Monthly Archives: December 2017

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २३

५६) तीर्थ विरोधी – तीर्थ (पवित्र जल) से सम्बंधित बाधाएं

श्रीदाशरथी स्वामीजी का श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर सभी नगरवासी पवित्र होते हुए। श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करते हुए।

तीर्थ का अर्थ है पवित्र जल। यह पवित्रता भगवान, आचार्य आदि के सम्पर्क में आने से आती है। जो जल भगवान के तिरुवाराधन में प्रयोग होता है उसे तीर्थ कहते है। उसे “भगवान का तीर्थ” भी कहते है। श्रीवैष्णव के परिभाषा में भगवान को स्नान कराने को “तिरुमञ्जन” कहते है। अन्य परिपेक्ष्य में भगवान के स्नान को “अभिषेक” भी कहते है। भगवान के स्नान के लिये जिस जल का प्रयोग होता है उसे “तिरुमञ्जन तीर्थ” कहते है। श्रीवैष्णव गोष्ठी (अन्य भी) में उसे एकत्रित कर सभी को वितरित किया जाता है। श्रीवैष्णव परिभाषा में श्रीवैष्णवों के स्नान किये हुए जल को भी “तीर्थादुथल” कहते है। आचार्य और उच्च कोटी के श्रीवैष्णवों के चरणामृत को “श्रीपादतीर्थ” कहते है। जो जल आचार्य के चरण पादुका के सम्पर्क में आता है उसे भी “श्रीपाद तीर्थ” कहते है। इस भाग में हम भगवान के तीर्थ, तिरुमञ्जन तीर्थ और श्रीपादतीर्थ से सम्बंधित “तीर्थ विरोधी” विषयों में अभ्यास सिखेंगे। अनुवादक टिप्पणी: तीर्थ के कई अर्थ है – पवित्र जल, पवित्र स्थान, स्वयं भगवान आदि। यहाँ हम केवल पवित्र जल जो कई प्रकार के है उस पर विषय को केन्द्रीत करेंगे।

  • भगवान का तीर्थ सांसारिक जनों या उनके घर से लेना बाधा है। मुमुक्षु वह है जो मोक्ष पर केन्द्रीत रहता है। जो सांसारिक लाभ पर केन्द्रीत होता है उसे भुभुक्षु कहते है। ऐसे जनों से भगवान का तीर्थ ग्रहण करना हानिकारक है क्योंकि ऐसे जनों से कोई भी सम्बन्ध हमारी निष्ठा पर प्रभाव डाल सकता है और पूर्वाचार्यों द्वारा दर्शाये गये मार्ग पर चलने से हमें डिगा सकता है।
  • साधनान्तर मनुष्यों (वह जो भगवान छोड़ अन्य सभी को उपाय मानता है) के सामने भगवान का तीर्थ ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: साधन का अर्थ कुछ पाने के लिये उपाय करना है। शास्त्र में भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्त करने के उपाय हेतु कई विधियाँ समझायी गयी है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। कुछ जन प्रपत्ति को भी उपाय मानते है। परन्तु सच्चे प्रपन्न/ शरणागत केवल भगवान को ही एकमात्र उपाय मानते है। जो स्वयं के प्रयत्न को भगवान के प्राप्ति का उपाय समझते ऐसे जनों के सामने हमे कुछ भी पाना नहीं चाहिये।
  • मन्त्र उच्चारण (द्वय महामन्त्र छोड़ अन्य मन्त्र) करनेवालों के सामने भगवान का तीर्थ पाना बाधा है। शिष्य को आचार्य द्वारा बताये गये रहस्य त्रय ही उपयुक्त है उसके अतिरिक्त अन्य कोई मन्त्र है तो वह देवतान्तर मन्त्र है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान ही उपाय और अम्माजी और भगवान के प्रति पवित्र कैंकर्य ही उपेय है, द्वय महामंत्र इस बात को अत्यंत स्पष्टता से प्रकाशित करते है, इसलिये हमारे पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र कि बड़ी स्तुति करते है। सभी मंत्रों में इस मन्त्र को मन्त्र-रत्न कहते है और हमारे पूर्वाचार्य इसका निरन्तर जप करने और स्मरण करने को कहते है। “पूर्व-दिनचर्या” रचना में श्रीएरुम्बी अप्पा यह दिखाते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के ओष्ठ निरन्तर द्वय महामन्त्र का जाप करते है और उनका मन सदा उसके अर्थ का अनुसंधान करता था।
  • दिव्य देश में तीर्थ लेने से पहिले भगवान के तीर्थ कि पवित्रता को जाँचना बाधा है। दिव्य देशों में तीर्थ लेने से हमे घबराना नहीं चाहिये। दिव्य देश अर्थात वह मन्दिर जहाँ आल्वारों ने अपने दिव्य प्रबन्धनों में भगवान कि स्तुति की है। यही नियम उस स्थान के लिए भी है जो आचार्य / आल्वारों से सम्बंधित है (उदाहरण – अभिमान स्थल, अवतार स्थल आदि) – वों भी दिव्य देश के समान है।
