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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ८

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै एवं एम्पेरुमान् सहित उभय नाच्चियार्

71) भक्तिमानुडैय भक्ति वैदमाय् वरुमतु । प्रपन्नुडैय भक्ति रुचि कार्यमायिरुक्कुम् । भक्तिपरनुक्कु साधनमायिरुक्कुम् । इवनुक्कु देहयात्रा शेषमायिरुक्कुम् ।

 भगवद्भक्ति (भगवद्रति) के कारण कृष्ण-तृष्ण-तत्त्वज्ञता से स्तव्य) — नम्माऴ्वार्

भक्त की भक्ति भक्ति-योग (भक्ति-शास्त्र) के नियमों के अनुसार ही होती है । परन्तु प्रपन्न के लिए भगवद्विषयोत्पन्नासक्ति ही भक्ति कहलाती है । साधना-भक्ति से भक्तिमान भगवान् को प्राप्त करता है । प्रपन्न के लिए, भक्ति का उपयोग स्वरूपानुरूप जीवन व्यापन मे होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे इन तत्त्वों को बहुत सुन्दर रूप से समझाया है । सूत्र 271 मे स्वामी कहते है ः- प्रपन्न के लिए भक्ति भगवद्विषयासक्तिरूप धारण करती है । श्रीवरवरमुनि स्वामी इस सूत्र व्याख्या मे कहते है जिस प्रकार अत्यन्त भूखा जैसे अन्नादि ग्रहण करता है ठीक वैसे ही भक्ति से ही एक प्रपन्न भगवद्कैङ्कर्य को यथारूप  से कर सकता है ।

72) भक्तिमानुक्कु पलत्तिल् स्रद्दै इल्लातपोतु तविरलायिरुक्कुम्, प्रपन्नुक्कु स्वरूप-प्रयुक्तमाय् वरुमतागैयाले ओरुकालम् तविरातायिरुक्कुम्

तिरुप्पाणाऴ्वार – पूर्णतया पेरियपेरुमाऴ् के प्रति आसक्त

भक्तिमान जब उपेय (लक्ष्य) के प्रति निरुत्साहित या रुचि या इच्छा को खोता है तो उसकी भक्ति मे रुकावट होती है अतः भक्ति सफलीकृत नही होती । चूँकि प्रपत्ति जीव के स्वरूपानुरूप है अतः एक बार करने से उस जीव की रुचि (मे रुकावट) प्रतिबंधित नही होती ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भक्तियोगानुयायी को प्रतिक्षण भगवद्चिन्तन करते रहना है । अगर गलती से भी एक क्षण के लिए भगवद्विस्मृति हो तो उसकी भक्ति मे बाधा आती है और अन्ततः रुक जाती है । चूँकि प्रपत्ति सिद्धोपाय (भगवान् ही उपायोपेय है और भगवान् अपने शरणागत की रक्षा करने मे सक्षम है) है अतः भगवान् को उपायोपेय स्वीकृति ही जीव (जो नित्य भगवद्दास है) का यथार्थ स्वरूप है ।

