लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ४

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

नम्पिळ्ळै – तिरुवेल्लिक्केणि

३१)  पिराट्टि अशोकवनैकैयिळे पिरिन्तिरुन्ताप् पोलेयिरुक्किरतु काणुम् स्वरूप ज्ञान् पिरन्तवारे उडम्बुडनिरुक्कुमिरुप्पु

चेतन (जीव) को स्वस्वरूप ज्ञान के माध्यम से अपने निज स्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है कि वह भगवान् और भागवतों का दास है और उसे परमपद मे नित्य सेवा प्राप्ति के ध्येय से सदैव तत्पर रहना चाहिये |  ऐसे चेतन कि स्थिति भगवन् श्रीमन्नारायण मतानुरूप श्री देवी (श्री महालक्ष्मी) (पिराट्टि) का अशोक वन मे शोकार्त स्थिति से तुल्य है |

अनुवादक टिप्पणी : इस अद्भुत विषय को नन्जीयर ने नम्पिळ्ळै को सिखाया था और जिसका उल्लेख स्वामी पेरियवाच्चान पिळ्ळै अपने ग्रन्थ “माणिक्क-मालै” (मणि-माला) मे करते है |

नम्पिळ्ळै स्वामी नन्जीयर स्वामी से पूछते है : संसार मे रहने वाले मुमुक्षु के लिये कौन सखा या सखी है ? वह अपना जीवन कैसे व्यतीत करता है ?

नन्जीयर कहते है : मुमुक्षु न तो वर्ण है न तो आश्रम है | अर्थात् वर्णाश्रम से परे है | मुमुक्षु वह है जिसमे अहोरात्र मोक्ष प्राप्ति की इच्छा है | ऐसे मुमुक्षु के सखा / सखी एवं जीवन व्यापन (लीलायें) विरजा नदी (पारलौलिक नित्य विभूति (श्रीवैकुण्ठ धाम ) और लौलिक विभूति (यह भौतिक सम्सार) को अलग करने वाली नदी) के उस पार है | जहाँ इच्छा है वहाँ सखा / सखी व लीला होना आवश्यक है | कहने का तात्पर्य यह हुआ कि अगर अशोक वन मे सीता माता का कोई सखा / सखी है / थी, तो अवश्य मुमुक्षु के लिये भी अवश्य सखा / सखी होंगे | ऐसे स्वरूप ज्ञान चेतन जीवों का संसार मे होना और सीता माता का लंका मे होना समतुल्य स्थिति है |

