Monthly Archives: August 2016

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) -१५

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १४

४६) सेवा विरोधी – भगवान कि पूजा करने में बाधाएं

श्रीवैष्णव परिभाषा में “सेवा” का बहुत प्रकार से अर्थ है। सामान्यत: भगवान का दर्शन करने को भी सेवा कहते है। साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना और अंजली (नमस्कार) करने को भी सेवा कहते है। पाशुरों का गान, ग्रन्थ वाचन करना भी सेवा है। संक्षेप में, किसी भी प्रकार का कैंकर्य, सेवा कहलाता है। कई पहलू – विशेषतः मन्दिर में भगवान कि सेवा के बारे में अनेक विषयों में समझाया गया है।

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श्रीरंगनाथ भगवान – श्रीरंगम

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श्रीरामानुज स्वामीजी सभी आचार्यों सहित

  • जब भी हम दिव्य देश, अभिमान स्थल आदि की यात्रा के लिये जाते है, तब वहां हमें उन स्थानों पर नहीं जाना चाहिये जो भगवान (मुख्य रूप में अर्चावतार) से सम्बंधित नहीं है। अगर हमें मजबूरी में ऐसे स्थानों पर जाना पड़े, तब उस स्थान के मुख्य आकर्षण कि ओर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिये। हमारा मन केवल भगवद विषय में होना चाहिये ओर कहीं नहीं। अनुवादक टिप्पणी: आजकल यह देखा जाता है कि कई जन दिव्यदेश यात्रा के साथ पर्यटक आकर्षण स्थान, ख़रीदारी आदि को भी जाते है। दिव्यदेश जाते समय ऐसे स्थान से बचना चाहिये। दिव्यदेश वह स्थान है, जहाँ भगवान स्वयं अर्चावतार रूप लेकर हम जीवों का उद्धार करने हेतु आये हैं। यह भगवान के सौलभ्य और कृपा का अंतिम स्वरूप है। हमें ऐसे दिव्य देशों कि महिमा को जानना चाहिये और अपने चित्त में आल्वारों के पाशुर और आचार्य के स्तोत्र का अनुसंधान कर भगवान के मंगलाशासन पर केन्द्रीत करना चाहिये।
  • मन्दिर और स्तम्भ देख हमें पहिले यह जानकारी लेनी चाहिये कि यह मन्दिर / स्तम्भ भगवान का है या नहीं। अगर वह मन्दिर देवता या अवैधिक धर्मों का है, तो हमें उन्हें सम्मान देने कि कोई अवश्यकता नहीं है। अगर कोई गलती से भी ऐसे मन्दिर / स्तम्भ का सम्मान करता है, तो उसे उस गलती पर पछताना चाहिए और शुद्ध होना चाहिए। इस संदर्भ में हम एक दृष्टांत श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के श्रीसहस्त्रगीति पर ईडु व्याख्या में देख सकते है।) श्री धनुर्दास स्वामीजी के भतीजे( वंदार और चोंदार उस प्रदेश के राजा उरैयूर के साथ घूमने निकले थे। राजा ने उनको एक जैन मंदिर दिखाया और कहा की यह भगवान विष्णु का मंदिर है, तब वंदार और चोंदर ने विष्णु भगवान का मंदिर जानकर साष्टांग कर लिया, साष्टांग करने के बाद राजा ने कहा की यह तो जैन का मंदिर है, मैंने तुम्हारे साथ मज़ाक– मस्ती की है, यह सुनते ही वंदार और चोंदार बेहोश होकर गिर गये। उनकी बेहोश की खबर सुनकर श्रीधनुर्दास स्वामीजी उनके पास आये और अपनी चरणरज उन पर प्रोक्षण किया, ऐसे करते ही वे तुरंत होश मे आ गये। इससे यह मालूम होता है की देवी देवताओं के मंदिर में हम लोगों को कभी प्रवेश नहीं करना चाहिए। भूलकर अगर किसी देवी देवता का दर्शन हो जाए, प्रसाद ले लिए, तो उसके प्रायश्चित हेतु परम भागवतों की चरणरज, श्रीपाद तीर्थ लेना चाहिए।
  • भगवान के मन्दिर और स्तम्भ को देखते हीं हमें तुरन्त बहुत आनंदित होना चाहिये, पूर्ण अभिवादन करना चाहिये, गाड़ी से उतरना चाहिए (अगर हम गाड़ी में यात्रा कर रहे है तो) और जुते (अगर पहिने हो तो) खोलना चाहिए। ऐसा न करना बाधा है।
  • जुते पहनकर दिव्य देश में प्रवेश नहीं करना। कम से कम मन्दिर कि गली प्रारम्भ होने से पहिले उन्हें खोल देना चाहिये।
  • आचार्य और श्रीवैष्णवों कि तिरुमाली के प्रवेश द्वार को सम्मान दिये बिना अंदर प्रवेश नहीं करना।
  • आचार्य और श्रीवैष्णवों कि तिरुमाली में प्रवेश किये बिना भगवान के मन्दिर में जाना बाधा है। अगर आचार्य कि तिरुमाली भगवान के मन्दिर के निकट है तो हमें सर्व प्रथम वहाँ जाकर आचार्य कि सेवा और उनके तिरुवाराधना भगवान कि पुजा कर के हीं मन्दिर में जाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हीं है जो हमें भगवान के दर्शन कराते है। श्रीवैष्णव हमें आचार्य के सन्मुख कराते और भगवान के महान तत्त्वों को समझाते है। इसलिये भगवान के सन्मुख आचार्य और श्रीवैष्णव पुरुषकार से ही दर्शन प्राप्त करना चाहिये न कि स्वतंत्र रूप से। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति 4.6.8 में इसे दर्शाते हुए कहते है “वेदं वल्लारगळैक कोण्डू विण्णोर पेरुमान तिरुप्पादम् पणिन्दू” – नित्य सुरियों के मार्गदर्शक श्रीभगवान के चरण कमलों की आराधना ऐसे श्रीवैष्णवों के पुरुषकार से करना चाहिए, जो वेदों में निपुण है।
  • दण्डवत प्रणाम किए बिना मन्दिर के अन्दर प्रवेश नहीं करना चाहिये।
  • मन्दिर में शरीर के उपरी भाग को उत्तरियम (कमर के ऊपर का कपड़ा) से ढक कर जाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम दास है– भगवान के नौकर (दास)। दास जन अपने मालिक के सामने कभी भी अपनी छाती ढककर नहीं रखते है। यह तत्व आज भी केरल राज्य में देखा जाता है, जहाँ पुरुष अपनी कमीज निकालकर और औरते साड़ी पहनकर ही मन्दिर में प्रवेश करती है। यह प्रथा दक्षिण के कुछ दिव्य देशों में भी आज भी पालन की जाती है, जैसे वाणमामलै (तोताद्री) आदि।
  • भगवान और बलि पीठ (वह स्थान जहाँ परिवार के देवता आदि को भेंट दिया जाता है) के मध्य में आना बाधा है।
  • मन्दिर में अप्रदक्षीणा (घडी की सुई के विपरीत दिशा से) प्रवेश करना बाधा है। सन्निधीयों में प्रदक्षीणा (सीधी दिशा) से ही प्रवेश करना चाहिये।
  • मुख्य सन्निधि के बाहर की सीढियों पर सीधे पैर रखना या चलना, यह योग्य शिष्टाचार नहीं है। पेरुमाल तिरुमौली 4.9 में श्रीकुलशेखर अल्वार भगवान श्रीवेंकटेश से कहते है “पडियाय्क्किडन्दु उन पवलवाय् काण्बेने ” – मैं आपके मंदिर की मुख्य सन्निधि के प्रवेश द्वार की सीढ़ी बनकर आपके सुंदर मोती जैसे मुखारविंद का अत्यंत आनंदपूर्वक मंगलाशासन करना चाहता हूँ।
  • मंदिर के अन्य सन्निधी की पूजा किये बिना सीधे मुख्य सन्निधी में जाकर पूजा करना बाधा है। सामान्यत: अम्माजी, आचार्य / आल्वारों कि सन्निधी प्रदक्षीणा में होती है। उनकी पूजा करने के पश्चात ही मन्दिर के मुख्य सन्निधी में प्रवेश करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: पूर्व दिनचर्या के २३वें श्लोक में श्रीएरुम्बी अप्पा उस क्रम को दर्शाते है, जिससे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगम में श्रीरंगनाथ भगवान का मंगलाशासन प्रतिदिन किया करते थे। “देवी गोदा यतिपति शठद्वेशिणौ रङ्गश्रुङ्गं सेनानाथो विहग वृषभ: श्रीनिधि: सिन्धुकन्या। भूमा नीला गुरूजनवृत: पुरुष: चेत्यमीशां अग्रे नित्यं वरवरमुने: अंघ्रियुग्मं प्रपध्ये ॥ – मैं प्रतिदिन श्रीगोदाम्बाजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरंग-विमान, श्रीविष्वक्सेनजी, श्रीगरुडजी, श्रीरंगनाथ भगवान– जो श्रीमहालक्ष्मीजी के धन है, परमपदनाथ है, श्री-भूदेवी-नीलादेवीजी और कई आचार्यों और आल्वरों से घिरे हुए है, के समक्ष श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों की आराधना करता हूँ। इस श्लोक में श्रीएरुम्बी अप्पा बहुर सुन्दरता से श्रीरंगम मन्दिर और क्रम से कई अन्य सन्निधी का वर्णन करते है। यह हमारे सम्प्रदाय में एक सामान्य ज्ञान है कि भगवान के दर्शन के पहिले हम आल्वार, आचार्य, अम्माजी के दर्शन प्राप्त करते है।
