Monthly Archives: September 2017

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २२

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २१

५४) भोजन विरोधी – तदीयाराधन में बाधाएं

सामान्यत: भोजन अर्थात खाद्य पदार्थ प्रदान करना जिसे “भगवद तदीयाराधन” कहा जाता है। इस विषय में श्रीवैष्णव जो प्रसाद देते है और जो प्रसाद ग्रहण करते है, उनका भाव और इसके सम्बन्ध में जो मुख्य पहलु है उसे समझाया गया है। यहाँ सामान्यत: जो त्रुटियाँ होती है उसे दर्शाया गया है। मुख्य अभिप्राय यही है कि जो त्रुटियाँ है उसे पहचान कर ठीक कर ले। अनुवादक टिप्पणी: आज कल मुख्य समस्या यह है कि कई स्थानों पर सही तिरुवाराधन और भगवद भोग के बिना ही भागवत तदीयाराधन होता है। हर भोग को सबसे पहिले भगवान को अर्पण नहीं किया गया तो वह प्रसाद नहीं होता है। कई स्थानों पर भगवान को भोग लगाने में कई कठिनाईयां आती है परन्तु सही व्यवस्था कर यह देखना चाहिये कि पहिले भगवान को भोग लगे और उसके पश्चात तदीयाराधन मे सभी को प्रसाद दिया जाये।