73) अवन् गुण निबन्धनमन्रु, अवनोट्टै सम्बन्धम् सत्ताप्रयुक्तमेङ्गै

जीवात्मा का परमात्मा से सम्बन्ध भगवद्गुणों पर आधारित नही है अपितु यह स्वाभाविक सम्बन्ध भगवच्छेषत्व (जो स्वरूपानुरूप) है के आधार पर है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः नम्माऴ्वार  तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ “कडियन् कोडियन्  . . . आगिलुम् कोडिय एन् नेन्जम् अवन् एन्रे किडक्कुम् ” पासुर मे कहते है भगवान् पाषाण-हृदयी है फिर भी इस दास का मन आप पर ही केन्द्रित है और सदैव आप के ही मनन चिन्तन मे है । नम्पिळ्ळै स्वामी ईडु व्याख्या मे अनसूया और श्री सीता देवी के संवाद का उदाहरण देते है । जब अनसूया कहती है कि ” एक पतिव्रता स्त्री के लिए उसका पति साक्षात् भगवान् है ” तो भगवती सीता कहती है –  सभी का ऐसा विचार है कि मै भगवान् श्रीरामचन्द्र के दिव्य गुणाधार पर उनके प्रति आसक्त हूँ । अगर मेरे स्वामी स्वगुणों को त्याग दे और बदसूरत भी हो जाए फिर भी उनके प्रति मेरी आसक्ती को नही त्यागूँगी । पर मै स्वकथन का निरूपण नही कर सकती क्योंकि मेरे प्रिय स्वामी कदाचित भी स्वगुणों का त्याग नही करेंगे । पिळ्ळै लोकाचार्य इसी तत्त्व को श्रीवचनभूषण के 111वें सूत्र मे कहते है ” गुण कृत दास्यत्तिलुम् काट्टिल् स्वरूप प्रयुक्तमान दास्यमिरे प्रधानम्” अर्थात् स्वरूपारूप भगवच्छेषत्व, गुणानुरूप भगवच्छेषत्व की तुलना मे श्रेष्ठ है । अगर मान लिया जाए कि यह भगवच्छेषत्व गुणानुरूप है तो जिस दिन यह गुण नज़र नही आयेंगे उस दिन (समय) दासत्व को छोड़ देंगे और इसी को वास्तविक आत्महत्या कहते है । परन्तु यह स्वाभाविकानुरूप (जो अपरिवर्तनशील है) है तो हम इसका (भगवच्छेषत्व का) परित्याग कदापि नही करेंगे ।

74) भगवद्विषयत्तिलोरडिवर निन्रवर्गळ् स्लाकनीयर्

जो कोई भी भगवान् के प्रति छोटा सा कार्य (करता) (कदम उठाता) है वह सदा कीर्तन (प्रशंसा) के योग्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः इस भौतिक जगत् मे जीवों के लिए जब इन्द्रिय तृप्ति के अनेकानेक साधन है तो उन जीवों मे अगर एक भी जीव भगवान् के प्रति आसक्त हो, वह सदा प्रशंसा के योग्य है । ऐसे आसाक्त अगर किसी श्रीवैष्णव का नित्य मार्गदर्शन प्राप्त हो तो वह अतीव शीघ्रता और सरलता से स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त करता है और सद्व्यवहार से स्वस्वरूप को समझता है ।

75) अत्तलैयाले वरुमतोऴियत् तान्तामोन्रै आशैयप्पडुगैकूडप्पऴि

सब कुछ भगवदेच्छा (भगवान् की इच्छा) अनुसारेण होना चाहिए । स्वमनोरथ पूर्ती भगवान् से याचना करना स्वदोष है । सदैव भगवद्मुखोल्लास से कार्य करना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् शेषी (स्वामी) है और जीव शेष (किंङ्कर) है । स्वामी को इच्छा कर आशीर्वाद देना चाहिए जो उस (दास) (सेवक) के लिए अनुकूल हो । शेषी होने की वजह से जीव का स्वतन्त्र इच्छा होना दोषयुक्त है और स्वरूप नाश कारक है ।

