Monthly Archives: November 2016

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ६

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि

५१) मुन्बु मुकम् तोट्ट्राते (तोत्ताते) निन्रानागिलुम् आबत्तु वन्दवारे मुकम् काट्टि रक्षिक्कुमवनायिट्ट्रु (रक्षिक्कुमवनायित्तु) | अवनिप्पडि इरुप्पानोरुवनागैयाले स्वाराधन् |

हालांकि बहुत लम्बे समय तक भगवान् प्रकट नही होते व दर्शन नही देते पर जब भी भक्त आपत्तिजनक स्थिति मे हो तो भगवान् भक्त रक्षणार्थ प्रकट होते हैं और दर्शन देते हैं | केवल इस गुणाधार पर पूर्वाचार्य भगवान् को सौलभ्य और पूजनीय भजनीय कहते हैं|

अनुवाद टिप्पणि : भगवान् अन्तरयामीब्रम्ह के रूप मे रहकर जीवात्मा को सदा मार्गदर्शन देते हैं और खयाल रखते हैं| जब कोई आपत्तिजनक स्थिति उद्भव होती है तो भक्त रक्षणार्थ अन्तरयामीब्रम्ह रूपी भगवान् तुरन्त प्रकट होते हैं| यहाँ दृष्टान्त गजेन्द्र का दिया गया है | गजेन्द्र ने मनोबल व शारीरिक बल से मगरमच्छ को जीतने का स्वप्रयास हज़ार वर्षों तक किया | पर जैसे ही उस आपत्तिजनक स्थिति मे गजेन्द्र ने स्वप्रयास को छोडकर भगवान् को आर्तभाव से पुकारा तो भगवान्  तुरन्त स्वधाम छोडकर उडते हुए आ पहुचें और मगरमच्छ को मारकर अपने भक्त गजेन्द्र की रक्षा बहुत प्रेम से किये |

५२) तान् रक्षिक्कुमिडत्तिल् इत्तिलैयिल् आनुकूल्यत्तुक्कु सूचकमान अप्रतिशेधमे वेण्डुवतु

जीवात्मा के प्रति भगवान् का किया हुआ रक्षण प्रयास मे भगवान् केवल यह चाहते हैं कि उनके द्वारा क्षेम, प्रेमपूर्वक किया गया यह कृत्य को जीव अस्वीकार (नकारे) न करे अर्थात् पूर्ण विश्वास से स्वीकारे | यही स्वीकारता भगवान् के प्रति अनुकूल कृत्य है और भगवान् स्वयं इसको अनुकूल मानते हैं|

अनुवादक टिप्पणि : ” भगवद्कृपा की स्वीकृति ” के विषय मे आण्डाळ् अम्मा जी तिरुप्पावै २८ वे पासुर मे इस प्रकार कहती है : जैसे भगवान् कृष्ण के विशेष प्रेम व अनुग्रह को जिस प्रकार वृन्दावन के गायों ने स्वीकारा था (गायों की रक्षा करना) ठीक उसी प्रकार इस दासी की रक्षा करने की कृपा करे जिसने आपके अनुग्रह को नकारा नही अर्थात् स्वीकृत ही किया है | पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी जी भी मुमुक्षु-पडि ग्रन्थ के २७३ वे सूत्र कहते हैं : ” पेट्ट्रुक्कु वेण्डुवतु विलक्कामैयुम् इरप्पुमिरे  ” अर्थात् जीवात्मा को परम ध्येय भगवद्-सेवा (कैङ्कर्य) प्राप्ति के लिये दो ही कार्य करणीय है : १) पहला भगवदहैतुकी कृपा को सदैव स्वीकारे (कभी भी तिरस्कार न करे) | २) दूसरा परम ध्येय – भगवद्-कैङ्कर्य के प्रति अटूट अप्रतिबन्धित चाहना या कामना | (जब तक पुरुष की चाहना उसके प्रति नही हो तो उसको पुरुषार्थ नही कह सकते हैं) |

५३) देवतान्तर स्पर्शम् उडैयारुडैय स्पर्शत्तिर्कु श्रीवैष्णवर्गळुडैय पादरेणुवैक् कोण्डु परिहारिक्कैप्पारुन्गोळ्

देवतान्तरि व्यक्ति (या देवतान्तर से सम्बन्ध रखने वाले) के स्पर्श के मात्र से उद्भवित देवतान्तरि वासना के परिहार हेतु प्रपन्न को तुरन्त श्रीवैष्णवों के चरणों की पाद धूलि का आश्रय लेना चाहिये |

अनुवादक टिप्पणि : देवतान्तर माने श्रीमन्नारायण को छोडकर अन्य सभी देवी-देवता | अन्य देवी-देवता जीवात्मों की भान्ति जीव ही है और स्वकर्मणा संसार के चक्र मे बन्धे हुए हैं| वे सभी अहंकार युक्त व रजसतमसोद्भव गुणों से प्रभावित हैं | अतैव हमारे पूर्वाचार्यों ने ऐसे देवी-देवता (देवतान्तर) संबन्ध को सदैव को त्यागा और उन सभी को भी त्यागा जो ऐसे देवतांतरी संबन्ध रखते हैं | इससे हम सभी को समझना चाहिये कि यह विषय कितना तीव्र और गम्भीर है |

इस दृष्टान्त मे, पूर्वाचार्य श्री पराशर भट्टर स्वामी जी का उल्लेख दिया गया है| एक दिन, गलती से किसी देवतान्तरि व्यक्ति के धोती का छोटा सा हिस्सा श्री पराशर भट्टर स्वामी पे लगा | हालांकि बहुत बडे विद्वान होते हुए भी, वह डगमगाहट गये | तुरन्त अपनी माता के पास पहुंचकर पूछे : हे माते ! क्या करूँ अब ? उनकी माताश्री ने कहा कि कोई अब्राह्मण श्रीवैष्णव को ढूँढो और उनका श्रीपाद तीर्थ ग्रहण करो ! ऐसे महद्व्यक्तित्व को ढूंढकर उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करते हैं| हालांकि पहले तो यह श्रीवैष्णव मना करते हैं पर बाद मे मान जाते हैं|

४४) भगवद् विषयत्तिल् पण्णिन अञ्जलिमात्रमुम् शरण्यम् नीमैयाले मिगै

भगवान् ही शरण्य है जो उनकी शरण मे आकर शरणगत होता है | जब कोई भी व्यक्ति भगवान् के प्रति प्रणाम या करबद्ध होकर प्रार्थना करता है तो इस कृत्य को भगवान् विशेष व महद् कार्य समझते हैं और ऐसे व्यक्ति की सम्पूर्ण रक्षा करते हैं |

