अन्तिमोपाय निष्ठा ३ – शिष्य लक्षण

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

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पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा २ – आचार्य लक्षण/वैभव) में, हमने आचार्य की महिमा देखी। हम इस खंड में शिष्य लक्षण के बारे में जानेंगे।

रंगनाथ गुरु (तिरुवरङ्गत्तु अमुदानार्), कूरेश स्वामीजी, श्री रामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार्)

शिष्य लक्षण पर अधिकः

  • उपदेश रत्न माला ७२ – इरुळ् तरुमा ज्ञालत्ते इन्बमुत्तु (इन्बमुट्रु) वाऴुम् तेरुळ् तरुमा देशिकनैच् चेर्न्दु  – अंधेरापन से भरे इस दुनिया में, जीव को उस आचार्य के प्रति आत्मसमर्पण करना चाहिए जो पूर्ण ज्ञान के साथ दिव्य देश श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) और भागवतों की सेवा कर आनन्दमय जीवन व्यापन कर रहे हैं।
  • पेरियाऴ्वार तिरुमोऴि ४.४.२ – कुत्तमिन्ऱि (कुट्रमिन्ऱि) गुणम् पेरुक्कि गुरुक्कळुक्कु अनुकूलराइ शिष्य को सदा दोष रहित होना चाहिए और हमेशा आचार्य के प्रति प्रिय (अनुकूल) होना चाहिए।
  • नान्मुगन् तिरुवन्तादि १८ – वेऱाग एत्तियिरुप्पारै वेल्लुमे मत्तवरैच् (मट्रवरैच्) चार्त्तियिरुप्पार् तवम् भागवताराधन कर रहे लोगों की तपस्या भगवदाराधन करने वाले लोगों की तपस्या से अधिक है।
  • नाचियार् तिरुमोऴि १०.१० – विट्टुचित्तर् तन्गळ् देवरै वल्लपरिसु वरुविप्परेल् अतु काण्डुमे  – अण्डाल अम्मा कहती हैं – अगर पेरियाऴ्वार कण्णन् भगवान् को आमंत्रित कर स्वगृह मे कैसे भी ले आते हैं , मैं आमंत्रित कण्णन् भगवान् को तत्क्षण देखूंगी।
  • कण्णिनुन्चिरुताम्बु तनियन् – वेऱोन्ऱुम् नानऱियेन् – मैं श्री शठकोप (नम्माळ्ळवार) के अलावा कुछ भी (किसी को भी) नहीं जानता।
  • कण्णिनुन्चिरुताम्बु २ – देवुमट्ररियेन्  – मैं श्री शठकोप (नम्माळ्ळवार) के अलावा किसी अन्य भगवान् को नहीं जानता।
  • श्रीमद्रामायण – शत्रुग्नो नित्यशत्रुग्नः – शत्रुग्नाऴ्वान भरताऴ्वान के प्रति यज्ञिय है और वह हमेशा श्री राम की सेवा करने की इच्छा पर काबू पाने के द्वारा भरताळवान की सेवा करते है।
  • श्रीवचन भूषण ४११ – वडुग नम्बि आऴ्वानैयुम् आण्डानैयुम् इरुकऱैयरेन्बर् – वडुग नम्बि  (जो पूरी तरह से श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्)) को आत्मसमर्पण कर चुके हैं) कहते थे कि श्री कूरेश (कूरताऴ्वान्) और श्री दासरथि (मुदलियाण्डान्) दोनों श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) और श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) पर निर्भर हैं (जबकि वह केवल श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) पर निर्भर है)।
  • रामानुस नूट्रन्दादि १ – इरामानुशन् चरणारविन्दम् नाम् मन्नि वाऴ नेञ्जे शोल्लुवोम् अवन् नामङ्गळे – हमें श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) के चरणकमलों की ओर बेहिचक विश्वास विकसित करने के लिए श्री रामानुज के नामों का लगातार जप करना चाहिए।