  • अन्य स्थानों पर भगवान के तीर्थ की शुद्धता को जाँचे बिना ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देश, अभिमान स्थल और आचार्य / आल्वारों का अवतार स्थान को छोड़कर – अन्य स्थानों प्र हमें यह सुनिश्चित कर लेना चाहिये कि वहां श्रीवैष्णव क्रम का पालन हो रहा है। उदाहरण के लिए हमारे पूर्वज मन्दिर में प्रवेश करने के पूर्व यह सुनिश्चित कर लेते थे कि मन्दिर में जहाँ आचार्य/ आल्वारों कि सन्निधी है वहाँ सही क्रम का पालन हो रहा है और भगवान के साथ उनकी भी उचित सेवा हो रही है।
  • सांसारिक जनों के सामने तीर्थ लेना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्य सांसारिक मानसिकता वाले लोगों से बचते थे और उनके सामने कुछ भी नहीं पाते थे।
  • अन्य श्रीवैष्णव के ग्रहण करने से पूर्व हमारा तीर्थ पाना बाधा है। हमें तीर्थ अन्य श्रीवैष्णव लेने के पश्चात ही लेना चाहिये। हमें जबरदस्ती कर आगे जाकर तीर्थ ग्रहण करने कि कोई आवश्यकता नहीं है।
  • किसी दिशा या स्थिति विशेष में तीर्थ लेने से बचना बाधा है। तीर्थ लेने के लिये ऐसा कोई नियम नहीं है जैसे पूर्व दिशा में होना, इत्यादि। हम श्रीवैष्णव गोष्ठी में कहीं भी हो हम तीर्थ ले सकते है।
  • तीर्थ ग्रहण करने के पश्चात उसे हमे अपने नेत्र और माथे पर बड़े आदर पूर्वक लगाना चाहिये – ऐसा न करना बाधा है।
  • तीर्थ ग्रहण करने के पश्चात हाथों को धोने का विचार करना भी बाधा है।
  • भगवद, आचार्य आदि का कोई भी कैंकर्य करने के पूर्व हाथों को धोना चाहिये। तीर्थ लेते समय हाथ ओष्ठ को छु सकते है – इस अशुद्धी को पवित्र करने हेतु हमें कोई कैंकर्य करने के पूर्व हाथों को धो लेना चाहिये।
  • तीर्थ को जमीन पर गिराना बाधा है। हमें तीर्थ ग्रहण करते समय अपना उपरी वस्त्र को हाथों के नीचे रखना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि तीर्थ जमीन पर न गिरे। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह समझाया गया है कि जो भी तीर्थ गिराता है वह बहुत बड़ा पाप करता है। तीर्थ या प्रसाद पर पैर रखने पर भी यही कहा गया है।
  • तीर्थ को माथे पर उछालना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले कहा गया है तीर्थ को नेत्र और माथे पर बड़े आदर पूर्वक लगाना चाहिये।
  • सांसारिक बाते करते हुए तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है। तीर्थ को बड़े आदर पूर्वक ग्रहण करना चाहिये और उस समय बाते करने से बचना चाहिये।
  • सांसारिक जनों द्वारा देखे जाने पर उस तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है।
  • हमें यह ज्ञान होना चाहिये कि भगवान के तीर्थ से भी बढ़कर श्रीवैष्णवों का श्रीपाद तीर्थ है। यह न समझना बाधा है।
  • तीर्थ कि सच्ची महिमा न जानकार, उसके देनेवाले के बाह्य रूप को देखकर ग्रहण करना बाधा है।
  • तीर्थ केवल एक बार ग्रहण करना पर्याप्त है यह तीर्थ देते समय क्या बोल रहे है उसपर आधारित है। सामान्यत: शातुमोरा के समय तीर्थ दिया जाता है और उस समय एक बार तीर्थ ग्रहण करना उचित है। यह न समझना बाधा है।
  • आचार्य का श्रीपाद तीर्थ जो आचार्य के कृपा से प्राप्त होता है उसे एक से अधीक बार ग्रहण करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: कुछ मठ/तिरुमाली श्रीपाद तीर्थ दो बार और कुछ में तीन बार दिया जाता है। शास्त्र में दोनों के लिये उचित प्रमाण है। इसलिये यह समझा जा सकता है कि श्रीपाद तीर्थ को केवल एक बार नही लेना चाहिये।
  • हमें यह समझना चाहिये कि सदाचार्य का श्रीपाद तीर्थ हमेशा पूजनीय है (जैसे मटके में रखा गंगा जल पूजनीय है)। हमें यह भी समझना चाहिये कि यह शिष्टाचार है (यह बड़ों द्वारा आचरण मे लाया गया है) और हमे भी यह करना चाहिये। यह न समझना बाधा है।
