श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका- पञ्च संस्कार

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका

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4.1 pancha-samskAramश्रीरामानुज स्वामीजी को पञ्च संस्कार प्रदान करते हुए श्रीमहापूर्ण स्वामीजी

हम श्रीवैष्णव कैसे बनते है?

हमारे पूर्वाचार्यो के अनुसार, एक क्रिया-विधि है, जिसके द्वारा श्रीवैष्णव बना जाता है। इस विधि को “पञ्च संस्कार” (संप्रदाय में दीक्षा) कहा जाता है।

संस्कार अर्थात शुद्ध/ सात्विक होने की प्रक्रिया। यह ऐसी विधि है, जो जीव को अयोग्य अवस्था से योग्य अवस्था में परिवर्तित करती है। इसी विधि के द्वारा ही हम प्रथम बार एक श्रीवैष्णव बनते है। जिस प्रकार ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने से ब्रह्म यज्ञ विधि द्वारा ब्राह्मण बनना सुलभ हो जाता है, उसी प्रकार श्रीवैष्णव परिवार में जन्म लेने से पञ्च संस्कार विधि द्वारा श्रीवैष्णव बनना सुलभ हो जाता है। ब्राह्मण कुटुम्भ के परिपेक्ष्य में यहाँ अधिक सुंदरता इस बात में है कि, श्रीवैष्णव अनुयायी बनने के लिए श्रीवैष्णव परिवार में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं है – क्यूंकि श्रीवैष्णवं आत्मा से सम्बंधित है, यद्यपि ब्राह्मण्यं शरीर से सम्बंधित है। जाति, समाज, देश, लिंग, आर्थिक स्थिति, कुटुम्भ, आदि पर आधारित कोई भेद नहीं है – जो भी इस मोक्ष के मार्ग पर आने की इच्छा करता है, उसे इस पथ में सम्मिलित किया जा सकता है। श्रीवैष्णव बनने के उपरान्त, देवान्तर (ब्रह्मा, शिव, दुर्गा, सुब्रमण्य, इंद्र, वरुण, आदि देवी-देवता, जिनका नियंत्रण भगवान करते है) और उनसे सम्बंधित सभी वस्तुओं से संपूर्णतः संबंध त्याग करना श्रीवैष्णव के लिए बहुत आवश्यक है।

पञ्च संस्कार

पञ्च संस्कार (समाश्रयं), किसी मनुष्य को कैंकर्य (इस संसार और परमपद) के लिए तैयार करने की परिशोधक प्रक्रिया है, जो शास्त्रों में समझायी गयी है। यह श्लोक, पञ्च संस्कार के विभिन्न पक्षों को समझाता है – “ताप: पुण्ड्र: तथा नाम: मंत्रो यागश्च पंचम:”। इसके अंतर्गत निम्न पांच क्रियाओं का अनुसरण किया जाता है:

  • ताप शंख चक्र लांचन – हमारे कन्धों/ बाहू पर शंक और चक्र की गर्म छाप। यह दर्शाता है कि हम भगवान की संपत्ति है –उसी प्रकार जैसे एक पात्र पर उसके स्वामी के चिह्न अंकित किये जाते है, हमें भगवान के चिह्नों से अंकित किया जाता है।
  • पुण्ड्र (चिह्न) – द्वादश ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करना – शरीर के द्वादश (12) स्थानों पर ऊर्ध्व पुण्ड्र (तिरुमण और श्रीचुर्ण) धारण करना।
  • नामदास्य नाम  आचार्य द्वारा प्रदत्त नया दास्य नाम (रामानुजदास, मधुरकविदास, श्रीवैष्णव दास)।
  • मंत्रमंत्रोपदेश आचार्य से रहस्य मंत्र का ज्ञान प्राप्त करना; मंत्र अर्थात वह जिसके ध्यान करने वाले को सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है – तिरुमंत्र, द्वयं और चरम श्लोक जो हमें संसार से मुक्ति प्रदान करते है। अधिक जानकारी के लिए कृपया http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/rahasya-thrayam.html पर देखें।
  • याग – देव पूजा – तिरुवाराधना/ पूजा विधि का ज्ञान प्राप्त करना।

योग्यतायें

अकिंचयम् (स्वयं को पुर्णतः असमर्थ/ अयोग्य/ अपात्र मानना) और अनन्य गतित्व (और कोई गति न होना), ये दो मुख्य शर्तें है, जो भगवान के प्रति समर्पण करने से पूर्व होना आवश्यक है। मात्र इसी स्थिति में, वह संपूर्णतः भगवान के प्रति समर्पित हो सकेगा और भगवान द्वारा स्वयं के उद्धार के लिए आश्वस्त होगा।

