विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) -११

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १०

42) लक्षण विरोधी – हमारी पहचान, रुप और आचरण में बाधाएं।

इस अंक में विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गयी है। लक्षण अर्थात पहचान, अन्य अर्थों में रुप। अनुवादक टिप्पणी: हमारे संस्कृत साहित्यों में लक्षण सामान्यत: अनूठे गुण से जुड़ा है, जो एक अस्तित्व का दूसरे से भेद करता है। इस अंक में जो विषय दर्शाये गए है, वे इस प्रकार है- पञ्च संस्कार जैसे ताप: (बाहुओं पर शंख चक्र ग्रहण करना, शरीर के विभिन्न अंगों पर १२ ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाना), बाह्य स्वरूप, परिधान सहिंता, आदि। इस लेख में अत्यंत मनोहर और सूक्ष्म बातें दर्शायी गयी है।

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श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – आदर्श श्रीवैष्णव

पञ्च संस्कार (समाश्रयण) के प्रथम अंग, ताप संस्कार के विषय में चर्चा करेंगे – वह प्रक्रिया जिस द्वारा श्रीवैष्णव को सबसे पहिले सम्प्रदाय में लाया जाता है।

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आचार्य ताप: संस्कार प्रदान करते हुए

  • तिरुविलच्छीनै (बाहु पर अंकित ताप मुद्रा जो यह दर्शाती है कि जीव को समाश्रित- पञ्च संस्कारित किया गया है), स्पष्ट रूप से दिखना चाहिये। मुद्रा को गर्म करके शंख और चक्र को बाहुओं पर आचार्य द्वारा मन्त्र उच्चारण करके अंकित किया जाता है। पहिले वह घाव जैसे दिखेगा और फिर वह सदैव के लिये बाहुओं पर अंकित रहता है। पञ्च संस्कार में यह सबसे पहिला संस्कार है। यह जरूरी है कि यह चिन्ह बाहुओं पर स्पष्ट रहे। ऐसा न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कई आचार्य पीठों में यह देखा जाता है कि शंख चक्र को हल्का गर्म करके शिष्य को दिया जाता है– जिससे चिन्ह स्पष्ट नहीं आता है। यह कुछ आचार्य पीठ में देखा जाता है तो इसे शिष्टाचार्य (हमारे पूर्वजों द्वारा बताई गयी विधि) समझा जाता है।
  • ताप: संस्कार को प्राप्त करने का एक अन्य मार्ग भी है – पुष्प का उपयोग करके – इसे पुष्प संस्कार/ समाश्रय कहते है। यह अभी हमारे सम्प्रदाय में नहीं है। यह अशिष्टाओं द्वारा किया जाता है (हमारे पूर्वाचार्य को छोड़ अन्य जन)।
  • ताप: संस्कार गर्म शंख चक्र का उपयोग करके करना ही सही मार्ग है। ऐसा न करना बाधा है।
  • ताप: संस्कार को हमारे शारीरीक रोग पीड़ा को मिटाने के लिये लेना अपने आप में विरोधी है।
  • इसे स्पष्ट रुप से समझ लेना चाहिये कि पञ्च संस्कार का उद्देश हमें सबसे बड़ी पीड़ा अर्थात इस संसार से दूर करके (संसार बंधन के इस जन्म मरण के चक्कर से बचाना), हमें उपर उठाकर परमपद धाम में भगवान कि आनंदमयी सेवा प्रदान करना है। इसे समझे बिना पञ्च संस्कार कराना बाधा है।
  • शंख और चक्र दोनों भगवान के नित्य चिन्ह (पहचान) है। यह मन में रखकर कि वें अपने प्रिय स्वामी के चिन्ह धारण किये है सभी को सम्पूर्ण प्रसन्नता से इन्हें धारण करना चाहिये। इस विषय में आनंदित न होना बाधा है।
  • श्रीवैष्णव होने से हम सांसारिक जीवों से अलग हो जाते है। हमें सांसारिक जीवों से अलग होने पर लज्जित नहीं होना चाहिये।
  • श्रीवैष्णव होने से हम अन्य श्रीवैष्णव के प्रिय हो जाते है। यह सोचकर हमें आनंदित होना चाहिये कि “अब मुझे अन्य श्रीवैष्णव स्वीकार करेंगे”। ऐसा आनन्द नहीं होना बाधा है।