76) उडैयवने नम् कार्यत्तुक्कुक्कडवन्

भगवान् स्वामी है और जीवात्मा उनका सेवक है । शरणागतों का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः आत्मा देह द्वारा कार्य करता है और इन्हीं कार्यों को करने का मार्गदर्शन आत्मा देता है । भगवान् जीवात्मा का आन्तरिक आत्मा के रूप मे आवास करते है और यही जीव उनका शरीर । अतः शरीर रूपी जीव का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है । पिळ्ळै लोकाचार्य मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के चरमश्लाक विवरण 258 वें सूत्र इसी विषय को समझाते हुए कहते है ःः भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा है – “मोक्षयिष्यामि” अर्थात् ” उद्धार करूँगा ” “मै रक्षा करूँगा” । सूत्र मे स्वामी कहते है – ” इनि उन्कैयिलुम् उन्नैक्काट्टित्तरेन् एन् उडम्बिल् अऴुक्कै नाने पोक्किक् कोळ्ळेनो ” । इस सूत्र व्याख्या मे श्रीवरवरमुनि कहते है – अब तक तुम (अर्जुन) स्वयं को स्वतन्त्र मानते थे ऐसा भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा । परन्तु अब तुम परतन्त्र मानकर (जैसे देह आत्मा पर निर्भर होता है उसी प्रकार) मुझ मे शरणागति किये । वरवरमुनि स्वामी कहते है यहाँ अर्जुन का भ्रम (दोष) निवारण कर्तव्य भगवान् का है और अर्जुन का शुद्धी एवं उद्धार का फलस्वरूपी भगवान् ही हैं।

77) वस्तुवुक्कु गुणत्तालेयिरे उत्कर्षम्  । अन्द गुणाधिक्यमेङ्गेयुण्डु, अङ्गेयिरेयेत्तम् (अङ्गेयिरेयेट्रम्)

एक वस्तु के प्रति उत्कर्ष का कारण उस वस्तु मे उपलब्ध विशेष गुण ही है । जब ऐसे गुणाधिक्यता हो तो ऐसे गुण उत्कृष्टता (विशिष्टता) प्राप्त करते है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् मे मुख्यतः दो विशेष गुण है – पहला कि वह विशिष्ट असंख्य कल्याण गुणों का भण्डार राशि है और दूसरा असद् गुणों के विपरीत है वह । इसी कल्याण गुणों के सान्निध्य की वजह से उनकी वन्दना (स्तुति) सभी करते है ।

78) शेषभूतन् स्वरूपम् पेट्ट्रडिमै सेइगै शेषिक्कु पेट्ट्रिरे

जैसा कहा गया है “मेय्याम् उयिर् निलै” (तिरुवाय्मोऴि तनिया) – अर्थात् भगवद्मुखोल्लास तभी होता है जब जीव भगवच्छेशत्व को स्वीकार कर भगवद्सेवा करें । ऐसा करने पर भगवान् को अत्यन्तहर्ष प्राप्त होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः कहा गया है – “चेतन लाभं ईश्वरनुक्कु” अर्थात् जब भगवद्सम्पत्ति जीव भगवद् निष्ठा मे परिपूर्ण रूप मे सिद्ध होता है, भगवान् ही इससे लाभ प्राप्त करते है ।

भगवान् ही जीव को मोक्ष प्राप्ति के सम्मुख लाने के लिए नित्य संसार की सृष्टि कर, विभिन्न अवतार लेकर, आऴ्वार एवं आचार्य रूप मे इस दिव्य ज्ञान का प्रसार करते है । अन्ततः यह कार्य से जब उनकी सम्पत्ति की शुद्धि होती है तो यह उनके लिए ही श्रेयस्कर है ।

79)  स्वनिकर्षम् सोल्लुगै ज्ञानकायम् । ईश्वरोऽहं एन्रिरुक्कै अज्ञान कार्यम् ।

जैसे अमुदानर (तिरुवरङ्ग स्वामी) रामानुज नूत्तन्दादि के 48वे पासुर मे कहते है – –  स्वदोष गुणानुसन्धान ही असली पहचान है सच्चे आत्मज्ञान की । अर्थात् मुझ समान कोई तुच्छ नही है ।

मै ईश्वर हूँ कहना अज्ञानता और अहं कारणोत्पन्न है ।

80) तीर्थङ्गळिळे वर्त्तिक्किर सत्त्वङ्गळुक्कु पापम् पोगिरतिल्लैयिरे ज्ञानमिल्लामैयाले

