विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ८

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देख सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ७


३६) गति विरोधी – चलने (और अन्य कार्य में) में बाधाएं

सामान्यता गति यानी चलना (गमनम् पर आधारित- जाना), उस पथ पर (जैसे अर्चिरादिक गति – परमपदधाम जाने का उज्ज्वल पथ) और शरण लेने वाला (जैसे अगति – वह जिसके पास कोई शरण न हो)। इस विषय में हमें श्रीवैष्णवों (वह जिसने आचार्य कृपा द्वारा भगवान कि शरण ली है), को संसारियों (भौतिक विचारों वाले लोग), आदि के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये यह चर्चा कि गयी है। हमने पहिले श्रीवैष्णव, मुमुक्षु, संसारी आदि के विषय में चर्चा कि है।

  • श्रीवैष्णव द्वारा उपयोगी बिस्तर पर चलना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव द्वारा जो भी वस्तु उपयोग किया गया है, उसे पवित्र मानना और उसका सम्मान करना चाहिये। हमारे परम्परा में किसी भी वस्तु पर चलना पाप माना गया है। परन्तु अन्य सभ्यता में पैर उपर रखना, पैरों से वस्तुओ को आगे / पिछे करना, आदि इसे सामान्य माना गया है। हमारे सभ्यता में दूसरों को पैर लगाना अपमान माना गया है।
  • हमारे निकट आने वाले श्रीवैष्णवों को रोकना, उनका अनादर माना जाता है। हमारे निकट आते ही, हमें मान तजकर, उन्हें साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना चाहिये और स्वयं आगे बढ़ना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह दर्शाया गया है कि जब भी एक श्रीवैष्णव दूसरे श्रीवैष्णव को मिलते है तो दोनों को एक दूसरे को लम्बी साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना चाहिये परन्तु आज कल यह सभ्यता लुप्त होती जा रही है।
  • पिछले विषय के विपरीत संसारी के प्रति नम्र होना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्यों ने यह समझाया है कि सांसारीयों के प्रति बहुत लगाव रखने से संसार में फँसे रहेंगे – इसलिये उनके प्रति अधिक लगाव होने से हमारी आध्यात्मिक उन्नती कम हो जायेगी।
  • भगवान के मंदिरों के गोपुरों, विमान को देखते ही हमें उसकी पुजा करनी चाहिये और उसकी सुन्दरता को निरखना चाहिये। ध्यान न देना या जल्दी वहाँ से निकल जाना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: पेरिय तिरुमौली के एक पाशुर की व्याख्या में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै एक घटना बताते है, जहाँ श्रीवेदांति स्वामीजी कहते है कि उन्होंने यह देखा कि श्रीपिल्लै तिरुनारैयूर अरयर और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी मन्दिर कि प्रदीक्षणा लगाते हुए मन्दिर के गोपुर, श्रीवैष्णवों कि तिरुमाली आदि कि प्रशंसा करते थे।
