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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १२

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १

भगवद, आल्वार और आचार्य – हमारे विचारों और ध्यान का उद्देश

४३) स्मरण विरोधी – विचारों / ध्यान / चिंतन में बाधाएं

स्मरण का अर्थ किसी पर ध्यान या चिंतन करना। इस अंश में किस पर ध्यान करना है और किस पर ध्यान नहीं करना है इसका उल्लेख किया गया है।

  • जैसे विष्णु पुराण में बताया गया है “अन्ये तु पुरुषव्याग्र चेतसा येपी अपाश्रया: अशुद्धास्ते समस्ता तु देवात्या: कर्मयोनय:” अर्थात हमें किसी भी देवतान्तर जैसे रुद्र, स्कंध, दुर्गा आदि पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करना चाहिए अपितु केवल भगवान श्रीमन्नारायण के दिव्य स्वरुप पर ही मन को केन्द्रित करना चाहिये। देवतान्तर पर केन्द्रित करना महान बाधा है। यह भी सत्य है कि जिसका कोई रुप या नाम न हो ऐसी वस्तु पर भी केन्द्रीत करना कठिन है। इसलिये हमें उन भगवान के पवित्र नामों या अर्चावतार पर, जो शुभ और ध्यान लगाने में सरल है, उन पर पूर्णत: ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
  • अपने आचार्य के पवित्र रुप का ध्यान न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी एक उत्सव के समय एक श्रीरंगम आते है और वहां पूरे समय के लिये निवास करते है। श्रीरामानुज स्वामीजी पूरे उत्सव में स्वामीजी की सेवा करते है। जब वो प्रस्थान करते है, तब श्रीरामानुज स्वामीजी उनसे पूछते है “कृपया मुझे कुछ अच्छे उपदेश प्रदान करें जिनकी मैं शरण ले सकु”। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कुछ पल के लिये अपने नेत्रों को बन्द कर फिर कहते है “हम श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के सानिध्य में आध्यात्मिक विषय पर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उस समय जब वे नदि में स्नान कर रहे होते थे और जब पीठ को उपर कि तरफ कर डुबकी लगाते थे तो उनकी पीठ सुन्दर चमकते हुए ताम्बे का मटके कि तरह दिखाई पड़ती थी मैं हमेशा उस पवित्र दृष्टी की शरण होता था। आप भी उसे ही अपना शरण मानो” – यह घटना बहुत प्रसिद्ध है। यह घटना ६००० पदि गुरु परम्परा प्रभावम में भी समझायी गयी है। यह घटना यह बताती है कि शिष्य का आचार्य के पवित्र रुप पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। यह कहा गया है कि श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी तिरुक्कोष्टीयूर मन्दिर के गोपुर पर बैठकर श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी का ध्यान करते थे और “यामुनैत्तुरैवर” (यामुनाचार्य) मन्त्र का जप करते थे। यह घटना अन्तिमोपाय निष्ठा में भी दिखायी गयी है।
  • भागवतों के समूह में ध्यान नहीं करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति के कई पाशुरों में भागवतों कि स्तुति करते है जैसे “पयिलुम चुदरोली” और “नेडुमार्क्कडिमै” पधिगम। श्रीकुलशेखर स्वामीजी भगवातों के प्रति अपना प्रेम और तपस्या पेरुमाल तिरुमोझी के “तेट्टरुम तिरल” पधीगम में कहते है। अन्य आचार्य और आल्वार भी यही कहते है कि हमें भागवतों का हमेशा स्मरण और ध्यान करना चाहिये।
  • सांसारिक लोगों के विषयों पर चिंतन करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपरकाल स्वामीजी परिय तिरुमोझी में कहते है “नण्णाद वाळ अवुणर” अर्थात “एक क्षण के लिये भी मैं उनके बारे में विचार नहीं करूंगा, जो ठंडे तिरुक्कड़ल्मल्लै (महाबलिपुर्) दिव्यदेश में स्थलशयन भगवान का ध्यान नहीं करते है”। सांसारिक जनों को केवल खाना, कपड़े, आराम कि वस्तु मिले वे लोग बस इसी विषय पर केन्द्रित रहते है।
  • उस दिव्यदेश का ध्यान न करना जो भगवान और भागवतों को प्रिय हो, वह बाधा है। और अन्य क्षेत्र जो भगवद, आल्वारों और आचार्य से संबंधीत न हो उस पर केन्द्रीत करना भी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह कहा जाता है कि भगवान अर्चा अवतार का रूप हम सब जीव पर कृपा करने हेतु लेते है। वह कई मन्दिर, मठ, तिरुमाली आदि में जीवात्मा कि सहायता करने हेतु विराजमान होते है। इन क्षेत्रों में जहाँ आल्वारों ने स्तुति कि है उस क्षेत्र को दिव्यदेश कहा गया है। जो आचार्य को प्रिय है उन्हें अभिमान स्थल कहा गया है। सामान्यत: कई क्षेत्र है जो श्रीवैष्णवों को प्रिय है। हमारा केन्द्र और ध्यान उसी स्थान पर रहना चाहिये जो भगवान, आचार्य और आल्वारों से संबंधीत हो।
  • भागवतों के लिए प्रिय विषय पर ध्यान न देकर सांसारिक विषय पर ध्यान देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आल्वारों और आचार्य का ध्यान हमेशा इस बात पर होता है कि हम सब भगवद विषय में लगे रहे। सांसारिक जनों का ध्यान हमेशा धन, आनंददायक वस्तुये जैसे खेल, संगीत, सिनेमा आदि पर ही केन्द्रीत रहता है। प्रपन्न होने के कारण हमें हमेशा आचार्य और आल्वारों के मार्ग पर चलना है न कि सांसारिक जीवों के।
  • भगवद और भागवतों के अच्छे गुणों का ध्यान न करना और अवैष्णवों के गुणों का गुण गान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण जब हम किसी श्रीवैष्णव को देखते है, जिन्हें भगवान और उनके भक्तों के प्रति बहुत लगाव तब हमें भी ऐसे गुणों कि तरफ ध्यान देना चाहिये ताकि हम भी ऐसे गुण स्वयं में आत्मसात कर सके। जब हम धन, उच्च स्थान अन्य में (अन्य श्रीवैष्णव भी) देखते है,जो हमें इस संसार से बाँधे रखता है,  तो हमें उनसे प्रेरणा नहीं लेना चाहिये।
  • इस बात का विश्लेषण करना कि भगवान के अर्चा अवतार के विग्रह किस धातु से बने है यह बहुत बड़ी बाधा है। यह सोचना कि सोने का विग्रह उच्च और लकड़ी के विग्रह हीन यह गलत है। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह कहा गया है कि अर्चा विग्रह के धातु का विश्लेषण करना यानी अपने माँ कि पवित्रता पर संदेह करने के समान है।
  • उसी तरह, ज्ञान और भक्ति में श्रेष्ठ श्री वैष्णव का उनके जन्म, धन, अनुष्ठान आदि पर भेद करना बाधा है। तिरुपति में श्रीभक्तांघ्रीरेणु स्वामीजी भगवातों कि स्तुति पाशुर के (मेम्पोरुल पाशुर के पश्चात) अन्त तक करते है। सभी को इस पाशुर को निरन्तर याद कर भगवातों के प्रति सम्मान और आदर का परिचय देना चाहिए। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव को उनके जन्म के आधार पर आंकना ऐसा ही जैसे अर्चा अवतार भगवान को उस धातु जिससे उन्हें बनाया गया है के आधार पर आंकना, यह बड़ा पाप है।
  • अपने आचार्य को सामान्य मनुष्य समझना बाधा है। प्रमाण वाक्य के अनुसार ,”आचार्य स हरी साक्षात – चररूपी नमस्या:” आचार्य स्वयं हरी है, जो हिल मिल सकते है। हमें कभी भी आचार्य को साधारण जीव नहीं समझना चाहिये।
  • हमें आचार्य के प्रति बहुत कृतज्ञ होना चाहिये। कृतज्ञता होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है कि आचार्य के माध्यम से में भगवान प्राप्त होते है और भगवान के द्वारा आचार्य की प्राप्ति होती है। इसलिये आचार्य हम पर सबसे बड़ी कृपा कर हमें भगवद प्राप्ति करा कर इस संसार बन्धन से मुक्त कर रहे है। इसलिये सभी को यह स्मरण रहना चाहिए और हमेशा आचार्य के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिये।
  • भागवतों को तुच्छ समझना बहुत बड़ी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी श्रीवैष्णवों को आचार्य के समान समझना चाहिये। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भगवद, भागवत, असह्य अपचार के बारें में दर्शाते समय अन्य श्रीवैष्णव को तुच्छ समझना बहुत बड़ा भागवत अपचार है यह समझाते है। हमें हमेशा अन्य भागवतों को भगवान और स्वयं से उच्च समझना चाहिये और उन्हें अधिक सम्मान और महत्त्व देना चाहिये।
  • आल्वारों के पाशुरों को दिव्य प्रबन्ध कहते है। वे “अरुलीच्चेयल” नाम से भी प्रसिद्ध है। उन्हें तमील भाषा में लिखा गया है। कुछ कहते है संस्कृत देव भाषा है और तमिल कमतर है। परन्तु श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है “चेन्नीरत्त तमिलोसै वडचोल्लागी” – जिसका अर्थ “सुन्दर तमील ध्वनी संस्कृत हो गयी”। जैसे आचार्य हृदयं में नायनार ने यह पहचाना कि “आगस्त्यमुम अनादी” – तमील भाषा जो अगस्त्य ऋषी ने प्रगट कि वह भी नित्य है। क्योंकि वह एक ऋषी द्वारा प्रगट हुई है उसे संस्कृत से छोटा नहीं माना जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार अपने आचार्य हृदयं ग्रन्थ में श्रीशठकोप स्वामीजी और उनके दिव्य प्रबन्ध कि स्तुति करते है। इस ग्रन्थ में वह यह स्थापित करते है कि हम आल्वारों का जन्म के आधार पर भेद नहीं करते, क्योंकि वे स्वयं भगवान के कृपा पात्र है, उनकी महिमा अपार है। उसी तरह वह यह स्थापित करते है कि यद्यपि वह दिव्य प्रबन्ध तमील में है, उनकी महिमा अपार है। वे बड़ी सुन्दरता से यह समझाते है कि अगर हम पवित्र संस्कृत में लिखी ग्रन्थ को अपनाते है तो हमें बौद्ध शास्त्र को अपनाना चाहिये। अगर हमें लेखक के जन्म के आधार पर किसी को अस्वीकार करना है, तो हमें महाभारत और भगवद्गीता को अस्वीकार करना चाहिये क्योंकि दोनों हीं लेखक ब्राह्मण नहीं है। अत: वे बड़ी सुन्दरता से यह स्थापित करते है कि प्रबन्ध कि स्तुति उसकी भाषा या उसके लेखक के जन्म पर निर्भर नहीं होती है परन्तु उस प्रबन्ध के तत्व पर होती है – अर्थात जब तक वह भगवान श्रीमन्नारायण कि स्तुति कर रहा है वह स्वीकारनीय है।
  • आत्म यात्रा (आत्मा की गतिविधियों) कि महिमा को भूल देह यात्रा (शरीर की गतिविधियों) पर केन्द्रीत होना बाधा है। आत्म यात्रा अर्थात जीवात्मा के कल्याण को देखना और उसीप्रकार व्यवहार करना। देह यात्रा अर्थात देह के कल्याण के बारें में सोचना और वैसे ही व्यवहार करना। आत्म कल्याण की तुलना में हमें देह कल्याण पर केन्द्रीत नहीं होना चाहिये।
  • उन गतिविधियों के स्वभाव और विशेषताओं के विषय में सोचना,जो भगवत अनुभव पर केन्द्रित न हो,यह बाधा है। भगवान का दास होना और भगवत इच्छा से कार्यरत होना यह जीवात्मा का स्वभाव है– इसके विपरीत होना यह जीवात्मा के स्वभाव के लिए उचित नहीं है।
  • अपना स्वभाव जो की पूरी तरह से उपाय रूप में भगवान पर अवलंबित है, उसे भूल जाना बाधा है। भगवान सिद्ध साधन कहलाते है –अर्थात “उपाय जो की हमेशा फल प्राप्ति कराने के लिए तैयार हो।” हमें इस पक्ष को कभी भूलना नहीं चाहिए।
  • साध्य साधन (उपायान्तर जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग) के विचारों के प्रति आकर्षित होना, बाधा है। साध्य साधन का अर्थ है “स्वयं के प्रयत्न से अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना”।
  • केवल भगवद कैंकर्य के विषय पर ध्यान केन्द्रीत करना और भागवत कैंकर्य का विस्मरण करना, यह बाधा है।
  • भगवान और भागवतों के लिए किये गए कार्यों के विषय में सोचना (अभिमान से) और उनके प्रति किये हुए प्रतिकुल व्यवहार से घबराना नहीं। यह दोनों बाधाएं है।
  • आचार्य ने हम पर असीम कृपा की है, निरन्तर धन्यवाद प्रगट करना चाहिये, ऐसा न करना बाधा है।
  • यह सोचना कि अन्त समय में भगवान के विषय में सोचना आवश्यक है, वह बाधा है। जो कर्म, ज्ञान, भक्ति योग में लगा हुआ है, उसे परमपद कई जन्म के पश्चात प्राप्त होगा। ऐसे व्यक्ति को अन्त समय में भगवान के विषय में सोचना आवश्यक है। परन्तु प्रपन्नों को अन्तिम स्मृति कि कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे भगवान वराह चरम श्लोक में कहते है “अहं स्मरामि मत भक्तं” – अपने भक्तों के अन्तिम समय में, मैं उनका स्मरण करता हूँ और उनका कल्याण करता हूँ, प्रपन्नों को मोक्ष प्रदान कर परमपद प्रदान करें यह भगवान कि ज़िम्मेदारी है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे हम अपने बहुत से पूर्वाचार्यों के जीवन में देख सकते है कि जब वे अपनी तिरुमेनी (शरीर) छोड़ते है, तो वे अपने आचार्य को स्मरण करते है न कि भगवान का। यह स्थापित किया जा सकता है कि अन्त समय में अपना मन स्थिर हो तो हमें अपने आचार्य का स्मरण करना चाहिये न कि भगवान का – क्योंकि हमें आचार्य अभिमान निष्ठा वाले ऐसा समझा जाता है।