  • रामानुस नूट्रन्दादि २८ – इरामानुशन् पुगऴ अन्ऱि एन् वाय् कोञ्जिप् परवगिल्लादु, एन्न वाऴ्विन्ऱु कूडियदे – मेरा जीवन अब इतना तेजोमय है, क्योंकि मैं केवल श्री रामानुजा के दिव्य / शुभ गुणों की महिमा करता हूं।
  • रामानुस नूट्रन्दादि ४५ – पेऱोन्ऱु मर्ट्रिल्लै निन् चरणन्ऱि, अप्पेरळित्तर्कु आऱोन्ऱुम् इल्लै मर्ऱच् चरणन्ऱि – श्रीरंगनाथ गुरु (अमुदनार्) श्री रामानुज (एम्पेरुमानार्) की ओर – मेरे जीवन का लक्ष्य आपके चरणकमलों की सेवा करना है और इसको (लक्ष्य) पूरा करने के लिए आपके चरणकमल ही एकमात्र मार्ग है।
  • रामानुस नूऱ्ऱन्तादि ४८ – निगरीन्ऱि निन्ऱ एन् नीचतैक्कु निन्नरुळिन् कण् अन्ऱिप् पुघल् ओन्ऱुमिल्लै अरुट्कुम् अख्ते पुगल्  – मेरे दोष अनगिनत हैं, मेरे दोषों से केवल आपकी कृपा ही मुझे शुद्ध करेगी। अपनी कृपा को प्रज्वलित करने के लिए, मुझे कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है, जब आप मुझे देखेंगे तब वो स्वचालित रूप से बह जाएगा।
  • रामानुस नूट्रन्दादि ५६ – इरामानुशनै अडैन्तपिन् एन्वाक्कुरैयातु एन् मनम् निनैयातु इनि मर्ऱोन्ऱैये – श्री रामानुज की आश्रय लेने के बाद, मेरे शब्द किसी और की महिमा नहीं गाएंगे और मेरा दिमाग किसी और चीज के बारे में नहीं सोचेगा।
  • रामानुस नूट्रन्दादि ७९ – इरामानुशन् निर्क वेऱु नम्मै उय्यक्कोळ्ळवल्ल देय्वम् इन्गु यादेन्ऱुलर्न्दवमे ऐयप्पडा निर्पर् वैयत्तुळ्ळोर् नल्लऱिविऴन्दे  – जब श्री रामानुज सच्चा ज्ञान देने और प्रत्येक जीव के उत्थान का इंतजार कर रहे हैं, तो मैं इस दुनिया के लोगों के लिए बहुत चिंतित हूँ जो अनजाने में अपने आप ईश्वर खोजने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं जो उनका उत्थान करेगा।
  • रामानुस नूट्रन्दादि १०४ – कैयिल् कनियन्न कण्णनैक् काट्टित् तरिलुम् उन्ऱन् मेय्यिल् पिऱन्गिय चीरन्ऱि वेण्डिलन् यान् – यहां तक कि यदि आप मुझे कण्णन् भगवान् दिखाते हैं (जो अपने सौंदर्य और उनके भक्तों के लिए अभिगम्यता के लिए अच्छी तरह से जाना जाते है), तो भी मैं केवल आपके दिव्य रूप और गुणों पर ध्यान केंद्रित करूंगा और मुझे कुछ नहीं चाहिए।
  • रामानुस नूट्रन्दादि १०६ – इरुप्पिडम् वैकुन्दम् वेङ्गडम् मालिरुन्चोलैयेन्नुम् पोरुप्पिडम् मायनुक्केन्बर् नल्लोर्, अवै तन्नोडुम् वन्दिरुप्पिडम् मायनिरामानुशन् मनत्तु इन्ऱवन् वन्दिरुप्पिडम् एन्दन् इदयत्तुळ्ळे तनक्किन्बुऱवे  – महात्माओं का कहना है कि श्रीमन्नारायणन का भौतिक धाम श्री वैकुण्ठ, तिरुवेण्कट (श्रीनिवास)  (तिरुमला), तिरुमालिरुन्चोलै, इत्यादि हैं। भगवान् उनके सभी परिवारों के साथ श्री रामानुज के सुंदर हृदय में सदैव विराजमान हैं। वह रामानुज मेरे हृदय में अनन्त आनंद के साथ रहते हैं।
  • रामानुस नूट्रन्दादि १०८ – नम् तलैमिशैये पोङ्गिय कीर्त्ति इरामानुशनडिप्पूमन्नवे  – श्री रामानुज के तेजोमय चरणकमलों को मेरे सिर को सजाने दें।

