Monthly Archives: October 2016

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ४

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै – तिरुवेल्लिक्केणि

३१)  पिराट्टि अशोकवनैकैयिळे पिरिन्तिरुन्ताप् पोलेयिरुक्किरतु काणुम् स्वरूप ज्ञान् पिरन्तवारे उडम्बुडनिरुक्कुमिरुप्पु

चेतन (जीव) को स्वस्वरूप ज्ञान के माध्यम से अपने निज स्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है कि वह भगवान् और भागवतों का दास है और उसे परमपद मे नित्य सेवा प्राप्ति के ध्येय से सदैव तत्पर रहना चाहिये |  ऐसे चेतन कि स्थिति भगवन् श्रीमन्नारायण मतानुरूप श्री देवी (श्री महालक्ष्मी) (पिराट्टि) का अशोक वन मे शोकार्त स्थिति से तुल्य है |

अनुवादक टिप्पणी : इस अद्भुत विषय को नन्जीयर ने नम्पिळ्ळै को सिखाया था और जिसका उल्लेख स्वामी पेरियवाच्चान पिळ्ळै अपने ग्रन्थ “माणिक्क-मालै” (मणि-माला) मे करते है |

नम्पिळ्ळै स्वामी नन्जीयर स्वामी से पूछते है : संसार मे रहने वाले मुमुक्षु के लिये कौन सखा या सखी है ? वह अपना जीवन कैसे व्यतीत करता है ?

नन्जीयर कहते है : मुमुक्षु न तो वर्ण है न तो आश्रम है | अर्थात् वर्णाश्रम से परे है | मुमुक्षु वह है जिसमे अहोरात्र मोक्ष प्राप्ति की इच्छा है | ऐसे मुमुक्षु के सखा / सखी एवं जीवन व्यापन (लीलायें) विरजा नदी (पारलौलिक नित्य विभूति (श्रीवैकुण्ठ धाम ) और लौलिक विभूति (यह भौतिक सम्सार) को अलग करने वाली नदी) के उस पार है | जहाँ इच्छा है वहाँ सखा / सखी व लीला होना आवश्यक है | कहने का तात्पर्य यह हुआ कि अगर अशोक वन मे सीता माता का कोई सखा / सखी है / थी, तो अवश्य मुमुक्षु के लिये भी अवश्य सखा / सखी होंगे | ऐसे स्वरूप ज्ञान चेतन जीवों का संसार मे होना और सीता माता का लंका मे होना समतुल्य स्थिति है |

  • चेतन का शरीर अशोक वन की तरह है जहाँ सीता माता जैसे जीव को रावण ने रखा था |
  • चेतन का लौकिक वासना या इच्छायें ठीक उसी प्रकार है जैसे श्री सीता माता का मारीच (सुवर्ण हिरण) के प्रति था |
  • चेतन का भौतिक लोक के प्रति कैसा खौफनाक चित्र है ठीक उसी प्रकार सीता माता तो था रावण के प्रति |
  • चेतन के ऐसे पु्त्र, सम्बन्धी जो स्वरूप ज्ञान विहित होकर कष्ट पहुँचाते है वैसे ही रावण के पुत्र / सम्बन्धी सीता माता को कष्ट दे रहे थे |
  • चेतन का ममत्व, अहंकार इत्यादि एकाक्षि (एक नेत्र राक्षसी), एककर्णि (एक कान राक्षसी) जैसे है जो अहोरात्र सीता माता पर अपना नज़र रखे हुए है |
  • चेतन का श्रीवैष्णव सत्सङ्ग उस प्रकार है जिस प्रकार माता सीता का श्री विभीषण एवं उसकी बेटी त्रिजटा के साथ था |
  • चेतन का आचार्य दृश्य ऐसा है जैसे सीता माता का तिरुवडि (हनुमान जी) का दृश्य है |
  • आळ्वार के दिव्यप्रबन्ध और भगवद्विषय श्रीमद्रामायण, श्रीमहाभारत मे ऐसा है जैसे हनुमान जी का श्रीराम जी के दिव्य गुणों का कीर्तन एवं स्तुति है |
  • अहोरात्र तिरुमन्त्र का अर्थानुसन्धान करने वाला चेतन ऐसा है जैसा सीता माता अपने प्राण प्रिय श्रीराम चन्द्र कि अङ्गुलिका को देखकर प्राण प्यारे राघव सरकार सहित अपने विविध लीलाओं का स्मरण करती थी |
  • चेतन के नित्य क्रिया इस संसार मे अन्यों से अलग है ठीक उसी प्रकार जैसे सीता माता एवं अन्य राक्षस व रक्षसियों का था | उत्तरवर्ती केवल इन्द्रिय तृप्ति व सुख मे सम्लग्न थे और पूर्ववर्ती (श्री सीता माता) केवल अपने स्वामी प्रिय राघवेन्द्र से मिलने के लिये तरस रही थी और दु:खी थी | श्री सीता माता खून चूसने वाले कुत्तों के परिसर मे ऐसे अस्सहाय हिरण की तरह थी ठीक वैसे ही हम सभी चेतन अन्य देवतान्तरि, प्रयोजनान्तरि के बींच मे है |
  • ऐसे विपरीत परिस्थिथियों मे भी भगवती सीता माता ने स्वप्रयत्न नही किया जिससे उनके पारतन्त्रिय पर आंच आये | इसी तरह, एक मुमुक्षु को सदैव यह स्मरण करना चाहिये कि वह स्वतन्त्र नही है और केवल परतन्त्र है | उसे अपने बचाव मे ऐसा कोई स्वप्रयास नही करना चाहिये जिससे उसके स्वतन्त्रता का मूल मात्र अंश प्रकाशित हो | ऐसे चेतन तो केवल भगवान् और भगवद्कृपा पर पूर्ण निर्भर होना चाहिये |
  • ऐसे भगवद् बन्धु या मुमुक्षु केवल भगवान् को हि उपायोपेय मानते है | निरन्तर भगवद् मिलन की चाहना मे अश्रु धारा बहाते हुए भगवान् से प्रार्थना करते है – इस भौतिक जगत् से उनको छुटकारा दिला दो .. मोक्ष दे दो और तदुपरान्त नित्य विभूति (श्रीवैकुण्ठ) मे नित्य सेवावकाश मिले |

३२) शेषिक्किनियतान वऴियालेयिरे शेषभूतनुक्किनियतावतु

श्रीरङ्ग एवं अन्य दिव्य क्षेत्र भगवान् को प्रिय है अत:श्रीवैष्णवों को भी प्रिय है

श्रीशठकोप सूरी भगवान् को प्रिय है अत:भागवतों के लिये भी प्रिय है

जो शेषि (स्वामी) को प्रिय एवं सुखदायी है वह स्वत: शेषभूतों (दासों) को भी प्रिय एवं सुखदायी है |

३३) मिथुनमाय्क् कलवा निन्रै इरण्डु तलक्कुम् उळ्ळ रसम् शेषशेषिगळ् परिमाट्ट्रत्तिलुमुण्दिरे

जो परमान्द एवं रस की अनुभूति दिव्य दम्पति के प्रेमालाप मे है वैसी ही अनुभूति शेषि (भगवान्) और शेष (जीव) के बींच मे है |

३४) अवन्तुक्किनियताय् अव्वऴियाले तनक्किनियतागैयिरे शेष भूतनुक्कु वाचि

जीवात्मा का स्वभाव है कि वह भगवान् (शेषि) के प्रति जो अनुकूल है उसे ही स्वीकारे |

अनुवादक टिप्पणी : यहाँ “वाचि” शब्द विशिष्टिकरणार्थ (भेद के लिये) उपयोग किया गया है | क्योंकि भगवान् स्वतन्त्र है और जीव परतन्त्र होने से भगवान् (अपने स्वामी) के अभिमत के अनुसार ही अनुसरण व आचरण करे |

३५)   भगवद् विषयत्तिले ओरदिवारा निन्रावारे परगृहत्तिनिन्रुम् स्वगृहत्तिले पुगुन्ताप् पोलेयिरुक्कुम् 

भौतिक वासनाओं को छोडकर (त्यागकर) भगवद् विषय मे रुचि दिखाना ऐसा है जैसे पराया घर से स्वगृह मे प्रवेश करना है क्योंकि जीव का स्वाभाविक चाह (महत्तवाकांक्षा) भगवद् विषय है |

३६) प्राप्ति देशम् नित्यसूरिगळित्त वऴक्काय् इरुक्कुम्

श्रीपरमपदनाथ एवं नित्यसूरी[/caption]

प्राप्ति देश : श्रीवैकुण्ठ धाम अर्थात् जीव का प्राप्ति देश (श्रीवैकुण्ठ धाम) नित्य नित्यसूरीयों के अधीन मे रहता है जैसे श्री शठकोप सूरी अपने पासुर ” वानवर् नाडु ” (तिरुवाय्मोऴि – ३.९.९) मे कहते है (नित्यसूरीयों / मुक्तों का निवास स्थान)