  • चेतन का शरीर अशोक वन की तरह है जहाँ सीता माता जैसे जीव को रावण ने रखा था |
  • चेतन का लौकिक वासना या इच्छायें ठीक उसी प्रकार है जैसे श्री सीता माता का मारीच (सुवर्ण हिरण) के प्रति था |
  • चेतन का भौतिक लोक के प्रति कैसा खौफनाक चित्र है ठीक उसी प्रकार सीता माता तो था रावण के प्रति |
  • चेतन के ऐसे पु्त्र, सम्बन्धी जो स्वरूप ज्ञान विहित होकर कष्ट पहुँचाते है वैसे ही रावण के पुत्र / सम्बन्धी सीता माता को कष्ट दे रहे थे |
  • चेतन का ममत्व, अहंकार इत्यादि एकाक्षि (एक नेत्र राक्षसी), एककर्णि (एक कान राक्षसी) जैसे है जो अहोरात्र सीता माता पर अपना नज़र रखे हुए है |
  • चेतन का श्रीवैष्णव सत्सङ्ग उस प्रकार है जिस प्रकार माता सीता का श्री विभीषण एवं उसकी बेटी त्रिजटा के साथ था |
  • चेतन का आचार्य दृश्य ऐसा है जैसे सीता माता का तिरुवडि (हनुमान जी) का दृश्य है |
  • आळ्वार के दिव्यप्रबन्ध और भगवद्विषय श्रीमद्रामायण, श्रीमहाभारत मे ऐसा है जैसे हनुमान जी का श्रीराम जी के दिव्य गुणों का कीर्तन एवं स्तुति है |
  • अहोरात्र तिरुमन्त्र का अर्थानुसन्धान करने वाला चेतन ऐसा है जैसा सीता माता अपने प्राण प्रिय श्रीराम चन्द्र कि अङ्गुलिका को देखकर प्राण प्यारे राघव सरकार सहित अपने विविध लीलाओं का स्मरण करती थी |
  • चेतन के नित्य क्रिया इस संसार मे अन्यों से अलग है ठीक उसी प्रकार जैसे सीता माता एवं अन्य राक्षस व रक्षसियों का था | उत्तरवर्ती केवल इन्द्रिय तृप्ति व सुख मे सम्लग्न थे और पूर्ववर्ती (श्री सीता माता) केवल अपने स्वामी प्रिय राघवेन्द्र से मिलने के लिये तरस रही थी और दु:खी थी | श्री सीता माता खून चूसने वाले कुत्तों के परिसर मे ऐसे अस्सहाय हिरण की तरह थी ठीक वैसे ही हम सभी चेतन अन्य देवतान्तरि, प्रयोजनान्तरि के बींच मे है |
  • ऐसे विपरीत परिस्थिथियों मे भी भगवती सीता माता ने स्वप्रयत्न नही किया जिससे उनके पारतन्त्रिय पर आंच आये | इसी तरह, एक मुमुक्षु को सदैव यह स्मरण करना चाहिये कि वह स्वतन्त्र नही है और केवल परतन्त्र है | उसे अपने बचाव मे ऐसा कोई स्वप्रयास नही करना चाहिये जिससे उसके स्वतन्त्रता का मूल मात्र अंश प्रकाशित हो | ऐसे चेतन तो केवल भगवान् और भगवद्कृपा पर पूर्ण निर्भर होना चाहिये |
  • ऐसे भगवद् बन्धु या मुमुक्षु केवल भगवान् को हि उपायोपेय मानते है | निरन्तर भगवद् मिलन की चाहना मे अश्रु धारा बहाते हुए भगवान् से प्रार्थना करते है – इस भौतिक जगत् से उनको छुटकारा दिला दो .. मोक्ष दे दो और तदुपरान्त नित्य विभूति (श्रीवैकुण्ठ) मे नित्य सेवावकाश मिले |

३२) शेषिक्किनियतान वऴियालेयिरे शेषभूतनुक्किनियतावतु

श्रीरङ्ग एवं अन्य दिव्य क्षेत्र भगवान् को प्रिय है अत:श्रीवैष्णवों को भी प्रिय है

श्रीशठकोप सूरी भगवान् को प्रिय है अत:भागवतों के लिये भी प्रिय है

जो शेषि (स्वामी) को प्रिय एवं सुखदायी है वह स्वत: शेषभूतों (दासों) को भी प्रिय एवं सुखदायी है |

३३) मिथुनमाय्क् कलवा निन्रै इरण्डु तलक्कुम् उळ्ळ रसम् शेषशेषिगळ् परिमाट्ट्रत्तिलुमुण्दिरे

जो परमान्द एवं रस की अनुभूति दिव्य दम्पति के प्रेमालाप मे है वैसी ही अनुभूति शेषि (भगवान्) और शेष (जीव) के बींच मे है |

३४) अवन्तुक्किनियताय् अव्वऴियाले तनक्किनियतागैयिरे शेष भूतनुक्कु वाचि

जीवात्मा का स्वभाव है कि वह भगवान् (शेषि) के प्रति जो अनुकूल है उसे ही स्वीकारे |

अनुवादक टिप्पणी : यहाँ “वाचि” शब्द विशिष्टिकरणार्थ (भेद के लिये) उपयोग किया गया है | क्योंकि भगवान् स्वतन्त्र है और जीव परतन्त्र होने से भगवान् (अपने स्वामी) के अभिमत के अनुसार ही अनुसरण व आचरण करे |

३५)   भगवद् विषयत्तिले ओरदिवारा निन्रावारे परगृहत्तिनिन्रुम् स्वगृहत्तिले पुगुन्ताप् पोलेयिरुक्कुम् 

