विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ९

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देख सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ८

 

३८) आवश्यक विरोधी – जिन सिद्धांतों को स्मरण रखना और जिनसे बचना आवश्यक है. उनमें उत्पन्न होने वाली बाधाएं

हमें इन बाधाओं को स्मरण भी करना चाहिये और इनसे बचना भी चाहिये। जब हमारा थुक (राल) किसी को छुता है, तो वह अशुद्ध हो जाता है। मनुष्य शरीर में नौ बाहरी मार्ग है (हमारे शरीर को नव द्वार पट्टन कहा जाता है– नौ दरवाजे वाला शहर– २ आँखे, २ कान, मुह, २ नासिका छिद्र, पेशाब संबंधी इंद्रिय और मल उत्सर्जन इंद्रिय)। हमारे हस्त इन किसी भी भाग को छू लेने पर दूषित हो जाते है और इसे शुद्ध करना पड़ता है। हम हाथ को जल से धोकर शुद्ध कर सकते है। जब हाथ पैरों को छुते है तब कहीं भी हाथ लगाने से पूर्व उन्हें साफ धोना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह विषय और आनेवाले और दो विषय अशुद्धी पर हीं है। आधुनिक सभ्यता में अशुद्धी को पूर्णत: नकारा गया है। सामान्यत: मुंह/ होठों (चुसना, जुबान से चाटना आदि) को छूकर हाथ से खाने / पीने को अशुद्धी कहते है। अन्य अशुद्धी के पहलु भी है जैसे

  • खाना / पीना
    • खाने के मुख्य पात्र को अशुद्ध हाथ लगाना।
    • बायें हाथ से खाना / पीना।
    • चम्मच, नली आदि से खाना / पीना भी अशुद्धी है।
    • उस स्थान को साफ न करना जहाँ हमने प्रसाद पाया है। गाय के गोबर से उसे साफ करना चाहिये।
    • खाने के पश्चात हमें हाथ, पैर को साफ धोना चाहिये और मुंह का कुल्ला करना चाहिये।
  • अशुद्ध वस्त्र
    • एक बार शरण की गयी धोती या साडी, रात में शयन के समय पहनी जाये अथवा शयन करने वाले बिस्तर को भी छुले तो वह अशुद्ध हो जाता है। उसे धोने के लिए डालना चाहिये और स्नान के पश्चात उसे छुना भी नहीं चाहिये।
  • जन्म / मरण
    • सगे सम्बन्धी के जन्म मरण के समय हम असौच हो जाते है और अत: कोई कैंकर्य भी नहीं कर सकते (तिरुमाली के भगवान का भी)। फिर भी संध्या वंधन असौच में भी नहीं त्याग सकते है।
    • नाई, अस्पताल, आदि स्थान हमें अशुद्ध कर देते है। वहाँ से घर पर लौटकर स्नान करना चाहिये।
    • मनुष्य को शौचालय जाकर आने के पश्चात स्नान करना चाहिये और स्वयं को शुद्ध करना चाहिये।
    • स्त्रीयों को अपने माहवारी के दौरान सबसे अलग रहना चाहिये और किसी से भी घुलना मिलना नहीं चाहिये।
    • जो अशुद्ध है उनसे करीबी सम्बन्ध रखने से स्वयं भी दूषित हो जाते है और ऐसी दशा में हमको शुद्ध होना चाहिये।

हमें अपने बड़ों से इन सब अशुद्धी के बारें में सिखना चाहिये। इस विषय में हम बाधाओं को देखेंगे।