  • श्रीपाद तीर्थ की महिमा “वेधकप पोन” (वह कसौटी जो ताम्बे को सोने में बदल देता है) से कि जाती है। श्रीपाद तीर्थ के केवल सम्बन्ध मात्र से हम पवित्र हो जाते है। “श्रमणी विदुर ऋषि पत्निकलैप पुतराक्किन पुण्डरीकाक्षन् नेदुनोक्कू” आचार्य हृदय – भगवान श्रीमन्नारायण के पवित्र नेत्र जिन्हें पुण्डरीकाक्ष ऐसे स्तुति किया जाता है उन्होंने शबरी, विदुर और ऋषियों कि पत्नीयों को भी पवित्र कर दिया। भगवान के पवित्र नेत्र जैसे आचार्य के पवित्र नेत्र भी श्रेष्ठ है। ऐसे आचार्य के श्रीपाद तीर्थ को विशेष मानना चाहिये। और इसे विशेष ज्ञान कहते है। ऐसा ज्ञान न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुरेश स्वामीजी के जीवन में एक सुन्दर घटना दर्शायी गयी है। एक श्रीवैष्णव का पुत्र उसके गलत संगत से अवैष्णव कि ओर बढ़ रहा था। परन्तु एक दिन अचानक वह अपने पिता के सामने सुन्दर वैष्णव वेष, तिलक आदि के साथ आया। उसके पिता ने तुरन्त पूछा कि क्या श्रीकुरेश स्वामीजी ने तुम्हें अपने पवित्र नेत्रों से देखा? ऐसा श्रीकुरेश स्वामीजी कि महिमा थी कि केवल अपने दृष्टि से किसी व्यक्ति में अच्छे पवित्र गुण लायेंगे।
  • केवल श्रीपादतीर्थ कि महिमा जानकार उसे ग्रहण करना और उसे पाने कि चाह नहीं होना बाधा है। केवल महिमा ही नहीं जानना चाहिये परन्तु ऐसे श्रीपाद तीर्थ को ग्रहण करने कि अति आर्तता भी होनी चाहिये।
  • किसी ऐसे तीर्थ को ग्रहण करना जिनका देवतान्तर सम्बन्ध हो वो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के विरुद्ध है। परिणाम जाने बिना ऐसे तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है।
  • आनंदित होकर सबसे पहिले तीर्थ ग्रहण करना और अन्त में ग्रहण करने से हिचकिचाना बाधा है। तीर्थ को जो भी स्थिति हो यह समझकर कि वो हमें शुद्ध करेगा, बिना कुछ अधिक सोचे विचारे ग्रहण करना चाहिये।
  • श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करने से अस्वीकार करना क्योंकि उसमें स्वयं का श्रीपादतीर्थ है। विशेष समय में जब तिरुमाली में श्रीवैष्णव गोष्ठी होती है यह सामान्य प्रथा है कि वहाँ पधारे सभी श्रीवैष्णवों का श्रीपादतीर्थ लिया जाता है। उस श्रीपादतीर्थ को एकत्रीत किया जाता है और सभी को वितरीत किया जाता है। उस समय यह सोचकर कि उसमें अपना श्रीपादतीर्थ मिला हुआ है किसी को भी उस श्रीपादतीर्थ को अस्वीकार नहीं करना चाहिये। हमें यह विचार कर उस श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये कि उसमें वह जल है जो कई श्रीवैष्णवों के चरण साफ करने हेतु प्रयोग किया गया हो और यह हमें अधीक शुद्ध करेगा।
  • प्रायश्चित के लिये उपयोग तीर्थ जो कुछ कर्मों के लिये किया गया हो उसे प्रपन्नों को उपयोग नहीं करना चाहिये। ऐसा करना बाधा है।
  • शैव आदि से शारीरिक सम्पर्क में आने से हमें स्वयं को शुद्ध करने हेतु श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। जब शारीरिक सम्पर्क होता है तो हमें उस भाग को धोकर साफ कर श्रीपाद तीर्थ लेना चाहिये। उस पाप के लिये यह प्रायश्चित है। हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन कि घटना को स्मरण कर सकते है। जब एक पाषण्ड के शरीर कि भस्म फैलकर स्वामीजी को स्पर्श कि तो स्वामीजी उसी क्षण अपने माता के पास गये और उन्हें शुद्ध करने को कहा। उनकी आण्डाल माता जो शास्त्र में विद्वान है उन्होने एक ब्राम्हण श्रीवैष्णव का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने को कहा और भट्टर स्वामीजी भगवान के पुरप्पाडु उत्सव के समय आये एक ब्राम्हण श्रीवैष्णव से विनंती कर उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करके स्वयं को शुद्ध किया। यह घटना वार्तामाला ३२७ में है।
  • श्रीपाद तीर्थ को केवल शुद्ध मानना और श्रीपादतीर्थ के प्रति अधीक लगाव न होना बाधा है। उसे बहुत आनंददायक समझना चाहिये।
  • केवल दिन में एक बार श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने से संतुष्ट होना और उसे दोबारा लेने कि इच्छा न करना बाधा है। जैसे कि एक शिशु जो अभी माँ का दूध पी रहा है उसे अपनी माँ के दूध कि और अधीक ललक होती है वैसे हीं हमें अपने आचार्य के श्रीपादतीर्थ कि ललक होनी चाहिये। ऐसे न करना बाधा है।