हम अगले अंक के अगले भाग में इस विषय को आगे बढ़ाएंगे।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/02/virodhi-pariharangal-12.html

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प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका – अर्थ पंचक

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका

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6 स्वरूपों में भगवान (जिन्हें प्राप्त करना ही परम धर्म है) – परतत्व (परमपद में), व्यूह (क्षीर सागर में), विभव (leela विभूति में लिए गए अवतार), अन्तर्यामी (जीव के अंतर में बसने वाले परमातमा), अर्चावतार (घरों, मंदिरों और मठों में विराजे भगवान के विग्रह) और हमारे श्रीआचार्य के रूप में भी।

मिक्क इरै निलैयुम मेय्याम उयिर निलैयुम
तक्क नेरियुम तडैयागित् तोक्कियलुम ऊल विनैयुम
वाल्विनैयुम ओधुम
कुरुकैयर कोन यालिन् इसै वेदत्तियल

– भट्टर द्वारा रचित तिरुवाय्मौली की तनियन 

अर्थ : हे आलवार तिरुनगरी में निवास करनेवालों के स्वामी – श्रीशठकोप स्वामीजी। वीणा की मधुर धुन के समान कर्णप्रिय उनकी तिरुवाय्मौली अत्यन्त महत्वपूर्ण 5 सिद्धांतों के विषय में समझाती है- सर्वेश्वर श्रीमन्नारायण भगवान का दिव्य स्वरुप (परमात्मा स्वरुप), नित्य जीवात्मा का सच्चा स्वरुप (जीवात्मा स्वरुप), सबसे उत्तम उपाय का स्वरुप (उपाय स्वरुप), अगणित कर्मों के रूप में सामने आने वाली बाधाओं का स्वरुप (विरोधी स्वरुप), और परम लक्ष्य का सच्चा स्वरुप (उपेय स्वरुप)।

अर्थ पंचक का अर्थ है “पंच आधार” (जिसे आवश्यक रूप से समझा जाना चाहिए)। अर्थ पंचक जाने बिना स्वरुप नहीं सुधरता। श्रीपिल्लै लोकाचार्य ने अपनी निर्हेतुक कृपा से एक दिव्य रहस्य ग्रंथ की रचना की, जो सुंदरता से अर्थ पंचक के सिद्धांतों की व्याख्या करता है। यह लेख उसी अद्भुत ग्रंथ के आधार पर संकलित किया गया है।

इस अद्भुत ग्रंथ की झलक यहाँ प्रस्तुत है, अब हम उन्हें देखते है:

  1. जीवात्मा (स्व स्वरुप) – इसे पुनः पांच श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
    • नित्यसुरी – परमपद (श्री वैकुंठ- आध्यात्मिक धाम) की नित्य मुक्त जीवात्माएं,
    • मुक्तात्मा – मुक्त जीवात्माएं, जो सांसार चक्र/ संसार बंधन से मुक्ति प्राप्त कर परमपद (श्री वैकुंठ) पहुंची है,
    • बद्धात्मा – वे जीवात्माएं, जो संसार बंधन में जकड़ी है (लौकिक संसार),
    • केवल्यार्थी – संसार से मुक्ति प्राप्त कर नित्य स्वयं के अनुभव (आत्मानुभव) में लीन, कैवल्य मोक्ष में रहने वाली जीवात्माएँ (आत्मानुभव, भगवान के कैंकर्य के समकक्ष अति निम्न स्तर का है), जिनके लिए भगवान का कैंकर्य प्राप्त करने की अब कोई आशा नहीं है,
    • मुमुक्षु – जीवात्माएं जो संसार में रहते हुए नित्य भगवान के कैंकर्य की चाहना करते है।

