द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 9

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 8

श्री पेरुमाळ कोईल महामहोपाध्याय जदगाचार्य सिंहासनाधिपति उभय वेदान्ताचर्य प्रतिवादि भयंकर श्री अणंगराचार्य स्वामीजी के कार्य पर आधारितII

इस लेख में, हम श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के कप्यासा पर लिखित टीकाओं को जाचेंगे और इसे आलवारों कि
स्तुतियों कि सोच से अनुकरण करके समझने कि कोशिश करेंगे|

गंभीरंबास्समुद्भूत-पुण्डरीक – कमल को जलज या अंबुज या निरजा कहते हैं। यह नाम जल से उत्पन्न
हुए इसी सच्चाई से आये हैं। कमल कैसे उत्पन्न हुआ इसके दूसरे कोई मतलब नहीं। यह जमीन पर
उत्पन्न नहीं हो सकते। इसलिए यह नाम ही योग्य हैं। अंबस्समुद्भूत का मतलब पानी से बाहर उत्पन्न
हुआ ऐसा हैं|

श्री पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी

श्रीवचनभूषण में, श्री पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कहते है

 “थामरैयाई अलर्त्थक्कदवा आदित्य
थाने नीरई पिरित्थाल आततायी उलर्त्थुमा पूली”

   अगर कमल जल से अलग हैं तो सुरज भी उस कमल को सुखाता हैं जिसे वो खिलाना चाहता है । इसे पता चलता हैं कि कमल और जल दोनों कैसे एक दूसरे
के बिना नहीं रह सकते।

भगवान के कमल नयनो कि तुलना उस कमल से कि गयी हैं जो जल में उत्पन्न होता हैं। यह तुलना
कमल के जल में उत्पन्न होने कि साक्षी हैं यह आलवारों कि स्तुतियों में अच्छी तरह जाना जाता हैं।
सिरया तिरुमदल में श्री परकाल स्वामीजी कहते है

“नीरार कमलमं पल सेंगनमाल एण्ड्रोरुवन” 

भगवान कि लाल आँखें सुन्दर जल के कमल कि तरह हैं। तिरुविरुत्तम में आल्वार “अजहलर थामराइक्कन्नान”
इसी मतलब को कहते हैं। स्वामी श्री नंपिल्लै अपनी टीका में कप्यासा की स्तुति में स्पष्ट प्रमाण देते हैं।
वादिकेसरी जीयर के स्वापदेसम में इसी मतलब को दर्शाया हैं।

वादिकेसरी जीयर

स्वामी श्री नंपिल्लै

प्रथम भाग – गंभीर – एक विशेषण जो विशालता दर्शाता हैं और तिरुवोयमोझी आल्वार के शब्दों से
प्रकट होता हैं –

थंपेरुनीर थंदन थामराई मलर्न्धाल ओक्कुणन पेरुङ्कण्णन”

कमल बड़े ठंडे तालाब में खिलता हैं; भगवान के नयन इसी कमल की तरह हैं।

सम्र्स्ता नल पुण्डरीक – कमल अपने पोषण के लिए जल पर निर्भर रहता है, जब पुष्प तंदरुस्त दंडी का
सहारा ले तभी जल का इस्तेमाल होता हैं। दंडी का वर्णन आलवारों के स्तुतियों से कमल के सम्बन्ध से
ही आता हैं। तिरुविरुथ्थम में आल्वार कहते हैं, “एम्पिरान थदण्कंकल मेंकाल कमलट्ठादम पोल
पोलिंदना” – भगवान के सुन्दर नयन कमल के सुन्दर दंडीयों की तरह चमक रहे हैं।

रविकर विकासिता – कमल जल में दंडी के सहारे से सुरज की किरणों से खिलता हैं। यह कमल कि उच्च
किमती खिलने की अवस्था थोड़ी तुलनात्मक भगवान की बहोत सुन्दर नैनो से कि गई हैं। उनके हस्त
सुरज के किरणों के समान हैं। यह वर्णन तिरुवोयमोझी आल्वार की “सेंचुदर्ट्टामराई” स्तुतियों से आया हैं। पुन: एक बार स्वामी नंपिल्लै ने कप्यासा कि व्याख्या को इन स्तुतियों का दृष्टांत दिया। तथापि भगवान
के नयनों से जब सम्बन्ध नहीं हुआ तब श्री कुलशेखर पेरूमल ने कमल और सुरज इन दोनों के बीच में
अपने पेरुमल तिरुमोझी में इस प्रकार सम्बन्ध बनाया “सेण्कमलम अंठरम सेर वेंकधिरोर्कल्लाल
अलरावाल”।

पुंडरिकदलमलयटेक्सनह – मूल व्याख्या कहती पुण्डरीकमेवमक्सीनी जो कि आसानी से अनुवादित कि
गयी हैं, कमल के जैसे नयन या कमल वाले नयन या पुण्डरीकेक्सणह। इसलिए श्री रामानुज स्वामीजी ने
दल, अमला और अयात यह तीन शब्दो को पुण्डरीक और इकसणह के बीच में जोडा। यह आल्वारों कि
स्तुतियों से प्रभावित होकर किया गया हैं।