अब ऊर्ध्व पुण्ड्र लगाने पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इस भाग में अब बहुत सूक्ष्म बातों पर चर्चा करेंगे। पहिले इस विषय में कुछ खास पहलूओं को देखेंगे। तिरु मण – पवित्र मिट्टी। काप्पु अर्थात उन्हें धारण करने वालों की रक्षा करने हेतु। इसलिये तमिल में ऊर्ध्व पुण्ड्र को तिरुमण काप्पु कहा जाता है। तिरुमण काप्पु को त्रिपुण्ड्रम भी कहा जाता है (क्योंकि इसमें ३ रेखायें है) – इसे नीचे से उपर खड़ा लगाया जाता है। हमारे पूर्वज शास्त्र में इसके अंगों का बहुत शोध किये है और ऊर्ध्व पुण्ड्र के मुख्य पक्षों को निर्धारित किये है। यह बहुत शर्मनाक बात है कि श्रीवैष्णव ऊर्ध्व पुण्ड्र और उसे सही प्रकार से धारण करने की महत्वत्ता को नहीं समझ पा रहे है।

तिरुमण काप्पु (ऊर्ध्व पुण्ड्र) को सही तरिके से एक निर्मल और सुन्दर रूप से धारण करना चाहिये। इस विषय में एक घटना है। सभी को पता है कि श्रीकूरेश स्वामीजी के नेत्र चोल राजा के दरबार में निकाल दिये गए थे। कुछ श्रीवैष्णवों को बहुत दुख हुआ और उन्होंने अपना शोक श्रीकूरेश स्वामीजी के समक्ष प्रकट किया। उस समय श्रीकूरेश स्वामीजी ने उदारता और दीनतावश यह कहा कि “यह भागवत अपचार का परिणाम है। मुझे किसी के ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक को देख लेना चाहिये और यह विचार करना चाहिये कि यह सही प्रकार से धारण नहीं किया गया है”। इसलिये हमें ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक सही प्रकार से धारण करना चाहिये ताकि देखनेवाले को देखकर प्रसन्नता हो। यह हमारा कर्तव्य है कि हम बड़ो और अन्य श्रीवष्णवों को मुश्किल परिस्थिति में न डाले।

तिरुमण पवित्र सफेद चूर्ण से बनाया जाता है। इसे धवलाप पोड़ी भी कहते है। पुराणों से यह पढ़ा जा सकता है कि श्रीगरुड़जी इस पवित्र मिट्टी को श्वेत द्वीप से लाकर भारत देश के कुछ स्थानों पर रखते है। वह आज सफेद मिट्टी रूप में तिरुनारायणपुरम, अयोध्या आदि इन स्थानों में पायी जाती है। इस सफेद मिट्टी को जमीन से निकाल कर पानी में मिलाकर, एक प्रक्रिया में डालकर और सुखाकर तिरुमण बनाया जाता है। इसे कई दिव्य देशों में पाया जा सकता है।

इसमें कुछ मतभेद भी है। इस विषय में जो भी बड़ों से सुना हुआ और श्री वैष्णव संप्रदाय के अनेकों साहित्यों में पढ़ा गया है वह यहाँ प्रस्तुत है।

3. thAyAr at perumAL thiruvadi

चरण कमल, चेल्व पिल्लै के चरण कमल (तिरुनारायण पुरम), चरण कमलों में अम्माजी

4. thiruman-hari-pAdha-AkAram

हरी-पाद-आकृति – कमल पीठ, भगवान के चरण कमलों, चरण कमलों के मध्य में अम्माजी को दर्शाया गया है