  • श्रीवैष्णव और आचार्य के तिरुमाली के समीप थुककर आदि से अशुद्ध करना। अनुवादक टिप्पणी: आजकल सड़कों पर थूकना सामान्य हो गया है। इससे बचना चाहिये और यह बहुत बड़ी भूल है।
  • श्रीवैष्णव और भगवान के गुजरने (सवारी) की राह को अशुद्ध करना।
  • उस बगीचे को दूषित करना जहाँ नित्य सूरी पुष्प का अवतार लेकर भगवान का कैंकर्य करते है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुलशेखर स्वामीजी, पेरुमाल तिरुमौली में यह दर्शाते है “ऊनेरु सेल्वम्” 4थे पधिगम “एम्पेरुमान् पोन्मलैमेल् एतेनुम् आवेने” – मुझे इस पवित्र तिरुवेंकट के पहाड़ों पर कुछ भी बना दीजिये। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी. श्रीरंगराज स्तव में यह दर्शाते है कि नित्यसूरी गण दिव्यदेश के बगीचे और सड़कों में पधारकर भगवान को प्रसन्न करने हेतु पुष्प और वृक्ष का रूप लेते है।
  • जहाँ आचार्य विराजमान है, उस स्थान को प्रदूषित करना।
  • प्रदूषित करने के पश्चात आचार्य के निकट जाकर उन्हें जल आदि देकर उनकी सेवा करना।
  • दूषित होने के पश्चात हमें इससे बचना चाहिये
    • भगवान के अर्चा विग्रह को स्पर्श करना
    • भागवतों को स्पर्श करना
    • भागवतों से दूर जाने से बचना
    • श्रीवैष्णव के तिरुमाली और बगीचे से जाने से बचना।

३९) शरीर शुद्धी विरोधी – स्वयं के शरीर को शुद्ध करने में बाधाएं

शरीर शुद्धी अर्थात स्वयं के शरीर को शुद्ध रखना। यह दूसरे कि पवित्रता रखने में भी लागू है। जिस भी कार्य से अपवित्रता होती है वह बाधा है और उससे बचना चाहिये।

  • जान बुझकर नदी, तालाब आदि का जल, जो भगवान के कैंकर्य में लगता है उसे दूषित करना। हमें इस बात का बहुत ध्यान रखना चाहिये और इस प्रकार के जल कि शुद्धता को खराब नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य और श्रीवैष्णवों के लिये रखे हुये जल को स्वयं के उपयोग में लेना। हमें स्वयं के उपयोग हेतु इस जल को नहीं लेना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों के उपयोग के पश्चात जो जल शेष है उसे “शेषम” कहते है और वह अबसे ज्यादा शुद्ध होता है। हमें ऐसे जल को हमारे हाथ, पैर, आदि धोने में उपयोग नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के उपयोग पश्चात बचे हुए जल को श्रीपादतीर्थ के रूप में ग्रहण करना चाहिये।
  • हमें आचार्य और श्रीवैष्णवों के श्रीपादतीर्थ को हमारे हाथ, पैर, आदि धोने में उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य जिस स्थान पर अपने हस्त को धोते है उस स्थान को पवित्र मानना चाहिये। एक शिष्य को उस स्थान पर अपने हाथ, पैर को नहीं धोना चाहिये।
  • हमें जल को इस तरह नहीं फेकना चाहिये कि वह दूषित जल श्रीवैष्णवों पर गिरे।
  • भागवतों के छुने मात्र से हम पवित्र हो जाते है। इसे छोड़ और कोई दूसरा विकल्प देखना भी अपचार है।

४०) स्नान विरोधी – स्नान करने में बाधा

स्नान अर्थात नदी, तालाब, आदि में स्नान करना जहाँ कोई पूरी तरह पानी में डुबता है और अपनी शरीर की गंदगी निकालता है। इसे तमील में निराट्टम या तीर्थामादुतल से पहचाना जाता है। ब्राम्हणों (दूसरे भी) की दिनचर्या में इसका अति मुख्य स्थान है। हमारे पूर्वज इसे अवगाहन स्नान ऐसे बताते है (नदी, तालाब आदि के जल में पूर्णत: डुबना) वह जिससे सच्ची शुद्धता प्राप्त होती है। आज कल के दिनचर्या में ऐसे मौक़े बहुत कम आते है – हम आज कल स्नान गृह में स्नान करते है जहाँ नहाने के लिए लोटे का इस्तेमाल किया जाता है।