  • अन्य देवताओं के मन्दिर के गोपुर, विमान आदि को देखते ही श्रीवैष्णवों को वहाँ से तुरन्त निकल जाना चाहिये नाकि वहाँ रहकर उनकी पुजा करें या उनको स्पर्श करें। ऐसा करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: इससे आधारित श्रीसहस्त्रगीति के अपने ईडु व्याख्या पर श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी एक घटना बताते है। धनुर्दास स्वामीजी के भतीजे वण्डर और चोण्डर एक दिन श्रीअगलंगा नाट्टाझवान के साथ घुम रहे थे। उन्हें सताने के लिये श्रीअगलंगा नाट्टाझवान ने उन्हें एक जैन मन्दिर दिखाकर भगवान का मन्दिर कहा और प्रणाम करने को कहा। उन्होंने उनकी आज्ञा का पालन किया परन्तु जब उन्हें पता चला कि यह जैन मन्दिर है वह मूर्छित हो गये। यह सुनकर धनुर्दास स्वामीजी वहाँ आकर अपना चरण रज देते है और उसे उन पर लगाने के पश्चात वें उठाते है।
  • भगवान का मन्दिर देख सभी को, घड़ी के कांटे के जैसे चलते है वैसे प्रदक्षीणा लगानी चाहिये। विपरित दिशा में जाना विरोधी है।
  • कहीं जाते समय अगर कोई भागवत दिव्य प्रबन्ध आदि का पाठ कर रहे हो तो हमें रुककर उसे सुनकर और धीरे से वहाँ से जाना चाहिये। इस समय जल्दी से वहाँ से निकल जाना उचित नहीं होगा।
  • सांसारिक विषयों कि जहां चर्चा हो रही हो तो वहाँ से कान बन्द कर तुरन्त निकल जाना चाहिये।
  • आचार्य या श्रीवैष्णवों के साथ चलते समय उनकी परछाई पर कदम नहीं रखना चाहिये।
  • हमें इस तरह चलना चाहिये कि हमारी परछाई भी उन पर न गिरे।
  • हमें इसका भी ध्यान रखना चाहिये कि हमारी परछाई संसारीयों पर न पड़े और सांसारियों कि परछाई हम पर न पड़े।
  • भगवद, भागवतों के लिये कुछ भी सामाग्री लाने के लिये जाये तो ब्रम्हा, शिव आदि के तिरुमाली के निकट से भी नहीं गुजरना चाहिये। शाण्डिल्य स्मृति यह समझाता है कि उनकी तिरुमाली स्मशान के जैसे है।
  • पुजा के लिये उपयोग हेतु सामाग्री पर पैर रखना देवतान्तर के समान है और इसे असौच मानना चाहिये और इसे नहीं करना चाहिये।
  • हमें अवैष्णवों कि संगत में नहीं चलना चाहिये।
  • हमारे यात्रा में जो भी श्रीवैष्णव हमारी संग करते है हमें उनका आभार प्रगट करना चाहिये। इसे तुच्छ समझना विरोधी है।
  • श्रीवैष्णवों को जब विदा करते है तो कुछ दूर तक उन्हें छोड़ने जाना चाहिये और तब तक प्रतिक्षा करनी चाहिये जब तक वें हमारी आँखों से ओझल न हो जाये। घर के दरवाजे से उन्हें विदा करना अनुचित है। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वज यह समझाते थे कि गाँव के नदी के तट तक श्रीवैष्णवों को पहूंचाने जाना चाहिये जो गाँव से बाहर होती है।
  • जब आचार्य या श्रीवैष्णव भागवत जन पधारते है, तो हमें स्वयं को आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहिये। हम जहाँ हैं वहाँ बैठे रहे तो यह ठीक नहीं है।
  • सांसारियों के साथ व्यवहार करते समय जब वें आते या जाते हैं उनके प्रति अधिक विचार करना यह ठीक नहीं है।
  • सांसारिक लाभ के कारण हमें सासारियों के तिरुमाली में नहीं जाना चाहिये।
  • दिव्य देशों को “उगन्तु अरुलिन निलंगल” से जाना जाता है – भगवान यहाँ स्वयं बहुत अनुकम्पा से अवतरित हुए है – यह वो मन्दिर है जिसकी आल्वारों द्वारा बहुत स्तुति कि गयी है। आचार्यों को भी कुछ क्षेत्रों पर बहुत विशेष लगाव था ऐसे स्थानों को अभिमान स्थल कहते है (श्रीरामानुज स्वामीजी को तिरुनारायणपुरम के प्रति बहुत लगाव था, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को राजा मन्नार कोईल के प्रति बहुत लगाव था आदि)। अगर कोई ऐसे स्थानों पर जाता है तो अपना बहुत समय भगवान कि स्तुति और पुजा करते हुए बिताना चाहिये। केवल वहाँ घुमना अच्छा रवैया नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: तीर्थ यात्री का मूल उद्देश वहाँ जाकर भगवान कि पुजा करना और महान श्रीवैष्णवों को मिलकर उनका संग गृहण करना है।