  • एक प्रपन्न श्रीवैष्णव को अपने ललाट और अन्य अंगों पर ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक सफेद मिट्टी जिसे श्वेत मृत्तिका कहते है द्वारा धारण करना चाहिये।
  • ऊर्ध्व पुण्ड्र को धारण करते समय भगवान के नाम को स्मरण करना/बोलना चाहिये। इसलिये तिरुमण को तिरुनाम भी कहते है।
  • श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में भगवान के द्वादश नामों की बढ़ाई करते है। इस पद के प्रारंभ के व्याख्यान में यह कहा गया है “वैष्णवत्व चिन्हमित्रे तिरुद्वादश नामं” (बारह नाम, वैष्णवम को दर्शाते है – जो भगवान श्रीमन्नारायण के है)।
  • शास्त्र में यह कहा गया है कि पुरुषों को १२ पुण्ड्र शरीर के १२ अंगों में लगाना चाहिये, वो भी निम्न क्रम से।

5. thiruman1

6. thiruman2

१. ललाट
२. पेट के मध्य में
३. छाती के मध्य में
४. कण्ठ के मध्य में
५. पेट के दाये तरफ
६. दाये कन्धे पर
७. कण्ठ के दाये तरफ
८. पेट के बायें तरफ
९. बायें कन्धे पर
१०. कण्ठ के बायें तरफ
११. कमर के उपर पीछे की तरफ
१२. कण्ठ के पीछे की तरफ

  • श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में कहते है “नीरू चेव्वेयिदक काणिल तिरुमालदियार एनरोदुम” – अगर मैं किसी को भी सीधे खड़े रूप में तिरुमण (ऊर्ध्वपुण्ड्र) धारण किये हुए देखूँ, तो मैं उसे भगवान श्रीमन्नारायण का दास समझूँगा। इसलिये हमें सीधे तिलक ही लगाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह भी देखा जाता है कि श्रीवैष्णव जन भी ललाट पर कुमकुम, चंदन, विभूति आदि लगाते है जिससे पूर्णत: बचना चाहिये।
  • तिरुमण को भगवान के श्री चरण कमल के जैसे लगाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में कहते है “तणतामरै सुमक्कुम पादप पेरुमान” –भगवान के अति कोमल चरण कमलों का वास शीतल कमल में है)।
  • इसे सीधी खड़ी रेखाओं में धारण करना चाहिये। दो सफेद रेखाये (दाये और बायें) भगवान के चरण कमलों को दर्शाती है। मध्य में लाल रेखा अम्माजी का संबोधन करती है और इसे श्रीचूर्ण कहते है। श्रीचूर्ण हल्दी से बनता है। इसे हरिद्रा चूर्ण भी कहते है। एक विधी द्वारा इसका रंग लाल हो जाता है। पद्म पीठ को तिरुमण द्वारा ही नासिका पर लगाना चाहिये। दोनों सफेद कड़ी रेखाओं (भगवान के चरण कमलों) के मध्य कम से कम २ इंच का फर्क रहना चाहिये। और हर सफेद रेखा १ इंच चौड़ी होनी चाहिये।
  • पाद पीठ केवल ललाट पर लगाया जाता है। अन्य ११ अंगों पर केवल सफेद रेखायें लगाते है।
  • शरीर के अन्य अंगों पर धारण करने वाले तिरुमण का एक विशिष्ट आकार है, जिसके कुछ नियम है।