2.  ब्रह्म (परमात्म स्वरुप – ईश्वर) – ईश्वर के पांच विभिन्न रूपों को यहाँ समझाया गया है:

    • परत्वं – परमपद में भगवान का उत्कृष्ट स्वरुप,
    • व्यूह – क्षीराब्धि में भगवान का स्वरुप और उनके संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नामक अन्य स्वरुप जो सृष्टि, स्थिति और संहार में संलग्न है,
    • विभव – श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि अवतार,
    • अंतर्यामि – अन्तर्यामी परमात्मा। इनका पुनः वर्गीकरण इस प्रकार है – आत्मा के भीतर परमात्मा रूप में और ह्रदय में श्रीमहालक्ष्मीजी के साथ प्रकाशमान स्वरुप में,
    • अर्चावतार – मंदिर, मठ, घरों आदि में विराजे भगवान के दिव्य विग्रह।

3.  पुरुषार्थ स्वरुप (उपेय) – वह जिसकी चाहना पुरुष (आत्मा) करता है, वह पुरुषार्थ है। इसके पांच वर्गीकरण निम्न है:

    • धर्म – सभी प्राणियों के कल्याण हेतु किये जाने वाले कार्य,
    • अर्थ – धन अर्जन करना और शास्त्रों द्वारा स्वीकृत उद्देश्यों में उसका उपयोग करना,
    • काम – पृथ्वी और अन्य दैविक लोकों के भौतिक सुखों की कामना,
    • आत्मानुभव – स्वयं के आनंदानुभव (आत्म-आनंद) के लिए मुक्ति,
    • भगवत कैंकर्य (परम पुरुषार्थ) – नित्य के लिए परमपद में भगवान का कैंकर्य करना, वह जो सांसारिक देह छुटने के पश्चाद, परमपद में पहुंचकर, सूक्ष्म शरीर धारण करके, नित्यसूरियों और मुक्तात्माओं के सानिध्य में प्राप्त होता है

4.  उपाय स्वरूप (साधन) – इसके पांच वर्गीकरण इस प्रकार है:

    • कर्म योग– यज्ञ, दान, तप, ध्यान, आदि में प्रयुक्त होना, जिनका निर्देश शास्त्र में किया गया है, इस अभ्यास द्वारा अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करना, अष्टांग योग में प्रयुक्त होना आदि। और अपनी आत्मा का अनुभव करना। यह ज्ञान योग का सहायक है और मुख्यतः सांसारिक मोह माया से सम्बंधित है।

    • ज्ञान योग – कर्म योग से प्राप्त ज्ञान अर्जित करके, अपने ह्रदय में विराजे भगवान श्रीमन्नारायण का ध्यान करना और निरंतर सदा उनकी साधना/ तप करना। यह भक्ति योग में सहायक है और मुख्यतः कैवल्य मोक्ष पर केन्द्रित है।

    • भक्ति योग – ऐसे ज्ञान योग के प्रभाव से, निरंतर साधना द्वारा आनंद की प्राप्ति करना, संचित पापों और पुण्यों से मुक्त होकर अंततः चरम गति और विधि को पुर्णतः समझना और उसके अनुसार प्रतिक्रिया करना।

    • प्रपत्ति – भगवान के प्रति समर्पण जो अतीव आनंदित करने वाला है, अनुसरण करने में अत्यंत सुलभ है, जो शीघ्र परिणाम प्रदान करता है और क्यूंकि इसे एक बार ही किया जाना है, तो इस समर्पण के पश्चाद किये गए अन्य सभी कार्य स्वतः ही भगवान के कैंकर्य स्वरुप हो जाते है। यह उनके स्वरुप के लिए भी हितकर है जो कर्मा, ज्ञान, भक्ति आदि उपाय करने में असक्षम है और जो इन योगो में प्रवृत्ति को अनुचित मानते है (एक बार भगवान के सेवक होने के सच्चे स्वरुप के विषय में ज्ञान होने पर स्व-रक्षा के लिये किये गए कोई भी स्व-प्रयास उनके लिए उचित नहीं है)। इनके दो प्रकार के वर्गीकरण मिलते है– आर्त प्रपत्ति (जिनके लिए इस दुःख जनित संसार में क्षणभर के लिए रहना भी असहनीय है और जो तुरंत इस संसार की मोहमाया से परे परमपद में जाने की चाहना करते है) और द्रुप्त प्रपत्ति (जो इस संसार में भगवान पर सम्पूर्ण आश्रय से रहते है और भाग्यानुसार परमपद पहुँचने से तक यही इस संसार में रहकर भगवान, भागवतों और आचार्य की सेवा करे)।

    • आचार्य अभिमान – जो पहले कहे गए किसी भी कार्य को करने में असमर्थ है, उन आश्रितों की अत्यंत दयालु श्रीआचार्यजी महाराज स्वयं जिम्मेदारी लेते है, उन्हें मार्गदर्शन देते है और महत्वपूर्ण सिद्धांतों की शिक्षा देते है। शिष्य को सदा सम्पूर्ण रूप से अपने आचार्य के आश्रित रहना चाहिए और आज्ञाकारी शिष्य के समान चरम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उनकी आज्ञा का अनुसरण करना चाहिए। टिपण्णी: यहाँ हम स्मरण कर सकते है- जीवों पर निर्हेतुक कृपा करते हुए श्रीरामानुज स्वामीजी उत्तारक (इस संसार से बचाने वाले) आचार्य है और हमारे अपने आचार्य उपकारक आचार्य है (आचार्य जो आश्रित जीवात्मा को श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणों तक पहुंचाते है)। भगवान के चरण कमलों में आश्रय ही परम लक्ष्य है, इस सिद्धांत को हमारे पूर्वाचार्यों ने सम्पूर्ण रूप से प्रदर्शित किया है। अधिक जानकारी के लिए कृपया http://ponnadi.blogspot.in/p/charamopaya-nirnayam.html पर देखें। हमारे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने भी आर्ति प्रबंध में यहाँ दर्शाया है कि वे श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी के समान बनना चाहते है जो श्री रामानुज स्वामीजी के प्रति पुर्णतः आश्रित थे।

5.  विरोधी स्वरुप (बाधाएं) – वह पक्ष जो हमारे लक्ष्य प्राप्ति में बाधाएं उत्पन्न करते है। इनका त्याग करना चाहिए। इनके पांच वर्गीकरण इस प्रकार है:

    • स्वरुप विरोधी– अज्ञानता वश – देह को आत्मा जानना , स्वयं को भगवान के अतिरिक्त किसी और के दास जानना और स्वयं (आत्मा) को स्वतंत्र समझना।

    • परत्व विरोधी – अन्य देवताओं को सर्वोत्तम/ प्रधान समझना, अन्य देवताओं को भगवान के समकक्ष समझना, ऐसे तुच्छ देवताओं को शक्तिमान समझना, भगवान के अवतारों को सामान्य मनुष्य समझना, भगवान के अर्चा विग्रह स्वरुप को सामर्थ्य/ शक्ति में कमतर आंकना।

    • पुरुषार्थ विरोधी – भगवान की सेवा के अतिरीक्त अन्य किसी और लक्ष्य की चाहना करना, भगवान की सेवा करने में स्वयं की पसंद को प्रधानता देना (भगवान की इच्छा का अनुसरण न करते हुए)

    • उपाय विरोधी – अन्य उपायों को महान समझना, इच्छित परिणाम प्राप्त करने हेतु समर्पण को अत्यंत सरल समझना, यह समझना कि परमपद में भगवान की सेवा प्राप्ति ही महानता है (इसके विपरीत यह श्रद्धा रखना चाहिए कि आचार्य/ भगवान सेवा प्रदान करने की कृपा करेंगे) और अनेक बाधाओं से भयभीत होना (इसके विपरीत हमें आचार्य/ भगवान पर समपूर्ण विश्वास होना चाहिए)।

    • प्राप्ति विरोधी – जो त्वरित लक्ष्य प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करता है– देह से संबंध (संचित पाप/पुण्य के शेष के समाप्त होने पर यह संबंध नष्ट हो जायेगा), जघन्य अपराध, भगवत अपचार (भगवान के प्रति अपचार), भागवत अपचार, आदि।

अर्थ पंचक में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी प्रतिपादित करते है कि:

इन पञ्च तत्वों का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चाद, मुमुक्षु को निम्न जीवन शैली का अनुसरण करना चाहिए– वर्णाश्रम और वैष्णव मूल्यों के अनुसार धन अर्जन करना, इस धन को भगवान/ भागवतों को समर्पित करना और शरीर निर्वाहन के लिए आवश्यक मात्र को ही ग्रहण करना, अपने आचार्य का कैंकर्य करना जिन्होंने अत्यंत परिश्रम से शिष्य को ज्ञान प्रदान किया है और उनकी प्रसन्नता के लिए जीवन यापन करना।