  • हमें सिर्फ स्वच्छता हेतु स्नान नहीं करना चाहिये। हमें शास्त्र के नियमानुसार स्नान करना चाहिये।
  • प्रपन्न होकर कोई विशेष दिन पुण्य कमाने के लिये स्नान करना बाधा है। विशेष दिन यानि संक्रांती, पुण्य काल, ग्रहण आदि। प्रपन्न होकर हमने अपनी पूरी जवाबदारी भगवान के चरण कमलों में दे दिया है। इसलिये ऐसे अवसर पर स्नान करने का कोई प्रश्न ही नहीं है। यह पूर्णत: जीवात्मा के स्वभाव के विरुद्ध है।
  • प्रपन्न के सिद्धांतों के विरुद्ध, कार्य करने के पश्चात, विशेष करुणा से और सम्प्रदाय के संरक्षण हेतु, यह सोचकर दुखी होना चाहिए कि इस शरीर बंधन के कारण ऐसा कार्य करना पड़ा। ऐसे कार्य के लिए भयभीत न होना बाधा है। यह सीधे स्नान से सम्बंधित प्रतीत नहीं होता है।
  • नदी के घाटों पर जहाँ पर भगवान के कैंकर्य हेतु जल लिया जाता हो उस स्थान पर स्नान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी अपने तिरुविरुत्तम के पहिले पाशुर में कहते है कि हमारे पास गंदा शरीर है अलुक्कुडम्बुम – श्रीपरकाल स्वामीजी भी तिरुक्कुरुन्दाण्डगम में शरीर के लिये यही शब्द का प्रयोग करते है। इसलिये किसी को भी वहाँ जाकर अपना शरीर को नहीं धोना चाहिये जहाँ भगवान के कैंकर्य हेतु जल लाया जाता हो। उस स्थान को हो सके उतना पवित्र रखना चाहिये।
  • उस घाट में स्नान करना जहाँ संसारी जन भी स्नान करते है, वह बाधा है। हमें उस स्थान पर स्नान नहीं करना चाहिये क्योकि संसारी द्वारा छुवा हुआ जल हमें छु लेगा। आचार्य हृदय के ३२वें चूर्णिका में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार एक घटना को दर्शाते है “साधन साध्यंगलिल मुतलुम मुडिवुम वर्णधर्मिगल दासवृत्तिगलेन्रु तुरैवेरीविडुवित्ततु” – जो कर्म (उपाय का पहला चरण) और कैंकर्य (ऊपेय का अन्तिम चरण) के मध्य में मतभेद समझ सकता है वह यह कहता है “आप वर्ण धर्म के अनुयायी हो और हम भगवद दासत्व के अनुयायी है – इसलिये हम आप के साथ एक ही घाट में स्नान नहीं कर सकते है”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तिरुव्हिंद्रपुरम कि एक सुन्दर घटना दर्शाते है। वहाँ एक श्रीवैष्णव थे (सन्यासी/जीयर) उनका नाम “विल्लीपुत्तुर पगवर” था जो अपना अनुष्ठान किसी घाट में करते थे, यद्यपि वहाँ के अन्य ब्राह्मण अपना अनुष्ठान किसी दूसरे घाट में करते थे। वह ब्राह्मण उन्हें अपने घाट पर आकर अनुष्ठान करने को कहते है जहाँ केवल ब्राह्मण ही अनुष्ठान करते है और विल्लीपुत्तुर पगवर प्रमाण देकर उत्तर देते है “हम भगवान श्रीमन्नारायण के दास है और आप वर्ण धर्म के अनुयायी हो – तो हम दोनों का मिलने का तो प्रश्न हीं नहीं आता” और उस स्थान से चले जाते है।
  • नदी में स्नान करते समय हमें उस घाट में स्नान नहीं करना चाहिये जहाँ से जल संसारीयों के उपयोग किये हुए घाट से आता है। अनुवादक टिप्पणी: इसका अर्थ यह है कि हम संसारीयों के बचे हुए जल से स्नान कर रहे हैं जो कि सही नहीं है।
  • हमें उस घाट में स्नान नहीं करना चाहिये जहाँ आगे श्रीवैष्णव स्नान कर रहे हो। हमें श्रीवैष्णवों के घाट के पश्चात स्नान करना चाहिये। इससे सम्बंधीत हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के जीवन से एक घटना देख सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कावेरी नदी में स्नान करने हेतु जाते थे। एक श्रीवैष्णव “तिरुमंजन अप्पा” जो भगवान श्रीरंगनाथ कि सेवा करते थे वह श्रीवैष्णव निरन्तर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के स्नान के पश्चात स्नान करते थे और इससे ज्ञान, वैराग्य आदि कि कृपा उन पर हो गयी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपने आचार्य रूप में स्वीकार कर लिया।
