विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २१

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २०

५२) गृह विरोधी – गृह स्थान में विरोधी।

परुत्तिक कोल्लै अम्माल के तिरुमाली में आकर जब श्रीरामानुज स्वामीजी यह देखते है कि अपने फटे हुए वस्त्र में बाहर आने में अम्माल लज्जा अनुभव कर रही है तब वे कृपा कर उन्हें अपना प्रपन्न पाकै (अपना वस्त्र) प्रदान करते है। अपनी तिरुवेंकट यात्रा में श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं उन साध्वी स्त्री के सात्विक गुणों को देखकर उनके तिरुमाली में पधारते है – यह घटना श्रीपिल्लै लोकम जीयर स्वामीजी के रामानुजार्य दिव्य चरित्र में दर्शाया गया है।

इस भाग में प्रपन्नों के निवास गृह कि बनावट को विस्तार से समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: हमारे पूर्वाचार्य दिव्य देश, अभिमान स्थल, आचार्य/आल्वार आदि के अवतार स्थान पर रहने को केन्द्रीत रहते थे। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में समझाते है कि “उन कोयिलील वालुम वैट्टणवन एन्नुम वनमै कण्डाये”- श्रीवैष्णव के लिये अंतिम लक्ष्य तो भगवद और भागवतों के कैंकर्य में व्यस्त रहना और उस स्थान पर निवास करना है जो भगवान को प्रिय है। दिव्य देशों कि “उगन्थरुलिन निलंगल” ऐसी स्तुति होती है – वह स्थान जहाँ पर भगवान कि निर्हेतुक कृपा होती है। दिव्य देश आदि में रहने का उद्देश्य भगवद विषय में शिक्षीत होकर श्रीवैष्णवों से चर्चा कर अपने ज्ञान को बढ़ाना और निरन्तर भगवद – भागवतों के कैंकर्य में रहना। भागवतों कि संगत में रहने से हम स्वतः ही संसारी जीवों से दूर हो जाते है। इस तत्व को इस अंश में पूर्णत: समझाया गया है।

