विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १२

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १

भगवद, आल्वार और आचार्य – हमारे विचारों और ध्यान का उद्देश

४३) स्मरण विरोधी – विचारों / ध्यान / चिंतन में बाधाएं

स्मरण का अर्थ किसी पर ध्यान या चिंतन करना। इस अंश में किस पर ध्यान करना है और किस पर ध्यान नहीं करना है इसका उल्लेख किया गया है।

  • जैसे विष्णु पुराण में बताया गया है “अन्ये तु पुरुषव्याग्र चेतसा येपी अपाश्रया: अशुद्धास्ते समस्ता तु देवात्या: कर्मयोनय:” अर्थात हमें किसी भी देवतान्तर जैसे रुद्र, स्कंध, दुर्गा आदि पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करना चाहिए अपितु केवल भगवान श्रीमन्नारायण के दिव्य स्वरुप पर ही मन को केन्द्रित करना चाहिये। देवतान्तर पर केन्द्रित करना महान बाधा है। यह भी सत्य है कि जिसका कोई रुप या नाम न हो ऐसी वस्तु पर भी केन्द्रीत करना कठिन है। इसलिये हमें उन भगवान के पवित्र नामों या अर्चावतार पर, जो शुभ और ध्यान लगाने में सरल है, उन पर पूर्णत: ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
  • अपने आचार्य के पवित्र रुप का ध्यान न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी एक उत्सव के समय एक श्रीरंगम आते है और वहां पूरे समय के लिये निवास करते है। श्रीरामानुज स्वामीजी पूरे उत्सव में स्वामीजी की सेवा करते है। जब वो प्रस्थान करते है, तब श्रीरामानुज स्वामीजी उनसे पूछते है “कृपया मुझे कुछ अच्छे उपदेश प्रदान करें जिनकी मैं शरण ले सकु”। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कुछ पल के लिये अपने नेत्रों को बन्द कर फिर कहते है “हम श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के सानिध्य में आध्यात्मिक विषय पर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उस समय जब वे नदि में स्नान कर रहे होते थे और जब पीठ को उपर कि तरफ कर डुबकी लगाते थे तो उनकी पीठ सुन्दर चमकते हुए ताम्बे का मटके कि तरह दिखाई पड़ती थी मैं हमेशा उस पवित्र दृष्टी की शरण होता था। आप भी उसे ही अपना शरण मानो” – यह घटना बहुत प्रसिद्ध है। यह घटना ६००० पदि गुरु परम्परा प्रभावम में भी समझायी गयी है। यह घटना यह बताती है कि शिष्य का आचार्य के पवित्र रुप पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। यह कहा गया है कि श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी तिरुक्कोष्टीयूर मन्दिर के गोपुर पर बैठकर श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी का ध्यान करते थे और “यामुनैत्तुरैवर” (यामुनाचार्य) मन्त्र का जप करते थे। यह घटना अन्तिमोपाय निष्ठा में भी दिखायी गयी है।
  • भागवतों के समूह में ध्यान नहीं करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति के कई पाशुरों में भागवतों कि स्तुति करते है जैसे “पयिलुम चुदरोली” और “नेडुमार्क्कडिमै” पधिगम। श्रीकुलशेखर स्वामीजी भगवातों के प्रति अपना प्रेम और तपस्या पेरुमाल तिरुमोझी के “तेट्टरुम तिरल” पधीगम में कहते है। अन्य आचार्य और आल्वार भी यही कहते है कि हमें भागवतों का हमेशा स्मरण और ध्यान करना चाहिये।
