य का कैंकर्य करते है तब हमें विश्राम नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य के विश्राम से पहिले हमें नहीं सोना चाहिये।
  • आचार्य के उठने के पश्चात भी हमें नहीं सोना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: सोने को एक सामान्य कार्य समझ सकते है। परन्तु सभी कार्य में हमें ध्यान पूर्वक सभी कार्य का विश्लेषण करना चाहिये। जैसे पहिले बताया गया है वैधिका यानि एक दिन को पाँच भाग में बाटा जाता है – अभिगमनं (उठना और सुबह के कार्य), उपाधानं (तिरुवाराधन के लिये सामग्री इकट्ठा करना), इज्जा (अपने तिरुमाली के भगवान कि तिरुवाराधन), स्वाध्यायम (उभय वेदान्त को सिखना और सिखाना) और योगम (विश्राम करना – जीवात्मा और परमात्मा का समागम)। योगम भाग को हम सामान्यत: विश्राम करना मानते है और जब विश्राम को अच्छी तरह नियंत्रण में रखेंगे तो तमोगुण कम होगा और सत्वगुण बढ़ेगा। अधिक सोना यानि तमोगुण का सीधा बढाना और हमें अपने दिनचर्या को सुधार कर सुबह जल्दी उठकर और शरीर और मन को भगवद / भागवत कैंकर्य में लगाकर इसको सुधारणा है ।
३५) उत्थान विरोधी उठने में बाधाएं