  • जब कोई श्रीवैष्णव प्रेम से प्रसाद (भगवान को अर्पण किये गए भोजन का शेष) देते है तो उस प्रसाद में मात्रा, विशेषता, स्वाद आदि देखना बाधा है। हमें केवल प्रेम देखना चाहिये कि किस प्रेम से हमें प्रसाद दिया गया है और उसे स्वीकार कर पा लेना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता में भगवान स्वयं कहते है कि वे प्रेम से अर्पण किया हुआ सब (एक पत्ता, एक फूल, एक फल या जल) जो भी है उसे स्वीकार करते है, प्रसाद की विशेषता नहीं देखते। इसलिये हमें केवल जिस प्रेम से प्रसाद दिया गया है उसे देखना चाहिये।
  • भगवद प्रसाद का आदर न करना बहुत बड़ी बाधा है।
  • जब प्रसाद देनेवाला से कोई भूल हो जाये तो हमें अचंभित नहीं होना चाहिये कि “इस व्यक्ति को प्रसाद देने भी नहीं आता है” यह बाधा है। हमें प्रसाद देनेवाले व्यक्ति में कोई दोष नहीं देखना चाहिये।
  • इसके आगे प्रसाद देनेवाले से जो भूल हो सकती है उस पर ध्यान केन्द्रित करेंगे (जिससे उन त्रुटियों से बचा जा सकता है)। अपने लिये अलग और अन्य के लिये अलग प्रसाद बनाना बाधा है। अतिथि को हमारे बराबर या उससे भी ऊँचा सम्मान देना चाहिये।
  • घमण्ड से प्रसाद देना (कि मैं प्रसाद दे रहा हूँ) बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक बार श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी अपनी तिरुमला यात्रा में तिरुक्कोवलूर पहूंचे। तिरुमला के रास्ते में उन्होंने यह विचार किया कि वह अपने एक धनी शिष्य एण्णायिर्त्तु एच्चान के तिरुमाली में जायेंगे। यह सुनकर उस शिष्य ने श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के स्वागत कि भव्य तैयारी कि। श्रीरामानुज स्वामीजी एक ऐसी जगह पहुंचे जहाँ मार्ग दो भागों में विभाजित हो जाता है। उन्होंने मार्ग में किसी से उन दो रास्तों के विषय में पूछा। उसने कहा एक रास्ता एण्णायिर्त्तु एच्चान के तिरुमाली कि ओर जाता है जहाँ रजस गुणों वाले लोग जाते है और दूसरा रास्ता परुत्तिक्कोल्लै अम्मैयार के तिरुमाली के ओर जाता है जहाँ सात्विक गुणों वाले लोग जाते है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने उसी क्षण परुत्तिक्कोल्लै अम्मैयार के तिरुमाली में जाने का विचार किया। यह चरित्र पिल्लै लोकम जीयर द्वारा रचित रामानुजाचार्य दिव्य चरित्र में समझाया गया है। इससे हम यह समझ सकते है कि दूसरों का सम्मान करते समय हमें अहंकार को साथ नहीं जोड़ना चाहिये।
  • अतिथि स्वामी है और वह हमसे सेवा लेकर अपनी ही संपत्ति को स्वीकार कर रहे है यह विचार न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तैतरीय उपनिषद यह घोषणा करते है “अतिथि देवो भव:” – अतिथि (श्रीवैष्णवों) को भगवान के समान आदर देना चाहिये। भगवान सभी के स्वामी है – हम जो कुछ भी भगवान को अर्पण करते है उसके स्वामी वे स्वयं हीं है। जब श्रीवैष्णव पधारते है तो उन्हें वही सम्मान देना चाहिये। हमें यह विचार करना चाहिये कि जो भी हमारे पास है वह सभी अतिथि श्रीवैष्णव का है और वह बहुत करुणा से उसे स्वीकार करते है।
  • अतिथि को इस बात पर जांचना कि वह कितने प्रकार के पकवान पाता है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति सामान्य से अधिक पाता है तो उस व्यक्ति में हीन भाव नहीं रखना चाहिये।
  • अगर तदीयाराधन में कुछ कमी या गलती हो तो अतिथि को यह नहीं सोचना चाहिये कि “वह मुझे सही तरीके से भोजन नहीं पवा रहा है” – यह बाधा है।
  • यह सोचकर ग़ुस्सा करना कि हमें सही मान सम्मान नहीं मिला और प्रसाद का त्याग कर वहाँ से निकल जाना बाधा है।
  • अतिथि को बाहर मेहमानों के कमरे में बिठाकर प्रसाद पवाना और स्वयं अन्दर बैठकर प्रसाद पाना बाधा है। अतिथि को पूर्ण आदर देकर उनकी सेवा करनी चाहिये।
  • स्वयं पहिले पाना और तत्पश्चात अतिथि को परोसना बाधा है। हमें अतिथि को उनके संतुष्ट होने तक उनकी सेवा कर तत्पश्चात स्वयं पाना चाहिये।
  • जब हम अतिथि के साथ प्रसाद पाने के लिये बैठते है तब हमें अतिथि का प्रसाद पाकर उठने तक प्रतीक्षा कर फिर उठना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: तदीयाराधन के प्रारम्भ में कुछ श्लोक (आचार्य तनियन, देवराज अष्टकम, पूर्व/उत्तर दिनचर्या, वानमामलै जीयर प्रपत्ती/ मंगलाशासन आदि – मठ, तिरुमाली आदि पर निर्भर करके) का उच्चारण होता है और फिर भगवान का तीर्थ सभी को परिशेषणम (प्रसाद पाने के पूर्व अन्तरयामी भगवान को भोग लगाने कि एक साधारण क्रिया) के लिये देना। सभी श्रीवैष्णवों को इसे साथ में करना चाहिये। उसी तरह प्रसाद पाने के पश्चात भगवान का तीर्थ सभी को दिया जाता है और सभी वैष्णव इसे पाकर प्रसाद को सम्पन्न करते है। सभी वैष्णव एक साथ अपने हाथ को धोने के लिये उठते है। यह सामान्य प्रकिया है। तदीयाराधन के मध्य में उठना यह शिष्टाचार नहीं है।
  • अतिथि का इस बात से दुखी होना कि प्रसाद पवानेवाला स्वयं भीतर प्रसाद पाकर उसे प्रसाद बाहर पवा रहा है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह पहले चर्चा किये गए विषय से संबंधित है- यहाँ अतिथि के संदर्भ में समझाया गया है। अतिथि को इसे सामान्यतः लेना चाहिये और अपमान स्वरुप नहीं लेना चाहिए।
  • अतिथि का इस बात से घबराना कि प्रसाद पवानेवाला उसके पहिले ही प्रसाद पा लिया है, यह बाधा है।
  • अतिथि का यह सोचना कि प्रसाद पवानेवाला उसे छोड़कर उठकर चला गया। यह बाधा है।
  • प्रसाद पवानेवाले को करुणा से अतिथि को बड़े विनम्र शब्दों से बुलाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। जैसे पहिले कहा गया है, यहाँ अतिथि भी श्रीवैष्णव होना चाहिये।
  • प्रसाद पवानेवाला अवैष्णवों को प्रसाद पवाने में भी अत्यंत विनम्रता और आथित्य करता है जहाँ उसकी जरूरत नहीं है, यह बाधा है।
  • अतिथि का नाराज/क्रोध होना यह सोचकर कि प्रसाद पवानेवाला उससे विनम्र शब्दों से स्वागत नहीं किया, यह बाधा है।
  • अतिथि को इस बात से गर्व होना कि प्रसाद पवानेवाले ने उसका उदारता से स्वागत किया बाधा है।
  • अतिथि द्वारा मानवता नहीं दिखाना और यह अतिथेय से कहना कि “आपको मेरे लिए स्वागत करने कि आवश्यकता नहीं है”। यह बाधा है।
  • अतिथि से पहिले स्वयं तीर्थ ग्रहण करना बाधा है। बुनियादी तौर पर हमें अतिथि का प्रसाद होने तक प्रतिक्षा करनी चाहिये।
  • स्वयं पहिले पाकर, शेष अतिथि को देना बाधा है। पहिले अतिथि को पवाना फिर स्वयं पाना यह सभ्यता है। अत: पहिले स्वयं पाना और बचा हुआ अन्य को देना सदाचार नहीं है।
  • स्वतन्त्रता से अतिथि द्वारा प्रसाद पाना प्रारम्भ करना बाधा है। श्रीवैष्णव तदीयाराधन में कुछ श्लोक, आचार्य तनियन आदि पहिले गाया जाता है। तत्पश्चात भगवान का तीर्थ दिया जाता है जिसके प्रयोग से परिशेषणम किया जाता है। उसके पश्चात हीं हमें पाना चाहिये।
  • अगर कोई अतिथि सभी श्रीवैष्णवों के पाने के पश्चात आता है तो उसे इस बात से नहीं घबराना चाहिये कि यह बचा हुआ खाना है। ऐसा करना बाधा है।
  • श्रीवैष्णवों के साथ उनकी सच्ची निष्ठा को समझे बिना प्रसाद आदान प्रदान करना बाधा है। वह प्रसाद आचार्य निष्ठ श्रीवैष्णवों का शेष हो सकता है अथवा उन श्रीवैष्णवों द्वारा प्रदत्त हो सकता है जो अच्चार्य निष्ठा में स्थित है। जब कोई आचार्य अभिमानी होता है तो उसे ऐसे प्रसाद के प्रति बहुत अनुराग होता है। ऐसी निष्ठा होने के बावजुद ऐसे प्रसाद का त्याग करना अपचार है। (डॉ वी.वी.रामानुजम स्वामी) एक व्यक्तिगत अनुभव कह रहे है। २० साल पूर्व वे श्रीधनुर्दास स्वामीजी के तिरुमाली में कैंकर्य कर रहे थे। उस समय सिंगपपेरुमाल के मन्दिर में एक महा संप्रोक्षण किया गया था। तिरुमाली में एक बहुत बड़ा तदीयाराधन का आयोजन किया गया था। श्रीपेरेम्बूतूर से उनके एक प्रिय मित्र पधारे थे। उन्होंने उन्हें तिरुमाली में आकर प्रसाद पाने को कहा। परंतु उन्होंने यह कहकर कि “मैं धनुर्दास स्वामीजी के वंशज के यहाँ प्रसाद नहीं पाता” आना अस्वीकार किया। अनुवादक टिप्पणी: प्रमेय रत्न में श्रीकुरेश स्वामीजी और उनकी पत्नी आण्डाल अम्माजी से संबंधित एक घटना समझायी गई है। बहुत लम्बी यात्रा के पश्चात श्रीकुरेश स्वामीजी और अम्माजी घर को लौट रहे थे। दोनों थके हुए और भुखे भी थे। वें एक श्रीवैष्णव के तिरुमाली में आते है जो उन्हें रहने को एक स्थान और प्रसाद देता है। स्वामीजी अपनी अनुष्ठान कर प्रसाद पाते है परन्तु अम्माजी नहीं पाती है और स्वामीजी से कहती है “आप श्रीवैष्णव नाम और रूप देखकर उनका प्रसाद पा लिये। परन्तु हमें उनकी निष्ठा का पता नहीं है। इसलिये मैं अपने घर जाने तक इंतजार करूंगी”। यह सुनकर स्वामीजी अचंभित होते है और अम्माजी से कहते है “मेरी आप जैसी निष्ठा क्यों नहीं है? कृपया भगवान से प्रार्थना कीजिये कि मेरे में भी आप जैसी निष्ठा आ जाये”। यह अम्माजी कि निष्ठा और स्वामीजी कि नम्रता है।
  • श्रीवैष्णवों कि आचार्य निष्ठा देखकर प्रसाद न पाना बाधा है।
  • खराब हाथों से प्रसाद पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे हाथ मुह, नाक आदि अथवा अन्य कोई शरीर का निचला भाग को छुने से खराब हो जाता है। हमें तुरन्त अपने हाथों को पानी से धो लेना चाहिये।
  • बर्तन में प्रसाद पाना बाधा है, यद्यपि सभी को प्रसाद वितरण करने के लिए बर्तन का उपयोग करने कि विनती करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमें प्रसाद वितरण करने वाले पात्र में कभी भी प्रसाद नहीं पाना चाहिये। आजकल हम इस बुनियादी तत्व से पूर्णत: अज्ञान हो जाते है आज के संस्कृति के प्रभाव से जैसे खराब हाथों से पाना, मुख्य पात्र में प्रसाद पाना, गंदगी का ध्यान न देना आदि।
  • जैसे तिरुमालै के ४१ पाशुर में कहा गया है “पोनगम शेय्द शेडम तरुवरेल पुनिदम अन्रे”, अर्थात हमें जानना चाहिये कि श्रीवैष्णवों का शेष प्रसाद सबसे अधीक पवित्र और शुद्ध है। इसमें विश्वास न रखना बाधा है। यह श्रीभक्ताङ्घ्रिरेणु आल्वार के पवित्र शब्द है। शेष प्रसाद दो प्रकार के होते है – पाण्डा शेष (प्रसाद वितरण करने वाले पात्र में शेष) और पात्र शेष (श्रीवैष्णव द्वारा प्रसाद पाकर उस पत्ते पर शेष)। यहाँ आल्वार, पात्र शेष अर्थात – श्रीवैष्णव द्वारा पाए गए पात्र / पत्ते का शेष के विषय में कह रहे है। यह सुगमता से समझा जा सकता है कि इस शेष प्रसाद की महिमा में श्रद्धा उत्पन्न होना अत्यंत कठिन है (क्यूंकि सामान्यतः लोग दूसरों के द्वारा पाए गए प्रसाद के शेष को हीन भाव से देखते है)।  अनुवादक टिप्पणी: इस संदर्भ में, हमें स्मरण होना चाहिए -“मोर मुन्नार ऐयर” – वे जो प्रथम दद्ध्योधन से प्रसाद प्रारम्भ करते थे यह सोचकर की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा पाए गए अंतिम पकवान का स्वाद न बदले) – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य जो नियमानुसार उनके द्वारा पाए गए पत्ते में ही प्रसाद पाया करते थे। पूर्वाचार्यों के ग्रंथों के अनुसार उन्होंने 30 वर्षों तक ऐसा ही किया। अंततः वे सन्यासी होकर परवस्तु पट्टरपिरान जीयर नाम से प्रख्यात हुए।
  • जब श्रीवैष्णव प्रसाद का पात्र परोसने के लिये हाथ में लेते है उन्हें देखते रहना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह सेवा करने के लिये आगे बढ़ना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों को परोसने के लिये स्वयं ही प्रसाद के पात्र को हाथ में लेना चाहिये। ऐसा न करना बाधा।
  • तदीयाराधन के समय प्रसाद पवानेवाले को स्वयं अपनी पत्नी के साथ परोसना चाहिये नाकी अपने तिरुमाली के सेवको या सांसारिक जनों द्वारा, ऐसा न करना बाधा है।
  • प्रसाद पाने के पश्चात अतिथि को स्वयं अपना पत्ता उठाना चाहिये यह विचार करके कि यह एक श्रीवैष्णव कि तिरुमाली है जिसे बहुत सम्मान देना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • अगर घर के वैष्णव प्रसाद के पत्ते उठाने से मना भी करते है तो अतिथि को बल पूर्वक यह जिम्मेदारी लेकर पत्ते को उठाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • पत्ते को निकालते समय यह सावधानी रखनी चाहिये कि प्रसाद तिरुमाली में सभी जगह बिखरे नहीं।
  • अन्य श्रीवैष्णवों से आगे बढ़कर हाथ धोना बाधा है। हमें हमारा समय आने पर ही संयम से हाथ, पैर आदि धोना चाहिये।
  • अन्य श्रीवैष्णव द्वारा उपयोग किये हुए जल से हाथ, पैर आदि को धोने से हिचकिचाना बाधा है। हमें इसे अपना सौभाग्य समझना चाहिये।
  • उस स्थान को शुद्ध करना जहाँ श्रीवैष्णवों ने प्रसाद पाया है, बाधा है। उस स्थान को प्राकृतिक रूप से साफ किया जा सकता है जहाँ अन्य श्रीवैष्णव प्रसाद पायेंगे। मठ, तिरुमाली में यह सामान्यत: देखा जाता है कि श्रीवैष्णव प्रसाद पाने के पश्चात अन्य के लिये उस स्थान को गाय के गोबर से साफ किया जाता है।
  • भस्म से जगह को साफ करना बाधा है।
  • सावधान न होना और उस स्थान पर पैर रखना जहाँ श्रीवैष्णवों ने प्रसाद पाया है बाधा है।
  • अन्य श्रीवैष्णवों को दिये बिना पान, सुपारी और चुना पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तदीयाराधन के पश्चात पान, सुपारी और चुना पाना यह एक सामान्य प्रथा है।
  • अन्य श्रीवैष्णवों को देनेवाले पान पर स्वयं के पाये हुए शेष चुना लगाना बाधा है।
  • अतिथि का उन श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में त्रुटियाँ देखना जिन्होंने उन्हें तदीयाराधन करवाया, यह बाधा है।
  • अतिथि जो तदीयाराधन करानेवाले के हृदय को हानि पहूंचाते है वह बाधा है।-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/05/virodhi-pariharangal-22.html