भगवान के समक्ष आश्रित को विनम्रता प्रदर्शित करना चाहिए (भगवान की महानता के विषय में ध्यान करते हुए), आचार्य के समक्ष अज्ञान प्रदर्शित करना चाहिए (आचार्य के विवेक, ज्ञान के विषय में ध्यान करना चाहिए), श्रीवैष्णवों के समक्ष समर्पण प्रदर्शित करना चाहिए (स्वयं पर उनके स्वामित्व के विषय में ध्यान करना चाहिए), संसारियों के समक्ष भेद प्रदर्शित करना चाहिए (यह ध्यान करते हुए कि हम भगवान के आश्रित है और उनके समान सांसारिक मोह माया से परे है।

अपने लक्ष्य की तृष्णा (उत्कट चाहना), साधन में श्रद्धा, बाधाओं का भय, देह के प्रति वैराग्य और विरक्ति, स्वयं का अनुभव, स्वयं की रक्षा में असमर्थ, भागवतों के प्रति सम्मान, आचार्य के प्रति कृतज्ञता और विश्वास आदि गुण आश्रितों में होना चाहिए।

जिनमें उपरोक्त ज्ञान है और जो इस ज्ञान का अभ्यास करते है, वह भगवान को अपनी दिव्य महिषी, नित्यसूरियों और मुक्तात्माओं से भी अधिक प्रिय है।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/artha-panchakam.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) -११

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १०

42) लक्षण विरोधी – हमारी पहचान, रुप और आचरण में बाधाएं।

इस अंक में विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गयी है। लक्षण अर्थात पहचान, अन्य अर्थों में रुप। अनुवादक टिप्पणी: हमारे संस्कृत साहित्यों में लक्षण सामान्यत: अनूठे गुण से जुड़ा है, जो एक अस्तित्व का दूसरे से भेद करता है। इस अंक में जो विषय दर्शाये गए है, वे इस प्रकार है- पञ्च संस्कार जैसे ताप: (बाहुओं पर शंख चक्र ग्रहण करना, शरीर के विभिन्न अंगों पर १२ ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाना), बाह्य स्वरूप, परिधान सहिंता, आदि। इस लेख में अत्यंत मनोहर और सूक्ष्म बातें दर्शायी गयी है।

1.azhwar-emperumanar-lokacharyar-jeeyar

श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – आदर्श श्रीवैष्णव

पञ्च संस्कार (समाश्रयण) के प्रथम अंग, ताप संस्कार के विषय में चर्चा करेंगे – वह प्रक्रिया जिस द्वारा श्रीवैष्णव को सबसे पहिले सम्प्रदाय में लाया जाता है।

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आचार्य ताप: संस्कार प्रदान करते हुए

  • तिरुविलच्छीनै (बाहु पर अंकित ताप मुद्रा जो यह दर्शाती है कि जीव को समाश्रित- पञ्च संस्कारित किया गया है), स्पष्ट रूप से दिखना चाहिये। मुद्रा को गर्म करके शंख और चक्र को बाहुओं पर आचार्य द्वारा मन्त्र उच्चारण करके अंकित किया जाता है। पहिले वह घाव जैसे दिखेगा और फिर वह सदैव के लिये बाहुओं पर अंकित रहता है। पञ्च संस्कार में यह सबसे पहिला संस्कार है। यह जरूरी है कि यह चिन्ह बाहुओं पर स्पष्ट रहे। ऐसा न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कई आचार्य पीठों में यह देखा जाता है कि शंख चक्र को हल्का गर्म करके शिष्य को दिया जाता है– जिससे चिन्ह स्पष्ट नहीं आता है। यह कुछ आचार्य पीठ में देखा जाता है तो इसे शिष्टाचार्य (हमारे पूर्वजों द्वारा बताई गयी विधि) समझा जाता है।
  • ताप: संस्कार को प्राप्त करने का एक अन्य मार्ग भी है – पुष्प का उपयोग करके – इसे पुष्प संस्कार/ समाश्रय कहते है। यह अभी हमारे सम्प्रदाय में नहीं है। यह अशिष्टाओं द्वारा किया जाता है (हमारे पूर्वाचार्य को छोड़ अन्य जन)।
  • ताप: संस्कार गर्म शंख चक्र का उपयोग करके करना ही सही मार्ग है। ऐसा न करना बाधा है।
  • ताप: संस्कार को हमारे शारीरीक रोग पीड़ा को मिटाने के लिये लेना अपने आप में विरोधी है।
  • इसे स्पष्ट रुप से समझ लेना चाहिये कि पञ्च संस्कार का उद्देश हमें सबसे बड़ी पीड़ा अर्थात इस संसार से दूर करके (संसार बंधन के इस जन्म मरण के चक्कर से बचाना), हमें उपर उठाकर परमपद धाम में भगवान कि आनंदमयी सेवा प्रदान करना है। इसे समझे बिना पञ्च संस्कार कराना बाधा है।
  • शंख और चक्र दोनों भगवान के नित्य चिन्ह (पहचान) है। यह मन में रखकर कि वें अपने प्रिय स्वामी के चिन्ह धारण किये है सभी को सम्पूर्ण प्रसन्नता से इन्हें धारण करना चाहिये। इस विषय में आनंदित न होना बाधा है।
  • श्रीवैष्णव होने से हम सांसारिक जीवों से अलग हो जाते है। हमें सांसारिक जीवों से अलग होने पर लज्जित नहीं होना चाहिये।
  • श्रीवैष्णव होने से हम अन्य श्रीवैष्णव के प्रिय हो जाते है। यह सोचकर हमें आनंदित होना चाहिये कि “अब मुझे अन्य श्रीवैष्णव स्वीकार करेंगे”। ऐसा आनन्द नहीं होना बाधा है।

अब ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाने पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इस भाग में अब बहुत सूक्ष्म बातों पर चर्चा करेंगे। पहिले इस विषय में कुछ खास पहलूओं को देखेंगे। तिरु मण – पवित्र मिट्टी। काप्पु अर्थात उन्हें धारण करने वालों की रक्षा करने हेतु। इसलिये तमिल में ऊर्ध्व पुण्ड्र को तिरुमण काप्पु कहा जाता है। तिरुमण काप्पु को त्रिपुण्ड्रम भी कहा जाता है (क्योंकि इसमें ३ रेखायें है) – इसे नीचे से उपर खड़ा लगाया जाता है। हमारे पूर्वज शास्त्र में इसके अंगों का बहुत शोध किये है और ऊर्ध्व पुण्ड्र के मुख्य पक्षों को निर्धारित किये है। यह बहुत शर्मनाक बात है कि श्रीवैष्णव ऊर्ध्व पुण्ड्र और उसे सही प्रकार से धारण करने की महत्वत्ता को नहीं समझ पा रहे है।

तिरुमण काप्पु (ऊर्ध्व पुण्ड्र) को सही तरिके से एक निर्मल और सुन्दर रूप से धारण करना चाहिये। इस विषय में एक घटना है। सभी को पता है कि श्रीकूरेश स्वामीजी के नेत्र चोल राजा के दरबार में निकाल दिये गए थे। कुछ श्रीवैष्णवों को बहुत दुख हुआ और उन्होंने अपना शोक श्रीकूरेश स्वामीजी के समक्ष प्रकट किया। उस समय श्रीकूरेश स्वामीजी ने उदारता और दीनतावश यह कहा कि “यह भागवत अपचार का परिणाम है। मुझे किसी के ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक को देख लेना चाहिये और यह विचार करना चाहिये कि यह सही प्रकार से धारण नहीं किया गया है”। इसलिये हमें ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक सही प्रकार से धारण करना चाहिये ताकि देखनेवाले को देखकर प्रसन्नता हो। यह हमारा कर्तव्य है कि हम बड़ो और अन्य श्रीवष्णवों को मुश्किल परिस्थिति में न डाले।

तिरुमण पवित्र सफेद चूर्ण से बनाया जाता है। इसे धवलाप पोड़ी भी कहते है। पुराणों से यह पढ़ा जा सकता है कि श्रीगरुड़जी इस पवित्र मिट्टी को श्वेत द्वीप से लाकर भारत देश के कुछ स्थानों पर रखते है। वह आज सफेद मिट्टी रूप में तिरुनारायणपुरम, अयोध्या आदि इन स्थानों में पायी जाती है। इस सफेद मिट्टी को जमीन से निकाल कर पानी में मिलाकर, एक प्रक्रिया में डालकर और सुखाकर तिरुमण बनाया जाता है। इसे कई दिव्य देशों में पाया जा सकता है।

इसमें कुछ मतभेद भी है। इस विषय में जो भी बड़ों से सुना हुआ और श्री वैष्णव संप्रदाय के अनेकों साहित्यों में पढ़ा गया है वह यहाँ प्रस्तुत है।

3. thAyAr at perumAL thiruvadi

चरण कमल, चेल्व पिल्लै के चरण कमल (तिरुनारायण पुरम), चरण कमलों में अम्माजी

4. thiruman-hari-pAdha-AkAram

हरी-पाद-आकृति – कमल पीठ, भगवान के चरण कमलों, चरण कमलों के मध्य में अम्माजी को दर्शाया गया है