कहते है की तीर्थ स्थलों के जलों मे रहने वाले विभिन्न जीवों का आत्मोद्धार नही होता है क्योंकि उनको स्वरूपानुरूप ज्ञान नही होता है अतः दोष निवारण नही होता है । केवल और केवल स्वरूपानुरूप ज्ञान से ही जीव दोषों से मुक्ति पाता है । अतः केवल तीर्थ जल मे स्नान मात्र से उद्धार नही होता ।

अनुवादक टिप्पणी ःः उदाहरणार्थ गङ्गा मे कोई स्नान करता है तो उसको यह ज्ञान होना चाहिये कि यह दिव्य गङ्गाजल का उद्भव भगवान् श्रीमन्नारायण के दिव्य चरणारविन्दों के चरणामृत से हुआ है जो इस सम्पूर्ण जगत् के सर्वरक्षक है । जब तक ऐसा ज्ञान वर्धन विचार नही होता है और केवल सोचता है कि यह सिर्फ दिव्य नदी जल है तो कोई उद्धार नही होता है ।

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-8.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १८

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १७

४९) अंजली विरोधी – अंजली/ प्रणाम/ नमस्कार करते समय बाधाएं (दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार करना)।

अंजली का अर्थ दोनों हथेली को जोड़ नमस्कार करना। यह ४८वें विषय (“वन्दना”- प्रणाम) से संबंधित है। साष्टांग दण्डवत करने के पश्चात हमें उठकर नमस्कार करना चाहिये। बहुत से समय यह भी देखा गया है कि बिना पूर्ण अभिवादन/ साष्टांग के केवल नमस्कार ही किया जाता है। नमस्कार दोनों हाथों को जोड़कर छाती के करीब लाकर किया जाता है। प्रायः यह भी देखा जाता है कि हाथो को अंजलि मुद्रा में सिर पर भी रखा जाता है। अंजली यानी “अम् जलयती इति अंजलि:” वह जो भगवान को पिघला दे, जिन्हें “अ” –अकार कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि “अंजलि: परमामुद्रा क्षिप्रं देवप्रसादिनी” – अंजली अन्तिम और उच्च स्तर की मुद्रा है, जिससे भगवान कि कृपा तुरन्त प्राप्त हो जाती है।