आल्वारों ने इस तरह सम्बन्ध जोड़ा जैसे “थामराइत्थदण्कण्णन” और “कमलट्ठादम पेरुण्कण्णन”। तमील
में “थड़ा” वैसे ही हैं जैसे संस्कृत में “दल”। संस्कृत का “ल” तमील में “द” ऐसे दिखाई देता हैं। संस्कृत के
विद्वान “लदयोह अबेदह” ऐसा कह सकते हैं (वहा पर द और ल के बीच में कोई भी भेद नहीं हैं)। यह
सिद्धान्त तमील के विद्वान “एज़्हुथ्थुप-पोली” इससे समझ सकते हैं। पूर्वाचार्यों कि व्याख्याओं से “थदम”
शब्द “बड़ा”, “तालाब” या “पण्खुड़ी” इस तरह समझाया हैं। यहा पर पण्खुड़ी शब्द ही उचीत हैं।

आल्वारों के “कमलक्कण्णन…अमलंगलागविझिक्कुम” – भगवान कि सुन्दर झलक सभी दोषों का निवारण
करती हैं। “अमल” शब्द का इस्तेमाल करके भगवान कि झलक कि विशेषता दर्शायी गयी हैं। केयट्स
कहते हैं कि वस्तु कि सुन्दरता हमेशा कि खुशी हैं और इससे प्रेम भाव बढ़ता हैं। इस दावे पर सन्देह
करना सच्चाई हैं। थोड़े समय बाद हालकि वह चीज सुंदर हैं फिर भी लोग उससे उब जाते हैं और अरुची
दिखाते हैं। जब कोई एक दूसरे के जीवन कि दु:ख भरी मेहनत को देखता हैं तब सुन्दरता का विचार
मुश्किल से ही दिमाग में आता हैं। भगवान कि सुन्दरता ही इसके लिए अपवाद हैं। यह रुची को बहोत
बढ़ता हैं, हर कोई इसका अनुभव कर सकता हैं। इसकी सुन्दरता सच में जैसे भक्ति बढ़ती हैं वैसे ही
बढ़ती हैं। इनके सुन्दर नयन भक्तों के भाव और अनुग्रह को झलकाते हैं। यह सिर्फ देखने निहारने के
लिए नहीं हैं, यह केवल शुद्धता कि पहचान नहीं हैं, यह उनके दयालु हृदय का प्रतिबिम्ब हैं जिसमे
हमेशा दु:ख से निवारण करने का उत्साह रहता हैं। सुन्दर नयन, दूसरे वस्तुओं कि सुन्दरता पसन्द नहीं
करते, हमारे सारे दोषों का निवारण करते हैं और हमारी सबसे बड़ी अच्छाई को बढ़ाते हैं।

श्रीवैष्णवों के लिए “अयता” शब्द कहा से आया हैं यह जानना बहोत सुलभ हैं। श्रीयोगीवाहन स्वामीजी कि

“करियवागीप पुड़ाइपरंथु मिलिर्न्धो सेव्वरी योडी निंदवाप्पेरियावाया कण्कल”

यह गाथा तुरन्त दिमाग में आती हैं। भगवान के बड़े सुन्दर नयन हैं।

रामानुज स्वामीजी के शब्दों कि व्याख्या करने के लिए आल्वारों के स्तुतियों से अलग प्रमाण ढूंढने कि
कोशिश आखिर में निराशाजनक हैं। सिर्फ श्री रामायण में जहा ‘रामः कमलपत्राक्सः’, ‘पुण्डरीक
विसालकक्सु’ आदि यह शब्द आयें हैं। श्री स्वामीजी के शब्दों के प्रमणों को दूसरे कुछ आधार ढूंढना
मुश्किल हैं। कोई भी इसे पूर्णतः प्रबन्ध पाठों से ही समझा सकता हैं।
हालाकि मूल संस्कृत में कोई भी तार्किक या धार्मिक विचार नहीं हैं इसलिए इस व्याख्या को आगे ले
जाने के लिए कोई भी आधार नहीं है, श्री रामानुज स्वामीजी जो कि दिव्य प्रबन्धों के अच्छे व्यक्ता हैं,
विविध आल्वारों कि गाथों से निकाल कर के जिससे उनके विचार संस्कृत वेदों के अभिप्राय से स्पष्ट होते
हैं। श्री रामानुज स्वामीजी कि व्याख्याए दिव्य प्रबन्धों पर आधारित हैं इसलिए कोई भी श्रेष्ठता कि हद
कि कल्पना कर सकता हैं और भगवान कि सुन्दर नयनों कि कोर में प्रेम और कृपा का अनुभव कर
सकता हैं।

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/07/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-9/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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