  • यह समझे बिना कि यह हमारे आचार्य का इस संसार में अन्तिम जन्म है आचार्य के श्रीपादतीर्थ से वंचीत रहना बाधा है। जैसे सहस्त्रगीति में “मरणमानाल वैकुण्ठं” कहा गया है (जब हम मर जायेंगे तो हम परमपद जायेंगे) हमें अपने आचार्य को बड़े आदर से देखना चाहिये और उनके श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये और जब तक वे संसार में है उनसे बहुमूल्य उपदेश सुनना चाहिये।
  • श्रीपादतीर्थ तीर्थ देनेवाले से सीधा ग्रहण करना चाहिये नाकी किसी ओर से। जैसे भगवान के तीर्थ वितरण के समय एक सह तीर्थकार देता है। ऐसा यहाँ नहीं होता है।
  • स्वयं श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना बाधा है। हमें आचार्य या जो तिरुवाराधन करते है उन्हीं से श्रीपादतीर्थ लेना चाहिये।
  • जब तक श्रीपादतीर्थ न मिले उसे पाने कि हमें बहुत ललक होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ अनजाने से श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने कि निन्दा कि गयी है।
  • श्रीपादतीर्थ देनेवाले और लेनेवाले दोनों का द्वय महामन्त्र पर ध्यान केन्द्रीत होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: द्वय महामन्त्र का अर्थानुसंधान हमेशा गुरुपरम्परा मन्त्र के साथ करना चाहिये। यह हमें निरन्तर स्मरण करायेगा कि हम अम्माजी और भगवान के दास है, जब हम स्मरण करेंगे की सिर्फ भगवान ही उपाय है तब परमपद में उनकी नित्य सेवा की हमारी लालसा बढ़ती जायेगी। गुरुपरम्परा मन्त्र को निरन्तर कहने से हमें यह स्मरण होता है कि भगवान के साथ हमारा सम्बन्ध आचार्य के संबंध से ही है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २३

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २२

thyaga-mandapam
श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी जो श्रीवरदराज भगवान के अति प्रिय सेवक हैं, उनका शेष प्रसाद पाने की इच्छा श्रीरामानुज स्वामीजी रखते हैं

५५) भोग्य विरोधी – प्रसाद / प्रसाद पाने में बाधाएं

भोग्य अर्थात वह जिसे पाया जाता है। इस भाग में वह स्थान जहाँ हम प्रसाद पा सकते है और जहाँ हम प्रसाद नहीं पा सकते है उस विषय पर विस्तार से चर्चा कि गयी है। अनुवादक टिप्पणी: जब प्रसाद लेने या ग्रहण करना होता है तो बहुत सी बाधाएं आती है। बहुत पहिले वैधीक (वेद का पालन करने वाले) “परान्न नियमं” का पालन करते थे – अर्थात किसी से भी भोजन गृहण नहीं करना (स्वयं पकाना) और केवल सन्निधी (मन्दिर, मठ) से ही गृहण करना। परन्तु आजकल बहुत बड़ा बदलाव है – बहुत लोगो को भोजन बनाना नहीं आता है और वे बाहर के भोजन पर ही निर्भर रहते है। सामान्यत: सात्विक भोजन ही भगवान को अर्पण किया जाता है और श्रीवैष्णवों द्वारा पाया जाता है। जो भी भोजन हम पाते है उसे पहले भली प्रकार से जांच लेना चाहिए कि वह भोजन श्रीवैष्णवों द्वारा ही बनाया गया है, वह भगवत प्रसाद है और उस समय के अनुकूल उसे पाना उचित है अथवा नहीं। उदाहरण के लिए श्रीवैष्णव द्वारा भी विभिन्न प्रसाद बनाये और भगवान को भोग लगाये जा सकते है – परन्तु एकादशी के दिन इन विभिन्न प्रकार के व्यंजनों को पाया नहीं जा सकता है (सिमित सात्विक भोजन पाना चाहिए)। जब प्रसाद का विषय आता है ३ प्रकार की निषेधता देखी जाती है – “जाती दुष्ट” (भोजन जो उसके स्वभाव से ही पाने योग्य नहीं है – प्याज, लहसुन आदि), “आश्रय दुष्ट” (सात्विक भोजन परन्तु वह जो अवैष्णवों के स्पर्श में आया है) और “निमित्त दुष्ट” (भोजन जो खराब हो गया हो आदि)। यह तीनों प्रकार के दुष्टता वाले अन्न को किसी भी परिस्थिति में हमें नहीं पाना चाहिये। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण १७.८ से १७.१० से विस्तार से समझाते है कि हमें किस प्रकार का अन्न नहीं पाना चाहिये जैसे वह भोजन जो कुछ घण्टों पहिले बना हो, वह भोजन जो उसका प्राकृतिक गुण खो चुका है, वह भोजन जो बासी हो गया है आदि। सबसे उत्तम है भोजन सम्बंधित विषय पर आदरणीय बड़ों से ज्ञान प्राप्त करे और उसे ही भोग लगाकर पाए जो श्रीवैष्णवों के लिए उचित है। आहार नियम पर पूर्ण चर्चा इस लिंक द्वारा प्राप्त हो सकती है। http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-aahaara-niyamam_28.html  और http://ponnadi.blogspot.in/2012/08/srivaishnava-ahara-niyamam-q-a.html