अनुवादक टिप्पणि :  भगवान् के ज़खम से उद्भव रक्त वेग को कम करने के लिये,पाण्डव पत्नि, भगवच्छरणागत द्रौपदी ने अपने साड़ी का तुकडा निकालकर ज़खम के चारों ओर बाँधती है | इस कृत्य को देखकर भगवान् उसे बहुत बडा उपहार (अनुग्रह) मानते हैं | भगवान् ने इस भावना से उनके सम्पूर्ण जीवन पर्यन्त पाण्डवों की सहायता व रक्षा की है | स्वधाम जाने से पूर्व भगवान् कहते हैं कि द्रौपदी द्वारा किया गया उपहार के बदले मे भगवान् अधिक नही पर पाये और उनको यह अफ़सोस सदैव रहेगा | देखिये भगवान् के विचार की विशालता और उदारशील भावना को | कलिवैरिदास (नम्पिळ्ळै) स्वामीजी श्री यामुनाचार्य के स्तोत्ररत्न के २८ वे श्लोक का अनुसरण करते हैं और यही उपदेश किया है| स्तोत्र रत्न का श्लोक निम्नलिखित है :

त्वदङ्घ्रिम् उद्दिष्य कथापि केनचित्
यथा तथा वापि सकृत् कृतोञ्जलि: !
तवैव मुष्नाति अशुभानि अशेषतः
शुभानि पुष्णाति न जातु हीयते !! 

यहाँ श्रीयामुनाचार्य कहते हैं भगवान् के चरणों के प्रति किया गया अनुचित विधिवत अञ्जलि भी उचित ही है क्योंकि उनके चरण उस व्यक्ति के समस्त पापों का नाश कर, समस्त शुभ प्रदान करते हैं|

५५) इङ्गिरुक्कुम् नाळैक्कु पुरुषकारमाग मुमुक्षुक्कळुण्डु | अङ्गुत्तैक्कु नित्यसूरिगळुण्डु

यहाँ कलिवैरिदास (नम्पिळ्ळै) स्वामीजी कह रहे हैं कि इस धरातल (यहाँ) पर दीक्षोपरान्त समय से मुमुक्षु के लिये मुमुक्षु सत्सङ्ग है | पर वहाँ (भगवद्धाम मे) हमे नित्यसूरि और मुमुक्षुओं का सङ्ग मिलेगा |

अनुवादक टिप्पणि : इस भौतिक जगत् मे मुमुक्षु जन, अन्य श्रीवैष्णव जन सहित भगवद्-भागवत-आचार्य सेवा मे सम्लग्न हो सकते हैं या होना चाहिये | देह त्याग पर्यन्त परमपद मे नित्य पार्षद एवं अन्य मुक्तों के सङ्ग मे भगवद्-सेवा मे सम्लग्न होते हैं| आचार्य पुरुषकारेण हम सभी भगवान् व भागवतों की सेवा कर मार्गदर्शन प्राप्त करते है | ऐसे आचार्य ही सत्यज्ञान प्रदान करते हैं और इसका अनुशीलन करवाते हैं| ऐसे मार्गदर्शन से ही इस भौतिक जगत् मे समय का सदुपयोग कर सकते हैं |

५६) ओरुवन् वैष्णवनागैयावतु इतु – सर्वेश्वरन् रक्षकन् एन्रोरुवन् पक्कलिले ओरु वार्त्तै केट्टुविट्टु

एक व्यक्ति तभी वैष्णव बन सकता है जब वह दूसरे वैष्णव (के उपदेशों) का श्रवण करता है :- कि भगवान् श्रीमन्नारायण ही एक मात्र परम देवता है और अन्य देवता जैसे इन्द्र, ब्रह्मा, शिव इत्यादि उनके अधीन मे है और श्रीमन्नारायण ही एक मात्र शरण्य है |

अनुवादक टिप्पणी : इस सूत्र को समझने के लिये पूर्वाचार्यों ने क्षत्रबन्धु का उदाहरण दिया है | क्षत्रबन्धु क्षत्रिय कुल मे जन्मा था पर कुकर्मिक वासानाओं से बन्धित था | एक समय मे, क्षत्रबन्धु ने एक महात्मा साधु की सहायता कर उनसे भगवान् का ” केशव ” नाम उपदेश मे प्राप्त किया | सन्त महात्मा ने इस दिव्य नाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा : कल्याण गुण सम्पन्न, श्रिय: पति, अखिलहेय प्रत्यनीक, ब्रह्मा और शिव के स्वामी, ही जगत् स्वामी और परम देवता है जिन्हे श्रीमन्नारायण कहते हैं | यह दृष्टान्त तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार अपने तिरुमालै दिव्य प्रबन्ध के चौथे (४) पासुर मे वर्णन करते है |

४७)  कऴिवतोर् कातलुट्ट्रार्क्कुम् उण्डो कण्गऴ् तुन्जुतल् एन्रिरेयिरुप्पतु स्वरूपमितु एन्रारिन्तल् स्वरूपनुरूपमान वृत्तियुम् इतुक्कुविरोधियानवट्ट्रैत् तळ्ळुतलुम् इल्लैयागिल् ज्ञानम् पिरन्ततिल्लैयामित्यनैयिरे इत्तिल्लैयागिल् आऴ्वारगळ् पोन वऴियिल् अन्वयैत्तिलनामित्तनैयिरे

श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं : जब किसी व्यक्ति को भगवान् और भगवद् विषय के प्रति रति और आसक्ति बढती है, ऐसा व्यक्ति एक क्षण के लिये भी कभी सो नही पायेगा (क्योंकि वह कुछ और सोच नही सकता) | इस प्रकार से ऐसे व्यक्ति जब तब उन्हे भगवान् प्राप्त न जाये तब तक चैन से नही रहते | वास्तविकता यही है | यह समझने के बावजूद भी आत्मा के अनुकूल कृत्य को अपनाकर, प्रतिकूल क्रियाओं को त्यागेगा नही तो प्राप्त ज्ञान की प्रगति नही होगी | अतः आळ्वार दर्शित मार्ग (वह मार्ग जिसमे लौकिक विषयों मे अनासक्ति और पूर्णासक्ति भगवान् के प्रति दर्शाया गया है) के लिये वह अयोग्य होगा |

५८)  नारायण शब्दत्तिर्कु उपायत्व उपयोगियान वात्सल्यादिगळुम् , उपेयत्व उपयोगियान शेषित्वादि गुणङ्गळुम् अर्थम्

