विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २७

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २६

६०) सम्बन्ध विरोधीसम्बन्ध में बाधाएं।

भगवान ही उनके माता पिता हैं, श्रीशठकोप स्वामीजी ऐसी घोषणा करते हैं। श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी ही उनके माता पिता हैं ऐसी घोषणा करते हैं।

सम्बन्ध का अर्थ है रिश्ता। वह इन आधार पर हो सकता है १) शरीर से संबंधी, २) मित्रता और ३) आध्यात्मिक पर आधारीत आत्म सम्बन्ध और आत्मा से संबंधीत विषय। इन तीनों में हमें यह समझना है कि तीसरा पक्ष ही मुख्य और स्तुति करने योग्य है। शरीर के संबंधी अर्थात पिता, माता, भाई, बहन और अन्य संबंधी। यह एक विशेष व्यवस्था के अंतर्गत होता है कि अपने कर्मानुसार जीव एक विशिष्ट परिवार में, विशिष्ट माता पिता के यहाँ जन्म लेता हैं। उसीतरह माता पिता के कर्मानुसार उन्हें वह सन्तान प्राप्त होती है जो तंदरुस्त/ कमजोर, अच्छे/ बुरे गुणवाला आदि हो। नाच्चियार तिरुमौली में आण्डाल अम्माजी वारणमायिरम के अन्तिम पाशुर फल श्रुति समझाते है (वह १० पाशुर गाने का परिणाम) “तूय तमिल मालै ईरैन्दुम वल्लवर वायु नन मक्कलैप् पेट्रु मगिल्वरे” (वह जो इन १० पाशुरों को पढ़कर प्रामाणीकता से पालन करेगा उन्हें अच्छी सन्तान प्राप्त होगी और वें सुख से जीवन व्यतित करेंगे)। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी यही तत्व को समझाते हैं “इवैयुम पत्तुम वल्लार्गल नल्ल पदत्ताल् मनै  वाल्वर कोण्ड पेण्डिर मक्कले” (जो भागवत कैंकर्य को समझते है और इन १० पाशुरों को पढ़ते/पालन करते है उनको विशिष्ट परिवार सुख प्राप्त होगा जिसमें सभी भगवान और भागवतों के प्रति कैंकर्यरत होते है)। तिरुमौली में श्रीपरकाल स्वामीजी कहते हैं “कणपुरम कै थोलुम पिल्लैयै पिल्लै एन्रेण्णप् पेरुवरे?” (अगर वो हमारा बालक भी हो और अगर वह बालक तिरुक्कण्णपुरम कि आराधना करता हैं तो उस बालक को छोटा नहीं बल्कि एक बड़ा भक्त मानना चाहिये)। वे तिरुनेडुन्दाण्डगम के २०वें पाशुर में कहते “पेरालन पेर ओदुम पेण्णै मण्मेल पेरुन तवत्तल एन्रल्लाल पेचलामे” (एक छोटी लड़की (स्वयं कि बिटिया) जो भगवान कि स्तुति करती हैं उसे नित्यसूरी (परमपदधाम कि नित्य निवासी) के समान समझना चाहिये)। भगवान कि कृपा से अपनी स्वयं का बच्चा भगवान के बहुत करीब हैं तो उसे को “मेरे छोटा बच्चा” ऐसे न समझना चाहिये बल्कि उसे बड़े आदर के साथ “सुकृतिना (पुण्यात्मा)” ऐसे समझना चाहिये। (अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन में इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाया गया हैं। श्रीकुरेश स्वामीजी कि धर्मपत्नी आण्डाल को सम्प्रदाय में बहुत बड़ी विद्वान माना गया हैं। उनके दो पुत्र श्रीपराशर भट्टर और श्रीवेदव्यास भट्टर जिनका जन्म भगवान श्रीरंगनाथ के प्रसाद से हुआ हैं। दोनों में से श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी विशेषकर उनकी बुद्धीमत्ता और पाण्डित्य के कारण विशेष कीर्ति योग्य है। उनको जन्म देनेवाली माँ आण्डाल अम्माजी भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी का श्रीपाद तीर्थ ग्रहण करती थी। ऐसे पूंछने पर उन्होंने समझाया कि शिल्पकार भगवान कि मूर्ति बनाता हैं परन्तु एक बार उस मूर्ति कि प्राण प्रतिष्ठा हो जाने पर वह शिल्पी भी उसकी पूजा करता हैं। इसी तरह यद्यपि मैंने उसे जन्म दिया हैं परन्तु जैसे हीं उस पर भगवान कि कृपा हो गयी वों मेरे लिये भी पूजनीय हो गया। वह तिरुमौली के ८.