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श्रीवैष्णव तिरुवाराधन प्राक्कथन

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुवाराधन

भगवान श्रीमन्नारायण अपनी निर्हेतुक कृपा से मंदिर, मठ, तिरुमाली में अर्चाविग्रह के रूप में अवतरित होते हैं। अर्चावतार तो भगवान की कृपा का अति उत्तम प्रकाशन है। विशेष रूप से हमारे तिरुमाली में विराजमान भगवान ही अति सुलभ हैं और उनकी सेवा अत्यंत सहज है। शास्त्र के नियमों के अनुसार भगवान की सेवा करने के इस विधि को तिरुवाराधन कहते हैं।

यह श्रीवैष्णवों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है। भगवान जो घर में विराजमान हैं, उनका ठीक ठीक ध्यान अवश्य रखना चाहिए। हमें हमारे घर के भगवान के प्रति आदर और प्रेम होना चाहिए। तिरुवाराधन की महिमा, तिरुवाराधन का क्रम, और तिरुवाराधन के प्रमाण ई-बूक में प्रकाशित किए गए हैं, जिनमें सभी जानकारी एकसाथ उपलब्ध है।

जैसे हम आगे देखेंगे, हमारे पूर्वाचार्योंने तिरुवाराधन को बहुत बड़ा महत्त्व दिया है। आज की गतिमान दुनिया में अनेक लोगोंके पास समय का आभाव है। परंतु कितनी भी व्यस्तता हो, सभी कार्योंसे समय निकालकर हमे थोड़ा समय उन भगवान के ध्यान, सेवा में देना चाहिए जो अपनी उच्चतम निर्हेतुक कृपा के कारण हमारे घर में अवतरित हुये हैं। भगवान का अपनी कृपा से हमारे घर में विराजमान होना, इस भाग्य का हम कोई मूल्य नहीं कर सकते। भगवान का प्रतिदिन तिरुवाराधन (कमसे कम दिन में एक बार) करके उन्हे थोड़ा प्रेम और समय देना इससे भगवान के उपकार का बदला चुकानेका दूसरा कोई मार्ग नहीं है। बस वही प्रतिदिन निष्ठा से सेवा करना यही प्रपन्न (शरणागत) का सच्चा स्वरूप है।

इस ग्रंथ के लिए श्री वरवरमुनी स्वामीजी लिखित “जीयर पड़ी”, एवं कांची श्री उभय वेदान्त प्रतिवादी भयंकरम अण्णङ्गराचार्य स्वामीजी लिखित “नित्यानुष्ठान पद्धति” मुख्य संदर्भ ग्रंथ का उपयोग हुआ है। दास श्री एरुम्बी वेंकटेश स्वामीजी का भी कृतज्ञ है जिन्होने उपरोक्त स्रोतोंका उपयोग करके प्रमाणम् का प्रथम प्रारूप बनाया।

भगवान, आल्वार, आचार्य और अस्मदाचार्य की निर्हेतुक कृपा से दास यह ईबूक समस्त श्रीवैष्णव समुदाय के सेवा में प्रेषित कर रहा है।

तिरुवाराधन की महिमा

श्रीवैष्णवोंके घरोंमें नित्या तिरुवाराधन के महत्त्व को प्रकाशित करना का विनम्र प्रयास इस लेख में कर रहे हैं। तिरुवाराधन तथा संध्यावंदन आदि वैदिक अनुष्ठान का महत्त्व दिनों दिन श्रीवैष्णवोंके घरों में कम होता जा रहा है। श्रीवैष्णवोंके लिए उभय वेद (संस्कृत वेद तथा द्रविड वेद) उच्चतम प्रमाण हैं तथा भगवान एक मात्र ही उपेय हैं।

भगवान श्रीमन्नारायण अपनी निर्हेतुक कृपा से अपने आपको पाँच स्वरूप में विस्तारित करते हैं। पर (श्री वैकुंठ में), व्यूह (वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, संकर्षण, और क्षीराब्धिनाथ), विभव (श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि), अंतर्यामी (हृदयस्थ परमात्मा), और अर्चाविग्रह। भगवान के पाँच स्वरूप के पूर्ण विवरण के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-parathvadhi.html इस लिंक पर क्लिक करें। इन पाँच अवतारों में से अर्चावातार भगवान सबसे अत्यंत कृपालु हैं । अर्चावतारोंमें भी हमारे घर में विराजने वाले अर्चा भगवान सबसे अधिक कृपालु हैं । प्रत्येक श्रीवैष्णव का मुख्य कर्तव्य है की वह अपने घर के अर्चा भगवान की सेवा सुचारु रूप से करे।

श्रीवैष्णव बनते समय हम आचार्य से पंचसंस्कार (समाश्रयण) ग्रहण करते हैं। समाश्रयण का अर्थ है शुद्धिकरण प्रक्रिया – वह प्रक्रिया जिससे एक अनधिकृत व्यक्ति को भगवान की सेवा कैंकर्य करनेका अधिकारी बनाया जाता है।

https://srivaishnavagranthamshindi.files.wordpress.com/2017/09/df985-pancha-samskaram.jpg

श्री रामानुज स्वामीजी को पंच संस्कारित करते हुये श्री महापूर्ण स्वामीजी

हम पंचसंस्कार को निम्नलिखित  प्रमाण “ताप: पुण्ड्र: तथा नाम: मंत्रो यागश्च पंचम:” (अर्थार्थ  “ताप, पुण्ड्र:, नाम:, मंत्र, याग यह पाँच संस्कार हैं) समझते हैं । पंचसंस्कार के दौरान होने वाली पांच क्रियाएँ हैं:

ताप: बाहुमूल में तप्त शंख चक्र को अंकित किया जाता है।

पुण्ड्र: शरीर के १२ भागों पर पासा और श्रीचूर्ण द्वारा ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण कराया जाता है।

नाम: आचार्य द्वारा एक नया दास्य नाम दिया जाता है (उदा. रामानुजदास, मधुरकविदास, श्रीवैष्णवदास, ई.) जिससे हमारा भगवान/आचार्य के साथ संबंध स्थापित होता है।

मंत्र: आचार्य से परम गोपनीय मंत्र मंत्रोपदेश द्वारा प्राप्त होता है। इस मंत्र के जप से संसार बंधन से छुटकारा मिलता है। मंत्र तीन होते हैं: मूल मंत्र, द्वय मंत्र, और चरम श्लोक।