भौतिक वासनाओं को छोडकर (त्यागकर) भगवद् विषय मे रुचि दिखाना ऐसा है जैसे पराया घर से स्वगृह मे प्रवेश करना है क्योंकि जीव का स्वाभाविक चाह (महत्तवाकांक्षा) भगवद् विषय है |

३६) प्राप्ति देशम् नित्यसूरिगळित्त वऴक्काय् इरुक्कुम्

श्रीपरमपदनाथ एवं नित्यसूरी[/caption]

प्राप्ति देश : श्रीवैकुण्ठ धाम अर्थात् जीव का प्राप्ति देश (श्रीवैकुण्ठ धाम) नित्य नित्यसूरीयों के अधीन मे रहता है जैसे श्री शठकोप सूरी अपने पासुर ” वानवर् नाडु ” (तिरुवाय्मोऴि – ३.९.९) मे कहते है (नित्यसूरीयों / मुक्तों का निवास स्थान)

अनुवादक टिप्पणी : इस तत्व ” नित्यसूरी ही असल मे परमपद के नियन्त्रक है ” को तात्त्विक प्रमाण निम्नलिखित है :

१) मधुरकवि आऴ्वार स्व रचित कण्णिनुन् शिरुत्ताम्बु प्रबन्ध के ग्यारहवें पासुर मे कहते है, जो व्यक्ति (जीव) उनके दिव्य प्रबन्ध के शब्दों मे निष्ठा रखता है और आचार्य निष्ठा का अनुसरण करता है, वह अवश्य परमपद धाम प्राप्त करता है | यहाँ पाठकों को यह प्रश्न या सन्देह आ सकता है कि क्यों मधुरकवि आळ्वार, अपने स्वाचार्य श्रीशठकोप सूरी के पादाश्रित होने पर भी, वह क्यों परमपद प्राप्ति की बात करते है ? पूर्वाचार्यों ने इस विषय को इस प्रकारेण समझाया है : श्रीशठकोप सूरी का जन्म स्थल – “आळ्वार तिरुनगरि” (इस देवस्थान को आदिनाथर्-आळ्वार देवस्थान कहते है) का पूर्ण नियन्त्रण दोनो (आदिनाथ भगवान् (पोलिन्डु निन्र पिरान् ) और स्वयं श्रीशठकोप सूरी कर रहे है | परन्तु श्रीवैकुण्ठ धाम का पूर्ण नियन्त्रण श्रीशठकोप सूरी ही कर रहे है |

२) श्रीयामुनाचार्य स्तोत्र-रत्न के ४२ वें श्लोक मे कहते है : भगवान् श्रीमन्नारायण ने नित्य एवं लीला विभूति (उभय विभूति) को श्रीविष्वक्सेन जी को सौंप दिया और स्वयं श्रीमन्नारायाणाभिमतानिरूपी नित्यानपायनी श्रीमहालक्ष्मी के साथ रास (लीलाओं) का रसास्वादन करते है |

३७) कर्मवश्यन् पिरविक्केल्लै काणानिन्रोम् ; अकर्मवश्यन् पिरविक्केल्लै काण्गिन्रिलोम्

भौतिक जगत् मे अनाधिकाल से बन्धा हुआ बद्ध जीव, जन्म-मृत्यु के जाल से तभी मुक्त होगा जब उसे मुक्ति मिलेगी और अन्तत: वह जन्म के बन्धन से छुटकारा पाता है | परन्तु कर्म से अबद्ध भगवान् अनेकानेक अवतार लेकर इस धरातल पर बारम्बार प्रगट होते है अर्थात् जन्म लेते है |

अनुवादक टिप्पणी :

१) वेद कहता है : ” अजायमान: बहुधा विजायते ” ! जन्म रहित (आजन्म) भगवान् स्वयं की अहैतुकी कृपा से धरातल पर प्रगट होते है |