२.९ पाशुर को बताती हैं जो इस तत्व को स्थापित करता हैं। इसी संदर्भ में अगर हमारे सांसारिक संबंधी सच्चे भागवत हो तो ऐसे सम्बन्ध का तो बहोत मन बढ़ाना और स्तुति भी करनी चाहिये। इस बात पर ज़ोर दिया गया हैं कि सांसारिक सम्बन्ध से अधीक भगवद, भागवत और आचार्य से उत्पन्न सम्बन्ध को अधिक महत्व देना चाहिये। इस पर भी ज़ोर दिया गया हैं कि जीवात्मा कि उन्नती के लिये केवल सांसारिक सम्बन्ध को महत्व नहीं देना चाहिये। मुख्य तत्व को स्पष्ट रूप से जानने के लिये एक लम्बी प्रस्तावना देना बहुत जरूरी था। इस प्रस्तावना के साथ हम इस विषय के आतंरिक तत्व को आसानी से समझ सकते हैं।

  • देह (सांसारिक) संबंधीयों को संबंधी मानना और भागवत संबंधीयों को संबंधी न मानना बाधा हैं। देह सम्बन्ध हमारे कर्मों से उत्पन्न होते हैं। परन्तु भागवत हमारे स्वरूप ज्ञान से उत्पन्न होते हैं और उसकी स्तुति भी होती हैं।
  • प्रपन्न होने के बावजूद सांसारिक सम्बन्ध रखना और श्रीवैष्णवों से सम्बन्ध नहीं रखना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: प्रपन्न वों हैं जो पूर्णत: आचार्य कृपा से भगवान के शरण हो गया हैं। ऐसे जनों को सांसारिक जनों से नाता रखने में कोई चाह नहीं होती हैं। वें पूरा ध्यान भगवान और भागवतों के कैंकर्य में हीं केन्द्रीत करते हैं।
  • केवल जन्म देनेवाले माता पिता को मोल देना और ज्ञान देनेवाले (आचार्य) माता पिता को मोल न देना बाधा हैं। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अरियाधन अरिवित्त अत्ता! नी चेय्वन अडियेन अरियेने” – यहाँ आल्वार भगवान कि स्तुति आचार्य के समान करते हैं जो पवित्र और मुख्य तत्वों को सिखाते हैं। आचार्य वह हैं जो शिष्य में सच्ची समझ लाते हैं। माता पिता वों हैं जो देह देते हैं और आचार्य वह हैं जो सच्ची समझ देते हैं जो जन्म से भी उच्च हैं। हमें अपने जन्म देनेवाले माता पिता को भी पूर्ण सम्मान देना चाहिये और ज्ञान देनेवाले आचार्य को भी उच्च माता पिता मानना चाहिये जैसे सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते हैं कि “मेलात ताय् तंतैयरुम अवरे इनियावारे” – आज से भगवान हीं मेरे श्रेष्ठ माता पिता हैं जिन्होंने में कौन हूँ इस सत्य का अनुभव कराया हैं। अनुवादक टिप्पणी: इस मुख्य तत्व को हम श्रीमधुरकवि स्वामीजी के कण्णिनुण शिरूत्ताम्बु के चौथे पाशुर से जोड़ सकते हैं “अन्नैयाय अत्तनाय एन्नै आण्डिडुम तन्मैयान शडगोपन एन नम्बिये” श्रीशठकोप स्वामीजी जो पूर्णत: पवित्र गुणोंवाले हैं उनका मुझ पर माता पिता की तरह पूर्ण नियन्त्रण हैं। यहीं बात आलवन्दार में बताते हैं “माता पिता ….” जहाँ आलवन्दार यह घोषित करते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी हीं उनके माता, पिता आदि सब कुछ हैं।