  • उस स्थान पर अपना गृह (निवास स्थान) का होना, जो देवतान्तर (अन्य देव जैसे ब्रम्हा, रुद्र, आदि) से सम्बन्ध के कारण निन्दक है। यह बाधा है।
  • उन गलियों में रहना, जहाँ पाषण्डी जन निवास करते है बाधा है (बाह्य – वह जो वेदों को स्वीकार नहीं करते है और कुदृष्टि – वह जो वेदों को स्वीकार तो करते है परन्तु उसका गलत अर्थ करते है)।
  • सांसारी जनों के निकट में रहना बाधा है।
  • उस स्थान में निवास करना रहना जहाँ भगवान के दिव्य चिन्ह जैसे ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, शङ्ख, चक्र आदि नहीं है, यह बाधा है।
  • उस स्थान में निवास करना जो सांसारियों का या उनके प्रियजनों का है, यह बाधा है।
  • हमारे आचार्य को जो स्थान प्रिय नहीं है, उस स्थान में निवास करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह समझना चाहिये कि जब भी एक घर का निर्माण होता है, उसे पहिले अपने आचार्य को समर्पित करना चाहिये तत्पश्चात उनकी अनुमती और आशीर्वाद से उस तिरुमाली का उपयोग करना चाहिये। यह आज भी गृह प्रवेश के रस्म के समय यह देखा जाता है कि आचार्य को बुलाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। आचार्य हृदयम में एक सुन्दर घटना ८५वें चूर्णिका में देखी गयी है जिसका प्रारम्भ “म्लेच्चनुम् भक्तन आनै” से होता है। भागवतों कि कीर्ति को समझाते हुए अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार यह दर्शाते है कि जब नदुविल तिरुवड़ी पिल्लै भट्टर ने नव तिरुमाली का निर्माण किया तब उन्होंने सिर्फ पिल्लै वानमामलै दासर से प्रवेश करने और अपने चरणों को सभी कक्षों में रखने कि प्रार्थना की। यह इतना ही नव तिरुमाली को पवित्र करने के लिए प्रयाप्त है।
  • उस निवास स्थान में रहना जहाँ भागवतों के प्रवेश और किसी भी समय उनका रहने को पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें अपने तिरुमाली को ऐसे निर्माण करना चाहिये कि भागवत किसी भी समय पूर्ण स्वतन्त्रता से प्रवेश कर सके (जैसे स्वयं ही उस तिरुमाली के स्वामी हो) और जीतने दिन उनको रहने कि इच्छा हो उतने दिन रह सके। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में श्रीवैष्णवों के स्वागत और उनके आगमन पर उनकी अच्छी तरह देखभाल करने में निपुण ऐसे तिरुक्कोष्टीयूर के जनों कि बहुत बढाई करते है।
  • उस निवास स्थान पर विराजमान होना जहाँ सांसारिक विषयों पर केन्द्रित संबंधी आते है, यह बाधा है। जब कोई सम्बन्धी श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी की तिरुमाली में आते थे, तब वे उन संबंधियों द्वारा उपयोग किये गए मिट्टी के सभी पात्र तोड़ देते थे और श्रीदाशरथी स्वामीजी द्वारा प्रयोग किये गये पात्र ले आया करते थे। अनुवादक टिप्पणी: गुरु परम्परा प्रभावम ६००० पड़ी में श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कि स्तुति कि गयी है। उसमें इस घटना को भी दर्शाया गया है। एक बार श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के सम्बन्धी (जो श्रीवैष्णव नहीं थे) उन्हें मिलने आते है। उनके जाने के पश्चात श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी सभी पात्रों को नष्ट कर उस स्थान को शुद्ध करते है। फिर वे श्रीदाशरथी स्वामीजी के तिरुमाली में जाकर उन पात्र को लेकर आते है, जिन्हें उन्होंने त्याग दिया है और वह उन पात्रों का प्रयोग करते है। अत: उन्होंने यह स्थापित किया कि जिनका शुद्ध आचार्य सम्बन्ध है उनसे संबंधित (उनके द्वारा त्यागा हुआ भी) सब कुछ पवित्र और स्वीकारनीय है और जो संसारी द्वारा उपयोग किया गया हो, उसका त्याग कर देना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ अर्चावतार भगवान (सालग्राम श्रीमूर्ति, विग्रह भगवान आदि) तिरुवाराधन कक्ष में न विराजे हो, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पञ्च संस्कार के एक भाग के अनुसार शिष्य अपने आचार्य से तिरुवाराधन करने कि विधि सिखता है। यह सीखने के पश्चात हमें अर्चावतार भगवान कि अराधना अपने तिरुमाली में करनी चाहिये जो कृपा कर हमारे तिरुमाली में पधारे है। अर्चावतार भगवान कि हमारे पूर्वाचार्यों ने बहुत स्तुति की है।