२) श्रीशठकोप सूरी (वैदिक अनुयायी) स्वग्रन्थ तिरुविरुत्तम् के प्रथम पासुर मे कहते है : भगवान् अपनी इच्छा से (निर्हेतुक कृपा से), वह अनेकानेक राशियों मे जन्म लेते है | नम्पिळ्ळै स्वामी ईडु व्याख्या मे कहते है : क्योंकि भगवान् निर्हेतुक कृपा से प्रगट होते है, अत: उन पर कोई पाबन्दी नही है कि वह कौन से योनी मे जन्मे अर्थात् कौन सा शरीर स्वीकारेंगे | यही तत्त्व तिरुवाय्मोळि के ३.१०.१ पासुर – ” सन्मम् पल पल चेय्दु ” अनेकानेक जन्मो को स्वीकार करना | एतदर्थ एवं श्रुति वाक्य ” अजायमानः बहुधा विजायते ” का सीधा अनुवाद तिरुवाय्मोळि के २.९.५ ” पिरप्पिल् पल् पिरविप् पेरुमान् ” पासुर मे दर्शाते है |

३८) कर्मत्तुक्कु अवधियुण्डु, अनुग्रहत्तुक्कु अवधियिल्लै

श्रीरङ्गनाथ भगवान् का अभयहस्थ : भगवद् भक्तों कि रक्षा का दावा करते हुए कह रहे है भयभीत न हो ! डरो मत ! चिन्ता मत करो  ( मा सुच: – भगवद्गीता )

जीव के कर्म की सीमा है पर भगवान् की अहैतुकीकृपा की कोई सीमा नही है !

३९) फलाभिसन्धि रहितमाग दानधर्मत्तै अनुष्ठित्तिक्कु, एमपेरुमानै उद्देश्यमाक्काते, फलाभिसन्धि युक्तमाग अनुष्ठित्तु स्वर्गादि भोगङ्गळैप् पट्ट्रिनाल् निलै निल्लतु

धार्मिक एवं दान सम्बन्धित कार्य (के फलों को त्यागकर) को, केवल और केवल भगवदुद्देश्य अर्थात् कैङ्कर्य बुद्धि से ही करनीय है | अगर ऐसे कार्य अन्युद्देश्य जैसे स्वर्ग प्राप्ति इत्यादि के लिये किया गया हो तो वह केवल काल पर्यन्त, नश्वर और तुच्छ है |

४०) शेषभूतन् पट्ट्रवतु (पत्तवतु) शेषियिनुडैय तिरुवडिगळैयिरे

भगवान् श्रीरङ्गनाथ के दिव्य चरण

जीवात्मा (शेषभूत) केवल भगवान् (शेषि) का ही शरण ग्रहण करता है | अर्थात् सहज स्वभावेन भगवान् का शरणागत होना शेषभूत (जीवात्मा) का कर्तव्य है |

अनुवादक टिप्पणी : इस तत्त्व को समझाने के लिये स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी बहुत सुन्दर उदाहरण देते है | उदाहरणार्थ ऐसे :

१) मुमुक्षुप्पडि १४७ : द्वय प्रकरणं चरणौ (तिरुवडि / दिव्य चरण) शब्दम् – शेषिपक्कल् शेषभूतन् इऴियुम् तुरै ; प्रजै मुलयिले वाय् वैक्कुमा पोले : जैसे नवजात शिशु अपने माँँ के स्तनों के लिये तत्पर रहता है (क्योंकि यह उसके लिये पोषणाहार है) ठीक वैसे ही जीव के लिये भगवाच्छरणारविन्द ही पोषणाहार है और यह स्वाभाविक है |

२) श्रीवचनभूषण ४२७ : आचार्य वैभवम् – ईश्वरनैप् पट्रुगै (पत्तुगै) पिडित्तुक् कार्यम् कोळ्ळुमो पाति ; आचार्यनैप् पट्रुगै कालैप् पिडित्तुक् कार्यम् कोळ्ळुमो पाति !!! प्रत्यक्ष रूप से भगवान् के समीप जाना ऐसा है जैसे उनके हाथों के लिये बढना है (यह सफल या असफल हो सकता है) | पर अप्रत्यक्ष रूप से अर्थात् भगवान् को आचार्य के माध्यम से प्राप्त करना उनके दिव्य चरण की और बढना है जो हर अवस्था मे सफल होता है | यहाँ यह दर्शाया गया है कि आचार्य ही भगवान् के दिव्य चरण है |

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-4.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s