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श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका – आचार्य- शिष्य संबंध

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका

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अपने पूर्व अनुच्छेद में हमने देखा कि किस प्रकार पञ्च संसार द्वारा जीव अपनी श्रीवैष्णव यात्रा प्रारंभ करता है। हमने आचार्य और शिष्य संबंध के माध्यम से एक अद्वितीय संबंध के आरंभ को भी देखा। क्यूंकि यह हमारे संप्रदाय का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है, आईये अपने पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों के द्वारा इस अद्भुत संबंध के विषय में थोडा और समझते है।

आचार्य अर्थात “जिन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया है, और जो स्वयं अपने जीवन में उन शास्त्रों का अनुसरण करते है और दूसरों को अपने उत्कृष्ठ उदाहरण से प्रेरित करते है।” शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि “सन्यासी भी यदि “श्रीविष्णु परत्वं” को स्वीकार नहीं करते है, तब वे चाण्डाल के समान ही है”। इसलिए यह सर्वविदित है कि आचार्य भी श्रीवैष्णव ही होने चाहिए – अर्थात वह जो श्रीमन्नारायण भगवान को ही सर्वेश्वर/ सर्वोत्तम स्वीकार करते है और प्रत्येक क्षण अपने प्रत्येक कार्य के द्वारा उनकी प्रसन्नता की चाहना करते है। हमारे पूर्वाचार्यों ने इस बात पर जोर दिया है कि पञ्च संस्कार में तिरुमंत्र उपदेश (द्वयं और चरम श्लोक भी) प्रदान करने वाले ही हमारे प्रत्यक्ष आचार्य है।

शिष्य, वह जो शिक्षा (सुधार) प्राप्त करता है। अंग्रेजी में इसे प्रायः अनुयायी के रूप में भी प्रयोग किया जाता है – अर्थात वह जिसे अनुशासित करना हो। यहाँ शिष्य स्वयं को आचार्य के सानिध्य में उचित सांचे में ढालते है।

5.1 udayavar-azhwan

उदैयवर (श्रीरामानुज स्वामीजी)– आलवान (श्री कुरेश स्वामीजी)- आदर्श आचार्य और् शिष्य – कूरम

हमारे पूर्वाचार्यों ने आचार्य और शिष्य के गुणों के विषय में अत्यंत विस्तार पूर्वक चर्चा की है। प्रारंभ करने के लिए, शास्त्रों के आधार पर उन्होंने यह स्थापित किया कि आचार्य- शिष्य संबंध पिता- पुत्र संबंध के समान ही है। जिस प्रकार एक पुत्र सदा अपने पिता की सेवा में रहता है, उसी प्रकार शिष्य को भी संपूर्णतः आचार्य के अधीन उनकी सेवा में रहना चाहिए।

भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है “तद विध्धि प्राणीपातेन परि प्रश्नेन् सेवया, उपदेक्षंती ते ज्ञानं ज्ञानिनस तत्व दर्शिन:“। यह आचार्य और शिष्य के गुणों को सुंदरता से विश्लेषित करते है। प्रथम पंक्ति में वे कहते है “हमें विनम्रता से आचार्य के समीप जाना चाहिए, विनम्रता से उनके प्रति कैंकर्य करना चाहिए और अत्यंत ही नम्रतापूर्वक उनसे प्रश्न पूछना चाहिए”। द्वितीय पंक्ति में वे कहते है “आचार्य तुम्हें वह ज्ञान प्रदान करेंगे, क्यूंकि उन्होंने सच्चे तत्व (अर्थात भगवान) को प्राप्त किया है”। आचार्य से अपेक्षित कुछ गुण इस प्रकार है:

  • आचार्यों की उपमा प्रायः श्री महालक्ष्मीजी से की जाती है – उनका प्रमुख उद्देश्य भगवान से पुरुष्कार करना है (अनुशंसा करना जैसा की अम्माजी करती है)।
  • श्रीअम्माजी के ही समान, उन्हें भी यह स्वीकार करना चाहिए कि वे एक मात्र भगवान के ही दास है, वे भगवान को ही उपाय स्वीकार करते है और उनके समस्त कार्य भगवान की प्रसन्नता हेतु ही है।
  • उन्हें कृपा से परिपूर्ण होकर शिष्य को स्वीकार करना चाहिए, उसके आत्म ज्ञान (स्वयं के विषय में ज्ञान) का विकास करके और वैराग्य (विरक्ति) उत्पन्न कराके, शिष्य को भगवत/ भागवत कैंकर्य में लगने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दिव्य श्री सूक्ति के अनुसार, आचार्य को सदा शिष्य के आत्म-रक्षण (आत्मा के उद्धार) के बाबत फिकर करनी चाहिए।
  • पिल्लै लोकाचार्य कहते है “एक आचार्य को स्वयं, शिष्य और परिणाम के विषय में उचित ज्ञान होना आवश्यक है”।
    • उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि वे आचार्य नहीं, वरन उनके आचार्य ही शिष्य के आचार्य है।
      • उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि शिष्य उनके शिष्य नहीं, वरन उनके आचार्य के शिष्य है।
      • उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि इस संबंध का प्रतिफल एक परिपक्व शिष्य का निर्माण करने से है, जो सदा भगवान का मंगलाशासन करे – अन्य कुछ नहीं।
  • जैसा की वार्ता माला ग्रंथ और शिष्टाचार में बताया गया है, आचार्य को अपने शिष्य के प्रति सम्मान के साथ व्यवहार करना चाहिए – क्यूंकि शिष्य ने शास्त्रों के आधार पर अपने सम्पूर्ण संरक्षण हेतु आचार्य (उनके गुण/ अनुभव का विश्लेषण किये बिना) शरण ली है।
  • हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा यह समझाया गया है कि भगवान को भी आचार्य रूप धारण करना प्रीतिकर है। इसी हेतु उन्होंने हमारी ओराण वालि गुरु परंपरा में प्रथमाचार्य होना स्वीकार किया। भगवान स्वयं अपने हेतु भी एक आचार्य की चाहना करते है – और इसीलिए उन्होंने स्वयं के लिए श्रेष्ठ/ अत्योचित आचार्य अर्थात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को स्वीकार किया।

शिष्य से अपेक्षित कुछ गुण इस प्रकार है:

  • पिल्लै लोकाचार्य कहते है-
      • शिष्य को भगवान और आचार्य के अतिरिक्त सभी अन्य प्रयोजनों से स्वयं को मुक्त करना चाहिए (अर्थात ऐश्वर्य और आत्मानुभव)।
      • शिष्य को सदैव सभी परिस्थितियों में अपने आचार्य की सेवा कैंकर्य के लिए तत्पर रहना चाहिए।
      • इस लौकिक संसार को देखकर शिष्य को मानसिक यंत्रणा का अनुभव करना चाहिए।
      • शिष्य को भगवत विषय और आचार्य कैंकर्य की अभिलाषा सदैव करनी चाहिए।
      • भगवत/ भागवतों की प्रशंसा/ कीर्ति को जानकार शिष्य को ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
    • एक शिष्य को सदा यह ध्यान करना चाहिए कि उसकी सभी संपत्ति आचार्य की है। उसे उस धन संपत्ति में से उतना ही उपयोग करना चाहिए जितना की संसार में देह धारण (जीविका) के लिए आवश्यक है।
    • एक शिष्य को सदा यह सोचना चाहिए कि आचार्य ही मेरे लिए सर्वोपरि है, जैसा की श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी ने आलवन्दार स्तोत्र में “माता पिता युवतय: …” श्लोक में दर्शाया है।
    • शिष्य को अपने आचार्य के जीवन-यापन का ध्यान रखना चाहिए।
    • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्न माला में समझाते है कि “इस संसार में रहते हुए शिष्य को कदापि अपने आचार्य से दूर नहीं रहना चाहिये”।
    • आचार्य की उपस्थिति में शिष्य को सदा उनका यशगान करना चाहिए और उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान के लिए सदा उनके प्रति उपकार स्मृति रखना (ऋणी रहना) चाहिए।

यह भी समझाया गया है कि एक शिष्य के लिए आचार्य का आत्म-रक्षण करना अनुचित है (अर्थात, शिष्य को कभी भी आचार्य को स्वरुप शिक्षा नहीं देनी चाहिए) और आचार्य के लिए शिष्य का देह रक्षण करना अनुचित है (अर्थात, शिष्य को अपेक्षा नहीं करना चाहिए कि आचार्य उसकी आजीविका ध्यान रखे)।

जैसा की पिल्लै लोकाचार्य द्वारा समझाया गया है, शिष्य होना अत्यंत कठिन है (और चाहे हम कितना भी ज्ञान प्राप्त करले, हम उचित शिष्य शिष्टाचार कभी नहीं समझ पाएंगे)। इसी हेतु स्वयं भगवान ने “नर” ऋषि का स्वरुप धारण कर, “नारायण” ऋषि (जो भगवान के अवतार है) के शिष्य होकर उनसे तिरुमंत्र का उपदेश प्राप्त किया और दर्शाया की योग्य शिष्य को कैसा होना चाहिए।

इस भूमिका के साथ, अब हम आगे आचार्यों के विभिन्न वर्गीकरण के विषय में भी जानेंगे।

अनुवृत्ति प्रसन्नाचार्य और कृपा मात्र प्रसन्नाचार्य

अनुवृत्ति प्रसन्नाचार्य

श्रीरामानुज स्वामीजी से पूर्व समय में, आचार्य अपने भावी शिष्यों को स्वीकार करने से पूर्व उनकी श्रद्धा/ समर्पण के स्तर को जांचते थे। उस समय यह प्रचलित था कि भावी शिष्य को स्वीकृति के लिए आचार्य के निवास पर जाकर, वहां रहकर एक वर्ष उनकी सेवा करनी होती थी।

कृपा मात्र प्रसन्नाचार्य

परंतु जब श्रीरामानुज स्वामीजी ने कलियुग का स्वरुप देखा, उन्होंने सोचा यदि आचार्य इस प्रकार होंगे, तब कुछ ही जीवात्माएं लौकिक आसक्तियों को त्यागने के लिए प्रेरित होंगी और बहुत सी जीवात्माएं आचार्य के आदेश को पूरा करने में असमर्थ होंगी। इसीलिए, अपनी अनंत कृपा से, श्रीरामानुज स्वामीजी ने नियमों को सरल किया और इस अमूल्य ज्ञान को उन सभी को प्रदान किया जो सच्ची श्रद्धा से भगवत विषय को सिखने की चाहना करते थे। इस प्रकार शिष्य की इस योग्यता को सुपात्र/ गुणी अधिकारियों से मनोरथ/ चाहना करनेवाले अधिकारियों के लिए परिवर्तित कर दिया गया। उन्होंने अपने शिष्यों को भी इसी नियमावली का अनुसरण करने का निर्देश दिया और अपनी कृपा से कई सहस्त्र जीवात्माओं को श्रीवैष्णव संप्रदाय में संस्कारित किया। श्रीरामानुज स्वामीजी से आरंभ हमारी परंपरा के सभी आचार्य कृपा मात्र प्रसन्नाचार्य कहे जाते है।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, ने अपनी उपदेश रत्न माला में सुंदरता से एक पासुर के द्वारा इस पक्ष को समझाया है “ओराण वलियाई उपदेशीत्तार् मुन्नोर्, एरार् एतिरासर् इन्नरुळाल् पारुलगिल आसै उडैयोर्क्केल्लाम आरियर्गाल कूरूम् एन्रू पेसी वरम्भारुत्तार् पिन”

उत्तारक आचार्य और उपकारक आचार्य

नायनाराच्चान पिल्लै ने अपने चरमोपाय निर्णय में, दो प्रकार के आचार्यों के विषय में बताया है। यह ग्रंथ श्रीरामानुज स्वामीजी के यश को अति स्पष्टता से स्थापित करता है।

उत्तारक आचार्य

उत्तारक आचार्य, हमें संसार से मुक्त कराकर सुगमता से परमपद में स्थान देने में समर्थ है। यह समझाया गया है कि श्रीमन्नारायण भगवान, श्रीशठकोप स्वामीजी और श्रीरामानुज स्वामीजी ही 3 उत्तारक आचार्य है (यह भी विदित है कि एरुम्बी अप्पा, श्रीवरवरमुनि शठकम में स्थापित करते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी जो यति पुनरवतारम है, उत्तारक आचार्य है)।