याग: भगवान की सेवा (तिरुवाराधन) का क्रम सिखाया जाता है।

हमारे पूर्वाचार्यों के अनुसार पंच संस्कार से दो धेय्य प्राप्त होते हैं।

  • तत्व ज्ञानान मोक्ष लब्ध:” भगवान का ज्ञान प्राप्त होनेपर जीव को मोक्ष मिलता है। आचार्य द्वारा शिष्य को रहस्यत्रय (मूलमन्त्र, द्वय मन्त्र, चरम श्लोक का रहस्यार्थ) की शिक्षा के द्वारा अर्थ पंचक के विषय मे ज्ञान प्राप्त होता है (अर्थ पंचक: परस्वरूप – भगवान, स्वस्वरूप – जीवात्मा,   उपायस्वरूप – भगवान को प्राप्त करने का उपाय, उपेयस्वरूप – जीवन का लक्ष्य, विरोधी  स्वरूप –  भगवतप्राप्ति में बाधाएँ)। उपरोक्त ज्ञान प्राप्त होनेपर जीव परम लक्ष्य (श्री वैकुंठधाम में श्रिय:पति भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्त होना) के प्राप्ति का अधिकारी बनजाता है।
  • जबतक इस शरीर में प्राण है, तबतक भगवान, आचार्य तथा भागवत का कैंकर्य करना। वर्तमान परिस्थिति में प्रत्येक व्यक्ति बहुत सुलभता और सहजता से भगवान के अर्चाविग्रह की सेवा कर सकता है (मुख्य रूप से घरमें तिरुवाराधन द्वारा और दिव्य देशों में कैंकर्य के द्वारा) ।

इस लेख में हम विविध प्रमाणोंको देखेंगे जो प्रत्येक श्रीवैष्णव के घर में दैनिक तिरुवाराधन के महत्त्व को दर्शाते हैं।

वर्तमान की दुखदायी परिस्थिति है की अनेक श्रीवैष्णवोंके घरों में तिरुवाराधन क्वचित ही हो रहा है। कई घरोमें ऐसा देखा जाता है की वहाँ पर शालिग्राम भगवान होते हुए भी वें पूर्णत: दुर्लक्षित हैं। अनेक जन इतने व्यस्त होगये हैं की उन्हे इस बात का विस्मरण होगया है की हमारे दुराचरण को ना देखते हुये साक्षात भगवान हमारे घर में अवतरित हुए हैं और विराज रहे हैं, इतने सुलभ हैं भगवान।

तिरुवाराधन क्रम का उचित ज्ञान ना होना और तिरुवाराधन का महत्व नहीं पता होना यह तिरुवाराधन ना होने के मुख्य कारण हैं।

निम्नलिखित अनुभागों में वेद, इतिहास, पुराण, श्रीमद्भगवद्गीता, दिव्य प्रबंध, पूर्वाचार्योंके अनुष्ठान/उपदेश/सूक्तियाँ और रहस्य ग्रंथ आदि में उल्लेखित तिरुवाराधन की महिमा को बताया गया है।

वेद:

जो वेदों को प्रमाण मानते हैं उन्हे वेदोंके निर्देशोंका पालन अवश्य करना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में कुछ अपवाद छोडकर बाकी सभी जनोंने बहुत से आचार विचार अनुष्ठान छोड दिये हैं। परंतु वेदोंके अनुसार सभी वैदिक जनोंको पंचकाल परायण होना आवश्यक है जिसमे दिन के पाँच करके प्रत्येक भाग में विशिष्ट कार्य किया जाता है। सम्पूर्ण दिवस मुख्य रूप से मध्यभाग के तिरुवाराधन पर केन्द्रित होता है। दिन के पाँच भाग हैं –

  • अभिगमन: ब्रह्ममुहूर्त (लगभग प्रात: ४ बजे) के पूर्व निद्रा से जगना। प्रातर्विधि, दन्तधावन, स्नान, संध्यावंदन करना इत्यादि ।
  • उपादान: तिरुवाराधन मे उपयोग होने वाली सामग्री एकत्रित करना।
  • इज्या (याग): एकत्रित किए हुये सामग्री का उपयोग करके तिरुवाराधन करना।
  • स्वाध्याय: अपने वर्ण अनुसार वेद और दिव्य प्रबंधोंका अध्ययन/अध्यापन करना।
  • योग: ध्यान द्वारा हमारा मन भगवान पर केन्द्रित करना।
  • यहाँ ईज्या का अर्थ है भगवान की तिरुवाराधन सेवा, जो हर श्रीवैष्णव को अपने घर के भगवान के लिए करना आवश्यक है। तिरुवाराधन के साथ हम भगवान के बारे में जानने का प्रयत्न करते हैं तथा उनकी लीलाओं का स्मरण भी करते हैं।
  • केवल पंच संस्कारों से शुद्ध होने के बाद ही किसी को तिरुवाराधन करने का अधिकार प्राप्त होता है।
  • श्री पेरियावाचान पिल्लै स्वामीजी ने पेरुमाल तिरुमोळि व्याख्यान में १.७ पाशुर – “मरम तिगलुम …” में “इरु-मुप्पोलुदु” (अर्थार्थ २+३ काल) को पंचकाल का वर्णन बताया है।

 

इतिहास/पुराण – उपब्रह्मण – जिनसे हम वेदों कों समझ सकते हैं।

श्री रामायण में भगवान श्रीराम स्वयं अपने कुलधन/कुलदेव श्री रंगनाथ (उस समय श्री नारायण नाम से संबोधित होते थे) की तिरुवाराधन सेवा करते हैं। श्री रंगनाथ (श्री नारायण) प्रथम श्री ब्रह्माजी से सेवित थे। तत्पश्चात् श्री रंगनाथ भगवान की सेवा रघुवंश के राजाओं के द्वारा (इक्ष्वाकू से श्रीराम तक) हुयी। श्री रामायण का श्लोक “सहपत्न्या विशालाक्ष्या नारायणं उपागमतु” में वर्णन है की कैसे श्री सीता अम्माजी भी भगवान श्री राम को तिरुवाराधन में सहायता करती थीं।

विभीषण जी को श्री रंगनाथ भगवान के अर्चाविग्रह को प्रदान करते हुये श्री रामचन्द्र भगवान

पूराणों में भी, तिरुवाराधन का महत्त्व कई जगह बताया गया है।

श्रीमद् भागवत में यह श्लोक है जिसमें श्री प्रह्लाद महाराज के कुछ उपदेश इस तरह दर्शाये गये है –

श्रवणम् किर्तनम् विष्णो: स्मरणम् पाद्यसेवनम् ।

अर्चनम् वंदनम् दास्यम् सख्यम् आत्मनिवेदनम् ॥

इस श्लोक में भगवान की पूजा के अलग अलग प्रकार बताये गये है। इसमें से बहुत सी विधीयाँ तिरुवाराधन के हि अलग अलग अंग है। श्रीभगवान का नाम लेना, उनकी अर्चना करना, उनके गुणों का गुणगान करना और ऐसे बहुत सारे साधन है जो तिरुवाराधन का एक अंग है।

गरुड पुराण में, भक्त की आठ विशेषता बताते हुए भगवान ने स्वयं कहा है कि –

मद् भक्त जन वात्सल्यम्, पूजायाम् अनुमोदनम्, स्वयं अपि अर्चनम् चैव …

यहाँ दो महत्त्व कि बात है “पूजायाम् अनुमोदनम्” – जब कोई दूसरा मेरी पूजा आराधना करता है उसे देख खुश होता है। और “स्वयं अपि अर्चनम्” – वह जो स्वयं मेरे पूजा आराधना करता है। आचार्य हृदय के ८५वें चूर्णिकै में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसकी व्याख्या करते है। ऐसे बहुत से प्रसंग हमें इतिहास में देखने को मिलते है।

श्रीमद्भगवद गीता – श्रीकृष्ण के मुख से वाणी

गीता के बहुत से श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण ने तिरुवाराधन का महत्त्व बताया है।

दो बार कहते हैं – “मन्मना भव मद्भक्त: मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसी युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ” ॥ ९.३४ ॥

उन्होंने कहा है कि – जो उनकी पूजा करता है,  भक्ति करता है, सदैव स्मरण करता है और खुद को भगवान के कार्य में रखता है।

हमारे पूर्वाचार्य ने भी यही बताया है कि “ये यथा माम प्रपद्यन्ते ताम्स तथैव भजामि अहम ”। इस श्लोक से सूचित होता है कि “भगवान अपने भक्त के इच्छानुसार अवतार लेकर उसकी पूजा स्वीकार करते हैं । यही अर्थ “तमर उगंधदु एव्वुरुवं अव्वुरुवम दाने ” (मुदल तिरुवंदादि) पाशुर से प्रकाशित होता है ।