उत्थानम यानि बिछौने से उठना। हम इस विषय में बाधाएं देखेंगे।

  • जब आचार्य या अन्य श्रीवैष्णव हमें उठाते है तो बहुत धीरे से उठना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवैष्णव हमें उठाते है तो हमें दु:ख प्रगट करना चाहिये की उन्हें हमें उठाना पड़ा। नाकि उनके सन्मुख हम पहिले हीं उठकर बैठ गये। अत: उनके उठाते हीं हमें एक हीं क्षण में बड़े उत्साह के साथ उठना चाहिये।
  • जब सांसारिक लोग उठाते है तब तुरन्त उठना ।
  • भगवान और आचार्य के कीर्ति को याद किये बिना उठना बाधा है। ज्ञानी जन “हरी: हरी:” का जप करते उठते है। “हरिर् हरति पापानि” श्लोक और द्वय महामन्त्र का जप करते हुये उठना हर एक के लिये अच्छा है। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में ब्रम्ह मुहूर्त में उठने का नियम है (४ बजे) और उठते ही भगवान श्रीमन्नारायण कि महिमा को स्मरण करें। सामान्यत: बड़ो में यह देख जाता है कि उठते हीं गुरु परम्परा का मन्त्र “अस्मद् गुरुभ्यो नम: से लेकर श्रीधराय नम: … ”, रहस्य त्रय (तिरुमंत्र, द्वय मन्त्र, चरम श्लोक), आचार्य तनियन, “हरिर् हरति पापानि” श्लोक्, “कौसल्या सुप्रजा” श्लोक, नदातूर अम्माल का परमार्थ द्वय श्लोक, गजेन्द्र मोक्ष और परत्ववादि पञ्च श्लोक गाते है।
  • जब आचार्य या श्रीवैष्णव हमारी प्रतिक्षा कर रहे हो तो अपने अनुसंधान जैसे दिव्य प्रबन्ध, स्तोत्र, इतिहास, पुराण या जप पर हीं ध्यान देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवैष्णव हमारे तिरुमाली में आते है तो हम हमारे नित्य पाठ का अनुसंधान करते हुए उनको प्रतिक्षा नहीं कराना चाहिये। उसे जल्द समाप्त कर उनकी सेवा में लगना चाहिये और फिर अनुसंधान कर सकते है।
  • जब आचार्य किसी के भी गोद पर विश्राम कर रहे हो तो हमें तुरन्त नहीं उठना चाहिये यह कहकर कि मेरा पाव दु:ख रहा है। हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी का संयोग को स्मरण कर सकते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य) श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी (शिष्य) के गोद पर अपना माथा रखकर विश्राम कर रहे थे – श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी बिना हिले बहुत समय तक वैसे हीं बैठे रहे और जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी निद्रा से उठे तो उन्होंने श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी कि उनके आचार्य कि सेवा के कारण और उनके इच्छाशक्ति के कारण बहुत प्रशंसा कि। हम कर्ण का उनके आचार्य श्रीपरशुराम के साथ हुई घटना को भी स्मरण कर सकते है। जब कर्ण श्रीपरशुराम के निकट धनुष बाण कि शिक्षा ग्रहण कर रहा था तो एक दिन परशुराम कर्ण के गोद पर सर रखकर विश्राम करने लग गये। उस समय एक बिच्छु आकर कर्ण को काटने लगा। वह फिर भी नहीं हिला। यह घटना महाभारत में मिल जाती है।
  • जब भी श्रीवैष्णवों कि गोष्ठी चल रही हो तो मध्य में उठकर वहाँ से निकल कर जाना अपचार है और यह गोष्ठी के लिये भी अपमान माना जाता है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य प्रबन्ध या कालक्षेप कि गोष्ठी में कभी भी पहिले आकर और अन्त तक रहना चाहिये। लोगों का मध्य में आना और जाना दूसरों के लिए विघ्न है।
  • श्रीवैष्णवों को उन पर चिल्लाकर जगाना बाधा है। श्रीवैष्णवों को जगाना या उनको एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने के लिये बड़े विनम्रता से कहना चाहिये।
  • बिना कार्य आचार्य को जगाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें अपने आचार्य के उठने से पहिले उठना चाहिये और उनके जागने कि प्रतिक्षा करनी चाहिये। आचार्य को कोई जागने के लिए विवश नहीं सकता। हम श्रीपराशर भट्टर के जीवन में यह देख सकते है। यह आय् जनन्याचार्य कि तिरुप्पावै के ८वें पाशुर के ४००० पड़ी व्याख्या में दिखाया गया है कि सभी श्रीवैष्णवों को सुबह जल्दी उठना चाहिये, स्वयं को तैयार होना है, और जाकर श्रीपरशर भट्टर स्वामीजी के दरवाजे के पास देखे और धीरे से उन्हें जगाये। क्योंकि वें श्रीकुरेश स्वामीजी और आण्डाल अम्माजी के प्रिय पुत्र थे और श्रीरंगनाथ भगवान / श्रीरंगनाचियार के गोद लिये हुए संतान थे और बहुत बड़े ज्ञानी और सम्प्रदाय के सेनापति थे, उनके शिष्य उनकी बहुत प्रशंसा करते और उनकी सेवा करते थे।
  • आचार्य के उठाने से पहिले नहीं उठना बाधा है। हमें आचार्य के विश्राम के पश्चात विश्राम करना चाहिये और उनके जगने से पहिले जगना और यह सुनिश्चित करें कि उनको कोई तकलीफ तो नहीं है।
  • आचार्य के अन्य शिष्यों को “सब्रम्हचारी” कहते है। उनका बड़ा सम्मान करना चाहिये। उनके समक्ष जम्हाई नहीं लेना, उनके सामने पैर पसार कर नहीं बैठना आदि। इन्हें अपचार समझा जाता है और इससे बचना चाहिये।
  • इन सब्रम्हचारी का आदर करना चाहिये। उनके प्रणाम करने से पूर्व हमें “अड़िएन” कहना चाहिये और प्रणाम करना चाहिये। ऐसे न करना अपचार है।
  • सभी को आचार्य के प्रति, उनके पत्नी के प्रति और उनके पुत्रों के प्रति आदर रखना चाहिये। उठते हीं उनको प्रणाम कर उनकी सेवा करनी चाहिये। ऐसे न करना अपचार है।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2013/12/virodhi-pariharangal-7.html

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