  • सांसारिक लोगों के विषयों पर चिंतन करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपरकाल स्वामीजी परिय तिरुमोझी में कहते है “नण्णाद वाळ अवुणर” अर्थात “एक क्षण के लिये भी मैं उनके बारे में विचार नहीं करूंगा, जो ठंडे तिरुक्कड़ल्मल्लै (महाबलिपुर्) दिव्यदेश में स्थलशयन भगवान का ध्यान नहीं करते है”। सांसारिक जनों को केवल खाना, कपड़े, आराम कि वस्तु मिले वे लोग बस इसी विषय पर केन्द्रित रहते है।
  • उस दिव्यदेश का ध्यान न करना जो भगवान और भागवतों को प्रिय हो, वह बाधा है। और अन्य क्षेत्र जो भगवद, आल्वारों और आचार्य से संबंधीत न हो उस पर केन्द्रीत करना भी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह कहा जाता है कि भगवान अर्चा अवतार का रूप हम सब जीव पर कृपा करने हेतु लेते है। वह कई मन्दिर, मठ, तिरुमाली आदि में जीवात्मा कि सहायता करने हेतु विराजमान होते है। इन क्षेत्रों में जहाँ आल्वारों ने स्तुति कि है उस क्षेत्र को दिव्यदेश कहा गया है। जो आचार्य को प्रिय है उन्हें अभिमान स्थल कहा गया है। सामान्यत: कई क्षेत्र है जो श्रीवैष्णवों को प्रिय है। हमारा केन्द्र और ध्यान उसी स्थान पर रहना चाहिये जो भगवान, आचार्य और आल्वारों से संबंधीत हो।
  • भागवतों के लिए प्रिय विषय पर ध्यान न देकर सांसारिक विषय पर ध्यान देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आल्वारों और आचार्य का ध्यान हमेशा इस बात पर होता है कि हम सब भगवद विषय में लगे रहे। सांसारिक जनों का ध्यान हमेशा धन, आनंददायक वस्तुये जैसे खेल, संगीत, सिनेमा आदि पर ही केन्द्रीत रहता है। प्रपन्न होने के कारण हमें हमेशा आचार्य और आल्वारों के मार्ग पर चलना है न कि सांसारिक जीवों के।
  • भगवद और भागवतों के अच्छे गुणों का ध्यान न करना और अवैष्णवों के गुणों का गुण गान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण जब हम किसी श्रीवैष्णव को देखते है, जिन्हें भगवान और उनके भक्तों के प्रति बहुत लगाव तब हमें भी ऐसे गुणों कि तरफ ध्यान देना चाहिये ताकि हम भी ऐसे गुण स्वयं में आत्मसात कर सके। जब हम धन, उच्च स्थान अन्य में (अन्य श्रीवैष्णव भी) देखते है,जो हमें इस संसार से बाँधे रखता है,  तो हमें उनसे प्रेरणा नहीं लेना चाहिये।
  • इस बात का विश्लेषण करना कि भगवान के अर्चा अवतार के विग्रह किस धातु से बने है यह बहुत बड़ी बाधा है। यह सोचना कि सोने का विग्रह उच्च और लकड़ी के विग्रह हीन यह गलत है। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह कहा गया है कि अर्चा विग्रह के धातु का विश्लेषण करना यानी अपने माँ कि पवित्रता पर संदेह करने के समान है।
  • उसी तरह, ज्ञान और भक्ति में श्रेष्ठ श्री वैष्णव का उनके जन्म, धन, अनुष्ठान आदि पर भेद करना बाधा है। तिरुपति में श्रीभक्तांघ्रीरेणु स्वामीजी भगवातों कि स्तुति पाशुर के (मेम्पोरुल पाशुर के पश्चात) अन्त तक करते है। सभी को इस पाशुर को निरन्तर याद कर भगवातों के प्रति सम्मान और आदर का परिचय देना चाहिए। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव को उनके जन्म के आधार पर आंकना ऐसा ही जैसे अर्चा अवतार भगवान को उस धातु जिससे उन्हें बनाया गया है के आधार पर आंकना, यह बड़ा पाप है।
  • अपने आचार्य को सामान्य मनुष्य समझना बाधा है। प्रमाण वाक्य के अनुसार ,”आचार्य स हरी साक्षात – चररूपी नमस्या:” आचार्य स्वयं हरी है, जो हिल मिल सकते है। हमें कभी भी आचार्य को साधारण जीव नहीं समझना चाहिये।
