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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २६

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २५

mamuni-thiruvahindrapuram

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – तिरुवहिन्द्रपुरम – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को विशदवाक्शिखामणि की उपाधि दी गयी है (अर्थात् वह जो केवल उतना कहता या लिखता है जितना कि उस तत्त्व को समझाने के लिये आवश्यक है)

५८) उक्ति विरोधी – भाषा / बोली में बाधाएं

उक्ति अर्थात शब्द, भाषा, बात करने का तरीका आदि। इस अंश में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि श्रीवैष्णवों को विशिष्ट श्रीवैष्णव परिभाषा का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये और वही बोलना चाहिये और सांसारिक जनों की तरह बात करने से बचना चाहिये। यह अंश बहुत बड़ा है। फिर भी यह बहुत महत्वपूर्ण है और इसका अपने दैनिक जीवन में भी पालन करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों ने सामान्य शब्दों के लिए कई विशिष्ट सुंदर श्रीवैष्णव शब्दों का प्रयोग किया है। इस विषय का अधिकांश भाग तमील शब्दों से संबंधित है परन्तु यही तत्त्व अन्य भाषाओं में भी लागू किया जा सकता है। अन्य भाषाओं में वहीं कार्य कई शब्दों में समझाया जा सकता है। श्रीवैष्णव होने के कारण हमें सम्मानजनक शब्द अथवा भाषा का प्रयोग करना चाहिये।

  • जब भी कोई श्रीवैष्णव हमें बुलाते है तो हमें “अड़ियेन्” कहकर उत्तर देना चाहिये। और जब सांसारीक जन बुलाते है तो हमें “जी कहिए” ऐसा कहकर उत्तर देना चाहिये। इसका उल्टा करना बाधा है। अगर गलती से या लापरवाही से हम ऐसा करें तो हमें उसका पश्चाताप होना चाहिये और तुरन्त क्षमा माँगना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक मुख्य बात, जब भी हमें सच में अपने अपराध का बोध हो तो उसे फिर से अपने जीवन में दोहराना नहीं चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों से वार्तालाप करते समय सम्मान जनक शब्दों का उपयोग नहीं करना जैसे कृपया गाईये, कृपया अपने हाथों को धोयीये, कृपया ताम्बुल और सुपारी स्वीकार कीजिये, कृपया शयन करिये ऐसा न कहना बाधा है। श्रीवैष्णव परिभाषा में जब हम किसी से वार्ता करते है तो “अरुळ” (हम पर कृपा करिये), “अमुदु” (प्रसाद) और “तिरु” (सत्कार) यह सामान्य शब्द है। इन्हें “पूज्योक्ति” कहते है – सम्मान के शब्द। इन्हें प्रपन्नोक्ति भी कहते है – प्रपन्नों की भाषा। आगे सांसारिकजन कौनसे शब्द का प्रयोग करते है और प्रपन्नों को इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिये वह समझाया गया है। पहिले जो सही शब्द है इनके विषय में समझाया गया है और आगे जिस शब्द से बचना चाहिये वो समझाया गया है। जब हम श्रीवैष्णवों को “विण्णप्पम् अरुळिच्चेय्तरुळ” कहते है उसका अर्थ है अध्यापक स्वामी से कहना कि कृपया गाना प्रारम्भ करें। मन्दिर के सन्निधी में दिव्य प्रबन्ध गोष्ठी के समय मुख्य अध्यापक सबसे “सादित्तरुळ” यह कहकर गाने को कहते है और तनियन प्रारम्भ करते है। अन्य सभी उनके पीछे गाते है। विशेष उत्सव के समय अर्चक या मणियकारर कहते “अरुळप्पाडु साधु श्रीवैष्णवर्गळ्” या “अरुलप्पाडु तिरुवाय्मोलि विण्णप्पम् चेय्वार्”। गोष्ठी के मुख्य अध्यापक और अन्य भी कहते है “नायनरे नायनरे” – यह श्वान सेवा के लिये आज्ञा है। आऴ्वार स्वयं को श्वान बुलाते थे जिसका यह अर्थ था कि वें भगवान के सच्चे सेवक थे और उसके बाद गाना प्रारम्भ करते थे। यह कहीं स्थानो पर देखा जा सकता है। उसी तरह ऐसे उच्च शब्द श्रीवैष्णवों से वार्ता करते समय भी प्रयोग करना चाहिये।
  • सांसारिक लोगों से बात करते समय उच्च शब्दों का उपयोग करने के बजाय यह कहना की कहिये, प्रतीक्षा करिये/बैठीये, निवेदन करिये / तेल देना, विश्राम करिये आदि बाधा है। हमें श्रीवैष्णव परिभाषा का प्रयोग करने कि आवश्यकता भी नहीं हैं और करना भी नहीं चाहिये उन जनों के लिये जिन्हें शायद इन शब्दो की समझ न हो।
  • इन शब्दों का प्रयोग अच्छी तरह से न करना और उनके मूल्य को न जानना बाधा है – वह शब्द है: तीर्थमाडा (स्नान करना), प्रसादप्पड (प्रसाद ग्रहण करना – पाना), अमुदुपड़ी (चावल), करियमुदु (सब्जी), अदिसिल/ तिरुक्कण्णमुत्तु (पायसम – मीठा चावल), प्रसादम (भगवान और भागवतों का शेष प्रसाद), तीर्थ (पवित्र जल), तिरुमंजन (भगवान के अभिषेख के लिये जल), इलैप्प्रसादम/ इलैमुदु (केले के पत्ते में प्रसाद परोसना), मुनरावतु (चुना जो ताम्बूल और सुपारी के साथ प्रयोग होता है)।
  • सामान्य शब्दों का प्रयोग करना जैसे नहा लीजिए, खा लीजिए, चावल, पके हुए चावल, पानी, करी (सब्जी),  वेररिलै (पान के पत्ते), सुण्णाम्बू (चुने की लई) बाधा हैं।
  • इन उच्च शब्दों का प्रयोग देवतान्तर के लिये करना जिन्हें तिरुविल्लात तेवर भी कहते है अर्थात जिनका श्रीभगवान-श्रीमहालक्ष्मी से कोई सम्बन्ध न हो बाधा हैं। वह शब्द है: तिरुपती (दिव्य देश जहाँ भगवान आनन्द से अपने इच्छा से रहते है, उसे तिरुमला-तिरुपती भी मान सकते है), तिरुच्चोलै/ तिरुमालिरुन्चोलै (दिव्य बागीचा), तिरुप पोयगै (दिव्य तालाब), तिरुक्कोपुरम (मंदिर का दिव्य गोपुरं), तिरुमधिल (मंदिर के पास के दिव्य दुर्ग), तिरुविधि (मंदिर के आसपास के दिव्य मार्ग), तिरुमालीगै (आचार्य/ श्रीवैष्णवों का आवास), तिरुवासल (दिव्य मुख्य आगम मार्ग), तिरुमंडपम् (दिव्य मण्डप), तिरुच्चूररू (सन्निधि का अंदरूनी भाग), तिरुवोलक्कम (दिव्य सभा), तिरुप्पल्लियरै (पेरुमाल की दिव्य सन्निधि), तिरूप्पल्लिक कट्टिल (सिंहासन), तिरुमेरकट्टु (विधानं – छत में बांधा हुआ सजावटी वस्त्र), तिरुत्तिरै (दिव्य पटल), तिरुक्कोररोलियल (प्रसाद/ पात्र आदि ढंकने के लिए दिव्य वस्त्र), तिरुवेण चामरम, तिरुवालवट्टम (पंखा), तिरुवड़ी नीलै (चरण कमल/ पादुका), तिरुप्पडीक्कम (वह पात्र जिसमें तिरुवाराधन तीर्थ का संचय किया जाता है), तिरुमंजनक्कुडम (तिरुमंजनम/ तिरुवाराधन के लिए जल लेन का पात्र),  तिरूप्परिकरम (सामग्री), तिरुवंधिक काप्पु (आरती जो पुरप्पादु ले अंत में होती है), तिरुविलक्कु (दिव्य ज्योति), तिरुमालै (दिव्य गलमाल), तिरुवाभरणम् (दिव्य आभूषण), तिरूप्पल्लित तामं (तुलसी की माला), तिरुमेनि (शीष से नख तक भगवान का दिव्य स्वरुप), तिरुनाल (उत्सव/ त्यौहार), आदि अनुवादक टिप्पणी: भगवद, भागवत, आचार्य और आल्वारों के लिये कोई भी शब्द का प्रयोग करे तो पहिले श्री लगाना चाहिये। ऐसा करना हमारा उनके प्रति आदर बतलाता है। परन्तु यह किसी देवताओ के लिये नहीं करना चाहिये। श्रीभक्तिसार स्वामीजी नांमुगन तिरुवंदादि में कहते है “तिरुविल्लात ठेवरै थेरेन्मिन देवू” (मैं उन देवताओं को कभी देवता न समझूँगा जो कभी भी श्रीमहालक्ष्मी से सम्बन्ध न रखते हो)।
  • श्रीरंगम मंदिर को कोयिल ना कहकर श्रीरंगम बोलना, छिंकने के बाद “तिरुवरंगम” नहीं बोलकर इतर दिव्य देशों के नाम लेना, वेंकटेश भगवान को तिरुवेंकटम न बोलकर केवल वेंकटम बोलना, श्री वरदराज भगवान मंदिर को “पेरुमाल कोयिल” ना बोलते हुये कांचीपुरम बोलना, तिरुवनंतपुरम के जगह अनंतशयन बोलना बाधा है। दिव्य देशों के सम्बोधन होते है। तिरुमलाई – तिरुवेंकटम के लिए, कोयिल – श्रीरंगम के लिए, पेरुमाल कोयिल – कांचीपुरम के लिए, तिरुनारायणपुरम – मेलूकोटे के लिए ये सम्बोधन निश्चित हैं। उनको इतर नामों से बुलाना बाधा है। यें चार दिव्य देश श्रीवैष्णवो के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। श्रीवैष्णवो कों संप्रदाय के सम्बोधन उपयोग में लाना चाहिए, न की सामान्य भाषा। अनुवादक टिप्पणी: एक बार श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी एक श्रीवैष्णव गोष्ठी को उपदेश कर रहे थे तभी एक श्रीवैष्णव छिंकता है और “वेंकटम” ऐसा कहता है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को क्रोध आता है और वें कहते है तुम्हें “तिरुवरंगम” कहना चाहिये वह श्रीवैष्णव स्वीकार कर लेता है। परन्तु तिरुमला-तिरुपती से होने के कारण जब वह वापस तिरुमला जाकर श्रीअनन्तल्वान स्वामीजी के पास जाकर इसकी चर्चा करता है, तब श्रीअनन्तल्वान स्वामीजी उसे एक बात कहकर वापस भेजते है। वह फिर से भट्टर स्वामीजी के उपदेश सुनने वहां जाकर छिंकता है। वह फिर से “वेंकटम” कहता है – इस पर श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी कहते है “मैंने तुम्हें तिरुवरंगम कहने को कहा है – तो फिर यह गलती क्यों कर रहे हो?”। तब वह श्रीवैष्णव कहता है “श्रीपरकाल स्वामीजी स्वयं पेरिया तिरुमौली के वेरुवाताल में “वेंकटमे” कहते है जो श्रीरंगनाथ के लिये है”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी जो बहुत चतुर है उन्हें यह उत्तर देते है “देखों यह आल्वार नहीं कह रहे है, यह तो आल्वार परकाल नायकी के चित्त को प्रगट कर रहे है – अगर वह परकाल नायकी होती तो वह भी तिरुवरंगम कहती”। वह श्रीवैष्णव श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के बात से सहमत हो गये।

इस स्थान से श्री रामायण और अन्य पुराणों पुरुषों के नाम यहाँ संप्रदाय परिपेक्ष्य में समझाये गये है। इन सभी महा पुरुषों का कोई विशिष्ट नाम है जिसके द्वारा उनके किसी गुण का बोध होता है। यह बताया गया है हमें सामान्य पद्धती से उनका सम्बोधन ना करते हुये संप्रदाय में वर्णित विशिष्ट नामों से ही संबोधित करना चाहिए। सामान्यतः श्री रामायण को दिव्य शास्त्र का स्थान दिया गया है जो भक्ति के गुण को विशिष्टता से समझाती है।