  • सांसारिक जनों के घर में प्रसाद पाना बाधा हैं। संसारी कौन है यह हम चर्चा कर चुके है – वह जो आत्म ज्ञान और भगवद ज्ञान रहित है।
  • देह सम्बन्धी जनों के घर में प्रसाद पाना बाधा है। श्रीवैष्णवों में भी कुछ श्रीवैष्णव लक्षण जैसे आचरण आदि होना चाहिये।
  • जो भगवान से क्षणिक सांसारिक लाभ की आशा करते है उन लोगों द्वारा बनाया गया भगवद प्रसाद पाना यह भी बाधा है। कुछ जन अपनी सांसारिक इच्छा (जैसे परीक्षा उत्तीर्ण होना, अथवा विवाहोत्सव) पूर्ण होने पर विशेष प्रसाद भोग लगाने का संकल्प लेते है। एक बार इच्छा पूर्ण होते हीं वे विशेष भोग बनाते और भगवान को भोग लगाते है। भगवद प्रसाद होने के उपरान्त भी क्यूंकि वह प्रसाद सांसारिक इच्छा पूर्ति हेतु भोग लगाया गया है इसलिये ऐसे प्रसाद से बचना चाहिये।
  • दिव्य देश कि महिमा को पूर्ण रूप से जाने बिना वहाँ का भगवद प्रसाद पाना बाधा है। दिव्य देश में आल्वारों ने द्वारा स्तुति कि है। ऐसे स्तुति को अच्छी तरह समझना चाहिये।
  • केवल भगवान के प्रति भक्ति रखनेवालों के यहाँ प्रसाद पाना बाधा है। ऐसे लोगों को आचार्य, भागवतों आदि कि महिमा के विषय में ज्ञान नहीं है और इसलिये उनके तिरुमाली में प्रसाद नहीं पाना चाहिये।
  • श्रीवैष्णव के तिरुमाली में स्वयं द्वारा बनाया हुआ प्रसाद पाना – यह विषय स्पष्ट नहीं है। परंतु इसे ऐसे समझा जा सकता है कि प्रसाद केवल स्वयं के पाने के लिये बना है भगवान के भोग के लिए नहीं। भगवान स्वयं भगवद गीता ३.१३ में कहते है “तेत्वकम भुन्जथे पापा ये पचन्ति कारणात्” – ऐसे जन जो केवल स्वयं के तृप्ति के लिये भोजन बनाते है वह पाप ही खाते है।
  • तिरुमाली में प्रसाद पाना जहाँ प्रसाद पवानेवाला इस विषय पर केन्द्रीत होता है कि तदियाराधन में कितना धन खर्च हुआ है, वह बाधा है।
  • किसी के कीर्ति, यश आदि में दिया हुआ भोजन पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ लोग भोजन केवल इसलिये खिलाते है कि जिससे वो सब को यह बता सके कि वे दान पुण्य में कितने महान है। ऐसी जगह से बचना चाहिये।
  • विवाह में भोजन करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अगर तदियाराधन मठ अथवा तिरुमाली में सही तिरुवाराधन विधि आदि से नहीं बना हो तो विवाह में प्रसाद पाने से बचना चाहिये। आजकल प्रसाद बनाने के तत्व में इतनी अशुद्धता है कि अवैष्णव जन प्रसाद बनाते है। ऐसे जगह में पाने से बचना चाहिये।
  • जिनके यहाँ कोई मृत्यु हुई हो उनके यहाँ प्रसाद पाना बाधा है।
  • पैसे देकर भोजन लाना और उसे पाना बाधा है। होटल और मंदिरों में बेचे जाने वाले भोजन को पाने से बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: अगर कोई तिरुवाराधन करता हो तो वहाँ प्रसाद पाने के पश्चात थोड़ा दान कर सकते है उस व्यक्ति के प्रति जिसने तिरुवाराधन विधि का प्रबन्ध किया है। परन्तु जो भोजन केवल बेचने के लिये बना है उसे खरीदना आत्मा के लिये हानिकारक है क्योंकि वह व्यक्ति केवल धन कमाने के लोभ में भोजन बेचता है और ऐसा भोजन करने से हमारा भी व्यवहार वैसी ही हो जाता है।
  • दूसरों का बचा हुआ शेष पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ यह समझना चाहिये कि सामान्य जनों का शेष भोजन पाने से सदैव बचना चाहिये। भगवान भगवद गीता में भी इस तत्व को समझाते है। भगवान कहते है किसी को किसी का शेष भोजन नहीं पाना चाहिये। अपने व्याख्या में श्रीरामानुज स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य आदि का शेष प्रसाद पाना सर्व-योग्य है। श्रीवेदान्ताचार्य अपनी व्याख्या में आगे और यह समझाते है कि पिता, बडे भाई, पति (पत्नी के लिये) आदि का शेष प्रसाद पा सकते है। श्रीभक्ताङिघ्ररेणु आल्वार के तिरुमालै के ४१वें पाशुर से हम यह समझ सकते है कि श्रीवैष्णवों का शेष प्रसाद पाने योग्य है।