  • भगवान के चरण कमलों पर अपना ध्यान केन्द्रीत कर अंजली मुद्रा को करना चाहिये। देवतान्तर, सांसारिक अमीर जनों आदि अन्य तत्वों पर ध्यान केन्द्रीत कर अंजलि नहीं करना चाहिये।
  • यह समझना चाहिये कि नमस्कार करने हेतु कोई समय की पाबंदी नहीं है और नमस्कार करने हेतु कोई अच्छा समय आदि नहीं देखना चाहिये।
  • यह किसी भी श्रीवैष्णव द्वारा और किसी भी श्रीवैष्णव के प्रति किया जा सकता है (किसी योग्यता की जरूरत नहीं है), यह तथ्य न समझना बाधा है। उसी तरह यह विचार करना कि अंजली करने के लिये कोई विशेष ज्ञान कि आवश्यकता है यह सही नहीं है। जिसे भी भगवद सम्बन्ध प्राप्त हो वह नमस्कार कर सकता है। हम श्रीपरकाल स्वामीजी के तिरुनेडुन्दाण्डगम के १४वें पाशुर में देख सकते है कि “वलरत्तदनाल पयन पेट्रेन वरुगवेन्रु मडक्किलियैक कैकुप्पि वणङ्गिनाले” – अर्थात यद्यपि वह तोता परकाल नायकी (श्रीपरकाल स्वामीजी का स्त्री भाव) द्वारा उत्थापित किया गया था, परंतु जब वे तोते को भगवान का नाम उच्चारण करते हुए सुनती है तो बहुत आनंदित होती है और स्वयं अपने ही तोते को दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करती है।
  • कोई किसी भी परिस्थिति में नमस्कार कर सकता है, यह न समझना बाधा है। शरणागति गद्यम में श्रीरामानुज स्वामीजी कहते है “ऐनकेनाबि प्रकारेण द्वयवक्ता” – जिस प्रकार किसी भी परिस्थिति में द्वय महा मन्त्र का अनुसन्धान किया जा सकता है – उसी तरह किसी भी परिस्थिति में नमस्कार किया जा सकता है, जिससे भगवान द्रवित हो जाते है।
  • एक अंजली प्रर्याप्त है ऐसा न समझकर सब ही को कई अंजली करना, यह सोचना बाधा है। सकृत- एक बार। असकृत- अनेक बार। स्तोत्र रत्न में आल्वंदार स्वामीजी भगवान से कहते है “तवदडिघ्रमुद्दिश्य कदापि केनचित् यथातथा वापि सकृत्कृतोञ्जलि: तदैव मुष्णात्यशुभान्यशेषतः शुभानि पुष्णाति न जातु हीयते” – किसी के द्वारा किसी भी समय किसी भी तरीके से आपके चरण कमलों कि ओर किया गया एक नमस्कार उसी क्षण उसके सारे पाप मिटा देगा और उस व्यक्ति का कल्याण होगा और उसकी वह अच्छाई कभी कम नही होगी। इसलिये एक बार नमस्कार करना पर्याप्त है उसे बार बार करने कि कोई अवश्यकता नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने श्रीगुण रत्न कोष में बड़ी सुन्दरता से ५८वें श्लोक में पेरिय पिरट्टियार कि स्तुति करते है “ऐश्वर्यम अक्षर गतिम् परमं पदम् वा कस्मैचित्त अंजलि परम वहथे विधिर्य अस्मै न किंचित उचित्तम कृतं इति अथ अम्ब त्वं लज्जसे कथय क: अयं उदारभाव:” – अर्थात प्यारी माँ! अगर कोई एक बार आपके सन्मुख नमस्कार करता है, तो आप उसे सांसारिक धन, परमपदधाम और परमपदधाम का कैंकर्य देकर कृपा करती हो। सबकुछ देने के पश्चात भी आप यह सोचती हो कि ‘क्या मैंने पर्याप्त प्रदान किया?’ और संकोचवश अपना सिर झुका देती हो। इससे भगवान और अम्माजी के भावों का पता चलता है कि भक्त के उनके पास पहूंचने के सबसे न्यूनतम प्रयास को भी अत्यंत बड़ा जानकार, वे उस पर एक ही क्षण में कृपा बरसाते है। इसलिये अधिक प्रयास के बारे में तो क्या कहना?
  • नमस्कार से भविष्य में उसका फल प्राप्त होगा और उसका परिणाम तुरन्त नहीं मिलेगा, ऐसा विचार करना बाधा है। जैसे कहा गया है “क्षिप्रं देव प्रसादिनी” कि जब कोई एक ही बार अंजली अर्पण करता है, तो भगवान एक ही क्षण में उसकी इच्छा पूर्ण कर देते है। यह पिछले बात कि चर्चा से समझाया जा चुका है।
  • प्रत्येक अपचार के लिये पृथक प्रणाम करना अथवा सभी अपचार के लिये एक ही प्रणाम पर्याप्त नहीं है, यह सोचना बाधा है। केवल यह कहना कि “अपराधानिमान् सर्वान् क्षमस्व पुरुषोत्तम!” – हे आत्माओं में श्रेष्ठ (भगवान)! कृपा कर मेरी सारी गलतियों को क्षमा करना ऐसा कहकर केवल एक अंजली करना प्रयाप्त है। अनुवादक टिप्पणी: यह श्लोक “उपचारापदेशेन……” के भाग से संबंधित है। यह श्लोक तिरुमाली में तिरुवाराधन के अन्त में गाया जाता है। इसका अर्थ “हे भगवान! मैंने यह तिरुवाराधन आपका लाड़ लड़ाने और सेवा करने हेतु प्रारम्भ किया। परन्तु मैंने इसको समाप्त करते समय सेवा कम और गलतियाँ अधिक की है। इसलिये कृपया आप मुझे मेरी गलतियों के लिये क्षमा करें”। भगवान की महानता को देखते हुए कोई भी उनकी सम्पूर्ण सेवा नहीं कर सकता है। और इस संसार बन्धन में बंधे हुए जीवात्मा और उसकी मानसिक स्थिति को सोचते हुए भगवान की सेवा करते समय भी भगवान पर अपना ध्यान केन्द्रीत करना और सही तरिके से उनकी सेवा करना कठीन है। इसलिये भगवान की महानता और जीवात्मा में दोष (कमी) के कारण जीवात्मा के दृष्टीकोण से तिरुवाराधन असंतोषजनक ही होगी। परन्तु भगवान सौलभ्य के सारसंग्रह है इसलिए जो भी कैंकर्य भक्त जन करते है, वे उसमें दोष न देखते हुए बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार करते है।