  • मन्दिर के पवित्र विमान के छाया पर भी हमें पैर नहीं रखना चाहिये। ऐसा करना बाधा है – किसी को भी यह कभी भी नहीं करना चाहिये।
  • मन्दिर के द्वारपाल (जय, विजय आदि) कि आज्ञा के बिना अंदर प्रवेश नहीं करना चाहिये। सन्निधी में अन्दर जाने के पूर्व हमें तिरुपावै के १६वें पाशुर का गान करके अन्दर प्रवेश करना चाहिये “नायगनाय निन्र” – इस पाशुर में श्रीगोदाम्बाजी हमारे लिये सही शिष्टाचार स्थापित करती है कि भगवान के सन्निधी में प्रवेश करने के पूर्व हमें द्वारपाल कि आज्ञा लेनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमें प्रतिदिन अपनी तिरुमाली में अपने पेरुमाल के तिरुवाराधन से पूर्व भी, इस पाशुर के गान के पश्चात ही मन्दिर के पट खोलने चाहिये।
  • श्रीविष्वक्सेनजी की आज्ञा के बिना मन्दिर में प्रवेश करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीविष्वक्सेनजी परमपदधाम में भगवान के मुख्य प्रबंधक है और भगवान के एक मुख्य नित्यसूरी है। वह हमारी गुरू परम्परा का एक अंश है, जो इस तरह है श्रीरंगनाथ भगवान, श्रीरंगनायकी अम्माजी, श्रीविष्वक्सेनजी, श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीनाथमुनि स्वामीजी आदि से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तक। इसलिये भगवान के सन्निधी में जाने से पूर्व इनकी आज्ञा लेना ही योग्य है।
  • हमें कभी भी अपने आचार्य के सानिध्य में ही भगवान के निकट जाना चाहिये।  अनुवादक टिप्पणी: आचार्य वह है, जिन्होने हमें भगवान से हमारे पवित्र सम्बन्ध का स्मरण कराया है। हमें हमेशा उनके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिये और भगवान के दर्शन उनके जरिये ही करना चाहिये। अपने तिरुमाली के भगवान के तिरुवाराधना करते समय भी हमें अपने हाथो को आचार्य के हाथ समझकर ही उनके निमित्त तिरुवाराधना करना चाहिये।
  • सन्निधी के अन्दर बिना कोई संकोच मध्य में से प्रवेश करना बाधा है। हमें सन्निधी में बड़े श्रद्धा और नम्रता पूर्वक बगल से प्रवेश करना चाहिये।
  • अगर कोई कमरा दाहिनी ओर है, तो बायें तरफ जाकर वहां भगवान की पूजा करना करना बाधा है।
  • सांसारी लोगों के समूह में भगवान कि पूजा करना बाधा है। जितना हो सके इससे बचना चाहिये।
  • सदा भगवान के चरण कमलों से प्रारम्भ कर उनके पवित्र मस्तक तक उन्हें निहारते हुए तब तक दर्शन करना चाहिए जब तक अपने हृदय और नेत्र को संतुष्टी प्राप्त न हो। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कि आराधना करने का एक उच्च उदाहरण है श्रीपरकाल स्वामीजी द्वारा भगवान की आराधना। उन्होंने अमलनाधिपिरान की रचना कि जो भगवान रंगनाथ के पवित्र अंगों के विषय में वर्णन करते है। अन्त में वह प्रार्थना करते है कि वह आंखें जिन्होंने भगवान रंगनाथ को देखा और पसन्द किया है, वो और कुछ नहीं देखेंगी। ऐसा हमारा भाव रहना चाहिये।
  • भगवान कि पूजा तिरुपल्लाण्डु और अन्य दिव्य प्रबन्ध के पाशुरों को गाकर (उस दिव्य देश से सम्बन्धित आदि) और पूर्वाचार्य के स्तोत्र के साथ करनी चाहिये।
  • हमें सांसारिक लोगों के जैसे सांसारिक लाभ के श्लोक आदि गान कर पूजा नहीं करनी चाहिये।
  • भगवान से कोई सांसारिक लाभ प्राप्त होगा इस उद्देश से उनकी पूजा नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसरोयोगी स्वामीजी मुदल तिरुवंदादि में समझाते है कि “एलुवार विडैगोल्वार ईन तुलायानै वलुवा वगै निनैन्दु वैगल तोलुवार विनैच्चुडरै नन्दुविक्कुम वेङ्गटमे वानोर मनच्चुडरैत्तूण्डुम मलै” – वेंकटेश्वर भगवान के समीप तीन प्रकार के लोग जाते है – वह जो सांसारिक लाभ को देखते है, वह जो कैवल्य को देखता है और अन्त: में वह जो नित्य कैंकर्य को देखता है। ऐसे तीन प्रकार के जनों के लिये तिरुवेंकट का पहाड़ ही सभी बाधाओं को दूर कर देगा (उन्हें प्राप्त करने वाले इच्छाएं)। इस तीनों प्रकार के प्राणियों में हमें इस प्रकार रहना चाहिये “इन तुलायानै वलुवा वगै नीनैन्डू वैगल तोलुवार” – वह जो दोषरहित होकर निरन्तर भगवान कि पूजा करता है।
  • भगवान कि पूजा करते समय मन पूरी तरह भगवान पर ही केन्द्रीत रहना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • पूजा करते समय मन भगवान पर ही निश्चित/ दृढ रहना चाहिये। उसे मक्खी के तरह नहीं रहना चाहिये जो नये बर्तन पर नहीं बैठती क्यूंकि उस पर कोई खाने का पदार्थ नहीं होता है।
  • मन्दिर में भगवान के तिरुवाराधना और भगवान को भोग लगाने के पश्चात प्रसाद परिवार के देवताओ को बलि पीठम में दिया जाता है। उसके पश्चात शातुमोरा (पासुरोंका पाठ पूर्ण किया जाता है) होता है। मध्य में (अर्थात तिरुवाराधना के पश्चात) किसी को भी उठकर नहीं जाना चाहिये।
  • धुपं (सुगंध), दीपं, तिरुवंधिक्काप्पु (बुरी नज़र को मिटाने के लिये की गयी आरती), भगवान को भोग लगाने आदि के समय, हमें भगवान की उस उपचार (सेवा) पर ध्यान देना चाहिये और उस सेवा के समय उन पाशुरों का अनुसंधान करना चाहिये। ऐसा न करना और दूसरी ओर अपना ध्यान केन्द्रीत करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जीयर पड़ी तिरुवाराधना क्रम में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बहुत ही सुन्दरता से तिरुमाली में तिरुवाराधना कैसे करना चाहिये इस बात को दर्शाते है। जब भी तिरुवाराधना किया जाता है श्रीवैष्णव जन बहोत समय तक कई पाशुरों का अनुसंधान करते है। तिरुमंजन के समय पञ्च सूक्तं, श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के तिरुमोली से “वेण्णेय अलैन्था कुणुंगुम” दशकम् आदि। भगवान के श्रुंगार के समय, उन्हें चन्दन का लेप लगाने के समय हमें गंधत्वारम (श्रीसूक्तं) श्लोक, पूसुम चांतु (श्रीसहस्त्रगीति) पाशुर। आभूषण और माला धारण कराते समय “स्फूरत्किरिटांग हारकंठिका” (स्तोत्र रत्न) श्लोक, “चूट्टू नल् मालैगल” (तिरुविरुत्तम) गाना चाहिये। धुपं अर्पण करते समय “परिवतिल इसनैप्पाडि” (श्रीसहस्त्रगिती) से गाया जाता है। दीपं अर्पण करते समय “वैयम तगलिया” (मुदल तिरुवंतादी), अन्बे तगलिया (इरण्डाम् तिरुवंतादी), तिरुक्कण्डेन (मून्राम् तिरुवंतादी) गाया जाता है। आरती के समय, इन्दिरनोडु बिरमन (पेरियालवार तिरुमौली दशकम् जहाँ श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी, तिरुवेल्लारै पेरुमाल के प्रति अपना अत्यंत स्नेह प्रकट करते है) दशकम् गया जाता है। मंदिरों मे जब भगवान के लिए तरह तरह के उपचार किए जाते है, तब उस पर हमारा पूरा ध्यान होना चाहिए और उस सेवा में उचित पाशुरों का अनुसंधान करना चाहिए।
  • भगवान के अर्चा विग्रह पर ध्यान ना देकर हमें सांसारिक नाच और गाने पर ध्यान केन्द्रीत नहीं करना चाहिये।