भगवान् उपायोपेय हैं अर्थात् भगवान् ही उपाय और भगवान् ही उपेय हैं  (सियाराम ही उपाय – सियाराम ही उपेय) | भगवान् ही साधन-साध्य वस्तु हैं  | नारायण शब्द उपाय-उपेय (साधन-साध्य) (दोनो) को इङ्गित करता है | इस शब्द मे अनेक कल्याण गुण सन्निहित हैं | ऐसे कुछ गुण इस शब्द रूपी ब्रह्म के उपाय और उपेय को प्रकाशित करते हैं| जैसे वात्सल्य, स्वामित्व, सौशील्य इत्यादि उपायत्व को दर्शाते हैं और शेषित्व (चितचित वस्तुवों का एक मात्र स्वामी होना) इत्यादि उपेयत्व को दर्शाते हैं|

अनुवादक टिप्पणी : स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य मुमुक्षुपडि के १३६ – १३८ सूत्र मे, भगवान् के अनेक कल्याण गुणों और इन गुणों की भूमिका का उल्लेख करते हैं जिससे भगवान् का उपायत्व सुगम हुआ है | अन्तत: यह कहते हैं ऐसे कल्याण गुणों का साक्षात् स्वरूप अर्चावतार भगवान् ही हैं|

५९) सृष्टियादिगळिल् सत्यसङ्कल्पनायिरुक्कुम्, आश्रित विरोधिगळळविले असत्यसङ्कल्पनायिरुक्कुम्

सृष्टि के प्रारंभ मे भगवान् अपना सत्यसङ्कल्प (जो प्रतिज्ञा ली उसकी परिपूर्णता) प्रदर्शित करते हैं| पर अपने भक्तों के विरोधियों के विषय मे हट के (उनको कठोर दण्ड देते हैं) अलग ढंग से व्यवहार करते हैं| कहने का तात्पर्य यह हुआ कि अगर कोई भक्तों का विरोध हो तो भगवान उनको दण्ड देते हैं हालांकि वे उनको चाहे तो सुधार ही सकते हैं |

६०) आश्रित विरोधिगळैत् तनुक्कु विरोधिगळागक् कोण्डु वळक्कु पेशुमवन्

भगवान् अपने भक्तो के विरोधियों को अपना विरोधि समझकर उनसे तर्क वितर्क करते हैं|

अनुवादक टिप्पणी : जब पाण्डवों के प्रति दुर्योधन पूर्णतया प्रतिकूल हो गया और पाण्डवों को बाधा पहुचाने लगा तो भगवान् ने पाण्डव पक्ष मे दूत के रूप धारण कर दुर्योधन से संवाद किया |

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-6.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १७

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १

आगे बढ़ने से पहले, श्रीवैष्णव तिरुवाराधन के विषय में भली प्रकार से जानने के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-thiruvaaraadhanam.html पर देखें क्यूंकि यह लेख इसी तत्व से सम्बंधित है।

४८) वन्दन विरोधी अभिवादन (साष्टांग दण्डवत) करने में बाधाएं

वन्दन का अर्थ है साष्टांग दण्डवत करना – पूर्ण दण्डवत आठ अंग (२ पैर, २ घूटने, पेट, २ कन्धे, २ हाथ और ललाट) इस सन्दर्भ में धरती को छुना। शास्त्र में आदेश हुआ है कि “वैष्णवो वैष्णवं दृष्टवा दण्डवत प्रणमेत पुवी” – जब एक श्रीवैष्णव दूसरे श्रीवैष्णव को देखता है, तो उसे उसी क्षण एक लकड़ी के जैसे धरती पर गिरकर साष्टांग दण्डवत करना चाहिये। पूर्ण अभिवादन अर्थात तमील में दण्डम समरप्पित्तल, दण्डनिडुदल कहते है – यहाँ दण्डम लकड़ी को दर्शाता है और अभिवादन एक लकड़ी धरती पर गिरने के जैसे होनी चाहिये (एक क्षण भी कुछ दूसरा सोचे बिना)। इस भाग में भगवद, भागवत और आचार्य के सन्मुख किये जाने वाले कई अभिवादन को स्पष्टता से समझाया गया है। यहाँ एक तत्व को अच्छी तरह समझना चाहिये। हमारे पूर्वाचार्य केवल एक बार अभिवादन करते थे – सिर्फ सकृत (एक) प्रणाम ही। एक वैष्णव अंश बारबार अभिवादन करते है – यहाँ इस विषय कि पर चर्चा नहीं करेंगे। परन्तु दण्डदनिदुतल का अर्थ एक लकड़ी के समान गिर जाना। एक लकड़ी एक बार गिर जाने के पश्चात फिर नहीं उठती – इस तरह हम इसे याद रख सकते है।

अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: अभिवादन दूसरे के प्रति सम्मान दिखाना है। हम भगवान, अम्माजी, नित्यसूरी (अनन्त, गरुड, विष्वक्सेन आदि) आल्वार, आचार्य और भागवतों के प्रति अभिवादन करते है। हमें सांसारिक जीवों के प्रति अभिवादन नहीं करना चाहिये जो हमारे साथ लौकिक सम्बन्ध रखते है, वह जो देवतान्तर सम्बन्ध रखते है, सामान्य आचार्य (जो कला,विज्ञान आदि पढ़ाते है) जो भगवान के प्रति थोड़ा भी झुकाव नहीं रखते हो आदि के प्रति भी अभिवादन नहीं करना चाहिये। इस विषय मे यहाँ चर्चा हो रही है। श्रीवैष्णवों में एक और मुख्य विषय है कि आयु अभिवादन के लिये खण्ड नहीं है। हमारे पूर्वाचार्य के जीवनी द्वारा हम देख सकते है कि किस प्रकार आयु में बड़े श्रीवैष्णव छोटे श्रीवैष्णवों का अभिवादन किया करते है। श्रीपरकाल स्वामीजी तिरुमौली में कहते है “कणपुरम कैतोलुम पिल्लैयैप पिल्लै एनरेण्णप पेरुवरे” – जो भगवान तिरुक्कण्णपुरम को पूजता है और वो चाहे एक छोटा बच्चा हो तो भी हम उन्हें एक बच्चे जैसे नहीं सोच सकते है – उसे श्रीवैष्णव ही समझना चाहिये। वो तिरुनेडुन्दाण्डगम के 14वें पाशुर में कहते है “वलरत्तदनाल पयन पेट्रेन वरुग ! एन्रु मडक्किलियैक्कै कूप्पि वणग्ङिनाले” – यद्यपि परकाल नायकी ने एक तोते को उठाया था (श्रीपरकाल स्वामीजी स्त्री भावना में) परंतु जब उन्होने तोते को बड़ी सुन्दरता से भगवान का नाम स्मरण करते हुए सुना तो वह बहुत आनन्दित हो गयी और अपने तोते को अपने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। श्रीकुरेश स्वामीजी कि पत्नी आण्डाल अम्माजी अपने पुत्र श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी, जो बहुत बड़े विद्वान थे और श्रीरंगम में सत सम्प्रदाय के मार्गदर्शक थे, उनका नित्य श्रीपादतीर्थ लेती थी। इसलिये युवा हो या वृद्ध श्रीवैष्णवों को अभिवादन करना बहुत आवश्यक है।