  • श्री रामायण में – पेरुमाल की जगह श्रीराम बोलना, नाचियार/पिराट्टी की जगह सीताजी बोलना, इलाया पेरुमाल की जगह श्रीलक्ष्मणजी बोलना, कृष्ण की जगह श्रीकृष्ण बोलना (कृष्ण गो चराने वाले हैं, अत: वे श्रीकृष्ण नहीं अपितु मित्र की तरह कृष्ण सम्बोधन पसंद करते हैं।), अलगिय सिंगर की जगह श्रीनृसिंहजी बोलना – भक्तिसार स्वामीजी ने नान्मुगम तिरुवंदादी में कहते है – अलगियान ताने अरियुरुवन ताने ” (सिंह मुख भगवान सबसे सुंदर है, विष्णु सहस्त्रनाम में भी कहा गया है कि “नारसिम्ह वपु श्रीमान”– सबसे सुंदर सिंह मुख धारण किये भगवान), गुह पेरुमाल की जगह गुह बोलना, तिरुवड़ी की जगह श्रीहनुमानजी बोलना, महाराज की जगह श्रीसुग्रीवजी बोलना, पेरिया उदइयार की जगह श्रीजटायुजी बोलना, तिरु तुलै की जगह श्रीतुलसीजी बोलना बाधा है। (गुह को भगवान श्री राम ने अपने भ्राता को स्थान दिया है। अत: उनको गुह पेरुमाल कहते हैं।)
  • अनुवादक टिप्पणी: इस का सार यही है की विशेष आदर से और उनको आनंद मिले ऐसे सम्बोधन से संबोधित करना चाहिए। उत्तर भारत में दक्षिण भाषा के शब्द प्रचलित न होने से यह संभव नहीं हो पाएगा। हमें बस इतना ध्यान रखना है की प्रत्येक शब्द अत्यंत आदर पूर्वक, जिसको सम्बोधन करते हैं उसे अच्छा लगे ऐसा और हमारे पूर्वाचार्य, आलवारों में प्रचलित हो ऐसा होना चाहिए।
  • आल्वान / आल्वार भगवान के बड़े भक्तों के लिये प्रयोग किया जाता हैं जैसे श्रीविभीषण आल्वान, श्रीगजेन्द्राल्वान, तिरुवाझियाल्वान (सुदर्शन चक्र), श्रीपाञ्चजन्याल्वान (शंख), श्रीभरताल्वान, श्रीशत्रुघनाल्वान, कोईलाल्वार (भगवान कि सन्निधी), नम्माल्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी)। ऐसे न करना बाधा हैं। हम यह भी देख सकते है कि श्रीपेरियावाचन पिल्लै ने घण्टाकर्ण, जो मृत शरीर खानेवाला राक्षस हैं उनकी भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति को देखकर उन्हें भी “श्री घण्टाकर्णाल्वान” कहकर संबोधित किया। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: आल्वान / आल्वार वह हैं जो भगवद अनुभव में लीन हैं। भगवान के प्रति उनके लगाव को दर्शाने हेतु वह केवल कुछ व्यक्तिविशेष के लिये प्रयोग करते है। कई आचार्य को आल्वान उपाधी प्राप्त हुई हैं – श्रीकुरेश स्वामीजीइंगलाल्वान, नदातुराल्वान, मिलगाल्वान उनमें से कुछ है जिन्हें भगवान के प्रति उनकी अत्यंत प्रीति के लिए ऐसे संबोधन से शुशोभित किया गया.
  • “तीर्थ नारायण” के बजाय “सालग्राम” कहना बाधा है। सालग्राम दिव्य देश जहाँ के निकट कण्टकी नदी में भगवान शिला रूप में प्राप्त होते है। सामान्यत: भगवान को “सालग्राम” कहा जाता है। श्रीवैष्णव परिभाषा में यह सही नहीं है। उन्हें तीर्थ नारायण कहकर बुलाया जाता है (क्योंकि वें तीर्थ (जल) में प्राप्त होते है)। उन्हें “श्री मूर्ति” भी कहा जाता है। अनुवादक टिप्पणी: सालग्राम शिला बहुत पवित्र हैं। भगवान पत्थर रूप में प्राप्त होते हैं जिन्हें कोई भी अपने तिरुमाली में कम से कम आवश्यकता से पूजा कर सकता हैं। तीर्थ का अर्थ भी पवित्र हैं – इसलिये भगवान को तीर्थ नायनार भी बुलाते हैं। नायनार अर्थात “भगवान” या “सबसे अधीक सम्मान जनक”।
  • विशेष उपाधी को न जानना या प्रयोग न करना बाधा है। उन विशेष उपाधीयों मे शामिल हैं:
  • श्रीमत द्वारपति नायनार – भगवान के मन्दिर आदि के मुख्य द्वारपालों के नाम।
  • तिरुवासल काक्कुम मुदलीगल – यह द्वारपाल मन्दिर के अन्दर हैं (निकट सन्निधी के बाहर)। तिरुपावै के १६वें पाशुर में – “नायगनाय् निन्र नन्दगोपनुदैय कोयिल काप्पाने! तोरण वायिल काप्पाणे!”, भगवान के सेवक जो सभी क्षेत्रों कि रक्षा करते हैं ऐसे पहचाना गया है।
  • सेनै मुदलियार – श्रीविष्वक्सेनजी – भगवान के मुख्य सेनापती।
  • नम्बी मूत्ता पिरान – श्रीबलरामजी जिनकी भगवान कृष्ण के बड़े भ्राता ऐसे स्तुति किया गया है और वह जो हमेशा भगवान का खयाल रखते हैं।
  • श्री मालाकार – जैसे विष्णु पुराण में “माल्योपजीवन:” ऐसे बताया गया हैं, वह जो अपना जीवन पुष्पहार बेचकर बिताते है। अनुवादक टिप्पणी: उन्होने भगवान कृष्ण को सबसे अच्छा हार सबसे अच्छे इरादे से दिया और भगवान को बहुत खुश किया।
  • श्री विदुरजी – विदुर (ध्रुतराष्ट्र और पाण्डु के भाई) जिन्हें विदुराल्वान भी कहते थे भगवान कृष्ण के बहुत बड़े भक्त हैं। अनुवादक टिप्पणी: उनकी स्तुति “महा मथि” (वह जो बहुत विद्वान हो) ऐसे किया गया हैं। उन्होंने केले फेंककर भगवान कृष्ण को बड़े प्रेम भाव के कारण छीलके खिलाये। सच्चा ज्ञान अर्थात भगवान के प्रति उपासना।
  • श्री नन्दगोप – नन्द महाराज जिन्होंने भगवान कृष्ण को पाल पोसकर बड़ा किया। अनुवादक टिप्पणी: इनकी भी व्याख्यानों में बहुत जगह भगवान कृष्ण के प्रति लगाव के कारण स्तुति हुई हैं।
  • हमारे पूर्वाचार्य द्वारा जिन भगवान का नाम न लिया गया हो उन भगवान का नामस्मरण करना बाधा है। भगवान का नाम जैसे हरीश, सुरेश, नरेश आदि आये हैं परन्तु यह नाम हमारे आचार्य प्रयोग नहीं करते थे और इसलिये हमें भी उनका प्रयोग नहीं करना चाहिये।
  • जैसे हमारे पूर्वज बड़े आनन्द से प्रयोग करते थे वैसे आचार्यों का नामस्मरण किये बिना गाना बाधा हैं। हमारे पूर्वाचार्य सच्चे आचार्य कि स्तुति “पिल्लै”, “आल्वान”, “आण्डान”, “नम्बी” आदि का प्रयोग कर करते थे।
  • एकांतीयों (वह श्रीवैष्णव जो भगवान को हीं उपाय और उपेय मानते हैं) को उनके गाँव, वंश और जन्म पर परखना बाधा हैं। श्रीवैष्णव का उनके जन्म के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए। यह बहुत बड़ा पाप हैं। उनके गाँव के आधार पर भेद करना भी पाप हैं। श्रीवचन भूषण के ७९ और १९४ से २०० सूत्र में यह तत्व को पूर्ण विस्तार से समझाया गया है। कृपया इसे पढ़े और स्पष्ट हो जाये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीवैष्णवों कि स्तुति को स्थापित करते है। उन्होने शास्त्र के प्रमाण देकर श्रीवैष्णव के स्थान की कई भ्रांतियाँ और सन्देह को दूर किया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने सुन्दर और विस्तृत व्याख्यान में कई प्रमाण दर्शाते हैं और विस्तार से समझाते हैं इसलिये यह तत्व स्पष्टता से समझा गया है। उदाहरण के लिये सूत्र ७९ कहता हैं “एकांती व्यापदेशतवय:” – यह श्लोक विष्वक्सेना संहिता से लिया गया हैं। इस व्याख्या में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़े सुन्दरता से विस्तार से यह श्लोक को समझाते है – “जो केवल भगवान के हीं शरण में जाता है वह ही अपने गाँव, जाती आदि बढाई में नहीं पड़ता है परन्तु वह भगवान से अपने सुन्दर और नित्य सम्बन्ध कि बढाई में रहता है”। वह आगे यह भी समझाते हैं कि ऐसे भागवतों के लिये सबकुछ (गाँव, जाती, गोत्र आदि) भगवान ही हैं। सूत्र १९४ से २०० में भागवत अपचार विस्तार से समझाया गया हैं। यहाँ पर श्रीवैष्णव के शरीर त्याग करने के पश्चात क्या शब्द / या पंक्ति कहना हैं विस्तार से समझाया गया हैं। आल्वार कहते हैं “पणिकण्दाय चामारे” (चामारे का अर्थ “मरना है”। “मरणमानाल वैकुण्ठम” (जब कोई श्रीवैष्णव शरीर त्याग करता है वह श्रीवैकुण्ठम जाता है। आजकल श्रीवैष्णव परिभाषा में जब कोई श्रीवैष्णव शरीर त्याग करता है तो उसे “आचार्यन् तिरुवड़ी अदैन्तार”)। पूर्वाचार्य के ग्रन्थों में कई शब्द हैं जो श्रीवैष्णवों के शरीर त्याग करने से संबंधीत हैं जैसे “तिरुवडिच चार्न्तार” (तिरुवड़ी का अर्थ चरण कमल भी है और भगवान भी – तिरुवड़ी चार्न्तार का अर्थ चरण कमल को प्राप्त करना या भगवान को प्राप्त करना), “परमपदम् एय्तिनार” (परमपद को प्राप्त करना – सर्वोच्च तिरुमाली), “तिरुनाडू अलंकरित्तार” (व्यक्ति पवित्र स्थान पर पहूंचना और उसको सजाना), “अवतारं तीर्थं प्रसाधित्तायीररू” (अवतार का अन्त हो गया)।
  • इस बात से यह समझना चाहिये कि आदरणीय कौन से प्रकार के श्रीवैष्णव हैं वैसे पदों का प्रयोग करना चाहिये – ऐसा न करना बाधा है। परमपदधाम और तिरुनाडु दोनों का अर्थ एक ही हैं – केवल भाषा अलग हैं – पहिला संस्कृत और दूसरा तमील में है। फिर भी परमपदधाम सामान्य शब्द है और तिरुनाडु विशेष शब्द है। केवल आचार्य श्रेष्ठ जब देह त्याग करते है तो “तिरुनाडु अलंकरित्तार” ऐसे स्तुति करते है। यह बहुत कठिन है कि किस के लिए कौनसा शब्द का प्रयोग करना है – समय चलते इसे हमें अपने बड़ों से हीं सिखना हैं। अनुवादक टिप्पणी: अन्तिमोपाय निष्ठा में यह चरित्र समझाया गया हैं। श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर कहते हैं – श्रीरामानुज स्वामीजी के परमपदधाम जाने के कुछ समय तक श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कुछ समय तक इस धरती पर विराजमान थे। परन्तु जब वे भी परमपदधाम को प्रस्थान कर दिये तब एक श्रीवैष्णव श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पास जाकर कहते हैं “श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी परमपदधाम को प्रस्थान कर दिये”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी उत्तर देते हैं “श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के लिये तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिये”। वह श्रीवैष्णव पूछता हैं “क्यों नहीं? क्या वें परमपदधाम को प्रस्थान किए ऐसे हम नहीं कह सकते क्या?”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि परमपदधाम प्रपन्न और भक्तों/ भागवतों (वह जो भक्ति योग के परिश्रम से परमपदधाम को जाता है) के लिये सामान्य है – श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी का उद्देश वह नहीं था। तब वह श्रीवैष्णव पूछता हैं “क्या आपके मन में कोई और स्थान हैं?” और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी समझाते हैं “हाँ। तुम्हें यह कहना चाहिये श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में अंतरध्यान हो गये” – यह तथ्य मेरे आचार्य (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने समझाया था। इसी तरह कि घटनायें श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के पेरियाल्वार तिरुमोझी के व्याख्यान में ४.४.७ पाशुर में भी समझाया गया हैं। मुलभुत रूप यह समझाया गया हैं कि सामान्यत: जो श्रीवैष्णव इस संसार को छोड़ कर जाते हैं उन्हें “तिरुवडीच चार्न्तार” से प्रगट करते है। अगर वह श्रीवैष्णव भागवत कैंकर्य में लिप्त थे तो उन्हें “तिरुनाडू अलंकरित्तार” कहा गया है। अगर वह श्रीवैष्णव आचार्य कैंकर्य में लिप्त थे तो उन्हें “आचार्य तिरुवड़ी अदैन्तार” कहा गया है।
  • श्रीवैष्णवो को कष्ट हो ऐसे बात करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें हमेशा अच्छी तरह बोलना चाहिये। शास्त्र में कहा गया हैं “सत्यम ब्रुयत प्रियं ब्रुयात” – सत्य बोलते समय भी सुखदता से बोलना चाहिये जो सामने व्यक्ति को स्वीकारनिय हो।
  • जो व्यक्ति हमें सुन रहा हैं उससे उसका हृदय ज़ोर से धड़कने लगे इस तरिके से बात करना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीराम “मृदु पुर्वंच भाषते” ऐसे जाने जाते हैं – वह जो पहिले मृदु शब्दों से जानकारी लेते हैं, दूसरों को कष्ट पहूंचे बिना मनोहरता से बात करते हैं। इसलिये हम भी अपने आचार्य के पथ का पालन करने का प्रयास कर सकते है।
  • अपनी गलतियों को न कहना, सांसारिक जनों का दोष देखना और अपने केवल अपने अच्छे गुणों को कहना बाधा है। जैसे कहा गया हैं “अहमस्मि अपराधानाम आलय:” मैं सभी दोषों का घर हूँ, हमें अपने आप को बहुत नीचा और नम्र स्थान पर देखना चाहिये। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “तीवीनैयो पेरिताई” (मेरे कई दोष हैं)। अगर कोई अच्छे गुण हैं तो वह भगवान देखेंगे और उसे स्वीकार करेंगे। हमें अपनी बढाई का प्रचार करने कि कोई जरूरत नहीं है।
  • भगवान और भागवतों कि स्तुति न करना बाधा है। भगवान में कोई दोष नहीं हैं। उन्हें दोषरहित ऐसा कहा जाता है। भागवत भी पवित्र होते हैं – फिर भी इस संसार में रहने के कारण वें दोष से प्रभावित हो जाते है। हमें फिर भी उन दोषों कि ओर न देखते हुए उनके पवित्र गुणों कि बढाई करनी चाहिये। भागवतों में दोष देखना बहुत बड़ी गलती है।
  • केवल भगवान कि स्तुति पर केन्द्रीत होकर आचार्य कि स्तुति को र्निलक्षित करना बाधा है। जैसे हम पहिले ही चर्चा कर चुके है कि भगवान दोषरहित और पवित्र है। भागवतों को भी कसौटी कहा जाता है। एक श्रीवैष्णव का बेटा बुरी संगत में पडकर पथभ्रष्ट हो जाता है। उस श्रीवैष्णव को अपने पुत्र के इस परिस्थिति को देखकर बहुत दुख होता है। परन्तु एक दिन अचानक से वह पुत्र बदल जाता है और शिखा, यज्ञोपवित, ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक आदि सहित पिता को आदर भी देता है। वह श्रीवैष्णव आनंदित होकर उसी क्षण पूछता हैं “क्या तुमने श्रीकुरेश स्वामीजी के दर्शन किये?”। इससे हम यह समझ सकते हैं कि उस श्रीवैष्णव को यह पूर्ण विश्वास था कि केवल भागवतों कि कृपा से उनका लड़का बदल गया है। भागवतों कि महिमा भगवान कि महिमा से अधीक है। भागवतों में आचार्य हीं सबसे बड़े है – हमें अपने आचार्य के बारें में कभी भी उच्च बोलना चाहिये।
  • आध्यात्मिक विषयों में ज्ञानी होने से हमें निरन्तर आलवार / आचार्य के पाशुरों और स्तोत्र को गाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। पाशुरों को गाते समय हमें उनके दिव्य अर्थों का भी अनुसन्धान करना चाहिये। इसमें हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा रचित कई ग्रन्थ भी हैं जिन्हें पढ़कर हर समय स्मरण भी करना चाहिये।
  • हमारे आचार्य के सिखाये गुरु परम्परा मन्त्र और द्वय महामन्त्र का जाप छोड़ अन्य मन्त्र का जाप करना और ऐसे गुरु परम्परा मन्त्र और द्वय महामन्त्र के जाप का त्याग करना बाधा हैं। द्वय महामन्त्र (तिरुमन्त्र, द्वय मन्त्र और चरम श्लोक) रहस्य त्रय का सूचक हैं। अनुवादक टिप्पणी: जैसे हमने समझा हैं कि हमारे पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र का निरन्तर जाप करते थे और हमें यह भी समझना चाहिये कि द्वय महामन्त्र का जाप पहिले गुरु परम्परा का जाप किये बिना नहीं किया जा सकता है यानि हम पहिले अम्माजी या भगवान के पास नहीं जाते हैं बल्कि हम गुरु परम्परा के द्वारा ही जाते हैं। इसिलिए हमारे आचार्य द्वय महामन्त्र का जाप करने से पहिले गुरु परम्परा मन्त्र का जाप करते थे।