  • अंजली थोड़े नहीं बल्कि सम्पूर्ण पाप को मिटा देती है। इसे “सर्वपापनिवारणी” (वह जो सभी पापों को निकाल देती है) कहते है। परन्तु जो जानकर पाप करके विचार करते है कि भगवान को नमस्कार करने से सभी पाप समाप्त हो जायेंगे उनके लिये कोई आशा नहीं है।
  • यह विचार करना कि प्रणाम से थोड़ा शुभ होगा और पूर्ण शुभ नहीं होगा, यह बाधा है। जैसे स्तोत्र रत्न के २८वें श्लोक में चर्चा की गयी है कि यह पूर्ण शुभ करता है।
  • केवल इच्छा फल प्राप्ति हेतु प्रणाम करना और यह न जानना कि फल प्राप्ति के पश्चात भी प्रणाम करते रहना चाहिए, यह बाधा है। इसके परिणाम स्वरूप यह भगवद अनुभव पर केन्द्रीत है। परमपद में नित्य और मुक्तजन भी प्रणाम करते है। जैसे “नम इत्येव वादिन:”। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी सहस्रगीति में कहते है “कैकलालारत थोलुत्तु थोलूतुन्नै” – मैं प्रणाम कर निरन्तर आपकी पूजा कर रहा हूँ। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी कि व्याख्यान इसके लिये बहुत श्रेष्ठ है – उनका तेज जो चमकदार सूर्य कि तरह चमकता है, वह आल्वारों के दिव्य मनोभाव को दर्शाता है। वह कहते है श्रीशठकोप स्वामीजी कि प्रणाम करने की प्रवृत्ति उन्हें अत्यधिक प्रिय है। वह कहते है “वह जो सांसारिक लाभों पर केन्द्रीत है, वह एक बार उसकी इच्छा पूर्ण होने पर आराधना करना छोड़ देता है। वह जो साधन भाव से अपनी इच्छाओं के लिये पूजा करता है, उन इच्छाओं कि पूर्ति होने पर उसे बन्द कर देता है। परन्तु जैसे ‘नित्यांजली पुड़ा’ में कहा गया है कि वह जो इसे यात्रा (जीवन पोषक कार्य) मानता है, और श्वेत द्वीप वासिस (दूध के समुन्द्र के निवासी), नित्य और मुक्त जन परमपद में भी निरन्तर प्रणाम करते है जैसे पहिले देखा गया है ‘नम इत्येव वादिन:’”। वह निरन्तर यह समझाते है कि इन महान भक्तों से उनके प्रति प्रणाम करवा कर भगवान स्वयं पोषण करते है। इसलिये हम यह समझ सकते है कि भगवान के प्रति प्रेम और स्नेह से जनित कैंकर्य के रूप में प्रणाम करते रहना चाहिए।
  • यह नहीं समझना कि जिसप्रकार गरुड मुद्रा साँप के जहर को नियंत्रण करती है उसी प्रकार, यह प्रणाम मुद्रा भगवान के स्वातंत्रीयं (सम्पूर्ण मुक्तता) को नियंत्रित और जीतती है। हमें इस तत्व पर विश्वास होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामायण के श्लोक में “च चाल चापं च मुमोच वीर” – जब रावण धनुष हाथ में लिये भगवान राम पर बाण चला रहे थे, तो भगवान राम भी उनका उत्तर बाण चला कर दे रहे थे – परन्तु जब भगवान ने रावण का धनुष तोडा, रावण ने उस टूटे धनुष को नीचे गिरा दिया (यह सोचकर कि भगवान राम उस पर वार नहीं करेंगे, क्योंकि उसके हाथ में शस्त्र नहीं है) भगवान राम ने तुरन्त उस पर वार करना छोड़ एक और जीवन दान दिया। हमारे पूर्वाचार्य यह समझाते है कि अगर रावण उस वक्त हाथ जोड़ लेता, तो वह भगवान राम पर अवश्य विजय प्राप्त कर लेता – क्योंकि भगवान एक ही श्रेष्ठ मुद्रा से नियंत्रण में आते है, वह है प्रणाम की मुद्रा।
  • हमें यह दृढ़ता से समझना चाहिये कि जैसे अभय हस्त (रक्षण अवस्था), शेषी (स्वामी) के लिये योग्य है, वैसे ही अंजली हस्त (हथेलियाँ जोड़ी हुई स्थितिमें), शेष-भूत (सेवक) के लिये योग्य है। ऐसा विश्वास न होना बाधा है। शेषी अर्थात भगवान। वह अपने हस्त अलग अलग प्रकार से धारण करते है जैसे अभय हस्त (रक्षा प्रदान दशा), वरद हस्त (आशीर्वाद प्रदान करना), आह्वान हस्त (निमंत्रण देना) आदि। उसी तरह जीवात्मा के लिये अंजली हस्त ही सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह जीवात्मा के अनन्य गतित्व और आकिंचनयं को प्रगट करता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति के पाशुर के व्याख्या में हम यह देख चुके है, भगवान भक्तों की रक्षा करके स्वयं को प्रमाणित करते है और जीवात्मा भगवान द्वारा की गयी रक्षा को स्वीकार करके स्वयं को प्रमाणित करते है।

