लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ३

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै – श्रीरङ्गम्

२१) प्राप्ति पलमाय् वरुमतिरे कैङ्कर्यम्

परमपद मे अप्रतिबन्धित सेवा (कैङ्कर्य), जीवात्मा का एकमात्र उद्देश्य – जीव का अन्तिम लक्ष्य

जीवात्मा (जीव), स्वभाव से, परम ईश्वर भगवान् श्रीमन्नारायण का दास है | जब वह भगवद्दासत्व को स्वीकार कर भगवान् की सेवा करेगा, तभी उसके दासत्व स्वरूप की पुष्टि होती है | भगवद्दासत्व युक्त ऐसी सेवा भगवद् प्राप्ति (भगवद्धाम प्राप्ति) का परिणाम है |

२२)  शेषिक्कु उद्देश्यमानतु शेषिभूतनुक्कु उद्देश्यमाय्च् चोल्लवेणुमो

जैसे भगवान्  को श्रीरङ्ग धाम एवं अन्य धाम प्रिय है, वैसे ही उनके भक्तों को भी बहुत प्रिय है

जो भगवान् को प्रिय है, वह स्वत: भावेन भगवद्दासों को प्रिय होता है |

जैसे आळ्वार भगवान् को प्रिय है, वैसे भगवद्दासों को भी आळ्वार अत्यधिक प्रिय है

२३) करणङ्गळुक्कुक् कडैत्त कार्यङ्गळ् कोळ्ळवे स्वरूपविरोधियाय् वन्देरियानवै तन्नडैयेपोम्

जीव के इन्द्रियों को भगवद्विषय मे सम्लग्न करने से, वह स्वरूप अनुरूप विरोधि विषयों से स्वत: मुक्त हो जाता है |

इस विषय मे, भगवद्भक्त श्री कासार योगी (सार मुनि) (मुदल् आळ्वार) अपने दिव्य प्रबन्ध मे कहते हैं :

कासार योगी – काञ्चीपुरम्

वायवनैयल्लत्तु वाळ्त्तातु
कैयुलगम् तायवनैयल्लत्तु ताम्तोऴा
पेय्मुलैनन्चु उणाग वुण्डान् उरुवोडु पेरल्लाल्
काणाकण् केळाचेवि

अर्थात् (मैं) भगवान् का ही गुण-गान करूँगा | मेरे दोनो हाथ उसकी ही पूजा करेंगे जिसने इस पूरे संसार को नापा – भगवान् त्रिविक्रम | मेरे दोनो नेत्र उस परम परात्पर भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन करेंगे जिनने पूतना जैसे क्रूर राक्षसी को माता का दर्जा देकर उसके विष से भरे स्तनों का पान किया |

भगवद् विषय मे अपने इन्द्रियों को सम्लग्न करने से, जीव के स्वरूप विरुद्ध बाधाएँ स्वत: दूर हो जाते हैं|

२४) गुणङ्गळुक्कु पिरित्तु स्थितियातल् , उपलम्बमातल् इल्लाताप् पोळे विभूतिक्कुम् अवनैयोऴिय स्थितियातल् उपलम्बमातलिल्लै

स्थिति – अस्थित्व , उपलम्बम् – इन्द्रियगोचरता |

एक गुण का अस्थित्व होना या ना होना केवल पदार्थ या वस्तु पर निर्भर है | उदाहरणार्थ लालिमा रङ्ग और लाल-वस्त्र अभिन्न हैं क्योंकि लालिमा का न तो भिन्न अस्थित्व है न लाल-वस्त्र से भिन्न स्वरूप मे देखा जा सकता है | ठीक इसी प्रकार, भगवद्धन (भगवान् का धन ) (नित्य एवं लीला विभूति) का भगवान् के बिना न तो अस्थित्व है न भगवान् से भिन्न देखा जा सकता है |

२५) कर्म निबन्धमान आकारम् स्मृति विषयमागातपदियान पाकम् पिरन्ताल् तदीयमाये तोत्ति (तोत्त्रि) एल्लामोक्क अनुभाव्यमायिरुक्कुम्

केवल भगवद् प्रेम और भगवद् भक्ति के कारण ही, प्रह्लाद महाराज अग्नि मे भी आनन्दमय रहे !

 जब हम समझेंगें कि सुख-दु:ख हमारे पाप-पुण्य के कारण प्राप्त होते हैं, तभी हम समझेंगें कि हम ईश्वराधीन हैं और स्वभावत: हमे यह स्वीकृत है |

अनुवादक टिप्पणी : उपरोक्त विषय सन्दर्भ मे, पिळ्ळै लोकाचार्य ” तत्त्व त्रय ” नामक ग्रन्थ के ७४ , ७५, ७६ सूत्रों मे दर्शाते हैं और इसके भवमय अर्थों को वरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या मे व्यक्त करते हैं | वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं : वस्तुत: सब भगवान् के अधीन होने के कारण सभी परिस्थितियां आनन्दमय एवं सुखपूर्वक है| केवल भौतिकता के कारण कुछ परिस्थितियाँ अनुकूल लगते हैं और कुछ प्रतिकूल लगते हैं| उदाहरणार्थ : एक ही क्षेत्र मे निवास करने वाला व्यक्ति ग्रीष्म ऋतु मे गर्मी और शरद ॠतु मे सर्दी महसूस करता है| जब हम ऐसे शारीरिकता के जाल से परे होंगें , हम जीव के स्वाभाव को यथारूप समझेंगें और चाहे हम किसी भी परिस्थिति मे हो, हमे उस स्थिति मे अचल रहकर (स्थिति को स्वीकार कर) भगवान् के अनुकुल मति से सकारात्मक भावेन प्रतिगतिशील होना चाहिये |