यहाँ गुरूपरम्परा मन्त्र हैं जिसे द्वय महामन्त्र के पहिले कहना चाहिये।

अस्मद् गुरूभ्यो नम: (हमारे स्वयं के आचार्य)
अस्मद् परमगुरूभ्यो नम: (हमारे आचार्य के आचार्य)
अस्मद् सर्वगुरूभ्यो नम: (सभी आचार्य)
श्रीमते रामानुजाय नम: (श्रीरामानुज स्वामीजी)
श्री पराङ्कुशदासाय नम: (श्रीमहापूर्ण स्वामीजी)
श्रीमद् यामुनमुनये नम: (श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी)
श्री राममिश्राय नम: (श्रीराममिश्र स्वामीजी)
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम: (श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी)
श्रीमन्नाथमुनये नम: (श्रीनाथमुनि स्वामीजी)
श्रीमते शठकोपाय नम: (श्री शठकोप स्वामीजी)
श्रीमते विष्वक्सेनाय नम: (श्रीविष्वक्सेनजी)
श्रियै नम: (श्री अम्माजी 
श्रीधराय नम: (श्री भगवान)

श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २७४ सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है –जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – हमें निरन्तर गुरूपरम्परा और द्वय महामन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 28

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 27

सन्तमिगु तमिळ् मरैयोन् , वेदान्तगुरु (वेदान्ताचार्य)

(द्रमिडोपनिषद् प्रभावसर्वस्व का अन्तिम अध्याय)

स्वामी देशिक (वेदान्ताचार्य) जी स्पष्टरूप से कहते है कि संस्कृत वेद को समझने के लिये सर्वप्रथम अरुलिच्चेयल (दिव्यप्रबन्ध) का अध्ययन करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | दिव्य प्रबन्ध केवल उन लोगों के लिये नही जो वेद नही पढ सकते परंतु कहने का तात्पर्य यह है कि  बिना दिव्य प्रबन्ध पढे, वेद पढने वाले भी वेद का पूर्ण अर्थ प्राप्त नही सकते |

स्पष्टतः यह अविवादित विषय है कि स्वामी वेदान्ताचार्य एक ऐतिहासिक आचार्य एवं संस्कृत के महान् विद्वान है, जिसका प्रमाण उनके विशिष्ट ग्रन्थ रचनाएँ है | परन्तु , उन्होने कभी यह नही सोचा कि वेदान्त कि उत्कृष्ट सिद्धान्त तत्त्वज्ञानवेत्ताओं मे उनकी निष्ठा एवं उनकी कौतुक संस्कृत भाषा परिज्ञान होने के बावज़ूद उन्होने दिव्यप्रबन्धाध्ययन की उपेक्षा की हो |

भगवद्पाद श्रीवेदान्ताचार्य स्वामीजी अपने “अधिकार सङ्ग्रह ” मे कहते है :

चेय्य तमिळ् मालैकळ् नाम् तेळिय ओडित्तेळियाद मरैनिलङ्गळ् तेळिगिन्ड्रोमे  “ |

इस पासुर मे, स्वामी वेदान्ताचर्य संस्कृत वेद को “ तेळियाद मरैनिलङ्गळ् ” अर्थात् ” वेद श्रुति के अस्पष्ट अनुभाग ” से सम्बोधित करते है | इसके विपरीत आपश्री दिव्यप्रबन्ध को “तमिळ् मालैकळ् तेळिय ओडि ” कहते हुए दर्शाते है कि दिव्यप्रबन्ध को स्पष्टरूप से सीखना चाहिये | यह केवल सुझाव नही है परन्तु आपश्री का नित्य स्वनियम एवं स्वाभ्यास है (नाम् तेळिय ओडि) |  

यही विचार को अपने “द्रमिडोपनिषद् तात्पर्य रत्नावली ” ग्रन्थ मे व्यक्त करते हुए कहते है :

” यत् तत् कृत्यं श्रुतिनां मुनिगणविहितैस्सेतिहासैः पुराणै:

तत्रासौ सत्वसीम्नः शठमथनमुनेस्संहिता सार्वभौमी “

वेद की सरल परिभाषा और अर्थ बोधक, इतिहास एवं पुराण, श्रेष्ठ मुनियों का कार्य है | ये सभी सामान्यतया अभिज्ञात है (अपने आपमे सिद्ध करते है) कि इनके कुछ अनुच्छेद (इतिहास एवं पुराण) रजोगुणी एवं तमोगुणी है | परन्तु इसके विपरीत अगर आप गौर करे तो शठकोप सूरी के दिव्य प्रबन्ध सत्वगुण के चरम सीमा मे है (विशुद्ध सत्त्व युक्त है) जैसे शठकोप सूरी स्वयं है और उत्तमोत्तम है (वेद को समझाने के लिये) | अतैव श्री शठकोप सूरी जी की श्री शठकोप संहिता सर्वोपरि एवं सर्वश्रेष्ठ है |

श्रीयामुनाचार्य (श्रीआळवन्दार) जी के स्तोत्र-रत्न के चौथे श्लोक के भावार्थ मे ” माता-पिता .. ” स्वामी वेदान्ताचार्य लिखते है :

अथ पराशर प्रबन्धादपि वेदान्त रहस्य  वैशद्यातिशयहेतुभूतै: सद्य: परमात्मनि चित्तरङ्जकतमै: सर्वोपजीव्यै: मधुरकविप्रभृति सम्प्रदाय परम्परया नाथमुनेर्पि उपकर्तारं कालविप्रकर्षेSपि परमपुरुष सङ्कल्पात् कदाचित् प्रातुर्भूय साक्षादपि सर्वोपनिषत्सारोपदेष्टरम् पराङ्कुश मुनिम्  “माता-पिता-भ्रातरेत्यादि उपनिषद् प्रसिद्ध भगवत् स्वभाव दृष्ट्या  प्रणमति – मातेति ” |

उपरोक्त व्याख्या का अर्थ कुछ इस प्रकार है :: यहाँ श्रीवेदान्ताचार्य स्पष्टीकरण कर रहे है कि वेदान्त के जो रहस्य है उनका यथार्थ प्रकाश श्री शठकोप सूरी ने ही किया है, और अन्य सन्तों या मुनियों जैसे श्री पराशर मुनि की तुलना मे श्री शठकोप सूरी का अभूतपूर्व रहस्योद्घाटन सर्वोत्तम है | और तो और, श्री शठकोप सूरी के पासुर सभी जनों के लिए उपलब्ध एवं उपयोगी है और भगवद्-भक्तों के लिये तो अमृतपान है | इसी कारण, श्री शठकोप सूरी ही उपनिषदों के मान्य शिक्षक है | इसी कारण, आप श्री (श्री शठकोप सूरी) सभी के पूजनीय है – माता, पिता, भ्राता, और स्वयं भगवान् के तुल्य है |    

यतिराज-सप्तति ग्रन्थ मे, एक श्लोक मे स्वामी वेदान्ताचार्य कहते है ::