  • बदले में कुछ पाने कि आशा से किसी को प्रसाद पवाना बाधा है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण के २८६ और २८७ सूत्र में यह दर्शाते है कि हम भगवान के सही दास तभी होंगे जब हम किसी भी कैंकर्य को श्रीविदुरजी, श्रीमालाकार स्वामीजी और कुब्जा के समान प्रेम से करेंगे। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का इन सूत्रों के लिये विश्लेषण बहुत ही सुन्दर है। वे यह समझाते है कि सामान्यत: अगर कोई मनुष्य कैंकर्य करता है तो उसके बदले में वह कुछ आशा करता है। इन सभी परिस्थितियों में इन भागवतों ने बिना कोई आशा के कैंकर्य किया। श्रीविदुरजी भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रेमभाव से केले का छिलका पवाये जिसे भगवान ने भी अत्यधिक प्रेम से पाया। श्रीमालाकार स्वामीजी ने भगवान कृष्ण के कहने पर बिना संकोच के उन्हें पुष्प दे दिया – यह भी न सोचा कि यहीं पुष्प उसके जीने का आधार है। कुब्जा पवित्र चन्दन का लेप भगवान कृष्ण को दी। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह भी दर्शाते है कि इन तीन भगवतों और घटना की अन्य विद्वानों ने भी स्तुति की है।
  • कुछ कार्य के लिये बनाया हुआ प्रसाद पाना बाधा है। कुछ वैधीक कार्य में थोड़ा सा प्रसाद कुछ देवता के लिये कुछ मन्त्र द्वारा अर्पण किया जाता है। उदाहरण के लिए श्राद्ध निमंत्रण पर। ऐसा प्रसाद पाना बाधा है।
  • कोई बड़े घमण्ड से प्रसाद पवाता है कि मैंने प्रसाद पवाया है। ऐसा प्रसाद पाना बाधा है।

आगे बढ़ने से पहिले आहार नियम से सम्बंधित, श्री उ.वे. वि.वि रामानुज स्वामी ने जैसा अपने बड़ो के आचरण को देखा है और जो अन्य ग्रंथ पढ़कर सिखा है वह समझाते है। आजकल यह तत्व समझनेवाले बहुत कम है और उन्हें पालन करनेवाले और भी कम है। प्रसाद को ३ गुणों के अनुसार से वर्गीकृत किया गया है सात्विक, रजस और तमस। रजस और तमस तो श्रीवैष्णवों को पूर्ण तरह निषेध है जिसकी भगवद गीता के १७वें भाग में चर्चा कि गयी है। आजकल लोग केवल बाह्य स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारें में सोचते है। आन्तरिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के विषय में ज्ञान बहुत थोड़ा है। अच्छे हृदयवाले लोग जो हमारे पहचान के हो उनको ही फल, सब्जियां, अन्न आदि उपजाना चाहिये और अच्छे मन से ही देना चाहिये। जो भोजन बनाता हो उसमें आचरण और अनुष्ठान दोनों ही होना चाहिये – नियमों का पालन के साथ स्वरूप ज्ञान होना चाहिये (कि वह जीवात्मा है जो भगवान की दास है)। वह श्रीवैष्णव सम्प्रदाय ग्रन्थों से भी परिचित होना चाहिए। पिल्लै लोकम जीयर द्वारा रचित “यतीन्द्र प्रवण प्रभावम” से एक घटना वर्णित है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी जो बड़े आचार्य थे उनको दो पत्नीयाँ थी। वो एक बार अलग अलग कर दोनों से एक प्रश्न किये। सर्वप्रथम उन्होंने अपनी पहिली पत्नी से पूछा कि “तुम मेरे विषय में क्या सोचती हो?” वह उत्तर देती है कि “मैं आपको को स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान ही जानती हूँ और अपना आचार्य मानती हूं”। वो प्रसन्न होकर उन्हें तिरुवाराधन और स्वयं उनके लिये प्रसाद बनाने को कहते है। फिर अपनी दूसरी पत्नी से भी यही प्रश्न करते है और प्रतिउत्तर में वह कहती है “मैं आपको अपना पति मानती हूं”। तब वह उन्हें अपनी पहिली पत्नी की प्रसाद बनाने में सहायता करने के लिए कहते है। जब उनकी पहिली पत्नी मासिक समय से होती है तब वह अपनी दूसरी पत्नी को प्रसाद बनाने कि आज्ञा देते है परन्तु उस पाने से पहले वे अपने प्रिय शिष्य को जो उच्च श्रीवैष्णव है प्रसाद को छुने को कहते है और तत्पश्चात पाते है। अत: वे अपने व्यवहार से यह बताते है कि हम श्रीवैष्णवों में सच्चा ज्ञान होना चाहिये ताकि भगवान और भागवतों के लिये प्रसाद बनाने का कैंकर्य प्राप्त कर सके। श्रीरामानुज स्वामीजी के समय उनके मठ में उनके सभी शिष्य महान थे व् उच्च कोटी के आचार्य बनने में सक्षम थे। कई सामान्य, सांसारिक, देहिक जनों को उन्होंने अपनी सेवा से निकाले दिया था। ऐसा उनके जन्म के आधार पर नहीं किया गया था। अपितु यह पूरी तरह भगवद विषय के प्रति के उनके समर्पण के आधार पर था। भोजन जो हम पाते है वह भगवद प्रसाद होना चाहिये। हम यह देख सकते है कि भोजन विरोधी और भोग्य विरोधी दोनों पवित्र हृदय और सात्विक व्यवहार पर केन्द्रीत है।