  • शारीरिक सम्बन्धियों के यहाँ केवल शरीर सम्बन्ध के कारण कोई कार्य / उत्सव में जाना विरोधी है।
  • श्रीवैष्णवों के यहाँ कोई कार्य / उत्सव मे जाने से बचना जो पूर्णत: कैंकर्य के लिये समर्पित हो विरोधी है।
  • भगवान सभी के हृदय में अंतर्यामी रूप में विराजमान है। इसलिये हमें उतावला होकर नहीं चलना चाहिये और अंतर्यामी भगवान में विघ्न नहीं डालना चाहिये। हमें अपनी चाल में नम्र होना चाहिये ताकि दूसरों को तकलीफ न हो। अनुवादक टिप्पणी: श्रीप्रह्लादजी के चरित्र में यह कहा गया है कि जब उन्हें पहाड़ के उपर से निचे फेंका गया था तो उन्होंने अपने हृदय को बहुत दृढ़ता से पकड़ लिया था ताकि हृदय में विराजमान भगवान को कोई चोट न लगे। यहीं भाव हमारा भी होना चाहिये।
  • हमें निरन्तर सदाचार्य के पिछे जाना चाहिये (सदाचार्य वह है जिन्होने हमारा पञ्च संस्कार किया हो या फिर हमें भगवद विषय में ज्ञान प्रदान किया हो) और उनकी अच्छी तरह सेवा करना चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला के ६४, ६५ और ६६वें पाशुर में इस तत्त्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते है। कृपया इन्हें पढे और इसे स्पष्ट कर ले। अनुवादक टिप्पणी: ६४वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि जब तक आचार्य इस संसार में है तब तक शिष्य को अपने आचार्य कि निरन्तर सेवा करनी चाहिये और यह कहते है कोई भी इससे कैसे बच सकता है। ६५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य कि ज़िम्मेदारी शिष्य का ध्यान रखना है और शिष्य कि ज़िम्मेदारी यह है कि अपने आचार्य कि सांसारिक जरूरत कि वस्तुएं का खयाल रखना है और यह भी कहते है कि इस तत्त्व को समझना और पालन करना बहुत कठिन है। ६६वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी के बारें में यह दर्शाते है कि वे श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी के ऐसे शिष्य थे कि उनकी निरन्तर सेवा करते थे और उनकी सेवा हेतु उन्होंने परमपद को भी ठुकरा दिया और अपने हृदय को यही निर्देश देते है कि पूरी निष्ठा के साथ ऐसा ही भाव रखे।
  • किसी को भी भगवद / भागवत कैंकर्य छोड़ सांसारिक लाभ के पिछे नहीं भागना चाहिये।
  • सदाचार्य के व्यवस्था हेतु हमें हर समय रहना चाहिये – जब आचार्य जाने को कहे तभी जाना चाहिये और जब आचार्य आने को कहे तो आना चाहिये – उनसे कोई विरोध या सवाल नहीं करना चाहिये – हमे केवाल सदाचार्य का पालन करना चाहिये।
  • दिव्य प्रबन्ध कि गोष्ठी की सवारी में किसी को भी आगे नहीं जाना चाहिये – नम्र होकर पिछे रहना चाहिये। किसीको भी पिछे रहने से घबराना नहीं चाहिये और अंतिम पंक्ति में चलना चाहिये।
  • जो जल्दी नहीं चल सकते है ऐसे गोष्ठी में हमें उनकी मदद करनी चाहिये। जिन व्यक्ति को मदद कि जरूरत है उसे अंदेखा करना विरोधी है।
  • जब हम आचार्य कि कोई भी सहायता करते है तो हमें सभ्य रहना चाहिये। इसे हमें सामान्यतः नहीं लेना चाहिये।