अनुवादक टिप्पणी : इस तत्व ” नित्यसूरी ही असल मे परमपद के नियन्त्रक है ” को तात्त्विक प्रमाण निम्नलिखित है :

१) मधुरकवि आऴ्वार स्व रचित कण्णिनुन् शिरुत्ताम्बु प्रबन्ध के ग्यारहवें पासुर मे कहते है, जो व्यक्ति (जीव) उनके दिव्य प्रबन्ध के शब्दों मे निष्ठा रखता है और आचार्य निष्ठा का अनुसरण करता है, वह अवश्य परमपद धाम प्राप्त करता है | यहाँ पाठकों को यह प्रश्न या सन्देह आ सकता है कि क्यों मधुरकवि आळ्वार, अपने स्वाचार्य श्रीशठकोप सूरी के पादाश्रित होने पर भी, वह क्यों परमपद प्राप्ति की बात करते है ? पूर्वाचार्यों ने इस विषय को इस प्रकारेण समझाया है : श्रीशठकोप सूरी का जन्म स्थल – “आळ्वार तिरुनगरि” (इस देवस्थान को आदिनाथर्-आळ्वार देवस्थान कहते है) का पूर्ण नियन्त्रण दोनो (आदिनाथ भगवान् (पोलिन्डु निन्र पिरान् ) और स्वयं श्रीशठकोप सूरी कर रहे है | परन्तु श्रीवैकुण्ठ धाम का पूर्ण नियन्त्रण श्रीशठकोप सूरी ही कर रहे है |

२) श्रीयामुनाचार्य स्तोत्र-रत्न के ४२ वें श्लोक मे कहते है : भगवान् श्रीमन्नारायण ने नित्य एवं लीला विभूति (उभय विभूति) को श्रीविष्वक्सेन जी को सौंप दिया और स्वयं श्रीमन्नारायाणाभिमतानिरूपी नित्यानपायनी श्रीमहालक्ष्मी के साथ रास (लीलाओं) का रसास्वादन करते है |

३७) कर्मवश्यन् पिरविक्केल्लै काणानिन्रोम् ; अकर्मवश्यन् पिरविक्केल्लै काण्गिन्रिलोम्

भौतिक जगत् मे अनाधिकाल से बन्धा हुआ बद्ध जीव, जन्म-मृत्यु के जाल से तभी मुक्त होगा जब उसे मुक्ति मिलेगी और अन्तत: वह जन्म के बन्धन से छुटकारा पाता है | परन्तु कर्म से अबद्ध भगवान् अनेकानेक अवतार लेकर इस धरातल पर बारम्बार प्रगट होते है अर्थात् जन्म लेते है |

अनुवादक टिप्पणी :

१) वेद कहता है : ” अजायमान: बहुधा विजायते ” ! जन्म रहित (आजन्म) भगवान् स्वयं की अहैतुकी कृपा से धरातल पर प्रगट होते है |

२) श्रीशठकोप सूरी (वैदिक अनुयायी) स्वग्रन्थ तिरुविरुत्तम् के प्रथम पासुर मे कहते है : भगवान् अपनी इच्छा से (निर्हेतुक कृपा से), वह अनेकानेक राशियों मे जन्म लेते है | नम्पिळ्ळै स्वामी ईडु व्याख्या मे कहते है : क्योंकि भगवान् निर्हेतुक कृपा से प्रगट होते है, अत: उन पर कोई पाबन्दी नही है कि वह कौन से योनी मे जन्मे अर्थात् कौन सा शरीर स्वीकारेंगे | यही तत्त्व तिरुवाय्मोळि के ३.१०.१ पासुर – ” सन्मम् पल पल चेय्दु ” अनेकानेक जन्मो को स्वीकार करना | एतदर्थ एवं श्रुति वाक्य ” अजायमानः बहुधा विजायते ” का सीधा अनुवाद तिरुवाय्मोळि के २.९.५ ” पिरप्पिल् पल् पिरविप् पेरुमान् ” पासुर मे दर्शाते है |

३८) कर्मत्तुक्कु अवधियुण्डु, अनुग्रहत्तुक्कु अवधियिल्लै

श्रीरङ्गनाथ भगवान् का अभयहस्थ : भगवद् भक्तों कि रक्षा का दावा करते हुए कह रहे है भयभीत न हो ! डरो मत ! चिन्ता मत करो  ( मा सुच: – भगवद्गीता )

जीव के कर्म की सीमा है पर भगवान् की अहैतुकीकृपा की कोई सीमा नही है !

३९) फलाभिसन्धि रहितमाग दानधर्मत्तै अनुष्ठित्तिक्कु, एमपेरुमानै उद्देश्यमाक्काते, फलाभिसन्धि युक्तमाग अनुष्ठित्तु स्वर्गादि भोगङ्गळैप् पट्ट्रिनाल् निलै निल्लतु

धार्मिक एवं दान सम्बन्धित कार्य (के फलों को त्यागकर) को, केवल और केवल भगवदुद्देश्य अर्थात् कैङ्कर्य बुद्धि से ही करनीय है | अगर ऐसे कार्य अन्युद्देश्य जैसे स्वर्ग प्राप्ति इत्यादि के लिये किया गया हो तो वह केवल काल पर्यन्त, नश्वर और तुच्छ है |

४०) शेषभूतन् पट्ट्रवतु (पत्तवतु) शेषियिनुडैय तिरुवडिगळैयिरे

भगवान् श्रीरङ्गनाथ के दिव्य चरण

जीवात्मा (शेषभूत) केवल भगवान् (शेषि) का ही शरण ग्रहण करता है | अर्थात् सहज स्वभावेन भगवान् का शरणागत होना शेषभूत (जीवात्मा) का कर्तव्य है |

अनुवादक टिप्पणी : इस तत्त्व को समझाने के लिये स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी बहुत सुन्दर उदाहरण देते है | उदाहरणार्थ ऐसे :

१) मुमुक्षुप्पडि १४७ : द्वय प्रकरणं चरणौ (तिरुवडि / दिव्य चरण) शब्दम् – शेषिपक्कल् शेषभूतन् इऴियुम् तुरै ; प्रजै मुलयिले वाय् वैक्कुमा पोले : जैसे नवजात शिशु अपने माँँ के स्तनों के लिये तत्पर रहता है (क्योंकि यह उसके लिये पोषणाहार है) ठीक वैसे ही जीव के लिये भगवाच्छरणारविन्द ही पोषणाहार है और यह स्वाभाविक है |

२) श्रीवचनभूषण ४२७ : आचार्य वैभवम् – ईश्वरनैप् पट्रुगै (पत्तुगै) पिडित्तुक् कार्यम् कोळ्ळुमो पाति ; आचार्यनैप् पट्रुगै कालैप् पिडित्तुक् कार्यम् कोळ्ळुमो पाति !!! प्रत्यक्ष रूप से भगवान् के समीप जाना ऐसा है जैसे उनके हाथों के लिये बढना है (यह सफल या असफल हो सकता है) | पर अप्रत्यक्ष रूप से अर्थात् भगवान् को आचार्य के माध्यम से प्राप्त करना उनके दिव्य चरण की और बढना है जो हर अवस्था मे सफल होता है | यहाँ यह दर्शाया गया है कि आचार्य ही भगवान् के दिव्य चरण है |

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-4.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १६

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १

आगे बढ़ने से पहले, श्रीवैष्णव तिरुवाराधन के विषय में भली प्रकार से जानने के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-thiruvaaraadhanam.html पर देखें क्यूंकि यह लेख इसी तत्व से सम्बंधित है।

४७) समाराधनम विरोधी तिरुमाली में भगवान की पुजा करते वक्त आनेवाली बाधायें

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भगवान के स्वरूप– पर (परमपदधाम में), व्यूह (क्षीराब्धी), विभव (श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि अवतार), अन्तर्यामी (हमारे आत्मा में विराजमान), अर्चा (मन्दिर), अर्चा (तिरुमाली में)