abhayam-anjali

  • स्वयं के रक्षा हेतु प्रणाम मुद्रा को करना बाधा है। नमस्कार करने से हम यह स्पष्ट कर देते है कि हमारी रक्षा हम स्वयं नहीं कर सकते है। जिस प्रकार अन्य कोई रक्षा प्रदान नहीं कर सकता, वैसे ही हम स्वयं कि रक्षा नहीं कर सकते है। जैसे तिरुक्कोलुर पेण पिल्लै वार्ता ग्रन्थ में कहा गया है कि “इरु कैयुम विट्टेनो द्रौपदीयैप पोले”– क्या मैं अपने दोनों हाथों को ऊपर करके स्वयं की रक्षा करना छोड़ दू और संपूर्णत: भगवान की शरण हो जाऊ, जैसे द्रोपदी ने किया था? जब द्रोपदी स्वयं का सम्मान खो देने की भयावह स्थिति में थी, उसने स्वयं को बचाने के सभी प्रयासों को छोड़ दिया, “हे कृष्ण! हे द्वारकानाथ!” ऐसे भगवान को पुकारा और तुरंत भगवान ने उसका रक्षण किया। इसी तरह हमें भी स्वयं की रक्षा के विश्वास का रंग चढ़े बिना सिर्फ मुखौल्लास हेतु प्रणाम करना चाहिए।