अनुवादक का टिप्पणी: उपरोक्त पासुर के माध्यम से, यह स्थापित किया गया है कि कैसे एक शिष्य को आचार्य पर ध्यान करना चाहिए, उनकी सेवा (करना) और उन्हे हमेशा प्रसन्न करने के लिए अभिलषित करना चाहिए। अगले अनुच्छेद में, देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्) के ज्ञान-सार से कई पासुर उद्धृत हैं।

देवराज मुनि (अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार्)

ज्ञान-सार ३०
माडुम् मनैयुम् मऱै मुनिवर्
तेडुम् उयर् वीडुम् सेन्नेऱियुम् – पीडुडैय
एट्टेऴुत्तुम् तन्दवने एन्ऱिरादार् उऱवै
विट्टिडुगै कण्डीर् विदि

शास्त्र के अनुसार, उस व्यक्ति को उन सभी लोगों का संबंध छोड़ना चाहिए जो सभी संपत्ति को (इस दुनिया की संपत्ति (भूमि, पत्नी / पति, आदि) और कैङ्कर्य की दिव्य संपत्ति) उस आचार्य (जिन्होंने अष्टाक्षर महामन्त्र के अर्थों का निर्देश दिया था) की संपत्ति स्वरूप नहीं मानते है ।

ज्ञान-सार ३१
वेदमोरु नान्गिन् उट्पोदिन्द मेय्प्पोरुळुम्
कोदिल् मनु मुदल् नूल् कूऱुवदुम् – तीदिल्
शरणागति तन्द तन् इऱैवन् ताळे
अरणागुम् एन्नुम् अदु

अष्टाक्षर महामन्त्र (जो वेदों का सार है) और स्मृति (मनु द्वारा दिया गया आदि) ढंखागूंज से घोषित करते हैं कि आचार्य जो हमें शरणागति का मार्ग दिखाते हैं वह शिष्य के लिए आश्रय हैं।

ज्ञान-सार ३६
विल्लार् मणि कोऴिक्कुम् वेङेगडप् पोऱ् कुन्ऱु मुदल्
शोल्लार् पोऴिल् शूऴ् तिरुप्पतिगळ् – एल्लाम्
मरुळाम् इरुळोड मत्तगत्तुत् तन् ताळ्
अरुळाले वैत्त अवर्

एक सच्चे शिष्य के लिए, भगवान् के सभी रहने वाले स्थान तिरुवेण्कट (और परमपद, क्षीराब्दि, आदि), अपने आचार्य में देखना चाहिए जिन्होंने अपनी अहैतुकी कृपा से शिष्य की अज्ञानता को हटा दिया।

ज्ञान-सार ३७
पोरुळुम् उयिरुम् उडम्बुम् पुगलुम्
तेरुळुम् गुणमुम् सेयलुम् – अरुळ् पुरिन्द
तन् आरियन् पोरुट्टाच् सन्ग्कऱ्पम् सेय्बवर् नेन्ज्चु
एन्नाळुम् मालुक्किडम्

सर्वेश्वर उस शिष्य के दिल में सदाबहार / प्रसन्नता से रहेंगे जो अपने आचार्य के नियंत्रण में अपनी सारी संपत्ति, रिश्ते, ज्ञान, कार्य आदि छोड़ देते हैं।

ज्ञान-सार ३८
तेनार् कमलत् तिरुमामगळ् कोऴुनन्
ताने गुरुवागित् तन् अरुळाल् – मानिडर्क्का
इन्निलत्ते तोन्ऱुदलाल् यार्क्कुम् अवन् ताळिणैयै
उन्नुवदे साल उऱुम्