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तिरुमाली में तिरुवाराधन

यहाँ समाराधनम का अर्थ है कैंकर्य समझ कर तिरुमाली में भगवान कि पूजा करना। परम्परागत रूप से इसे तिरुवाराधन कहते है। भगवद आराधन बिना किसी आशा के बदले में प्रेम भाव से करना। भगवद गीता ९.२६ में भगवान कहते है “प्रथम पुष्पं पलं थोयम योमे भक्त्या प्रयच्छति तदहं भक्ति उपहृतं अस्नामी प्रयतात्मन” – एक पत्ता, फूल, फल या जल – जब भक्ति से मुझे अर्पण करोगे, तो प्रसन्नता से मैं उसे ग्रहण करूँगा। इस भाग में भगवद आराधन के समय हमारा रवैया समझाया गया है। अन्तिम भाग में भागवत आराधन समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: तिरुवाराधनं का श्रीवैष्णवों के जीवन में बड़ा महत्व है। भगवान कि दया को हम यहाँ देख सकते है जो अपने भक्तों के तिरुमाली में अर्चावतार रूप में विराजमान होते है। यह सुनिश्चित करना बहुत मुख्य बात है कि श्रीवैष्णवों कि तिरुमाली में ऐसे भगवान का विशेष ध्यान दिया जाता है। समाश्रयण (पञ्च संस्कार) के भाग में हमारे आचार्य यह ५ शुद्धता के कार्य करते है – १) ताप (गर्म शंख चक्र को अपने दोनों बाहु पर अंकित करना), २) पुण्ड्र (ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण कराना – सफेद भगवान के चरण को संबोधीत करता है और लाल अम्माजी को), ३) नाम (दास्य नाम – शिष्य का नाम करण करना), ४) मन्त्र (गुप्त मन्त्र शिष्य को सिखाना जो उसे इस संसार बन्धन से मुक्त करेगा) और ५) याग सिखाना (भगवान कि तिरुवाराधन कि विधी)। एक बार अपने आचार्य से समाश्रित होने के पश्चात तिरुवाराधन शिष्य के लिये अति मुख्य कैंकर्य है। शिष्य को अपने आचार्य से यह तिरुवाराधन कि विधी को अच्छी तरह सीख कर अपने तिरुमाली में करना चाहिये। श्रीरामानुज स्वामीजी ने अपने नित्य ग्रन्थ (संस्कृत) में तिरुवाराधन क्रम को समझाया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अपने जीयर पड़ी (तमिल) तिरुवाराधन में यह समझाया है। तिरुवाराधन की कीर्ति और उसका क्रम http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-thiruvaaraadhanam.html पर समझाया गया है। हमारे नित्यानुसंधान के विषय में और अधिक http://ponnadi.blogspot.in/p/anushtanam.html पर देखा जा सकता है।