  • एक प्रपन्न श्रीवैष्णव को अपने ललाट और अन्य अंगों पर ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक सफेद मिट्टी जिसे श्वेत मृत्तिका कहते है द्वारा धारण करना चाहिये।
  • ऊर्ध्व पुण्ड्र को धारण करते समय भगवान के नाम को स्मरण करना/बोलना चाहिये। इसलिये तिरुमण को तिरुनाम भी कहते है।
  • श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में भगवान के द्वादश नामों की बढ़ाई करते है। इस पद के प्रारंभ के व्याख्यान में यह कहा गया है “वैष्णवत्व चिन्हमित्रे तिरुद्वादश नामं” (बारह नाम, वैष्णवम को दर्शाते है – जो भगवान श्रीमन्नारायण के है)।
  • शास्त्र में यह कहा गया है कि पुरुषों को १२ पुण्ड्र शरीर के १२ अंगों में लगाना चाहिये, वो भी निम्न क्रम से।

5. thiruman1

6. thiruman2

१. ललाट
२. पेट के मध्य में
३. छाती के मध्य में
४. कण्ठ के मध्य में
५. पेट के दाये तरफ
६. दाये कन्धे पर
७. कण्ठ के दाये तरफ
८. पेट के बायें तरफ
९. बायें कन्धे पर
१०. कण्ठ के बायें तरफ
११. कमर के उपर पीछे की तरफ
१२. कण्ठ के पीछे की तरफ

  • श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में कहते है “नीरू चेव्वेयिदक काणिल तिरुमालदियार एनरोदुम” – अगर मैं किसी को भी सीधे खड़े रूप में तिरुमण (ऊर्ध्वपुण्ड्र) धारण किये हुए देखूँ, तो मैं उसे भगवान श्रीमन्नारायण का दास समझूँगा। इसलिये हमें सीधे तिलक ही लगाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह भी देखा जाता है कि श्रीवैष्णव जन भी ललाट पर कुमकुम, चंदन, विभूति आदि लगाते है जिससे पूर्णत: बचना चाहिये।
  • तिरुमण को भगवान के श्री चरण कमल के जैसे लगाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में कहते है “तणतामरै सुमक्कुम पादप पेरुमान” –भगवान के अति कोमल चरण कमलों का वास शीतल कमल में है)।
  • इसे सीधी खड़ी रेखाओं में धारण करना चाहिये। दो सफेद रेखाये (दाये और बायें) भगवान के चरण कमलों को दर्शाती है। मध्य में लाल रेखा अम्माजी का संबोधन करती है और इसे श्रीचूर्ण कहते है। श्रीचूर्ण हल्दी से बनता है। इसे हरिद्रा चूर्ण भी कहते है। एक विधी द्वारा इसका रंग लाल हो जाता है। पद्म पीठ को तिरुमण द्वारा ही नासिका पर लगाना चाहिये। दोनों सफेद कड़ी रेखाओं (भगवान के चरण कमलों) के मध्य कम से कम २ इंच का फर्क रहना चाहिये। और हर सफेद रेखा १ इंच चौड़ी होनी चाहिये।
  • पाद पीठ केवल ललाट पर लगाया जाता है। अन्य ११ अंगों पर केवल सफेद रेखायें लगाते है।
  • शरीर के अन्य अंगों पर धारण करने वाले तिरुमण का एक विशिष्ट आकार है, जिसके कुछ नियम है।

अब हम लक्षण विरोधी में कुछ बाधाएं है, उन्हें देखेंगे।

  • जिसे हमारे पूर्वजों ने स्वीकार नहीं किया उस स्थान से प्राप्त तिरुमण का उपयोग करना यह बाधा है।
  • जो दिव्य देशों से प्राप्त है (जैसे तिरुनारायणपुरम, श्रीरंगम, अयोध्या आदि) जिन्हें हमारे पूर्वजों ने स्वीकार किया है उस तिरुमण का उपयोग नहीं करना। यह बाधा है।
  • उस दिव्य देश कि महिमा को जाने बिना जहां से तिरुमन प्राप्त किया गया है, उसका उपयोग करना यह बाधा है। हमें ऐसा विचार करना चाहिये कि “ओ! यह तिरुमण अयोध्या से प्राप्त है, यह आश्चर्यजनक है”।
  • मुमुक्षु होने पर हमें केवल सफेद तिरुमण लगाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • यह प्रतीत होता है कि अन्य लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु कई रंगों के तिरुमण है। ऐसा अभ्यास करना बाधा है।
  • हमारे पूर्वाचार्य हरी पाद आकृति (भगवान के चरण कमलों के रूप में) लगाने के लिये स्वीकृति दिये है। पुण्ड्र को धारण करने के लिये कई अन्य तरीके के भी है – परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों ने शास्त्र को पढ़कर केवल हरी पाद आकृति को ही स्वीकृति प्रदान की है।
  • बहुत छोटा तिरुमण लगाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: बहुत बार लोगों को बिन्दु लगाते देखा गया है और यह गलत अभ्यास है।
  • तिरुमण को संकीर्ण प्रकार से नहीं लगाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: पहिले बताया गया है कि श्वेत रेखाओं के मध्य कम से कम २ इंच का फर्क रहना चाहिये।
  • यह जाने बिना कि उसका सही माप क्या होना चाहिये, जो हमारे पूर्वाचार्य उपयोग करते थे, तिरुमण को धारण करना बाधा है।
  • तिरुमण को शरीर के सभी १२ बताये हुए अंगों पर धारण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह हमारे पूर्वाचार्य के ग्रन्थों से स्पष्ट हैं कि जब भी तिरुमण लगाने कि बात हो तो शरीर के सभी १२ अंगों पर उसे धारण करना चाहिये। इसलिये श्रीवैष्णवों को १२ ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक धारण करना चाहिये।
  • १२ ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक को “केशवाय नम:” उच्चारण के साथ प्रारम्भ करके क्रमानुसार धारण करना चाहिये।
  • सभी १२ तिरुमण को शरीर के सही भाग पर लगाना चाहिये।
  • एक बार तिरुमण धारण करने के पश्चात उसे सही नहीं करना चाहिये।
  • तिरुमण को बिना मध्य में श्रीचूर्ण के धारण नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: केवल अंतैष्टी कैंकर्य के समय और असौच काल (सुआ/ सुतक) – केवल तिरुमण को धारण करना चाहिये – बाकि सारे समय दोनों को धारण करना चाहिये – तिरुमन भगवान (के श्रीचरणों का सूचक है) और श्रीचूर्ण श्रीमहालक्ष्मीजी का सूचक है। इन दोनों को कभी अलग नहीं करना चाहिये। यह बहुत बड़ा अपचार है।
  • तिरुमण को श्रीशैलेश दया पात्रम….. तनियन, आचार्य तनियन, रहस्य त्रय आदि का पाठ करते हुए धारण करना चाहिये। तिरुमण धारण करते हुए अन्य मन्त्र का स्मरण नहीं करना चाहिये।
  • तिरुमण को केवल अपने अंगुली से धारण करना चाहिये। किसी वस्तु का उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • सांसारिक मनुष्य द्वारा उपयोग किया गया जल का प्रयोग तिरुमण को मिलाने के लिये नहीं करना चाहिये।
  • जिसे भागवतों ने उपयोग किया हो उस जल का प्रयोग नहीं करना, यह बाधा है।
  • आचार्य के उपयोग हेतु लिया हुआ जल का प्रयोग हमें नहीं करना चाहिये।
  • सांसारिक जनों के सामने हमें तिरुमण धारण नहीं करना चाहिये।
  • सांसारिक जनों से हमें तिरुमण ग्रहण और उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों के लिये तिरुमण को धारण करना यह सही पहचान है यह विचार करके ही उसे धारण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • केवल शास्त्र कि आज्ञा मानकर तिरुमण को धारण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: इसे बहुत उत्साह से धारण करना चाहिये।
  • भागवतों को तिरुमण बहुत प्रिय है यह सोचकर धारण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • तिरुमण को बार बार अच्छा दिखने के लिये पोंछकर धारण नहीं करना चाहिये। उसे धैर्य पूर्वक और अच्छी तरह एक ही बार लगाना चाहिये।
  • हमें हमेशा अपने आचार्य का बचा हुआ तिरुमण और श्री चूर्ण का उपयोग करना चाहिये।
  • अगर बचा हुआ तिरुमण सीधे हमें प्रकट न हो तो हमें आचार्य का ध्यान करके प्रार्थना (मानसिक) करनी चाहिये कि वह तिरुमण उनका शेष हो जाये। ऐसा न करना बाधा है।
  • हमें आचार्य के उपयोग के लिये निकाला हुआ तिरुमण का प्रयोग नहीं करना चाहिये और उनको बचा हुआ नहीं देना चाहिये। यह बहुत बड़ा अपचार है।
  • बिना तिरुमण के हमें भगवद, भागवत और आचार्य के सामने उपस्थित नहीं होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हम इस घटना का स्मरण कर सकते है जब तिरुनारायणपुरम में श्रीरामानुज स्वामीजी के पास लगाने के लिये तिरुमण समाप्त हो गया था, तो वे स्वयं अपने मुख को वस्त्र से ढक लिये। भगवान ने उसी समय उन्हें यह बताया कि उन्हें लगाने के लिये तिरुमण कहाँ प्राप्त होगा।