  • हमें आचार्य के प्रति बहुत कृतज्ञ होना चाहिये। कृतज्ञता होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है कि आचार्य के माध्यम से में भगवान प्राप्त होते है और भगवान के द्वारा आचार्य की प्राप्ति होती है। इसलिये आचार्य हम पर सबसे बड़ी कृपा कर हमें भगवद प्राप्ति करा कर इस संसार बन्धन से मुक्त कर रहे है। इसलिये सभी को यह स्मरण रहना चाहिए और हमेशा आचार्य के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिये।
  • भागवतों को तुच्छ समझना बहुत बड़ी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी श्रीवैष्णवों को आचार्य के समान समझना चाहिये। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भगवद, भागवत, असह्य अपचार के बारें में दर्शाते समय अन्य श्रीवैष्णव को तुच्छ समझना बहुत बड़ा भागवत अपचार है यह समझाते है। हमें हमेशा अन्य भागवतों को भगवान और स्वयं से उच्च समझना चाहिये और उन्हें अधिक सम्मान और महत्त्व देना चाहिये।
  • आल्वारों के पाशुरों को दिव्य प्रबन्ध कहते है। वे “अरुलीच्चेयल” नाम से भी प्रसिद्ध है। उन्हें तमील भाषा में लिखा गया है। कुछ कहते है संस्कृत देव भाषा है और तमिल कमतर है। परन्तु श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है “चेन्नीरत्त तमिलोसै वडचोल्लागी” – जिसका अर्थ “सुन्दर तमील ध्वनी संस्कृत हो गयी”। जैसे आचार्य हृदयं में नायनार ने यह पहचाना कि “आगस्त्यमुम अनादी” – तमील भाषा जो अगस्त्य ऋषी ने प्रगट कि वह भी नित्य है। क्योंकि वह एक ऋषी द्वारा प्रगट हुई है उसे संस्कृत से छोटा नहीं माना जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार अपने आचार्य हृदयं ग्रन्थ में श्रीशठकोप स्वामीजी और उनके दिव्य प्रबन्ध कि स्तुति करते है। इस ग्रन्थ में वह यह स्थापित करते है कि हम आल्वारों का जन्म के आधार पर भेद नहीं करते, क्योंकि वे स्वयं भगवान के कृपा पात्र है, उनकी महिमा अपार है। उसी तरह वह यह स्थापित करते है कि यद्यपि वह दिव्य प्रबन्ध तमील में है, उनकी महिमा अपार है। वे बड़ी सुन्दरता से यह समझाते है कि अगर हम पवित्र संस्कृत में लिखी ग्रन्थ को अपनाते है तो हमें बौद्ध शास्त्र को अपनाना चाहिये। अगर हमें लेखक के जन्म के आधार पर किसी को अस्वीकार करना है, तो हमें महाभारत और भगवद्गीता को अस्वीकार करना चाहिये क्योंकि दोनों हीं लेखक ब्राह्मण नहीं है। अत: वे बड़ी सुन्दरता से यह स्थापित करते है कि प्रबन्ध कि स्तुति उसकी भाषा या उसके लेखक के जन्म पर निर्भर नहीं होती है परन्तु उस प्रबन्ध के तत्व पर होती है – अर्थात जब तक वह भगवान श्रीमन्नारायण कि स्तुति कर रहा है वह स्वीकारनीय है।
  • आत्म यात्रा (आत्मा की गतिविधियों) कि महिमा को भूल देह यात्रा (शरीर की गतिविधियों) पर केन्द्रीत होना बाधा है। आत्म यात्रा अर्थात जीवात्मा के कल्याण को देखना और उसीप्रकार व्यवहार करना। देह यात्रा अर्थात देह के कल्याण के बारें में सोचना और वैसे ही व्यवहार करना। आत्म कल्याण की तुलना में हमें देह कल्याण पर केन्द्रीत नहीं होना चाहिये।