पञ्च संस्कार के उद्देश्य

  • जैसा की शास्त्र कहते है, “तत्व ज्ञानान् मोक्ष लाभ: अर्थात ब्रह्म के विषय में सच्चा ज्ञान प्राप्त करके ही, मोक्ष प्राप्त होता है। आचार्य से अमूल्य अर्थ पंचक (ब्रह्मं – भगवान, जीवात्मा – आत्मा, उपाय – भगवान को प्राप्त करने के साधन, उपेय – लक्ष्य/ परिणाम, विरोधी – उन लक्ष्य को प्राप्त करने में आने वाली बाधाएं), जो मंत्र उपदेश का अंग है, के विषय में ज्ञान प्राप्त करके, हम चरम लक्ष्य अर्थात नित्य विभूति में श्रिय:पति के प्रति कैंकर्य, को प्राप्त करने के योग्य बन सकेंगे। सच्चा ज्ञान यह स्वीकार करना है कि हम संपूर्णतः भगवान के प्रति समर्पित/ आश्रित है।
  • अपने आचार्य और श्रीवैष्णवों (अनेकों प्रकार से) के प्रति कैंकर्य करते रहना और अर्चावतार भगवान का घर में तिरुवाराधन द्वारा और दिव्य देशों में कैंकर्य करते रहना ही इस जीवन का उदेश्य है।
  • इस महान सन्देश को अन्य लोगों में उनके आध्यात्मिक लाभ के लिए प्रचार करना भी महत्वपूर्ण है। श्रीरामानुज स्वामीजी, अपने मुख्य उपदेशों में, प्रथम हमें श्रीभाष्य, तिरुवाय्मौली सिखने और अन्य को भी सिखाने का आदेश करते है।

यहाँ, जीवात्मा और परमात्मा से दिव्य मिलन का प्रबंध आचार्य करते है। यद्यपि हमें समय समय पर प्रपन्न भी कहा जाता है, परंतु सच्चे संदर्भ में, श्रीरामानुज स्वामीजी और हमारे सभी पूर्वाचार्यों ने हमें समझाया है कि हम आचार्य निष्ठ है अर्थात जो संपूर्णतः आचार्य को समर्पित/ आश्रित है। इस पञ्च संस्कार विधि को जीवात्मा के लिए सच्चा जन्म भी कहा जाता है, क्यूंकि इसी समय, जीवात्मा अपने सच्चे स्वरुप के विषय में ज्ञान प्राप्त करती है और भगवान के प्रति संपूर्ण समर्पण करती है। इस दिव्य संबंध के कारण, जो पति (परमात्मा) और पत्नी (जीवात्मा) के मध्य संबंधों के समान है, यहाँ अन्य देवताओं को जड़- मूल से त्यागने पर निरंतर महत्त्व दिया गया है।

इसलिए जैसा की यहाँ समझाया गया है, इस लौकिक संसार को त्यागकर, नित्य परमपद जाकर श्रिय:पति (श्रीमन्नारायण भगवान) के प्रति अनवरत कैंकर्य करना ही श्रीवैष्णवता का सिद्धांत है।

पञ्च संस्कार विधि कौन निष्पादित कर सकता है?

यद्यपि श्रीवैष्णवं एक नित्य/ अनादि सिद्धांत है, परंतु आलवारों और आचार्यों ने इसे पुर्नार्जीवित किया है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की और समय के साथ लुप्त हो चुकी प्रथा को श्रीनाथमुनि स्वामीजी, आलवन्दार, आदि प्रधान आचार्यों के निर्देशों के आधार पर पुनः स्थापित किया। उन्होंने 74 आचार्यों को सिंहासनाधिपतियों (आचार्य) के रूप में स्थापित किया और उन्हें उन लोगों को पञ्च संस्कार करने के लिए अधिकृत किया जो इस जीवन के लक्ष्य/ उद्देश्य (इस संसार को त्याग परमपद प्रस्थान करना) को समझते थे। उन 74 वंश में जन्म लेने वालों में से कोई भी पञ्च संस्कार प्रदान कर सकता है। उन्होंने (और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने) कुछ विशिष्ट मठ और जीयर स्वामियों (सन्यासियों) को स्थापित किया जिनके वंशज भी उन लोगों को पञ्च संस्कार प्रदान करने के लिए अधिकृत है जो श्रीवैष्णव बनने का लक्ष्य रखते है।

हमारे पञ्च संस्कार अथवा समाश्रायण के दिवस पर हमें क्या करना चाहिए?