आगे तुलसी/कमलाक्ष आदि माला को धारण करने पर विस्तार से चर्चा होगी।

  • तुलसी और कमलाक्ष कि माला को अलग अलग धारण करना बाधा है। तुलसी और कमलाक्ष कि माला को पूर्णत: सुखाकर छोटे मनका बनाया जा सकता है और माला बनाने के लिये उपयोग किया जा सकता है। उन्हें हमेशा एक साथ पहनना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे कहा गया है “ये कण्ठ लग्न तुलसी कमलाक्ष माला, ये बाहुमूल परिचिन्हित शंख चक्रा:ये वा ललाट पटले लसद्रुर्ध्वपुण्ड्रा:, ते वैष्णवा भुवनमाशु पवित्र यन्ति॥”– जो तुलसी/ कमलाक्ष कि माला धारण करते है, जिनके बाहु पर शंख चक्र अंकित है और जो ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण किये है, ऐसे श्रीवैष्णवों की उपस्थिती मात्र से वह स्थान जहाँ वे विराजमान है, पवित्र हो जाता है। अक्सर देखा जाता है कि सिर्फ तुलसी या सिर्फ कमलाक्ष की माला ही धारण करते है – उन्हें दोनों को धारण करना चाहिये। श्रीवैष्णव तो पवित्रा भी धारण करते है जो भगवद /आल्वार/ आचार्य द्वारा धारण की गयी है।
  • उसे नाभी तक धारण नहीं करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: उसे नाभी तक पूरी लम्बाई में धारण करना चाहिये। अन्य सम्प्रदाय में देखा गया है कि उसे गले में मजूबूती से पहना जाता है। परन्तु हमारे पूर्वाचार्य उसे पूर्ण लम्बाई में पहनते थे– इसे कई मंदिरों में पवित्रा माला में भी देखा जा सकता है, जिसे पूरी लम्बाई मे धारण किया गया हो।
  • उलझी कनक्ती पहनना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: वैदिक शास्त्र के अनुसार कनक्ती अनिवार्य है। इसे हमें हमेशा धारण करना चाहिये। हमें उलझी हुई कनक्ती नहीं पहननी चाहिये।
  • बिना कनक्ती (कमर बन्द) के रहना बाधा है। जिसे तमिल में अरै नाण कयिरू भी कहा जाता है। यह बहुत जरूरी चीज है जिसे हमेशा धारण करना चाहिये।
  • धोती, कटी वस्त्र और लंगोटी छोटे रूप मे पहनना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें हमेशा धोती और कटी वस्त्र पहनना चाहिये। केवल कभी कोई मृत्यु के पश्चात करनेवाले कर्म और तर्पण के समय केवल धोती पहनते है,ऐसे समय कटी वस्त्र नहीं पहनना चाहिये। अन्य समय कम से कम दो वस्त्र को पहनना चाहिये। आजकल पढे लिखे जन भी केवल धोती पहनकर घूमते है – यह कभी नहीं करना चाहिये – हमेशा अंतरियम के साथ उत्तरियम को पहनना चाहिये। कौपिनम, यह एक कटी वस्त्र है – जो एक नैसर्गिक अन्तः वस्त्र है जिसमें सिलाई नहीं होती। वैदिक क्रिया करने वाले कैंकर्य करते समय ऐसा कोई वस्त्र नहीं पहनते जिसमें सिलाई कि गयी हो।
  • काला (श्याम) रंग कि चादर का उपयोग करना विरोधी है।
  • फटे या नष्ट हुए कपड़ों का प्रयोग करना विरोधी है।
  • धोती पहनते समय उसे इस तरह धारण करना चाहिये कि उसके अन्त के भाग नीचे कि तरफ न आये।
  • बिना किनारे कि धोती, साड़ी आदि पहनना विरोधी है।
  • धोती को गिरने से बचाने के लिये एक धागे का उपयोग करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • सिर के केशों को निकाले बिना शरीर के केश निकालना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: ब्रह्मचारी और सन्यासी केवल सिर/मुख के केश को निकाल सकते है। गृहस्थ को हर बार सर्वांग (शरीर के पीछे के अंग को छोड़ सिर से लेकर पैर तक) केश निकालना है – केवल सिर के केश या मुख के केश नहीं निकाल सकते है। यह भी ध्यान देना चाहिये कि सिर के केश निकालते समय शिखा को न काटे। आज-कल सर का पूरी तरह मुंडन किया जाता है जिसका हमें अधिकार नहीं है, सर का पूरी तरह मुंडन करना, यह वैदिक धर्म में निषेध है इसीलिए हमे नहीं करना चाहिये। आल्वारों के कई पाशुरों मे सर का पूरी तरह मुंडन करना, अवैधिक संप्रदाय से संबंधित कहा गया है।
  • मुछे रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वज कभी केवल मुछ नहीं रखते थे– या तो अच्छी तरह हजामत करते (वर्ण या आश्रम के अनुसार) या दाढी और मुछ दोनों को बढ़ाते थे। उदाहरण पर दीक्षा के वक्त (संकल्प के समय जब पत्नी गर्भवती हो या माता-पिता के गुजरने के एक साल तक आदि) हजामत नहीं करते है। परंतु केवल मूछे रखना या उसे कांट-छांट करना इसकी अनुमति नहीं है।
  • नाखुनों को बढ़ाना बाधा है और उसे बढ़ने से पहिले काट देना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: उपर बताये गयी बातें कठोर और अनोखी लगेगी। परन्तु इन सब के लिये व्यवहारिक कारण है। उदाहरण पर लम्बे नाखुन रहने से कैंकर्य में बाधा आती है और दूसरों को भी हानी पहुँच सकती है।

अगली चर्चा खुशबू आदि धारण करने पर है – जो केवल सांसारिक आनन्द हेतु है। श्रीवैष्णवों को इन सबसे दूर रहना चाहिये।

  • शारीरिक सुंदरता बढाने हेतु चेहरे पर पाउडर आदि नहीं लगाना चाहिये।
  • अत्यधिक चन्दन का लेप आदि लगाना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ पर अधिक भोग विलास पर ध्यान केन्द्रित किया गया है – वर्णाश्रम के नियमानुसार गृहस्थों को भगवान के सन्निधि में प्रसाद रूप में जितना वितरण किया गया हो उतना ही चन्दन ग्रहण करना चाहिये।
  • भगवान को अर्पण किये बिना चन्दन का लेप को ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कृष्ण भगवद गीता में कहते है कि कोई कुछ भी खाये, करें, आदि वह सब कुछ सबसे पहिले भगवान को अर्पण करना चाहिए और पश्चात उसका उपयोग करना चाहिये। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी तिरुपल्लाण्डु में कहते है “उदुत्तु कलईन्त निन पितकवादै उदुत्तु…”– हमें वस्त्र/धोती पहिले भगवान को अर्पण करने के पश्चात धारण करना चाहिए। यही नियम अन्य वस्तु जो हम पाते / उपयोग करते है उस पर भी लागु है – वह पहिले भगवान द्वारा उपयोग/ग्रहण किया जाना चाहिये।
  • विशेष प्रार्थना द्वारा और भगवान के शेष चन्दन के लेप, महक आदि प्राप्त करना अनुवादक टिप्पणी: भगवद प्रसाद को भी भोग्य बुद्धि (स्वयं के आनंद) और अधिक भोग विलास से स्वीकार नहीं करना चाहिये। सभी शान्त रिती और जितना जरूरी उतना ही करना चाहिये।
  • चन्दन के लेप को अत्यधिक चाव से लगाना। अनुवादक टिप्पणी: सभी को अपने आप को अध्यात्मिक (अशारीरिक) समझना चाहिये और शारीरिक मनोकामना और भोग से अलग रहना चाहिए। प्रपन्न बनने के पश्चात शारीरिक लगाव में अत्यधिक क्रियाशील होना निरर्थक है। इसके अलावा हमें अपने सच्चा कार्य पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, जो भगवान और भागवतों का दासत्व है।
  • पान के पत्ते और सुपारी को भगवान को भोग लगाये बिना नहीं पाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब प्रसाद रूप में देते है तो थोड़ा ग्रहण कर लेना चाहिये। यह केवल गृहस्थ ही ग्रहण कर सकते है। चन्दन के लेप की तरह इसे ब्रह्मचारी और सन्यासी भी स्वीकार कर सकते है और दूसरों को दिया भी जा सकता है। परन्तु चन्दन का लेप ब्रह्मचारी और सन्यासी द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
  • बहुत वजन और विभिन्न प्रकार की कानों की बाली पहनना। इससे कानों के छेद बढ़ सकते है। परन्तु इससे बचना चाहिये।
  • तुलसी को कानों पर पहनना। यह कभी भी देखा जाता है कि तुलसी को कानों पर रखते है। ऐसा नहीं करना चाहिये।