  • धार्मिक भय से तिरुवाराधन करना और भगवान के प्रेम भक्ति के लिये उसे न करना बाधा है। तिरुवाराधन को इस विश्वास के साथ करना चाहिये कि यही हमारे लिये उचित कैंकर्य है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान अपने भक्तों के तिरुमाली में दया और प्रेम के कारण आते है। हमें और कुछ नहीं बल्कि उनके प्रति परस्पर प्रेम करना है। तिरुवाराधन करके हम भगवान से सीधे और केवल उनसे ही वार्तालाप कर सकते है। इस आपसि क्रिया को सही तरिके से करने हेतु हमें यह समझना चाहिये कि जीवात्मा (स्वयं) भगवान (जिनके पास असीम अच्छे गुण है) का सच्चा दास है। एक बार यह समझ आने पर हम स्वतः ही उनकी पूजा सही प्रकार से करेंगे वैसे ही जैसे हमारे पूर्वाचार्यों ने सिखाया है।
  • तिरुवाराधन करते समय किसी को भी आलस्य नहीं करना चाहिये। तिरुवाराधन करते समय हमें प्रसन्न और उत्साही होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह समझाया जा चुका है कि तिरुवाराधन को थोड़े भय से (कि हम भगवान कि सेवा कर रहे इसलिये कोई गलती नहीं करनी चाहिये) और प्रेम भक्ति (कि ऐसे परमपिता हमारी सेवा स्वीकार कर रहे है- इसलिये हमें उन्हें बहुत भव्य ढंग से बहुत भक्ति से सेवा करनी चाहिये) से करना चाहिये। ऐसे स्वभाव के साथ एक क्षण के लिये भी आलस्य के लिये कोई जगह नहीं है।
  • तिरुवाराधन करने हेतु कोई दूसरे को नियुक्त करना सही नहीं है। हमें अपने भगवान कि सेवा स्वयं हीं करनी चाहिये। हम एक बहुत प्रचलित पंक्ति को स्मरण कर सकते है “आलिट्टू अंधी तोलवो” (क्या हम किसी को हमारी संध्या वंदन करने हेतु नियुक्त कर सकते है क्या? नहीं – कोई भी हो उसे अपने नित्यानुष्ठान कर्मों को स्वयं हीं करना चाहिये।) और “महिषी स्वेतत्तुक्कु आलिदुवारुण्डो?” – (ऐसा कोई राजा है जो अपनी रानी के पसीने को पोछने के लिये किसी को नियुक्त करता है? नहीं – अपने निर्हेतुक प्रेम के लिये वह स्वयं ही करेगा)।
  • तिरुवाराधन को सही समय पर करना चाहिये ना की अपने अनुकूल। अनुवादक टिप्पणी: जैसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पूर्व/उत्तर दिनचर्या में बताया गया है तिरुवाराधन को ३ बार करना चाहिये – संक्षीप्त में प्रात: काल में, विस्तार से मध्यान में और सायंकाल में फिर से संक्षीप्त में। सामान्यत: मुख्य तिरुवाराधन दिन के मध्य में किया जाता है। वैधीका को पञ्च काल परायण कहा जाता है – वह जो दिन को पाँच भाग में बाँटता है और हर एक भाग में कुछ कैंकर्य करता है। वह पाँच भाग है – अभिगमनम (उठना – सुबह के शरीर का शुद्धीकरण), उपाधानम (कच्चा पदार्थ जमा करना), इज्जा (देव पूजा – जमा किये हुए पदार्थ से तिरुवाराधन करना), स्वाध्यायम (वेद, वेदान्त, दिव्य प्रबन्ध आदि सिखना) और अन्त में योगम (ध्यान करना और मन/शरीर को भगवान के सोच के लिये आराम करना)। इससे हम यह समझ सकते है कि मुख्य और विस्तार पूर्वक तिरुवाराधन दिन के मध्य में किया जाता है। उसी तरह पितृ कार्य (श्राद्ध आदि) को दोपहर २.०० बजे के पश्चात करना चाहिये – वही पितृ के लिये योग्य समय है।
  • तिरुवाराधन यश के लिये और अन्य जन हमारी बढाई करे इसीलिए करना बाधा है। उसे भगवान का कैंकर्य समझकर करना चाहिये।
  • तिरुवाराधन पैसे के लिये करना बाधा है। उसे पैसे के लिये नहीं बल्कि स्वयं प्रयोजनम के लिये करना चाहिये।
  • तिरुवाराधन को अन्य काम्य कर्मों के जैसे नहीं करना चाहिये (जहाँ कोई एक कर्म फल प्राप्ति के लिये करता है)। उसे बिना कोई आशा के कैंकर्य समझकर करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के लिये स्वर्ग प्राप्ति के लिये ज्योतिष्टोम करता है। तिरुवाराधन ऐसे सांसारिक लाभ के लिये नहीं करना चाहिये – बल्कि उसे हमारे स्वयं के स्वरूप कि पूर्ति के लिये करना चाहिये कि हम भगवान के नित्य दास है।
  • तिरुवाराधन यह समझकर करना चाहिये कि हमारा शरीर (और इन्द्रियाँ) भगवान द्वारा उनकी सेवा हेतु दिया हुआ है। ऐसा न करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे इसमे कहा गया है कि “विचित्रा देह संपत्तिर इशवराय निवेदितुम, पूर्वमेव कृता ब्राह्मण हस्तपाधाधि संयुक्ता” – जब जीवात्मा कठीन परिस्थिती में हो (प्रलय के समय) जैसे एक अचित वस्तु, बिना शरीर/इन्द्रियाँ के और सांसारिक भोग को भोगे बिना या बंधन मुक्त करने कि कोशिश करना कृपा प्रदान करने वाले सर्वेश्वर उनके चरण कमल कि ओर अग्रेसर होने के लिये जीवात्मा को शरीर/इन्द्रियाँ के साथ आशिर्वाद प्रदान करते है। जीवात्मा शरीर/इन्द्रियाँ उपयोग के बजाय श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में जैसे बताये है वैसे भगवान कि ओर अग्रेसर होते है। “अन्नाल नी तंत आक्कैयिन वलि उलल्वेन”, शारीरिक आनन्द कि ओर जाता है, वैसे हीं जैसे एक मनुष्य जिसे नदी पार करने के लिये एक बेड़ा दिया जाता है वह नदी के दिशा में उसकी प्रवाह से समुद्र में गिर जाता है, इसीतरह इस संसार के चक्कर से बाहर आने के लिये जो इन्द्रियाँ/शरीर जीवात्मा को दि गयी थी उससे वो उतना हीं इस संसार में डुब जाता है। श्रीतिरुवरंगत्तु अमुधनार यही तत्व श्रीरामानुज नुतरंदादी के ६७वें पाशुर में समझाते है “मायवन तन्नै वणन्ग वैत्त करणम इवै” – भगवान हम जीवात्मा को यह शरीर उनकी सेवा हेतु दिये है। अत: हमें इस जन्म के सहीं उद्देश को जानना और उसी प्रकार निर्वाह करना चाहिये।
  • हमें भगवान कि पूजा यह समझकर करनी चाहिये कि यह स्वाभाविक है, जीवात्मा जो भगवान के दास है उसके सच्चे स्वभाव को शोभा देता है। इसे सतही तौर पर नहीं करना चाहिये।
  • भगवान को अवाप्त समस्त कामन कहते है (वह जो जिसकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो गयी हो)। वह दूसरों से कुछ भी आशा नहीं करते है और उन्हें निरपेक्षन (इच्छा रहित) कहते है। तिरुवाराधन हम हमारे स्वरूप में सही तरिके से स्थापित हो और हमारी ज़िम्मेदारी को पूर्ण करने हेतु करते है। हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि भगवान हम पर निर्भर है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान सर्व स्वतंत्र है। जीवात्मा पराधीन है। कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान स्वयं अर्जुन के सारथी बनकर उनके लिये उपलब्ध हुए थे। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुपड्डी के चरम श्लोक प्रकरण के २४७ सूत्रं में बहुत सुन्दरता से समझाते है। “किलिल पारतंत्रियमुम इंत स्वातंत्रियत्तिनुदैया एल्लै निलमिरे”। हमारे पूर्वाचार्यों कि दीप्ति को इस सुन्दर वर्णन से समझा जा सकता है। यहाँ इस विभाग में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी “अहं” कि चर्चा करते है – जहाँ भगवान अपनी प्रधानता को बताते है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे चरम श्लोक के पहली पंक्ति में “मां” से जोड़ते है जहाँ भगवान कृष्ण स्वयं को सारथी दिखाते है और अर्जुन को कहते है कि पूर्णत: केवल उन पर निर्भर रहे। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते है कि भगवान स्वयं इतना नीचा पद अपने भक्तों के सामने लेते है यह उनके श्रेष्ठता का स्वरूप है। उसी तरह भगवान अर्चा विग्रह का अवतार ग्रहण कर अपने भक्तों कि तिरुमाली में विराजमान होते है और भक्तों को पूर्ण अधीन प्रदर्शित करते है और यह सौलभ्य भी है।
  • सभी को यह बात समझना चाहिये कि सब कुछ भगवान का हीं है और वें हीं सभी के नियंत्रक है और स्वयं के वस्तु लेकर वें हीं तिरुवाराधन कराते है। हमें यह नहीं विचार करना चाहिये कि भगवान का तिरुवाराधन हम अपने वस्तु से कर रहे है। अगर हम कुछ फल या अन्य भोग लगाते है हमे यह सोचना चाहिये कि “वह स्वयं का वस्तु अपना रहे है हमारा कुछ भी नहीं है” और उनकी सेवा करे। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में कहा गया है “स्वत्वं आत्मनि संजातं स्वामित्वं ब्रह्मणी स्थितम” – जीवात्मा का यह गुण होना है कि वह भगवान कि संपत्ति है और भगवान का स्वभाव स्वामी होना है। यहीं बात अचित को भी लागू होती है – सब कुछ भगवान का हीं है। एक बार यह ज्ञान जीवात्मा को समझ में आ जाये वह भगवान कि नित्य सेवा का अधिकारी होगा।
  • हमें तिरुवाराधन स्वयं को पवित्र करने हेतु करना चाहिये नाकि भगवान को शुद्ध करने हेतु। भगवान हमेशा पवित्र है और उन्हें अंदणन, कुंदन, अमलन, आदि कहा जाता है। हम दोष और अपवित्रता से भरे हुए है। भगवान कि पूजा कर हम भी पवित्र हो जाते है (क्योंकि मन हमेशा भगवान के विषय में हीं सोचता है)। फिर भी स्नान, साफ वस्त्र पहनकर, नित्य कर्मानुष्ठान कर और प्रपन्न के दिनचर्या का पालन कर सभी को अपने शरीर को शुद्ध कर तिरुवाराधन करना चाहिये – हमें यह विचार नहीं करना चाहिये कि भगवान कि पूजा कर हम शुद्ध हो जायेंगे इसलिये इन शुद्धता के कदमों को पालन करने कि कोई आवश्यकता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: मन और शरीर दोनों को शुद्ध करना चाहिये। शारीरिक शुद्धता स्नान आदि से प्राप्त होती है और मन कि शुद्धता भगवान और उनके दिव्य गुणों के ध्यान से प्राप्त होती है। क्योंकि भगवान शुद्ध है जीवात्मा उनका ध्यान पूजन करके शुद्ध हो जाता है।
  • यह नहीं समझना कि भगवान का तिरुवाराधन करते समय भगवान केवल भाव शुद्धी कि इच्छा करते है।
  • यह विचार करना कि भगवान को हम क्या देते है उस पर हमारा न्याय करेंगे यह बाधा है। भगवान किसी के द्वारा उन्हें क्या दिया है उस पर निर्णय नहीं करते है – चाहे वह सस्ता हो या महंगा, अमीर हो या गरीब आदि। सभी को उनकी पूजा और सेवा प्रेम से और अपने हेसियत से उन्हें कुछ भी प्रदान करके करना चाहिये। अगर कोई अमीरों का खान दे जैसे घी आदि तो उसे वह बिना डरे करना चाहिये। परन्तु अगर कोई मूल प्रसाद ही अर्पण करें तो भगवान उस विषय कि परवाह नहीं करते कि क्या अर्पण किया है – परन्तु किस परिस्थिती में अर्पण किया है। शास्त्र में कहा गया है “यधन्न: पुरुषो भवति तदन्नस्थस्य देवता” – जो भी हम पाते है पहिले उस खाने को भगवान को अर्पण करना चाहिये उसके पश्चात प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह प्रमाण बहुत मुख्य है। कोई भी भगवान को वह प्रसाद अर्पण कर सकता है जो किसी के पाने के लिये उचित हो। भगवान कुछ भी और सब कुछ पा सकते है। परन्तु हर व्यक्ति अपने वर्ण और आश्रमानुसार कुछ हीं पदार्थ पा सकता है। उदाहरण पर गृहस्थ पान सुपारी भगवान को अर्पण कर पा सकता है, ब्रह्मचारी अगर वह प्रसाद हो तो भी उसे ग्रहण नहीं कर सकता है। इसलिये हमें उसे सावधानी से उस वस्तु का विश्लेषण करना चाहिये और यह देखना चाहिये कि स्वयं के पाने के पहिले क्या उसे भगवान को अर्पण किया जा सकता है।
  • यह सोचना कि तिरुवाराधन बहुत कठिन कार्य है परंतु उसे रिझानेवाला कार्य न समझना। तिरुवाराधन को रिझानेवाला कार्य समझना चाहिये और उसे प्रसन्नता से करना चाहिये।