  • उन गतिविधियों के स्वभाव और विशेषताओं के विषय में सोचना,जो भगवत अनुभव पर केन्द्रित न हो,यह बाधा है। भगवान का दास होना और भगवत इच्छा से कार्यरत होना यह जीवात्मा का स्वभाव है– इसके विपरीत होना यह जीवात्मा के स्वभाव के लिए उचित नहीं है।
  • अपना स्वभाव जो की पूरी तरह से उपाय रूप में भगवान पर अवलंबित है, उसे भूल जाना बाधा है। भगवान सिद्ध साधन कहलाते है –अर्थात “उपाय जो की हमेशा फल प्राप्ति कराने के लिए तैयार हो।” हमें इस पक्ष को कभी भूलना नहीं चाहिए।
  • साध्य साधन (उपायान्तर जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग) के विचारों के प्रति आकर्षित होना, बाधा है। साध्य साधन का अर्थ है “स्वयं के प्रयत्न से अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना”।
  • केवल भगवद कैंकर्य के विषय पर ध्यान केन्द्रीत करना और भागवत कैंकर्य का विस्मरण करना, यह बाधा है।
  • भगवान और भागवतों के लिए किये गए कार्यों के विषय में सोचना (अभिमान से) और उनके प्रति किये हुए प्रतिकुल व्यवहार से घबराना नहीं। यह दोनों बाधाएं है।
  • आचार्य ने हम पर असीम कृपा की है, निरन्तर धन्यवाद प्रगट करना चाहिये, ऐसा न करना बाधा है।
  • यह सोचना कि अन्त समय में भगवान के विषय में सोचना आवश्यक है, वह बाधा है। जो कर्म, ज्ञान, भक्ति योग में लगा हुआ है, उसे परमपद कई जन्म के पश्चात प्राप्त होगा। ऐसे व्यक्ति को अन्त समय में भगवान के विषय में सोचना आवश्यक है। परन्तु प्रपन्नों को अन्तिम स्मृति कि कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे भगवान वराह चरम श्लोक में कहते है “अहं स्मरामि मत भक्तं” – अपने भक्तों के अन्तिम समय में, मैं उनका स्मरण करता हूँ और उनका कल्याण करता हूँ, प्रपन्नों को मोक्ष प्रदान कर परमपद प्रदान करें यह भगवान कि ज़िम्मेदारी है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे हम अपने बहुत से पूर्वाचार्यों के जीवन में देख सकते है कि जब वे अपनी तिरुमेनी (शरीर) छोड़ते है, तो वे अपने आचार्य को स्मरण करते है न कि भगवान का। यह स्थापित किया जा सकता है कि अन्त समय में अपना मन स्थिर हो तो हमें अपने आचार्य का स्मरण करना चाहिये न कि भगवान का – क्योंकि हमें आचार्य अभिमान निष्ठा वाले ऐसा समझा जाता है।

हम अगले अंक के अगले भाग में इस विषय को आगे बढ़ाएंगे।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/02/virodhi-pariharangal-12.html

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Disciple of SrImath paramahamsa ithyAdhi pattarpirAn vAnamAmalai jIyar (29th pattam of thOthAdhri mutt). Descendant of komANdUr iLaiyavilli AchchAn (bAladhanvi swamy, a cousin of SrI ramAnuja). Born in AzhwArthirungari, grew up in thiruvallikkENi (chennai), presently living under the shade of the lotus feet of jagathAchArya SrI rAmAnuja, SrIperumbUthUr. Learned sampradhAyam principles from vELukkudi krishNan swamy, gOmatam sampathkumArAchArya swamy and many others. Full time sEvaka/servitor of SrIvaishNava sampradhAyam. Taking care of koyil.org portal, which is a humble offering to our pUrvAchAryas. koyil.org is part of SrI varavaramuni sambandhi Trust (varavaramuni.com) initiatives.

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