  • उस तिरुमाली में रहना जिसके प्रवेश द्वार पर शंख हो बाधा है। यद्यपि शंख भगवान के पवित्र शस्त्र और चिन्ह है, परंतु इनका बहुतेरे जन स्वतन्त्रता पूर्वक प्रयोग करते है। केवल शंख का प्रयोग करने कि यहाँ निन्दा कि गयी है।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ श्रीआचार्य का श्रीपाद तीर्थ न हो बाधा है। हमारे पूर्वाचार्यों ने यह समझाया है कि सभी तिरुमाली में आचार्य श्रीपाद तीर्थ और भगवान का तीर्थ होना ही चाहिये। यह सामान्य अभ्यास है कि कुमकुम या चन्दन का लेप आचार्य के चरण कमलों को लगाकर उसकी छाप एक सफेद नये कपड़े पर लेकर और उसे बड़े आदर के साथ अपने तिरुमाली में रखा जाता है। कभी कभी आचार्य कि चरण पादुका को भी रखते है। श्रीपाद तीर्थ इन दोनों – कपड़े पर आचार्य के चरण पादुका कि छाप या चरण पादुका से बनाया जा सकता है। एक और शैली है श्रीपाद तीर्थ बनाने की – तुलसी के पेड़ के नीचे कि मिट्टी को एक बार आचार्य के श्रीपाद तीर्थ के साथ मिलाकर एक ठोस खण्ड बनाया जाता है। जब वह सुख जाता है तो इसे “तीर्थवड़ी” कहा जाता है – सादे जल को इसमें मिलाने से श्रीपाद तीर्थ बन जाता है। किसी भी परिस्थिती में शिष्य को प्रतिदिन श्रीपाद तीर्थ को ग्रहण करना ही चाहिये।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक कि सामग्री और भगवान का प्रसाद न हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह सामग्री श्रीवैष्णव के नित्य प्रति दिन के लिये आवश्यक है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ मन्त्र जपने कि माला लटकी हुई है, बाधा है। अगर हमें केवल अपने मन्त्र उच्चारण का हिसाब रखना हो तो वह हम अंगूली के लकीरों से भी रख सकते है। अनुवादक टिप्पणी: अन्य सम्प्रदाय में मन्त्र उच्चारण के लिये कहा गया है परन्तु हमारे सम्प्रदाय में मन्त्र (मूल मन्त्र, द्वय मन्त्र आदि) के अर्थानुसन्धान पर केन्द्रीत रहने के लिए कहा गया है। हमारे सम्प्रदाय में इतनी गिनती की माला जपना है, ऐसा कोई नियम नहीं है केवल गायत्री मन्त्र जो संध्या वन्दन का एक अंग है जो प्रथम ३ वर्णआश्रम (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैश्य) के लिये है।
  • कुत्ते, लोमड़ी, भेड़िया, पाषण्ड के समीप के तिरुमाली में रहना बाधा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ शैव, बौद्ध, जैन, शार्वाक (बाह्य और कुदृष्टी) सम्प्रदाय के ग्रन्थ हो बाधा है। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमालै के ७वें पाशुर में कहते है “काण्बरो केटपरो ताम” – क्या वें कभी अन्य सम्प्रदाय के ग्रन्थ को देखेंगे या सुनेंगे। इस पाशुर के व्याख्या में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै समझाते है कि कैसे श्रीकुरेश स्वामीजी की बाल्यावस्था में उनके पिताजी ने उन्हें अन्य सम्प्रदाय के विषय में सुनने पर सजा दी थी।
  • उस तिरुमाली में रहना जिसे केवल शुक्रवार, अमावस आदि के दिन ही गाय के गोबर से साफ किया हो, बाधा है। यह समझना चाहिये कि सभी का घर प्रतिदिन साफ और पवित्र करना चाहिये। यही तथ्य अर्जन विरोधी में भी समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: क्योंकि भगवान सभी के तिरुमाली में विराजमान है इसलिये उसे भगवान का मन्दिर यह सोचकर हमें अपने तिरुमाली को प्रतिदिन साफ और पवित्र रखना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में विराजमान होना जहाँ रसोई घर में पका हुआ प्रसाद सामान्य जनों कि दृष्टी में आता है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक बार प्रसाद बनाने के पश्चात भगवान को निवेदन करने से पूर्व किसी को भी उस भोजन को देखना/ सूंघना/ चखना नहीं चाहिये। इसलिये पके हुए प्रसाद को ढककर सुरक्षीत रखना चाहिये। इसलिये हम देखते है कि भगवान को जो भोग लगता है उसे ढककर ले जाया जाता है। इसे हमें अपने तिरुमाली में भी पालन करना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ बहुत राख़ छलकाया गया है, बाधा है। राख़ सामान्यत: शैव अपने ललाट पर लगाते है और श्रीवैष्णवों को उसे स्पर्श करना पूर्णत: गलत है। अनुवादक टिप्पणी: पुनः यह विषय घर कि स्वछता और पवित्रता को सही तरीके से रखने को प्रदर्शित करता है।