  • भगवान का सौलभ्य देखते हुए तिरुवाराधन करने से हमें दुर्लक्षित नहीं होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान का हमारे तिरुमाली में अर्चा विग्रह के रूप में विराजमान होना स्वीकार करना ही सौल्यभता है – वें हमारे घर मे ही सुगम है। परन्तु उनके इस सादगी भरे आनंदमय तत्व को देखते हुए किसी को यह विचार नहीं करना चाहिये कि वें पूजा करने योग्य नहीं है – यह पूर्णत: असभ्य है।
  • तिरुमाली में अर्चावतार को श्रेष्ठ न मानना और उनकी मौजुदगी को महसुस न करना बाधा है। हमें यह दृढ़ विश्वास करना चाहिये कि तिरुमाली में अर्चावतार श्रीवैकुण्ठ के परमपदनाथ हीं है। मुदल तिरुवंदादी में श्रीसरोयोगी स्वामीजी ४४वें पाशुर में कहते है कि “तमर उगन्ददेव उरुवम अव उरुवम ताने तमर उगन्ददेप्पेर मट्रप्पेर्” – भगवान उनके भक्तों के लिए जो रूप पसन्द है वहीं रूप लेते है। भक्तों को जो पसंद है वही नाम ग्रहण करते है। सहस्त्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते “नेंजिनाल नीनैपपान्यवन अवनागुम निलकदल वण्णने” – श्रेष्ठ भगवान वहीं है जिसने वहीं रूप लिया है जो उसके भक्तों कि इच्छा है।
  • हमें स्वयं को अपने आचार्य का दास समझना चाहिये और अपने आचार्य के प्रति तिरुवाराधन करना चाहिये। हमें तिरुवाराधन आचार्य आज्ञा प्राप्त होने के पश्चात करना चाहिये। समाश्रयण के भाग में आचार्य शिष्य को तिरुवाराधन कैसे करना चाहिये यह सिखाते है और शिष्य को तिरुवाराधन कैसे करना यह शिक्षा देते है। हमारे नित्य तिरुवाराधन में हम इस संकल्प “श्री भगवदाज्ञा भगवत कैंकर्यरूपं आचार्य हस्तेन भगवदाराधनं करिष्ये” को स्मरण करते है – मुझे इस तिरुवाराधन को करने दे जो मेरे आचार्य के हस्त है। अत: हमे अपने आप को आचार्य दास समझकर तिरुवाराधन करना चाहिये।
  • सांसारिक जीवों के सामने हमें तिरुवाराधन नहीं करना चाहिये। ऐसा करना बाधा है। उसी तरह जब श्रीवैष्णव उपस्थित हो तो हमें तिरुवाराधन करते समय पर्दा नहीं करना चाहिये – बल्कि तिरुवाराधन उनके समक्ष हीं करना चाहिये।
  • तिरुवाराधन केवल एक दिनचर्या समझकर नहीं करना चाहिये। हमें बड़ो द्वारा किए हुए प्रक्रिया को समझना चाहिये जैसे तिरुपावै में कहा गया है “मेलैयार सेय्वनगल” – बड़ों ने क्या किया है। अनुवादक टिप्पणी: शिष्टाचरण (तत्व जो हमारे पूर्वाचार्य पालन करते थे) हमारे लिये बहुत मुख्य है। उन्होंने शास्त्र के तत्व को पूर्णत: समझा है और सबसे मुख्य बात उन्होंने उसका पालन किया है। अत: अगर हम आचार्य और आलवारों के राह में चलते है तो हमको इस राह में चलना बहुत सरल होगा।
  • तिरुवाराधन करते समय निम्म बाधाएं पहचानी गयी है:
    • तिरुवाराधन को अन्य मंत्रों के साथ करना। सामान्यत: मन्त्र यानी तिरुमन्त्र (अष्टाक्षर मन्त्र)। तिरुनेडुन्दाण्डगम के पाशुर ४ में यह कहा गया है की “मन्दिरत्तै मन्दिरत्ताल मरवादेन्रुम वालुदियेल वाललाम मड नेञ्जमे” – तिरुमन्त्र से भगवान का निरन्तर स्मरण किया जा सकता है और इस तरह एक गौरवशाली जीवन व्यतित किया जा सकता है। इस तिरुमन्त्र को “मन्त्र राज” (मंत्रों का राजा) कहा जाता है। तिरुमन्त्र का प्रसार/विस्तार द्वय महा मन्त्र है और इसे महा मन्त्र (मंत्रों के मणियों का मुकुट) कहा जाता है। तिरुवाराधन में द्वय महा मन्त्र को कई परिस्थितीयों में गाया जाता है। उसके आर्त पूर्त्ति (पूर्ण स्वभाव – पूर्ण सभी अर्थों में) और शिष्ट परिग्रहम (अपने पूर्वाचर्यों द्वारा स्वीकृत और पालन होना) नारायण मन्त्र सबसे उपर और किसी और मन्त्र से उसकी तुलना नहीं कि जा सकती है।
    • तिरुवाराधन के समय बिना गुरु परम्परा का उच्चारण के द्वय महा मन्त्र करना। मुमुक्षुपड्डी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४वें सूत्रं में समझाते है “मंत्रत्तिलुम मंत्रत्तुक्कु उल्लिदान वस्तुविलुम मंत्र प्रधनान आचार्यन पक्कलिलुम प्रेमं गनक्क उण्डानाल कार्यकरमावतु”श्रीवरवर मुनि स्वामीजी बहुत सुन्दरता समझाते है कि शिष्य को मन्त्र (जो समझाया गया है) में बहुत निष्ठा होनी चाहिये, भगवान (जो मन्त्र के लक्ष्य है) और आचार्य (जिनको मन्त्र पर पूर्ण नियंत्रण है) और इन तीनों पर बहुत लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हम इस तत्व को विस्तार पूर्वक देख चुके है। गुरु परम्परा मन्त्र (अस्मद गुरुभ्यो नम:.. श्रीधराय नम:) द्वय महा मन्त्र के पूर्व बोलना चाहिये। हमें हमेशा अपने आचार्य परम्परा हमारे आचार्य से प्रारम्भ कर श्रीमन्नारायण जो पहिले आचार्य है कि ओर भगवान के पास जाने से पूर्व कृतज्ञ रहना चाहिये।
    • तिरुवाराधन के समय सभी को आल्वारों के पाशुर और आचार्य के स्तोत्र/शब्द को स्मरण करना चाहिये जो द्वय महा मन्त्र को विस्तार पूर्वक समझाते है। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अळगिय मणवाल पेरुमाल नारायनार कहते है “द्वयार्थम धिर्घ चरणागति एनरतु सारसंग्रहत्तिले”श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने यह स्थापित किया कि तिरुवैमोझी (जिसे धीर्ग शरणागति भी कहते है) और कुछ नहीं द्वय महा मन्त्र का विस्तार पूर्वक व्याख्या है। इसलिये आल्वार और आचार्य के पाशुरों को स्मरण कर हम निरन्तर द्वय महा मन्त्र और उसके अर्थों को स्मरण करते है। और पूर्व दिनचर्या में एरुम्बियप्पा कहते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी होठों से निरन्तर द्वय महा मन्त्र बोलते रहते है और उनका हृदय उसके अर्थ को स्मरण करता है। इसलिये हम पूर्वाचार्यों का भाव स्पष्टता से समझ सकते है।
    • सभी को पाशुर/स्तोत्र को अर्घ्य/पाध्य/आचमन के लिये (भगवान के हाथ, चरण कमल और मुँह को साफ करने हेतु), स्नान (तिरुमंजन), धूपम (धूप/सुगन्ध), दीपम (दिया), तिरुवालवत्तम (पंखी करना), चन्दन का लेप लगाना, पुष्प अर्पण करना, प्रसाद लगाना, आदि के लिये स्मरण/गाना चाहिये जैसे हमारे पूर्वाचार्य करते थे। यह “जियर पड्डी तिरुवाराधन क्रम” में देखा जा सकता है जिसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने हम पर कृपा कर दिये है। अनुवादक टिप्पणी: सभी के लिये उचित पाशुर है। उदाहरण के लिए स्नान पर हम श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी का तिरुमोलि पदिगम गाते है “वेण्णेय अलैन्त कुणुन्गुम”, धूपम के लिये तिरुवैमौली का “परिवतिल इसनैप पाडी” का पाशुर गाते है आदि।
    • हमें मन्त्र, पाशुरों को गाना चाहिये जो हमारे पूर्वाचार्य गाते थे। हमें स्वयं के इच्छा से कुछ भी नहीं गाना चाहिये।
  • तिरुवाराधन कम एकाग्रता से करना। हमें अपना ध्यान पूर्णत: भगवान पर केन्द्रीत कर तिरुवाराधन पूर्ण सावधानी और प्रेम से करना चाहिये।
  • हमें भगवान से भी बढ़कर आचार्य और आल्वारों को मानना चाहिये और उनकी भी तिरुवाराधन उसी महत्त्वता या उससे भी बढ़कर करनी चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। उनकी महिमा “विण्णुलारिलुम सीरियर” (परमपदधाम से भी बढकर) ऐसे कि जाती है। इसी प्रकार उनके चरण कमलों को धोने में हिचकिचाना और भगवान के धोने में नहीं हिचकिचाना भी विरोधी है। भागवतों कि पूजा शास्त्र में भगवान से भी उच्च बताई गयी है। उन्हें भी भगवान के बराबर या उनसे उच्च समझना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इसी संदर्भ में हम श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कि परिस्थिती को स्मरण कर सकते है। श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति दृढ़ भक्ति थी और भगवान कि ओर देखते भी नहीं थे। एक बार श्रीरामानुज स्वामीजी के साथ यात्रा करते समय श्रीरामानुज स्वामीजी के पूजा करनेवाले भगवान के साथ उसी पेटी में उनके पूजा करनेवाले भगवान (श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण पादुका) को भी रख दिया। श्रीरामानुज स्वामीजी यह देख चोक गये और श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी से इसका कारण पूछा। श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी तुरन्त उत्तर दिये कि “क्या मेरे भगवान आपके भगवान से छोटे है?”। इसलिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आर्ति प्रबन्ध में श्रीरामानुज स्वामीजी से प्रार्थना करते है “कृपा कर मेरे ह्रदय को संपूर्णतः श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के ध्यान में स्थित कीजिये”।
  • भगवान के लिये जो भोग बनाया गया हो उसे भगवान के बहुत करीब (पवित्र मुख/होठ) से धरना चाहिये। उनके नीचे या बहुत दूर से भोग नहीं लगाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले समझाया गया है कि भगवान प्राकृतिक रूप से मौजूद है और उनसे सावधानी और प्रेम से व्यवहार करना चाहिये नाकि लापरवाही से।
  • आचार्य को भगवान से भी अधीक सम्मान देना चाहिये और जैसे हम भगवान को भोग लगाते है वैसे ही किसी को भी आचार्य को भोग लगाने से नहीं डरना चाहिये।
  • हमें भगवान में भेद को समझना चाहिये वह जो सांसारि लोगों के तिरुमाली में रहते है और जो श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में है। यह आसानी से समझा जा सकता है भगवान जो दिव्य देशों में विराजमान है और भगवान जो श्रीवैष्णवों में विराजमान है वह बहुत महान और पूजनीय है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान विशेषकर श्रीवैष्णवों को दर्शन देने हेतु आकर उनकी मौजूदगी का आनन्द लेते है और उनकी सेवा स्वीकार करते है। भगवद गीता ४.८ में भगवान कहते है “परित्राणाय साधुनाम, विनाशाय च दुषकृताम, धर्म संस्थापनार्थथाय संभवामि युगे युगे” – मैं पुन: पुन: अपने भक्त कि रक्षा, उनके दुश्मनों का सँहार करने और धर्म कि सही स्थापना करने हेतु आता हूँI गीता भाष्य में श्रीरामानुज स्वामीजी समझाते है कि ३ कारण है परन्तु मुख्य कारण भक्तों को खुश रखना और उनकी रक्षा करना है। श्रीरामानुज स्वामीजी यह आल्वारों के पाशुर को आधार बनाकर हीं कहते है जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति में कहते है “अगर भगवान स्वयं गजेन्द्र को बचाने नहीं आते तो उनकी प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती”।
  • कुछ भक्तों कि पूजा करना जिन्हें हमारे पूर्वाचार्य नहीं पूजते थे बाधा है। जैसे तिरुप्पावै में लिखा है “मेलैयार सेय्वनगल” – जो हमारे पूर्वज करते थे उसे हमें करना चाहिये। “चेय्यातन चेय्योम” – जिसे हमारे पूर्वज नहीं करते थे उसे हमें नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह बहुत मुख्य बात है। भगवान के बहुत भक्त है। परन्तु हमारे पूर्वाचार्य विशेषकर इस बात को दर्शाये है कि क्योंकि हम प्रपन्न है हमें उन भक्तों कि राह पर चलना चाहिये जिन्हें अहंकार नहीं है और हमेशा सत्व गुण में रहते है। एक बहुत सुन्दर उदाहरण जो हमेशा आता है वह शिवजी है। सामान्यत: शिवजी को बहुत बड़ा भागवत कहा गया है। भागवत में कहा गया है “वैष्णवानाम यथा संबु:” वैष्णवों में शंभु हीं सबसे उच्च है। फिर भी हमारे पूर्वाचार्य ने जो उनमें तमोगुण है उसके कारण उन्हें पूरी तरह अस्वीकार किया है। वह भगवान से भी लड़ बैठते है (भगवान कि श्रेष्ठता को जानते हुए भी)। यह कई देवतान्तरों को समान है जो अनजान बन जाते है और भगवान से झगड़ा कर बैठते है। कुछ भक्तों के विषय में भी जो सत्त्व गुण में स्थित है उन्हें थोड़ा अहंकार आ जाता है कि उन्हें भगवान उनके स्वयं के भक्ति से प्राप्त हुए है। ऐसे विषय में भी उन भक्तों कि पूजा नहीं करनी चाहिये।