अब हम लक्षण विरोधी में कुछ बाधाएं है, उन्हें देखेंगे।

  • जिसे हमारे पूर्वजों ने स्वीकार नहीं किया उस स्थान से प्राप्त तिरुमण का उपयोग करना यह बाधा है।
  • जो दिव्य देशों से प्राप्त है (जैसे तिरुनारायणपुरम, श्रीरंगम, अयोध्या आदि) जिन्हें हमारे पूर्वजों ने स्वीकार किया है उस तिरुमण का उपयोग नहीं करना। यह बाधा है।
  • उस दिव्य देश कि महिमा को जाने बिना जहां से तिरुमन प्राप्त किया गया है, उसका उपयोग करना यह बाधा है। हमें ऐसा विचार करना चाहिये कि “ओ! यह तिरुमण अयोध्या से प्राप्त है, यह आश्चर्यजनक है”।
  • मुमुक्षु होने पर हमें केवल सफेद तिरुमण लगाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • यह प्रतीत होता है कि अन्य लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु कई रंगों के तिरुमण है। ऐसा अभ्यास करना बाधा है।
  • हमारे पूर्वाचार्य हरी पाद आकृति (भगवान के चरण कमलों के रूप में) लगाने के लिये स्वीकृति दिये है। पुण्ड्र को धारण करने के लिये कई अन्य तरीके के भी है – परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों ने शास्त्र को पढ़कर केवल हरी पाद आकृति को ही स्वीकृति प्रदान की है।
  • बहुत छोटा तिरुमण लगाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: बहुत बार लोगों को बिन्दु लगाते देखा गया है और यह गलत अभ्यास है।
  • तिरुमण को संकीर्ण प्रकार से नहीं लगाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: पहिले बताया गया है कि श्वेत रेखाओं के मध्य कम से कम २ इंच का फर्क रहना चाहिये।
  • यह जाने बिना कि उसका सही माप क्या होना चाहिये, जो हमारे पूर्वाचार्य उपयोग करते थे, तिरुमण को धारण करना बाधा है।
  • तिरुमण को शरीर के सभी १२ बताये हुए अंगों पर धारण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह हमारे पूर्वाचार्य के ग्रन्थों से स्पष्ट हैं कि जब भी तिरुमण लगाने कि बात हो तो शरीर के सभी १२ अंगों पर उसे धारण करना चाहिये। इसलिये श्रीवैष्णवों को १२ ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक धारण करना चाहिये।
  • १२ ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक को “केशवाय नम:” उच्चारण के साथ प्रारम्भ करके क्रमानुसार धारण करना चाहिये।
  • सभी १२ तिरुमण को शरीर के सही भाग पर लगाना चाहिये।
  • एक बार तिरुमण धारण करने के पश्चात उसे सही नहीं करना चाहिये।
  • तिरुमण को बिना मध्य में श्रीचूर्ण के धारण नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: केवल अंतैष्टी कैंकर्य के समय और असौच काल (सुआ/ सुतक) – केवल तिरुमण को धारण करना चाहिये – बाकि सारे समय दोनों को धारण करना चाहिये – तिरुमन भगवान (के श्रीचरणों का सूचक है) और श्रीचूर्ण श्रीमहालक्ष्मीजी का सूचक है। इन दोनों को कभी अलग नहीं करना चाहिये। यह बहुत बड़ा अपचार है।
  • तिरुमण को श्रीशैलेश दया पात्रम….. तनियन, आचार्य तनियन, रहस्य त्रय आदि का पाठ करते हुए धारण करना चाहिये। तिरुमण धारण करते हुए अन्य मन्त्र का स्मरण नहीं करना चाहिये।
  • तिरुमण को केवल अपने अंगुली से धारण करना चाहिये। किसी वस्तु का उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • सांसारिक मनुष्य द्वारा उपयोग किया गया जल का प्रयोग तिरुमण को मिलाने के लिये नहीं करना चाहिये।
  • जिसे भागवतों ने उपयोग किया हो उस जल का प्रयोग नहीं करना, यह बाधा है।
  • आचार्य के उपयोग हेतु लिया हुआ जल का प्रयोग हमें नहीं करना चाहिये।
  • सांसारिक जनों के सामने हमें तिरुमण धारण नहीं करना चाहिये।
  • सांसारिक जनों से हमें तिरुमण ग्रहण और उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों के लिये तिरुमण को धारण करना यह सही पहचान है यह विचार करके ही उसे धारण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • केवल शास्त्र कि आज्ञा मानकर तिरुमण को धारण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: इसे बहुत उत्साह से धारण करना चाहिये।
  • भागवतों को तिरुमण बहुत प्रिय है यह सोचकर धारण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • तिरुमण को बार बार अच्छा दिखने के लिये पोंछकर धारण नहीं करना चाहिये। उसे धैर्य पूर्वक और अच्छी तरह एक ही बार लगाना चाहिये।
  • हमें हमेशा अपने आचार्य का बचा हुआ तिरुमण और श्री चूर्ण का उपयोग करना चाहिये।
  • अगर बचा हुआ तिरुमण सीधे हमें प्रकट न हो तो हमें आचार्य का ध्यान करके प्रार्थना (मानसिक) करनी चाहिये कि वह तिरुमण उनका शेष हो जाये। ऐसा न करना बाधा है।
  • हमें आचार्य के उपयोग के लिये निकाला हुआ तिरुमण का प्रयोग नहीं करना चाहिये और उनको बचा हुआ नहीं देना चाहिये। यह बहुत बड़ा अपचार है।
  • बिना तिरुमण के हमें भगवद, भागवत और आचार्य के सामने उपस्थित नहीं होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हम इस घटना का स्मरण कर सकते है जब तिरुनारायणपुरम में श्रीरामानुज स्वामीजी के पास लगाने के लिये तिरुमण समाप्त हो गया था, तो वे स्वयं अपने मुख को वस्त्र से ढक लिये। भगवान ने उसी समय उन्हें यह बताया कि उन्हें लगाने के लिये तिरुमण कहाँ प्राप्त होगा।