  • सांसारिक भाई बहन को भाई बहन मानना और अपने स्वयं के आचार्य के शिष्यों को भाई बहन न मानना बाधा। हमारे माता पिता के जन्में बच्चों को जैसे हम भाई बहन मानते हैं वैसे हीं आचार्य जो हमारे पिता हैं और उनके शिष्य उनके पुत्र/पुत्री ही है – तो ऐसे शिष्य हमारे स्वाभाविक भाई बहन है।
  • देह संबंधीयों को औपाधिक न मानना और भागवत संबंधीयों को निरुपाधीक न मानना बाधा हैं। हम सब अपने पूर्व कर्मानुसार उसी ही परिवार में जन्म लिये हैं – इसलिये वह नियमबद्ध हैं। परन्तु भागवत सम्बन्ध और आचार्य सम्बन्ध अनियमित हैं।
  • यह न जानना कि अचित सम्बन्ध (शरीर और शारीरिक सम्बन्ध) हटाये जाने योग्य और अस्थाई हैं और अयन सम्बन्ध (भगवान से सम्बन्ध – अयन का अर्थ शरणागतों की तिरुमाली) हटाने जाने योग्य नहीं है और स्थाई हैं, यह बाधा हैं। जीवात्मा और परमात्मा के मध्य में सम्बन्ध वहीं हैं जो सेवक और स्वामी के मध्य में हैं। भगवान स्वामी है और जीवात्मा भगवान का सेवक हैं – यह सम्बन्ध नित्य है और कभी समाप्त नहीं हो सकता हैं। सभी परिस्थिती में जीवात्मा भगवान का सेवक हैं। इसे अच्छी तरह समझना चाहिये।
  • यह न मानना कि अचित सम्बन्ध जीवात्मा के स्वभाव को नाश करता हैं और अयन सम्बन्ध जीवात्मा को इस संसार से ऊपर उठायेगा, बाधा हैं। क्योंकि यह शरीर पदार्थ से बना हैं जिसके ३ गुण हैं – सत्व, रजस और तम, यह जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को पहचान ने से हमेशा रोकेगा। परन्तु एक बार वह जीवात्मा भगवान के शरण हो जाये तब भगवान उसे उसके सच्चे स्वभाव से अवगत करायेंगे। अनुवादक टिप्पणी: माणिक्क मालै में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। वों अचित और ईश्वर के मध्य में बहुत सुन्दर समानता लाते हैं। जब हम सांसारिक सुख कि ओर खिंचे जाते हैं तब अचित यह निश्चित करता हैं कि हम सांसारिक सुख में डुबे रहे और हम कही भी न जाये विशेषकर भगवान कि ओर। उसी तरह जब हम भगवान कि ओर जाते हैं तो भगवान यह निश्चय करते हैं कि हम अपने सच्चे स्वभाव में रहे और उनकी ओर बड़ी भक्ति रखे। वो एक सुन्दर उदाहरण देते हैं। हिरण्यकशिपु प्रकृति कि शरण लेता है और भगवान का विरोध करता हैं – उसका सर्वनाश हो गया। प्रह्लादजी भगवान कि शरण लेते हैं और प्रकृति से दूर रहते है – उनकी उन्नति हो गयी। किसी भी वस्तु कि ओर हम जितना जुड़े रहेंगे हम उतने ही अज्ञानी हो जायेंगे। हम जितना अधिक भगवान से जुड़ेंगे ज्ञान में वृद्धि के कारण हम उतने आनंदित होंगे। अन्त में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै सुन्दरता से सम्पन्न करते हैं –भगवद सम्बन्ध (आचार्य के जरिये) स्थापित करने के पश्चात अगर किसी को अपने शरीर और शारीरिक गतिविधियों से डर नहीं हैं तो ऐसे व्यक्ति के ज्ञान पर सन्देह करना चाहिये।
  • सभी सांसारिक पक्षों को भागवत सेवा में प्रयोग न करना और श्रीमन्नारायण भगवान (वह जो अन्तरयामी है) के साथ का सम्बन्ध ही हमारा पोषण करता हैं, यह न मानना बाधा हैं। श्रीमन्नारायण जगदीश्वर हैं जो सब जगह और सभी में रहते हैं। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “उडल्मिसै उयिरेनक करनथेंगुम परंथुलन” – जैसे जीवात्मा पूरे शरीर में होता हैं (अपने धर्म भूत ज्ञान के जरिये) वैसे हीं भगवान स्वयं हर जगह होते हैं। वेदों में यह दर्शाया गया हैं कि भगवान सभी विषय में अनगिनत जीवात्मा के द्वारा प्रवेश करने कि इच्छा प्रगट करते हैं और अत: यह संसार का जन्म जीवन के विभिन्न रूप में होता हैं।