यस्य सारस्वतं श्रोतो वकुलामोदवासितं श्रुतिनां विश्रयामासं शठारिं तं-उपास्महे

वेदों ने अपने आप को त्याग दिया, जब स्वत: प्रमाण अयोग्य एवं व्यर्थ हुए यथार्थ सिद्धान्त को समझाने मे | ऐसे आशाहीन वेदों (का उद्धार), श्री शठकोप सूरी, (वह सन्त जो वकुला फूलों से सदैव युक्त है या को सदैव धरते है), ने अपने ग्रन्थो से किया |

अपने पादुका-सहस्र ग्रन्थ मे, स्वामी वेदान्ताचार्य अनेकानेक श्लोकों मे आळ्वार एवं पासुरों का जिक्र करते है | आप सभी के लिये कुछ ही उदाहरणार्थ प्रस्तुत है | २९वें श्लोक मे, स्वामी वेदान्ताचार्य कहते है तमिल भाषा, जिसका प्रादुर्भाव अगस्त्य मुनि ने किया, संस्कृत वेदों के तुलना मे, श्रेष्ठता को प्राप्त हुई केवल आळ्वार के पासुरों द्वारा | २२वें पासुर मे, वेदान्ताचार्य स्पष्ट रूपेण कहते है, भगवद्-कृपापात्र बनने के लिये, आळ्वारानुग्रहीत पासुरार्थानुसन्धान के अलावा अन्योपाय नही है अर्थात् वह व्यक्तित्व जो भगवच्छरणारविन्द से सुप्रसिद्ध है और जिनका नाम शठकोप है |

अमृतास्वादिनि प्रबन्ध मे, स्वामी वेदान्ताचार्य कहते है, श्री शठकोप सूरी है जो श्रेष्ठतम एवं उत्तमोत्तम आचार्य है जो भक्तों की रक्षा कर मोक्ष कि ओर प्रेरित करते है |

अन्त मे, स्वामी वेदान्ताचार्य अपने आप को द्राविद वेदान्त विद्वान से सम्बोधित कर स्वयं की प्रसंशा करते है | स्वयं को संबोधित करते हुए कहते है -“ सन्तमिगु तमिळ् मरैयोन् तूप्पुल् तोण्ड्रुम् वेदान्तगुरु ” | उनकी प्रसंशा – “सेन्तमिळ्त्-तूप्पुल-तिरुवेङ्गडवन् वाळिये” |

अत: यह स्थापित हो गया है कि हमारे पूर्वाचार्य आळ्वारों एवं उनके पासुरों को सर्वोत्तम बोध माना गया है | इन २८ लेखों (अनुच्छेदों) मे, पूर्वाचार्य के विश्वासरूपि सागर की एक बूंद (विश्वाससागरबिन्दु) को प्रकाशित किया है | पूर्ण प्रभाव को समझने के लिये ऐसे नियमित एवं कुछ उदाहरण पर्याप्त नही है अपितु ऐसे भाव को समझने के लिये पूर्वाचार्यों के विलक्षण ग्रन्थों का नित्यानुसन्धान करना होगा | लेखक जैसे दासों कि आशा है कि इस माध्यम से आप भक्त पाठकों मे तनिक भर भी पूर्वाचार्यों के असीमित ग्रन्थों के विभिन्न व्याख्याएँ जैसे तिरुक्कुरुगै पिल्लान, नञ्जीयर, नम्पिळ्ळै, पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, वडुक्कु तिरुवीधिपिळ्ळै, वादिकेसर अळिगय मणवाळ जीयर, स्वामी अळगिय मणवाल पेरुमाळ् नायनार, वेदान्ताचार्य, वरवरमुनि इत्यादि के प्रति इच्छा जागरूक हुई होगी | आगे और आशा करते है कि ऐसे विशुद्ध आचार्य परम्परागत सम्प्रदाय के आचार्यों के प्रति प्रेम और भक्ति अधिकाधिक जागरूक हो और उनके टीकाओं के प्रति भी | हम सभी गणातीत रूप से ॠणि है उभय वेदान्त शिरोमणि काञ्चि महाविद्वान प्रतिवादि भयङ्कर अन्नङ्गाचार्य स्वामी के प्रति जिन्होने ऐसे विलक्षण ग्रन्थ को प्रकाशित किया जिसमे यह सिद्ध है कैसे संस्कृत ग्रन्थ और पूर्वाचार्यों कि वेदिक व्याख्या, पूर्णतया आळ्वार मार्गदर्शित है |

आळ्वार की जय हो ! पासुरों की जय हो !

आचार्य की जय हो, जिनके शब्द विशुद्ध है !

इनके ग्रन्थों की जय हो, जो इस जगत् के लिये प्रकाश है !

और अन्त मे वेदों की जय हो !

सुख कि धुन्ध मे और दु:ख के अन्धकार मे, आशा है कि आळ्वार अनुग्रहीत पासुर हमारे दिल एवं बुद्धि मे प्रकाशित रहे | हे स्वामी रामानुजाचार्य !! यह एक इच्छा कि पूर्ति करिये और आप के दासानुदासों पर अनुग्रह करे |

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/26/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-28/

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 27

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 26

श्री पराशर भट्टर और आळ्वार

श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की परम्परा मे, स्वामी श्री पराशर भट्टर, एक प्रसिद्ध एवं निपुण व्यक्तित्व है | उनका सम्प्रदाय एवं परम्परा मे ज्ञान अतुलनीय है और इस विषय मे आपकी प्रवीणता तो स्वामी रामानुजाचार्य से तुल्य है | यही एक मात्र कारण है कि स्वामी रामानुजाचार्य का निर्णय “श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्र की व्याख्या” श्रीपराशर भट्टर करे | आप श्री की “विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र व्याख्या” “श्रीमद् भगवद्गुणदर्पण ” के नाम से सुप्रसिद्ध है | आप श्री की व्याख्या पूर्णतया आळ्वार के दिव्य वचनों से बद्ध है | व्याख्या का विस्तार को देखते हुए, हम इस छोटे से लेख मे विस्तृत रूपेण, आप श्री और आळ्वार के दिव्य प्रबन्ध की समान्ता को दर्शा नही सकते |

अतैव हम केवल श्रीरङ्गराजस्तव का उद्धरण ही देखेंगे | आप श्री, श्री शठकोप सूरी की प्रशंसा करते हुए कहते है :::

ऋषिम् जुषामहे कृष्ण-तृष्णातत्त्वमिवोदितं  |

सहस्रशाखां योद्राक्षीत् द्रामिडीम् ब्रह्म सम्हिताम् || (६)

श्री पराशर भट्टर, श्री शठकोप सूरी की तुलना ऋषि (साधु-सन्त) से करते है | श्री शठकोप सूरी एक और दृष्टिकोण से श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम का साक्षात् स्वरूप है | कहने के लिये जैसे श्री कृष्ण भक्ति और श्री शठकोप सूरी अभिन्न है अर्थात् दोनों का एक ही स्वरूप है | श्री पराशर भट्टर कहते है कि असंख्य वेद शाखाओं का सार को, श्री शठकोप सूरी ने तमिल भाषा मे प्रकाशित किया |

तेरहवें श्लोक मे, आप श्री कहते है :::

अमतम् मतम् मतमतामतम् स्तुतम् परिनिन्दितम् भवति निन्दितम् स्तुतम् इति रङ्गराजमुदजूघुशत्-त्रयि

उपरोक्त श्लोक का पूर्व भाग (प्रथम भाग) उपनिषद् वाक्य “यस्यामतम् तस्य मतम् …” का सीधा अनुसरण करता है | (जो) यह सोचता है कि ब्रह्म ज्ञेय है, (वह) असल मे ब्रह्म को जानता नही है | (जो) यह सोचता है कि ब्रह्म अभी भी अज्ञेय है, वह सत्य मे ब्रह्म को जानता है |

श्लोक के अगले भाग मे श्री पराशर भट्टर कहते है, भगवद् स्तुति करना निन्दा है और निंदा करना स्तुति है | यह विषय उपनिषद् मे कहीं भी वर्णित नही है, तो यहाँ यह कैसे आप श्री ने बताया ? इसका उत्तर आळ्वार अनुगृहीत दिव्य प्रबन्ध ही है | आळ्वार (श्री शठकोपसूरी) पेरिय तिरुवन्दादि मे कहते है

“पुगळ्वोम् पळिप्पोम् पुगळोम् पळियोम्, इगळ्वोम् मडिप्पोम् मडियोम् इगळोम् ” |

यहाँ विशेष यह है कि श्री पराशर भट्ट इन दोनों भागों “त्रयि” से है | इससे यह सूचित किया जा रहा  है कि श्री पराशर भट्ट, उपनिषद् एवं दिव्य प्रबन्धों को वैदिक श्रुति मानते है | यही विचार उनके १६वें श्लोक मे सुस्पष्ट रूप से दर्शाते हुए कहते है – ” स्वं संस्कृत द्राविड वेद सूक्तै: “ अर्थात्  वेद कि सूक्तियाँ दो भाषाओं मे प्रकट हुई है |

२१वें श्लोक मे कावेरी नदी को उपद्रवी नदी मानते हुए एवं इसी भाव का रसास्वादन करते हुए ” दुग्धाब्धिर्जनको जनन्यहमियं “ कहते है जिसमे तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार के मधुर वचन ” तेळिविलाक् कलङ्गल् नीर्चूळ् तिरुवररङ्गं “ का सीधा अनुसरण करते है |

तिरुमङ्गै आळ्वार (परकाल सूरी) के सेवानुगृहीत श्रीरङ्ग मन्दिर के विभिन्न मण्डप, दुर्ग (मीनार), पथ इत्यादि की स्तुति एवं प्रार्थना ३६वें श्लोक मे उपलब्ध है ::

जितबाह्यजिनादिमणिप्रतिमा अपि वैदिकयन्निवरङ्गपुरे |

मणिमण्डपवपगणान् विदधे परकालकविः प्रणमेमहि तान् ||  

चूंकि मण्डप, दुर्ग एवं पथ, पूरी तरह से ऊर्ध्वपुण्ड्र एवं शङ्ख-चक्र से चिह्नित है, इसी लिये आप श्री “वैदिकयन्निव” कहते है | इन्ही चिह्नों की वजह से मण्डप, दुर्ग एवं पथ मे उपयोगित सामग्री वैदिकीय हो गयी है |

चन्द्र पुष्करिणी के पूर्व छोर मे जिन आळ्वारों का निवास स्थान है उनका वैभव गान ४१वें श्लोक इस प्रकार से श्री पराशर भट्ट स्वामी करते है :

पूर्वेण तां तद्वदुदारनिम्न प्रसन्न शीतशयमग्ननाथाः |

पराङ्कुशद्याःप्रथमे पुमांसो निषेदिवांसो दशमांदयेरन् ||

इस चन्द्र पुष्करिणी तटस्थ वृक्ष का वर्णन करते हुए श्री पराशर भट्ट कहते है :

पुन्नागतल्लजम-अजस्र-सहस्र-गीतिसेकोतथ-दिव्य-निजसौरभमामनामः | (४९)

कहा जाता है कि यह तटस्थ वृक्ष सहस्र गीति के मधुर सुगन्ध (सौगन्ध) (महक) रस का नि:स्त्रवण करता है क्योंकि इसी तटस्थ वृक्ष की छाया मे, अनन्य श्रीवैष्णव सहस्र गीति के गूढ एवं निगूढतम अर्थों का रसास्वादन करते थे | इस वैभव एवं सौन्दर्य युक्त वर्णन मे, श्री पराशर भट्ट श्रीवैष्णव दिनचर्या -” दिव्य प्रबन्ध का पठन पाठन एवं आळ्वार श्रीसूक्तियों का सत्सङ्ग – अर्थानुसन्धान एवं भगवद् विषय प्रतिपादक वार्तालाप” भी दर्शाते है |

कुळशेखर आळ्वार, भगवान् श्रीरङ्गनाथ के समक्ष स्थित परिस्थिति के परिणामस्वरूप विकसित भाव का वर्णन करते हुए कहते है : कडियरङ्गत्तु अरवणैयिल् पळ्ळिकोळ्ळुम् मायोनै मनत्तूणे पट्रिनिन्ड्रु एन्वायारवेन्ड्रु कोलो वाळ्तुनाळे ” अर्थात् भगवान् श्रीरङ्गनाथ के दिव्य एवं सुन्दर नेत्रों से रसपूर्ण एवं सुगन्धित प्रवाह, आपके समक्ष स्थित भक्त को इस प्रकार हिला देती है कि वह अपने पैरों पर एक चित्त होकर खड़ा नही हो पाता |  ऐसे दिव्य अनुभूति का निरन्तर अनुभव करने के लिये भक्त को “मणत्तून्” स्तम्भ का आलिङ्गन कर सहारा लेना पडता है | इस भाव का प्रकाशन आप श्री ५९वें श्लोक मे करते हुए कहते है :