  • भगवद / आचार्य / आल्वारों के सन्निधी में बुझते दिये को देख उसे तुरन्त सही करना चाहिये और अधिक तेज से भी नहीं रखना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। कृपया वचन भूषण का ३८२ सूत्र कि व्याख्या देखे, जहाँ ललीता चरित्र पर चर्चा की गयी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी एक पुराण के चरित्र को बताते है कि एक चूहा आकस्मिक एक बाती को दिये में ढकेलता है और अचानक उस दिये कि चमक अधिक हो जाती है और आगे वह सुंदर लड़की ललीता के नाम से जन्म लेता है जो काशी के राजा से विवाह करती है। उसके पिछले जन्म के कर्म के कारण उसे भगवान के पास जलते दीपक से अधिक लगाव हो जाता है। हम प्रपन्न को कुछ आशा के बदले में कोई कैंकर्य नहीं करना चाहिए जैसे अच्छा जन्म आदि। भगवान से स्वाभाविक प्रेम भक्ति के कारण हमें कैंकर्य करते रहना है।
  • जमीन पर धूल देखकर (भगवान\ आचार्य\ आल्वार के सन्निधि मे) उसे साफ न करना बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति में कहते है “कडैत्तलै चिय्क्कप्पेट्राल् कडुविनै कलैयलामे” – किसी के भी पाप भगवान के मन्दिर में पोछा लगाने से मिट जाते है। अनुवादक टिप्पणी: तिरुक्कण्णमंगै आन्डान सब कुछ त्याग करने के लिये प्रसिद्ध है और तिरुक्कण्णमंगै भक्तवत्सलन भगवान के सन्निधी में हमेशा रहे। उन्हें मन्दिर में झाडु लगाने के कैंकर्य में बहुत लगाव था और उस कैंकर्य को निरन्तर करते थे। नाचियार तिरुमोझी के पहिले पाशुर में श्रीपेरियवाच्चन पिल्लै दर्शाते है कि तिरुक्कण्णमंगै आणडान झाडु लगाने के कैंकर्य को अन्तिम लक्ष्य मानते थे (कुछ पाने के लिये नहीं)।
  • श्रीसहस्त्रगीति के व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से एक मुख्य बात को स्थापित करते है। इस पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान से कहते है “हम कई पीढी से बहुत भिन्न भिन्न कैंकर्य करते है जैसे मन्दिर में सफाई करना आदि”। यहाँ एक प्रश्न आता है। प्रपन्न पूर्ण रूप से भगवान को हीं उपाय मानते है। उनका कोई निजी प्रयास में हस्तक्षेप नहीं है – इसलिये कैंकर्य क्यों करना? यह श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने बड़ी सुन्दरता से इस घटना से बताया है जिसमे तिरुक्कण्णमंगै आण्डान शामिल है।   एक सहपाठक जो नास्तिक बन गया आण्डान से पूंछते है कि वें क्यों अपने आपको जमीन का पोचा लगाने के कार्य में कष्ट दे रहे है जब की उनका स्वयं कोई प्रयास नहीं है। आण्डान उन्हें एक स्थान बताते है जहां धूल है और एक स्थान जहां धूल नहीं है – वह कहते है इसका परिणाम और कुछ नहीं बल्कि वह स्थान साफ हो जायेगा और कुछ नहीं। वह पूंछते है कि “क्या तुम्हें स्वच्छ और गंदे स्थान में फर्क नजर नहीं आता है क्या?”। अत: हम यह समझ सकते है कि कैंकर्य करना दासों का प्राकृतिक कार्य है और वह कैंकर्य उपाय नहीं बन जाता है। श्रीवचन भूषण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ८८वें सूत्रं में बड़ी सुन्दरता से समझाते है “अगर एक सांसारिक जीव अपने सांसारिक इच्छाओं को पूर्ण करने हेतु कितने कार्य करता है तो एक प्रपन्न को भगवान कि सेवा करने हेतु कितनी इच्छा होनी चाहिये जो की सर्वश्रेष्ठ है और योग्य सेवा करना जीवात्मा का सच्चा स्वभाव है?”
  • भगवान के धारण किये वस्त्र, आभूषण, हार आदि देख हमें यह सोचना चाहिये कि यह भगवान के है परंतु यह विचार नहीं करना चाहिये कि “बहुत अच्छा होता अगर मैं इन्हें धारण करता”।
  • भगवान भोग को स्वीकार किये बिना और हमें प्रसाद रूप में दिये बिना भगवान के सामने लगा भोग देखकर मुह में पानी लाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: स्वाभाविकता से सब कुछ भगवान का ही है और वों हीं सब कुछ का रस ले सकते है। उन्हीं के कृपा से वह सब कुछ पाते है और अपने शेष से कृपा करते है। हमें यह सब कुछ प्रदान करने हेतु हमें उनका कृतज्ञ रहना चाहिये। क्योंकि भगवद्गीता में यह कहा गया है भगवान को भोग लगाये बिना पाना वैसे हीं है जैसे पाप को खाना। इसलिये जो भगवान के लिये बनाया गया है उस प्रसाद पर भगवान से पहिले हम उसे ग्रहण करें इस उद्देश से दृष्टी डालना यह बहुत बड़ा पाप है।
  • नीचे बताइ गयी बातों को मन्दिर के अन्दर नहीं करना चाहिये –
    • पैरों को फैलाना – पैरों को हमेशा मोड़कर रखना चाहिए।
    • वस्त्र (धोती आदि) को उपर की तरफ नहीं मोड़ना चाहिए – उसे सही तरीके से पहनना चाहिए।
    • उबासी / जम्हाई लेना
    • हाथों / पैरों से आलस्य कि अंगड़ाई लेना
    • सिर को हिलाके बालों को नीचे गिराना
    • नाख़ुन को तोड़ना / काटना
    • छींकना, नाक से बलगम को बाहर निकालना
    • थूकना
    • पान, सुपारी, तम्बाकु आदि खाना
    • शरीर के उपरी भाग को वस्त्र से ढकना
    • सोना, उबासी लेना
    • फालतु बाते करना
    • जोर से ताली बजाते हँसना
    • किसी को बुलाने के लिये ज़ोर से आवाज देना
    • दूसरों को ड़ाटना
    • दूसरों पर घुस्सा होना
    • नम्रता बिना अभिमान करना
  • मन्दिर में सांसारिक जनों से बात करना और श्रीवैष्णवों कि ओर ध्यान न देना।
  • भागवतों कि सेवा किये बिना भगवान कि सेवा करना।अपने स्वयं के आचार्य के कैंकर्य से बचना। अनुवादक टिप्पणी: उपदेश रत्नमाला में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ६४वें पाशुर में एक मुख्य तत्व को बताते है। वह कहते है “कोई भी अपने आचार्य कि सेवा तभी कर सकता है जब उसके आचार्य इस संसार में है। यह समझने के पश्चात भी अगर कोई अपने आचार्य कि सेवा न करें तो हम क्या कहे?”
  • हमें अपने आचार्य के पीछे उनकी परछाई की तरह जाना चाहिये और हमेशा उनकी सेवा करनी चाहिये। श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी की “रामानुज पद छाया” – श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमल कि परछाई ऐसे स्तुति होती है। हम श्रीमहदयोगी स्वामीजी के पेरिय तिरुमोझी के अन्तिम पाशुर कि अन्तिम पंक्ति को देख सकते है “चायै पोलप्पाड वल्लार तामुम अणुक्कर्गले”। अनुवादक टिप्पणी: इस पाशुर के व्याख्या में श्रीपेरियवाचान पिल्लै एक सुंदर घटना को समझाते है। कुछ श्रीवैष्णव जन श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के पास जाकर इस वाक्य का अर्थ समझाने को कहते है। इस पंक्ति का यथाशब्द अनुवाद है “जो परछाई कि तरह गा सकते है वें भगवान के प्रिय दास है” – परन्तु यह स्पष्ट नहीं दिखता है। श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी कहते है “मैंने श्रीरामानुज स्वामीजी से इसका अर्थ नहीं सुना है और वे अभी श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी से मिलने गये है। परन्तु क्योंकि आपने हमें यह पूछा है तो मुझे आपको समझाना है” और श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण पादुका को लेकर अपने सिर पर रख और कुछ पल के लिये ध्यान करते है। कुछ पल बाद अपने नेत्र खोल कर और यह कहते है “अब श्रीरामानुज स्वामीजी ने मुझे इसका अर्थ बताया है आप सुन सकते है। इसे इस तरह लिया जाना चाहिये कि पाद वल्लार – चायै पोल – तामुम अणुक्कर्गले अर्थात जो इन पाशुरों को गा सकता है वो मेरी परछाई जैसे बन जायेगा और मेरे बहुत प्रिय रहेगा”।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/02/virodhi-pariharangal-15.html