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आदर्शस्वरूप उदाहरण – श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी को साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हुए

  • साष्टांग दण्डवत करने से पूर्व धरती को देखना बाधा है। चाहे जमीन गीली, कीचड़ आदि हो सभी को अपने कपड़े, शरीर कि ओर न देखते हुए अभिवादन करना चाहिये।
  • पूर्णत: अभिवादन न करना बाधा है। केवल झुक कर और जमीन को हाथों से छुना नहीं चाहिये। यह सुनिश्चित करना चाहिये कि सभी आठ अंग धरती को छु रहे है। एक लकड़ी के समान गिरना इसमें समझाया गया है।
  • पूर्ण ध्यान के बिना अभिवादन करना बाधा है। हमें साष्टांग करते समय पूर्णत: भगवद/ भागवत/ आचार्य कि ओर अपना ध्यान केन्द्रीत करना चाहिये।
  • द्वयमन्त्र को स्मरण और अनुसन्धान किये बिना साष्टांग करना बाधा है। भगवान को साष्टांग करते समय द्वयमन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिये। हमारे पूर्वज सामान्यत: आलवन्दार स्तोत्र के २२वा श्लोक “न धर्म निष्ठो …” का अनुसन्धान करते थे – “मेरे पास कोई कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि नहीं है; मेरे हाथों में अर्पण करने के लिये कुछ नहीं है और मुझे जाने के लिये कोई और स्थान भी नहीं है; मैं आपके चरण कमलों में अपने आपको समर्पित करता हूँ”। इस सन्दर्भ में हमें एक मुख्य विषय को जानना चाहिये। साष्टांग के पश्चात अभिवादन नहीं करना है (जो गोत्र, सूत्र, नाम आदि को बताता है) क्योंकि अभिवादन वैधिक कर्मानुष्ठान तक ही सीमित रहता है। अन्य श्रीवैष्णवों से बात करते समय हमें केवल “अडियेन् रामानुजदास” ऐसा कहना चाहिये – जैसे “अडियेन् श्रीवैष्णवदास” प्रतिवादी भयंकर अण्णा स्वामीजी के शिष्यगण कहते है, “अडियेन् मधुरकविदास” – श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी के शिष्य कहते है आदि। यह श्रीवैष्णवों को स्पष्टता से समझना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: अभिवादन (किसी को गोत्र, सूत्र, वेद आदि द्वारा पहचान) शरीर से सम्बन्ध रखता है। जब हम आत्मा पर केन्द्रीत कर रहे है और जब हम आत्मबन्धु (श्रीवैष्णव – वो जो हमसे भगवान के दास होने से सम्बन्ध रखते है) से मिलते है, हमें स्वयं की आत्मा द्वारा पहचान करानी चाहिये। आचार्य हृदयम में अळगिय मणवाल पेरुमाल नायनार ३६वें चूर्णिका में बहुत सुन्दरता से समझाते है “विप्रर्क्कु गोत्र चरण सूत्र कूटस्त्तर पराशर पाराशर्य बोधायनाधिगल; प्रपन्न जन कूटस्त्तर परांगुश परकाल यतिवराधिगल” – ब्राह्मणों के लिये (जो केवल शारीरिक वेदिका के बारें में सोचते है), गोत्र (वंश), चरणा (वेद का एक भाग), सूत्र (वेद के भाग को कर्मानुष्ठान पर केंद्र करता है) ऋषी है जैसे पराशर, व्यास, बोध्याना क्रमश: में। प्रपन्नों के लिये (जिन्होंने यह जान लिया कि वे भगवद्दास है उन्हें समर्पण कर दिया है) उनकी पहचान आल्वारों से सम्बन्ध से है जैसे श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीपरकाल स्वामीजी आदि और आचार्य जैसे श्रीरामानुज स्वामीजी आदि। यहाँ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी इस व्याख्यान में एक विशेष बात पर ज़ोर देते है – प्रपन्न अपने आपको आल्वार और आचार्य के सम्बन्ध से पहचानते है, क्योंकि आल्वार और आचार्य अपने उपदेश और अनुष्ठान से उन तत्वों को स्थापित किये जिसे हम प्रपन्नों को पालन करना है।
  • केवल शास्त्र में लिखा है इसलिये अभिवादन करना और प्रेम और भक्ति से न करना बाधा है।
  • जैसे भगवान को साष्टांग करते है, वैसे भागवतों को करने में हिचकिचाना। अनुवादक टिप्पणी: भगवान को श्रेष्ठ मानना, भगवान को कोई भी प्रेम से आसानी से अभिवादन कर सकता है। परन्तु भागवतों को भी वहीं प्रेम और सन्मान मिलना चाहिये। भगवान स्वयं जब अपने भक्तों से जो आठ गुणों कि आशा करते है वो समझाते हुए यह दर्शाते है कि उनके भक्तों के साथ बड़े सन्मान और प्रेम के साथ व्यवहार करना चाहिये। भक्त कहलाने को योग्य होने के लिए पहिले हमें भगवान के भक्तों से सम्मान और सावधानी से व्यवहार करना चाहिये।
  • आचार्य के प्रति अभिवादन करने से पूर्व हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि हमारा सिर आचार्य के चरण कमलों कि तरफ होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हालाकि ऐसा कहा गया है फिर भी आचार्य को स्पर्श करने से पूर्व हमें ध्यान रखना चाहिये – विशेषकर सन्यासी जो कड़े नियमों का पालन करते है और किसी को भी शारीरिक स्पर्श नहीं करते है। इसलिये हमें सहीं शिष्टाचार का पालन करना चाहिये और हमें ऐसी स्थिति में आचार्य को शारीरिक स्पर्श करने से बचना चाहिये।
  • हमें कभी भी एक बार में अभिवादन से संतुष्ट नहीं होना चाहिये। यह असकृत प्रणाम को नहीं दर्शाता है – हमारे आचार्य द्वारा बाद में प्रणाम करने के लिए कहे जाने पर या किसी विशेष कारण की वजह से या एक बार भगवान /आचार्य की सन्निधि से जाकर वापिस आने पर। ऐसे समय में हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि “मैंने पहिले अभिवादन किया है और यह पूरे दिन के लिये काफी है”।
