लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – २

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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११) प्राप्याभासङ्गगळिलु प्रापगाभासङ्गळिलुम् नेगिऴ्न्तु अवनैयोऴिन्त एल्लावत्तलुम् ओरु प्रयोअनमिन्रिक्के इरुक्क वेणुम् 

वरमंगै नायिका , श्रीदेवी , भूमि देवी, आण्डाळ समेत श्री वानमामलै दैवनायक पेरुमाल , नाँगूनेरी

यथार्थ : भगवान के अलावा अन्य कोई भी साधन असल मे प्राप्य ध्येय नही है | भगवान के अलावा अन्य साधन असल मे सही मार्ग नही है | अत: शरणागत ऐसे मनगढंत विचारों को मन से निकाल दे और विश्वास एवं श्रद्धा पूर्वक मान ले कि भगवान ही उपाय (साधन) है | यही जीवात्मा के लिये सही और उच्चतम स्थिति है |

१२) परमशेषियैक् कण्डार् द्वारशेषिगळ् अळविल् निल्लारगळिरे

परमपदनातन

यथार्थ : एम्पेरुमान (भगवान), जिसका ना कोई तुल्य है और ना तो कोई इससे बडा है, ही असल मे सही शेषि है (सबका मालिक है ) | अन्य देव जैसे ब्रह्मा, शिव, इन्द्र इत्यादि द्वारशेषि है अर्थात् अन्तरयामीब्रम्ह (भगवान) के द्वारा नियमित रूप से विशेष कार्यों जैसे सृष्टि निर्माण, सृष्टि विनाशक मे कार्यरत हैं| भगवान उसको स्वयं प्रत्यक्ष रूप से आशीर्वाद देते हैं जो उनके शरणगत हैं| भगवान उसको भी अपना आशीर्वाद देते है जो अन्य देव शरणागत हैं लेकिन परोक्ष रूपेण अर्थात् उन देवताओं द्वारा जिनके परमात्मा भगवान स्वयं हैं| अत: ऐसे भगवान के यथार्थ स्वरूप को जानने वाला शरणार्थी कदापि अन्य देवान्तर भ्रम मे नही पडेगा और शरणागत को ऐसे भ्रम मे नही पडना चाहिये |

१३) अवन् ताने कत्त आऴ्वार्गळ् कण्डाप्पोले काण्बार्क्कुक् कणलामित्तनै अल्लतु स्वयत्नत्ताल् काण्बार्क्कु अरियप्पोमो

आळ्वार

भावार्थ : एम्पेरुमान् (भगवान) ने स्वयं अपने निर्हेतुक कृपा से स्वयं का स्वभाव, दिव्य मङ्गल स्वरूप, विशिष्ट गुण, सम्पत्ति (नित्य / लीला विभूति) इत्यादि का विशेष दर्शन आळ्वार को कराया और अत: ऐसे प्रेम युक्त स्थिति मे आळ्वार ने भगवद् स्वरूप का दर्शन किया | स्वप्रयत्न से ऐसे भगवद् सम्बन्धी विषयों को जानना नामुमकिन है | केवल भगवद्-कृपा से ही ऐसे विषय जान सकते हैं|

१४)   आश्रयणीयन् अवने !! ब्रह्मरुद्रादिगळ् आश्रयणीयर् अल्लर्

भावार्थ : भगवान श्रीमन्नारायण ही एक मात्र आश्रय है | ब्रह्म, रुद्र इत्यादि आश्रय नही है |

१५) मुक्तरुम् नित्यरुम् ताङ्गळुम् अनुभवित्तु अवनैयुम् आनन्दिप्पिप्परगळ् बद्धर् ताङ्गळ् आनन्दियादे अवनै आनन्दिप्पिप्परगळ्

भावार्थ : मुक्त एवं नित्य जीव, भगवद् धाम मे आनन्दित रहकर,  भगवान श्रीमन्नारायण को आनन्द प्रदान करते हैं | बद्ध जीव (सम्सार मे)  दु:ख भोगते हुए भगवद् लीला मे भाग लेकर भगवान श्रीमन्नारायण को आनन्द प्रदान करते हैं |

१६) सर्वेश्वरन् त्रिविध चेतनरैयुलम् स्वरूपनुरूपमाग अडिमै कोळ्ळा निन्रान्

भावार्थ : भगवान श्रीमन्नारायण (सर्वेश्वर, परमेश्वर) त्रिविध (तीन) प्रकार के चेतन (मुक्त, नित्य, बद्ध जीव) से अपने स्वरूपानुरूप के अनुसार सेवा स्वीकार करते हैं|

१७) विरोधियैप् पोक्कि उज्जीविप्पिक्कैयिरे अवतारङ्गळुक्कु प्रयोजनम्

भावार्थ : भगवान श्रिय:पति के अवतार रहस्य का कारण भगवद्-भक्तों का उद्धार एवं भक्तों के विपरीत आसुरी भाव रखने वालों का नाश करना है |

अनुवादक टिप्पणी :: इसी मूल अङ्ग को स्वामी पिळ्ळैलोकाचार्य अपने श्रीवचन दिव्य शास्त्र मे दर्शाते हुए कहते हैं – भगवान श्रीमन्नारायण के अवतार एवं अवतारों मे दृश्यमान उनके अद्भुत कार्यों का कारण केवल भागवतों के प्रति कृत्य अपचार ही है |

१८) कर्म सम्सृष्टरान चेतनर्क्कु कर्म सम्बन्धमत्तु (सम्बन्धमट्रु) अनुभिविक्कु मुन् तिरुमेनियिळे नेन्जै वैक्कप् पोगातिरे

भावार्थ : बद्ध जीव (संसारी) इस भौतिक जगत् मे कर्म के बन्धित हैं | वासतविकता मे भगवान श्रीमन्नारायण के दिव्य अर्चा स्वरूप इतने सुन्दर एवं आकर्षक है कि केवल दर्शन मात्र से ही प्रत्येक जीव के विविध दोषों एवं दु:खों का निवारण कर सकते हैं| अत: ऐसे दिव्यानुभूति के लिये प्रत्येक जीव का कर्म विहीन होना चाहिये (अर्थात कर्म शून्यता) |

१९) शेषवस्तुवुक्कु शेषत्वम् निरुपकमानाल् निरूपकत्तैयोऴिय निरूप्य सिद्धि इल्लै

भावार्थ : निरूपकम् –> अर्थात् जो निव स्वभाव को दर्शाता है | निरूप्यं –> जिसको सिद्ध किया गया हो |

जीव का भगवद शेषत्व (दासत्व भाव) का निर्धारण केवल उसके सेवा भाव युक्त कार्यों से होता है | उसका स्वभाव उसके दासत्व भाव युक्त सेवा से सिद्ध होता है | अत: जो भगवान की सेवा नही करते, वो चेतन (जीवात्मा) के योग्य सिद्ध नही होते और अन्तत: ये सभी भी जड (अचेतन) की श्रेणी मे ही आयेंगे |

२०) पारतन्त्रिय रसम् अरिवार्क्कु स्वातन्त्रियम् अनर्थम्

भावार्थ : पारतन्त्रिय -> भगवान के आधीन (नियन्त्रण) मे रहना |

उन सभी के लिये स्वातन्त्रय (स्वतन्त्र) भाव (मै स्वतन्त्र हूँ) घातक (अनर्थ) है जिनने भगवद् पारतन्त्रिय भाव (मै भगवद् दास हूँ – मै भगवान के अधीन हूँ) का रासास्वादन किया है |

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/07/divine-revelations-of-lokacharya-2.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

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