२६) वैष्णव सन्तानत्तिले पिरन्तार्क्कु ईश्वर मर्गमङ्गळ् तेरियुमिरे

श्रीविष्णुचित्त स्वामी और आण्डाल् अम्मा जी

लोकाचार्य स्वामीजी कहते हैं : जो जीव श्रीवैष्णव के घर मे जन्म लेते हैं , वे सभी भगवान् (ईश्वर) के गुप्त एवं गूढ विषय ज्ञान से सम्पन्न होते हैं | उदाहरणार्थ : गोदा अम्माजी, (जो) श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कि पुत्री है, वह भगवान् के दिव्य गुणों एवं गुप्त विषय ज्ञान से समपन्न थी |

२७) मनुष्य जन्मत्तुक्कु पलम् (फलम्) भगवद् समाश्रयणमाय इरुक्क, अत्तु इल्लातर् मनुष्यरल्लर्

मनुष्य जन्म की सार्थकता, भगवदाश्रय ग्रहण करना है (या भगवच्छरणागत होना है) | ऐसे अ-भगवच्छरणागत (यानि जिन्होंने भगवान् का आश्रय ग्रहण नही किया है) वह मनुष्य नही होते है और न मनुष्य श्रेणि मे इनकी गणना होती है |

२८) प्रातिकूल्य वर्जनमिरे वेण्डुवतु

जीवात्मा के लिये प्रतिकूल कार्यों का वर्जन करना अत्यन्त आवश्यक है |

भगवान् श्रीराम और राक्षस राज रावन के बीच युद्ध का दृश्य

अनुवादक टिप्पणी :  पिळ्ळै लोकाचार्य अपने मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के २०३ सूत्र मे यह सिद्धान्त को व्यक्त करते हुए रामायण के इस श्लोक  “च चाल चापम् च मुमोच वीर ”  माध्येन समझाते हैं | वे  कहते हैं , जब  रावन भगवान् श्रीराम चन्द्र  के प्रति अपने  तीव्र बाणों  से प्रहार  कर रहा था तब समतुल्य भाव से भगवान् श्री रामचन्द्र ने भी  रावण के प्रति  दिव्य बाणों  से प्रहार किया | श्रीरामचन्द्र के तीव्र बाण प्रहार से जब रावण का धनुष एवं बाण टूट गया तो भगवान् श्रीरामचन्द्र ने अपने अस्त्रों को त्यागकर रावन के प्राण की रक्षा की (रावन को दूसरा मौका दिया )  | यही उदाहरण माध्येन अन्य उपायों के विषय सन्दर्भ मे हमारे पूर्वाचार्य समझाते हुए कहते हैं  कि ऐसे अन्य उपायशरण भगवान् को हमारा उद्धार करने से रोकते हैं |  

२९) ओरु चिरायै विस्वासित्तु आरु मासत्तुकु वेणुम् चोरुम् तण्णिरुम् एत्तिक्कोण्डु कदलिलिऴिया निन्रान् | अव्वोपति विस्वामागिलुम् वेण्डवो भगवद् विषयत्तैप् पत्तुवार्क्कु

चिराय : – छोटी सी सामान्य नौका !

समुद्री यात्रा मे यात्रीगण जैसे अन्न, दाल, इत्यादि विविध पदार्थों को लेकर नौका मे यात्रा करते हैंइस आशा से कि ये पदार्थ उनकी यात्रा के लिये समुचित है, ठीक उसी प्रकार से प्रत्येक प्रपन्न को ऐसी श्रद्धा भगवच्छरणारविन्द मे होनी चाहिये| हम प्राय: देखते हैं कि भौतिक जगत् मे हम सभी पेय जल, योग्य अन्न, यात्रा (वायुयान, जहाज से), बैंक राशी एवं इतर इतर व्यस्वस्था में विश्वास रखते हैं। अगर ऐसी श्रध्दा एवं विश्वास अगर आचार्य द्वारा समाश्रित होकर हम भगवान के प्रति समर्पित करें (भगवान के चरणों का शरण स्वीकार किया हो), तो हम ऐसे तुच्छ भौतिक सुखों को आसानी से परित्याग कर दिया होगा  ।

३०) प्राप्यत्तिल प्रथमावदि भगवच्छेषत्वत्तळविले निर्कै ; चरमावदि भागवत शेषत्वत्तळविले वरुगै |

श्रीशठकोप सूरी – भगवद् शेषत्व मे स्थित

मधुरकवि आळ्वार – भागवत शेषत्व मे स्थित

प्राप्य ध्येय के प्रथम स्थर मे भगवच्छेषत्व ही उचित है (भगवद् दास) और चरम स्थर तो भागवत शेषत्व है  (भागवत दास ) |

अनुवादक टिप्पणी : उपरोक्त सूत्र के उत्तरवर्ति विषय के बारे मे अधिक जानकारी के लिये यह लिङ्क क्लिक करे — http://ponnadi.blogspot.in/p/anthimopaya-nishtai.html

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/07/divine-revelations-of-lokacharya-3.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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