वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी २

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<<भाग १

ब्रह्मा टूट जाते है जब  देवी सरस्वती क्रोध में उन्हें छोड़कर तपस्या करने चली जाती हैंI उन्होंने विश्लेषण करना शुरू किया – ” वोह नाराज थी क्योंकि मैंने श्रीदेवी को महान के रूप में वर्णित किया था, उनके (देवी सरस्वती) के नाम को अनदेखा कर दियाI ज़ाहिर है, उन्होंने मुझे छोड़ दियाI परंतु सरस्वती नदी (वही नदी के रूप में हैं) के तट पर तपस्या क्यों? जब कोई नाराज हो तो तपस्या हि करने जाना चाहिए क्या? इस कार्य का कारण क्या हो सक्ता है?…  मंथन कर रहे थे ब्रह्मा – भगवान जो जन्मे थे भगवान नारायण की नाभी सेI

लंबे समय तक विश्लेषण के बाद, विरिन्चन (ब्रह्मा) को उत्तर प्राप्त हुआI

उन्होंने स्मरण किया कि सरस्वती ने उन को एक बार क्या बताया था।

एक समय की बात थी,  ब्रह्मा और देवी सरस्वती में वार्तालाप चल रहा था, उनके वार्तालाप की दिशा गंगा के विषय की तरफ मुड़ीI ब्रह्मा गंगा कि तरफ श्रद्धा दिखाने लगेI यह सुनकर, ज्ञान और शब्दों कि देवी अप्रसन्न हुईI

देवी सरस्वती दुःखी थीं,  ब्रह्मा को गंगा कि प्रशंसा करते हुए देख कर – “एज़्हुमैयुम् कूडि ईन्डिय पावम् इरैप्पोज़्हुतु अळवनिल् एल्लाम् कज़्हुविडुम् पेरुमै गंगई” (यह प्रसिद्ध गंगा प्राणियों द्वारा जन्म के बाद जन्म प्रतिबद्ध सभी पापों को हटाने में सक्षम हैI एक पल में हमें हमारे सारे पापों से मुक्त करती हैI उनके नाम स्मरण मात्र से हमें सभी बुराइयों से मुक्त कर देती हैI)

अगर गंगा की प्रशंसा की जाती है तो गुस्सा आता हैI

श्री देवी कि प्रशंसा से चिढ़ जाती हैI

परंतु सरस्वती ऐसे ही सभी पर नाराज हो, इस प्रकार नहीं है I

(अक्सर, एक महिला अन्य महिलाओं के गुण और महानता से सहमत नहीं होती हैI)

भगवान्, ईश्वर, एक नाटक का अभिनय कर रहे थे, देवी सरस्वती कि चाल के माध्यम से, कांची में स्थापित होने के लिए, ताकि हम मानव जाति को धन्य और संरक्षित किया जा सके I

ऐसे हि कैकेयी की बुद्धि भी दुषित किया गया था इस संसार को उनके महान गुण प्रकट करने के लिएI

और अर्जुन की बुद्धि को भी अस्तव्यस्त किया गया था ताकि महान गीता का उपदेश कर सकेI

अतः, यह भी अपने कल्याण के लिए ही है I

देवी सरस्वती कि अप्रसन्नता को निम्नानुसार तर्क दिया जा सकता है ” मै, सरस्वती नदी के रूप में, उत्तर का बद्रिकास्रम् में प्रवाहित होति हूँI मेरे पास एक विशेष लक्षण है जो अन्य नदियों को नहीं दी गई हैI मेरा प्रवाह कुछ स्थानों पर दिखाई देता हैI कुछ स्थानों पर, मैं अदृश्य हो कर  पृथ्वी के नीचे प्रवाहित होति हूँ (अन्तर्वाहिनि)I

(क्वचितुपलक्षिता क्वचित अपन्कुर कूट गति: – दया सतकम् – श्री देसिकन भी इस दावे को समर्थन देते हैं)

यह मेरी अद्वितीय गुण हैI यह गुण गंगा और अन्य नदियों में नहीं हैI

फिर भी, मेरे स्वामी समेत सभी अपने दोनों हाथ सिर के ऊपर जोड़कर प्रशंसा में गाते हैं “जय, जय”, जिस क्षण गंगा का उल्लेखन होता हैI  मैं इस महिमा के लिए पूर्वनिर्दिष्ट नहीं हूँ – ब्रह्मा कि सहधर्मिणी ने विचार किया I