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तत्व त्रय – ईश्वर

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद वरवरमुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

तत्व त्रय

इस लेख को चित्रों के माध्यम से इस लिंक पर देखा जा सकता है- https://docs.google.com/presentation/d/1Q6qEuvsuGTv4z_5–HYzlLfRFkdprThj3xmqWoyqKCQ/present#slide=id.p

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ज्ञानपूर्ण व्यक्तियों के शिक्षण के द्वारा ईश्वर तत्व को समझना

भूमिका

प्रथमतय भगवान के स्वरुप (विशिष्ट स्वरुप) को विस्तार से समझाया गया है। यह भी स्वतः ही स्थापित किया गया है कि वह अन्य सभी तत्वों से पुर्णतः भिन्न है।

स्वरुप – स्वरुप से ईश्वर

  • किसी भी अमांगलिक गुण से रहित (अर्थात सदा सभी दिव्य और कल्याण गुणों से परिपूर्ण है)
  • असीमित है,
    • समय/ काल के संदर्भ में – अर्थात भगवान नित्य/ अनादी है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य सभी में उपस्थित है
    • स्थान के संदर्भ में – लौकिक और पारलौकिक संसार सभी स्थानों में उपस्थित है– सर्वव्यापी स्वरुप
    • जीवों/ वस्तुओं के संदर्भ में – अर्थात सभी में अन्तर्यामी परमात्मा
  • संपूर्ण ज्ञान और अपरिमित आनंद का भण्डार है,
  • अनेकों दिव्य कल्याण गुणों से परिपूर्ण है जैसे ज्ञान, बल, आदि,
  • वह है, जो सृष्टि की उत्पत्ति, पोषण और संहार सभी को पुर्णतः नियंत्रित करते हैं,
  • वह है, जो 4 प्रकार के साधकों का आश्रय है (जैसा की श्रीमद भगवत गीता के 7.16 प्रकरण में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं)-
    • आर्त: – आकुल/ संतप्त
    • अर्थार्ती – वह जो नई संपत्ति को चाहता है
    • जिज्ञासु – वह जो कैवल्य को चाहता है
    • ज्ञानी – सच्चा भक्त
  • वे, जो चार प्रकार के पुरुषार्थ प्रदान करते हैं – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
  • वह जिनके अनेकों दिव्य स्वरुप है
  • वह जो श्रीमहालक्ष्मीजी, श्रीभूदेवीजी और श्रीनीलादेवीजी के प्राण प्यारे नाथ है
  • उनका प्रत्येक जीवात्मा में अन्तर्यामी परमात्मा होना, उनके स्वरुप को किंचिद भी प्रभावित नहीं करता, जिस प्रकार अनेकों देह धारण करने से जीवात्मा का स्वरुप प्रभावित नहीं होता।

भगवान के दिव्य कल्याण गुण

  • उनके दिव्य गुणों की विशेषताएं निम्न हैं-
    • नित्य/ अनंत है
    • असंख्य है – अनेकों दिव्य गुण है
    • अपरिमित है – उनमें से एक भी गुण सम्पूर्ण रूप से समझा अथवा अनुभव नहीं किया जा सकता
    • निर्हेतुक है – उनके दिव्य गुण किसी बाह्य तत्व से प्रभावित होकर प्रत्यक्ष नहीं है, अपितु वे स्वतः स्वाभाविक और प्राकृतिक है
    • दोषरहित है
    • अद्वितीय है – जिस प्रकार कोई भी अन्य भगवान के समान या उनसे बड़ा नहीं है, उसी प्रकार उनके गुणों से बढ़कर या उनके समान भी कुछ और नहीं है
  • उनके दिव्य गुण  तीन प्रकार के हैं-
    • ऐसे गुण जो उनके और उनके भक्तों के प्रति अनुकूल है
      • वात्सल्य – मातृ प्रेम