  • श्रीमन्नारायण भगवान प्रथमाचार्य है और सर्वज्ञ, सर्वशक्त आदि होने से, वे सुगमता से किसी को भी मोक्ष प्रदान कर सकते है।

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पेरिय पेरुमाल – श्रीरंगम

  • श्रीशठकोप स्वामीजी, संसारियों को ज्ञान प्रदान करने और उनके सुधार के लिए भगवान द्वारा चयनित थे, जो सभी को मोक्ष प्रदान करने में सक्षम है। यह तिरुवाय्मौली में कहे गए स्वयं उनके वचनों से समझा जा सकता है-“पोन्नुलगू आलिरो, भुवनी मुलुतु आलिरो“। भगवान को भेजे हुए अपने दूत रूप पक्षियों से वे कहते है कि भगवान के सामने उनकी सिफारिश करने पर वे उन्हें नित्य और लीला विभूति दोनों ही संभावना (भत्ते) के रूप में दे देंगे।

5.3Nammazhwar

श्री शठकोप स्वामीजी – आलवार तिरुनगरी

  • श्रीरामानुज स्वामीजी को श्री रंगनाथ भगवान और तिरुवेंकटमुदैयान (श्रीनिवास भगवान-तिरुमला) द्वारा उदैयवर कहा गया है – उभय विभूति के नायक। वे न केवल भगवत अनुभव में मग्न थे, अपितु लीला विभूति में लम्बे समय रहकर (120 वर्ष) भगवान के उद्देश्य पूर्ति के कैंकर्य को भी पूर्ण किया। उन्होंने मंदिर की पूजा-अर्चना विधि को उचित रूप से स्थापित किया, सहस्त्र शिष्यों को संप्रदाय में संस्कारित किया, 74 सिंहासनाधिपतियों को दिव्य सन्देश प्रसारित करने हेतु स्थापित किया।

5.4 ramanujar-sriperumbudhur

श्री रामानुज स्वामीजी – श्री भूतपुरी

भगवान, शास्त्रों के आधार पर जीवात्माओं को उनके कर्म और भावों के अनुसार मोक्ष प्रदान करते है अथवा उन्हें संसार चक्र में बांधे रखते है। इसीलिए, नयनाराच्चान पिल्लै बताते है कि उत्तारकत्वं, श्रीरामानुज स्वामीजी में ही पूर्ण हुआ।

श्रीशठकोप स्वामीजी ने इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद, क्यूंकि वे आलवार थे –थोडा परोपदेश किया परंतु, भगवत अनुभव में मग्न होकर, अपने आर्त स्वरुप से बहुत ही अल्प आयु में संसार का त्याग किया।

श्रीरामानुज स्वामीजी ने अपनी परम कृपा से मोक्ष चाहने वालों को मोक्ष प्रदान किया और उन्हें भगवान की दिव्य सेवा में पहुंचाया।

इस प्रकार, नयनाराच्चान पिल्लै बताते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी ने ही उत्तारकत्वं की पूर्ति की।

उपकारक आचार्य

वे ही समर्थ है जो हमें उत्तारक आचार्य तक पहुंचा सकते है। हमारे संप्रदाय में, श्रीरामानुज स्वामीजी की परंपरा में आने वाले सभी आचार्य, हमारे आचार्य पर्यंत उपकारक आचार्यों की श्रेणी में वर्गीकृत होते है। जब भी हम पञ्च संस्कार प्राप्त करते है, हमारे आचार्य अपनी गुरु परंपरा के माध्यम से श्रीरामानुज स्वामीजी से निवेदन करते है कि वे इस जीवात्मा को भगवान के चरणों में अर्पण करें क्यूंकि यह जीव इस संसार को त्यागकर परमपद में भगवान की सेवा करने की चाहना करता है।

उत्तारक आचार्य और उपकारक आचार्य दोनों ही समान रूप से आदरणीय है – यद्यपि श्रीरामानुज स्वामीजी का हमारे संप्रदाय में विशेष स्थान है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपनी उपदेश रत्न माला में श्रीशैलेश स्वामीजी से आरंभ कर श्रीरामानुज स्वामीजी तक उचित दृष्टिकोण को दर्शाने के उद्देश्य से हमें बताते है।

समाश्रयण आचार्य और ज्ञान आचार्य

  • समाश्रयण आचार्य- वह है जो हमें पञ्च संस्कार प्रदान करते है।
  • ज्ञान आचार्य- वह है जिनसे हम ग्रंथ कालक्षेप आदि श्रवण करते है, जिस द्वारा हमारे आत्म ज्ञान का विकास होता है।

यद्यपि हम सदैव अपने समाश्रयण आचार्य के ऋणी है और हमें सदैव उनके चरणों में आश्रित रहना चाहिए, तथापि हमें ज्ञान आचार्य का आदर और सम्मान भी समान रूप से करना चाहिए। कुछ के लिए, समाश्रयण और ज्ञान आचार्य दोनों एक भी हो सकते है। श्रीवचन भूषण के अनुसार, प्रत्येक श्रीवैष्णव का भी अपने आचार्य के समान आदार करना चाहिए।

संक्षिप्त में, एक शिष्य को सदा अपने आचार्य पर पूर्ण रूप से आश्रित रहना चाहिए। उस पर अपने आचार्य जीविका की सम्पूर्ण रूप से देखरेख करने का दायित्व भी है। शिष्य को सदा अपने आचार्य सानिध्य में रहना चाहिए और उनकी सभी आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए।

हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन में आचार्य- शिष्य शिष्टाचार से सम्बंधित अद्भुत दृष्टांत है। उनमें से कुछ हम यहाँ देखते है:

  • श्रीराममिश्र स्वामीजी अपने आचार्य श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी के निवास पर घरेलु परिचारक सेवाएँ किया करते थे।

  • श्रीराममिश्र स्वामीजी ने श्रीयामुनाचार्य/ आलवन्दार को श्रीवैष्णव संप्रदाय में लाने के लिए बहुत प्रयत्न किये।

  • श्रीरामानुज स्वामीजी, श्री कुरेश स्वामीजी के शिष्य होने के उपरान्त भी उनसे अत्यंत आदर से व्यवहार किया करते थे।

  • एक बार जब श्रीरामानुज स्वामीजी, श्री कुरेश स्वामीजी से नाराज हुए, श्री कुरेश स्वामीजी ने कहा, “दास तो आचार्य की संपत्ति है- वे जैसा उचित समझे वैसा करें”।

  • श्री गोविंदाचार्य स्वामीजी, अपने आचार्य शयन पलंग को जांचने के लिए स्वयं पहले उस पर सोकर देखते थे। जब पूछा गया कि यह तो पाप है, तब उन्होंने कहा कि उनके आचार्य के सुख के लिए, पाप करने में भी उन्हें आपत्ति नहीं है।

  • श्रीरामानुज स्वामीजी, अनंताल्वान से कहते है कि पराशर भट्टर मेरे समान ही है और उनका सम्मान भी उसी प्रकार से किया जाना चाहिए।

  • श्री भट्टर और श्री वेदांती स्वामीजी के मध्य का अत्यंत सुंदर वार्तालाप है। श्री वेदांती स्वामीजी सभी कुछ त्यागकर सन्यासी हो गए। एक बार उन्होंने कहा, “यदि मेरा आश्रम धर्म मेरे आचार्य कैंकर्य में बाधा बनेगा, तो मैं अपने त्रिदंड का त्याग करूँगा।”

  • श्री वेदांती स्वामीजी ने श्री कलिवैरिदास स्वामीजी के विचारों को प्रोत्साहित किया यद्यपि कुछ पासुरों के लिए वह व्याख्यान उनके द्वारा दिए गए व्याख्यान से भिन्न था।

  • पिन्बलगीय पेरुमाल जीयर् कहते है कि वे इस लीला विभूति में सिर्फ अपने आचार्य श्री कलिवैरीदास स्वामीजी के कावेरी स्नान के पश्चाद उनकी पीठ के दर्शन के लिए रहना चाहते है।

  • कुरकुलोत्तम दासर् ने श्री शैलेश स्वामीजी को श्रीवैष्णव संप्रदाय में लाने के लिए बहुत प्रयत्न किये।

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपने आचार्य के निर्देशों को अपने जीवन का एक मात्र उद्देश्य बनाया। उन्होंने एक बार श्रीभाष्य सिखा और उस पर व्याख्यान किये परंतु उन्होंने अपने जीवन का शेष समय अरुलिच्चेयल और रहस्य ग्रंथों पर केन्द्रित किया।

  • श्री रंगनाथ भगवान ने श्रीदेवी और भूदेवी के साथ, एक वर्ष तक अपनी सन्निधि के सामने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से ईदू कालक्षेप को श्रवण किया और अपनी आचार्य संभावना के रूप में अपना शेष पर्यंकम उन्हें प्रदान किया और आचार्य को तनियन भेंट की जिसका आज भी अरुलिच्चेयल गोष्ठी के आरंभ और समाप्त में उनके निर्देसानुसार सभी जगह गान किया जाता है।

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने स्वयं अपना आसन, तिरुवालि (चक्र) और तिरुचंगु (शंख) पोन्नादिक्काल जीयर को प्रदान किया और उन्हें अप्पाचियारण्ण को पञ्च संस्कार प्रदान करने के निर्देश दिए।

यह समझाने के लिए कि आचार्य और शिष्य को एक दुसरे से किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, ऐसे और भी बहुत से द्रष्टांत है, परंतु यहाँ उनमें से कुछ ही बताये गए है।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/simple-guide-to-srivaishnavam-acharya-sishya.html

>>श्रृंखला का अगला लेख – https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/04/08/simple-guide-to-srivaishnavam-guru-paramparai/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १०

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देख सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ९

श्रीरामानुज स्वामीजी शास्त्र का तत्व लाये – दिव्य देशों में विराजमान भगवान का कैंकर्य

नित्य कर्मानुष्ठान

४१) अनुष्ठान विरोधी – नित्य दैनिक क्रियाओं में बाधाएं

अनुवादक टिप्पणी: बाधाएं जानने से पहिले इस विषय पर विस्तार पूर्वक विश्लेषण करेंगे। इस विषय मे क्या करे और क्या न करे इसपर बहुत भ्रांतियां है।