शेषशयलोचनामृत नदीरयाकुलितलोलमानानाम् |

आलम्बमिवामोदस्तम्भद्वयम् अन्तरङ्गमभियामः ||

कृपया गौर करे :: श्री पराशर भट्ट स्वामीजी “मणत्तून्” शब्द का सीधा अनुवाद “आमोदस्तम्भ” से करते है |

७८वें श्लोक मे आप श्री कहते है, भगवान् श्रीरङ्गनाथ का मानना है कि उनके प्रिय भक्त श्रीशठकोप सूरी के दिव्य प्रबन्धों के शब्द, उनके निज निवास स्थान का प्रत्यक्षीकरण है |

(वटदल-देवकीजठर-वेदशिरः कमलास्थन शठकोपवाग्वपुषि रङ्गगृहे शयितम्)

९१वें श्लोक मे आप श्री, श्री शठकोप सूरी के दिव्य भाव (मुडिच्चोदियाय् उनदु मुगच्चोदि मलर्न्ददुवो) को पुनरुद्धार कर प्रकाशित करते है | (किरीटचूडरत्नराजिराधिराज्यजल्पिका | मुखेन्दुकान्तिरुन्मुखं तरङ्गितेव रङ्गिणः |)

११६वें श्लोक मे, “त्रयो-देवास्-तुल्यः” श्री शठकोप सूरी के

मुदलान् तिरुवुरम् मूण्ड्रेन्बर्, ओन्ड्रे मुदलागुम मून्ड्रुककुम् एन्बर्

पासुर का सीधा अनुवाद है |

श्री पराशर भट्ट एवं श्री शठकोप सूरी के शब्दों की समतुलना आगे दिखाना केवल अपने को मूर्ख साबित करने का प्रतीक है | श्री पराशर भट्ट के शब्द श्री शठकोप सूरी के दिव्य वचनों के परिपूर्ण सुगन्धरूप से विकसित है जिससे जिज्ञासु को लगता है कि आळ्वार का प्रभाव इनके कार्यों मे है | जो इनके कार्यों अर्थात् ग्रन्थों के शब्दों का रसास्वादन अनुभवी व्याख्याओं सहित करते है, वह निश्चित रूप मे धन्य है |

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 26

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 25

श्रीशठकोप स्वामी एवं कुरेश स्वामी (आळ्वार एवं आळ्वान)

श्रीकूरेश स्वामी द्वारा विरचित, अतिमानुष स्तव का तीसरा श्लोक भी आप श्री का आळ्वार के प्रति अत्यन्त प्रेम भावना को प्रकाशित करता है ::

श्रीमत् परान्कुश मुनीन्द्र मनोविलासात् तज्जानुरागरसमज्जनं अञ्जसाप्य |

अद्याप्यनारततदुत्तित रागयोगं श्रीरङ्गराजचरणाम्बुजं उन्नयामः ||

इस श्लोक का मुख्य पद ” श्रीरङ्गराजचरणाम्बुज उन्नयामः ” है और भगवान् श्रीरङ्गनाथ के दिव्य चरणों की ओर अंकित है | एक सामान्य कवि को भगवान् के चरणकमलों की लालिमा दर्शाने के लिये अनेकानेक कारण है जैसे उनके चरणों की कोमलता, या चरणकमल जो बहुत कोमल एवं नाजूक है, चलने या किसी अन्य क्रिया से ऐसे लालिमा से चिह्नित है |

आल्वार का भगवान के चरण कमलों में पूर्ण शरण होना

हमारे प्रिय आळ्वान (कूरेश) स्वामीजी, (जो) कवियों और श्रीवैष्णवों मे अग्रगण्य चूडामणि है, भगवद् चरणों की लालिमा को एक अलग ही दृष्टिकोण देकर विशेष कारण प्रकाशित करते है | आप श्री कहते है कि श्री शठकोप स्वामीजी (के), (भक्तिसागर से आवृत) हृदय मन्दिर मे भगवान् के चरणों ने निवास प्राप्त कर (भगवान् के दिव्य चरणों ने), प्रेम का रङ्ग (लालिमा को) प्राप्त किया और भगवच्छरणों की यह लालिमा अभी भी ऐसे ही है |

भगवान् के प्रति श्री शठकोप स्वामीजी के प्रेम की तुलना मे कूरेश स्वामीजी का शठकोप स्वामीजी के प्रति प्रेम, बहुत ज्यादा एवं बडा है (सर्वश्रेष्ठ) | अतिमानुष स्तव का द्वितीय भाग जो श्रीकृष्ण भगवान् के दिव्य चरित्र पर आधारित है वह केवल श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य वचनों का सीधा अनुसरण है |

वकुळधरसरस्वतीविषक्त-स्वररसभावयुतासु किन्नरीषु |

द्रवति दृषदपि प्रसक्तगानास्विहवनशैलतटीषु सुन्दरस्य ||

उपरोक्त सुन्दरबाहु स्तव का बारहवाँ श्लोक का तात्पर्य यह है कि किन्नर स्त्रीयाँ जो तिरुमालिरुन्शोलै दिव्य देश के सुन्दरबाहु अर्चा भगवान् को पूजने आती है, वे अपने कौशलपूर्ण गान कला के माध्यम से श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य पासुरों का मधुर गान इस प्रकार करती है कि यह गान इन पासुरों के अर्थों से तालमेल खाती है |  | इसके अतिरिक्त इन किन्नरों का यह गान इतना मधुर एवं रसपूर्ण है कि इस दिव्य देश के कठोर पत्थर भी गल (पिघल) जाते है | इस प्रकार से सभी चिदचित वस्तुएं पिघलकर नुपुरगङ्गा (सिलम्बरु) धारा के रूप मे बहती है | ऐसे दिव्य देश एवं श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति प्रेम भावानाओं को हमारे प्रिय कूरेश स्वामीजी ने बहुत अद्भुत रूप से इस श्लोक मे प्रकाशित किया है |

प्रिय आळ्वान ” मरण्गुळम् इरण्गुम् वगै मणिवण्णा एन्ड्रु कूवुमाल् “ पासुर पद को याद करते है | ऐसे भव्य एवं प्रेममय पासुर को प्रकट करने वाले श्रीशठकोपसूरी के पासुर कठोर पत्थरों को पिघला देते है | सामान्य जन की बात ही क्या करें ? ऐसे पासुर तो सभी जनों के लिये मुक्तिदाता है और निश्चित रूप से मुक्ति देने का सामर्थ्य रखते है |

आळ्वान अन्कित करते हुए कहते है कि इनके पासुर तो केवल इस भूमण्डल के मनुष्य ही नही गाते अपितु समस्त लोकों के जन गाते है जब वे सभी भगवद् आराधना करते है | इस प्रकार से, आळ्वान श्रीशठकोपसूरी के वैभव का रसास्वादन अपने अन्दाज़ मे करते है |

वरदराजस्तव (५९) मे, आळ्वान ऐसे दिव्य स्थानों का वर्णन करते है जहाँ भगवान् के चरणों ने आनन्दपूर्वक निवास प्राप्त किया है | इस सूची मे, वे कहते है ” यश्च मूर्धा शठारे: “ अर्थात् श्रीशठकोपसूरी का मस्तक भगवान् के चरणों का आनन्दपूर्वक निवास स्थान है |

असल मे सत्य यह है कि आळ्वान के प्रत्येक स्तव, श्रीशठकोपसूरी के दिव्य पासुरों पर ही आधारित है | परन्तु उदाहरनार्थ आप सभी के लिये यह तुलना प्रस्तुत की जा रही है |

अनुवादक टिप्पणी :: जो इच्छुक प्रपन्न इनके अर्थों को यथार्थ भाव मे समझना चाहते है वो कृपया श्रीमान उभय वेदान्त कांची स्वामी अनुग्रहीत भावुक सुन्दर व्याख्या का अवश्य पठन करे जो आळ्वान एवं श्रीशठकोपसूरी के प्रत्येक शब्दों की तुलना को दर्शाती है |

 

आळ्वान के पुस्तक का नाम आळ्वान के शब्द श्रीशठकोपसूरी के शब्द तुलनात्मक भाव
श्रीवैकुण्ठ स्तव (७) ऊर्ध्वपुंसां मूर्धनि चकास्ति १) तिरुमालिरुन्चोलै मलैयेतिरुप्पार्कडले एन्दलैये !!!

२) एननुच्चियुळाने

श्रीशठकोपसूरी कहते है : जिस प्रकार अन्य दिव्यदेशों मे भगवान् श्रीमन्नारायण अपने दिव्यचरणों को इङ्गित करते हुए खडे है ठीक उसी प्रकार भगवान् उनके मस्तक पर खडे है | उनका यह भी कहना है कि भगवान् महान सन्तों (जैसे शठकोपसूरी) के मस्तक पर खडे रहते है |
श्रीवैकुण्ठस्तव (१०) प्रेमार्द्र-विह्वलितगिर: पुरुष: पुराण: त्वाम् तुष्टुव: मधुरिपो ! मधुरैर्वचोभि: १) उळ्ळेलामुरुगि कुरल् तळुत्तु

२) ओळिन्देन्वेवारावेत्कै नोय् मेललावियुळ्ळुलर्थ३) आरावमुदे ! अडियेनुडलम् निन्पालन्बाये नीरायलैन्दु करैय वुरुककुगिन्ड्र नेडुमाले
आळ्वार अपनी वाणी एवं हृदय मे कोमलता का कारण भगवद्प्रेमानुभव बताते है |

कूरेश स्वामी भी ऐसे स्वभाव के बारे मे कहते है जो भूतकाल के महान् आचार्य (जैसे आळ्वार) मे है और जिनके शब्द भगवद् अनुराग (प्रेम) से कोमल है |

सुन्दरबाहु स्तव (१०) प्रेमार्द्र-विह्वलितगिर: पुरुषा: पुराण: त्वां तुष्टुवुः मधुरिपो !! मधुरैर्वचोभि: श्रीशठकोपसूरी

अ)
केट्टु आरावानवर्कळ् चेविक्किनिय चेञ्चोल्ले

ब)
तोण्डर्क्कु अमुदुण्णा चोन्मालैकळ् चोन्नेन्

श्रीशठकोपसूरी कहते है कि नित्य सूरियों, भगवान्, भगवद्-भक्तों को,  उनके दिव्य शब्द कितने मधुर और आस्वादनीय है | श्रीकूरेश स्वामीजी कहते है श्रीशठकोपसूरी जैसे सन्तों के दिव्य वचन और शब्द मधू की तरह मधुर है |  
सुन्दरबाहु स्तव (४) उदधिगमन्दाराद्रि

मन्थन-लब्ध-पयोमधुर-रसेन्द्राह्वसुधा-सुन्दरदो: परिघम्

श्रीगोदा अम्माजी
मन्दारम् नाट्टि यन्द्रु मधुरक्कोळुञ्चारु कोण्ड सुन्दरत्तोळुडैयान्
यथार्थ अनुवाद (क्षीरसागर मन्थनलीला को बताने वाले श्लोक)
सुन्दरबाहु स्तव (५) शशधरिङ्खन् आध्यशिखम् श्रीशठकोपसूरी

मदितवळ्कुडुमि मालिरुञ्चोलै

यथार्थ अनुवाद
सुन्दरबाहु स्तव (५) भिदुरित-सप्तलोक-सुविशृंखल-शङ्ख-रवम् श्रीशठकोपसूरी

अदिर्कुरल् चङ्गत्तु अळगर् तम् कोयिल्

यथार्थ अनुवाद
सुन्दरबाहु स्तव (८) सुन्दरदोर्दिव्याज्ञा …

पूरा श्लोक

पेरियाळ्वार् (श्रीविष्णुचित्त स्वामी)

करुवारणम् तन्पिडि … तन् तिरुमालिरुञ्चोलैये

यथार्थ अनुवाद
सुन्दरबाहु स्तव (१६, १७) प्रारूढ श्रियम् आरूढ श्री: श्रीगोदा अम्माजी