  • हमें तब तक साष्टांग कर उठना नहीं चाहिये जब तक आचार्य न कहे “पर्याप्त है! कृपया अब उठिये”। हम यहाँ एक घटना को स्मरण कर सकते है: श्रीरामानुज स्वामीजी जब श्रीरंगम पधारे तब वे मन्दिर के शासन प्रबन्ध को सुधार रहे थे। उस समय कुछ लोगों को यह अच्छा नहीं लगा और वे श्रीरामानुज स्वामीजी के भिक्षा में जहर मिलाने कि सोचे (सन्यासी होने के कारण वें भिक्षा ग्रहण करते इसलिये वे उस खाने में जहर मिलाने का सोचे)। श्रीरामानुज स्वामीजी को इस बात का पता चल गया और वे एक दो दिन के लिये उपवास कर लिये। यह सुनकर श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी तुरन्त श्रीरंगम पधारे। श्रीरामानुज स्वामीजी अपने आचार्य के आने का संदेश सुनकर उनके स्वागत हेतु स्वयं कड़ी धूप में कावेरी नदी के किनारे गये। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी को देखते ही उन्होंने लम्बी साष्टांग दण्डवत किया। परंतु आचार्य आज्ञा न होने के कारण वह उस तप्त भूमि से नहीं उठे। यह देख किडाम्बी आच्चान (श्रीरामानुज स्वामीजी के एक प्रिय शिष्य) श्रीरामानुज स्वामीजी को उठाने को जाते है और श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी से कहते है कि “शिष्य और आचार्य के मध्य यह कैसा व्यवहार है? आप श्रीरामानुज स्वामीजी जैसे को क्यों इस कडक धूप में तड़पने को रखे हो? क्या कभी कोई एक नाजुक फूल को कडक धूप में जलने के लिये छोड़ता है?”। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी, किदाम्बी आच्चान का श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति प्रेम देख प्रसन्न हो गये और कहते है “मैं ऐसे ही व्यक्ति कि तलाश कर रहा हूँ जिसे श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति इतना लगाव हो। अब से आप इन्हीं से भिक्षा लेना और कहीं जाने कि जरूरत नहीं है”। इससे हम यह देख सकते है कि साष्टांग करने हेतु स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी सही शिष्टाचार बता रहे है।
  • केवल साष्टांग करना और आचार्य के चरण कमलों को अपने माथे से नहीं छुना। यह पहिले चर्चा किये गए पहलू जैसा ही है।
  • जब हम भगवान कि आराधना के लिए जाते है, और उस समय हम आचार्य को वहां उपस्थित देखे, तो सबसे पहिले उन्हीं को साष्टांग करना चाहिये और तत्पश्चात भगवान को। अगर आचार्य स्वयं न हो तो मानसिक रूप से उन्हें अभिवादन कर फिर भगवान को साष्टांग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हम भगवान के पास अपने आचार्य के माध्यम से ही जा सकते है। इसलिये अगर वे मौजुद हो तो पहिले उन्हें साष्टांग कर फिर भगवान को के पास जाना चाहिये। यह हम तिरुवाराधन में भी देखे है। हम पहिले आचार्य के पास जा कर उनकी पूजा कर, उनकी आज्ञा लेकर फिर उनके निमित्त तिरुवाराधन करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने “जीयर पडी तिरुवाराधन क्रमं” में यह समझाते है कि हम तिरुवाराधन श्रीरामानुज स्वामीजी, आल्वार, नित्यसूरी और अन्त में भगवान का इस क्रम से करते है।
  • भगवान कि सन्निधी में भागवतों को साष्टांग करने में हिचकिचाना बाधा है। यद्यपि यह आजकल अभ्यास में नहीं है। साधारणत: आजकल मन्दिर के अन्दर भगवान, अम्माजी, आल्वार और आचार्य को छोड़ और किसी को भी साष्टांग नहीं करते है।
  • पहिले दूसरे श्रीवैष्णवों का साष्टांग करने का इंतजार करना और पश्चात हमारा साष्टांग करना बाधा है। श्रीराम की इस तरह स्तुति हुई है “मृदु पुर्वंच भाषते”, पूर्व भाषी – वह जो पहिले किसी से भी मिलने पर नम्र शब्दों से विचार करता है। उसी तरह दूसरे श्रीवैष्णवों के साष्टांग करने से पूर्व हमें स्वयं उनको साष्टांग करना चाहिये।
  • जब कोई श्रीवैष्णव साष्टांग करता है, तब यह सोचना कि “वह मेरी पूजा कर रहा है” और उसका उलट सोचना भी बाधा है। इससे सम्बंधित एक घटना अळगिय मणवाल पेरुमाल नायानार तिरुपावै के पहिले पाशुर पर व्याख्यान में बताते है। एक बार श्रीरामानुज स्वामीजी अपने शिष्यों के साथ घुम रहे थे। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी, जो श्रीरामानुज स्वामीजी के आचार्य है, उनके सामने आते है और वे उन्हें साष्टांग दण्डवत करते है। यह देख सभी चकित हो जाते है। यद्यपि श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीमहापूर्ण स्वामीजी कि हृदय कि बात की जानकारी थी फिर भी सभी के भ्रम को दूर करने हेतु वे श्रीमहापूर्ण स्वामीजी से पूछँते है कि उन्होंने अपने शिष्य को ही साष्टांग क्यों किया? श्रीमहापूर्ण स्वामीजी कहते है कि उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी में श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी (श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के आचार्य) को देखकर साष्टांग किया। अत: श्रीरामानुज स्वामीजी यह स्पष्ट करते है कि अपने आचार्य के हृदय को स्पष्टता से समझ कर उन पर आश्रित होना चाहिये और यह सोचना चाहिए कि अभिवादन स्वयं के लिये नहीं था। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह कभी नहीं सोचना चाहिये कि अभिवादन हमें कर रहे है यह तो हृदय में विराजमान अंतर्यामी भगवान के लिये और भागवत सम्बन्ध जो हमारा अपने आचार्य और आल्वारों के साथ है उनके लिए है। अभिवादन स्वीकार करने का और दूसरों को अभिवादन करने का यही सही तरीका है।
  • अगर कोई श्रीवैष्णव उनका हमारे प्रति प्रेम के कारण साष्टांग करना चाहे, तो किसी का अनादर नहीं करना चाहिए और अलग ठहर जाए। अनुवादक टिप्पणी: पहिले बताये गये उदाहरण के समान। सभी को श्रीवैष्णवों का आदर कैसे करे इसे और उनके वास्तविक अभीष्ट को समझना चाहिये। अगर उनका अभीष्ट हमे साष्टांग करने में हो जो हमे उनसे भी उच्च स्थान पर पहुंचा रहा है, तो हमें भी बड़ी नम्रतापूर्वक दयालुता से उस स्थान को अपनाना चाहिये।