  • अपने अनुष्ठान में बहुत से पहलु है। हम सम्प्रदाय के तत्त्वों के प्रति कैसा आचरण करें यहाँ यही मूल केंद्र है।
  • यानि कर्म और कैंकर्य के मध्य में मतभेद समझना। जबकी कर्म सामान्य धर्म है जिसे पालन करना जरूरी है और कैंकर्य विशेष धर्म है जो सामान्य धर्म से भी अधिक मुख्य है।
  • कर्म तीन प्रकार के है
    • नित्य कर्म – नित्य दैनिक क्रियाओं जैसे संध्या वंदन आदि
    • नैमित्तीक कर्म – सामयिक कार्य जैसे तर्पण आदि
    • काम्य कर्म – कार्य जो सांसारिक लाभ के लिये किया जाता है।
  • कैंकर्य तीन प्रकार के है
    • भगवद कैंकर्य – भगवान के प्रति सेवा (नित्य और नैमीतिक कर्म भगवान के कैंकर्य का एक भाग है जो भगवान स्वयं हमें यह करने की आज्ञा करते है)।
    • भागवत कैंकर्य – भगवतों के प्रति कैंकर्य
    • आचार्य कैंकर्य – अपने स्वयं के आचार्य के प्रति कैंकर्य
  • यह तत्व हमारे समझने के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। वर्णाश्रम धर्म का त्याग कोई भी कभी भी नहीं कर सकता है। मुमुक्षुपड्डी के २७० और २७१ सूत्र में यह पक्ष बहुत अच्छी तरह समझाया गया है – अवतारिका २७० में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है “कर्म, ज्ञान, भक्ति योग का कोई स्वरूप त्याग नहीं है” (जिसका अर्थ वह केवल उपाय बुद्धि त्याग है – यानि कर्म करना चाहिये परन्तु वह भगवान को पाने का उपाय नहीं होना चाहिये परंतु कैकर्य स्वरूप होना चाहिए) – हमें भगवान को प्रसन्न करके कुछ पाने हेतु कोई उपाय नहीं करना चाहिए। सभी नित्य (प्रति दिन संध्या वंदन आदि) और नैमित्तीक (तर्पण आदि) कर्म कैंकर्य समझकर करना चाहिये। यह अगले सूत्र में दर्शाया गया है “कर्मं कैंकर्यत्तिले पुगुम …” (कर्म कैंकर्य में आता है) – श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अतिरिक्त अन्य कौन इसे भली प्रकार से समझा सकता है?
  • परन्तु कब यह सामान्य कैंकर्य अप्रधान बन जाता हैं? अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार के आचार्य हृदय के ३१वें चूर्णिका के व्याख्यान में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है – “अत्ताणि चेवगत्तिल पोधुवानाथू नलुवूम।” श्रीवरवरमुनि स्वामीजी व्याख्या में यह समझाते है कि हम भगवद/भागवत कैंकर्य में लगे रहे, सामान्य कैंकर्य तो बाद में या छोड़ा भी जा सकता है।
  • आजकल यह देखा जा सकता है कि कई श्रीवैष्णव बुनियादी अनुष्ठान भी नहीं करते है यह कहते है कि “यह श्रीवैष्णवों के लिये जरूरी नहीं है”।
  • परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों ने यह स्पष्ट रूप से वर्णन किया है कि सामान्य कैंकर्य करना जरूरी है और वह स्वयं बिना चूके इसका पालन करते थे – क्योंकि वे शास्त्र का कठोरता से पालन करते थे। केवल जब भगवद कैंकर्य में मतभेद होता था तो वे सामान्य कैंकर्य को अस्थाई रूप से त्याग कर देते थे।
  • ६००० पदी गुरु परम्परा प्रभावम में बताया गया है कि श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से यह प्रश्न पूचा गया कि हम क्यों नित्य / नैमितिक कर्म करते है, जबकी हम अन्य देवताओं कि पुजा नहीं करते है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी अच्छी तरह यह समझाते है कि नित्य / नैमितिक कर्म वैधिक अनुष्ठान का एक भाग है, जो वेद का एक अंग है इसलिये हम इसे करते है।
  • पेरियावाच्चन पिल्लै “परन्त रहस्य चरम श्लोक प्रकरण” में यह समझाते है “नम्माचार्यर्गल इवर्रै अनुष्ठीप्पारुम अनुष्ठीयातारुमाय् पोरुगिरतु” – हमारे कुछ आचार्य ने यह दिखाया है कि वर्णाश्रम का कर्तव्य पालन करना चाहिये और कुछ ने यह बताया है कि वर्णाश्रम का कर्तव्य टाला जा सकता है। इस उदाहरण के साथ हम इसे समझ सकते है: १२० बीस साल की उम्र होने पर भी श्रीरामानुज स्वामीजी संध्या वंदन करते थे और खड़े होकर अर्घ्य देते थे। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी संध्या वंदन को छोड़ भगवान श्रीरंगनाथ की पंखी सेवा करते थे। अत: सामान्य कैंकर्य का तत्व इस पर आधारीत है कि हम भगवद / भागवत कैंकर्य कर रहे है कि नहीं।
  • यह पक्ष श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने सूत्र २७६ से २७८ तक में बहुत सुन्दर तरिके से समझाया है।
    • सुत्रं २७६ – कैंकर्य दो प्रकार के है।
    • सुत्रं २७७ – चाहनेवाला कार्य करना और न चाहनेवाला कार्य से बचना यह दो प्रकार है।
    • सुत्रं २७८ – चाहनेवाला और न चाहनेवाला कार्य वर्णाश्रम धर्म और आत्म स्वरूप पर निर्भर है। सभी पहलू को जाँचकर इस छोटे से सूत्र के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी एक बड़ा और व्यापक व्याख्यान लिखते है। वह इस तत्व को दूसरे तरिके से समझाते है और अन्त में कहते है “अगर वर्णाश्रण धर्म का त्याग करना जरूरी माना जाता है, तो वह प्रत्यक्ष में भगवान (और अम्माजी) कि इच्छा का विरोध करना है। इसलिये इसे उचित नहीं समझा जा सकता है”। इसलिये वह कहते है कि दूसरों के प्रति करुणा भाव से वर्णाश्रम धर्म का पालन करना उचित है। ताकि सभी को इसका पालन करके लाभ प्राप्त हो।
  • अन्त: में यह देखा गया है कि हमारे पूर्वाचार्य पूर्णत: शास्त्र के नियम अनुसार जीवन व्यतित किये है और नित्य और नैमित्तीक कैंकर्य को किये और वे कभी भी काम्य कर्म में नहीं लगे – यह कर्म सांसारिक लाभ के लिये किया जाता है। नित्य और नैमितिक कर्म करना जरूरी है – इसे नहीं करना, शास्त्रों में अमान्य है। परन्तु काम्य कर्म वैकल्पिक है।
  • इसलिये हमें अपने पूर्वाचार्य के पदचिह्नों पर चलना चाहिये और उनके बताये अनुसार मूल तत्व को अपनाना चाहिये।

इस विषय में हम अब बाधा देखेंगे।

  • ऐसी दिनचर्या का पालन करना जो भगवद, भागवत और आचार्य कैंकर्य के अंतर्गत नहीं आती है। यह ३ हमारे स्वरूप के लिये स्वाभाविक है। इन ३ कैंकर्य को छोड़ दूसरा कुछ भी करना बाधा है।
  • उपर बताये ३ कैंकर्यों में हमें यह विचार नहीं करना चाहिये कि केवल भगवद कैंकर्य हीं स्वाभाविक है और अन्य दो अर्थात आचार्य और भागवत कैंकर्य अतिरिक्त है। जैसे भगवद कैंकर्य स्वाभाविक है, आचार्य कैंकर्य भी स्वाभाविक है। प्रणवम में यह समझाया गया है कि जीवात्मा स्वाभाविक रूप से भगवान की दास है। क्योंकि आचार्य और भागवत, भगवान को प्रिय है, इसीलिए उनका कैंकर्य करना भी जीवात्मा के लिये स्वाभाविक है। अनुवादक टिप्पणी: पेरिय तिरुमौली में श्रीपरकाल स्वामीजी स्वयं तिरुमन्त्र का तत्व भगवान को सुनाते है जैसे “नीन तिरुवेट्टेलुत्तुम कट्रू नान उट्रूतुम उन्नादियार्क्कदीमै कण्णपुर्त्तुरैयम्माने” – तिरुक्कण्णापुरम के प्रिय भगवान! तिरुमन्त्र का तत्व सिखने के पश्चात मैंने यह समझा कि मैं आपके भक्तों का दास हूँ। इससे यह समझना सरल है कि आचार्य और भागवतों का दास बनना यह मुख्य सिद्धान्त है और यह भगवान का दास बनने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • अन्रुसमस्यम – अनुकम्पा (दया)। लोक संग्रहं – संसार का कल्याण (शास्त्र का पालन करके)। श्रीवैष्णवों द्वारा सामान्य कैंकर्य (बुनियादी वर्णाश्रम धर्म) अन्रुसम्स्यार्थ (साधारण मनुष्यों के प्रति करुणा भाव से) पालन किया जाता है और यह लोक संग्रहार्त्थं नहीं है (संसार के कल्याण हेतु शास्त्र के तत्व का निर्वाह करना)। श्रीभगवद्गीता के ३.२२ में भगवान कृष्ण कहते है कि उनके लिये कोई नियत कार्य नहीं है फिर भी अपने अनेक अवतारों के समय वह शास्त्रानुसार उसका पालन करते है। अनुवादक टिप्पणी: उसके पिछले श्लोक में ३.२१ में भगवान कहते है कि समाज में जो भी बड़े महान जन करते है सामान्य जन उसी राह पर चलते है। इसीलिये हमारे पूर्वाचार्य अपनी अनुकम्पा से सामान्य कैंकर्य का पालन करते थे। अन्रुसमस्यम और लोक संग्रहं के मध्य सूक्ष्म भेद उनके उद्देश और भाव है। इसे करुणा भाव से करना (यानि यह भगवान कि इच्छा है और वर्णाश्रम धर्म कि आज्ञा जो इस सांसारिक दुनिया के लिये जरूरी है और मार्गदर्शक को इसका पालन करना चाहिये ताकि दूसरे जन उनकी राह में चल सके और आध्यात्मिक में प्रगति कर सके) और इसके विपरीत मार्गदर्शक के लिये करना (अहंकार का रंग कि मैं इसे पूरी अच्छी तरह से कर रहा हूँ और बाकि सब इसी राह पर चले और कामयाब हो)।
  • करुणा स्वरुप किया गया कोई भी कार्य जो जीवात्मा के स्वरुप अनुरूप नहीं है, वह कैंकर्य का एक हिस्सा नहीं हो सकता है। उसे कैंकर्य का एक भाग समझना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा का सच्चा स्वभाव भगवद भागवतों कि निर्हेतुक सेवा करना है – इसके सिवा करुणा भाव से कुछ भी करना (शास्त्र के विशेष समत्ती के सिवा) वह कैंकर्य नहीं समझा जाएगा।
  • अगर भगवान हमारे सामने है तो (जैसे सवारी में या सन्निधि में इकट्ठा होना) हमें सामान्य धर्म (जैसे संध्या वंदन आदि) करने के लिए अपनी उपस्थिती का त्याग नहीं करना चाहिए, दूसरों के प्रति अपनी करुणा भाव को दर्शाते हुए। केवल भगवान के अपनीसन्निधि में जाने के पश्चात हमें अपने दिनचर्या में लगना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह परम संहिता में समझाया गया है “येन  येनदाता गच्छति तेन तेन सह गच्छति ” – जब भी परम परमेश्वर जायेंगे उनके शिष्य (यहाँ पर मुक्तात्मा) पीछे जायेंगे। यह भट्टर स्वामीजी के चरित्र से समझ सकते है जिसका प्रमाण पहिले भी दे चुके है। एक बार जब वे श्री रामानुज स्वामीजी को पंखी कर रहे थे और संध्या वंदन का वक्त हो गया, एक श्री वैष्णव ने भट्टर स्वामीजी को यह याद कराया। भट्टर स्वामीजी ने उत्तर दिया “अगर मैं श्री रामानुज स्वामीजी के प्रत्यक्ष सेवा कार्य के लिए इस वक्त संध्या वंदन को छोड़ दूँ, चित्र गुप्त (धर्म राज यम के सहायक) इसकी पाप में गिनती नहीं करेंगे।” यह कहा जाता है की जब श्री रामानुज स्वामीजी सवारी के लिये बाहर जाते थे सभी उनकी सुरक्षा हेतु साथ रहते और उनकी सन्निधि में वापस आने तक उनके साथ ही रहते थे। इसीलिए हमारे पूर्वचार्यों का कहना है की जब हम कैंकर्य मे व्यस्त हो तब कर्म अनुष्ठान विलम्ब से कर सकते है।
  • जब श्रीवैष्णव जन भगवान के दिव्य गुणों का अनुभव या उसकी चर्चा कर रहे हो तो हमें संध्या वन्दन आदि करना है यह कहकर उस गोष्ठी को मध्य में छोड़ कर नहीं जान चाहिये। यद्यपि इस कार्य को दूसरों के लिए करुणा भाव से किया गया है तथापि यह कार्य वह भगवत/भागवत के अनुभव की कीमत चुकाकर नहीं कर सकते।
  • प्रपन्नों के लिये केवल भगवान ही उपाय है। इसलिये सभी कार्य करते समय हमें वह उपाय समझकर नहीं परंतु कैंकर्य समझकर करना चाहिये। उस कैंकर्य को बिना कोई आशा से करना चाहिये और जीवात्मा के लिये यह स्वाभाविक है। इसमे शामिल है:
    • ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना (तिरुमण / श्रीचूर्ण)
    • तीर्थ, प्रसाद आदि को ग्रहण करना
    • भगवान के श्रीचरणों का प्रक्षालन करना (तिरुवाराधन का एक भाग)
    • दिव्य प्रबन्ध पाशुरों का गान करना
    • दिया लगाना (मन्दिर में, तिरुमाली में, भगवान कि सन्निधी में आदि)
    • पुष्प माला बनाकर भगवान को अर्पण करना
    • बगीचे में भगवद कैंकर्य के लिये पुष्प लगाना।
    • श्रीवैष्णवों की सेवा करना।
    • दिव्य प्रबन्ध, रहस्य ग्रन्थ को सिखना और सिखाना।
  • जिसे हमारे पूर्वाचार्य ने कभी नहीं किया उस कार्य को करना बाधा है। तिरुप्पावै में श्रीगोदाम्बाजी कहती है “चेय्यातन चेय्योम”।
  • कैंकर्य कोई कारण हेतु नहीं करना चाहिये उसे तो केवल भगवान के आनन्द के लिये करना चाहिये।
  • हमें भगवान के आनन्द के लिये कैंकर्य करना चाहिये नाकि स्वयं की खुशी के लिये। सहस्त्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी यह घोषणा करते है “तनक्केयाग एनैक  कोल्लुम इदे” – कृपया आप मुझे अपने कार्य के लिये, आपके आनन्द के लिये उपयोग करें (मैं आपके आनन्द को छोड़ और कोई कार्य नहीं करना चाहता हूँ)। श्रीलक्ष्मणजी भगवान राम और माता सीता को कहते हैं कि मुझे उस कार्य कि आज्ञा करें, जिससे आपको आनन्द प्राप्त होता हो। श्रीगोदाम्बाजी तिरुप्पावै के अन्त में इसी की प्रार्थना करती है “मट्रै नम् कामंगल माट्रु”
  • अत: हमने भगवान के आनन्द को ही अपना एक मात्र लक्ष्य समझ कर सभी कैंकर्य करने के महत्त्व को देखा । यह भी देखा कि कैसे बिना कोई आशा से हमें कैंकर्य करना चाहिये जो श्रीवैष्णवों के लिये स्वाभाविक है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ९