एरु तिरुवुडैयान्

यथार्थ अनुवाद
सुन्दरबाहु स्तव (४०) पूरा श्लोक आळ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी)
कोळ्किन्द्र कोळिरुळै चुकिर्न्दित्त मायन् कुळल्
यथार्थ अनुवाद





सुन्दरबाहु स्तव (49)
पूरा श्लोक श्रीगोदा अम्माजी

कळिवण्डेङ्गुम् कलनदार्पोल् .. मिळिरनिनद्रु विळैयाड

तिरुमङ्गै अळ्वार मैवण्ण नरुण्कुङ्जि कुळल्पिन्ताळ मगरन् चेर् कुळैयिरुपाडिलन्गियाड

श्रीकूरेश स्वामीजी का यह श्लोक श्रीगोदा अम्माजी और श्रीतिरुमङ्गै आळ्वार के दिव्य पासुरों से उत्पन्न अनुभवों का सार सङ्ग्रह है |


सुन्दरबाहु स्तव(५५)


पूरा श्लोक
श्रीगोदा अम्माजी
चेङ्कमल नाण्मलर्मेल् तेनुकरुमन्नम्पोल् ..चङ्करैया
यथार्थ अनुवाद

सुन्दरबाहु स्तव (६२ & ६३)

पूरे श्लोक
शठकोप स्वामी :

तण्डामरै चुमक्कुम् पादप्पेरुमानै

श्रीकूरेश स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी के पासुर के चुमक्कुम् पद का दिव्य अनुभव एवं महत्ता का अनुभव करते है |

सुन्दरबाहु स्तव (९२)

पूरा श्लोक
तिरुमङ्गै आळ्वार्

निलैयैडमेङ्गुमिन्ड्रि

भावार्थ : कूरेश स्वामी का श्लोक का छन्द तिरुमङ्गै आळ्वार् के पासुर के छन्द से तुल्य है |

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 25

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 24

परान्कुश पयोधि

ऐसे विभिन्न लवलीन घटनाएँ है जिनसे भगवद् पाद श्रीरामानुजाचार्य के विभिन्न ग्रन्थों मे शठकोप स्वामीजी के दिव्य शब्दों के गूढ़ प्रभाव को अनुभव कर सकते है | हमने यह भी देखा कि किस तरह से भगवद्रामानुजाचार्य, शठकोप स्वामीजी के प्रति सम्मान की भावना रखते है | इस लेख से शुरुकर, हम सभी श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य वचनों का प्रभाव अन्य आचार्यों पर देखेंगे जिनके ग्रन्थ एवं रचानायें अधिकतर संस्कृत मे है |

स्वामी कूरेश

 

स्वामी कूरेश (आळ्वान्), श्रीरामानुजाचार्य के परम उत्कृष्ट प्रतिभाशाली शिष्य, ने विश्व विख्यात “पञ्च-स्तवों”, पाञ्च स्तवों की रचना किये है | पहला स्तव “श्रीवैकुण्ठस्तव” है | स्वामी आळ्वान् इस स्तव मे “यो नित्यं अच्युत …..” श्लोक से प्रारंभ कर,  तदुपरान्त २ श्लोकों मे श्रीशठकोप स्वामीजी की वैभवता का गुणगान करते है | यह सत्य है कि स्वामी रामानुजाचार्य तभी खुश होंगे जब उनके आध्यात्मिक पथ प्रदर्शक गुरु, श्रीशठकोप स्वामी की स्तुति हो | भगवान् (जो सभी स्तुतियों के मुख्य विषयवस्तु है) का अनुग्रह अत्यन्त सुलभता से प्राप्त तभी होगा जब उनके प्रिय स्वामी शठकोपमुनि की स्तुति सर्वप्रथम होगी |

 

 

निम्नलिखित दो श्लोकों का उद्धरण देकर उनके भावार्थ को समझाया जायेगा :  

त्रैविद्या-वृद्धजन-मूर्धविभूषणं यत्सम्पञ्च सात्विकजनस्य यदेव नित्यं |

यद्वाशरण्यं अशरण्य-जनस्य पुण्यं तत् संश्रयेम वकुलाभरणाङ्घ्रीयुग्मम् ||

श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य चरण “त्रैविद्या-वृद्धजन-मूर्धविभूषणं” है | उनके चरण ऐसे आभूषण है जिनको वेदों मे निपुण लोग अपने मस्तक पर सजाकर रखते है | उनके चरण “सात्विकजनस्यनित्यं संपत्“- शुद्ध सात्विक लोगों का नित्य निधि है | यहाँ हमे इस दृष्टान्त को याद रखना चाहिये कि यामुनाचार्य स्वामीजी ने स्वरचित श्लोक मे आप श्री (शठकोप स्वामीजी) को अपना सर्वस्व (माता-पिता …) माना है |

आप श्री के दिव्य चरण उनके लिये भी शरण्य है जो शरणाभाव से ग्रस्त है – ” अशरण्य जनस्य शरण्यं “ | वस्तुत: हम देखते है कि सामान्य जन उन लोगों का शरण लेते है जो धनवान है या समाज मे बहुत प्रभावशाली एवं बलवान है | परन्तु, ज्ञानी जन उपरोक्त विभिन्न खल आश्रयों को त्यागकर अपने मन, वाक, कर्म को ऐसे सामान्य जनों के को समर्पित नही करते | वह सभी दिव्यानुभूति के लिये दिव्य एवं पारलौकिक भगवान् एवं उनके भक्तों के लिये पूर्ण समर्पित है | चूंकि श्री शठकोप स्वामीजी ऐसे ज्ञानी एवं त्यागी भक्त समुदाय के अग्रगण्य नेता है, अतैव ऐसे ज्ञानी जन आप श्री के दिव्य वचनों का आश्रय लेकर आपके दिव्य चरणों मे शरणागत है |  

श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य चरण, इस भौतिक संसार मे पीडित जनों का उद्धार करने मे सक्षम है | अनेकानेक कष्टप्रद तपस्या एवं दिव्य नदियों मे नहाने, की कोई जरूरत नही है | केवल श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य चरण मे शरणागत होना है | उनके दिव्य चरण सभी को तत्क्षण विशुद्ध कर देते है | अत: उनके चरण पुण्य (पुण्यं) है | इस कारण, हम सभी वकुला पुष्पों से अलंकृत, श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य चरण की अभीलाषा सैदव रखते है |

अगले श्लोक मे, कूरेश स्वामीजी कहते है —

भक्ति-प्रभाव-भवद्-अद्भुत-भाव-बन्ध-संधुक्षित-प्रणय-सार-रसौघ-पूर्ण: |

वेदार्थरत्ननिधिर्-अच्युतदिव्यधाम जीयात् परान्कुशपयोधिर्-असीमभूमा ||

इस श्लोक मे, श्रीशठकोप स्वामीजी की अलंकारात्मक तुलना महासागर से की है, कूरेश स्वामीजी ने | आप श्री परान्कुश पयोनिधि अर्थात् आप परान्कुश महासागर है |

इसका कारण चौगुना है, जो निम्नलिखित है ::

१) सागर कई नदियों के प्रवाह से सिंचित है अर्थात् सभी नदियों का समावेश सागर ही होता है | इसी प्रकार आप श्री महासागर मे भक्ति के विभिन्न प्रवाहों का समावेश है | अतैव – ” भक्ति-प्रभाव-भवद्-अद्भुत-भाव -बन्ध-संधुक्षित-प्रणय-सार-रसौघ-पूर्ण: है | भगवद्भक्ति के कारण, आप महासारगर मे ऐसे भावों का आविर्भाव हुआ है जिनसे भगवद्प्रेम का प्रमुख जल जाग्रत हुआ और आप महासागर को नवरसों के धाराओं से पोषित किया |

२) जिस प्रकार महासागर दिव्य मोतियों एवां अन्य संपत्ति का नित्य निवास स्थान है ठीक उसी प्रकार आप महासागर (परान्कुश) भी विशिष्ट सम्पत्तियों का सदन है | आप वेदार्थरत्ननिधि है – वह महासागर सदन है जिसमे मोतियों एवं अन्य जवाहरों जैसे वेदार्थ उपलब्ध है |

३) महासागर भगवान् का शयन क्षेत्र है | भगवान् क्षीराब्धि महासागर पर अपने नित्यसेवक आदिशेष पर शयन करते है | भगवान् श्रीरामचन्द्र ऐसे महासागर पर पुल का निर्माण करते है | भगवान् जल प्रयल मे एक छोटे से पत्ते पर बालस्वरूप मे विराजमान होकर शयन करते है | इस प्रकार से, महासागर भगवद् धाम है (भगवान् का ही धाम है ) — अच्युतदिव्यधाम | सार योगी स्वामी अपने गान (पासुर) मे कहते है, “आलिनिनैत्तुयिन्द्र आऴियान्”, कोलक्करुमेनि चेङ्कण्माल् कण् पडैयुल् एन्ड्रुनतिरुमेनि नी तीन्डप्पेट्रु” |

इसी तरह, आप परान्कुश महासागर, भगवद् धाम है | भगवान् स्वयं अपने दिव्य नित्य धाम को छोडकर, श्रीशठकोप स्वामीजी मे आश्रय पाते है | श्रीशठकोप स्वामीजी स्वयं कहते है — “कल्लुम् कनैकडलुम् वैकुन्दवानाडुम्

पुल्लेन्ड्रोळि़न्धनकोल् एपावम् !! वेल्ल नेडियान् निरंकरियान् उळ्पुकुन्डुनीन्गान् अडियेनदुउळ्ळत्तगम् “, अर्थात् हे ! नील मेघ वर्ण वाले भगवान् ने स्वयं के धामों जैसे तिरुपति, क्षिराब्धि, वैकुण्ठ इत्यादि को निम्न समझकर, दास के हृदय मे नित्य वास स्वीकारा है |

” कोण्डल् वण्णन् चुडर् मुडियन् नाङ्गु तोळन् कुनिचारङ्गन् ओङ्सङ्गत्तै वालाळि़यानोरुवन् अडियेनुळ्लने ” — [भगवान्, काले मेघ वर्ण वाले, चतुर्हस्थ युक्त (वाले), और पांच दिव्य शस्त्रों को धरण करने वाले मेरे अन्तरभाग मे

यही विषय तिरुवाय्मोळि़ “इवैयुमनवैयुमुवैयुम्” मे महत्तव दिया गया है |

४) महासागर इतना विशाल होता है कि किनारा ढूँढना बहुत ही मुश्किल होता है | अत:, असीमभूमा कहा जाता है | आप परान्कुश महासागर की असीमा, उसके स्वभाव और विशिष्ट गुणों के महत्ता मे ही है | कण्णिनुन् शिरुत्ताम्बु, नामक ग्रन्थ मे, स्वामी मधुरकवि आळ्वार्, अपने ज्ञानाचार्य, श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य एवं अतुलनीय अनुकम्पा, कृपा का अनुभव “अरुल्कोण्डाडुम् अडियवर्” पासुर मे ठीक उसी प्रकार करते है जिस प्रकार वेद की श्रुतियाँ परब्रह्म के अतुलनीय परमानन्द को गाती है |

इस प्रकार से, कूरेश स्वामीजी, स्वानुभव से ऐसे परान्कुश पयोनिधि के वैभवपूर्ण महत्ता का गुणगान करते है |

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 24

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 23

आळ्वारों के श्रीसूक्तियों (अरुलिच्चेयल्) से मूल सिद्धान्त का निरूपण

उपनिषदों मे ऐसे कई विभिन्न वेदवाक्य है जो विभिन्न अर्थों को व्यक्त करते है | उनमे से कुछ वाक्य जीव और परमात्मा का भेद नही करते है (जीव और परमात्म अभिन्न है), तो दूसरी ओर कुछ जीव और परमात्मा का सच्चा भेद करते है |

यह स्पष्ट है कि ऐसा कोई भी वेदान्ती नही होगा जो कहेगा कि जीव का होना असत्य है या जीव का सम्भव होना ही मुश्किल है | अन्तत: ऐसे वेदान्ती से पूछा जाए कि “कौन इस लोक मे सुख और दु:ख का अनुभव करता है” ? इसका उत्तर तो परमात्मा हो ही नही सकते | न्यूनयातिन्यून विचार से जीव को ही स्वीकारा जाता है | और, ऐसे वेदान्ती जिसके लिये जीव और परमात्मा मे अभिन्नता मान्य है, मानता है कि जीव, इस जगत् मे जो सुख और दु:ख का अनुभव करता है, वह अनुभव परमात्मा के अनुभव से भिन्न है | ऐसे वेदान्त दर्शनों मे, अभिन्नता अप्रत्यक्ष है न कि प्रत्यक्ष | परमात्मा और जीव की अभिन्नता ऐसे मे स्वीकृत है जब जीव को परमात्मा का ही अप्रत्यक्ष रूप मन पर पडे परछाई इत्यादि माध्यम से माना गया हो |  

अतैव, जीव और परमात्मा की परिभाषा, सभी वेदान्त दर्शनों मे स्वीकृत है | सभी वेदान्त दर्शन मतावलंबि एक ही प्रश्न का सामना करते है – भिन्नात्मक एवं अभिन्नात्मक अर्थ प्रतिपादन वाले उपनिषद् वाक्यों को कैसे सुलझाए ? कैसे समाधान करे ? कैसे पारस्परिक भेदाभेद वाक्यों का निष्कर्ष निकाले ?

उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में, वेदान्तियों के बहुत सारे विचार धाराएँ है ।

अद्वैतवाद मतावलम्बीयों का उपागम यह है कि जो वेदवाक्य भिन्नता को प्रकाशित करते है वह असल में उतने प्रमुख नहीं जितना अभिन्नात्मक वेदवाक्य है ।  उनका मानना है कि भिन्नता केवल तब तक है जब तक जीव अविद्या से बद्ध है और जब जीव विद्या (ज्ञान) से पूर्ण आवृत हो तब भिन्नता होती ही नहीं । ये अभिन्नात्मक वेदवाक्यों का बारंबार उद्धरण देते है जो अभिन्नता प्रकाशित करते है, और भिन्नात्मक वेदवाक्यों की उपेक्षा करते है, क्योंकि इनके यथार्थ निम्न श्रेणी के है ।

भेदावादी वेदांतीयों का दृष्टिकोण अद्वैतवादियों के दृष्टिकोण से पूर्णतया उलटा है । उनका मानना है कि जो श्रुति वाक्य अभिन्नता प्रकाशित करते है और (जो) अद्वैतवादियों का मुख्य प्रमाण है असल में वे अभिन्नता की बात ही नहीं करते । उनका मानना है कि जड़ प्रकृति की तुलना में परमात्मा और आत्मा दोनों ही आध्यात्मिक तत्त्व है । वे यह प्रचार करते है कि जीव परमात्मा के आध्यात्मिक वंशावलि से सम्बन्ध रखता है न कि जड़ प्रकृति के प्राकृतिक वंशावली से । वे उन श्रुति वाक्यों का उद्धरण करते है जो भिन्नता को प्रकाशित करते है और उनका मानना है परमात्मा और जीव-आत्मा में वास्तविक भिन्नता है । उनके अनुसार अद्वैतियों का दावा कि भिन्नता केवल जड़ता (अविद्या) से है असह्य एवं अप्रमाणिक है । उपरोक्त कथन के अनुसार, भेदावादी, परमात्मा और जीवात्मा के भेद और अभेद भाव से असहमत है । वे उन श्रुति वाक्यों का यथार्थ भाव प्रकाश करते है जो वाक्य उनके मतानुसार सहमत है और अन्य सभी असहमत श्रुति वाक्यों का अप्रत्यक्ष या माध्यमिक अर्थ प्रकाश करते है । वे यह भी मानते है कि जो श्रुति वाक्य उनके मत के अनुसार है वह ही यथार्थ एवं सत्य प्रमाण है ।

अतैव उपरोक्त पारस्परिक विपर्यय मतों से भेद-अभेद श्रुति वाक्यों का निर्णय करना आसान नहीं है ।

भेदाभेद मतावलम्बी एकता और भिन्नता को स्वीकार करते है । किस हद तक एकता या भिन्नता स्वीकृत है यह प्रत्येक भेदाभेद तत्त्वदर्शी मत पर निर्भर है । परन्तु वेदान्तियों का मानना है कि भेदाभेद वादी इस वेदान्त प्रश्न का समाधान न कर केवल इस प्रश्न को पुन: दोहराते है । वे स्पष्ट रूप से यह समझा नहीं पाते कि यह सोच भेद और अभेद कैसे अनारक्त है या इसका क्या अभिप्राय है ? और तो और, जब ये समझाने का प्रयास करते है, तो उनका भेद और अभेद का दृष्टिकोण श्रुति (उपनिषद्) सम्मत नहीं है ।

उपनिषदों के प्रति, विशिष्टाद्वैत वेदान्तियों का एक मुख्य एवं विशेष स्थान है | वे भेद श्रुति एवं अभेद श्रुति वाक्यों को प्रमुख या द्वितीय नही मानते | वे इन दोनों श्रुति वाक्यों को तुल्य मानते है | फिर पारस्परिक भेदाभेद का निर्णय कैसे करें ? उनका मानना है कि इसका समाधान देने के लिये बाह्य विवेक बुद्धि जरूरी नही है | इसका समाधान श्रुति मे ही उपलब्ध है | यही विशिष्टाद्वैत मतावलम्बी का पक्ष है | और ऐसे कोई विशेष शास्त्रज्ञ के बुद्धि की जरूरत नही जो ऐसा पक्ष (संरचना) प्रस्तुत करे जिससे श्रुति वाक्य निर्णित हो |  श्रुति (उपनिषद्) स्वयं इस विशेष संरचना का प्रदान करती है | जो वेदान्ती इस श्रुत्यन्तरगत विशेष संरचनाको स्वीकार करेगा, उस के लिये परस्पर विरोध श्रुति व्याक्यों का समधान अत्यन्त सुलभ है |  

विशिष्टाद्वैतवादी यह दर्शाते है कि श्रुति मे दो नही अपितु तीन प्रकार के वाक्य उपलब्ध है जैसे :

१) भेद श्रुति : वह जो जीवात्मा और परमात्मा मे भेद दर्शाते है

२) अभेद श्रुति : वह जो जीवात्मा और परमात्मा मे अभेद दर्शाते है

३) घटक श्रुति : वह जो उपरोक्त पारस्परिक विरोधि श्रुति वाक्यों का निष्कर्ष करे

क्योंकि पूर्व ही भेद और अभेद श्रुति वर्णित है, अतैव अभी घटक श्रुति पर ध्यान देंगे |

ऐसे प्रमुख वेद वाक्य जो तीसरे वर्ग के अन्तर्गत आते है, वह सारे बृहदारण्यक उपनिषद् के अन्तर्यामी ब्राहमण (जो सबसे प्राचीन उपनिषद् से मान्य है), और सुबलोपनिषद् से है | ये उपनिषद् वाक्य यह दर्शाते है कि जीव और परमात्मा का सम्बन्ध शरीर और आत्मा के सम्बन्ध जैसा ही है | जीवात्मा परमात्मा का आध्यात्मिक शरीर है | परमात्मा का शरीर जड और चेतन वस्तुएं है (अर्थात् प्रकृति एवं जीवात्मा) | यह सम्बन्ध सूचित करता है कि भगवान् (परमात्मा ही) अन्तर्यामी है और सभी जीवों के अन्तरात्मा है | यह सम्बन्ध नित्य है और परमात्मा और जीवात्मा का स्वाभाविक गुण है | इसके बिना उनका व्यक्तित्व और अस्थित्व नही है | अतैव, जीव और परमात्मा नित्य सम्बन्धित रहकर एक रूपेण अस्तित्व है, परन्तु उनके निज स्वभाव मे अन्तर है, एक शरीर है और एक आत्मा है | शरीर और आत्मा का जो भावार्थ भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य ने सबसे सरलतम वाग्विस्तार से परिवर्जित रहने के लिये अपने श्री भाष्य मे प्रकाशित किया है, यह विषय प्रस्तुत लेख के विषय लक्ष्य से परे है |

विशिष्टाद्वैतवादि मानते है कि अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैतावाद, ये तीनों साथ-साथ नित्य और सत्य है | परमात्मा और जीवात्मा का अस्तित्व (सत्त्व) एक ही रूप मे है, और जीवात्मा का प्रत्येक उद्धरण परमात्मा मे अन्त होता है | जीवात्मा का स्वाभाविक गुण, अस्तित्व, और व्यवहार नित्य परमात्मा मे निहित है | बिना जीवात्मा के परमात्मा या परमात्मा के बिना जीवात्मा का अस्तित्व असम्भव है | इसी प्रकाश मे एकता (अभिन्नता) मान्य है | स्वाभाविक व्यवहार और गुणों मे, जीवात्मा और परमात्मा भिन्न है | परमात्मा भौतिक जगत् के पीड़ा से परे है और इससे कभी भी पीडित नही होते | परमात्मा असंख्य कल्याण गुणों के राशि है, भौतिक जगत् के कमियों से परे, सर्वकारण कारक, सृष्टिकर्ता, पालन कर्ता, संहारकर्ता, आधारभूत एवं सर्वान्तर्यामी, सर्वोपरि, परमेश्वर, सर्वज्ञ है | इस भौतिक जगत् मे बद्ध जीवात्मा, सुख और दु:ख का अनुभव करता है, कर्म से बाध्य है, और स्वयं को इस त्रास से बचा नही सकता | ऐसा जीवात्मा सर्वेश्वर परमात्मा पर पूर्णतया निर्भर होता है जिसके लिये पूर्ववर्ति स्वभावत: दास है और समर्पित है  | ऐसे सच्चे ज्ञान से अनभिज्ञता के कारण कष्ट भुगतता है | इस दृष्टिकोण मे, परमात्मा और जीवात्मा भिन्न है | परस्परिक भेदाभेद का निरंतरता केवल विभिन्न दृष्टिकोण मे संभव है और इसका कारण केवल जीवात्मा-परमात्मा का शरीर-शरीरि (देह-आत्मा) संबंध है, जिसका अधिवक्ता स्वयं उपनिषद् के घटक श्रुति है | इस प्रकार से उपनिषदों मे भेदाभेद का प्रस्ताव प्रश्न का समाधान बिना किसी संशय से विशिष्टाद्वैत करता है | विशिष्टाद्वैत कोई नवीन परिप्रेक्ष्य है परन्तु सभी उपनिषदों का न्यायिक एवं उचित परिप्रेक्ष्य है जो उपनिषद् के वाक्यों का आधार लेकर पारस्परिक कलहों का समाधान प्रस्तुत करता है | यह परिप्रेक्ष्य वेद व्यास, बोधायन, तन्क, द्रमिद, गुहदेव इत्यादि के विचारों एवं पुराण और इतिहास के अभिमत से अनुकूल है | अत: विशिष्टाद्वैत भारत देश के इस दिव्य वैदिक परम्परा को तारतम्यता से परिरक्षित करता है | अत: विशिष्टाद्वैत के विशिष्ट रूपरेखा मे कर्म, ज्ञान, भक्ति और प्रपत्ति (शरणागति) की महत्ता और अनुप्रयोग महत्त्वपूर्ण मायने रखता है | विशिष्टाद्वैतवादी यह नही मानते कि वेदान्त के एक शिक्षा पद्धति के अनुयायि अज्ञानी और दूसरे ज्ञानी है | वे वेदान्त के सभी वाक्यों का तारतम्य समाधान वेदान्त के पारंपरिक पद्धतियों से  ही करते है

विशिष्टाद्वैति ने कैसे घटक श्रुति को स्वीकारा या पहचाना जिसे पहचानने से अन्य अनभिज्ञ रहे ? इसका उत्तर एक ही है, विशिष्टाद्वैति श्री आळ्वारों के अभिमत से मार्गदर्शित थे और अभी भी है | तिरुवाय्मोळि के प्रथम दो दशक, वेदान्त सूत्रों का सार प्रदान करते है और अतैव उपनिषद् सार |

इस विषय मे, श्री शठकोप सूरि घटक श्रुति के अभिप्राय को ” उडल्मिशै उयिरेन करनदेन्गुम् परन्दुलन् ” (१-१-७) पासुर से शरीर-शरीरि भाव को व्यक्त करते है | उपनिषदों का अध्ययन करने का मार्गदर्शन इसी पासुर से विशिष्टाद्वैति को मिलता है | यह कहना कोई अतिशयोक्ति नही है कि विशिष्टाद्वैतवाद के आचार्य एवं सन्तजन जैसे स्वामी रामानुजाचार्य ने देखा कि उपनिषदों का यथार्थ भाव, आळ्वारों के पासुरों के प्रकाश मे प्रज्वल्यमान है |

केवल यहाँ ही नही अपितु उपनिषदों के पारस्परिक कलहों का समाधान भी, विशिष्टाद्वैति, आळ्वारों के दिव्य पासुरों से ही लेते है |