        श्रीवेंकटेश भगवान का प्रायः उनके वात्सल्य के लिए मंगलाशासन किया जाता है

        श्रीवेंकटेश भगवान का प्रायः उनके वात्सल्य के लिए मंगलाशासन किया जाता है

      • सौशील्य – दयालुता/ उदारता

        Untitled

        श्रीराम की महिमा उनके सौशील्य में है – गुहा, हनुमान आदि में हिलना मिलना

      • सौलभ्य – सुगमता से प्राप्त होने वाले

        भगवान श्रीकृष्ण की महिमा उनके सौलभ्य में है

        भगवान श्रीकृष्ण की महिमा उनके सौलभ्य में है

      • मार्ध्वं – कोमलता/ मृदुता (ह्रदय और अंगों दोनों की)
      • आर्जवं – सत्यता, आदि
    • ऐसे गुण जो उनके और उनके भक्तों के प्रति प्रतिकूल है
      • शौर्य – वीरता/ साहस
      • वीर्य – शक्ति /सामर्थ्य, आदि
    • ऐसे गुण जो सभी के लिए समान
      • ज्ञान – सभी का सम्पूर्ण ज्ञान
      • शक्ति – सामर्थ्य/ बल
      • बल – सभी का सहारा/ आश्रय प्रदान करने का सामर्थ्य
      • ऐश्वर्य – रक्षण/ नियंत्रण क्षमता
      • वीर्य – सभी कुछ नियंत्रित/ प्रबंधन करने पर भी, उनके स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं (अविकार)
      • तेजस – सभी को स्वयं संभालने की योग्यता
  • भगवान के दिव्य कल्याण गुण और उन गुणों के लक्ष्य-
    • भगवान का ज्ञान, उन जीवों की सहायता के लिए है, जो स्वयं को अज्ञानी स्वीकार करते हैं
    • भगवान की शक्ति, उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को दीन समझते हैं
    • भगवान की क्षमा, उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को अपराधी मानते हैं
    • भगवान की कृपा, उनके लिए है, जो स्वयं को इस संसार पीढ़ा से व्यथित जानते हैं
    • भगवान का वात्सल्य, उनकी सहायता के लिए है जो स्वयं को सदा दोषयुक्त समझते हैं
    • भगवान का शील (भव्यता), उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को दलित समझते हैं
    • भगवान का आर्जवं (सत्यता), उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को कपटी समझते हैं
    • भगवान का सौहाद्र (सह्रदयता), उनकी सहायता के लिए है, जो स्वयं को अच्छा नहीं मानते हैं
    • भगवान का मार्धवं (ह्रदय की कोमलता), उनकी सहायता के लिए है, जो भगवान से वियोग सहन नहीं कर सकते
    • भगवान का सौलभ्यं (सुलभता), उनकी सहायता के लिए है, जो सदा उनके दर्शन को चाहते हैं
    • और इसी प्रकार और बहुत कुछ
  • उनके गुणों का प्राकट्य इनसे होता है-
    • भगवान इस संसार में पीड़ित जीवात्माओं के दुःख को देखकर व्यथित/ चिंतित रहते हैं और सदा उनके कल्याण के लिए सोचते हैं।
    • वे सदा उन जीवात्माओं की सहायता करने का प्रयत्न करते हैं, जो विपत्ति/ संकट में है।
    • जो भगवान के शरणागत होते हैं, उन जीवों के लिए
      • भगवान जन्म, ज्ञान, कर्मों आदि पर आधारित उनके किसी भी दोष को नहीं देखते हैं।
      • भगवान उनकी रक्षा तब करते हैं, जब जीव स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता, न ही कोई और उसकी रक्षा कर सकता है।
      • भगवान शरणागतों की प्रसन्नता के लिए अद्भुत/ आश्चर्यपूर्वक कार्य करते हैं, जैसे श्रीकृष्ण ने सांदीपनी मुनि (उनके मृत पुत्र को वापस लाना) और ब्रह्मा के लिए किया (उनके पुत्रों को वापस लाना जिन्हें श्रीमहालक्ष्मीजी परमपद में श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरुप के दर्शन करने परमपद ले गयी थी)।
      • भगवान स्वयं को पूर्ण रूप से उनके लिए प्राप्य बनाते हैं।
      • शरणागतों की सहायता के पश्चाद, वे उसी प्रकार संतुष्ट होते हैं, जिस प्रकार कोई व्यक्तिगत कार्य पूर्ण होने पर होता है।
      • शरणागतों पर किये गए अनेक उपकारों पर ध्यान न देकर, वे सदा उनके द्वारा किये गए अति सूक्ष्म सुकृत्यों की ओर ही देखते हैं और अनादी काल से जीव में विद्यमान लौकिक आकांक्षाओं को भूलाने में उसकी सहायता करते हैं।
      • भगवान शरणागतों के अपराधों को उसी प्रकार क्षमा करते हैं, जिस प्रकार एक पुरुष अपनी प्रिय स्त्री और बालकों के अपराधों को सहज ही क्षमा करता है।
      • यद्यपि श्रीमहालक्ष्मीजी शरणागत जीवात्मा में दोष चिन्हित कर भी दे, पर भगवान उस दोष पर ध्यान नहीं देते हैं।
      • वे अत्यंत प्रेम से शरणागतों के दोषों के साथ उन्हें अपनाते हैं, जिस प्रकार एक प्रेमी पुरुष अपनी स्त्री के स्वेद, आदि को भी अपनाता है।
      • वियोग में, उन्हें शरणागत जीवात्मा से अधिक पीड़ा होती है।
      • जिस प्रेम और चिंता से एक गाय अपने नये जन्में बछड़े के लिए बड़े बछड़ों को दूर कर देती है उसी प्रकार, भगवान भी नये जीवात्मा के शरणागत होने पर श्रीमहालक्ष्मीजी और नित्यसूरियों को पीछे करते हैं।

उनका कारणत्व -वे सभी सृष्टि के प्रधान कारण हैं

5.

ब्रह्मा, जो भगवान श्रीमहाविष्णु की नाभि से जन्मे

  • भगवान ही सभी जगत के कारण हैं।
  • कुछ लोग कहते हैं कि अणु (सबसे सूक्ष्म पदार्थ) प्रधान कारण है। परंतु क्योंकि यह सोच शास्त्र के प्रतिकूल है, उसे प्रधान कारण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
  • कुछ कहते हैं कि पदार्थ/ अचित जगत का प्रधान कारण है। परंतु क्योंकि पदार्थ में ज्ञान का आभाव है और भगवान की आज्ञा के बिना वह स्वयं से परिवर्तित नहीं हो सकता, वह सृष्टि का प्रधान कारण नहीं हो सकता है।
  • बद्ध चेतन (जीवात्मा) जैसे ब्रह्मा, रुद्र, आदि सृष्टि का प्रधान कारण नहीं है, क्योंकि वे कर्मो से बंधे हुए हैं और इस संसार में पीड़ित हैं, इसलिए वे सृष्टि का प्रधान कारण नहीं हो सकते।
  • इसलिए ईश्वर ही सृष्टि के प्रधान कारण हैं। ईश्वर अज्ञान, कर्म, दूसरों की आज्ञा आदि विषयों के आधार पर कारण नहीं हुए, अपितु स्वयं की इच्छा से इस सृष्टि के रचयिता हैं।
  • क्योंकि सृष्टि की रचना, पोषण और संहार केवल उनकी दिव्य इच्छा से होता है, इसलिए इनमें उनके लिए कोई कष्ट नहीं है।
  • यह सब सृष्टि उनकी क्रीड़ा के लिए है।
  • परंतु क्या संहार उनकी क्रीड़ा को बाधित नहीं करता? – नहीं, क्योंकि संहार भी उनकी लीला का एक अंश है, इसलिए कोई व्यवधान नहीं है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे सुंदरता से एक प्रत्यक्ष उदाहरण द्वारा समझाते हैं – बच्चे रेत के महल बनाकर खेलते हैं, और खेल के अंत में वे उसी महल को प्रसन्नता से गिरा भी देते हैं। उसी प्रकार, संहार भी भगवान के लिए एक क्रीड़ा है।
    • क्योंकि भगवान इस लौकिक संसार में अपना रूप परिवर्तित कर सकते हैं, वही सृष्टि के प्रधान कारण हैं। नोट: 3 कारण होते हैं: उपाधान कारण (महत्वपूर्ण कारण), निमित्त कारण (निहित कारण) और सहकारी कारण (सहायक कारण)। उदहारण के लिए, एक मिट्टी का पात्र बनाने में, मिट्टी और रेत महत्वपूर्ण कारक है, पात्र बनाने वाला निमित्त कारण है और, उसका डंडा और पहिया सहायक कारण है।
  • परंतु क्योंकि भगवान के स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं है, उन्हें निर्विकार भी कहा जाता है (अपरिवर्तनीय)।
  • सिर्फ उनकी देह (अर्थात चित और अचित तत्व) ही परिवर्तित होती है। मकड़ी अपनी ही लार से जाल बुनती है और फिर उसका ही उपभोग कर लेती है। जब मकड़ी ऐसा कर सकती है तो ईश्वर क्यों नही, जो सर्वशक्तिमान है।

सृष्टि, स्थिति, संहार

भगवान इस तीनों गतिविधियों के एक मात्र नायक है। समष्टि सृष्टि (पञ्च भूतों तक) की रचना स्वयं भगवान करते हैं और व्यष्टि सृष्टि (विभिन्न जीव-जंतु, प्रत्यक्ष, आदि) की रचना अप्रत्यक्ष रूप में अन्य जीवों में अन्तर्यामी होकर भगवान ही करते हैं।

1. सृष्टि (रचना)