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देख सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ८

 

३८) आवश्यक विरोधी – जिन सिद्धांतों को स्मरण रखना और जिनसे बचना आवश्यक है. उनमें उत्पन्न होने वाली बाधाएं

हमें इन बाधाओं को स्मरण भी करना चाहिये और इनसे बचना भी चाहिये। जब हमारा थुक (राल) किसी को छुता है, तो वह अशुद्ध हो जाता है। मनुष्य शरीर में नौ बाहरी मार्ग है (हमारे शरीर को नव द्वार पट्टन कहा जाता है– नौ दरवाजे वाला शहर– २ आँखे, २ कान, मुह, २ नासिका छिद्र, पेशाब संबंधी इंद्रिय और मल उत्सर्जन इंद्रिय)। हमारे हस्त इन किसी भी भाग को छू लेने पर दूषित हो जाते है और इसे शुद्ध करना पड़ता है। हम हाथ को जल से धोकर शुद्ध कर सकते है। जब हाथ पैरों को छुते है तब कहीं भी हाथ लगाने से पूर्व उन्हें साफ धोना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह विषय और आनेवाले और दो विषय अशुद्धी पर हीं है। आधुनिक सभ्यता में अशुद्धी को पूर्णत: नकारा गया है। सामान्यत: मुंह/ होठों (चुसना, जुबान से चाटना आदि) को छूकर हाथ से खाने / पीने को अशुद्धी कहते है। अन्य अशुद्धी के पहलु भी है जैसे

  • खाना / पीना
    • खाने के मुख्य पात्र को अशुद्ध हाथ लगाना।
    • बायें हाथ से खाना / पीना।
    • चम्मच, नली आदि से खाना / पीना भी अशुद्धी है।
    • उस स्थान को साफ न करना जहाँ हमने प्रसाद पाया है। गाय के गोबर से उसे साफ करना चाहिये।
    • खाने के पश्चात हमें हाथ, पैर को साफ धोना चाहिये और मुंह का कुल्ला करना चाहिये।
  • अशुद्ध वस्त्र
    • एक बार शरण की गयी धोती या साडी, रात में शयन के समय पहनी जाये अथवा शयन करने वाले बिस्तर को भी छुले तो वह अशुद्ध हो जाता है। उसे धोने के लिए डालना चाहिये और स्नान के पश्चात उसे छुना भी नहीं चाहिये।
  • जन्म / मरण
    • सगे सम्बन्धी के जन्म मरण के समय हम असौच हो जाते है और अत: कोई कैंकर्य भी नहीं कर सकते (तिरुमाली के भगवान का भी)। फिर भी संध्या वंधन असौच में भी नहीं त्याग सकते है।
    • नाई, अस्पताल, आदि स्थान हमें अशुद्ध कर देते है। वहाँ से घर पर लौटकर स्नान करना चाहिये।
    • मनुष्य को शौचालय जाकर आने के पश्चात स्नान करना चाहिये और स्वयं को शुद्ध करना चाहिये।
    • स्त्रीयों को अपने माहवारी के दौरान सबसे अलग रहना चाहिये और किसी से भी घुलना मिलना नहीं चाहिये।
    • जो अशुद्ध है उनसे करीबी सम्बन्ध रखने से स्वयं भी दूषित हो जाते है और ऐसी दशा में हमको शुद्ध होना चाहिये।

हमें अपने बड़ों से इन सब अशुद्धी के बारें में सिखना चाहिये। इस विषय में हम बाधाओं को देखेंगे।

  • श्रीवैष्णव और आचार्य के तिरुमाली के समीप थुककर आदि से अशुद्ध करना। अनुवादक टिप्पणी: आजकल सड़कों पर थूकना सामान्य हो गया है। इससे बचना चाहिये और यह बहुत बड़ी भूल है।
  • श्रीवैष्णव और भगवान के गुजरने (सवारी) की राह को अशुद्ध करना।
  • उस बगीचे को दूषित करना जहाँ नित्य सूरी पुष्प का अवतार लेकर भगवान का कैंकर्य करते है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुलशेखर स्वामीजी, पेरुमाल तिरुमौली में यह दर्शाते है “ऊनेरु सेल्वम्” 4थे पधिगम “एम्पेरुमान् पोन्मलैमेल् एतेनुम् आवेने” – मुझे इस पवित्र तिरुवेंकट के पहाड़ों पर कुछ भी बना दीजिये। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी. श्रीरंगराज स्तव में यह दर्शाते है कि नित्यसूरी गण दिव्यदेश के बगीचे और सड़कों में पधारकर भगवान को प्रसन्न करने हेतु पुष्प और वृक्ष का रूप लेते है।
  • जहाँ आचार्य विराजमान है, उस स्थान को प्रदूषित करना।
  • प्रदूषित करने के पश्चात आचार्य के निकट जाकर उन्हें जल आदि देकर उनकी सेवा करना।
  • दूषित होने के पश्चात हमें इससे बचना चाहिये
    • भगवान के अर्चा विग्रह को स्पर्श करना
    • भागवतों को स्पर्श करना
    • भागवतों से दूर जाने से बचना
    • श्रीवैष्णव के तिरुमाली और बगीचे से जाने से बचना।

३९) शरीर शुद्धी विरोधी – स्वयं के शरीर को शुद्ध करने में बाधाएं

शरीर शुद्धी अर्थात स्वयं के शरीर को शुद्ध रखना। यह दूसरे कि पवित्रता रखने में भी लागू है। जिस भी कार्य से अपवित्रता होती है वह बाधा है और उससे बचना चाहिये।

  • जान बुझकर नदी, तालाब आदि का जल, जो भगवान के कैंकर्य में लगता है उसे दूषित करना। हमें इस बात का बहुत ध्यान रखना चाहिये और इस प्रकार के जल कि शुद्धता को खराब नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य और श्रीवैष्णवों के लिये रखे हुये जल को स्वयं के उपयोग में लेना। हमें स्वयं के उपयोग हेतु इस जल को नहीं लेना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों के उपयोग के पश्चात जो जल शेष है उसे “शेषम” कहते है और वह अबसे ज्यादा शुद्ध होता है। हमें ऐसे जल को हमारे हाथ, पैर, आदि धोने में उपयोग नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के उपयोग पश्चात बचे हुए जल को श्रीपादतीर्थ के रूप में ग्रहण करना चाहिये।
  • हमें आचार्य और श्रीवैष्णवों के श्रीपादतीर्थ को हमारे हाथ, पैर, आदि धोने में उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य जिस स्थान पर अपने हस्त को धोते है उस स्थान को पवित्र मानना चाहिये। एक शिष्य को उस स्थान पर अपने हाथ, पैर को नहीं धोना चाहिये।
  • हमें जल को इस तरह नहीं फेकना चाहिये कि वह दूषित जल श्रीवैष्णवों पर गिरे।
  • भागवतों के छुने मात्र से हम पवित्र हो जाते है। इसे छोड़ और कोई दूसरा विकल्प देखना भी अपचार है।

४०) स्नान विरोधी – स्नान करने में बाधा

स्नान अर्थात नदी, तालाब, आदि में स्नान करना जहाँ कोई पूरी तरह पानी में डुबता है और अपनी शरीर की गंदगी निकालता है। इसे तमील में निराट्टम या तीर्थामादुतल से पहचाना जाता है। ब्राम्हणों (दूसरे भी) की दिनचर्या में इसका अति मुख्य स्थान है। हमारे पूर्वज इसे अवगाहन स्नान ऐसे बताते है (नदी, तालाब आदि के जल में पूर्णत: डुबना) वह जिससे सच्ची शुद्धता प्राप्त होती है। आज कल के दिनचर्या में ऐसे मौक़े बहुत कम आते है – हम आज कल स्नान गृह में स्नान करते है जहाँ नहाने के लिए लोटे का इस्तेमाल किया जाता है।