अन्त में कुछ ओर पहलू को यहाँ समझाया गया है।

  • शुक्रवार को दांतों का साफ करना। इसके बारें में और इसके पीछे के कारण का भी कुछ साफ पता नहीं है।
  • कुछ श्याम रंग के स्याही/ पेंट है, जो दूसरों को सम्मोहित और नियंत्रण करने हेतु उपयोग किया जाता है। यह सामान्यत: देवतान्तर को पूजने पर प्राप्त किया जाता है। हमें ऐसी चीज़ों से नहीं जुड़ना नहीं चाहिये।
  • अपनी रक्षा हेतु गले में, हाथों में ,पैरों में काला डोरा पहनना। अपने रक्षण हेतु तो ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक और बाहू पर शंख-चक्र है। अनुवादक टिप्पणी: यह भी देखा जाता है कि श्रीवैष्णव जन भी ऐसे धागे पहनते है। भगवान ही हमारे रक्षक है। श्रीवैष्णव केवल तुलसी, कमलाक्ष और पवित्रा को धारण कर सकते है।
  • उंगलियों में चांदी की अंगूठी धारण करना।
  • शस्त्र के सम्पर्क में आना। हमें सदा भगवान के शस्त्र पर निर्भर रहना चाहिये।
  • भगवद, भागवत और आचार्य के सामने पुरुषों को अपने उपर के अंग को नहीं ढकना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: दास वर्ग मतलब जो अंग वस्त्र को अपने कमर पर पहनते है -इसीलिए श्रीवैष्णव अंग वस्त्र अपने शरीर पर नहीं पहनते। कुछ देश है जहाँ बहुत थण्ड हो वहाँ वस्त्र, शाल आदि से ढक सकते है।
  • संसार की ओर प्रोत्साहित करनेवाले पक्षों पर चर्चा करना और अहंकार से भरे रहना।
  • आंखों में दया / कृपा न रहना विरोधी है। हमारी आँखों में सदा दया और शीतलता प्रदर्शित होना चाहिए – न कि क्रोध। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के लिये दया और कृपा रखना सामान्य है और यह स्वाभाविकता से उनके आंखों द्वारा प्रगट होता है।
  • दिव्य प्रबन्ध (व्याख्या, स्तोत्र, रहस्य ग्रन्थ आदि) छोड़ अन्य विषयों पर चर्चा करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम जो भी कहे / चर्चा करें वह केवल अपने पूर्वाचार्य के श्रीसूक्ति पर आधारित होना चाहिये।
  • ज़ोर से वार्तालाप करना बाधा है। भगवान श्रीराम कि स्तुति करते समय यह कहा गया है कि “मृदु पुर्वंच भाषते” – मधुर बोलना बहुत अच्छा है।
  • गपशाप और व्यर्थ चर्चा करना विरोधी है।
  • जोर से हँसना विरोधी है।
  • अंजली मुद्रा में न रहना बाधा है। जब कोई भी कैंकर्य न कर रहे हो तब अपने हाथों को अंजली मुद्रा (नमस्कार अवस्था) में रखना चाहिये।
  • हाथों में भीख माँगनेवाला कटोरा लेने में लज्जा नहीं आनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह ब्राह्मण धर्म का एक हिस्सा है कि खाने के अनाज के लिये भिक्षा मांगे। हमारे सम्प्रदाय के कई बड़े पूर्वाचार्य जैसे श्रीकुरेश स्वामीजी, श्रीवेदांताचार्य स्वामीजी आदि उच्छ वृत्ती का कैंकर्य करते थे।
  • चौड़ी छाती करके नहीं चलना चाहिए- अपने व्यवहार में करुणा रखना चाहिए।
  • तेज तेज चलना और मानसिक तनाव के साथ चलना बाधा है। सभी को धीरे और शान्त रीति से चलना चाहिये।
  • धोती को उपर लेना और उसे पहनना अपमान जनक माना जाता है।
  • भगवत विषय को सुनकर और भागवतों को देखकर सभी को अति भावुक और रोमांचित होना चाहिये। ऐसा न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान स्वयं अपने भक्त के ८ गुणों को समझाते है और उसमें से एक गुण भगवान के विषय को सुनकर पवित्र मनोभाव होना यह है। वह कहते है मेरे भक्तों में यह ८ गुण जरूरी है – १) भगवान के भक्तों में निर्हेतुक प्रेम, २) भगवान की पूजा करने में आनन्द आना, ३) स्वयं भगवान कि पूजा करना, ४) अहंकार रहित रहना, ५) भगवान के विषय में श्रवण करने की प्रीति रहना, ६) जब भगवान के विषय में सुनते/ सोचते/ बोलते है, तब शारिरीक बदलाव आना ७) हमेशा भगवान के बारे में सोचना, ८) भगवान के पूजा के बदले में सांसारिक लाभ नहीं मांगना। ऐसे भक्त अगर वे म्लेच्छ भी हो, वे मेरे समान ही ब्राह्मणों, योगियों, कैंकर्य करने वालों, और यहाँ तक की सन्यासियों और विद्वानों द्वारा पूजनीय है। वे उन विद्वानों से ज्ञान प्रदान और स्वीकार करने के योग्य है”। उसी प्रकार, यह भी समझाया गया है कि, एक श्रीवैष्णव को देखने पर, हमें उसी प्रकार हर्ष का अनुभव होना चाहिए जिस प्रकार शीतल चंद्रमा को देखकर होता है, ठंडी बयार का अनुभव करते हुए होता है और अत्यंत उत्कृष्ट चन्दन का लेप लगाकर होता है।
  • भगवान और भागवतों के बिछड़ने पर वियोग नहीं होना। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति पदिगम 8.2.1 में अपना दुख प्रगट करते हुए कहते है “नंगल वरीवलै”। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी और उनके शिष्य श्रीदेववारि आण्डान के बीच कि घटना का स्मरण करते है – जब श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी तिरुवनंतपुरम जाते है, श्रीदेववारि आण्डान बहुत बीमार हो जाते है और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी को देखने के बाद पुन: ठीक होते है।
  • हमारे ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, हमारे रूप से प्रदर्शित होना चाहिये। उस व्यक्ति को देखकर स्वयं से इसे समझ लेना चाहिये। ऐसा न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुरेश स्वामीजी के चरित्र में यह कहा गया है कि जो भी स्वामीजी को देखेगा वह पवित्र हो जायेगा – ऐसे उनके गुण थे।
  • अपने वैष्णवत्वं का अपने स्वरुप से बोध नहीं होना बाधा है। पूर्व अनुच्छेद के समान ही।

हम अगले अंक के अगले भाग में इस विषय को आगे बढ़ाएंगे।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका – तत्व त्रय – संक्षिप्त वर्णन

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमदवरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका

<< पूर्व अनुच्छेद

तत्वों को 3 मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है – चित, अचित और ईश्वर।

Reincarnation

चित में, वे सभी असंख्य जीवात्मायें समाहित है, जो नित्य विभूति (परमपद- नित्य आध्यात्मिक धाम) और लीला विभूति (संसार – अनित्य भौतिक धाम) दोनों में वास करती है। स्वरुप से जीवात्माएं ज्ञान से निर्मित है और ज्ञान से परिपूर्ण भी है। क्यूंकि सच्चा ज्ञान सदैव वरदान रूप होता है, जब आत्मा सच्चे ज्ञान में स्थित हो तब वह आनंदित रहती है। जीव अनंत है , अजर-अमर है, ईश्वर के शरण भजन से इसका कल्याण होता है। जीवात्माएं तीन वर्गों में विभाजित है – नित्यसुरी (जो सदा के लिए मुक्त है), मुक्तात्मा (जो एक समय संसार बंधन में थी परंतु अब मुक्त है) और बद्धात्मा (जो संसार चक्र में बंधे है)। बद्धात्माओं को पुनः भूभूक्षु (वह जो संसार को भोगना चाहते है) और मुमुक्षु (वह जो मोक्ष प्राप्त करना चाहते है) में वर्गीकृत किया गया है। फिर मुमुक्षु का वर्गीकरण कैवल्यार्थी (जो स्वयं की अनुभूति और स्वयं के भोग की चाहना करते है) और भगवत कैंकर्यार्थी (जो परमपद में भगवान का नित्य कैंकर्य करना चाहते है) के रूप में किया गया है। वृस्तत जानकारी के लिए, कृपया http://ponnadi.blogspot.com/2013/03/thathva-thrayam-chith-who-am-i5631.html पर देखें।