  • जहाँ पके हुए चावल को कोने में रखते है उस तिरुमाली में निवास करना बाधा है। इसे सामान्यत: उत्तर-पूर्वी (इशान्य) कोने में रखते है। अनुवादक टिप्पणी: जब पके हुए चावल उस ही दिन संपन्न न हो तब उसे एक घड़े में जल मिलाकर रात भर रखते है। इससे चावल सुरक्षीत रहते है और अगले दिन के लिये एक पौष्टीक आहार भी रहते है। पुराने जमाने में (१५ वर्ष पूर्व भी) कई परिवार (कई श्रीवैष्णव परिवार भी) इस तरह चावल को सुरक्षित करते थे और अगले दिन सवेरे उसे वैसे ही अथवा दही में मिलाकर पाते थे। इस प्रथा कि यहाँ निन्दा कि गयी है। भगवान कृष्ण भगवद्गीता में समझाते है कि किसी को भी वह भोजन नहीं पाना चाहिये जो पहिले बना हुआ है जैसे रात के समय सवेरे का भोजन और सवेरे के समय रात का भोजन क्योंकि ऐसे भोजन बासी हो जाते है और हमारे सात्विक स्वभाव के लिये सही भी नहीं है। परन्तु आजकल लोगों को भोजन का कोई मोल नहीं है इसलिये जो भी बचा है उसे फेंक देते है – यह भी बहुत गलत है क्योंकि शास्त्र कहता है “अन्नं न निन्द्यत” (भोजन को व्यर्थ न करो)। इसलिये भोजन को नष्ट किये बिना हमें अधिक भोजन नहीं बनाना चाहिये और जब अधिक हो तो उस प्रसाद को जिसे जरूरत है उसे दे ताकी प्रसाद का अपमान न हो।
  • उस घर में रहना जहाँ विश्राम करते समय हाथ, पैर आदि में धागे बांधते है।  अनुवादक टिप्पणी: यह तो आजकल के जमाने कि चाल हो गयी है श्रीवैष्णव परिवारों में भी हाथ, पैर, गले आदि में धागे बांधते है जो कि देवतान्तर से सम्बंधित होता है। कभी लोग उसे हनुमानजी या वेंकटेश भगवान का कहते है। जो कुछ भी हो वह हमारे सम्प्रदाय के विरुद्ध है। श्रीवैष्णवों के लिये सबसे प्रमुख रक्षा कवच तो उनका ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक है। सामान्यतः जो श्रीवैष्णवों को धारण करना है वह है:
    • ब्राम्हण, क्षत्रीय और वैश्य के लिये यज्ञोपवित।
    • अरै नाण कयिरु (कटी सूत्र) – कमर में बाँधने का सूत्र (सभी के लिए अनिवार्य) – यह आवश्यक है क्यूंकि कौपिनम (कोवणम – कौपिन वस्त्र – परंपरागत भीतरी परिधान) इसमें अवश्य बंधा जाना चाहिए
    • रक्षाबन्धन – रक्षा कवच जो यज्ञ, दीक्षा आदि के समय बांधे जाते है। सामान्यत: सफेद या पीला रंग
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ भगवान के लिये जिन पात्र में प्रसाद बनता हो उस पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक न हो। सभी बर्तन को भगवान के चिन्ह से सजाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीमहद्योगी स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में यह बताते है कि “एन्नैयुम एन उदैमैयैयुं उन चक्करप पोरी ओट्रिक्कोन्डू” – आपके चक्र के चिन्ह को मेरे आत्मा और मेरी संपत्ति (शरीर, धन आदि) पर लगाए। यह सभी श्रीवैष्णवों का कर्तव्य है कि अपने सभी वस्तु पर भगवान का चिन्ह लगाये।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जो अभी तक भागवतों के चरण स्पर्श से पवित्र नहीं हुई है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम नडुविल तिरुवड़ी पिल्लै भट्टर और पिल्लै वानमामलै दासर के उदाहरण को आगे देख चुके है।
  • पाषण्डी जनों के जाने के पश्चात उस घर को पवित्र कर के ही वहाँ निवास करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ पशु को देवता का चिन्ह माना जाता है, बाधा है। पशुओं को गावों में विशेष चिन्ह से पहचानना एक सामान्य रिवाज है। यह स्पष्ट कर लेना की यह कोई देवतान्तर का चिन्ह नहीं है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ के लोग उन धार्मिक श्लोक का उच्चारण करते है जिन्हें हमारे पूर्वाचार्य नहीं गाते थे। वह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे सम्प्रदाय को सत सम्प्रदाय या शुद्ध सम्प्रदाय कहते है। हमारे पूर्वाचार्य आल्वारों के पाशुर, पूर्वाचार्यों के स्तोत्र, व्याख्या और रहस्य ग्रन्थों पर केन्द्रीत थे – यह सब देवतान्तर भजन, उपयान्तर निष्ठा आदि रहित है। हमारे आचार्यों द्वारा जो भी स्वीकार किया गया है, उसके अतिरिक्त कुछ भी करना चाहे वह आचार्यों/ आलवारों के कार्यों के अनुरूप हो अथवा न हो। इसलिए इस तरह के कार्यों में संलग्न होने से बचना ही उत्तम है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ तुलसी नहीं लगायी जाती, वह बाधा है। घर के भगवान के तिरुवाराधन के लिये अगर अपने घर में ही तुलसी लगायी जाये तो अच्छा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ दिव्य प्रबन्ध के पाठ के गान को न सुन पाये वह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: घर में भी हमें दिव्य प्रबन्ध, स्तोत्र पाठ, रहस्य ग्रन्थ आदि का पाठ नियमित रूप से करना चाहिये। इस तरह परिवार के सभी सदस्य भगवद गुणानुभाव और कैंकर्य कर सकते है।