  • हमें सिर्फ स्वच्छता हेतु स्नान नहीं करना चाहिये। हमें शास्त्र के नियमानुसार स्नान करना चाहिये।
  • प्रपन्न होकर कोई विशेष दिन पुण्य कमाने के लिये स्नान करना बाधा है। विशेष दिन यानि संक्रांती, पुण्य काल, ग्रहण आदि। प्रपन्न होकर हमने अपनी पूरी जवाबदारी भगवान के चरण कमलों में दे दिया है। इसलिये ऐसे अवसर पर स्नान करने का कोई प्रश्न ही नहीं है। यह पूर्णत: जीवात्मा के स्वभाव के विरुद्ध है।
  • प्रपन्न के सिद्धांतों के विरुद्ध, कार्य करने के पश्चात, विशेष करुणा से और सम्प्रदाय के संरक्षण हेतु, यह सोचकर दुखी होना चाहिए कि इस शरीर बंधन के कारण ऐसा कार्य करना पड़ा। ऐसे कार्य के लिए भयभीत न होना बाधा है। यह सीधे स्नान से सम्बंधित प्रतीत नहीं होता है।
  • नदी के घाटों पर जहाँ पर भगवान के कैंकर्य हेतु जल लिया जाता हो उस स्थान पर स्नान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी अपने तिरुविरुत्तम के पहिले पाशुर में कहते है कि हमारे पास गंदा शरीर है अलुक्कुडम्बुम – श्रीपरकाल स्वामीजी भी तिरुक्कुरुन्दाण्डगम में शरीर के लिये यही शब्द का प्रयोग करते है। इसलिये किसी को भी वहाँ जाकर अपना शरीर को नहीं धोना चाहिये जहाँ भगवान के कैंकर्य हेतु जल लाया जाता हो। उस स्थान को हो सके उतना पवित्र रखना चाहिये।
  • उस घाट में स्नान करना जहाँ संसारी जन भी स्नान करते है, वह बाधा है। हमें उस स्थान पर स्नान नहीं करना चाहिये क्योकि संसारी द्वारा छुवा हुआ जल हमें छु लेगा। आचार्य हृदय के ३२वें चूर्णिका में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार एक घटना को दर्शाते है “साधन साध्यंगलिल मुतलुम मुडिवुम वर्णधर्मिगल दासवृत्तिगलेन्रु तुरैवेरीविडुवित्ततु” – जो कर्म (उपाय का पहला चरण) और कैंकर्य (ऊपेय का अन्तिम चरण) के मध्य में मतभेद समझ सकता है वह यह कहता है “आप वर्ण धर्म के अनुयायी हो और हम भगवद दासत्व के अनुयायी है – इसलिये हम आप के साथ एक ही घाट में स्नान नहीं कर सकते है”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तिरुव्हिंद्रपुरम कि एक सुन्दर घटना दर्शाते है। वहाँ एक श्रीवैष्णव थे (सन्यासी/जीयर) उनका नाम “विल्लीपुत्तुर पगवर” था जो अपना अनुष्ठान किसी घाट में करते थे, यद्यपि वहाँ के अन्य ब्राह्मण अपना अनुष्ठान किसी दूसरे घाट में करते थे। वह ब्राह्मण उन्हें अपने घाट पर आकर अनुष्ठान करने को कहते है जहाँ केवल ब्राह्मण ही अनुष्ठान करते है और विल्लीपुत्तुर पगवर प्रमाण देकर उत्तर देते है “हम भगवान श्रीमन्नारायण के दास है और आप वर्ण धर्म के अनुयायी हो – तो हम दोनों का मिलने का तो प्रश्न हीं नहीं आता” और उस स्थान से चले जाते है।
  • नदी में स्नान करते समय हमें उस घाट में स्नान नहीं करना चाहिये जहाँ से जल संसारीयों के उपयोग किये हुए घाट से आता है। अनुवादक टिप्पणी: इसका अर्थ यह है कि हम संसारीयों के बचे हुए जल से स्नान कर रहे हैं जो कि सही नहीं है।
  • हमें उस घाट में स्नान नहीं करना चाहिये जहाँ आगे श्रीवैष्णव स्नान कर रहे हो। हमें श्रीवैष्णवों के घाट के पश्चात स्नान करना चाहिये। इससे सम्बंधीत हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के जीवन से एक घटना देख सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कावेरी नदी में स्नान करने हेतु जाते थे। एक श्रीवैष्णव “तिरुमंजन अप्पा” जो भगवान श्रीरंगनाथ कि सेवा करते थे वह श्रीवैष्णव निरन्तर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के स्नान के पश्चात स्नान करते थे और इससे ज्ञान, वैराग्य आदि कि कृपा उन पर हो गयी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपने आचार्य रूप में स्वीकार कर लिया।
  • दुसरे मंत्रों के साथ स्नान करना। सामान्यत: स्नान के समय कुछ मंत्रों का उच्चारण होता है। हमें अवैष्णव मंत्रों से सावधान रहना चाहिये।
  • सामान्यत: यह देखा जाता है कि “इमम्मे गंगे यमुने सरस्वती” श्लोक का स्नान से पहिले उच्चारण होता है। प्रपन्नों को यह नहीं करना चाहिये। श्रीरंगनाथ भगवान की इस तरह स्तुति होती है “तिरुवरंगप पेरुनगरुल तेण्णिर्प पोन्नित तिरैक्कैयाल अडिवरुडप पल्ली कोल्लुम करुमणि”“कावेरी नदी की लहरे श्रीरंगम में आदि शेष पर शयन कर रहे श्रीरंगनाथ भगवान को बहुत हल्के से छु कर जाती है” हमें यह उच्चारण करना चाहिये “गंगैयिल पुनितमाय  काविरी” “कावेरी जो गंगा से भी अधिक पवित्र है”। जीवात्मा को स्नान के समय विरजा नदी का भी स्मरण करना चाहिये जो परमपद के सीमा पर बहती है।
  • भगवद, आल्वार a आचार्य के उत्सवों में उपस्थित होने के पश्चात सेवार्त्ति (जो उत्सवों मे दर्शन हेतु आये है) को छुने के बावजूद स्नान नहीं करना चाहिये। भगवद, आल्वार और आचार्य के उपस्थिति में भीड़ के छुने को नकारा जाता है।
  • जब श्रीवैष्णव जन इस संसार को छोड़ कर जाते है – तो उनका शरीर को “विमल चरम विग्रह” समझा जाता है – पवित्र शरीर। ऐसे तिरुमेनी (शरीर) को भगवान के अर्चा विग्रह के समान समझा जाता है। इसलिये ऐसे शरीर को असौच नहीं समझना चाहिये और इससे बचना चाहिये। अन्तिम क्रिया होने के पश्चात स्नान किया जाता  है – परंतु उसे केवल अवबृता स्नान समझना चाहिये (उत्सव के समापन का एक भाग समझे जैसे तीर्थ वारी)।
  • अवैष्णव / अभागवतों को छुने के पश्चात स्नान करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • आचार्य के तीर्थ उत्सव के दिन शिष्य को अच्छे से स्नान करके भगवद और भागवत आराधन को निभाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब मठ/तिरुमाली में आचार्य का तिरुनक्षत्र, तीर्थ उत्सव मनाया जाता है तो शिष्य को आर्थिक और प्राकृतिक रूप से उपस्थित रहना चाहिये। आचार्य का तिरुनक्षत्र और तीर्थ उत्सव मनाना यह शिष्य का कर्तव्य है।
  • स्नान के पश्चात शरीर को सुखाने के लिये सिर आदि को हिला कर ऐसे नहीं सुखाना चाहिये कि हमारे शरीर की पानी की बुँदे समीप खड़े श्रीवैष्णव पर गिरे।
  • श्रीवैष्णवों को वेदकप पोन (पारस) कहा जाता है – उनके स्पर्श से हम शुद्ध हो जाते है। उनका स्पर्श हमें अशुद्ध करेगा ऐसा सोचना और उसके लिये स्नान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी सूत्र २२१ में कहते है “वेदकप पोन पोले इवर्गलोट्टै सम्बन्धं” – श्रीवैष्णवों से सम्बन्ध रखना अर्थात पारस के स्पर्श में आना – जब एक पारस लोहे को छुता है तो वह लोहा सोना बन जाता है। उसी तरह श्रीवैष्णवों के छुने मात्र से हम शुद्ध हो जाते है।
  • भगवान का अभिषेक (तिरुमंजन) करने के पश्चात स्नान करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: जब हम भगवान का अभिषेक करते है तो दूध, दही, शहद आदि हमारे उपर भी गिर जाते है। यह बहुत बड़ा सौभाग्य है। हमें कभी भी यह विचार नहीं करना चाहिये कि हम अशुद्ध हो गये है और इसे साफ करने कि कोशिश भी नहीं करनी चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों को स्नान कराने के पश्चात स्नान नहीं करना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों के हमारे तिरुमाली में आकर वापस जाने के पश्चात हमें स्नान नहीं करना चाहिये।
  • केवल शरीर को साफ करने हेतु स्नान करना बाधा है। हमें स्नान करते समय आध्यात्मिक बातों को ध्यान में रखना चाहिये और उसका पालन करना चाहिये।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका- पञ्च संस्कार

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका

<< पूर्व अनुच्छेद

4.1 pancha-samskAramश्रीरामानुज स्वामीजी को पञ्च संस्कार प्रदान करते हुए श्रीमहापूर्ण स्वामीजी

हम श्रीवैष्णव कैसे बनते है?

हमारे पूर्वाचार्यो के अनुसार, एक क्रिया-विधि है, जिसके द्वारा श्रीवैष्णव बना जाता है। इस विधि को “पञ्च संस्कार” (संप्रदाय में दीक्षा) कहा जाता है।

संस्कार अर्थात शुद्ध/ सात्विक होने की प्रक्रिया। यह ऐसी विधि है, जो जीव को अयोग्य अवस्था से योग्य अवस्था में परिवर्तित करती है। इसी विधि के द्वारा ही हम प्रथम बार एक श्रीवैष्णव बनते है। जिस प्रकार ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने से ब्रह्म यज्ञ विधि द्वारा ब्राह्मण बनना सुलभ हो जाता है, उसी प्रकार श्रीवैष्णव परिवार में जन्म लेने से पञ्च संस्कार विधि द्वारा श्रीवैष्णव बनना सुलभ हो जाता है। ब्राह्मण कुटुम्भ के परिपेक्ष्य में यहाँ अधिक सुंदरता इस बात में है कि, श्रीवैष्णव अनुयायी बनने के लिए श्रीवैष्णव परिवार में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं है – क्यूंकि श्रीवैष्णवं आत्मा से सम्बंधित है, यद्यपि ब्राह्मण्यं शरीर से सम्बंधित है। जाति, समाज, देश, लिंग, आर्थिक स्थिति, कुटुम्भ, आदि पर आधारित कोई भेद नहीं है – जो भी इस मोक्ष के मार्ग पर आने की इच्छा करता है, उसे इस पथ में सम्मिलित किया जा सकता है। श्रीवैष्णव बनने के उपरान्त, देवान्तर (ब्रह्मा, शिव, दुर्गा, सुब्रमण्य, इंद्र, वरुण, आदि देवी-देवता, जिनका नियंत्रण भगवान करते है) और उनसे सम्बंधित सभी वस्तुओं से संपूर्णतः संबंध त्याग करना श्रीवैष्णव के लिए बहुत आवश्यक है।

पञ्च संस्कार

पञ्च संस्कार (समाश्रयं), किसी मनुष्य को कैंकर्य (इस संसार और परमपद) के लिए तैयार करने की परिशोधक प्रक्रिया है, जो शास्त्रों में समझायी गयी है। यह श्लोक, पञ्च संस्कार के विभिन्न पक्षों को समझाता है – “ताप: पुण्ड्र: तथा नाम: मंत्रो यागश्च पंचम:”। इसके अंतर्गत निम्न पांच क्रियाओं का अनुसरण किया जाता है:

  • ताप शंख चक्र लांचन – हमारे कन्धों/ बाहू पर शंक और चक्र की गर्म छाप। यह दर्शाता है कि हम भगवान की संपत्ति है –उसी प्रकार जैसे एक पात्र पर उसके स्वामी के चिह्न अंकित किये जाते है, हमें भगवान के चिह्नों से अंकित किया जाता है।
  • पुण्ड्र (चिह्न) – द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करना – शरीर के द्वादश (12) स्थानों पर ऊर्ध्व पुण्ड्र (तिरुमण और श्रीचुर्ण) धारण करना।
  • नामदास्य नाम  आचार्य द्वारा प्रदत्त नया दास्य नाम (रामानुजदास, मधुरकविदास, श्रीवैष्णव दास)।
  • मंत्रमंत्रोपदेश आचार्य से रहस्य मंत्र का ज्ञान प्राप्त करना; मंत्र अर्थात वह जिसके ध्यान करने वाले को सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है – तिरुमंत्र, द्वयं और चरम श्लोक जो हमें संसार से मुक्ति प्रदान करते है। अधिक जानकारी के लिए कृपया http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/rahasya-thrayam.html पर देखें।
  • याग – देव पूजा – तिरुवाराधना/ पूजा विधि का ज्ञान प्राप्त करना।

योग्यतायें

अकिंचयम् (स्वयं को पुर्णतः असमर्थ/ अयोग्य/ अपात्र मानना) और अनन्य गतित्व (और कोई गति न होना), ये दो मुख्य शर्तें है, जो भगवान के प्रति समर्पण करने से पूर्व होना आवश्यक है। मात्र इसी स्थिति में, वह संपूर्णतः भगवान के प्रति समर्पित हो सकेगा और भगवान द्वारा स्वयं के उद्धार के लिए आश्वस्त होगा।

पञ्च संस्कार के उद्देश्य

  • जैसा की शास्त्र कहते है, “तत्व ज्ञानान् मोक्ष लाभ: अर्थात ब्रह्म के विषय में सच्चा ज्ञान प्राप्त करके ही, मोक्ष प्राप्त होता है। आचार्य से अमूल्य अर्थ पंचक (ब्रह्मं – भगवान, जीवात्मा – आत्मा, उपाय – भगवान को प्राप्त करने के साधन, उपेय – लक्ष्य/ परिणाम, विरोधी – उन लक्ष्य को प्राप्त करने में आने वाली बाधाएं), जो मंत्र उपदेश का अंग है, के विषय में ज्ञान प्राप्त करके, हम चरम लक्ष्य अर्थात नित्य विभूति में श्रिय:पति के प्रति कैंकर्य, को प्राप्त करने के योग्य बन सकेंगे। सच्चा ज्ञान यह स्वीकार करना है कि हम संपूर्णतः भगवान के प्रति समर्पित/ आश्रित है।
  • अपने आचार्य और श्रीवैष्णवों (अनेकों प्रकार से) के प्रति कैंकर्य करते रहना और अर्चावतार भगवान का घर में तिरुवाराधन द्वारा और दिव्य देशों में कैंकर्य करते रहना ही इस जीवन का उदेश्य है।
  • इस महान सन्देश को अन्य लोगों में उनके आध्यात्मिक लाभ के लिए प्रचार करना भी महत्वपूर्ण है। श्रीरामानुज स्वामीजी, अपने मुख्य उपदेशों में, प्रथम हमें श्रीभाष्य, तिरुवाय्मौली सिखने और अन्य को भी सिखाने का आदेश करते है।

यहाँ, जीवात्मा और परमात्मा से दिव्य मिलन का प्रबंध आचार्य करते है। यद्यपि हमें समय समय पर प्रपन्न भी कहा जाता है, परंतु सच्चे संदर्भ में, श्रीरामानुज स्वामीजी और हमारे सभी पूर्वाचार्यों ने हमें समझाया है कि हम आचार्य निष्ठ है अर्थात जो संपूर्णतः आचार्य को समर्पित/ आश्रित है। इस पञ्च संस्कार विधि को जीवात्मा के लिए सच्चा जन्म भी कहा जाता है, क्यूंकि इसी समय, जीवात्मा अपने सच्चे स्वरुप के विषय में ज्ञान प्राप्त करती है और भगवान के प्रति संपूर्ण समर्पण करती है। इस दिव्य संबंध के कारण, जो पति (परमात्मा) और पत्नी (जीवात्मा) के मध्य संबंधों के समान है, यहाँ अन्य देवताओं को जड़- मूल से त्यागने पर निरंतर महत्त्व दिया गया है।

इसलिए जैसा की यहाँ समझाया गया है, इस लौकिक संसार को त्यागकर, नित्य परमपद जाकर श्रिय:पति (श्रीमन्नारायण भगवान) के प्रति अनवरत कैंकर्य करना ही श्रीवैष्णवता का सिद्धांत है।

पञ्च संस्कार विधि कौन निष्पादित कर सकता है?