भगवान गीताजी के ९.२६ श्लोक “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति: । तदहं भक्त्युपहृतम श्रामि प्रयतात्मन: ॥” में कहते हैं कि जो प्रेम से एक तुलसीदल, फूल, फल, जल मुझे अर्पण करता है मैं उसे ग्रहण कर लेता हूँ। अगले श्लोक में “यत्करोषि यद श्रासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्याषि कौंतेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ ९.२७ ॥ ” कहते हैं कि आप जो भी करते हो वह मुझे अर्पण समझकर करो। यह सब हमारे तिरुवाराधन क्रम के स्वाभाविक भाग है और यह भगवान के सबसे उदार स्वभाव को बताता है। कैसे भक्तिभाव से अर्पण किए हुए किसी भी वस्तु को भगवान ग्रहण कर लेते है।

वह आगे और कहते हैं “यज्ञशिष्टाशिन: ….” श्लोक ३.१३ में कि जो अन्न खुद के आनंद के लिए बनाते है, भगवान को भोग लगाये बिना खाते हैं वह पाप है। भगवान ने कहा है कि तुम्हें सिर्फ प्रसाद पाना है – उसके सिवा कुछ भी नहीं पाना है। याग तिरुवाराधन है और अनुयाग प्रसाद ग्रहण करना है।

दिव्य प्रबन्ध जो हमारे लिये अति महत्त्वपूर्ण है, इसमें कई पाशुर हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रीतीसे तिरुवाराधन विधि के विषय में बताते हैं, जो भगवान कि सरल पूजा विधी है।

तमर उगंधदु एव्वुरुवं (मुदल तिरुवंदादि)

श्रीमहद्योगी स्वामीजी ने बहुत सुन्दर रीतिसे भगवान के उन अवतारों और गुणों का वर्णन किया है जिनमें उनके भक्त उन्हें देखना चाहते है। पूर्वाचार्यों के जीवन से बहुत सारे प्रसंगों को चुना है।

चुट्टु नन मालैगल – तिरुविरुत्तम में नित्यसूरीयों द्वारा तिरुवाराधन।

तिरुविरुत्तम में श्रीशठकोप स्वामीजी ने परमपदधाम में नित्यसूरीयों द्वारा तिरुवाराधन के विषय में जानकारी प्रदान की है। इस पाशुर में उन्होंने कहा है कि जब नित्य सूरी भगवान को धूप सेवा करते है तब भगवान उस धूप में ढक जाते हैं और उन्हें वहाँ से चुपके से  लीलाविभूति जाने का अवसर मिलता है।

  • इस लीलाविभूति में भगवान कृष्ण बनकर आते हैं
  • माखन चोरी करने में व्यस्त हो जाते हैं और जितना हो सके उतना पा लेते हैं और
  • नीला देवी के संग विवाह करने हेतु सात सांडों को मारते हैं ।
  • उनके मनपसन्द कुडक कूत्तु नृत्य करते हैं (हाथों, सिर में मटका और कमर में मृदंग)।
  • और फिर वापस परमपदधाम में आकार विराजमान हो जाते है जैसे कुछ हुआ हीं नहीं है।

“परिवथिल ईसनैप पाड़ी” (तिरुवाईमोलि)

तिरुवाईमोलि में श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान के ‘स्वारातत्व गुण’ (भगवान के सहजतासे पूजे जानेवाले गुण) का वर्णन करते हैं । ईडु व्याख्या में श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदांती स्वामीजी के सुन्दर वार्ता पर प्रकाश करते हैं जहां श्रेपराशर भट्टर स्वामीजी कहते हैं कि भगवान को कोई सा भी पुष्प अर्पण किया जा सकता है। वह एक स्थान पर यह भी कहते हैं कि कुछ पत्ते लाकर उसे जलाओं तो भगवान उस सुगन्ध को भी स्वीकार करेंगे।

यहाँ एक और मुख्य बात कही गयी है – कि इतर देवता हमसे कठीन कार्य की अपेक्षा करते हैं जैसे की मुझे एक बकरा बली में चढ़ाओ “अाठ्ठै अरुत्तु ता” या मुझे एक बालक की बली चढ़ाओ “पिल्लैक करि ता ”। परन्तु भगवान श्रीमन्नारायण अपने भक्तों से केवल प्रेम पूर्वक समर्पण की अपेक्षा करते हैं ।

चैय्या तामरैक कण्णन पदिगम  (तिरुवाईमोलि)

यह पाशुर पूर्णत: घर के अर्चाभगवान का वैभव वर्णन करता है। श्रीशठकोप स्वामीजी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अपने घर के अर्चा भगवान सबसे अद्भुत अवतार हैं । श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य अनुभावों को तिरुवाईमोलि नूत्तंदादी के २६वें पाशुर “एयिदुम अवरक्कु इंनिलत्तिल अर्चावतारम एलिदु ” दर्शाते हैं । इस जगत में हम सब के लिये अर्चावतार भगवान सबसे सुलभ हैं ।

तेरित्तू एलुदि वाचित्तुम केट्टुम वणाँगी वलिपट्टुम पूसित्तुम पोक्किनेन पोदु   (नान्मुगन तिरुवन्दादि)

यह श्रीभक्तीसार स्वामीजी की दिनचर्या है। वो स्वयं कहते हैं कि वो कैसे अपना दिन व्यतीत करते हैं – पढ़ना, लिखना, सीखना और भगवान कि सेवा करना।

पूर्वाचार्यों के अनुष्ठान, उपदेश और वार्ताएं


अनेक आचार्यों ने स्वयं अपने तिरुमाली के भगवान से भी बढ़कर दिव्यदेश के भगवान, आल्वार, आचार्यों का तिरुवाराधन किया है।

  • श्रीनाथमुनि स्वामीजी:- कात्तुमन्नार कोयिल में यह कहा गया है कि श्रीनाथमुनि स्वामीजी स्वयं भगवान का तिरुवाराधन करते थे।
  • श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजी के व्यक्तिगत भगवान के श्रीविग्रह कि सेवा का कैंकर्य स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी ने प्रदान किया।
  • तिरुवाईमोलि पिल्लै और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दोनों ने आल्वार तिरुनगरी में भविष्यदाचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी कि तिरुवाराधन किया है।

 

उपदेश

  • श्रीरामानुज स्वामीजी ने संस्कृत में “नित्य ग्रन्थ” कि रचना की है जिसमें तिरुवाराधन का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह श्रीरामानुज स्वामीजी के नव रत्न में अंतिम रत्न है।

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने तमिल में “जीयर पड़ी” कि रचना कि है जिसमें तिरुवाराधन का वर्णन है जो श्रीरामानुज स्वामीजी के ग्रन्थ की तुलना में छोटा है।

उपरोक्त आचार्यों द्वारा अनुष्ठान और उपदेश हम श्रीवैष्णवों के पालन के लिये है।

वार्ताएं  

कई ऐसी घटनाएं हैं जहाँ पूर्वाचार्यों ने पालन कर तिरुवाराधन कि महत्वता को बताया है।

श्रीरामानुज स्वामीजी और वंगी पुरत्तु नम्बी

पेरिया तिरुमोलि ६.७.४ – पेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान – इस पाशुर में श्रीपरकाल स्वामीजी भगवान कृष्ण का वर्णन करते हैं कि बालकृष्ण भगवान जैसे ही माखन चोरी करते समय पकड़े जाते यशोदा मैय्या से डरकर स्वयं रोना प्रारम्भ कर देते। इस संदर्भ में एक सुन्दर घटना समझायी गयी है। श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी से तिरुमाली में तिरुवाराधन क्रम सिखाने कि विनती करते हैं । श्रीरामानुज स्वामीजी अपने व्यस्थता के कारण समय देकर यह सिखाने में असमर्थ थे। परन्तु एक बार श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के अनुपस्थिति में श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी और श्रीहनुमत दासर को तिरुवाराधन सिखाने लगे। उसी समय श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी पधारते हैं और उन्हें देखकर भावविभोर हो जाते हैं । श्रीरामानुज स्वामीजी कहते हैं – “इतने समय तक मुझे शंखा थी, परन्तु अभी मैं समझ रहा हूँ कि भगवान होकर भी बालकृष्ण माखन चोरी करते समय पकड़े जाने पर क्यों डर गये थे। मैं अभी उसी अवस्था में हूँ। जब तुमने विनंती की थी तब मैंने तुम्हें नहीं पढ़ाया परन्तु कुछ कारण वश इन लोगों को वही पढ़ा रहा हूँ। हालांकि मैं आचार्य हूँ और तुम शिष्य हो अत: मुझे तुमसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे ऐसे कार्य के लिये मुझे तुमसे डर लग रहा है”।