आगे तुलसी/कमलाक्ष आदि माला को धारण करने पर विस्तार से चर्चा होगी।

  • तुलसी और कमलाक्ष कि माला को अलग अलग धारण करना बाधा है। तुलसी और कमलाक्ष कि माला को पूर्णत: सुखाकर छोटे मनका बनाया जा सकता है और माला बनाने के लिये उपयोग किया जा सकता है। उन्हें हमेशा एक साथ पहनना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे कहा गया है “ये कण्ठ लग्न तुलसी कमलाक्ष माला, ये बाहुमूल परिचिन्हित शंख चक्रा:ये वा ललाट पटले लसद्रुर्ध्वपुण्ड्रा:, ते वैष्णवा भुवनमाशु पवित्र यन्ति॥”– जो तुलसी/ कमलाक्ष कि माला धारण करते है, जिनके बाहु पर शंख चक्र अंकित है और जो ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण किये है, ऐसे श्रीवैष्णवों की उपस्थिती मात्र से वह स्थान जहाँ वे विराजमान है, पवित्र हो जाता है। अक्सर देखा जाता है कि सिर्फ तुलसी या सिर्फ कमलाक्ष की माला ही धारण करते है – उन्हें दोनों को धारण करना चाहिये। श्रीवैष्णव तो पवित्रा भी धारण करते है जो भगवद /आल्वार/ आचार्य द्वारा धारण की गयी है।
  • उसे नाभी तक धारण नहीं करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: उसे नाभी तक पूरी लम्बाई में धारण करना चाहिये। अन्य सम्प्रदाय में देखा गया है कि उसे गले में मजूबूती से पहना जाता है। परन्तु हमारे पूर्वाचार्य उसे पूर्ण लम्बाई में पहनते थे– इसे कई मंदिरों में पवित्रा माला में भी देखा जा सकता है, जिसे पूरी लम्बाई मे धारण किया गया हो।
  • उलझी कनक्ती पहनना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: वैदिक शास्त्र के अनुसार कनक्ती अनिवार्य है। इसे हमें हमेशा धारण करना चाहिये। हमें उलझी हुई कनक्ती नहीं पहननी चाहिये।
  • बिना कनक्ती (कमर बन्द) के रहना बाधा है। जिसे तमिल में अरै नाण कयिरू भी कहा जाता है। यह बहुत जरूरी चीज है जिसे हमेशा धारण करना चाहिये।
  • धोती, कटी वस्त्र और लंगोटी छोटे रूप मे पहनना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें हमेशा धोती और कटी वस्त्र पहनना चाहिये। केवल कभी कोई मृत्यु के पश्चात करनेवाले कर्म और तर्पण के समय केवल धोती पहनते है,ऐसे समय कटी वस्त्र नहीं पहनना चाहिये। अन्य समय कम से कम दो वस्त्र को पहनना चाहिये। आजकल पढे लिखे जन भी केवल धोती पहनकर घूमते है – यह कभी नहीं करना चाहिये – हमेशा अंतरियम के साथ उत्तरियम को पहनना चाहिये। कौपिनम, यह एक कटी वस्त्र है – जो एक नैसर्गिक अन्तः वस्त्र है जिसमें सिलाई नहीं होती। वैदिक क्रिया करने वाले कैंकर्य करते समय ऐसा कोई वस्त्र नहीं पहनते जिसमें सिलाई कि गयी हो।
  • काला (श्याम) रंग कि चादर का उपयोग करना विरोधी है।
  • फटे या नष्ट हुए कपड़ों का प्रयोग करना विरोधी है।
  • धोती पहनते समय उसे इस तरह धारण करना चाहिये कि उसके अन्त के भाग नीचे कि तरफ न आये।
  • बिना किनारे कि धोती, साड़ी आदि पहनना विरोधी है।
  • धोती को गिरने से बचाने के लिये एक धागे का उपयोग करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • सिर के केशों को निकाले बिना शरीर के केश निकालना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: ब्रह्मचारी और सन्यासी केवल सिर/मुख के केश को निकाल सकते है। गृहस्थ को हर बार सर्वांग (शरीर के पीछे के अंग को छोड़ सिर से लेकर पैर तक) केश निकालना है – केवल सिर के केश या मुख के केश नहीं निकाल सकते है। यह भी ध्यान देना चाहिये कि सिर के केश निकालते समय शिखा को न काटे। आज-कल सर का पूरी तरह मुंडन किया जाता है जिसका हमें अधिकार नहीं है, सर का पूरी तरह मुंडन करना, यह वैदिक धर्म में निषेध है इसीलिए हमे नहीं करना चाहिये। आल्वारों के कई पाशुरों मे सर का पूरी तरह मुंडन करना, अवैधिक संप्रदाय से संबंधित कहा गया है।
  • मुछे रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वज कभी केवल मुछ नहीं रखते थे– या तो अच्छी तरह हजामत करते (वर्ण या आश्रम के अनुसार) या दाढी और मुछ दोनों को बढ़ाते थे। उदाहरण पर दीक्षा के वक्त (संकल्प के समय जब पत्नी गर्भवती हो या माता-पिता के गुजरने के एक साल तक आदि) हजामत नहीं करते है। परंतु केवल मूछे रखना या उसे कांट-छांट करना इसकी अनुमति नहीं है।
  • नाखुनों को बढ़ाना बाधा है और उसे बढ़ने से पहिले काट देना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: उपर बताये गयी बातें कठोर और अनोखी लगेगी। परन्तु इन सब के लिये व्यवहारिक कारण है। उदाहरण पर लम्बे नाखुन रहने से कैंकर्य में बाधा आती है और दूसरों को भी हानी पहुँच सकती है।