  • सृष्टि अर्थात
    • सूक्ष्म पदार्थ का सकल पदार्थों में परिवर्तन
    • जीवात्माओं को देह और इन्द्रियाँ प्रदान करना
    • जीवात्मा के ज्ञान का विस्तार करना
  • सृष्टि रचना का कार्य ब्रह्मा, प्रजापतियों, काल (समय) द्वारा किया जाता है, यह सब भगवान उनके अन्तः मन में विराजकर करते हैं।
  • सृष्टि की रचना रजो गुण की स्थिति में होती है।

2. स्थिति (रक्षण- पोषण)

  • स्थिति अर्थात
    • जिस प्रकार जल धान की उपज का पोषण करते हैं, उसी प्रकार भगवान भी जीवात्मा का पोषण करते हैं, उनके अंतर में अनुकूल अभिप्राय जागृत करके और सभी स्थितियों में उनकी सहायता करते हैं।
  • स्थिति का कार्य भगवान इस प्रकार पूर्ण करते हैं
    • श्री विष्णु (इस संसार में भगवान का प्रथम अवतार) और ऐसे ही अनेकों अवतार लेकर प्रकट होते हैं।
    • मनु, ऋषियों आदि द्वारा जगत में शास्त्र स्थापित करते हैं।
    • धर्म और सत्य के मार्ग पर जीवात्माओं का मार्गदर्शन करते हैं
    • सभी प्राणियों और काल में अन्तर्यामी रहते हैं
  • स्थिति का कार्य सत्व गुण की अवस्था में होता है।

3. संहार

  • संहार अर्थात
    • जीवात्माओं को पुनः सूक्ष्म स्थिति में वापस खींचना, जिससे लौकिक आकांक्षाओं के प्रति उनका आकर्षण कम हो। यह उसी प्रकार है जैसे अपने उद्दंड पुत्र के हितार्थ उसे बंदी बनाकर रखना।
  • रूद्र, अग्नि, काल और सभी प्राणियों में अन्तर्यामी रहकर संहार को संचालित करते हैं।
  • संहार का कार्य तमो गुण (अज्ञान) की अवस्था में होता है।

सृष्टि में भगवान का सर्वोच्च/ श्रेष्ठ गुण

  • कुछ प्राणी आनंदित हैं और अन्य कुछ विपत्ति/ संकट में हैं, क्या यह भगवान का पक्षपात और निर्दयता नहीं?
  • नहीं, निसंदेह नहीं – क्योंकि सभी को अपने कर्मों के अनुसार ही शरीर प्राप्त होता है, और सभी कार्य जीवात्मा के कल्याण हेतु किये जाते हैं, इसलिए भगवान द्वारा कोई पक्षपात या निर्दयता नहीं है।
  • भगवान सृष्टि (रचना), स्थिति (पोषण) और संहार सभी अपने दिव्य रूप में करते हैं, जैसा की श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा तिरुवाय्मौली के 3.2.1 में बताया गया है।

भगवान के विभिन्न रूप

  • भगवान के रूप
    • उनके स्वरुप (स्वभाव), गुण आदि से भी अधिक रमणीय है।
    • नित्य है – सदा एक मनोहर रूप के साथ
    • एक समान है– वृद्धा अवस्था, आदि का कोई प्रभाव नहीं होता
    • उनका रूप शुद्ध सत्व, दिव्य पदार्थ से निर्मित है
    • उनका रूप लौकिक शरीर के विपरीत है, जो आत्मा के ज्ञान को आच्छादित कर देता है। भगवान का दिव्य रूप उनके सच्चे स्वरुप को पुर्णतः प्रकट करता है।
    • नित्य प्रकाशित/ आभायमान
    • उनका रूप सभी दिव्य गुणों को धारण करने वाला है जैसे सुंदरता, निर्मलता, आदि
    • वह रूप जिसका ध्यान योगियों द्वारा किया जाता है
    • वह रूप जिसके दर्शन मात्र से संसार से विरक्ति हो जाये
    • वह रूप जिसके दर्शन से नित्यसूरीगण और मुक्तात्मायें आनंदित होते है
    • वह जो सभी कष्टों/ विपत्तियों को दूर करने वाला है
    • उनके सभी अवतारों का स्तोत्र है
    • सभी प्राणियों के लिए आश्रय है
    • सभी उसमें व्याप्त है
    • दिव्य आयुधों (जैसे शंख, चक्र आदि) और आभूषणों (कंठमाला, हार, आदि) से सुशोभित है
  • भगवान के स्वरुप, 5 विभिन्न प्रकार के रूपों से सम्बंधित है, जो है
    • परत्वं – परमपद में विराजे
    • व्यूह – व्यूह स्थिति में रूप, जो सृष्टि रचना पर केन्द्रित है
    • विभव – भगवान के असंख्य अवतार
    • अन्तर्यामी – सभी जीवात्मा और अचेतन के अन्तः में विराजे स्वरुप
    • अर्चा – असंख्य मूर्ति रूप जो मंदिरों, मठों, घरों आदि में पूजे जाते है
    • इनका अधिक विवरण http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-parathvadhi.html पर देखा जा सकता है।

परत्व

paramapadhanathan

  • परमपद का वर्णन ऐसे स्थान के रूप में किया गया है, जहाँ नित्य आनंद है और असंख्य कल्याण गुण सुशोभित है और जहाँ काल (समय) का कोई नियंत्रण नहीं है। लौकिक संसार में समय ही नियंत्रक है – हम चाहे अथवा नहीं, समय स्वतः ही सब परिवर्तित कर देता है।
  • परमपद में सभी अध्यात्मिक है।
  • भगवान अपनी दिव्य महिषियों श्रीमहालक्ष्मीजी, श्रीभूदेवीजी और श्रीनीलादेवीजी के साथ परमपद के प्रधान है।
  • वे वहां नित्य सुरियों और मुक्तात्माओं (जो पहले संसार में थे, परंतु अब मुक्त होकर परमपद में है) के सम्पूर्ण आनंद के लिए उपस्थित है।
  • उनके दिव्य कल्याण गुण जैसे ज्ञान, शक्ति, आदि परमपद में पुर्णतः प्रत्यक्ष है।

व्यूह

6.

क्षीराब्धि नाथन रूप, भाग्वाब के व्यूह रूप का प्रतिनिधित्व करते है

  • वह रूप जो भगवान स्वीकार करते है
    • लौकिक जगत के पालन हेतु (सृष्टि, स्थिति, संहार के माध्यम से),
    • संसार में जीवात्मा का मार्गदर्शन और रक्षण-पोषण हेतु और
    • साधना करने वालों के लिए साधना के उपाय रूप में।
  • पर वासुदेव पहले स्वयं को व्यूह वासुदेव के रूप में विस्तारित करते है।
  • व्यूह वासुदेव स्वयं को तीन और रूपों में विस्तारित करते है- संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध।
  • संकर्षण
    • ज्ञान, बल (सभी का समर्थन करने की क्षमता) उनमें प्रधान है।
    • वे जीव तत्व पर अधिकार स्थापित करते है और चित और अचित तत्व के मध्य भेद कर, उन्हें नाम और रूप देने की प्रक्रिया का आरंभ करते है।
    • वे शास्त्र (वेद, वेदान्त, आदि) स्थापित करने और संहार के नियंत्रक है।
    • वे ही तदन्तर प्रद्युम्न रूप में विस्तृत होते है।
  • प्रद्युम्न
    • ऐश्वर्य (संपत्ति), वीर्य (शक्ति) उनमें प्रधान है।
    • वे मानस तत्व पर अधिकार स्थापित करते है।
    • वे निम्न कार्य संभालते है
      • धर्म के सिद्धांतों का निर्देश प्रदान करना,
      • मानव और चातुर वर्णों (चार वर्ग – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र) की रचना करना
      • शुद्ध सत्व में स्थित सभी प्राणियों की रचना (जो अंततः भगवान की ओर अग्रसर करते है)
  • अनिरुद्ध
    • शक्ति (बल) और तेज (सभी स्थितियों को नियंत्रित करने की क्षमता) उनमें प्रधान है।
    • इस स्वरुप में वे सभी कुछ संचालित करते है
      • सच्चे ज्ञान को प्रदान करते है
      • समय और सभी प्राणियों की रचना- सत्व, रजस और तमस गुणों के मिश्रण द्वारा करते है।

विभव

7.