इस कहानी के साथ आगे बढ़ते हुए,  हमें अनुभव होगा कि इस पवित्र सरस्वती नदी वेगवती के रूप में कांची में प्रकट होती है, यह वही सरस्वती वेदों और महाभारत में एक पवित्र नदी के रूप में  प्रसिद्ध हैI

पाठकों के लिए यह एक और आनंददायक  उपाख्यान (कथा) है….    भारत की पहली सिंधु घाटी सभ्यता वास्तव में सरस्वती नदी सभ्यता हैI  आधुनिक भौगोलिक निष्कर्ष परिणाम बताते हैं कि सरस्वती के तट पर जन्मी हुई सभ्यता कालान्तर के बाद  गंगा तट पर  प्रवास करने चली गईI

अतः, देवी सरस्वती का क्रोध न्यायोचित हैI वह स्वयं को गंगा से श्रेष्ठ मानती थी क्योंकि उनसे हि मानव संस्कृति  गंगा तट पर  प्रवास करने गई I

एक तरफ़: पाठकों के लिए:

१९ वीं शताब्दी के उत्खनन और विष्कर्ष  के परिणाम अतिरिक्त जानकारी के रूप में शामिल हैंI

(देवी सरस्वती निश्चय हो गई कि वह स्वयं को गंगा से श्रेष्ठ मानती थी क्योंकि उनसे हि मानव संस्कृति  गंगा तट पर प्रवास करने गई I)

अपनी इस कहानी के समय, जब देवी सरस्वती क्रोधित हुई, तब यह संस्कृतियों ने रूप नहीं लिया थाI १९ वीं शताब्दी के उत्खनन और विष्कर्ष हमारे कथा में स्वाद जोड़ने के लिए उल्लेख किया गया हैI यह केवल सरस्वती के दृढ़ विश्वास का समर्थन करने के लिए है कि वह क्रोधित होते समय सबसे महान और साथ हि साथ उसके पश्चात् काल में जब वह मानव संस्कृति गंगा तट को दान देने तक सम्मिलित हैI

हम इस कहानी के बारे में किसी भी भ्रम में प्रवेश न करें कि हमारी कहानी के समय कोई मानव सभ्यता थी या नहीं।

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ब्रह्मा ने सहनशीलता से तर्क देना शुरू किया I

ब्रह्मा ने कहा “वाणी!! क्रोधित न होना I गंगा इस वास्तविकता के कारण उच्च है कि वह स्वयं मेरे हस्त से, चतुर्भुज (विष्णु) के कमल चरणों से और शंकर के शीर्ष (बंदे हुए लट) से बहती है I वह हम तीनों द्वारा सम्मानित हैI

मुख्यतः, सिर्फ उन्हें नारायन के चरणों (श्रीपद तीर्थ) से बहने का एक मात्र सम्मान हैI देवी सरस्वती निश्शब्द थी जब ब्रह्मा उन्हे यह बात बता रहे थे, परंतु अब वह क्रोधित थी और तपस्या प्रारम्भ किI सुरज्येश्टन् (देवताओ में उच्च – ब्रह्मा) ने मेहसूस किया कि गंगा से ज्यादा गौरवान्वित होने के लिये देवी सरस्वती यह तपस्या का कार्य कर रही हैI

उन्होंने इस विचार में गहरी साँस लियाI

तब हि अयन (ब्रह्मा) को समाचार मिलता है कि भ्रुहस्पति, देवों के गुरु,अन्य सभी के साथ उनसे मिलने पधारे हैंI अनुचरों में से एक ने अपने आठ कानों में से एक के माध्यम से यह सन्देश गुप्त रूप से ब्रह्मा को सूचित करते है कि ” मेरे प्रभू, भ्रुहस्पति, देव और ऋषि (ऋषि और मुनि), शिव के साथ क्रोध और प्रकोप से आपस में वाद – विवाद करते हुए आपके दर्शन के लिए आये हैं”!

इस प्रकार अनुचर ने जब बताया तो चतुर्मुख भगवान आश्चर्यचकित हो गयेI

भय से काँपते स्वर में, उस अनुचर से पूछा कि क्या विषय हैI

 जवाब क्या दिया गया था?

हमें शीघ्र ही पता चलेगा!!

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/05/11/story-of-varadhas-emergence-2/

archived in https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/

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