अगली चर्चा खुशबू आदि धारण करने पर है – जो केवल सांसारिक आनन्द हेतु है। श्रीवैष्णवों को इन सबसे दूर रहना चाहिये।

  • शारीरिक सुंदरता बढाने हेतु चेहरे पर पाउडर आदि नहीं लगाना चाहिये।
  • अत्यधिक चन्दन का लेप आदि लगाना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ पर अधिक भोग विलास पर ध्यान केन्द्रित किया गया है – वर्णाश्रम के नियमानुसार गृहस्थों को भगवान के सन्निधि में प्रसाद रूप में जितना वितरण किया गया हो उतना ही चन्दन ग्रहण करना चाहिये।
  • भगवान को अर्पण किये बिना चन्दन का लेप को ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कृष्ण भगवद गीता में कहते है कि कोई कुछ भी खाये, करें, आदि वह सब कुछ सबसे पहिले भगवान को अर्पण करना चाहिए और पश्चात उसका उपयोग करना चाहिये। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी तिरुपल्लाण्डु में कहते है “उदुत्तु कलईन्त निन पितकवादै उदुत्तु…”– हमें वस्त्र/धोती पहिले भगवान को अर्पण करने के पश्चात धारण करना चाहिए। यही नियम अन्य वस्तु जो हम पाते / उपयोग करते है उस पर भी लागु है – वह पहिले भगवान द्वारा उपयोग/ग्रहण किया जाना चाहिये।
  • विशेष प्रार्थना द्वारा और भगवान के शेष चन्दन के लेप, महक आदि प्राप्त करना अनुवादक टिप्पणी: भगवद प्रसाद को भी भोग्य बुद्धि (स्वयं के आनंद) और अधिक भोग विलास से स्वीकार नहीं करना चाहिये। सभी शान्त रिती और जितना जरूरी उतना ही करना चाहिये।
  • चन्दन के लेप को अत्यधिक चाव से लगाना। अनुवादक टिप्पणी: सभी को अपने आप को अध्यात्मिक (अशारीरिक) समझना चाहिये और शारीरिक मनोकामना और भोग से अलग रहना चाहिए। प्रपन्न बनने के पश्चात शारीरिक लगाव में अत्यधिक क्रियाशील होना निरर्थक है। इसके अलावा हमें अपने सच्चा कार्य पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, जो भगवान और भागवतों का दासत्व है।
  • पान के पत्ते और सुपारी को भगवान को भोग लगाये बिना नहीं पाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब प्रसाद रूप में देते है तो थोड़ा ग्रहण कर लेना चाहिये। यह केवल गृहस्थ ही ग्रहण कर सकते है। चन्दन के लेप की तरह इसे ब्रह्मचारी और सन्यासी भी स्वीकार कर सकते है और दूसरों को दिया भी जा सकता है। परन्तु चन्दन का लेप ब्रह्मचारी और सन्यासी द्वारा स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
  • बहुत वजन और विभिन्न प्रकार की कानों की बाली पहनना। इससे कानों के छेद बढ़ सकते है। परन्तु इससे बचना चाहिये।
  • तुलसी को कानों पर पहनना। यह कभी भी देखा जाता है कि तुलसी को कानों पर रखते है। ऐसा नहीं करना चाहिये।