जैसे कुछ उपनिषद् वाक्य कहते है, सर्वेश्वर परमात्मा निर्गुण है, कुछ वाक्य कहते है वह गुणों का सागर है अर्थाथ् सगुण है | इस विषय मे, कई वेदान्त व्याख्याकारों ने विभिन्न व्याख्यायें प्रस्तुत किये है | यहाँ इस विषय के बारे मे विस्तार से चर्चा करना अनुचित होगा क्योंकि इनका आधार उपनिषद् मे नही है और अधिक विवेक बुद्धि पर आधारित है | विशिष्टाद्वैति सगुण और निर्गुण को एक ही सिक्के के दो पहलू है अर्थात् परब्रह्म के ही दो पहलू है | परब्रह्म तीन गुणों से परे है अतैव निर्गुण है और असंख्य कल्याण गुणों का भण्डार है अतैव सगुण है | इसी प्रकार का समाधान श्री शठकोप स्वामीजी अपने तिरुवाय्मोळि के सर्वप्रथम पासुर ” उयर्वर उयर्नलम् ” मे करते है | सर्वेश्वर भगवान् असंख्य उन्नत एवं कल्याण गुणों का भण्डार है | असल मे, यही अर्थ ब्रह्म कहलाता है | यह शब्द “ब्रह् ” से उत्पन्न है जिसका अर्थ महानता है | परब्रह्म की महानता उसके असंख्य उत्कृष्ट एवं कल्याण गुणों से स्वयं प्रकाशमान है |

स्वामी रामानुजाचार्य इसी पासुर का सीधा अनुवाद कर कहते है :

उयर्वर — अनवधिकातिशय, उयर् — असंख्येय, नलम् उडैयवन् — कल्याणगुणगण, यवनवन् — पुरुषोत्तम: (भगवान् पुरुषोत्तम) |

अतैव वे सभी उत्कृष्ट एवं सौभाग्यशाली जीव है जो स्वामी रामानुजाचार्य के इन शब्दों मे भगवद् प्रिय श्री शठकोप स्वामीजी के प्रेम एवं विशिष्ट तत्त्व की गूंज सुन सकते है |

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 23

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 22

 

श्रीभाष्यकार श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य आलौकिक ग्रन्थों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन

यह स्पष्ट है कि श्रीरामानुज स्वामीजी के दिव्य ग्रन्थों का अध्ययन कर समझना है तो अध्ययन कर्ता को उनके प्रत्येक अक्षरों को बहुत निगूढ़ता एवं गंभीरतापूर्वक से समझना है | उनके शब्दों का अगंभीरता पूर्वक अध्ययन असल मे यतार्थ भावों को प्रकाशित करने मे असफल ही रहा है | श्रीआळवन्दार् (यामानुजाचार्य), पराशर भट्ट स्वामीजी, स्वामी देशिक (वेदान्ताचार्य) के ग्रन्थों कि परिस्थिति को देखने से जो भिन्नता दिखती है वह हमारे लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह भिन्नता उनकी शैली और उनका अभिप्राय है |

श्रीरामनुज स्वामीजी का अनुयायी को यह स्वातंत्र्य है कि, वह उनके शब्दों के निगूढतम यथार्थों को समझने की जिज्ञासा को चुने ही न और केवल उनके ग्रन्थों मे प्रयोगित शब्दों के अर्थों को सतही तौर से ही समझने का प्रयास कर संतुष्ट रह सकता है | ऐसा अनुयायी असल मे भगवद् पाद श्रीरामानुज स्वामीजी के शाब्दिक भाव को नजरअंदाज कर, उनके भाव से वंचित रह जाता है | असल मे, रामानुजानुयायी को, श्रीरामानुज स्वामीजी के सुवाक्यों के अन्तरङ्ग मे छुपे, शठकोप स्वामीजी के निगूढ अर्थों और तत्त्व-विषयों को प्रतिपादित करने वाले उनके पासुरों के शब्दार्थ, को ध्यानपूर्वक और गंभीरतापूर्वक से समझना चाहिये |

इस लेख मे, हम श्रीरामानुज स्वामीजी के रचनाओं मे से ऐसा एक उदाहरण श्रीशठकोप स्वामीजी के आन्तरिक भाव को समझने के लिये नही देखेंगे अपितु उनके रचनाओं को कैसे ध्यानपूर्वक और गंभीरतापूर्वक अध्ययन करना है को समझेंगे | इससे यह सुस्पष्ट है कि भगवद् पाद जगदाचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी ने सांप्रदायिक निगूढ तत्त्वों को सीखने, समझने के लिये, अनेक प्रसंगों मे पर्याप्त मात्रा मे छूट दिये है, जो केवल आळ्वार् से सम्बन्धित ही नही अपितु अन्य विषय तत्त्वों से भी संबंधित है |

उदाहरण के तौर पर, उनके द्वारा रचित, श्रीमद्भगवद्गीता के मङ्गल श्लोक, जो स्वामी यामुनाचार्य का गुणगान करती है :

यत्पदाम्भोरुह ध्यान विध्वस्ताशेष कल्मष: |

वस्तुतामुपयातो$हं यामुनेयं नमामि तं ||

सभी इस विषय से अभिज्ञ है कि भगवद्पाद श्रीरामानुज स्वामीजी, पञ्चाचार्य-पदाश्रित है, अर्थात् उन्होने पाञ्च आचार्यों को स्वीकार किया है | इसका कारण यह है कि, उनको श्री यामुनाचार्य के पदाश्रय उपरान्त, उनसे सीखने का पर्याप्त अवकाश नही मिला | अतैव उनको श्रीपाद यामुनाचार्य की व्यवस्था मे, उनके नियुक्त शिष्यों से श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के विषयो तत्त्वों को सीखना पड़ा | हलांकि उनका शिक्षा अध्ययन बिल्कुल भगवान् श्री कृष्ण का महर्षि सान्दीपनि से समतुल्य है, पर शिक्षा विधि परोक्ष रूप मे इन पाञ्चों के द्वारा संपन्न हुई, क्योंकि श्रीयामुनाचार्य के शिष्य बनने की इच्छा हेतु भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य का श्रीरङ्गम प्रयाण संपन्न होने के पूर्व ही, श्रीयामुनाचार्य का परमपद वास हो गया |

अत: यह संभवत: बहुत आश्चर्यजनक बात है कि भगवद्पाद श्रीरामनुजाचार्य ने अपने गीता-भाष्य के प्रारंभ मे श्रीपाद यामुनाचार्य जी की स्तुति की है पर उनके अध्ययनाचार्यों का उल्लेख मात्र भी नही है जिनसे उन्होने श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के तत्त्वों को सीखा | इसी प्रकार से कोई यह प्रश्न पूछ सकता है कि क्यों भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य ने, केवल श्रीपाद यामुन स्वामीजी की स्तुति की है और संपूर्ण गुरु परंपरा कि स्तुति क्यों नही की ? कूरेश स्वामीजी, स्वामी पराशर भट्ट, स्वामी देशिक (वेदान्ताचार्य) की स्तुतियों मे गुरु परंपरा एवं अन्य आचार्यों की स्तुति स्पस्ट रूप से वर्णित है |

इन सभी का समाधान यह है कि भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य न तो गुरु परंपरा या पञ्चाचार्यों की स्तुति निश्चित रूप से नही करते पर उनका उल्लेख को अवश्य उपस्थित है |

पहला : “यत्पदाम्भोरुह” शब्द १४ अक्षरों का संयुक्त शब्द है – ‘य्’ ‘अ’ ‘त्’ ‘प’ ‘अ’ ‘द’ ‘आ’ ‘म’ ‘ब’ ‘ओ’ ‘उ’ ‘ह’ ‘अ’ | शाब्दिक अर्थ है – चरण (पाद) | इसका और एक अर्थ है – अंश | चूंकि यह शब्द १४ अक्षरों (अंशों) का संयुक्त समूह है, हम इसे ७ चरणों की जोडी (युग्म) समझ सकते है | यहाँ भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य के ७ चरण युग्म है, तत्कालीन पञ्च आचार्य, श्रीपाद यामुन स्वामीजी, श्री शठकोप स्वामीजी (क्योंकि मातापिता श्लोक मे श्री शठकोप स्वामीजी के चरण युग्मों को यामुन स्वामीजी धारण करते है) | इस प्रकार से, श्री शठकोप स्वामीजी से प्रारंभ, पञ्चाचार्य की स्तुति (उपासना) भगवद्पाद रामानुज स्वामीजी ने की है |  

दूसरा : यही अभिप्राय दूसरे शैलि मे प्राप्त एवं समझ सकते है | पूर्ववर्ति पहलू मे, शाब्दिक अर्थ प्रत्यक्ष रूप और नियम संग्रह से समझा जा सकता है, पर इस पहलू मे, शब्द को गंभीरतापूर्वक समझने से शाब्दिक अर्थ समझा जा सकता है | षष्ठी तत्पुरुष समास से इस शब्द का अर्थ समाधित है जैसे “यस्य पदाम्बोरुहे” | आक्षरिक अर्थ है – जिसके चरण युग्म (कमल) | यह अर्थ निम्नलिखित तीन प्रकार से भाषांतरित है :

  • श्रीपाद यामुनाचार्य के चरण युग्म जो असल मे उनके ही चरण कमल है जिनकी उपासना भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य कर रहे है |
  • श्रीपाद यामुनाचार्य के चरण युग्म जो उनके उपास्य चरण युग्म है – भगवान् , श्रीमन्नाथमुनि, श्रीशठकोप स्वामी |
  • श्रीपाद यामुनाचार्य के चरन युग्म उनके शिष्य है | यह विशिष्ट आचरण है कि शिष्य अपने आचार्य के चरण युग्म है | अत: इस प्रकार से यह उनके पाञ्च आचार्यों को दर्शाता है |

तीसरा :  एक और विशेष बात गौर करने के लिये यह है कि भगवद्पाद श्रीरामानुजाचार्य ने ‘प’ शब्द से ही पदामबोरुह शब्द प्रयोग किया है | यह स्पस्टीकरण है कि श्रीपाद यामुन स्वामीकी के शिष्य वृन्द मे, वह शिष्य जिनका नाम ‘प’ से शुरु होता है अग्रगण्य है | श्री रामानुजाचार्य के ऐतिहासिक प्रमाणों से हमे ज्ञात है कि स्वयं पेरिय नम्बि (परांकुश दास स्वामीजी, पूर्णाचार्य) ने रामानुजाचार्य को वैष्णवी दीक्षा प्रदान की थी | आप पाञ्च आचार्यों मे सर्वप्रथम है | आप गुरुपरंपरा मे परांकुश दास से संभोधित है जो ‘प’ शब्द से शुरू होता है | अगर इस शब्द को श्री शठकोप स्वामीजी के प्रारंभ सभी आचार्यों पर्यन्त तक की गणना है, तो फिर ‘प’ शब्द का प्रयोग उपयुक्त है क्योंकि परांकुश नाम श्री शठकोप स्वामीजी का ही प्रारंभिक उपाधि है |

इस प्रकार से भगवद्पाद रामानुजाचार्य, पूरे गुरु परंपरा (शठकोप स्वामीजि से प्रारंभ) अपने तत्कालीन पाञ्च आचार्य पर्यन्त, सभी की स्तुति की है | इसी कारण, तिरुवरङ्ग स्वामीजी (तिरुवरङ्गत्तु अमुदानार्), भगवद्पाद रामानुजाचार्य के तत्कालीन शिष्य, अपने आचार्य के, पूर्वाचार्यों और आळ्वारों के दिव्य ज्ञान मे अभिज्ञ एवं इस संबंध को दर्शाकर, अपने आचार्य की स्तुति करते है |   

यह सच मे भगवद् पाद श्रीरामानुजाचार्य के विद्वत् प्रतिभा का चिह्न है | एक आम व्यक्ति अपनी निपुणता के आधार पर केवल बाह्य अर्थ को व्यक्त करने मे ही समर्थ है | पर इसके विपरीत मे, भगवद् पाद रामानुजाचार्य इतने निपुण निष्णात है कि आप तीक्ष्ण एवं दीर्घ आलोचना को बढावा देने के लिये सभी स्थरों मे रहस्य मर्मज्ञों को छुपाये हुए है कि ये आपके पदाश्रितों को नित्य आनन्द प्रदान करते है जो इन मर्मज्ञों की दिव्यानुभूति मे निमग्न है और आपके प्रबल शब्दों का गहन चिन्तन करते है |  

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/21/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-23/

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