  • अवैष्णव द्वारा स्पर्श किये गए प्रसाद को पाना बाधा है।
  • अवैष्णव द्वारा स्पर्श किये गए पात्र जिसमें प्रसाद हो उसे पाना बाधा है।
  • अवैष्णव द्वारा बनाया हुआ प्रसाद, जो प्रसाद बनाते समय निरन्तर भगवद विषय छोड़ अन्य विषय का स्मरण करता हो ऐसा प्रसाद पाना बाधा है। भगवद विषय छोड़ अन्य विषय का अर्थ देवतान्तर भजन, गप्पे आदि।
  • प्रसाद बनाते समय दिव्य प्रबन्ध आदि का उच्चारण करना चाहिए और ऐसे प्रसाद को ही पाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव जन प्रसाद बनाते समय तिरुपल्लाण्डु, तिरुपावै आदि पाठ करते है और भगवान के दिव्य लीलाओं का स्मरण करते है। ऐसे विषय कि चर्चा करते समय भगवान के लिये जो प्रसाद बनाया गया हो वो स्वादिष्ट हो जाता है। हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के साथ तिरुमला में हुई एक घटना को स्मरण कर सकते है। श्रीप्रतिवादी भयंकर अण्णन स्वामीजी श्रीनिवास भगवान के तिरुमंजन के लिये जल सेवा का कार्य करते थे। वह जल लाकर उसमें इलायची आदि डालकर उसे सुगन्धीत कर भगवान के अर्चक को दे देते थे। एक दिन श्रीरंगम से एक श्रीवैष्णव तिरुमला में पधारे और उन्होंने अण्णन स्वामीजी के समक्ष श्रीरंगम में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति और जीवन के विषय में चर्चा करना प्रारम्भ किया। उस प्रक्रिया में अण्णन स्वामीजी जल में सुगन्धीत द्रव्य डालना भुल गये और अर्चकों को ऐसे ही दे दिया। कुछ समय पश्चात अण्णन स्वामीजी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तुरन्त अर्चकों के समीप जाकर अपनी गलती के विषय में कहा। अर्चकजनों ने जो उस जल का उपयोग कैंकर्य हेतु करना प्रारम्भ कर चुके थे कहा कि आज तो यह जल प्रतिदिन से भी अधीक सुगन्धीत है। यह सुनकर श्रीअण्णन स्वामीजी को बहुत अचम्बा हुआ और उन्हें स्मरण हुआ की यह केवल श्रीरंगम से पधारे श्रीवैष्णव के साथ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के विषय में चर्चा करने से ही हुआ है। पश्चात वे श्रीरंगम जाकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए।
  • भगवान और भागवतों हेतु न होकर स्वयं कि तृप्ति के लिये भोजन बनाकर पाना बाधा है।
  • उन पात्र से भोजन लेकर पाना जिन पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक न हो बाधा है। पात्र जिसमें प्रसाद बनाया, परोसा आदि जाये उस पर भगवान का तिलक होना चाहिये।
  • भगवान को भोग लगाये बिना प्रसाद पाना बाधा है।
  • सांसारिक जनों द्वारा भोजन पवाना और भोजन जो सार्वजनिक स्थलों में दिया जाये, वह पाना बाधा है। भगवान को जब भी भोग लगाते है तो उस स्थान को परदे से ढकना या कक्ष का दरवाजा बंद कर देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रसाद को कभी भी ढक कर रखना चाहिये। प्रसाद के वितरण के समय ही उसपर से कपड़ा निकालना चाहिये।
  • उस प्रसाद को पाना जो केवल भगवान को निवेदन किया हो और नित्यसुरी जैसे आदिशेष, विष्वक्सेन आदि आल्वार और आचार्य को अर्पण नहीं किया हो, बाधा है। जब हम भगवान को भोग लगाते है तब हम एक क्रम का अनुसरण करते है। पहिले हम कहते है “सर्व मंगल विग्रहाय समस्त परिवाराय श्रीमते नारायणाय नम:” (भगवान श्रीमन्नारायण जो अपने अनेक रूप और परिवार के साथ यहाँ पधारे है, मेरा यह कैंकर्य स्वीकार करें)। “अडियेन मेवी अमर्गिनर अमुधे! अमुदु सेय्तरुल वेण्डुम्”। (मैं यह प्रसाद पूर्ण भक्ति से अर्पण कर रहा हूँ कृपया स्वीकार करें)। अत: पहिले हम भगवान को अर्पण करते है। तत्पश्चात श्रीदेवी, श्रीभूदेवी और श्रीनीलादेवीजी आदि को यह कहकर कि “श्री भूमी नीलादिभ्यो नम:”। पश्चात हम शंख, चक्र, अनन्त, गरुड, विष्वक्सेन आदि को अर्पण करते है। फिर हमें आल्वार और आचार्य को “परांकुश परकाल यतिवराधीभ्यो नम:” कहकर उन्हें अर्पण करते है। (श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीपरकाल स्वामीजी, आल्वार, श्रीरामानुज स्वामीजी और अन्य आचार्य भगवान का प्रसाद स्वीकार करें)। अन्त में हम अपने आचार्य को “अस्मद गुरुभ्यो नम:” कहकर अर्पण करते है। अत: प्रसाद पाने से पहले हम भोग भगवान, अम्माजी, नित्यसूरी, आल्वार और आचार्य को पहिले अर्पण करते है।