दशावतार – 10 मुख्य अवतार

  • भगवान के असंख्य अवतार है।
  • उनके अवतारों को निम्न रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है
    • मुख्य अवतार
      • ये अवतार मुमुक्षुओं (जो मोक्ष की चाहना करते है) द्वारा अत्यधिक महत्वपूर्ण और पूजनीय है
      • भगवान स्वयं अनेकों दिव्य स्वरुप धारण करके प्रकट होते है जैसे मतस्य, कुर्म, वराह आदि
      • उनके दिव्य रूप दिव्य पदार्थों से निर्मित है (जैसे परमपद में है)।परमपद के समान ही इन रूपों में भी वे अपने सभी दिव्य कल्याण गुण धारण करते है।
      • जिस प्रकार दीया उसे प्रज्वलित करने वाली माचिस की तिली से अधिक रौशनी प्रदान करता है, उसी प्रकार भगवान के अवतार भी उनके परमपद के रूप से अधिक आभायमान है।
    • गौण अवतार
      • गौण अर्थात विशिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु भगवान, जीवात्मा को अपना स्वरुप अथवा शक्ति (बल) प्रदान करते है।
      • इस रूप को अन्य रूपों से कम महत्वपूर्ण माना जाता है और यह रूप मुमुक्षुओं द्वारा पूजनीय नही है, क्योंकि इन अवतारों का उद्देश्य केवल कुछ विशिष्ट कार्यों की पूर्ति है।
      • इनके 2 वर्गीकरण इस प्रकार है
        • स्वरुप आवेश – भगवान अपना दिव्य स्वरुप जीवात्मा को प्रदान करते है जो धरती पर प्रकट होते है। उदहारण के लिए: परशुराम, आदि।
        • शक्ति आवेश – भगवान विशिष्ट उद्देश्य से केवल अपनी शक्ति जीवात्मा को प्रदान करते है। उदहारण: ब्रह्मा, रूद्र, व्यास, आदि।
  • वे पुर्णतः अपनी दिव्य अभिलाषा से विभिन्न अवतारों को धारण करते है।
  • इन अवतारों का उद्देश्य स्वयं भगवान ने भगवत गीता 4.8 में समझाया है
    • परित्राणाय साधुनां – अपने भक्तों (साधुता) की रक्षा के लिए
    • विनाशाय च दुष्कृतां – दुष्टों के विनाश के लिए
    • धर्म संस्थापनार्थम् – धर्म की संस्थापना हेतु
  • यद्यपि यह भी कहा जाता है कि भगवान ऋषि के श्राप आदि के कारण अवतार लेते है, परंतु यह सब सिर्फ कहानी (अनर्गल कारण) है और वास्तविक कारण तों सिर्फ भगवान की दिव्य अभिलाषा ही है।

अन्तर्यामी

8.

  • अन्तर्यामी अर्थात जो सभी में व्याप्त है और सभी प्राणियों का अन्तः से सम्पूर्ण नियंत्रण करते है।
  • जहाँ भी जीवात्मा जाती है भगवान भी उसके साथ रहकर उसका मार्गदर्शन करते है।
  • वे प्राणी जो भगवान की साधना करना चाहते है, उनके लिए दिव्य रूप और दिव्य महिषियों के साथ उनके अंतर मन में करुणापूर्वक प्रकट होकर भगवान दर्शन देते है।
  • वे सदा सभी प्राणियों के साथ उनके अंतः में रहकर उनकी रक्षा करते है।

अर्चाविगृह

9.

 108 दिव्य देश – जिनका मंगलाशासन आलवारों द्वारा किया गया है

  • इन्हें भगवान के सभी रूपों का प्रतीक समझा जाता है।
  • जैसा की सरोयोगी स्वामीजी ने मुदल तिरुवंताधि के 44वे पासूर में समझाया है, भगवान सहर्ष वह रूप स्वीकार करते है जो उनके भक्त चाहना करते है।
  • अर्चावतार, अन्य रूपों (परम, व्यूह, आदि) के विपरीत सभी समय, सभी स्थानों पर, सभी के लिए उपस्थित है, जो सीमित है
    • विशिष्ट देश के अनुसार (परमपद, क्षीराब्धि, आदि स्थान)
    • विशिष्ट काल के अनुसार (त्रेता युग, द्वापर युग, आदि युगों में),
    • विशिष्ट अधिकारीयों के अनुसार (रामावतार में दशरथ आदि)
  • अपनी निर्हेतुक कृपा के वशीभूत ही वे अपने भक्तों के अपराधों को भी क्षमा करते है।
  • वे अपने सभी कार्यों के लिए अपने भक्तों पर निर्भर होकर रहते है जैसे उथापन, स्नान, भोजन, शयन आदि।
  • वे अनेकों मंदिरों (दिव्य देश, अभिमान स्थल, गाँव के मंदिर, आदि- सभी स्थानों पर, देश, प्रांत, प्रदेश आदि के भेद के बिना), मठों और हमारे गृहों में प्रकट होते है।
  • अर्चावतार का सम्पूर्ण स्वरुप
    • अपने अर्चावतार द्वारा, वे स्वयं के प्रति प्रीति और अनुराग उत्पन्न करते है।
    • वे सभी दिव्य कल्याण गुणों को धारण करने वाले है – उनके सभी गुण जैसे सौशील्य (उदारता), सौलभ्य (सुलभता), वात्सल्य (ममता), आदि पुर्णतः प्रत्यक्ष है। यह सभी गुण परमपद में प्रत्यक्ष नही है क्योंकि परमपद में सभी शुद्ध और पुर्णतः साधित है।
    • वे सभी प्राणियों के लिए आश्रय है, चाहे वह किसी भी जन्म, ज्ञान आदि से सम्बंधित हो।
    • भगवान सबसे अधिक आनंदप्रद है जैसा की आलवारों और आचार्यों द्वारा समझाया गया है। हम आलवार/ आचार्य अर्चावतार अनुभव में इसे पहले ही देख चुके है http://ponnadi.blogspot.in/p/archavathara-anubhavam.html
  • अर्चावतार में भगवान का उदार स्वरुप
    • यद्यपि वह नाथ है और अन्य सभी उनके आश्रित है, वे उदारतावश स्वयं को अपने भक्तों के आश्रित प्रकट करते है।
    • अर्चा स्वरुप में, वे स्वयं को निम्न प्रकार से प्रस्तुत करते है
      • अज्ञानी – क्योंकि वे अपने भक्तों के माध्यम से ही सभी कुछ समझते है
      • असमर्थ – क्योंकि वे अपने भक्तों द्वारा सभी कार्यों की प्रतीक्षा करते है जैसे स्नान, भोजन, वस्त्र, शयन आदि
      • अपने भक्तों पर पुर्णतः निर्भर रहते है जैसा की पहले बताया गया है
    • यद्यपि, अपने भक्तों के प्रति अपनी निर्हेतुक और असीमित कृपा, करुणा और प्रेम के वशीभूत, वे उनकी सभी अभिलाषाओं की पूर्ति करते है, बदले में कोई भी चाहना किये बिना, इसप्रकार अपने वात्सल्य गुण को प्रकट करते है।

सारांश

इस प्रकार हमने 3 तत्वों – चित, अचित और ईश्वर के विषय में विस्तृत चर्चा की। यह अत्यंत कठिन विषय वस्तु है क्योंकि इसमें बहुत से विशेष और गहन तत्व समाहित है। हमने अभी तक जो देखा वह बड़े से विषय की छोटी सी झलक थी- श्रीपिल्लै लोकाचार्य के तत्व त्रय नामक दिव्य ग्रंथ, जिसे कुट्टी भाष्य (श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीभाष्य का सार) भी कहा जाता है, पर रचित व्याख्यान में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा और अधिक सुमधुर और सुंदर वर्णन प्रस्तुत है। आईये हम श्रीमन्नारायण भगवान, आलवारों और आचार्यों का मंगलाशासन करें जिन्होंने हमें ऐसा महान साहित्य प्रदान किया जो हमारे लिए अतुलनीय है।

10.