  • यह मानना कि हम उन सभी सांसारिक जनों से जुड़े है क्यूंकि उनका भगवान से सम्बन्ध है (क्योंकि सांसारिक जन भी भगवान से जुड़े होते है) और यह न मानना कि श्रीवैष्णव जिनके पास पवित्र चेतना हैं उनके साथ हमारा नित्य सम्बन्ध हैं, बाधा है। यद्यपि शरीर के संबंधो का उनके मनुष्यत्व के कारण सम्मान करना चाहिये, पर यह अन्त नहीं हैं। हमें उन श्रीवैष्णवों कि सराहना करनी चाहिये जो निरन्तर दूसरों की प्रगती और उनकी सेवा के बारे में सोचते रहते हैं। हमें यह भी समझना चाहिये कि ऐसे श्रीवैष्णवों के साथ सम्बन्ध नित्य हैं। अनुवादक टिप्पणी: आलवान्दर अपने स्तोत्र रत्न के दूसरे श्लोक में यह घोषित करते है कि “नाथाय नाथ मुनये अत्र परत्र चापि नित्यं यदीय चरणौ शरणम मदीयं” इस संसार और परमपदधाम इन दोनों में श्रीनाथमुनि स्वामीजी (जो उनके दादाजी है) के चरण कमल हीं नित्य शरण हैं।
  • यह न सोचना कि भगवद सम्बन्ध दोनों बन्धन (संसार में बंधना) और मोक्ष (संसार से छुटना) के लिये सामान्य है और आचार्य सम्बन्ध केवल मोक्ष पर हीं केन्द्रीत है, यह बाधा हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के व्याख्या के ४३३वें सूत्र में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि भगवान के शरण होने पर भगवान या तो हमारे असंख्य पाप कर्मों को देखते हुए हमें इस संसार में फिर से कुछ समय अधिक के लिये रखते है अथवा भगवान कृपा कर हमें इस संसार से उठाकर (क्योंकि भगवान स्वाभाविक कृपा करनेवाले हैं) इस संसार के दु:खों से मुक्त कर देते हैं। यह इसलिये कि भगवान निरंकुश स्वतन्त्र है (पूर्णत: स्वतन्त्र और किसी से भी नियंत्रण या कोई भी उन्हें प्रश्न नहीं कर सकता हैं) – यह पूर्णत: अन्त में उन्हीं कि इच्छा हैं। परन्तु आचार्य मुख्य रूप से दया करनेवाले है जो उनके शरण में आते हैं वों हमेशा उसे ऊपर उठाने का ही विचार करते हैं। श्रीलक्ष्मी अम्माजी हमेशा जीवात्मा कि ओर करुणामय रहती है और भगवान से निरन्तर जीवात्मा के उद्धार के लिये सिफारिश करती है – आचार्य भी ऐसे हीं होते है वें कृपा कर यह सुनिश्चित करते है कि शिष्य का कल्याण हो जाये। यह ४४७वें सूत्र में समझाया गया हैं – आचार्य अभिमानमे उत्थार्गम  – आचार्य कि कृपा हीं केवल हमारा उद्धार कर सकती हैं।
  • यह न मानना कि आचार्य के साथ सम्बन्ध हमारी प्राणवायु के समान है और यह मानना की यह सम्बन्ध केवल आचार्य द्वारा शिष्य को मुख्य तत्वों को देने से उत्पन्न होता है, बाधा है। जैसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला में समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयीरैप पेनुमवन” (आचार्य वह है जो जीवात्मा का पोषण कराते है) – वह केवल उपदेशक नहीं है, उन्हें सबकुछ समझना चाहिये और उन्हें पूर्ण आदर, सेवा और सत्कार सहित व्यवहार करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/06/virodhi-pariharangal-27.html

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