३७) स्थिती विरोधीहमारे रहने में विरोधी (और आचरण)

स्थिती यानी अस्तित्व और बैठना भी। यह विषय यह समझता है कि हमें कैसे विभिन्न परिस्थितीयों में व्यवहार करना चाहिये। संसारी यानी वह जिसे स्वयं का सच्चा स्वभाव भी नहीं मालूम है (यानी भगवान और भागवतों का दास जैसे)। वह अच्छे खाना, कपड़े, आदि पर केन्द्रित करता है। इस विषय पर बाधा आनेवाले पर चर्चा करेंगे।

  • सांसारी के पहने हुए कपड़ों द्वारा छुवा जाना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन चरित्र कि एक घटना को हमने पढ़ा है जहाँ एक देवतान्तर भक्त के कपड़े स्वामीजी को छु जाते है और इसका प्रायश्चित्त स्वामीजी एक भागवत के श्रीपादतीर्थ लेकर करते है।
  • सांसारी के समान या वही आसान पर बैठना।
  • हमारे कपड़ों को श्रीवैष्णवों द्वारा स्पर्श कराना। अनुवादक टिप्पणी: हमें श्रीवैष्णव के निकट बहुत सावधानी से रहना चाहिये और उन्हें नहीं छुना चाहिये। वें भगवद, भागवत आचार्य के कोई कैंकर्य मे कार्यरत होंगे। उस समय हम बहुत मैले / दूषित हो सकते है – इसलिये हमें उन्हें छुने से बचना और उनकी पवित्रता को प्रदूषित करने से बचना चाहिये।
  • स्वयं को श्रीवैष्णवों के बराबर समझना और उनके साथ एक हीं आसान पर विराजमान होना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में स्वामी श्रीपिल्लै लोकाचार्यजी मुख्यत: एक अपचार को पहचानते है वह यह है की स्वयं को अन्य श्रीवैष्णव के बराबर समझना। हमें हमेशा नम्र रहना चाहिये और अन्य श्रीवैष्णव से नीचा समझना चाहिये।
  • हमें संसारीयों को हमसे बढ़कर नहीं समझना चाहिये और उनसे ऊपर के आसन पर भी नहीं विराजमान होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: संसारी यानी वह जो हमारे शारीरिक लगाव को अनेक तरीको से बढ़ाते है। संसारी हमारी प्रशंसा करते है तो उससे हमें बचना चाहिये और खुदको उनका दास समझना विरोधी है। एक वह जिसके फल स्वरूप किसी की संसारी वस्तुओं मे चाहना बढ़ती है और उसे संसार के जन्म मरण के सरकश पथ मे ही रखती है।
  • सांसारी जन रहनेवाले तिरुमाली में हमें नहीं रहना चाहिये।
  • हमें संसारीयों कि आने कि प्रतिक्षा नहीं करनी चाहिये यह सोच के साथ कि उनके आने से हमे लाभ होगा।
  • सांसारी के संग में किसी को नहीं रहना चाहिये।
  • सांसारीयों से भरे हुए स्थान में हमें नहीं रहना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों से भी नीचे स्थान पर विराजमान होने को अस्वीकार करना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों से निचले स्थान पर बहुत आनंद से विराजमान होना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों रहने कि तिरुमाली में रहने से डरना।
  • श्रीवैष्णवों के आने कि प्रतिक्षा को लज्जित समझना।
  • श्रीवैष्णवों के संग से दूर रहना।
  • श्रीवैष्णवों से भरे हुए स्थान में रहने से बचना।
  • उस स्थान में रहना जहाँ आचार्य या भगवान बाहर गये या सवारी में है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देशों आदि में यह देखा जाता है कि भगवान कि पालखी मन्दिर के गलियों में निरन्तर निकलती रहती है। भगवान कि यह हम जीव पर निर्हेतुक कृपा है कि वह स्वयं बाहर आकर हम पर कृपा करते है (जो वृद्ध, बिमार, अपंग, आदि है और मन्दिर नहीं जा सकते है)। जब भगवान कि सवारी हमारे तिरुमाली के सामने आती है तो उनके आने से पहिले हमें बाहर आकर उनके आने का स्वागत करना चाहिये (पुष्प, फल आदि को अर्पित कर)।