यद्यपि श्रीवैष्णवं एक नित्य/ अनादि सिद्धांत है, परंतु आलवारों और आचार्यों ने इसे पुर्नार्जीवित किया है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की और समय के साथ लुप्त हो चुकी प्रथा को श्रीनाथमुनि स्वामीजी, आलवन्दार, आदि प्रधान आचार्यों के निर्देशों के आधार पर पुनः स्थापित किया। उन्होंने 74 आचार्यों को सिंहासनाधिपतियों (आचार्य) के रूप में स्थापित किया और उन्हें उन लोगों को पञ्च संस्कार करने के लिए अधिकृत किया जो इस जीवन के लक्ष्य/ उद्देश्य (इस संसार को त्याग परमपद प्रस्थान करना) को समझते थे। उन 74 वंश में जन्म लेने वालों में से कोई भी पञ्च संस्कार प्रदान कर सकता है। उन्होंने (और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने) कुछ विशिष्ट मठ और जीयर स्वामियों (सन्यासियों) को स्थापित किया जिनके वंशज भी उन लोगों को पञ्च संस्कार प्रदान करने के लिए अधिकृत है जो श्रीवैष्णव बनने का लक्ष्य रखते है।

हमारे पञ्च संस्कार अथवा समाश्रायण के दिवस पर हमें क्या करना चाहिए?

  • प्रातः जल्दी उठाना।
  • श्रीमन्नारायण भगवान, आलवारों और आचार्यों का ध्यान करना। यही हमारा सच्चा जन्म दिवस है- हमारे ज्ञान का जन्म।
  • नित्य कर्मानुष्ठान करना (स्नान, ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण, संध्या वंदन, आदि)।
  • समय पर आचार्य मठ/ मंदिर में पहुंचना चाहिए। कुछ फल, वस्त्र (भगवान/ आचार्य के लिए वस्त्र), संभावना (धन), आदि जो भी संभव हो साथ लेकर जाना चाहिए।
  • समश्रायण प्राप्त करना।
  • आचार्य का श्रीपाद तीर्थ स्वीकार करना।
  • ध्यान देकर आचार्य के निर्देशों को श्रवण करना।
  • मठ/ मंदिर में ही प्रसाद पाना।
  • पूरा दिवस मठ/ मंदिर में व्यतीत करना और जितना संभव हो प्रत्यक्ष आचार्य से संप्रदाय के विषय में समझना।
  • समाश्रयण के पश्चाद व्यवसाय, आदि पर जाने की शीघ्रता नहीं करना चाहिए – उस दिवस को शांति और सात्विकता के लिए संचित कर, गुरु परंपरा के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शन करना चाहिए। श्रीवैष्णव के लिए यह दिन आने वाले ऐसे अनेकों मीमांसात्मक दिनों का प्रारंभ दिवस होना चाहिए।

पञ्च संस्कार प्रारंभ है अथवा अंत है?

यह सामान्य मिथ्याबोध है कि समाश्रयण मात्र एक साधारण रीति है और यही समापन है। परंतु यह पुर्णतः गलत है। यह श्रीवैष्णवं में हमारी यात्रा का प्रारंभ है। परम लक्ष्य अटल है (श्री महालक्ष्मीजी और श्रीमन्नारायण भगवान की नित्य सेवा में निरत होना) और प्रक्रिया हमारे पूर्वाचार्यों ने प्रदान की है – आचार्य द्वारा भगवान को साधन रूप स्वीकार करना और आचार्य द्वारा बताये गए सिद्धांतों को आनंदपूर्वक अनुसरण करना। प्रत्येक जीवात्मा के सच्चे स्वरुप के लिए सबसे उपयुक्त है, इन सिद्धांतों को स्वीकार करना, उन्हें अपने दैनिक जीवन में अनुसरण करना और मोक्ष प्राप्त करना।

मुमुक्षुप्पदी के, सूत्र 116 में, पिल्लै लोकाचार्य बताते है कि श्रीवैष्णव को कैसे व्यवहार करना चाहिए (वह जिसने पञ्च संस्कार प्राप्त किये है)।

  1. लौकिक विषयों के प्रति प्रीति को पुर्णतः त्यागना।
  2. श्रीमन्नारायण भगवान को ही अपना एकमात्र उपाय मानना।
  3. सच्चे लक्ष्य (नित्य कैंकर्य) के निष्पादन/ कार्यसिद्धि में सम्पूर्ण श्रद्धा रखना।
  4. सच्चे लक्ष्य को शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त करने की निरंतर उत्कट अभिलाषा करना।
  5. इस संसार में रहते हुए, सदा दिव्य देशों में भगवान के दिव्य गुणानुवादन और कैंकर्य में निरत रहना।
  6. भगवान के परम स्नेही भक्त, जिनमें उपरोक्त वर्णित गुण निहित है, उनकी महानता को जानकार, उन्हें देखते ही आनंदित होना।
  7. अपने मानस को तिरुमंत्र और द्वय महामंत्र पर दृढ करना।
  8. अपने आचार्य के प्रति महान प्रीति रखना।
  9. आचार्य और भगवान के प्रति कृतज्ञ रहना।
  10. सात्विक श्रीवैष्णवों का संग करना, जो सच्चे ज्ञान से परिपूर्ण, विरक्त और शान्त स्वभाव वाले है।

इन बिन्दुओं पर अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2012/08/srivaishnava-lakshanam-5.html पर देखें।

इस समय, हमें भगवत श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने इस पञ्च संस्कार विधि को भव्य शैली में संस्थागत किया और अपने अनेकों अनुयायियों (74 सिंहासनाधिपति) के द्वारा उसका प्रचार किया। यह सब उन्होंने जीवात्माओं के प्रति अपनी अपरिमित कृपा के कारण किया, जो इस लौकिक संसार में अंधकार में घिरे हुए है और भगवान के प्रति मंगलाशासन करने के अपने स्वाभाविक कर्तव्य से वंचित है। इस तत्व के विषय में और अधिक हम अगले अंकों में देखेंगे।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/simple-guide-to-srivaishnavam-pancha-samskaram.html

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श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका – भूमिका

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका

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3.srivaishna-guruparamparai

श्रीमन्नारायण भगवान ने अपनी निर्हेतुक कृपा से, संसारियों (बद्ध जीवात्माओं) के उद्धार हेतु, सृष्टि रचना में ब्रह्मा को शास्त्रों (वेदों) का ज्ञान प्रकट किया। वैदिकों के लिए वेद ही परम प्रमाण है। प्रमाता (आचार्य) ही प्रमाण (शास्त्रों) के द्वारा प्रमेय (भगवान) के विषय में पुष्टि कर सकते है। जिस प्रकार भगवान में अखिल हेय प्रत्यनिकत्वं (सभी अनैतिक गुणों के विपरीत) और कल्याणैकतानत्वं (सभी मंगलमय दिव्य गुण) प्रकट है, जो उन्हें अन्य सभी रचानाओं से पृथक करती है, उसीप्रकार वेदों में निम्न महत्वपूर्ण गुण है (जो उन्हें अन्य प्रमाणों से पृथक करते है):

  • अपौरुषेयत्वं –  जिसकी रचना किसी जीवात्मा द्वारा नहीं की गयी (प्रत्येक सृष्टि के समय, भगवान वेदों का ज्ञान ब्रह्मा को प्रदान करते है जो अंततः उसका प्रचार करते है)। इसलिए व्यक्तिगत समझ और अनुभूति आदि द्वारा उत्पन्न त्रुटी इनमें अनुपस्थित है।
  • नित्य –  वह अनादी है – जिसका कोई आरंभ नहीं और कोई अंत नहीं – यह भगवान के द्वारा समय समय पर प्रकट किया जाता है, जो वेदों की विषयवस्तु से पुर्णतः परिचित है।
  • स्वत प्रामाण्यत्व – सभी वेद व्याख्यान स्वतः ही पर्याप्त/ यथेष्ट है, अर्थात, उसकी प्रामाणिकता को सिद्ध करने के लिए हमें और किसी भी साक्ष्य की आवश्यकता नहीं है।

यद्यपि वेद, शास्त्रों का वृहद शरीर है, वेद व्यास ने भविष्य में मनुष्य विवेक की सीमित क्षमता को जानते हुए, वेद को 4 वेदों में विभाजित किया – ऋग्, यजुर्, साम और अथर्व।

वेदांत वेदों का सार है। वेदांत, उपनिषदों का समूह है, जो अत्यंत जटिलता से भगवान के विषय में चर्चा करता है। उपनिषद, उन महान संतों की रचनाएँ है, जिन्होंने ब्रहम का विभिन्न पक्षों से विश्लेषण किया है। यद्यपि वेद आराधना विधि के विषय में चर्चा करते है, और वेदांत, भगवान के विषय में चर्चा करते है, जो उस आराधना के प्रयोजन है। अनेकों उपनिषदों में से निम्न को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है:

  • ऐत्रेय
  • ब्रुहदारण्यक
  • छान्धोग्य
  • ईशा
  • केन
  • कठ
  • कौशिधिकी
  • महा नारायण
  • मान्डुक्य
  • मुंडक
  • प्रश्न
  • सुभाल
  • स्वेतस्वतार
  • तैत्त्रिय

महर्षि वेद व्यास द्वारा कृत ब्रहम सूत्र को भी वेदांत का अंग माना जाता है, क्यूंकि यह उपनिषदों का सार है। क्यूंकि, वेद अनंत है (अंतहीन – विशाल) और वेदांत अत्यंत जटिल और मानव विवेक की क्षमता भी सिमित है (जिसके परिणामस्वरूप अशुद्ध अर्थ निरूपण संभव है), इसलिए हमें वेद/ वेदांत को स्मृति, इतिहास और पुराणों द्वारा समझना होगा।

  • स्मृति – धर्म शास्त्रों का संग्रह है, जिनकी रचना महान ऋषियों जैसे मनु, विष्णु हारित, याज्ञवल्क्य, आदि द्वारा की गयी है।
  • इतिहास – श्रीरामायण और महाभारत – दो महाकाव्यों का संग्रह है। श्रीरामायण को शरणागति शास्त्र और महाभारत को पंचमो वेद (ऋग, यजुर, साम और अथर्व वेदों के पश्चाद) का स्थान प्राप्त है।
  • पुराण – ब्रह्मा द्वारा रचित 18 मुख्य पुराण (ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण, विष्णु पुराण, आदि) और अनेकों उप-पुराणों (लघु पुराणों) का संग्रह। इन 18 पुराणों में, ब्रह्मा स्वयं घोषणा करते है कि सत्व गुण के प्रभाव में वह भगवान विष्णु की स्तुति/ प्रशंसा करते है, रजो गुण के प्रभाव में स्वयं की स्तुति/ प्रशंसा करते है और तमो गुण के प्रभाव में शिव, अग्नि, आदि की स्तुति/ प्रशंसा करते है।