अन्त में कुछ ओर पहलू को यहाँ समझाया गया है।

  • शुक्रवार को दांतों का साफ करना। इसके बारें में और इसके पीछे के कारण का भी कुछ साफ पता नहीं है।
  • कुछ श्याम रंग के स्याही/ पेंट है, जो दूसरों को सम्मोहित और नियंत्रण करने हेतु उपयोग किया जाता है। यह सामान्यत: देवतान्तर को पूजने पर प्राप्त किया जाता है। हमें ऐसी चीज़ों से नहीं जुड़ना नहीं चाहिये।
  • अपनी रक्षा हेतु गले में, हाथों में ,पैरों में काला डोरा पहनना। अपने रक्षण हेतु तो ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक और बाहू पर शंख-चक्र है। अनुवादक टिप्पणी: यह भी देखा जाता है कि श्रीवैष्णव जन भी ऐसे धागे पहनते है। भगवान ही हमारे रक्षक है। श्रीवैष्णव केवल तुलसी, कमलाक्ष और पवित्रा को धारण कर सकते है।
  • उंगलियों में चांदी की अंगूठी धारण करना।
  • शस्त्र के सम्पर्क में आना। हमें सदा भगवान के शस्त्र पर निर्भर रहना चाहिये।
  • भगवद, भागवत और आचार्य के सामने पुरुषों को अपने उपर के अंग को नहीं ढकना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: दास वर्ग मतलब जो अंग वस्त्र को अपने कमर पर पहनते है -इसीलिए श्रीवैष्णव अंग वस्त्र अपने शरीर पर नहीं पहनते। कुछ देश है जहाँ बहुत थण्ड हो वहाँ वस्त्र, शाल आदि से ढक सकते है।
  • संसार की ओर प्रोत्साहित करनेवाले पक्षों पर चर्चा करना और अहंकार से भरे रहना।
  • आंखों में दया / कृपा न रहना विरोधी है। हमारी आँखों में सदा दया और शीतलता प्रदर्शित होना चाहिए – न कि क्रोध। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के लिये दया और कृपा रखना सामान्य है और यह स्वाभाविकता से उनके आंखों द्वारा प्रगट होता है।
  • दिव्य प्रबन्ध (व्याख्या, स्तोत्र, रहस्य ग्रन्थ आदि) छोड़ अन्य विषयों पर चर्चा करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम जो भी कहे / चर्चा करें वह केवल अपने पूर्वाचार्य के श्रीसूक्ति पर आधारित होना चाहिये।
  • ज़ोर से वार्तालाप करना बाधा है। भगवान श्रीराम कि स्तुति करते समय यह कहा गया है कि “मृदु पुर्वंच भाषते” – मधुर बोलना बहुत अच्छा है।
  • गपशाप और व्यर्थ चर्चा करना विरोधी है।
  • जोर से हँसना विरोधी है।
  • अंजली मुद्रा में न रहना बाधा है। जब कोई भी कैंकर्य न कर रहे हो तब अपने हाथों को अंजली मुद्रा (नमस्कार अवस्था) में रखना चाहिये।
  • हाथों में भीख माँगनेवाला कटोरा लेने में लज्जा नहीं आनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह ब्राह्मण धर्म का एक हिस्सा है कि खाने के अनाज के लिये भिक्षा मांगे। हमारे सम्प्रदाय के कई बड़े पूर्वाचार्य जैसे श्रीकुरेश स्वामीजी, श्रीवेदांताचार्य स्वामीजी आदि उच्छ वृत्ती का कैंकर्य करते थे।
  • चौड़ी छाती करके नहीं चलना चाहिए- अपने व्यवहार में करुणा रखना चाहिए।