  • पूर्ण तिरुवाराधन करने के पश्चात हमें पूर्ण साष्टांग दण्डवत करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तिरुवाराधन के अन्त में “उपचारपदेशेन…” श्लोक का अनुसन्धान करना चाहिये और पूर्ण साष्टांग दण्डवत करना चाहिये और तिरुवाराधन के समय अपनी गलतियों के लिये क्षमा मांगना चाहिये। यह पहलू इधर दर्शाया गया है।
  • इयल गोष्ठी सेवाकालम (पुरप्पाडु/सवारी के समय मिलकर पाशुरों को गाना) को सम्पूर्ण करने के पश्चात सभी श्रीवैष्णव एक दूसरे का अभिवादन करते है। अभिवादन किये बिना वहाँ से जाना गलत है। हालाकि यहाँ “ईयल साट्रु” का वर्णन किया गया है जो स्तुति करने के पद के संग्रह है, इसे अन्य इयल गोष्ठी के संदर्भ में भी लिया जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: यह अभी भी सभी स्थानों पर अभ्यास में है। पुरप्पाडु के समाप्ति के पश्चात एकत्रीत श्रीवैष्णव अभिवादन करते है और तिरुवंधिक काप्पु (बुरी नजर से बचने हेतु आरती) किया जाता है।
  • श्रीवैष्णव गोष्ठी में प्रवेश करते समय और वहाँ से बाहर निकलते समय सभी को अभिवादन करना चाहिये और आज्ञा लेना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • अगर कोई आचार्य के समीप रहता हो तो उसे प्रतिदिन आचार्य के सन्मुख होना चाहिये और अभिवादन कर और उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना चाहिये। परन्तु अगर वो उनके निकट नहीं रहता है तो आचार्य के तिरुमाली के दिशा में प्रतिदिन साष्टांग करना चाहिये।
  • पुरोदासा का अर्थ यज्ञ (भगवान) का शेष – इसे कुत्ते आदि को नहीं देना चाहिये। उसी तरह एक बार भगवान के शरण होने के पश्चात सांसारिक संबंधियों को (जो श्रीवैष्णव नहीं है) अभिवादन नहीं करना चाहिये।
  • केवल किसी के जन्म के आधार पर हमें किसी को साष्टांग नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार् सुन्दरता और स्पष्टता से श्रीवैष्णव और अन्य वर्णों में भेद बताते है। ब्राम्हण्यम अर्थात जो भगवान की तरफ लेके जाए परन्तु कोई ब्राम्हण अगर इसे न समझे और वाद ,वेदान्त में निपुण होने का दावा करे तो ऐसा कीमती ज्ञान व्यर्थ है।
  • अगर कोई श्रीवैष्णव पधारते है, तो उन्हें एक उच्च स्थान देना चाहिये और तत्पश्चात उन्हें साष्टांग करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब अतिथी पधारते है तो उन्हें हाथ, पैर धोने के लिये और मुँह के कुल्ली के लिये जल देना चाहिये। अगर वह एक कठीन यात्रा से आये है तो उन्हें आराम महसूस हो ऐसा करवाना चाहिये।
  • देवतान्तर के मन्दिर में साष्टांग करना और पाखण्डी के सामने भी अभिवादन करना बाधा है। इस तत्व की पहिले भी चर्चा की जा चुकी है।
  • तिरुपति में प्रवेश करते समय (सामान्यत: तिरुपति अर्थात दिव्यदेश, परंतु इस शब्द का अर्थ मन्दिर भी हो सकता है) मन्दिर में प्रवेश करने के पूर्व ही साष्टांग करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • सार्वजनिक स्थान में आचार्य और आचार्य के समान श्रीवैष्णवों को साष्टांग करने से हिचकिचाना बाधा है। जब भी हम उन्हें देखे तुरन्त हमें उनका अभिवादन करना चाहिये।
  • जो अध्यात्म विद्या (भगवान का रहस्यमय ज्ञान) में पूर्णत: निपुण न हो, उनके प्रति भी पूर्ण अभिवादन प्रकट करना बाधा है, यद्यपि वो अन्य सांसारिक विषयों में निपुण हो। जैसे समझाया गया है “तत कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्ते, आयासायापरं कर्म विध्यान्या सिल्पनैपूणम” – वह कार्य जो बन्धन से मुक्त करे, वह ज्ञान, जो बन्धन से मुक्त करे, वह सच्चा ज्ञान है; अन्य कार्य केवल हमें थकायेंगे और अन्य ज्ञान केवल व्यवसाय के लिये है, गुरु जो सांसारिक ज्ञान सिखाता है वो अभिवादन का सच्चा लक्ष्य नहीं है। हमारे पूर्वाचार्य ऐसे ज्ञान को चप्पल सीने के ज्ञान के समान मानते है और वेदों के अर्थ को समझे बिना जो व्यक्ति उसका उच्चारण करते है वह केसर को ढोने वाले गधे के समान है (केसर का मोल जाने बिना उसे ढोते है)
  • उनका अभिवादन करना, जो मन्त्र रत्न (द्वय महामन्त्र और उसका अर्थ) के गुरु नहीं है, अपितु अन्य मंत्रों को सिखानेवाले है, यह एक बाधा है। यहाँ मात्र द्वय मन्त्र को दर्शाया गया है, परंतु इसका आशय तीनों मन्त्रों से है – तिरुमन्त्र, द्वय मन्त्र, चरम श्लोक, एक दूसरे से परस्पर जुड़े हुये है। यहाँ अन्य मन्त्र का सामान्यत: अर्थ है, अवैष्णव मन्त्र और ऐसे मन्त्र जो साँप, आदि काटने पर देते है।
  • कठिन परिस्थितियों में भी हमें सांसारिक जनों के आगे नहीं झुकना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमें भगवान पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिये जो हमारी हर समय हर परिस्थिति में चिन्ता करेंगे। जब यह विश्वास है तो और किसी भी सहायता को देखने कि जरूरत नहीं है।
  • आलस्य में भगवान को साष्टांग करना टालना नहीं चाहिये। यहीं विषय आचार्य और भागवतों के लिये भी लागू है।
  • भगवान की सन्निधी में अवैष्णवों को साष्टांग करना ओर भागवतों को नहीं करना बाधा है। यह विषय हम पहिले चर्चा कर चुके है कि अवैष्णवों को साष्टांग करने से बचना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/03/virodhi-pariharangal-17.html