  • उस भोजन को पाना जिसके जाति या स्वभाव में ही दोष हो, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: प्याज, लहसुन, मुली, ढ़ोल का छड़ी, आदि सब्जियां उनके स्वभाव से अवगुण कारक है।
  • जो भोजन कीड़े, बाल (केशों), कृमी आदि से स्पर्श होता हो, वह भोजन पाना भी बाधा है।
  • अवैष्णवों के साथ बैठकर प्रसाद पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब हम प्रसाद पाते है तब हमारे आस पास कौन है यह सदैव देखना चाहिये।
  • व्यर्थ चर्चा करते हुए प्रसाद पाना बाधा है। प्रसाद पाने से पहिले हमें परिसेषनं (अन्तरयामी भगवान को भोग लगाना) करना चाहिये और तनियन, श्लोक आदि गाना चाहिये। केवल व्यर्थ सांसारिक चर्चा करते हुए पाने से बचना चाहिये।
  • द्वय महामन्त्र का निरन्तर जाप किये बिना प्रसाद पाना बाधा है।
  • केवल आनन्द भोग से प्रसाद पाना बाधा है। हमें सांसारिक आनन्द पर केन्द्रीत नहीं होना चाहिये। अपितु हमें प्रसाद कि शुद्धता पर केन्द्रीत होना चाहिये। अगर बड़े भी स्वाद लेकर चखते है वो कहते है “भगवान ने प्रसाद का आनन्द लिया है और शेष हमारे लिये दिया है”।
  • भगवद प्रसाद का बहुत आदर करना चाहिये और ऐसा न करना बाधा है।
  • प्रसाद को भगवद आराधना का अन्तिम भाग समझकर पाना चाहिये और ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तिरुवाराधन का एक भाग है भगवान, आल्वार और आचार्य को भोग लगाना। अब यही भोग प्रसाद हो गया है। हमें उस प्रसाद को स्वीकार कर ही तिरुवाराधन के क्रम को समाप्त करना चाहिये। तिरुवाराधन को याग कहते है और तदियाराधन को अनुयाग कहते है। हमारा आचरण यह होना चाहिये कि प्रसाद पाना भगवद कैंकर्य का एक अंश है (जिससे भगवद कैंकर्य के लिये हमारे में ऊर्जा आये) और यह हमारे निजी आनन्द भोग के लिये नहीं है। यह तत्व श्रीवचन भूषण के प्रपन्न दिनचर्या के २४३ सूत्र में विस्तार से समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है कि हमें प्रसाद देह धारण के लिये पाना चाहिये और तिरुवाराधन कि प्रक्रीय को सम्पन्न करना चाहिये।
  • भागवतों को प्रसाद पवाने से पहिले स्वयं पाना बाधा है।
  • सदाचार्य को प्रसाद पवाने से पहिले स्वयं पाना बाधा है।
  • केवल प्राण वायु को पवाकर प्रसाद पाना बाधा है। परिशेषण विधि के अनुसार हमें प्रसाद को अलग अलग वायु अर्थात प्राण, अपान, व्यान, उधान और समान को अर्पण करना चाहिए। केवल मन्त्र उच्चारण करना और अर्पण करना पर्याप्त नहीं है। हमें आचार्य तनियन आदि भी बोलना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों द्वारा शुद्ध किये बिना भोजन को पाना बाधा है। श्रीवैष्णवों के देखने और स्पर्श मात्र से प्रसाद शुद्ध हो जाता है।
  • श्रीवैष्णव, जो सभी को शुद्ध करते है, उनको तदियाराधन विधि में देखकर भी उस विधि में भाग लेने से भागना। एरुम्बी अप्पा के वरवरमुनि दिनचर्या के व्याख्या में तिरुमलिसै अण्णाप्पंगार यह दर्शाते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का ऐसा दिव्य शोभा है की जिनकी उपस्थिति सभी श्रीवैष्णव तदियाराधन गोष्ठी (श्रीवैष्णव का समूह जो एक साथ प्रसाद पाते हैं) में शुभता लाती है। इसलिये प्रसाद पाने से पूर्व वरवरमुनि दिनचर्या का अनुसन्धान करते हैं।
  • अपने स्वयं कि तिरुमाली में सीमित प्रसाद पाना।
  • श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में सीमित प्रसाद पाना (जो अपने आचार्य जैसे अच्छे है)। अनुवादक टिप्पणी: तैत्तिरीय उपनिषद कहता हैं “अन्नं बहु कुर्वियात” (अधिक प्रसाद बनाओं और उसे बाटों)। हमें भी अधिक मात्रा में प्रसाद बनाकर श्रीवैष्णवों को बाँटना चाहिए और जितना जरूरत है उतना ही पाना चाहिये ताकि सरलता से कैंकर्य कर सके।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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