  • जो आदित्य मण्डलम (अन्तर्यामी स्वरुप का सामान्य प्राकट्य – सभी के अंतर में विराजमान) के मध्य में दिखते है उन भगवान कि पूजा करना चाहते है जब की वें अपने तिरुमाली में अर्चाविग्रह के रूप में उदार स्वरूप में विराजमान है। अनुवादक टिप्पणी: अन्य रूप से भी अर्चावतार रूप में पूजा करना भगवान को सबसे अधीक प्रसन्नता देनेवाली बात है – क्योंकि वह अपने भक्तों को पूर्ण स्वतन्त्र देते है।
  • बहीर यागम (बाहरी पूजा) अन्तर यागम (आन्तरिक पूजा) से भी अधीक महत्त्वपूर्ण है इसे न समझना यह बाधा है। यागम इस जड़ मूल से लिया गया है “यज देव पूजा” – भगवान कि पूजा करना। बन्द दरवाजे में चोरी से करना सेवा करना अप्रधान है जब कि सबके संग में करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह पहलू सबको तिरुवाराधन में भाग लेने के लिये प्रोत्साहित करता है। औरते, बच्चे आदि सभी उनके स्वभाव के हिसाब से कैंकर्य कर सकते है। उदाहरण पर औरते भगवान के लिये प्रसाद, पुष्पमाला बना सकती है, उस स्थान को साफ रक सकती है आदि। बच्चों को स्तोत्र, पाशुर आदि गाने में प्रोत्साहन कर सकते है। अन्तर और बहीर की एक ओर व्याख्या यह हो सकती है –अपने स्वयं के हृदय से अधीक बाहरी अर्चावतार रूप में भगवान की पूजा करना ज्यादा अच्छा होगा – क्योंकि भगवान भव्य रूप से पूजा करने हेतु विशेषकर अर्चावतार में उतरते है। इसलिये जो हमारे तिरुमाली में उतरे है उन भगवान को छोड़ नहीं सकते और यह नहीं कह सकते कि हम भगवान का ध्यान हमारे हृदय में कर रहे है।
  • अगर हम अपने आचार्य से अर्चाविग्रह को प्राप्त करते हैं तो हम उस विग्रह कि वैसे हीं पूजा करनी चाहिये। हमें और कोई प्रतिष्ठा पूजा करने कि जरूरत नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: अगर हम अर्चाविग्रह कोई मूर्तिकार से लाते है तो उस अर्चाविग्रह का कोई अच्छे पण्डित द्वारा प्राण प्रतिष्ठा करानी चाहिये। यह भी कहा जाता है कि अपने तिरुमाली में पूजा करने हेतु एक लाया गया नव निर्मित विग्रह मन्दिर में कोई यज्ञ जैसे पवित्रोत्सव के समय भगवान कि उपस्थिती उस विग्रह में लाने के लिये विराजमान कर सकते है। परन्तु अपने आचार्य द्वारा दी हुई विग्रह को कोई पूजा करने कि कोई जरूरत नहीं हैं। और प्राण प्रतिष्ठा का तत्व मानव द्वारा बनाये विग्रह के लिये है। सालग्राम भगवान के लिये कोई नियम नहीं है क्योंकि वह स्वयंभु है और उन्हें ऐसे हीं पूजा जा सकता है।
  • यहाँ से आचार्य भागवत आराधन पर हमारा ध्यान केन्द्रित होगा। हमें यह समझना चाहिये कि भगवान से अधीक भगवान के भक्तों कि पूजा बड़े आनन्द से करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: पद्म पुराण में शिवजी अपनी पत्नी पार्वती से कहते है “आराधनानम सर्वेषाम विष्णोर आराधनं परम, तस्मात् परतरम देवी ताधियानाम आराधनं” सभी पूजा से विष्णु कि पूजा उत्तम है। इसमे भी उत्तम भगवान विष्णु के भक्तों कि पूजा करना है। हमारे पूर्वाचार्यों ने इस तत्व को कई तरिके से स्थापित किया है। इसलिये यह बहुत मुख्य बात है कि हमें भागवतों कि ओर भी अधीक ध्यान देना है।
  • 3-thadhiyaradhanam
  • हमें यह पूर्ण विश्वास रखना चाहिये कि अपने स्वयं के आचार्य कि पूजा करना स्वयं को उपर उठाने का एक विशेष उपाय है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य ने ऐसा समझाया है कि “भगवान जो हमसे सीधे वार्तालाप कर सके” अर्चावतार भगवान के तुलना जो हमसे व्यक्तिगत रूप से बात नहीं करते है (कुछ विशेष स्थिति में जहां वरदराज भगवान श्रीकाञ्ची पूर्ण स्वामीजी से वार्तालाप करते है आदि)। अत: शिष्य के स्वभाव के लिये उनकी पूजा और सेवा करना ज्यादा उचित रहेगा।
  • भगवान के स्थिति में उनके तिरुमेनी से भी उनके चरण कमल को अधीक प्रिय माना है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति में यह दर्शाते है “पूवार कलल्गल अरुविनैयेन पोरुनतुमारु पूणराये” – मुझे आपके चरण कमलों में बड़े दृढ़ता से रहने दो जो मेरे सभी पापों को निकाल देगा और श्रीसहस्त्रगीति में “अदिक्किल अमरन्तु पुगुन्तेने” – मैं आपके चरण कमलों के नीचे विश्राम कर रहा हूँ। उसी तरह आचार्य के स्थिति में भी हमें उनके चरण कमलों कि सेवा में भी अधीक लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पडी के १४७ सूत्रं में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बड़े सुन्दरता से द्वय प्रकरणम चरणौ सम्बन्ध समझाते है- शेषीपक्कल शेषभूतन इलियुम तुरै; प्रजै मुलैयिले वाय वैक्कुमा पोले – जैसे एक जन्म लिया हुवा बच्चा अपने माँ के स्तन को ढुँढता है (क्योंकि वह उसके पालन पोषण का मूल है) जीवात्मा भी भगवान के चरण कमलों कि खोज करता है।
  • चरमाधिकारीयों (वो जो आचार्य भक्ति के अन्तिम तत्व पर स्थित है) के लिये आचार्य के चरण कमल से भी बढ़कर आचार्य कि पादुका है। निरंतर मनन और अनुभूति के द्वारा यह बात हमारे मन मस्तिष्क में द्रढ़ता से स्थापित हो जनि चाहिए। ऐसा न करना बाधा है। जैसे भगवान कि पादुका श्रीशठकोप स्वामीजी हमें अधीक प्रिय है, आचार्य कि पादुका भी हमें अधीक प्रिय है। जैसे पहिले देखा गया है हम श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी कि महानता को स्मरण कर सकते है। वें इस “देवुमट्ररियेन्” तत्व पर पूर्ण स्थित थे – मैं श्रीरामानुज स्वामीजी को छोड़ और किसी देवता को नहीं जानता हूँ। वह श्रीरामानुज स्वामीजी के गोपनीय और तुच्छ सेवा करने में हीं केन्द्रीत रहते थे। एक बार श्रीरामानुज स्वामीजी के साथ यात्रा करते समय श्रीरामानुज स्वामीजी के पूजा करनेवाले भगवान के साथ उसी पेटी में उनके पूजा करनेवाले भगवान (श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण पादुका) को भी रख दिया। जब श्रीरामानुज स्वामीजी ने यह देखा तो वह नाराज हो गये और श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी को ड़ाटते है। श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी बिना डरे कहे कि “मेरे भगवान आपके भगवान से छोटे कैसे हुए?”। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी कि निष्ठा के प्रति बड़े विस्मय हो गये और कहते है “मैं आपसे चर्चा में हार गया। आपसे कोई भी जीत नहीं सकता है”। ऐसे दृढ़ विश्वास प्रगट करना बड़ा कठिन है। अनुवादक टिप्पणी: हम यहाँ श्रीचैलाचल अम्बाजी को याद कर सकते है जिन्हें अध्यात्मिक विषय में श्रीरामानुज स्वामीजी ने स्वयं शिक्षा दि है। वो अपने तिरुवाराधन में श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण पादुका कि पूजा करती थी। यह चरण पादुका स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी ने उन्हें दिया था। अब हम कुछ आचार्य के पादुका के नामों को देखेंगे। सामान्यत: प्रिय शिष्य के नाम पर पादुका का नाम रखा जाता है। भगवान के लिये यह श्रीशठकोप है (श्रीशठकोप स्वामीजी)। श्रीशठकोप स्वामीजी के लिये श्रीमधुरकवि स्वामीजी (आल्वार तिरुनगरी में इन्हें श्रीरामानुज भी कहते है)। श्रीरामानुज स्वामीजी के लिये श्रीदाशरथी स्वामीजीश्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के लिये श्रीपराशर भट्टर स्वामीजीश्रीवरवरमुनि स्वामीजी के लिये पोन्नदियाम सेंगमलम (पोन्नडिक्काई जीयर) आदि।
  • हमें निरन्तर भगवान और भागवतों कि पूजा में लगे रहना चाहिये – यह आचार्य को बहुत प्रसन्न करेगा। ऐसा न करना बहुत बड़ी गलती होगी। और भगवदाराधन और भागवत आराधन में कोई भिन्नता नहीं होनी चाहिये – दोनों को समान रूप से देखना चाहिये।
  • जब भी हम किसी थके हुए श्रीवैष्णवों को देखते है तो तुरन्त हमें उनके चरण कमलों को धोना चाहिये और उन्हें प्रसाद पवाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • यह कहा जाता है कि “दर्शनाथ गृहयते मया” (जो भोग चढाया जाता है वह मेरे नयनों द्वारा पाया जाता है) – इसे “कण्दरुलप पण्णुगै” कहा जाता है (भगवान को भोग लगाना)। परन्तु यहाँ “अमुधू सेय्यप पण्णुगै” भी है (भगवान चढाये हुए भोग को सच में पा रहे है) – जो पूर्ण है। हालाकि यह दोनों भिन्न है हमें यह सोचना चाहिये कि भगवान सच में पा रहे है जबकि वो अपने नयनों से ग्रहण कर बचा हुआ हमें दे रहे है। अनुवादक टिप्पणी: क्योंकि यह चर्चा भागवत आराधन तक पहूँच गयी हमें यह समझना चाहिये। भगवान को भोग लागाने से वों उन्हें अपने नयनों से पाते है। हम उसके पश्चात वह भगवान के भोग को भागवातों को देना चाहिये जो उस प्रसाद को सच में पाते है। उसके पश्चात ही हमें वह प्रसाद को ग्रहण करना चाहिये जो भागवतों द्वारा सीधे प्राप्त किया गया है और भगवान के नयनों द्वारा पाया गया है। भागवत शेष को सबसे अधीक पवित्र माना गया है। भागवत में श्रीनारद मुनि कहते है कि वो अपने पिछले जन्म में केवल शिक्षीत ऋषी जो महान भागवत थे उनका प्रसाद लेने से पवित्र हुये है। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमालै के पाशुर में यह घोषणा करते है कि “पोनगम शेय्द शेडम तरुवरेल पुनिदम अन्रे” – केवल भागवतों कि कृपा से उनका शेष प्रसाद प्राप्त हो तो वह पवित्र है।
  • आचार्य और भागवतों की समान रूप से भगवान के बराबर सेवा करनी चाहिये और बिना कोई भेद भाव से बड़े अच्छे ढंग से सेवा करनी चाहिये। यह कहा जाता है कि “आचार्य: स हरिश साक्षात चररुपी न संशय:” – आचार्य भगवान है स्वयं हरी आचार्य रूप में घुमते रहते है जब कि अर्चावतार भगवान एक ही स्थान पर रहते है।
  • सामान्य शास्त्र और शिष्टाचार्य है। एक प्रसिद्ध बात है “धर्मज्ञ समयम प्रमाणं वेदा: च” – शिक्षीत जन की दिशा अधिकार और वेद भी है। यहाँ श्रीवैष्णवों को वेदों से भी अधिक महत्त्व दिया गया। इसलिये तिरुवाराधन करते समय हमें पूर्वाचार्यों के पद चिन्हों पर चलना चाहिये जो बड़े ज्ञानी थे ना कि सामान्य तत्व से (जो कि सांसारिक लाभ को चाहते है।)
  • भगवद, भागवत और आचार्य कि पूजा करते समय आलस्य के कारण हमें अंगड़ाई नहीं लेनी चाहिये। यह एक बहुत बड़ा विषय है कुछ महत्त्वपूर्ण बातों के साथ जो हमारे नित्य दिनचर्या में लागु होता है यानी तिरुवाराधनम। सभी को बड़ी सावधानी से पढना चाहिये, तत्त्वों को समझना चाहिये और अपने नित्य दिनचर्या में इसका पालन करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ३

