द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 11

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 10

साम्राज्य पट्टाभिशेखम

भक्तों के लिए गद्यत्रय मंगल हैं। शरणागति गद्यम विभाग में श्री रामानुज स्वामीजी ने शुरु में
अखिलहेयप्रत्यनीक यह भगवान के सर्वोत्तम स्वभाव को, उनके श्रेष्ठ आकार को, उनके शुभ भाव को,
उनके श्रेष्ठ और सुन्दर आभुषण को, उनके श्रेष्ठ शस्त्रों को और उनके श्रेष्ठ भार्या को समझाया हैं।

उनके श्रेष्ठ आभुषण के बारे में समझाते समय शुरुवात में ‘स्वीचित-विविध विचित्रानंताश्चर्य’… यह शब्द
आते हैं किरिट मुकुट चूड़ावतंस. तीनों शब्द किरिट, मुकुट और चूड़ावतंस सभी एक ही मतलब दर्शाते
हैं। वह सभी उनके किरिट या अभिषेक को सम्मति देते हैं। यह एक प्रश्न आता हैं कि क्यों स्वामीजी श्री
रामानुजाचार्य ने एक मतलब के लिए तीन शब्दों का प्रयोग किया।

हर एक शब्द किरिट के एक–एक भाग को समझने के लिए लिया गया हैं। किरिट- यह मुकुट के नीव को दर्शाता हैं जो कि मस्तक के चारों तरफ से गुजरता हैं। मुकुट यह मुकुट का वह भाग बताता हैं जो उनके मस्तक के ऊपर से
फैलता हैं। चूड़ा यह मणि हैं जो किरिट से लटककर ललाट पर सजता हैं। अवतंस यह आभुषण का वह भाग हैं जो
कि कानों के उपर पुष्प जैसे आकार किया गया हैं। यह सभी टीका स्वामीजी श्री पेरियवाच्छान पिळ्ळै के टीप्पणि में
भी हैं।

कुछ भक्तजन जिन्होंने भगवान नंपेरुमल के उत्सवों का दर्शन किया है उन्होंने उनके अलग अलग तरह के
अभिषेक को देखा है। वह यह सोच सकते हैं की अलग–अलग शब्द भगवान के अलग-अलग किरिट धारण
करने जैसा है।

इस वर्तमान प्रसङ्ग में, जहाँ हम श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के कार्यों का अनुभव करते हैं वहां आल्वारों
के शब्दों के जरिये यह सोचना योग्य हो जाता है कि आल्वारों ने भी भगवान का अनुभव इस तरह ही
किया होगा।

तिरुविरूत्तम में, आल्वार कहते हैं कि, पारलन्दा पेररसे! एम्विसुंबरसे! एम्माइ निथ्थु वंचिथ्थोररसे! आल्वार
तीन बार भगवान का आदर “अरसे! अरसे! अरसे!” यह कहकर करते हैं।

तीनों शब्द के तीन अलग-अलग मतलब हैं।

त्रिविक्रमा अवतार

पारलन्दा पेररसे! यह भगवान को उनके सौलभ्य वृत्तान्त के कारण राजा के जैसे बतलाता हैं । त्रिविक्रमा अवतार के समय उन्होंने अपने दिव्य चरण कमल हम सब जीव पर रखा था।

 

एम्विसुंबरसे! यह भगवान को उनके परत्वम वृत्तान्त के कारण राजा के जैसे बतलाता हैं । वह वैकुण्ठ में सभी नित्य सूरीयों के उपर राज्य करता हैं।

 

एम्माइ निथ्थु वंचिथ्थोररसे! यह भगवान को उनके प्रणयीत्वम या आल्वारों के लिये प्रेम वृत्तान्त के कारण राजा के जैसे बतलाता हैं। जिसके कारण वह आल्वारों से उनके प्रेम के कारण अलग अलग समय पर हिल-मिल सके ।

 

भगवान के राजा बनने के तीन रास्ते श्री वरवरमुनि स्वामीजी के आचार्य हृदय नामक ग्रन्थ में इस प्रकार
प्रकाशित किया गया हैं

“पारलंधा-वेन्नुम मुंद्रु मुदिक्कुरिया इलवारसुक्कू …. ”

यह देखा जाता हैं कि उनकी भगवत तत्वों को (साम्राज्य पट्टाभिशेखम) सौलभ्य, परत्वम और प्रणयीत्वम को
किरिट, मुकुट और चूड़ावतंस प्रसिद्ध करने के लिए श्री रामानुज स्वामीजी आलवारों के शब्दों का अनुकरण
करते थे।

यहा पर एक शंका उपस्थित होती हैं कि क्या प्रणयीत्वम सौलभ्य का भाग नहीं हैं। यह सच है कि प्रणयीत्वम
सौलभ्य गुण के एक छोटे भाग की तरह अनुभव कर सकते हैं। यह देखा जाता है कि यह भगवान का एक विशेष
गुण हैऔर उसे अलग से अनुभव करना योग्य है। सौलभ्य अलग वर्ग में है और सभी जीवों पर लागू होता है। जब
भगवान उनके श्री चरण सभी के मस्तक पर रखते हैं तब वे उनके बीच में फरक नहीं रखते। परन्तु उनका
प्रणयीत्वम गुण सिर्फ आल्वारों कि दशा में अनुभव कर सकते हैं और वह विशेष गुण है। जो सांसारिक सुख में घिरे
हुए हैं उनके लिए भी सौलभ्य यह साधारण गुण हैं जैसे

“उंदिए उदइए उगण्ठोदुम इम्मंदलथ्ठोर”

परन्तु उनका प्रणयीत्वम गुण आलवारों के विशेष दशा में देख सकते है जो

“उन्नुम सोर परुगु नीर थिन्नुम वेट्रिलैयुमेल्लाम कण्णन”।

इन विशेष गुणों का अनुभव करना प्रचलित हैं जब कि वे दूसरे वर्गीय पद से पहचाना जाता है। श्री
रामानुज स्वामीजी ने “श्री भाष्य” में खुद ही दूसरे उदाहरण दिये है।

जब कि शुरुवात में ही उन्होंने दिखाया कि परब्रम्ह, श्रीनिवास “अखिलभुवना-जन्म-क्षेम-भण्गाडिलियाह” हैं या एक
जो सारी सृष्टी को खेल-खेल में रचता हैं, रक्षक हैं और विनाश करता हैं। उसके बाद भी वें पुन: ऐसे सम्मानित
किये जाते हैं “विनता-विविधा-भूता-रक्षीका-दिक्सह” उनकी अपने भक्तों का रक्षक ऐसे ही प्रशंसा की जाती
हैं। हालाकि उनका रक्षक यह गुण “क्षेम” इसमें पहले से ही प्रगट होता हैं फिर भी इसे वापिस दर्शाया
गया हैं। साधारणत: ‘अखिल-भुवना-क्षेम-लियाह’ इस में उन्हें सम्पूर्ण जगत का रक्षक ऐसे सम्मानित
किया गया हैं। “विनता-विविधा-भूता-रक्षीका-दिक्सह” इसमें उनका विशेष रक्षक गुण उनके भक्तों के प्रति
सम्मानित किया गया हैं। इसी प्रकार प्रणयीत्वम को सौलभ्य के विशेष रूप में अनुभव किया जाता हैं।

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/09/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-11/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
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