भट्टर – सोमाशियाण्डान

एक बार श्रीसोमाशियाण्डान ने श्री भट्टर स्वामीजी को तिरुवाराधन की विधी सिखाने को कहा । तब श्रीभट्टर स्वामीजी ने उन्हें बहुत विस्तार से वह विधी सिखायी। फिर एक दिन जब श्रीसोमाशियाण्डान श्रीभट्टर स्वामीजी के तिरुमाली में पधारे तो उन्होंने देखा की श्रीभट्टर स्वामीजी के लिये जो केले के पत्ते पर परोसा हुआ था उसे ग्रहण करने हेतु वे तैयार थे। तभी श्रीभट्टर स्वामीजी ने उनके एक शिष्य को बुलाकर उनके नित्य आराधन के भगवान को वहाँ लेकर आने को कहा और उनको भोग लगाकर श्रीभट्टर स्वामीजी ने प्रसाद पाना प्रारम्भ किया। यह देखकर श्रीसोमाशियाण्डान ने श्रीभट्टर स्वामीजी से पुछा कि उनको बतायी हुयी विधी तो बहुत विस्तृत है। तब श्रीभट्टर स्वामीजी ने कहा उन्होंने श्रीसोमाशियाण्डान को जो भी सिखाया है वह उनके लिये कम हीं है। इसका गूढ अर्थ यह है कि अगर श्रीभट्टर स्वामीजी अपने मन कि परिस्थिति के लिये असल तिरुवाराधन प्रारम्भ करें तो वों पिघल जाते परन्तु श्रीसोमाशियाण्डान के लिये जो भी सिखाया गया वह छोटा है क्योंकि उन्हीं लम्बे सोम यज्ञ करने का अनुभव है।

एरुम्भी अप्पा – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

  • जब श्रीएरुम्भी अप्पा श्रीरंगम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के यहाँ शरण लेने पधारे उस समय वहां से बहुत सुन्दर कालक्षेप, आदि सुनकर आये परन्तु अपने तिरुमाली जाने से पहिले श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का प्रसाद लिये बिना चले गये। वहाँ से अपने तिरुमाली मे आने के पश्चात उनके तिरुवाराधन भगवान (श्रीराम) ने उनका द्वार खोलने की अनुमति नहीं दी और उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पास जाने का आदेश दिया।
  • पूर्व और उत्तर दिनचर्या में श्री एरुम्भी अप्पा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के तिरुवाराधन कि बड़ाई करते है।

रहस्य ग्रन्थ

कई जगह पर तिरुमाली के भगवान कि चर्चा विशेषकर रहस्य ग्रंथों में की गयी है।

मुमुक्षुपडी
द्वय प्रकरनम – सूत्र १४१ – इवैयेल्लाम नमक्कु नम्पेरुमाळ पक्कलिले काणलाम इस व्याख्या में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि सभी दिव्य गुण (वात्सल्य, स्वामित्व, सौशील्य, सौलभ्य, ज्ञान, शक्ति, आदि) हमारे भगवान में हैं।

टिप्पणी: हालाकी सामान्यता भगवान श्रीरंगनाथ को कहते है परन्तु इस सन्दर्भ में सभी अर्चा अवतार (हमारे तिरुमाली के भी) के लिये कहा गया है।

आचार्य हृदय

चूर्णिकै ७५ – वीटिंबा इंबप पाक्कलिल द्रव्य भाषा निरूपणम समं इंबमारियिल आराइच्चि – इस व्याख्या में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है कि वीटिंबं  का अर्थ है अर्चा अवतार भगवान जो उनके  तिरुमाली में है जिनके हृदय और सोच केवल भगवान में स्थित है। यह विशेषकर तिरुमाली के अर्चावतार के महिमा को दर्शाता है।

अन्तिम निर्णय

उपर दिये हुए ग्रन्थ में से जैसे कि वेद, इतिहास, पुराण, दिव्य प्रबन्ध, पूर्वाचार्यों के ग्रन्थ, अनुष्ठान, उपनिषद और विविध रहस्य ग्रन्थ हमें तिरुवाराधन का कितना महत्त्व है यह पता चलता है। यह श्रीवैष्णवों का कर्तव्य है कि वह अपने दिनचर्या में थोड़ा समय अपने तिरुमाली के अर्चावतार के तिरुवाराधन के लिये व्यतीत करें। और तिरुवाराधन के पश्चात प्रसाद ग्रहण करें। (सिर्फ भगवान को भोग लगाने के बाद हीं हर वस्तु को ग्रहण करें)।

हमारे पूर्वजों ने यह कहा है कि तिरुवाराधन का क्रम हमें अपने आचार्य से भलीभाँती सिखाना चाहिए। आजकल तो बहुत सारी ग्रन्थ भी प्राप्त होते है जिसमें तिरुवाराधन का क्रम सरल रीतीसे बताया गया है। उनका भी उपयोग कर सकते है।

प्रेमभाव से प्रतिदिन तिरुवाराधन करके हम भगवान कि निर्हेतुक कृपा को जान और प्राप्त कर सकते हैं ।

पुराने जमाने कि एक रीती अनुसार एक बार भगवान कि तिरुवाराधन समाप्त होने के पश्चात प्रसाद पहिले भागवतों को तदियाराधन रूप में पवाया जाता है। वों जो यात्रा में जाते हैं इसी तदियाराधन पर निर्भर रहते हैं और श्रीवैष्णव अपने तिरुमाली में प्रतिदिन अर्पण करते थे। परन्तु आजकल यह बहुत कम देखने को प्राप्त होता है। जब भी मौका प्राप्त हो हम इसे कर सकते है।

तिरुवाराधन की विधी

तैयारी

  • सिर के उपर से स्नान करना।
  • ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करना – १२ स्थानों पर ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक धारण करना (गुरु परम्परा के श्लोक का अनुसंधान करना, आचार्य तनियन, द्वादश नाम दोनों भगवान और अम्माजी के)।
  • संध्या वन्दन।
  • माध्यांहिकम (दिन के समय पर निर्भर होना) – तिरुवाराधन दोपहर के समय करना चाहिये, परंतु आजकल के समय यह यथार्थ में संभव नहीं है। हम अधीक से अधीक शास्त्र का नियम पालन कर सकते हैं और जहाँ नहीं कर पाते वहाँ भगवान से क्षमा याचना कर सकते हैं ।
  • पञ्च पात्र के पात्रों कि तैयारी करना, धूपम, दीपम, पुष्प, तीर्थ, सुगंधीत पावडर, आदि कि तैयारी।
  • आचार्य श्रीपादतीर्थ – आचार्य के चरण पादुका अथवा तिरुवड़ी वस्त्र (एक वस्त्र पर आचार्य चरणों के चिन्ह) हमेशा साथ में रखना चाहिये जो हमारे तिरुवाराधन का एक क्रम है। गुरु परम्परा मंत्र का अनुसंधान करते हुए हम श्रीपादतीर्थ अथवा तिरुवड़ी ले सकते हैं । यह तिरुवाराधन का बहुत मुख्य भाग है।
  • तिरुमाली के सभी भागवत तिरुवाराधन के विविध कैंकर्य में भाग ले सकते हैं । जैसे पुष्पमाला तैयार करना, उस स्थान कि सफाई करना जहां तिरुवाराधन किया गया हो, प्रसाद बनाना, आदि।

 

क्रम

पात्र और उनके उपयोग

  1. अर्घ्य पात्र – भगवान के श्रीहस्थ प्रक्षालन के लिए।
  2. पाद्य पात्र – भगवान के श्रीचरण प्रक्षालन के लिए।
  3. आचमनीय – भगवान के श्रीमुख प्रक्षालन के लिए।
  4. कंदूषम (भगवान के श्रीमुख कुल्ला करने के लिए जल), स्नानीय (भगवान के तिरुमंजन के लिए जल), मधुवर्गं (मधु अर्थात शहद इ.), पानीय (भगवान को पिलाने के जल लिए), कंदूषम (क्रम के अनुसार हर आसान के लिए ) ।
  5. सर्वार्थतोय (शुद्धोदक) – भगवान को समर्पित किये जाने वाली हर वस्तु को पवित्र/शुद्ध करने के लिए ।
  6. प्रतीग्रह (पतितपावनी) – हर उपचार के बाद जल डालने के लिए पात्र ।
  7. आचार्य के तीर्थ के लिए ।
  8. तिरुक्कावेरी – भगवान के लिए शुद्ध जल भरकर रखने के लिए पात्र ।