  • दुसरे मंत्रों के साथ स्नान करना। सामान्यत: स्नान के समय कुछ मंत्रों का उच्चारण होता है। हमें अवैष्णव मंत्रों से सावधान रहना चाहिये।
  • सामान्यत: यह देखा जाता है कि “इमम्मे गंगे यमुने सरस्वती” श्लोक का स्नान से पहिले उच्चारण होता है। प्रपन्नों को यह नहीं करना चाहिये। श्रीरंगनाथ भगवान की इस तरह स्तुति होती है “तिरुवरंगप पेरुनगरुल तेण्णिर्प पोन्नित तिरैक्कैयाल अडिवरुडप पल्ली कोल्लुम करुमणि”“कावेरी नदी की लहरे श्रीरंगम में आदि शेष पर शयन कर रहे श्रीरंगनाथ भगवान को बहुत हल्के से छु कर जाती है” हमें यह उच्चारण करना चाहिये “गंगैयिल पुनितमाय  काविरी” “कावेरी जो गंगा से भी अधिक पवित्र है”। जीवात्मा को स्नान के समय विरजा नदी का भी स्मरण करना चाहिये जो परमपद के सीमा पर बहती है।
  • भगवद, आल्वार a आचार्य के उत्सवों में उपस्थित होने के पश्चात सेवार्त्ति (जो उत्सवों मे दर्शन हेतु आये है) को छुने के बावजूद स्नान नहीं करना चाहिये। भगवद, आल्वार और आचार्य के उपस्थिति में भीड़ के छुने को नकारा जाता है।
  • जब श्रीवैष्णव जन इस संसार को छोड़ कर जाते है – तो उनका शरीर को “विमल चरम विग्रह” समझा जाता है – पवित्र शरीर। ऐसे तिरुमेनी (शरीर) को भगवान के अर्चा विग्रह के समान समझा जाता है। इसलिये ऐसे शरीर को असौच नहीं समझना चाहिये और इससे बचना चाहिये। अन्तिम क्रिया होने के पश्चात स्नान किया जाता  है – परंतु उसे केवल अवबृता स्नान समझना चाहिये (उत्सव के समापन का एक भाग समझे जैसे तीर्थ वारी)।
  • अवैष्णव / अभागवतों को छुने के पश्चात स्नान करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • आचार्य के तीर्थ उत्सव के दिन शिष्य को अच्छे से स्नान करके भगवद और भागवत आराधन को निभाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब मठ/तिरुमाली में आचार्य का तिरुनक्षत्र, तीर्थ उत्सव मनाया जाता है तो शिष्य को आर्थिक और प्राकृतिक रूप से उपस्थित रहना चाहिये। आचार्य का तिरुनक्षत्र और तीर्थ उत्सव मनाना यह शिष्य का कर्तव्य है।
  • स्नान के पश्चात शरीर को सुखाने के लिये सिर आदि को हिला कर ऐसे नहीं सुखाना चाहिये कि हमारे शरीर की पानी की बुँदे समीप खड़े श्रीवैष्णव पर गिरे।
  • श्रीवैष्णवों को वेदकप पोन (पारस) कहा जाता है – उनके स्पर्श से हम शुद्ध हो जाते है। उनका स्पर्श हमें अशुद्ध करेगा ऐसा सोचना और उसके लिये स्नान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी सूत्र २२१ में कहते है “वेदकप पोन पोले इवर्गलोट्टै सम्बन्धं” – श्रीवैष्णवों से सम्बन्ध रखना अर्थात पारस के स्पर्श में आना – जब एक पारस लोहे को छुता है तो वह लोहा सोना बन जाता है। उसी तरह श्रीवैष्णवों के छुने मात्र से हम शुद्ध हो जाते है।
  • भगवान का अभिषेक (तिरुमंजन) करने के पश्चात स्नान करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: जब हम भगवान का अभिषेक करते है तो दूध, दही, शहद आदि हमारे उपर भी गिर जाते है। यह बहुत बड़ा सौभाग्य है। हमें कभी भी यह विचार नहीं करना चाहिये कि हम अशुद्ध हो गये है और इसे साफ करने कि कोशिश भी नहीं करनी चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों को स्नान कराने के पश्चात स्नान नहीं करना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों के हमारे तिरुमाली में आकर वापस जाने के पश्चात हमें स्नान नहीं करना चाहिये।
  • केवल शरीर को साफ करने हेतु स्नान करना बाधा है। हमें स्नान करते समय आध्यात्मिक बातों को ध्यान में रखना चाहिये और उसका पालन करना चाहिये।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/01/virodhi-pariharangal-9.html

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