  • प्रातः जल्दी उठाना।
  • श्रीमन्नारायण भगवान, आलवारों और आचार्यों का ध्यान करना। यही हमारा सच्चा जन्म दिवस है- हमारे ज्ञान का जन्म।
  • नित्य कर्मानुष्ठान करना (स्नान, ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण, संध्या वंदन, आदि)।
  • समय पर आचार्य मठ/ मंदिर में पहुंचना चाहिए। कुछ फल, वस्त्र (भगवान/ आचार्य के लिए वस्त्र), संभावना (धन), आदि जो भी संभव हो साथ लेकर जाना चाहिए।
  • समश्रायण प्राप्त करना।
  • आचार्य का श्रीपाद तीर्थ स्वीकार करना।
  • ध्यान देकर आचार्य के निर्देशों को श्रवण करना।
  • मठ/ मंदिर में ही प्रसाद पाना।
  • पूरा दिवस मठ/ मंदिर में व्यतीत करना और जितना संभव हो प्रत्यक्ष आचार्य से संप्रदाय के विषय में समझना।
  • समाश्रयण के पश्चाद व्यवसाय, आदि पर जाने की शीघ्रता नहीं करना चाहिए – उस दिवस को शांति और सात्विकता के लिए संचित कर, गुरु परंपरा के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शन करना चाहिए। श्रीवैष्णव के लिए यह दिन आने वाले ऐसे अनेकों मीमांसात्मक दिनों का प्रारंभ दिवस होना चाहिए।

पञ्च संस्कार प्रारंभ है अथवा अंत है?

यह सामान्य मिथ्याबोध है कि समाश्रयण मात्र एक साधारण रीति है और यही समापन है। परंतु यह पुर्णतः गलत है। यह श्रीवैष्णवं में हमारी यात्रा का प्रारंभ है। परम लक्ष्य अटल है (श्री महालक्ष्मीजी और श्रीमन्नारायण भगवान की नित्य सेवा में निरत होना) और प्रक्रिया हमारे पूर्वाचार्यों ने प्रदान की है – आचार्य द्वारा भगवान को साधन रूप स्वीकार करना और आचार्य द्वारा बताये गए सिद्धांतों को आनंदपूर्वक अनुसरण करना। प्रत्येक जीवात्मा के सच्चे स्वरुप के लिए सबसे उपयुक्त है, इन सिद्धांतों को स्वीकार करना, उन्हें अपने दैनिक जीवन में अनुसरण करना और मोक्ष प्राप्त करना।

मुमुक्षुप्पदी के, सूत्र 116 में, पिल्लै लोकाचार्य बताते है कि श्रीवैष्णव को कैसे व्यवहार करना चाहिए (वह जिसने पञ्च संस्कार प्राप्त किये है)।

  1. लौकिक विषयों के प्रति प्रीति को पुर्णतः त्यागना।
  2. श्रीमन्नारायण भगवान को ही अपना एकमात्र उपाय मानना।
  3. सच्चे लक्ष्य (नित्य कैंकर्य) के निष्पादन/ कार्यसिद्धि में सम्पूर्ण श्रद्धा रखना।
  4. सच्चे लक्ष्य को शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त करने की निरंतर उत्कट अभिलाषा करना।
  5. इस संसार में रहते हुए, सदा दिव्य देशों में भगवान के दिव्य गुणानुवादन और कैंकर्य में निरत रहना।
  6. भगवान के परम स्नेही भक्त, जिनमें उपरोक्त वर्णित गुण निहित है, उनकी महानता को जानकार, उन्हें देखते ही आनंदित होना।
  7. अपने मानस को तिरुमंत्र और द्वय महामंत्र पर दृढ करना।
  8. अपने आचार्य के प्रति महान प्रीति रखना।
  9. आचार्य और भगवान के प्रति कृतज्ञ रहना।
  10. सात्विक श्रीवैष्णवों का संग करना, जो सच्चे ज्ञान से परिपूर्ण, विरक्त और शान्त स्वभाव वाले है।

इन बिन्दुओं पर अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2012/08/srivaishnava-lakshanam-5.html पर देखें।

इस समय, हमें भगवत श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने इस पञ्च संस्कार विधि को भव्य शैली में संस्थागत किया और अपने अनेकों अनुयायियों (74 सिंहासनाधिपति) के द्वारा उसका प्रचार किया। यह सब उन्होंने जीवात्माओं के प्रति अपनी अपरिमित कृपा के कारण किया, जो इस लौकिक संसार में अंधकार में घिरे हुए है और भगवान के प्रति मंगलाशासन करने के अपने स्वाभाविक कर्तव्य से वंचित है। इस तत्व के विषय में और अधिक हम अगले अंकों में देखेंगे।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/simple-guide-to-srivaishnavam-pancha-samskaram.html

श्रृंखला का अगला लेख>> श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका- आचार्य-शिष्य संबंध

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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