तिरुवाराधन का एक मुख्य पहलू यह है कि, हमको यह बात को सदा स्मरण रखना चाहिये कि हमारे आचार्य हीं भगवान कि सेवा कर रहे हैं और हम तो आचार्य के हाथों का एक उपकरण हैं – यह सब आचार्य हमारे हाथों से करवा रहे हैं।

हमारे पूर्वज हमें यह कह गये हैं कि पहिले हमें उसी पद्धती से आचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी (और अन्य आल्वार), श्रीविश्वक्सेन (और श्रीतिरुवनन्त्लावन, श्रीगरुडजी, श्रीसुदर्शनजी, श्रीपाञ्चजन्यजी) इन सब कि सेवा के पश्चात भगवान और अम्माजी कि सेवा करनी चाहिये। उदाहरण के लिये अर्ध्य, पाद्य, आचमनी पहिले आचार्य से प्रारम्भ कर अन्त में भगवान का करना चाहिये। आचार्य के सेवा के लिये अलग से पात्र होना चाहिये। श्रीभोग, श्रीपुष्प, श्रीचन्दन, आदि पहिले भगवान को अर्पण कर फिर आल्वार, आचार्य और अन्त में अस्मदाचार्य।

यह विधी सरल पद्धती से निम्न रीतीसे समझायी गयी है। यह शायद पूर्ण न हो और यह प्रत्येक तिरुमाली, परिवार, दिव्य देश, आदि में अलग हो सकता है। सभी अपने परिवार के बड़ों से अपने परिवार कि रीति जान सकते हैं। परन्तु यह हमें एक तिरुवाराधन क्रम का एक भाव बता देता है और जो योग्य है उसे करने में वह इसका पालन कर सकता है।

  • सभी तैयारी होने के बाद, यह श्लोक बोलते हुए तुलसी लाना “तुलस्यमृत जन्मासी”।
  • दिया लगाना – सामान्य तनियन, वैय्यम तग़लिया, अंबे तग़लिया, एवं थिरूक्कंडेन पाशुर बोलना।
  • पंचपात्र कि तैयारी करना।
  • तिरुकावेरी में (तीर्थ का पात्र) तीर्थ बनाना।
  • द्वय मन्त्र का उत्तर वाक्य बोलते हुए (श्रीमते नारायण नम:) – तीर्थ और तुलसी लेकर, तीर्थ से सभी पुजा सामाग्री पर संप्रोक्षण करना।
  • अन्य सभी पात्र में तीर्थ मिलाना।
  • धीरे से दोनों हाथों से ताली बजाकर भगवान का उत्थापन करना और यह श्लोकों/पाशुरों का अनुसंधान करना कौशल्या सुप्रजा श्लोक, कुर्माधीन दिव्य लोकान श्लोक, नायगनाइ निँर नन्दगोपनुडैया, मारी मलै मुलाईन्जिल, अन्रू इववूलगम अलंदान एवं अँगनमा न्यालत्तु अरसर।
  • पूर्ण भाव से साष्टांग दण्डवत करना।

हर आसन के प्रारम्भ में तिरुकावेरी से शुद्ध जल लेकर हर वट्टिल में संकल्प के साथ डालना चाहिये। अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय, आदि करने के पश्चात भगवान के मुख को शुद्ध वस्त्र से पोंछना चाहिये।

मन्त्रासन – भगवान को तिरुवाराधन के लिये आवाहन करना

पहिले दिन के पुष्प को निकालना – “उडुथुक कलैन्दा” पाशुर का गान करना।

  • अर्घ्य देना (भगवान के श्रीहस्थ प्रक्षालन के लिए), पाद्य (भगवान के श्रीचरण प्रक्षालन के लिए), आचमनीय (भगवान के श्रीमुख प्रक्षालन के लिए) – यह करते समय ॐ अर्घ्यम समर्पयामि, ॐ पाद्यम समर्पयामि, ॐ आचमनीय समर्पयामि का अनुसंधान करना चाहिये या तिरुक्कैगल विळक्कियरूला वेन्डुम, तिरुवडिगल विळक्कियरूला वेन्डुम, आचमनं कंदरुला वेन्डुम का अनुसंधान करना चाहिये।
  • सभी १०८ दिव्य देश के भगवान को तिरुवाराधन के लिये आमंत्रित करना।
  • इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि यह तिरुवाराधन हमारे आचार्य हमारे हाथों से करवा रहे हैं । हम स्वयं आचार्य के हाथ हीं हैं ।

स्नानासन – भगवान का तिरुमंजन

  • सालग्राम भगवान को एक उचित स्थान पर विराजमान करें (तिरुमंजन वेधिके या एक पात्र)।
  • अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय कराना।
  • स्नान कराना – ॐ स्नानीयं समर्पयामि या स्नानीयं कंदरुला वेन्डुम
  • अब तिरुमंजन करना – पुरुष सूक्तम, नारायण सूक्तम, विष्णु सूक्तम, श्री सूक्तम, भू सूक्तम, नीला सूक्तम का अनुसंधान करना – जितना समय मिले उतनी बार। अन्त में “वेन्नै अलैन्ता कुणुन्गुम” पधिगम और  तिरुमंजन काल पाशुरों का गान करना।
  • अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय, धूप, दीप, गर्म दूध और फल निवेदन करना।
  • तीर्थ को एक पात्र में खाली करना।

अलंकारासनम्भगवान का श्रृंगार करना

  • शालिग्राम भगवान को उनके मूल स्थान पर बिराजमान करना।
  • पात्र में शुद्ध तीर्थ भरकर रखें।
  • अर्घ्य पाद्य आचमनीय करना ।
  • चन्दन तथा पुष्प से श्रृंगार करना ।

(“गंधद्वाराम् दुरधारशाम्….” श्लोक निवेदन करना)

(“पूछुं चान्तु एन नेंजमे…” पाशुर निवेदन करना)

(सूचना: सामान्यत: शालिग्राम भगवान को ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण नहीं कराया जाता है। केवल चन्दन निवेदन किया जाता है।)

  • धूप निवेदन करना (“धूर्वस्य …” श्लोक निवेदन करना)
  • दीप निवेदन करना (“उध दीप्यस्य…” श्लोक निवेदन करना)
  • मंत्र पुष्पम निवेदन करना, वेदारंभम् (वेद आरंभ) करना
  • द्वादश नाम अर्चना करना
  • दिव्य प्रबंध का पाठ करना
  • पोधु तनियन निवेदन करना (“श्रीशैलेश दयापात्रम…” से प्रारम्भ करके)
  • तिरुपल्लाण्डू, तिरुपल्लियेलुचि, तिरुप्पावै, अमलनादीपिरान, स्थल पाशुर (आप जिस दिव्य देश से आए हो अथवा जिस दिव्य देश में आप अभी हो उस दिव्य देश का पाशुर), कण्णिनुण् शिरुत्तांबु, कोईल तिरुवायमोलि, रामानुज नुत्तंदादि, उपदेश रत्नमालै इत्यादि का पाठ करना

सूचना:

  • समयानुकूल ज्यादा से ज्यादा पाठ करें
  • श्री रामानुज नुत्तंदादि को प्रपन्न गायत्री के नाम से जाना जाता है – श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने कहा है की जैसे एक ब्राह्मण प्रतिदिन नियम से गायत्री का जप करता है, ठीक उसी तरह एक शरणागत को चाहिए की कमसे कम श्री रामानुज नुत्तंदादि का पाठ एकबार प्रतिदिन करे।
  • ४००० दिव्य प्रबंधोंका पाठ भी एक मास में होना चाहिए। प्रतिदिन उस दिन के नक्षत्र के अनुसार पाठ होने चाहिए। अधिक विस्तृत जानकारी के लिये http://kaarimaaran.com/sevakalam.html इस संकेतस्थल को देखें।