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – श्रीपेरुम्बुदुर

रहस्य तत्वत्रयतय विवृत्या लोकरक्षिणे।
वाक्बोशा कल्परचना प्रकल्पायास्तु मंगलम।।

श्रीमते रम्यजामातृ मुनींद्राय महात्मने।
श्रीरंगवासिने भूयात नित्यश्री नित्य मंगलं।।

मंगलाशासन परैर मदाचार्य पुरोगमै।
सर्वैश्च पूर्वैर आचार्यै सत्कृतायास्तु मंगलं।।

-अडियेन भगवती रामानुजदासी

आधार – तत्व त्रय

अंग्रेजी संस्करण – http://ponnadi.blogspot.in/2013/03/thathva-thrayam-iswara- who-is-god.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – २

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

११) प्राप्याभासङ्गगळिलु प्रापगाभासङ्गळिलुम् नेगिऴ्न्तु अवनैयोऴिन्त एल्लावत्तलुम् ओरु प्रयोअनमिन्रिक्के इरुक्क वेणुम् 

वरमंगै नायिका , श्रीदेवी , भूमि देवी, आण्डाळ समेत श्री वानमामलै दैवनायक पेरुमाल , नाँगूनेरी

यथार्थ : भगवान के अलावा अन्य कोई भी साधन असल मे प्राप्य ध्येय नही है | भगवान के अलावा अन्य साधन असल मे सही मार्ग नही है | अत: शरणागत ऐसे मनगढंत विचारों को मन से निकाल दे और विश्वास एवं श्रद्धा पूर्वक मान ले कि भगवान ही उपाय (साधन) है | यही जीवात्मा के लिये सही और उच्चतम स्थिति है |

१२) परमशेषियैक् कण्डार् द्वारशेषिगळ् अळविल् निल्लारगळिरे

परमपदनातन

यथार्थ : एम्पेरुमान (भगवान), जिसका ना कोई तुल्य है और ना तो कोई इससे बडा है, ही असल मे सही शेषि है (सबका मालिक है ) | अन्य देव जैसे ब्रह्मा, शिव, इन्द्र इत्यादि द्वारशेषि है अर्थात् अन्तरयामीब्रम्ह (भगवान) के द्वारा नियमित रूप से विशेष कार्यों जैसे सृष्टि निर्माण, सृष्टि विनाशक मे कार्यरत हैं| भगवान उसको स्वयं प्रत्यक्ष रूप से आशीर्वाद देते हैं जो उनके शरणगत हैं| भगवान उसको भी अपना आशीर्वाद देते है जो अन्य देव शरणागत हैं लेकिन परोक्ष रूपेण अर्थात् उन देवताओं द्वारा जिनके परमात्मा भगवान स्वयं हैं| अत: ऐसे भगवान के यथार्थ स्वरूप को जानने वाला शरणार्थी कदापि अन्य देवान्तर भ्रम मे नही पडेगा और शरणागत को ऐसे भ्रम मे नही पडना चाहिये |

१३) अवन् ताने कत्त आऴ्वार्गळ् कण्डाप्पोले काण्बार्क्कुक् कणलामित्तनै अल्लतु स्वयत्नत्ताल् काण्बार्क्कु अरियप्पोमो

आळ्वार

भावार्थ : एम्पेरुमान् (भगवान) ने स्वयं अपने निर्हेतुक कृपा से स्वयं का स्वभाव, दिव्य मङ्गल स्वरूप, विशिष्ट गुण, सम्पत्ति (नित्य / लीला विभूति) इत्यादि का विशेष दर्शन आळ्वार को कराया और अत: ऐसे प्रेम युक्त स्थिति मे आळ्वार ने भगवद् स्वरूप का दर्शन किया | स्वप्रयत्न से ऐसे भगवद् सम्बन्धी विषयों को जानना नामुमकिन है | केवल भगवद्-कृपा से ही ऐसे विषय जान सकते हैं|

१४)   आश्रयणीयन् अवने !! ब्रह्मरुद्रादिगळ् आश्रयणीयर् अल्लर्

भावार्थ : भगवान श्रीमन्नारायण ही एक मात्र आश्रय है | ब्रह्म, रुद्र इत्यादि आश्रय नही है |

१५) मुक्तरुम् नित्यरुम् ताङ्गळुम् अनुभवित्तु अवनैयुम् आनन्दिप्पिप्परगळ् बद्धर् ताङ्गळ् आनन्दियादे अवनै आनन्दिप्पिप्परगळ्

भावार्थ : मुक्त एवं नित्य जीव, भगवद् धाम मे आनन्दित रहकर,  भगवान श्रीमन्नारायण को आनन्द प्रदान करते हैं | बद्ध जीव (सम्सार मे)  दु:ख भोगते हुए भगवद् लीला मे भाग लेकर भगवान श्रीमन्नारायण को आनन्द प्रदान करते हैं |

१६) सर्वेश्वरन् त्रिविध चेतनरैयुलम् स्वरूपनुरूपमाग अडिमै कोळ्ळा निन्रान्

भावार्थ : भगवान श्रीमन्नारायण (सर्वेश्वर, परमेश्वर) त्रिविध (तीन) प्रकार के चेतन (मुक्त, नित्य, बद्ध जीव) से अपने स्वरूपानुरूप के अनुसार सेवा स्वीकार करते हैं|

१७) विरोधियैप् पोक्कि उज्जीविप्पिक्कैयिरे अवतारङ्गळुक्कु प्रयोजनम्

भावार्थ : भगवान श्रिय:पति के अवतार रहस्य का कारण भगवद्-भक्तों का उद्धार एवं भक्तों के विपरीत आसुरी भाव रखने वालों का नाश करना है |

अनुवादक टिप्पणी :: इसी मूल अङ्ग को स्वामी पिळ्ळैलोकाचार्य अपने श्रीवचन दिव्य शास्त्र मे दर्शाते हुए कहते हैं – भगवान श्रीमन्नारायण के अवतार एवं अवतारों मे दृश्यमान उनके अद्भुत कार्यों का कारण केवल भागवतों के प्रति कृत्य अपचार ही है |

१८) कर्म सम्सृष्टरान चेतनर्क्कु कर्म सम्बन्धमत्तु (सम्बन्धमट्रु) अनुभिविक्कु मुन् तिरुमेनियिळे नेन्जै वैक्कप् पोगातिरे

भावार्थ : बद्ध जीव (संसारी) इस भौतिक जगत् मे कर्म के बन्धित हैं | वासतविकता मे भगवान श्रीमन्नारायण के दिव्य अर्चा स्वरूप इतने सुन्दर एवं आकर्षक है कि केवल दर्शन मात्र से ही प्रत्येक जीव के विविध दोषों एवं दु:खों का निवारण कर सकते हैं| अत: ऐसे दिव्यानुभूति के लिये प्रत्येक जीव का कर्म विहीन होना चाहिये (अर्थात कर्म शून्यता) |

१९) शेषवस्तुवुक्कु शेषत्वम् निरुपकमानाल् निरूपकत्तैयोऴिय निरूप्य सिद्धि इल्लै

भावार्थ : निरूपकम् –> अर्थात् जो निव स्वभाव को दर्शाता है | निरूप्यं –> जिसको सिद्ध किया गया हो |

जीव का भगवद शेषत्व (दासत्व भाव) का निर्धारण केवल उसके सेवा भाव युक्त कार्यों से होता है | उसका स्वभाव उसके दासत्व भाव युक्त सेवा से सिद्ध होता है | अत: जो भगवान की सेवा नही करते, वो चेतन (जीवात्मा) के योग्य सिद्ध नही होते और अन्तत: ये सभी भी जड (अचेतन) की श्रेणी मे ही आयेंगे |

२०) पारतन्त्रिय रसम् अरिवार्क्कु स्वातन्त्रियम् अनर्थम्

भावार्थ : पारतन्त्रिय -> भगवान के आधीन (नियन्त्रण) मे रहना |

उन सभी के लिये स्वातन्त्रय (स्वतन्त्र) भाव (मै स्वतन्त्र हूँ) घातक (अनर्थ) है जिनने भगवद् पारतन्त्रिय भाव (मै भगवद् दास हूँ – मै भगवान के अधीन हूँ) का रासास्वादन किया है |

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/07/divine-revelations-of-lokacharya-2.html

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