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ५

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै – तिरुवल्लिक्केणि

४१) अव्यतत्तिनुडैय व्यक्ततदशैयिरे महानागिरतु

मूल प्रकृति प्रथम तत्त्व है | ऐसी प्रकृति के तीन गुण हैं : सत्त्व, रजस, तमस | प्रकृति केअव्यक्त स्थिति को अव्यक्त कहते हैं| इस स्थिति मे तीनो गुण (सत्त्व, रजस, तमस) समान मात्रा मे रहते हैं | जब ऐसे अव्यक्त स्थिति मे तीनो गुणों की मात्रा असमान होती है तब प्रकृति की व्यक्त स्थिति प्रदर्शित होती है | ऐसे व्यक्त स्थिति को महान कहते हैं |

अनुवादक टिप्पणी : स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य स्वग्रन्थ ” तत्त्व त्रय ” को ” कुट्टि भाष्य ” कहते हैं | यह ग्रन्थ श्रीभाष्य के विभिन्न अंशों को संक्षिप्त रूप मे प्रकाश करती है | श्रीमद्वरवरमुनि जी ने इस ग्रन्थ पर स्वभाष्य लिखकर महद्योगदान दिया है | इस प्रकार से वेद के सार को स्वभाष्य मे सरल भाव से प्रकाशित करते है | संक्षिप्त विवरण आप के लिये यहाँ ” https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/thathva-thrayam/” उपलब्ध किया गया है | अचित विषय का संक्षिप्त विवरण यहाँ उपलब्ध है :                                       ” https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/07/17/thathva-thrayam-achith-what-is-matter/” |

४२) सात्त्विकमायुम् राजसमायुम् तामासमायुम् मून्रु वगैप्पत्तिरे अहङ्कारन्तनिरुप्पतु

अहङ्कार ही बद्ध जीवों को भ्रमित करता है जिससे हम अपने शरीर को आत्मा मान लेते है | अहङ्कार २४ तत्त्वों मे से एक तत्त्व है | यह तत्त्व प्रकृति के व्यक्त स्थिति से उत्पन्न होता है | अहङ्कार तीन प्रकार का होता है : सात्त्विक, रासजिक, तामसिक |

अनुवादक टिप्पणी : अहङ्कार अर्थात् ” अनात्मनि आत्म बुद्धि ” – माने जो आत्मा न हो उसको आत्मा मानना व शरीर को आत्मा मानना अविवेकता एवं अज्ञानता कारण | यह आध्यात्मिक मार्ग मे सबसे बडा विरोधि है | जब तक हम शरीर और आत्मा को भिन्न एवं स्वयं को शरीर नही मानेंगे, तब तक सुनी आध्यात्मिक वचन प्रभावशाली नही होंगे और हमारे सोच कि बुनियाद असत्य ही रहेगी क्योंकि हमारी पहचान असत्य के पर्दे से घिरा हुआ है | भगवद् गीता के दूसरे अध्याय मे, भगवान् श्रीकृष्ण सर्व प्रथम आत्मा का रहस्य एवं आत्मा का स्वभाव समझाते है | बारहवें श्लोक ” नत्वेवाहं ” मे, भगवान् श्रीकृष्ण कहते है जीवात्मा स्थायी है और शरीर अस्थायी है | इसी श्लोक मे भगवान् बहु जीवत्व (जीव असंख्य) है, प्रत्येक जीव का अलग व्यक्तिगत पहचान और जीवात्मा एवं परमात्मा का भिन्नत्व तत्त्व को दर्शाते है | कृपया अधिक जानकारी के लिये यह लिंक क्लिक कर पढे :

https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/07/17/thathva-thrayam-achith-what-is-matter/

४३) सात्विक अहङ्कार कार्यम् एकादश इन्द्रियङ्गळ् | तामसाहङ्कार कार्यम् पृथिव्यादि भूतङ्गळ् | इरण्डुक्कुम् उपकारमाय् इरुक्कुम् राजस अहङ्कारम् |

सात्विक अहङ्कार से एकादश इन्द्रियोत्पन्न होते है (पञ्च ज्ञानेन्द्रिय : कर्ण(कान), त्वचा (शरीर), चक्षु, जीब (जिह्वा), नाक (नासिका) ; पञ्च कर्मेन्द्रिय : वाक (मुह), हस्थ (हाथ), पाद (पैर), उत्सर्गी इन्द्रिय, उपस्तिन्द्रिय (उत्पादन संबन्धित इन्द्रिय) ; मन (मनस) | तामसिक अहङ्कार से पञ्च भूतेन्द्रियोत्पन्न होते है (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) | राजसिक अहङ्कार, सात्त्विक एवं तामसिक अहङ्कार के कार्यों मे अपना सहयोग देता है |

४४) किट्टिनार्क्कु साम्यापत्तिरयिरे फलम्

परमपद नाथ – श्रीमन्नारायण एवं परमपद घोष्टि

जीवात्मा के लिये निज उद्देश्य उस परमपदनाथ को प्राप्त करना है | ऐसे जीव जो भगवद्धाम प्राप्त करते है उनको साम्यापत्ति (साम्य मोक्ष) जैसे तिरुमङ्गैयाळ्वार पेरिय तिरुमोळि ११.३.५ पासुर मे कहते है : तम्मैये ओक्क अरुळ् चेय्वर् अर्थात् भगवान् उस जीव पर अनुग्रह कर अपने गुण देते है |

अनुवाद टिप्पणी : साम्यापत्ति मोक्ष (साम्य मोक्ष) का अर्थ है कि भगवद्कृपा से जीव परमपद मे आठ विषेश गुण प्राप्त करता है जो भगवान् मे स्वयं है | इन गुणों के अलावा, ऐसे कुछ विषेश गुण है जो केवल भगवान् मे ही है जैसे – श्रिय: पतित्व, शेषशायित्व, उभयविभूतिनाथत्व इत्यादि |

उपरोक्त आठ गुण है :

  • १) अपहतपाप्मा : सभी प्रकार के दोषों के मुक्त (दोष रहित)
  • २) विजर : वृद्धापन से मुक्ति (सदैव युवावस्था मे रहना) यौवनत्व
  • ३) विमृत्यु : मृत्यु के मुक्ति (अमरत्व)
  • ४) विशोक: शोक के मुक्ति
  • ५) विजिगट्स : भूख से मुक्ति
  • ६) अपिपास : प्यास से मुक्ति
  • ७) सत्यकाम : सभी प्रकार के इच्छाओं कि पूर्ति
  • ८) सत्यसङ्कल्प : सभी प्रकार के कार्यों को करने कि क्षमता

४५) मुक्तर् पञ्च विंशति वार्शिकरायिरुप्पर्गळिले – निरन्तर भगवदनुभवत्ताले

नित्य निरन्तर भगवदनुभव करने वाले मुक्त जीव 25 वर्षीय ही रहते है अर्थात नित्ययौवनावस्था प्राप्त करते है |