बीच के समय में भगवान के लिये भोग बनाएँ। भगवान का भोग बनाने के लिये स्वतंत्र पात्र का उपयोग करना चाहिए। जिस पात्र में भोग बनाया गया हो उसी पात्र में भोग नहीं लगाना चाहिए। उस भोग को अलग पात्र में निकाल लेना चाहिए। भगवान के भोग बनानेके, भोग लगानेके पात्र हमें अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिये नहीं लेना चाहिए। यह पात्र केवल भगवान के लिये ही होने चाहिए।

भोज्यासनम् – भगवान को भोग निवेदन करना

  • अर्घ्यम्, पाद्यम्, आचमनीयम् निवेदन करना
  • भोग को भगवान के सामने रखना
  • भोग को जल से प्रोक्षण करके भोग पर तुलसी रखना
  • भगवान को भोग निवेदन करना। (“कूड़ारै वेल्लुम सीर…”, “नारु नरूम्पोलिल…”, “उलगमुण्डा पेरुवाया…” पाशुर निवेदन करना और “या प्रीतिर्विदुरार्पिते…” श्लोक निवेदन करना)
  • भगवान को ताम्बूल और चन्दन निवेदन करना
  • भगवान का प्रसाद आल्वार, आचार्य को निवेदन करना

पुनर्मन्त्रासनम् – मंगलाशसनम्/शात्तुमुरै

  • अर्घ्यम्, पाद्यम्, आचमनीयम् निवेदन करना
  • आरती निवेदन करना – “तद्विष्णोर्परमपदम्…” बोलना
  • भगवान, तिरुमलै वेंकटेश्वर भगवान, श्रीरंगनाथ भगवान, श्री तिरुनारायणपुर भगवान, जगन्नाथ भगवान, श्री रामचन्द्र भगवान, पार्थसारथी भगवान, गोदाम्बाजी, शठकोप स्वामीजी, रामानुज स्वामीजी, वरवरमुनि स्वामीजी, सभी आचार्य इनके मंगल स्तोत्र का पाठ करना (https://guruparamparai.wordpress.com/mangala-slokams)
  • शात्तुमुरै पाशुर, तिरुपल्लाण्डु पाशुर, वालि तिरुनाम का पाठ करना
  • तिरुवाराधनम करनेवाले व्यक्ति तीर्थ, श्रीपादतीर्थ, भगवान की चरणोंमें अर्पित तुलसी लेकर सभी को वितरीत कर सकते हैं
  • दैनिक नक्षत्र के अनुसार आल्वार, आचार्य का वालि तिरुनाम का पाठ करना (https://guruparamparai.wordpress.com/vazhi-thirunamams/)

पर्यंकासनम् – भगवान को विश्राम करनेके लिये विनती करना

  • “पन्नाकदीश पर्यङ्के …”, “क्षीर सागरा…” श्लोक निवेदन करना
  • साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना (“उपचारापदेशेन…” श्लोक बोलते हुये) (तिरुवाराधनम करते हुये होनेवाले अपचारोंके लिये पूर्ण हार्दिकता से क्षमा मांगते हुये)
  • भगवान का पट बंद करते हुये “उरगल उरगल उरगल…”, “पनिक्कडलील पल्ली कोलै पलगविट्टु …” पाशुर निवेदन करें

अनुयागम् – तिरुवाराधन (याग) सम्पन्न

  • अपने आचार्यपीठ की परंपरानुसार देवराज अष्टकम् अथवा वरवरमुनि पूर्व/उत्तर दिनचर्या अथवा वानमामलै जीयर प्रपत्ति/मंगलाशासनम् का पाठ करना
  • श्रीवैष्णव अतिथियोंकों प्रसाद पवाना
  • स्वयं प्रसाद ग्रहण करना

अधिक जानकारी

  • अनध्ययन कालम्
    • अनध्ययन काल में हम आल्वार के पाशुर का पाठ नहीं करते हैं। “जितन्ते स्तोत्र” के प्रथम २ श्लोक, “कौसल्या सुप्रजा राम…”, “कूर्मादिन…” आदि श्लोक निवेदन करते हुये भगवान का पट खोलना चाहिए। आल्वार पाशुर का मानसिक अनुसंधान करने के लिये कोई प्रतिबन्ध नहीं।
    • वैसेही तिरुमंजन के समय सूक्तोंका का पाठ करना
    • मंत्र पुष्प में “चैंराल कुडैयाम” के स्थान पर “एंपेरुमानार दरिशनम एन्रे” पाशुर का पाठ करना
    • शात्तुमुरै में उपदेश रत्तिनमालै, तिरुवायमोलि नुत्तंदादि के पाशुरोंका पाठ करनेके बाद में “सर्व देश दशा काले…” और वालि तिरुनामम का पाठ करना चाहिए।

लघु तिरुवाराधनम (३० मिनट का क्रम)

  • भगवान का पट खोलना
  • अर्घ्यम्, पाद्यम्, आचमनीयम् निवेदन करना
  • तिरुमंजन करना
  • तिरुपल्लाण्डु, तिरुप्पावै इत्यादि – जो भी हम उपलब्ध समय में पाठ कर सकें (अनध्ययन काल में हम दिव्य प्रबंध तनियन और उपदेश रत्तिनमालै का पाठ कर सकते हैं।)
  • भगवान, आल्वार, आचार्य को भोग निवेदन करना
  • शात्तुमुरै
  • श्रीपादतीर्थ
  • भगवान का पट बंद करना

महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ

  • पूर्व/उत्तर दिनचर्या में उपलब्ध वर्णन के अनुसार तिरुवाराधन दिनमें ३ बार करना चाहिए। जितना हो सके हमें करना चाहिए।
    1. प्रात: संध्यावंदन के पश्चात् लघु तिरुवाराधन
    2. मध्याह्न काल में विस्तृत तिरुवाराधन
  • सायंकालीन संध्यावंदन के पश्चात् लघु तिरुवाराधन
  • एकादशी के दिन पूर्ण पंच पक्वान, अन्न का भोग नहीं लगता. सूखा मेवा, अथवा सादा भोग लगता है।
  • द्वादशी के दिन तिरुवाराधन जल्दी करके बादमें तीर्थ, तुलसी, प्रसाद लेकर पारणम करना चाहिए।
  • अनध्ययन काल में हमें ४००० दिव्य प्रबंध का पाठ नहीं करना चाहिए। पुर्वाचार्य स्तोत्र, उपदेश रत्तिनमालै, तिरुवायमोलि नुत्तंदादि, आल्वार/आचार्य तनियन, वालि तिरुनाम का पाठ करना चाहिए। धनुर्मास प्रारम्भ होनेपर तिरुपल्लियेलुचि और तिरुप्पावै का पाठ कर सकते हैं।
  • यात्रा के समय हमें भगवान को साथ लेकर चलना चाहिए अथवा हमारे अनुपस्थिति में भगवान की सेवा की व्यवस्था करनी चाहिए। भगवान को आप्त श्रीवैष्णवोंके पास सौंप सकते हैं जो भगवान की प्रेम पूर्वक सेवा कर सकें।
  • अशौच के समय हम तिरुवरधानम नहीं कर सकते हैं। इस समय भगवान की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
  • घर में भगवान विराजमान हो और उनकी हम सेवा न करें इसका अर्थ है किसीको हमारे घर आमंत्रित करें और उसको दुर्लक्षित करदें।

शास्त्र की आज्ञा और पूर्वाचार्योंके निर्देश का पालन करके हार्दिकता से प्रेमपूर्वक अपने घर के भगवान का तिरुवाराधन करना चाहिए। इस प्रकार हम भगवद/भागवत/आचार्य कैंकर्य में पूर्ण रूप से और स्वाभाविक रूपसे संलग्न हो सकते हैं तथा भगवान, आल्वार, आचार्य और अस्मदाचार्य के अत्यंत प्रिय बन सकते हैं।

भगवान के तिरुवारधानम में आनेवाली बाधाओं का विस्तृत वर्णन http://ponnadi.blogspot.in/2014/03/virodhi-pariharangal-16.html इस संकेतस्थल पर उपलब्ध है।

संदर्भ: जियर पड़ि, काँचीपुरम प्र. भ. अण्णंगराचार्य स्वामीजी लिखित “नित्यानुष्ठान पद्धति”

दासानुदास सपना रामानुज दासी, दासानुदास केशव रामानुज दास एवं दासानुदास कण्णन रामानुज दास ।

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-thiruvaaraadhanam.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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