आदि केशव पेरूमाल, श्रीदेवी और भू देवी संग – भूतपुरी में पुरप्पाडु के समय

  • आचार्य और श्रीवैष्णवों को देखते ही हमें उसी क्षण साष्टांग दण्डवत कर उनका सम्मान करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • इसके विपरीत अगर कोई संसारी आता है और बहुत नजदीक वाले है तो भी हमें उनका भव्य स्वागत करने कि कोई जरूरत नहीं है। अनुवादक टिप्पणी:योनित्य …” श्रीरामानुज स्वामीजी की इन तनियन को याद करना चाहिये, जहाँ यह बताया गया है कि श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान के चरण कमलों के अलावा सभी कुछ को तिनके के समान मानते थे।
  • आचार्य और श्रीवैष्णवों के आगमन पर सामान्य रहना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के आगमन पर हमें उत्साहित होना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि उनका पूरा ध्यान रखा गया है।
  • जब भगवान का तिरुवाराधन चल रहा हो और कोई श्रीवैष्णव पधारते है तो उसी समय तिरुवाराधन को विराम कर श्रीवैष्णव का सत्कार करना चाहिये, उनके बारें मे पूछना, उनके आराम से ठहरने कि व्यवस्था करना और तत्पश्चात फिर से तिरुवाराधन प्रारम्भ करना चाहिये। हम भगवान के तिरुवाराधन मे व्यस्त है ऐसे बताकर श्रीवैष्णवों को प्रतिक्षा नहीं करानी चाहिये। यह समझना अति आवश्यक है कि भागवत आराधना भगवद आराधना से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • जब हम एक श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर रहे हो तो कोई दूसरे श्रीवैष्णव वहाँ पधारते है तो हमें पहिले श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना अधुरा नहीं छोड़ना चाहिये। हमें उन दूसरे पधारे हुए श्रीवैष्णव से विनम्र निवेदन कर उन्हें रुकने के लिये प्रार्थना करनी चाहिये और पहिले श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर फिर दूसरे श्रीवैष्णव से ग्रहण करना चाहिये।
  • श्रीवैष्णव जो अपना श्रीपादतीर्थ प्रदान कर रहे हो तो उन्हें भी सहयोग करना चाहिये और मध्य में नहीं छोड़ना चाहिये।
  • जंगमा विमानम् यानि चलनशील वस्तु – जो उत्सवों में और श्रीवैष्णवों (जो भगवान को अपने हृदय में रखते है) में दोनों वाहनों को दर्शाता है ,अजंगमा विमानम् यानि अचलनशील वस्तु – मन्दिर में गरुड स्तम्भ। हमें इन दोनों वस्तु कि परछाई के ऊपर पैर रखकर नहीं जाना चाहिये।
  • हमें इस तरह नहीं खड़ा होना चाहिये कि देवतान्तर मन्दिर कि परछाई या उनके गोपुर कि परछाई हमारे उपर पड़े।
  • देवतान्तर को प्रिय पेड़ के छाव में भी हमें नहीं रुकना चाहिये (उदाहरण नीम का पेड़)। श्रीशठकोप स्वामीजी को प्रिय इमली के पेड़ की छाव में रह सकते है।
  • देवतान्तर के स्थान और उनके प्रिय स्थान में नहीं रहना चाहिये।
  • भागवतों कि तिरुमाली छोड़ अवैष्णवों कि तिरुमाली में नहीं रुकना चाहिये। अवैष्णवों कि तिरुमाली को टालना बहुत अच्छी बात है। अनुवादक टिप्पणी: इस तत्त्व को महाभारत के एक घटना से सीख सकते है। जब भगवान कृष्ण, दुर्योधन के पास दूत बनकर जाते है तो वह दुर्योधन, भीष्म और द्रोणाचार्य कि तिरुमाली छोड़ विदूरजी कि तिरुमाली में जाते है जो उनके एक बहुत बड़े भक्त थे। दुर्योधन के पूछने पर भगवान कृष्ण यह उत्तर देते है कि “क्योंकि पाण्डव मुझे प्रिय है तो में उनको न चाहनेवालों कि तिरुमाली में नहीं रुक सकता” – भगवान स्वयं भागवतों के यहाँ ठहरने कि इच्छा रखते है और इस तत्त्व को समझाते है।
  • जब आचार्य खड़े हो तो शिष्य को नहीं बैठना चाहिये।
  • जब आचार्य चल रहे तो हमको नहीं बैठना चाहिये। हमें भी आचार्य के साथ चलना चाहिये और उनको अगर कोई सहायता कि आवश्यकता है तो उसे पूर्ण करनी चाहिये।
  • जब आचार्य शिष्य को खड़े होने का आदेश करते है और फिर भी हम उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते है तो यह गलत स्वभाव है।
  • भगवद, भागवत और आचार्य के दिशा में पैर पसारना तो पूर्णत: असभ्य है।
  • मंदिरों में भी जब श्रीवैष्णव जन पधारते है तो हमें खड़े होकर उनका सन्मान करना चाहिये। श्रीवैष्णवों को मन्दिर में आते देखकर भी बैठना असभ्य है।
  • भगवान और भागवतों के सन्मुख हमें आंखें बन्द कर ध्यान में नहीं बैठना चाहिये। हमें आंखें खोलकर भगवान कि सुन्दरता को निहारना चाहिये और भागवतों कि सुंदर उपस्थिती को चखना चाहिये। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन कि एक घटना है जहाँ स्वामीजी एक बार यह देखते है कि कोई आंखें बन्द कर भगवान के सामने उनकी प्रार्थना कर रहा है और वह उसके प्रति दु:ख प्रगट करते है और कहते है कि वह आंखें बन्द कर भगवान के सुन्दर भव्य दर्शन को खो रहा है। आगे यह भी कहा गया है कि वह मनुष्य अपनी आंखें खो बैठता है।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/01/virodhi-pariharangal-8.html

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