अनुवादक टिप्पणी : नित्य भगवदानुभव करने वाले, आध्यात्मिक यौवनावस्था भगवदानुग्रह से प्राप्त करते है | यह निदर्शन है कि कैसे नित्य पार्षद एवं मुक्त जीव सदैव यौवन रहते है | उदाहरणार्थ :

  • श्री दशरथ महाराज, नित्य भगवान् श्रीरामचन्द्र के सौन्दर्य लावण्य को देखकर आत्मानंद प्राप्त कर रहे थे जिसका फलस्वरूप उनको यौवनावस्था प्राप्त हो रही थी | ऐसी प्राप्त यौवनावस्था का उल्लेख स्वामी कुलशेखर आळ्वार स्व पेरुमाळ् तिरुमोळि के ९.४ वें पासुर ” वा पोगु वा ” मे करते है |

  • श्री तिरुप्पावै के ग्यारहवें पासुर “कट्ट्रक्करवै” मे भी यही भाव का प्रसतुतिकरण हुआ है श्री गोदाम्बा अम्मा जी द्वारा | कट्ट्र : गाय का बछड़ा, करवै : दूध देने वाले गाय ! यहाँ एक प्रश्न उठता है कि कैसे गाय का बछड़ा दूध देने योग्य है ? कैसे यह सम्भव है ? इसका समाधान श्री अळगिय मणवाळ पेरुमाळ् नायनार इस प्रकार से करते है : जिस प्रकार नित्य त्रिपादविभूति धाम मे मुक्त एवं नित्य पार्षद सदैव यौवनावस्था मे रहते है ठीक उसी प्रकार इस धाम के गाय भी अपने यौवनावस्था के कारण बछड़े के समान होकर भी दुग्ध धारा बहाते है केवल भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य स्पर्श से |

४६) क्षुद्र विषयङ्गळाय् अनुभविक्पुककाल् , अवै अल्पास्थिरत्वादि दोष तुष्टमागैयाळे , अनुभविक्कुम् कालमुम् अल्प आयिरुक्कुम्

भगवद् विषय के परिधि के बाहर आने वाले समस्त विषय (क्षुद्र विषय) अल्पायुषी, अनित्य, अशाश्वत, तुच्छ है |

४७) अनुभाव्य विषयम् अपरिच्छिन्नमागैलाये कालमुम् अनन्तकालमाय् इरुक्कुम्

श्री शठकोप सूरि तिरुक्कुडन्दै आरावमुदन् भगवान् को नित्य असीमित अबाधित अमृत रस से सम्बोधित करते हैं

क्योंकि भगवान् असीमित हैं, उनके प्रति की गई सेवा (कैङ्कर्य) भी असीमित है अर्थात् नित्य होती ही रहेगी

४८) माता पिताक्कळ् कुरैवालर् पक्कलिलेयिरे इरङ्गवतु

जैसे शारीरिक व मानसिक विकलांगता से बाधित सन्तान के प्रति माता-पिता ज्यादा अनुरक्त और चिन्तित रहते हैं ठीक उसी प्रकार भगवान् भी भौतिक जगत् मे पीडित बद्ध जीवों के प्रति चिन्तित एवं अनुरक्त रहते हैं |

अनुवादक टिप्पणी : नित्य एवं मुक्त पार्षद, सम्पूर्ण ज्ञानमयी है एवं परिपूर्ण रूप से भगवद्-कैङ्कर्य मे संलग्न है परन्तु बद्ध जीव भौतिक जगत् मे बाधित एवं पीडित हैं | क्योंकि भगवद्-कैङ्कर्य सभी जीवों का समान हक है, बद्ध जीव भी इसका सदुपयोग कर स्वरूप, स्वस्वरूप ज्ञान से भगवद्दास होकर भगवान् श्रीमन्नारायण का स्वामित्व स्वीकर करने से उसका आत्मोज्जीवन होगा अन्यथा कालरूप संसार चक्र मे पुनरागमन अवश्य होगा | ऐसे अचेतनता वश मे गिरा हुआ बद्ध चेतन के लिये भगवान् का उद्यम को देखिये :

  • सृष्टि करना
  • जीवों को शरीर व इन्द्रिय प्रदान करना
  • ज्ञान प्रदान करना
  • जीवों का साथ देना – अन्तर्यामी ब्रह्म के रूप मे
  • भगवद् श्वासोत्पन्न नित्य शास्त्र प्रदान करना
  • भौतिक जगत् मे यथावत धर्म वृद्धि, भगवद् भक्त संरक्षणार्थ, अधर्म विनाशार्थ अवतरित होना (अवतार लेना)
  • करुणामय आळ्वार, आचार्यों का भौतिक जगत् मे सुसाध्य आगमन करना बद्ध जीवों के लिये

उपरोक्त विषयों को स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३८१ सूत्र ” त्रिपाद विभूतियिळे परिपूर्ण अनुभवम् नडवा नीर्क ” और अगले चन्द सूत्रों मे दर्शाते हैं | ये सूत्र भगवान् कि निर्हेतुक कृपा तत्त्व को सविस्तार पूर्वक प्रतिपादित करते हैं | श्री वरवरमुनि अपनी व्याख्या मे और विस्तृत रूप से इस विषय को समझाते हैं |

४९) तेळिविसुम्बागैयाले अन्निलम् ताने सोल्लुविक्कुम् | इरुळ् तरुमा ज्ञालमागैयाले इन्निलम् अत्तैत् तविर्पिक्कुम् |

त्रिपादविभूति श्रीवैकुण्ठ धाम अनन्त असीमित आनन्द व निष्कलंक ज्ञान का आलय है | अत: यह स्वभावतः सभी जीवों को भगवान् श्रीमन्नारायण का नित्य गुणगान (साम गान, भगवन्नाम सङ्कीर्तन इत्यादि) करने मे संलग्न करता है | इसके विपरीत मे देखा जाये तो सांसारिक जगत् मे केवल अज्ञान है जिसकी वजह से सभी जीव सांसारिक व इन्द्रिय तृप्ति विषय मे ही व्यस्त रहते हैं जो तुच्छ है |

५०) भगवन्नाम सङ्कीर्तननुम् भागवत सहसवासमुम् सत्तयातारकम्

भगवद् भक्तों (भागवतों) के सहवास मे (सत्सङ्ग मे) अन्य भगवद्भक्त भगवन्नाम सङ्कीर्तन और कैङ्कर्य परायणता से आत्मोज्जीवन करते हैं (अपना जीवन व्यापन करते हैं) |

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-5.html

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