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

नम्पिळ्ळै – श्रीरङ्गम्

२१) प्राप्ति पलमाय् वरुमतिरे कैङ्कर्यम्

परमपद मे अप्रतिबन्धित सेवा (कैङ्कर्य), जीवात्मा का एकमात्र उद्देश्य – जीव का अन्तिम लक्ष्य

जीवात्मा (जीव), स्वभाव से, परम ईश्वर भगवान् श्रीमन्नारायण का दास है | जब वह भगवद्दासत्व को स्वीकार कर भगवान् की सेवा करेगा, तभी उसके दासत्व स्वरूप की पुष्टि होती है | भगवद्दासत्व युक्त ऐसी सेवा भगवद् प्राप्ति (भगवद्धाम प्राप्ति) का परिणाम है |

२२)  शेषिक्कु उद्देश्यमानतु शेषिभूतनुक्कु उद्देश्यमाय्च् चोल्लवेणुमो

जैसे भगवान्  को श्रीरङ्ग धाम एवं अन्य धाम प्रिय है, वैसे ही उनके भक्तों को भी बहुत प्रिय है

जो भगवान् को प्रिय है, वह स्वत: भावेन भगवद्दासों को प्रिय होता है |

जैसे आळ्वार भगवान् को प्रिय है, वैसे भगवद्दासों को भी आळ्वार अत्यधिक प्रिय है

२३) करणङ्गळुक्कुक् कडैत्त कार्यङ्गळ् कोळ्ळवे स्वरूपविरोधियाय् वन्देरियानवै तन्नडैयेपोम्

जीव के इन्द्रियों को भगवद्विषय मे सम्लग्न करने से, वह स्वरूप अनुरूप विरोधि विषयों से स्वत: मुक्त हो जाता है |