senses-elements

अचित, उन विभिन्न जड़ वस्तुओं का संग्रह है. जो हमारी सकल इन्द्रियों के प्रत्यक्ष है। सम्पूर्ण विनाश के पश्चाद वे अव्यक्त रूप में थी और सृष्टि के समय वे व्यक्त हो गई। वह ईश्वर के परतंत्र है। नित्य विभूति और लीला विभूति दोनों में अचित उपस्थित है। यद्यपि, साधारणतः, अचित (जड़ वस्तुयें) लौकिक संसार में सच्चे ज्ञान को आवरित करता है, परंतु आध्यात्मिक परिपेक्ष्य में वह सच्चे ज्ञान को सुगम बनता है। अचित को, शुद्ध सत्व (सम्पूर्ण सत्वता, जो परमपद में दिखाई देती है), मिश्र सत्व (सत्वता, जो राग और अज्ञान के साथ मिश्रित है, जिसे मुख्यतः संसार में देखा जा सकता है) और सत्व शून्य (सत्वता का अभाव-जो काल/समय है) इन तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। अधिक जानकारी के लिए, कृपया http://ponnadi.blogspot.com/2013/03/thathva-thrayam-achith-what-is-matter.html पर देखें।

paramapadhanathan

ईश्वर, श्रीमन्नारायण है, जो परमात्मा है और श्रीमहालक्ष्मीजी के साथ नित्य विराजते है। भगवान छः गुणों से परिपूर्ण है, वे है- ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य (वीरता), शक्ति, तेज। यह छः गुण विस्तृत होकर असंख्य दिव्य कल्याण गुणों में परिवर्तित होते है। वे इन सभी असंख्य कल्याण गुणों को धारण करने वाले है। सभी चित्त और अचित उनपर आश्रित है और उनमें व्याप्त है– अर्थात ईश्वर उनके अंदर भी समाये है और उन्हें थामे हुए भी है। ईश्वर एक है और अनेक रूपों में चेतनों की रक्षा करते है। वे सभी के स्वामी है, सभी चित और अचित पदार्थ उन्हीं के आनंद हेतु सृष्टि में है। अधिक जानकारी के लिए, कृपया http://ponnadi.blogspot.com/2013/03/thathva-thrayam-iswara-who-is-god.html पर देखें।

तत्वों में समानताएं:

  • ईश्वर और चित (जीवात्माएं) दोनों ही चेतन है।
  • चेतन और अवचेतन वस्तुयें दोनों ही ईश्वर की संपत्ति है।
  • ईश्वर और अचित दोनों में ही, चेतनों को अपने स्वरूपानुगत परिवर्तित करने का सामर्थ्य है। उदहारण के लिए, अत्यधिक भौतिक गतिविधियों में प्रयुक्त होने वाली जीवात्मा, ज्ञान के संदर्भ में वह जीवात्मा अचित वस्तु के समान ही हो जाती है अर्थात जड़ वस्तु के समान ही ज्ञान से परे है। उसी प्रकार, जब एक जीवात्मा पूर्ण रूप से भगवत (आध्यात्मिक) विषय में लीन होती है, तब वह सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त करके, भगवान के समान सच्चा सुख/ आनंद प्राप्त करती है।

तत्वों के मध्य असमानताएं:

  • सर्वोत्तमता, ईश्वर का विशिष्ट गुण है और वे सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान आदि है।
  • चित का विशिष्ट गुण है, ईश्वर के प्रति कैंकर्य के विषय में ज्ञान।
  • अचित का विशिष्ट गुण है, उसका ज्ञान रहित होना और उनकी उत्पत्ति संपूर्णतः दूसरों के अनुभव के लिए है।

पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के रहस्य ग्रंथ तत्व त्रय की अवतारिका को पढने के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2013/10/aippasi-anubhavam-pillai-lokacharyar-tattva-trayam.html पर देखें।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2015/12/thathva-thrayam-in-short.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
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श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका – रहस्य त्रय

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवैष्णव संप्रदाय मार्गदर्शिका

<< पूर्व अनुच्छेद

पञ्च संस्कार विधि के भाग के रूप में मंत्रोपदेश (रहस्य मंत्रो के उपदेश) दिया जाता है। उसमें, आचार्य द्वारा शिष्य को 3 रहस्यों का उपदेश दिया जाता है। वे इस प्रकार है:

तिरुमंत्र – नारायण ऋषि ने नर ऋषि (दोनों ही भगवान के अवतार है) को बद्रिकाश्रम में उपदेश किया था।

nara-narayanan

ओम नमो नारायणाय

अर्थ : जीवात्मा, जिसके स्वामी/नाथ भगवान है, उसे सदा भगवान की प्रसन्नता मात्र के लिए ही प्रयत्नरत रहना चाहिए; उसे सभी के स्वामी श्रीमन्नारायण भगवान की सदा सेवा करना चाहिए।

द्वय मंत्र – श्रीमन्नारायण भगवान ने श्रीमहालक्ष्मीजी को विष्णु लोक में उपदेश किया।

kshirabdhinathan

श्रीमन् नारायण चरणौ शरणं प्रपद्ये |
श्रीमते नारायणाय नमः || 

अर्थ : मैं श्रीमन्नारायण भगवान के चरण कमलों में आश्रय लेता हूँ, जो श्रीमाहलाक्ष्मीजी के दिव्य नाथ है; मैं श्रीमहालक्ष्मीजी और श्रीमन्नारायण भगवान के स्वार्थ रहित कैंकर्य की प्रार्थना करता हूँ।

चरम श्लोक (भगवत गीता का भाग) – श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र की रणभूमि में उपदेश किया।

githacharya-2

सर्व धरमान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः:||

अर्थ : सभी साधनों का पुर्णतः त्याग कर, अपना सर्वस्व मुझे समर्पित करो; मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त करूँगा, चिंता मत करो।

मुमुक्षुप्पदी व्याख्यान के द्वय महामंत्र प्रकरण के प्रारंभ में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने तीनों रहस्य मंत्रों के मध्य दो प्रकार के संबंधों के विषय में समझाया है:

  • विधि- अनुष्ठान – तिरुमंत्र जीवात्मा और परमात्मा के मध्य के संबंध को समझाता है; चरम श्लोक जीवात्मा को निर्देशित करता है कि परमात्मा की शरणागति करो; द्वयं मंत्र का स्मरण और जप ऐसी शरणागत जीवात्मा को सदा सर्वदा करना चाहिए।

  • विवरण-विवरणी – तिरुमंत्र का नमो नारायणाय पद, प्रणवं को समझाता है। द्वय महामंत्र तिरुमंत्र का विवरण करता है। चरम श्लोक तिरुमंत्र का और अधिक विवरण प्रदान करता है।

हमारे आचार्यों ने तीनों रहस्य मत्रों में द्वय महामंत्र की बहुत महिमा बताई है और सदा उसका ध्यान किया। उसे मंत्र रत्न के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। यह मंत्र श्रीमहालक्ष्मीजी के पुरुष्कार-भूता स्वरुप को भली प्रकार से दर्शाता है। श्रीमहालक्ष्मीजी और भगवान श्रीमन्नारायण के आनंद मात्र के लिए किया गया कैंकर्य ही परम लक्ष्य है, यह भी दर्शाता है। वरवरमुनि दिनचर्या में श्री देवराज गुरु ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दिव्य दिनचर्या को लिपि बद्ध किया है। नवम श्लोक में, वे दर्शाते है “मंत्र रत्न अनुसंधान संतत स्पुरिताधरम | तधर्थ तत्व निध्यान सन्नद्द पुलकोद्गमं “- अर्थात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सदा द्वय महामंत्र का जप किया करते थे। द्वय मंत्र (जो तिरुवाय्मौली ही है) के अर्थों के सतत अनुसंधान से उनके शरीर में दिव्य प्रतिक्रियां प्रदर्शित होती थी। यह स्मरणीय है कि द्वय महामंत्र का पृथक जप नहीं करना चाहिए – अर्थात द्वय महामंत्र के जप से पहले हमें सदा गुरु परंपरा (अस्मद गुरुभ्यो नमः … श्रीधराय नमः) का ध्यान करना चाहिए। हमारे बहुत से पूर्वाचार्य, श्रीपराशर भट्टर (अष्ट श्लोकी) से प्रारंभ करके, पेरियवाच्चान पिल्लै (परंत रहस्य), पिल्लै लोकाचार्य (श्रिय:पति: पदी, यादृच्चिक: पदी, परंत पदी, मुमुक्षुप्पदी), अलगिय माणवाल पेरूमल नायनार (अरुलिच्चेयल रहस्य), श्रीवरवरमुनि स्वामीजी (मुमुक्षुप्पदी का व्याख्यान) आदि ने रहस्य त्रय के अर्थों को विस्तार से समझाया है। उन सभी अद्भुत प्रबंधों में, मुमुक्षुप्पदी एक अत्यंत सूक्ष्म साहित्य है और इसे श्रीवैष्णवों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कालक्षेप ग्रंथ माना जाता है (जिसका आचार्य के सानिध्य में अध्ययन किया जाना है)। रहस्य त्रय मुख्यतः, तत्व त्रय और अर्थ पंचक पर केन्द्रित है, जो श्रीवैष्णवों के लिए सर्वोच्च महत्त्व के है।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

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