इतने प्रमाणों की उपलब्धता के पश्चाद भी, शास्त्रों के द्वारा सच्चा ज्ञान प्राप्त करने और सच्चे लक्ष्य को खोजने के बजाये, संसारी अभी भी लौकिक आकांक्षाओं में निरत है। तब, भगवान स्वयं अनेकों अवतारों में प्रकट हुए, परंतु बहुत से मुर्ख लोगों ने उन्हें असम्मानित किया और उनसे बैर भी किया। यह सोचकर कि संसारियों की सहायता हेतु, उन्हें एक जीवात्मा को तैयार करना चाहिए (जिसप्रकार एक हिरन को पकड़ने के लिए शिकारी अन्य हिरन का उपयोग करता है), उन्होंने कुछ जीवात्माओं का चुनाव किया और उन्हें निष्कपट दिव्य ज्ञान प्रदान किया। यही जीवात्माएं, आलवारों के रूप में प्रसिद्ध है (जो संपूर्णतः भगवत अनुभव में लीन है)। उनमें प्रमुख है श्रीशठकोप स्वामीजी (प्रपन्न कुलकुठस्थर/ वैष्णव कुलपति) और उनकी संख्या 10 है – सरोयोगी स्वामीजी, भूतयोगी स्वामीजी, महद्योगी स्वामीजी, भक्तिसार स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी, कुलशेखर स्वामीजी, विष्णुचित्त स्वामीजी, भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी, योगिवाहन स्वामीजी और परकाल स्वामीजीमधुरकवि स्वामीजी (श्रीशठकोप स्वामीजी के शिष्य) और गोदाम्बजी (विष्णुचित्त स्वामीजी की पुत्री) को भी आलवारों की गोष्ठी में सम्मिलित किया जाता है। भगवान के पूर्ण कृपापात्र आलवारों ने दिव्य ज्ञान की शिक्षा बहुतों को प्रदान की। परंतु क्यूंकि वे सदा भगवत अनुभव में लीन रहा करते थे, भगवान का मंगलाशासन करना ही उनका परम उद्देश्य था।

भगवान ने संसार से अधिक जीवात्माओं के उद्धार हेतु, श्रीनाथमुनि स्वामीजी से प्रारंभ और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पर्यंत क्रम में आचार्यों के अवतरण की दिव्य व्यवस्था की। भगवत रामानुज, जो आदिशेषजी के विशेष अवतार है, हमारी इस आचार्य परंपरा क्रम के मध्य में अवतरित हुए और उन्होंने इस श्रीवैष्णव संप्रदाय और विशिष्टाद्वैत सिद्धांत को असीमित उचाईयों तक आगे बढ़ाया। पराशर, व्यास, ध्रमिड, टंका, आदि महान ऋषियों की रचनाओं का अनुसरण करते हुए, उन्होंने द्रढ़ता और स्थिरता से विशिष्टाद्वैत सिद्धांतों को स्थापित किया। उन्होंने 74 आचार्यों को सिंहासनाधिपतियों के रूप में स्थापित किया और उन्हें निर्देश दिए कि वे लोग श्रीवैष्णव संप्रदाय को उस प्रत्येक मनुष्य तक पहुंचाए, जो भगवान के विषय में जानने की और सच्चा ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा रखता हो। श्रीरामानुज स्वामीजी के महान कार्यों और सभी के एकमात्र रक्षक होने के कारण ही, इस संप्रदाय को “श्रीरामानुज दर्शन” भी कहा जाता है। कुछ समय पश्चाद, दिव्य प्रबंधन और उनके अर्थों के प्रचार हेतु, वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के रूप में पुनः प्रकट हुए। श्रीरंगम पेरिय कोयिल में पेरिय पेरुमाल (भगवान) स्वयं श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपने आचार्य के रूप में स्वीकार करते है और उस आचार्य रत्नहार (आचार्य परंपरा) को पूर्ण करते है जो उन्हीं से प्रारंभ हुई था। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बाद, उनके प्रमुख शिष्यों, जिन्हें अष्ट-दिक् गजंगल (अष्ट हाथी) कहा जाता है ने पोन्नडिक्काल् जीयर के नेतृत्व में श्रीवैष्णव संप्रदाय को सभी जगह प्रचारित किया। कालांतर में, इस संप्रदाय में बहुत से आचार्य प्रकट हुए और उन्होंने हमारे पूर्वाचार्यों के महान कार्य को आज भी जारी रखा है।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/simple-guide-to-srivaishnavam-introduction.html

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प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ८

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देख सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ७


३६) गति विरोधी – चलने (और अन्य कार्य में) में बाधाएं

सामान्यता गति यानी चलना (गमनम् पर आधारित- जाना), उस पथ पर (जैसे अर्चिरादिक गति – परमपदधाम जाने का उज्ज्वल पथ) और शरण लेने वाला (जैसे अगति – वह जिसके पास कोई शरण न हो)। इस विषय में हमें श्रीवैष्णवों (वह जिसने आचार्य कृपा द्वारा भगवान कि शरण ली है), को संसारियों (भौतिक विचारों वाले लोग), आदि के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये यह चर्चा कि गयी है। हमने पहिले श्रीवैष्णव, मुमुक्षु, संसारी आदि के विषय में चर्चा कि है।

  • श्रीवैष्णव द्वारा उपयोगी बिस्तर पर चलना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव द्वारा जो भी वस्तु उपयोग किया गया है, उसे पवित्र मानना और उसका सम्मान करना चाहिये। हमारे परम्परा में किसी भी वस्तु पर चलना पाप माना गया है। परन्तु अन्य सभ्यता में पैर उपर रखना, पैरों से वस्तुओ को आगे / पिछे करना, आदि इसे सामान्य माना गया है। हमारे सभ्यता में दूसरों को पैर लगाना अपमान माना गया है।
  • हमारे निकट आने वाले श्रीवैष्णवों को रोकना, उनका अनादर माना जाता है। हमारे निकट आते ही, हमें मान तजकर, उन्हें साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना चाहिये और स्वयं आगे बढ़ना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह दर्शाया गया है कि जब भी एक श्रीवैष्णव दूसरे श्रीवैष्णव को मिलते है तो दोनों को एक दूसरे को लम्बी साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना चाहिये परन्तु आज कल यह सभ्यता लुप्त होती जा रही है।
  • पिछले विषय के विपरीत संसारी के प्रति नम्र होना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्यों ने यह समझाया है कि सांसारीयों के प्रति बहुत लगाव रखने से संसार में फँसे रहेंगे – इसलिये उनके प्रति अधिक लगाव होने से हमारी आध्यात्मिक उन्नती कम हो जायेगी।
  • भगवान के मंदिरों के गोपुरों, विमान को देखते ही हमें उसकी पुजा करनी चाहिये और उसकी सुन्दरता को निरखना चाहिये। ध्यान न देना या जल्दी वहाँ से निकल जाना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: पेरिय तिरुमौली के एक पाशुर की व्याख्या में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै एक घटना बताते है, जहाँ श्रीवेदांति स्वामीजी कहते है कि उन्होंने यह देखा कि श्रीपिल्लै तिरुनारैयूर अरयर और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी मन्दिर कि प्रदीक्षणा लगाते हुए मन्दिर के गोपुर, श्रीवैष्णवों कि तिरुमाली आदि कि प्रशंसा करते थे।
  • अन्य देवताओं के मन्दिर के गोपुर, विमान आदि को देखते ही श्रीवैष्णवों को वहाँ से तुरन्त निकल जाना चाहिये नाकि वहाँ रहकर उनकी पुजा करें या उनको स्पर्श करें। ऐसा करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: इससे आधारित श्रीसहस्त्रगीति के अपने ईडु व्याख्या पर श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी एक घटना बताते है। धनुर्दास स्वामीजी के भतीजे वण्डर और चोण्डर एक दिन श्रीअगलंगा नाट्टाझवान के साथ घुम रहे थे। उन्हें सताने के लिये श्रीअगलंगा नाट्टाझवान ने उन्हें एक जैन मन्दिर दिखाकर भगवान का मन्दिर कहा और प्रणाम करने को कहा। उन्होंने उनकी आज्ञा का पालन किया परन्तु जब उन्हें पता चला कि यह जैन मन्दिर है वह मूर्छित हो गये। यह सुनकर धनुर्दास स्वामीजी वहाँ आकर अपना चरण रज देते है और उसे उन पर लगाने के पश्चात वें उठाते है।
  • भगवान का मन्दिर देख सभी को, घड़ी के कांटे के जैसे चलते है वैसे प्रदक्षीणा लगानी चाहिये। विपरित दिशा में जाना विरोधी है।
  • कहीं जाते समय अगर कोई भागवत दिव्य प्रबन्ध आदि का पाठ कर रहे हो तो हमें रुककर उसे सुनकर और धीरे से वहाँ से जाना चाहिये। इस समय जल्दी से वहाँ से निकल जाना उचित नहीं होगा।
  • सांसारिक विषयों कि जहां चर्चा हो रही हो तो वहाँ से कान बन्द कर तुरन्त निकल जाना चाहिये।
  • आचार्य या श्रीवैष्णवों के साथ चलते समय उनकी परछाई पर कदम नहीं रखना चाहिये।
  • हमें इस तरह चलना चाहिये कि हमारी परछाई भी उन पर न गिरे।
  • हमें इसका भी ध्यान रखना चाहिये कि हमारी परछाई संसारीयों पर न पड़े और सांसारियों कि परछाई हम पर न पड़े।
  • भगवद, भागवतों के लिये कुछ भी सामाग्री लाने के लिये जाये तो ब्रम्हा, शिव आदि के तिरुमाली के निकट से भी नहीं गुजरना चाहिये। शाण्डिल्य स्मृति यह समझाता है कि उनकी तिरुमाली स्मशान के जैसे है।
  • पुजा के लिये उपयोग हेतु सामाग्री पर पैर रखना देवतान्तर के समान है और इसे असौच मानना चाहिये और इसे नहीं करना चाहिये।
  • हमें अवैष्णवों कि संगत में नहीं चलना चाहिये।
  • हमारे यात्रा में जो भी श्रीवैष्णव हमारी संग करते है हमें उनका आभार प्रगट करना चाहिये। इसे तुच्छ समझना विरोधी है।
  • श्रीवैष्णवों को जब विदा करते है तो कुछ दूर तक उन्हें छोड़ने जाना चाहिये और तब तक प्रतिक्षा करनी चाहिये जब तक वें हमारी आँखों से ओझल न हो जाये। घर के दरवाजे से उन्हें विदा करना अनुचित है। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वज यह समझाते थे कि गाँव के नदी के तट तक श्रीवैष्णवों को पहूंचाने जाना चाहिये जो गाँव से बाहर होती है।
  • जब आचार्य या श्रीवैष्णव भागवत जन पधारते है, तो हमें स्वयं को आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहिये। हम जहाँ हैं वहाँ बैठे रहे तो यह ठीक नहीं है।
  • सांसारियों के साथ व्यवहार करते समय जब वें आते या जाते हैं उनके प्रति अधिक विचार करना यह ठीक नहीं है।
  • सांसारिक लाभ के कारण हमें सासारियों के तिरुमाली में नहीं जाना चाहिये।
  • दिव्य देशों को “उगन्तु अरुलिन निलंगल” से जाना जाता है – भगवान यहाँ स्वयं बहुत अनुकम्पा से अवतरित हुए है – यह वो मन्दिर है जिसकी आल्वारों द्वारा बहुत स्तुति कि गयी है। आचार्यों को भी कुछ क्षेत्रों पर बहुत विशेष लगाव था ऐसे स्थानों को अभिमान स्थल कहते है (श्रीरामानुज स्वामीजी को तिरुनारायणपुरम के प्रति बहुत लगाव था, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को राजा मन्नार कोईल के प्रति बहुत लगाव था आदि)। अगर कोई ऐसे स्थानों पर जाता है तो अपना बहुत समय भगवान कि स्तुति और पुजा करते हुए बिताना चाहिये। केवल वहाँ घुमना अच्छा रवैया नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: तीर्थ यात्री का मूल उद्देश वहाँ जाकर भगवान कि पुजा करना और महान श्रीवैष्णवों को मिलकर उनका संग गृहण करना है।
  • शारीरिक सम्बन्धियों के यहाँ केवल शरीर सम्बन्ध के कारण कोई कार्य / उत्सव में जाना विरोधी है।
  • श्रीवैष्णवों के यहाँ कोई कार्य / उत्सव मे जाने से बचना जो पूर्णत: कैंकर्य के लिये समर्पित हो विरोधी है।
  • भगवान सभी के हृदय में अंतर्यामी रूप में विराजमान है। इसलिये हमें उतावला होकर नहीं चलना चाहिये और अंतर्यामी भगवान में विघ्न नहीं डालना चाहिये। हमें अपनी चाल में नम्र होना चाहिये ताकि दूसरों को तकलीफ न हो। अनुवादक टिप्पणी: श्रीप्रह्लादजी के चरित्र में यह कहा गया है कि जब उन्हें पहाड़ के उपर से निचे फेंका गया था तो उन्होंने अपने हृदय को बहुत दृढ़ता से पकड़ लिया था ताकि हृदय में विराजमान भगवान को कोई चोट न लगे। यहीं भाव हमारा भी होना चाहिये।
  • हमें निरन्तर सदाचार्य के पिछे जाना चाहिये (सदाचार्य वह है जिन्होने हमारा पञ्च संस्कार किया हो या फिर हमें भगवद विषय में ज्ञान प्रदान किया हो) और उनकी अच्छी तरह सेवा करना चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला के ६४, ६५ और ६६वें पाशुर में इस तत्त्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते है। कृपया इन्हें पढे और इसे स्पष्ट कर ले। अनुवादक टिप्पणी: ६४वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि जब तक आचार्य इस संसार में है तब तक शिष्य को अपने आचार्य कि निरन्तर सेवा करनी चाहिये और यह कहते है कोई भी इससे कैसे बच सकता है। ६५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य कि ज़िम्मेदारी शिष्य का ध्यान रखना है और शिष्य कि ज़िम्मेदारी यह है कि अपने आचार्य कि सांसारिक जरूरत कि वस्तुएं का खयाल रखना है और यह भी कहते है कि इस तत्त्व को समझना और पालन करना बहुत कठिन है। ६६वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी के बारें में यह दर्शाते है कि वे श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी के ऐसे शिष्य थे कि उनकी निरन्तर सेवा करते थे और उनकी सेवा हेतु उन्होंने परमपद को भी ठुकरा दिया और अपने हृदय को यही निर्देश देते है कि पूरी निष्ठा के साथ ऐसा ही भाव रखे।
  • किसी को भी भगवद / भागवत कैंकर्य छोड़ सांसारिक लाभ के पिछे नहीं भागना चाहिये।
  • सदाचार्य के व्यवस्था हेतु हमें हर समय रहना चाहिये – जब आचार्य जाने को कहे तभी जाना चाहिये और जब आचार्य आने को कहे तो आना चाहिये – उनसे कोई विरोध या सवाल नहीं करना चाहिये – हमे केवाल सदाचार्य का पालन करना चाहिये।
  • दिव्य प्रबन्ध कि गोष्ठी की सवारी में किसी को भी आगे नहीं जाना चाहिये – नम्र होकर पिछे रहना चाहिये। किसीको भी पिछे रहने से घबराना नहीं चाहिये और अंतिम पंक्ति में चलना चाहिये।
  • जो जल्दी नहीं चल सकते है ऐसे गोष्ठी में हमें उनकी मदद करनी चाहिये। जिन व्यक्ति को मदद कि जरूरत है उसे अंदेखा करना विरोधी है।
  • जब हम आचार्य कि कोई भी सहायता करते है तो हमें सभ्य रहना चाहिये। इसे हमें सामान्यतः नहीं लेना चाहिये।