५३) क्षेत्र विरोधीहमारी जो भूमि है, उस से सम्बंधित बाधाएं

 श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीअनंताल्वान स्वामीजी का बगीचा देखते हुए जो तिरुवेंकट भगवान के लिये बनाया गया है

इसे पिछले भाग का अविराम कहा जा सकता है। गृह विरोधी में किसी के तिरुमाली सम्बंधीत विषय को समझाया गया है। इस विषय का स्थान जहाँ तिरुमाली का निर्माण किया जाता है उसको बताया गया है। अनुवादक टिप्पणी: क्षेत्र का सामान्यता अर्थ है उपजाऊ भूमि। इसका एक और अर्थ कोई भी भूमि जो खेती, कृषी या अन्य काम के लिये प्रयोग होती है। पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में सामान्यतः गृह और क्षेत्र की चर्चा एक साथ होती है।

  • उस भूमि पर अपन स्वामित्व जताना जो देवतान्तरों की है, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ भूमि अन्य देवता या उनके मन्दिर के भी हो सकते है। श्रीवैष्णवों को उसका उपयोग स्वयं के लिये नहीं करना चाहिये।
  • उस भूमि को लेना जिस पर देवतान्तर का चिन्ह हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: देवतान्तर के कई चिन्ह है जैसे त्रीयाक पुण्ड्र, त्रीशुल, आदि। ऐसे चिन्ह के भूमि पर कभी भी समझौता करने से बचना चाहिये।
  • उस स्थान पर भूमि लेना जो भगवान को प्रिय नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले देखा गया है दिव्य देश, आल्वार/आचार्य अवतार स्थल, आदि भगवान को प्रिय है और हमें इन्हीं स्थानों पर भूमि लेनी चाहिये।
  • उस भूमि पर अपना कब्जा करना जो भगवान से चोरी/ छीनी गयी है, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ लोग मन्दिर कि भूमि आदि को चुरा लेते है। ऐसे भूमि से तो बचना चाहिये क्योंकि यह हमारे स्वरूप विरुद्ध है। ऐसे भूमि से अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।
  • दूसरों कि भूमि को चुराना/कब्जा करना बाधा है।
  • उस भूमि पर दावा करना यह सोचकर कि “यह मेरी भूमि है” बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह समझना चाहिये कि सब कुछ भगवान का है हमें तो केवल एक अवसर मिला है उस संपत्ति का उपयोग करने हेतु।
  • उस भूमि पर कब्जा करना जो आचार्य कि सेवा हेतु उपयोग में न आवें। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवेदान्ती स्वामीजी के जीवन में एक सुन्दर घटना बताई गयी है। एक बार जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने परिवार सहित कूरकुलोत्तम गाँव में थे तो श्रीवेदान्ती स्वामीजी के बगीचे को श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के कोई परिवारवालों ने नुकसान पहूंचाया। श्रीवेदान्ती स्वामीजी के गृह कार्य करनेवाले उदास होकर कुछ अपशब्द कह दिये। यह सुनकर श्रीवेदान्ती स्वामीजी उदास हो गये और अपने परिचारकों को समझाते हुए कहे कि यह बगीचा श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के संतुष्टी के लिये है न की नम्पेरुमाल के लिये है। इससे हम यह समझ सकते है कि हमारा धन सबसे पहिले आचार्य कैंकर्य हेतु उपयोग करना हैं।
  • उस भूमि पर कब्जा करना जो पूर्णत: भगवद, भागवत, आचार्य के लिये समर्पित न हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीअनंताल्वान स्वामीजी कि निष्ठा देख सकते है उन्होंने केवल श्रीरामानुज स्वामीजी कि आज्ञा सुनकर तिरुमला में भगवान वेंकटेश के लिये एक सुन्दर बगीचा और तालाब बनाया।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/05/virodhi-pariharangal-21.html

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