  • तेज तेज चलना और मानसिक तनाव के साथ चलना बाधा है। सभी को धीरे और शान्त रीति से चलना चाहिये।
  • धोती को उपर लेना और उसे पहनना अपमान जनक माना जाता है।
  • भगवत विषय को सुनकर और भागवतों को देखकर सभी को अति भावुक और रोमांचित होना चाहिये। ऐसा न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान स्वयं अपने भक्त के ८ गुणों को समझाते है और उसमें से एक गुण भगवान के विषय को सुनकर पवित्र मनोभाव होना यह है। वह कहते है मेरे भक्तों में यह ८ गुण जरूरी है – १) भगवान के भक्तों में निर्हेतुक प्रेम, २) भगवान की पूजा करने में आनन्द आना, ३) स्वयं भगवान कि पूजा करना, ४) अहंकार रहित रहना, ५) भगवान के विषय में श्रवण करने की प्रीति रहना, ६) जब भगवान के विषय में सुनते/ सोचते/ बोलते है, तब शारिरीक बदलाव आना ७) हमेशा भगवान के बारे में सोचना, ८) भगवान के पूजा के बदले में सांसारिक लाभ नहीं मांगना। ऐसे भक्त अगर वे म्लेच्छ भी हो, वे मेरे समान ही ब्राह्मणों, योगियों, कैंकर्य करने वालों, और यहाँ तक की सन्यासियों और विद्वानों द्वारा पूजनीय है। वे उन विद्वानों से ज्ञान प्रदान और स्वीकार करने के योग्य है”। उसी प्रकार, यह भी समझाया गया है कि, एक श्रीवैष्णव को देखने पर, हमें उसी प्रकार हर्ष का अनुभव होना चाहिए जिस प्रकार शीतल चंद्रमा को देखकर होता है, ठंडी बयार का अनुभव करते हुए होता है और अत्यंत उत्कृष्ट चन्दन का लेप लगाकर होता है।
  • भगवान और भागवतों के बिछड़ने पर वियोग नहीं होना। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति पदिगम 8.2.1 में अपना दुख प्रगट करते हुए कहते है “नंगल वरीवलै”। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी और उनके शिष्य श्रीदेववारि आण्डान के बीच कि घटना का स्मरण करते है – जब श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी तिरुवनंतपुरम जाते है, श्रीदेववारि आण्डान बहुत बीमार हो जाते है और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी को देखने के बाद पुन: ठीक होते है।
  • हमारे ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, हमारे रूप से प्रदर्शित होना चाहिये। उस व्यक्ति को देखकर स्वयं से इसे समझ लेना चाहिये। ऐसा न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुरेश स्वामीजी के चरित्र में यह कहा गया है कि जो भी स्वामीजी को देखेगा वह पवित्र हो जायेगा – ऐसे उनके गुण थे।
  • अपने वैष्णवत्वं का अपने स्वरुप से बोध नहीं होना बाधा है। पूर्व अनुच्छेद के समान ही।

हम अगले अंक के अगले भाग में इस विषय को आगे बढ़ाएंगे।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/02/virodhi-pariharangal-11.html

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