draupadi-krishna

  • कैंकर्य को छोड़ अन्य लाभ के लिये प्रणाम करना। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा का इस जीवन में एक ही कार्य है भगवान और उनके भक्तों कि सेवा। ओर कोई आशा नहीं होनी चाहिये। जीवात्मा और भगवान के मध्य में यह कोई व्यापार सम्बन्ध नहीं है जो किसी लाभ से प्रणाम करें। हमने पहिले यह श्रीसरोयोगी स्वामीजी के मुदल तिरुवंदादि के २६वें पाशुर में देखा है “एलुवार विडैगोल्वार ईन तुलायानै वलुवा वगै निनैन्दु वैगल तोलुवार …” – वह जो सांसारिक धन को देखता है और वह जो कैवल्य को देखता है अपनी इच्छा पूर्ण होते ही भगवान को छोड़ देगा, परन्तु जो शुद्धता से भगवान कि सेवा करना चाहता है वह बिना कोई चाह के भगवान कि निरन्तर सेवा करेगा।
  • मन्दिर में देवतान्तर के सामने शठारी (श्रीशठकोप स्वामीजी) लेना बाधा है। यह सामान्य चलन है कि जब भी श्रीसहस्रगीति को गाते है हर पाधिगम (१० पाशुर को) के अन्त में जब ११वें पाशुर को गाते है और श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम सुनते है, तो तुरन्त प्रणाम करना चाहिये और श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति आभार प्रकट करना चाहिये कि उन्होंने हम पर बहुत कृपा की। यह भी कहा जाता है कि श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम किसी भी समय कहीं भी सुने तो हमें प्रणाम करना चाहिये। परन्तु हम किसी देवताओं के मन्दिर में या निकट भी हो तो ऐसा करना नही चाहिये (उसे भूलवश, उन देवताओं को प्रणाम समझा जा सकता है)। इस संदर्भ में यह कहा जाता है कि “शठगोपनुम त्याज्यं ” – ऐसी परिस्थिति में शठारी का प्रणाम भी त्याग किया जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: यद्यपि श्रीसहस्रगीति को पुरप्पाडु (सवारी) के समय ज़ोर से नहीं गाया जाता परन्तु महान भक्त इन पाशुरों को अपने हृदय में उनके अर्थ का स्मरण करते हुए गाते है। ऐसी दशा में सावधान रहना चाहिये और देवतान्तरों को आदर देने से बचना चाहिये।
  • जब कोई अवैष्णव नमस्कार करता है तो उनके प्रति ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिये। इसके प्रतिकूल किसी भागवत को देखकर उनके नमस्कार करने के पूर्व हमें प्रणाम करना चाहिये।
  • आचार्य को देखते ही हमें न केवल प्रणाम अपितु साष्टांग दण्डवत करने के पश्चात उठकर फिर प्रणाम करना चाहिये।
  • प्रणाम को अशुद्ध हृदय से अथवा बनावट (फैशन) से नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रणाम को पूर्ण प्रसन्नता से सही प्रकार से करना चाहिये। शास्त्र में किसी को भी एक हाथ से प्रणाम करने कि निन्दा कि गयी है।
  • श्रीशठकोप स्वामीजी का नाम सुनते ही अपने सर पर हाथ रखकर प्रणाम नहीं करना बाधा है। इसकी पहिले भी चर्चा की गयी है। गोष्ठी में पाशुरों का गान करते समय, हम लोगों को हाथ को शीष पर रखकर अंजली करते नहीं देखते। भगवान की पादुका (चरण कमल) को ही श्रीशठकोप कहते है। गोष्ठी में या कहीं भी जब हमें श्रीशठकोप स्वामीजी से आशीर्वाद मिल रहा है, तब हमें आदरतापूर्वक शीष झुकाना चाहिये और उस आशीर्वाद को प्रणाम के साथ स्वीकार करना चाहिये।

srisatagopam-vanamamalai

श्रीशठारी में विराजे श्रीशठकोप स्वामीजी – वानमामलै

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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