इस विषय मे, भगवद्भक्त श्री कासार योगी (सार मुनि) (मुदल् आळ्वार) अपने दिव्य प्रबन्ध मे कहते हैं :

कासार योगी – काञ्चीपुरम्

वायवनैयल्लत्तु वाळ्त्तातु
कैयुलगम् तायवनैयल्लत्तु ताम्तोऴा
पेय्मुलैनन्चु उणाग वुण्डान् उरुवोडु पेरल्लाल्
काणाकण् केळाचेवि

अर्थात् (मैं) भगवान् का ही गुण-गान करूँगा | मेरे दोनो हाथ उसकी ही पूजा करेंगे जिसने इस पूरे संसार को नापा – भगवान् त्रिविक्रम | मेरे दोनो नेत्र उस परम परात्पर भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन करेंगे जिनने पूतना जैसे क्रूर राक्षसी को माता का दर्जा देकर उसके विष से भरे स्तनों का पान किया |

भगवद् विषय मे अपने इन्द्रियों को सम्लग्न करने से, जीव के स्वरूप विरुद्ध बाधाएँ स्वत: दूर हो जाते हैं|

२४) गुणङ्गळुक्कु पिरित्तु स्थितियातल् , उपलम्बमातल् इल्लाताप् पोळे विभूतिक्कुम् अवनैयोऴिय स्थितियातल् उपलम्बमातलिल्लै

स्थिति – अस्थित्व , उपलम्बम् – इन्द्रियगोचरता |

एक गुण का अस्थित्व होना या ना होना केवल पदार्थ या वस्तु पर निर्भर है | उदाहरणार्थ लालिमा रङ्ग और लाल-वस्त्र अभिन्न हैं क्योंकि लालिमा का न तो भिन्न अस्थित्व है न लाल-वस्त्र से भिन्न स्वरूप मे देखा जा सकता है | ठीक इसी प्रकार, भगवद्धन (भगवान् का धन ) (नित्य एवं लीला विभूति) का भगवान् के बिना न तो अस्थित्व है न भगवान् से भिन्न देखा जा सकता है |

२५) कर्म निबन्धमान आकारम् स्मृति विषयमागातपदियान पाकम् पिरन्ताल् तदीयमाये तोत्ति (तोत्त्रि) एल्लामोक्क अनुभाव्यमायिरुक्कुम्

केवल भगवद् प्रेम और भगवद् भक्ति के कारण ही, प्रह्लाद महाराज अग्नि मे भी आनन्दमय रहे !

 जब हम समझेंगें कि सुख-दु:ख हमारे पाप-पुण्य के कारण प्राप्त होते हैं, तभी हम समझेंगें कि हम ईश्वराधीन हैं और स्वभावत: हमे यह स्वीकृत है |

अनुवादक टिप्पणी : उपरोक्त विषय सन्दर्भ मे, पिळ्ळै लोकाचार्य ” तत्त्व त्रय ” नामक ग्रन्थ के ७४ , ७५, ७६ सूत्रों मे दर्शाते हैं और इसके भवमय अर्थों को वरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या मे व्यक्त करते हैं | वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं : वस्तुत: सब भगवान् के अधीन होने के कारण सभी परिस्थितियां आनन्दमय एवं सुखपूर्वक है| केवल भौतिकता के कारण कुछ परिस्थितियाँ अनुकूल लगते हैं और कुछ प्रतिकूल लगते हैं| उदाहरणार्थ : एक ही क्षेत्र मे निवास करने वाला व्यक्ति ग्रीष्म ऋतु मे गर्मी और शरद ॠतु मे सर्दी महसूस करता है| जब हम ऐसे शारीरिकता के जाल से परे होंगें , हम जीव के स्वाभाव को यथारूप समझेंगें और चाहे हम किसी भी परिस्थिति मे हो, हमे उस स्थिति मे अचल रहकर (स्थिति को स्वीकार कर) भगवान् के अनुकुल मति से सकारात्मक भावेन प्रतिगतिशील होना चाहिये |

२६) वैष्णव सन्तानत्तिले पिरन्तार्क्कु ईश्वर मर्गमङ्गळ् तेरियुमिरे

श्रीविष्णुचित्त स्वामी और आण्डाल् अम्मा जी

लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं : जो जीव श्रीवैष्णव के घर मे जन्म लेते हैं , वे सभी भगवान् (ईश्वर) के गुप्त एवं गूढ विषय ज्ञान से सम्पन्न होते हैं | उदाहरणार्थ : गोदा अम्माजी, (जो) श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कि पुत्री है, वह भगवान् के दिव्य गुणों एवं गुप्त विषय ज्ञान से समपन्न थी |

२७) मनुष्य जन्मत्तुक्कु पलम् (फलम्) भगवद् समाश्रयणमाय इरुक्क, अत्तु इल्लातर् मनुष्यरल्लर्

मनुष्य जन्म की सार्थकता, भगवदाश्रय ग्रहण करना है (या भगवच्छरणागत होना है) | ऐसे अ-भगवच्छरणागत (यानि जिन्होंने भगवान् का आश्रय ग्रहण नही किया है) वह मनुष्य नही होते है और न मनुष्य श्रेणि मे इनकी गणना होती है |

२८) प्रातिकूल्य वर्जनमिरे वेण्डुवतु

जीवात्मा के लिये प्रतिकूल कार्यों का वर्जन करना अत्यन्त आवश्यक है |

भगवान् श्रीराम और राक्षस राज रावन के बीच युद्ध का दृश्य

अनुवादक टिप्पणी :  पिळ्ळै लोकाचार्य अपने मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के २०३ सूत्र मे यह सिद्धान्त को व्यक्त करते हुए रामायण के इस श्लोक  “च चाल चापम् च मुमोच वीर ”  माध्येन समझाते हैं | वे  कहते हैं , जब  रावन भगवान् श्रीराम चन्द्र  के प्रति अपने  तीव्र बाणों  से प्रहार  कर रहा था तब समतुल्य भाव से भगवान् श्री रामचन्द्र ने भी  रावण के प्रति  दिव्य बाणों  से प्रहार किया | श्रीरामचन्द्र के तीव्र बाण प्रहार से जब रावण का धनुष एवं बाण टूट गया तो भगवान् श्रीरामचन्द्र ने अपने अस्त्रों को त्यागकर रावन के प्राण की रक्षा की (रावन को दूसरा मौका दिया )  | यही उदाहरण माध्येन अन्य उपायों के विषय सन्दर्भ मे हमारे पूर्वाचार्य समझाते हुए कहते हैं  कि ऐसे अन्य उपायशरण भगवान् को हमारा उद्धार करने से रोकते हैं |  

२९) ओरु चिरायै विस्वासित्तु आरु मासत्तुकु वेणुम् चोरुम् तण्णिरुम् एत्तिक्कोण्डु कदलिलिऴिया निन्रान् | अव्वोपति विस्वामागिलुम् वेण्डवो भगवद् विषयत्तैप् पत्तुवार्क्कु

चिराय : – छोटी सी सामान्य नौका !

समुद्री यात्रा मे यात्रीगण जैसे अन्न, दाल, इत्यादि विविध पदार्थों को लेकर नौका मे यात्रा करते हैंइस आशा से कि ये पदार्थ उनकी यात्रा के लिये समुचित है, ठीक उसी प्रकार से प्रत्येक प्रपन्न को ऐसी श्रद्धा भगवच्छरणारविन्द मे होनी चाहिये| हम प्राय: देखते हैं कि भौतिक जगत् मे हम सभी पेय जल, योग्य अन्न, यात्रा (वायुयान, जहाज से), बैंक राशी एवं इतर इतर व्यस्वस्था में विश्वास रखते हैं। अगर ऐसी श्रध्दा एवं विश्वास अगर आचार्य द्वारा समाश्रित होकर हम भगवान के प्रति समर्पित करें (भगवान के चरणों का शरण स्वीकार किया हो), तो हम ऐसे तुच्छ भौतिक सुखों को आसानी से परित्याग कर दिया होगा  ।

३०) प्राप्यत्तिल प्रथमावदि भगवच्छेषत्वत्तळविले निर्कै ; चरमावदि भागवत शेषत्वत्तळविले वरुगै |

श्रीशठकोप सूरी – भगवद् शेषत्व मे स्थित

मधुरकवि आळ्वार – भागवत शेषत्व मे स्थित

प्राप्य ध्येय के प्रथम स्थर मे भगवच्छेषत्व ही उचित है (भगवद् दास) और चरम स्थर तो भागवत शेषत्व है  (भागवत दास ) |

अनुवादक टिप्पणी : उपरोक्त सूत्र के उत्तरवर्ति विषय के बारे मे अधिक जानकारी के लिये यह लिङ्क क्लिक करे — http://ponnadi.blogspot.in/p/anthimopaya-nishtai.html

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/07/divine-revelations-of-lokacharya-3.html

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