३७) स्थिती विरोधीहमारे रहने में विरोधी (और आचरण)

स्थिती यानी अस्तित्व और बैठना भी। यह विषय यह समझता है कि हमें कैसे विभिन्न परिस्थितीयों में व्यवहार करना चाहिये। संसारी यानी वह जिसे स्वयं का सच्चा स्वभाव भी नहीं मालूम है (यानी भगवान और भागवतों का दास जैसे)। वह अच्छे खाना, कपड़े, आदि पर केन्द्रित करता है। इस विषय पर बाधा आनेवाले पर चर्चा करेंगे।

  • सांसारी के पहने हुए कपड़ों द्वारा छुवा जाना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन चरित्र कि एक घटना को हमने पढ़ा है जहाँ एक देवतान्तर भक्त के कपड़े स्वामीजी को छु जाते है और इसका प्रायश्चित्त स्वामीजी एक भागवत के श्रीपादतीर्थ लेकर करते है।
  • सांसारी के समान या वही आसान पर बैठना।
  • हमारे कपड़ों को श्रीवैष्णवों द्वारा स्पर्श कराना। अनुवादक टिप्पणी: हमें श्रीवैष्णव के निकट बहुत सावधानी से रहना चाहिये और उन्हें नहीं छुना चाहिये। वें भगवद, भागवत आचार्य के कोई कैंकर्य मे कार्यरत होंगे। उस समय हम बहुत मैले / दूषित हो सकते है – इसलिये हमें उन्हें छुने से बचना और उनकी पवित्रता को प्रदूषित करने से बचना चाहिये।
  • स्वयं को श्रीवैष्णवों के बराबर समझना और उनके साथ एक हीं आसान पर विराजमान होना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में स्वामी श्रीपिल्लै लोकाचार्यजी मुख्यत: एक अपचार को पहचानते है वह यह है की स्वयं को अन्य श्रीवैष्णव के बराबर समझना। हमें हमेशा नम्र रहना चाहिये और अन्य श्रीवैष्णव से नीचा समझना चाहिये।
  • हमें संसारीयों को हमसे बढ़कर नहीं समझना चाहिये और उनसे ऊपर के आसन पर भी नहीं विराजमान होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: संसारी यानी वह जो हमारे शारीरिक लगाव को अनेक तरीको से बढ़ाते है। संसारी हमारी प्रशंसा करते है तो उससे हमें बचना चाहिये और खुदको उनका दास समझना विरोधी है। एक वह जिसके फल स्वरूप किसी की संसारी वस्तुओं मे चाहना बढ़ती है और उसे संसार के जन्म मरण के सरकश पथ मे ही रखती है।
  • सांसारी जन रहनेवाले तिरुमाली में हमें नहीं रहना चाहिये।
  • हमें संसारीयों कि आने कि प्रतिक्षा नहीं करनी चाहिये यह सोच के साथ कि उनके आने से हमे लाभ होगा।
  • सांसारी के संग में किसी को नहीं रहना चाहिये।
  • सांसारीयों से भरे हुए स्थान में हमें नहीं रहना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों से भी नीचे स्थान पर विराजमान होने को अस्वीकार करना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों से निचले स्थान पर बहुत आनंद से विराजमान होना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों रहने कि तिरुमाली में रहने से डरना।
  • श्रीवैष्णवों के आने कि प्रतिक्षा को लज्जित समझना।
  • श्रीवैष्णवों के संग से दूर रहना।
  • श्रीवैष्णवों से भरे हुए स्थान में रहने से बचना।
  • उस स्थान में रहना जहाँ आचार्य या भगवान बाहर गये या सवारी में है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देशों आदि में यह देखा जाता है कि भगवान कि पालखी मन्दिर के गलियों में निरन्तर निकलती रहती है। भगवान कि यह हम जीव पर निर्हेतुक कृपा है कि वह स्वयं बाहर आकर हम पर कृपा करते है (जो वृद्ध, बिमार, अपंग, आदि है और मन्दिर नहीं जा सकते है)। जब भगवान कि सवारी हमारे तिरुमाली के सामने आती है तो उनके आने से पहिले हमें बाहर आकर उनके आने का स्वागत करना चाहिये (पुष्प, फल आदि को अर्पित कर)।

आदि केशव पेरूमाल, श्रीदेवी और भू देवी संग – भूतपुरी में पुरप्पाडु के समय

  • आचार्य और श्रीवैष्णवों को देखते ही हमें उसी क्षण साष्टांग दण्डवत कर उनका सम्मान करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • इसके विपरीत अगर कोई संसारी आता है और बहुत नजदीक वाले है तो भी हमें उनका भव्य स्वागत करने कि कोई जरूरत नहीं है। अनुवादक टिप्पणी:योनित्य …” श्रीरामानुज स्वामीजी की इन तनियन को याद करना चाहिये, जहाँ यह बताया गया है कि श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान के चरण कमलों के अलावा सभी कुछ को तिनके के समान मानते थे।
  • आचार्य और श्रीवैष्णवों के आगमन पर सामान्य रहना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के आगमन पर हमें उत्साहित होना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि उनका पूरा ध्यान रखा गया है।
  • जब भगवान का तिरुवाराधन चल रहा हो और कोई श्रीवैष्णव पधारते है तो उसी समय तिरुवाराधन को विराम कर श्रीवैष्णव का सत्कार करना चाहिये, उनके बारें मे पूछना, उनके आराम से ठहरने कि व्यवस्था करना और तत्पश्चात फिर से तिरुवाराधन प्रारम्भ करना चाहिये। हम भगवान के तिरुवाराधन मे व्यस्त है ऐसे बताकर श्रीवैष्णवों को प्रतिक्षा नहीं करानी चाहिये। यह समझना अति आवश्यक है कि भागवत आराधना भगवद आराधना से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • जब हम एक श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर रहे हो तो कोई दूसरे श्रीवैष्णव वहाँ पधारते है तो हमें पहिले श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना अधुरा नहीं छोड़ना चाहिये। हमें उन दूसरे पधारे हुए श्रीवैष्णव से विनम्र निवेदन कर उन्हें रुकने के लिये प्रार्थना करनी चाहिये और पहिले श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर फिर दूसरे श्रीवैष्णव से ग्रहण करना चाहिये।
  • श्रीवैष्णव जो अपना श्रीपादतीर्थ प्रदान कर रहे हो तो उन्हें भी सहयोग करना चाहिये और मध्य में नहीं छोड़ना चाहिये।
  • जंगमा विमानम् यानि चलनशील वस्तु – जो उत्सवों में और श्रीवैष्णवों (जो भगवान को अपने हृदय में रखते है) में दोनों वाहनों को दर्शाता है ,अजंगमा विमानम् यानि अचलनशील वस्तु – मन्दिर में गरुड स्तम्भ। हमें इन दोनों वस्तु कि परछाई के ऊपर पैर रखकर नहीं जाना चाहिये।
  • हमें इस तरह नहीं खड़ा होना चाहिये कि देवतान्तर मन्दिर कि परछाई या उनके गोपुर कि परछाई हमारे उपर पड़े।
  • देवतान्तर को प्रिय पेड़ के छाव में भी हमें नहीं रुकना चाहिये (उदाहरण नीम का पेड़)। श्रीशठकोप स्वामीजी को प्रिय इमली के पेड़ की छाव में रह सकते है।
  • देवतान्तर के स्थान और उनके प्रिय स्थान में नहीं रहना चाहिये।
  • भागवतों कि तिरुमाली छोड़ अवैष्णवों कि तिरुमाली में नहीं रुकना चाहिये। अवैष्णवों कि तिरुमाली को टालना बहुत अच्छी बात है। अनुवादक टिप्पणी: इस तत्त्व को महाभारत के एक घटना से सीख सकते है। जब भगवान कृष्ण, दुर्योधन के पास दूत बनकर जाते है तो वह दुर्योधन, भीष्म और द्रोणाचार्य कि तिरुमाली छोड़ विदूरजी कि तिरुमाली में जाते है जो उनके एक बहुत बड़े भक्त थे। दुर्योधन के पूछने पर भगवान कृष्ण यह उत्तर देते है कि “क्योंकि पाण्डव मुझे प्रिय है तो में उनको न चाहनेवालों कि तिरुमाली में नहीं रुक सकता” – भगवान स्वयं भागवतों के यहाँ ठहरने कि इच्छा रखते है और इस तत्त्व को समझाते है।
  • जब आचार्य खड़े हो तो शिष्य को नहीं बैठना चाहिये।
  • जब आचार्य चल रहे तो हमको नहीं बैठना चाहिये। हमें भी आचार्य के साथ चलना चाहिये और उनको अगर कोई सहायता कि आवश्यकता है तो उसे पूर्ण करनी चाहिये।
  • जब आचार्य शिष्य को खड़े होने का आदेश करते है और फिर भी हम उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते है तो यह गलत स्वभाव है।
  • भगवद, भागवत और आचार्य के दिशा में पैर पसारना तो पूर्णत: असभ्य है।
  • मंदिरों में भी जब श्रीवैष्णव जन पधारते है तो हमें खड़े होकर उनका सन्मान करना चाहिये। श्रीवैष्णवों को मन्दिर में आते देखकर भी बैठना असभ्य है।
  • भगवान और भागवतों के सन्मुख हमें आंखें बन्द कर ध्यान में नहीं बैठना चाहिये। हमें आंखें खोलकर भगवान कि सुन्दरता को निहारना चाहिये और भागवतों कि सुंदर उपस्थिती को चखना चाहिये। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन कि एक घटना है जहाँ स्वामीजी एक बार यह देखते है कि कोई आंखें बन्द कर भगवान के सामने उनकी प्रार्थना कर रहा है और वह उसके प्रति दु:ख प्रगट करते है और कहते है कि वह आंखें बन्द कर भगवान के सुन्दर भव्य दर्शन को खो रहा है। आगे यह भी कहा गया है कि वह मनुष्य अपनी आंखें खो बैठता है।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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