चूंकि श्रीमन् नारायणन् जो श्री महालक्ष्मी के दिव्य पति है, वह स्वयं आचार्य के रूप में जीवात्मा के उत्थान के लिए अपनी अहैतुकी कृपा से प्रकट होते हैं, उनके कमल चरणों में पूर्ण आश्रय लेने सबसे अच्छा विकल्प है।

एक शिष्य को अपने आचार्य की ओर प्यार / स्नेह से भरा होना चाहिए।

अनुवादक का टिप्पणी: इसके बाद पिळ्ळै लोकाचार्य द्वारा श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र में विस्तृत वर्णित शिष्य लक्षण विषय का सार

सूत्र २४३

  • चूंकि हम इस संसार में हैं, सबसे पहले, हमें निम्नलिखित बिन्दुओं के बारे में सोचना चाहिए
    • स्वयं (अर्थात् मुख्य रूप से हमारे शरीर) को आत्मा का मुख्य विरोधी के रूप में मानना है क्योंकि यह हमारे अहङ्कार (स्व-स्वातन्त्रय) का कारण है और भौतिकवादी आकांक्षाओं में रुचि।
    • संसारियों (भौतिकवादी लोगों) को विषमय सांप के रूप में मानकर हमें उनसे डरना चाहिए – क्योंकि वे हमारी भौतिकवादी आकांक्षाओं को विकसित करेंगे और हमें संसार में रखेंगे।
    • श्रीवैष्णव असली रिश्तेदारों के रूप में मानना चाहिए – क्योंकि वे हमें भौतिकवादी आकांक्षाओं से बाहर निकलने में मदद करेंगे और आध्यात्मिक आकांक्षाओं / भगवद्विषय में रुचि रखते हैं।
    • श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) को पिता के रूप में मानना चाहिए – क्योंकि वह हमेशा आत्म(जीव)-हित का चिंतन करते हैं।
    • जैसे एक भूखा व्यक्ति भोजन के बारे में सोचता है ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक भोजन से सन्तप्त जीव को आचार्य को  आध्यात्मिक भोजन प्रदाता के रूप मे सोचना चाहिए – क्योंकि हम (जीव) आध्यात्मिक भोजन (ज्ञान) से भूखे हैं और आचार्य उसी को प्रदान करते हैं।
    • शिष्य जिसे हम बहुत प्यार करते हैं – क्योंकि शिष्य के साथ हम भगवदनुभव का रसास्वादन कर सकते हैं और वह इसे पसंद करेंगे, इसका आनंद लेंगे और हमें भगवद्विषय का भी आनंद देंगे।
  • उपरोक्त सूत्र सार की बुद्धि से, हमें यह सोचना चाहिए की ः
    •  हमारे असली शुभचिंतकों (अर्थात् आत्मा के शुभचिंतक श्रीवैष्णवों) की ओर से विचलन का कारण अहङ्कार है ।
    • अवैष्णवों के प्रति प्रीति का कारण अर्थ (भौतिक-संपदा) है – जिस क्षण हम धन के पीछे जा रहे हैं, हमें हर किसी को सलाम करना शुरू करना होगा और अवैष्णवों से अनुग्रह करना शुरू करना होगा। ऐसे मामलों में, हम ऐसे अवैष्णवों (जो भी वे कर रहे हैं में अच्छा हो सकता है) के प्रति आदर विकसित करेंगे – लेकिन यह प्रशंसा बहुत खतरनाक है क्योंकि यह भगवद्विषय के बारे में नहीं है और यह हमें ऐसे कार्यों की ओर ले जाएगा।
    • विपरीत लिंग की ओर प्रीति काम-वासना है  (यहां तक कि जब वे हमें अनदेखा करते हैं) – श्री कृष्ण (कण्णन एम्पेरुमान्) भगवद्गीता में कहते हैं – लगाव से हमें वासना मिलती है, वासना से हमें इच्छाएं मिलती हैं, इससे हम पागल हो जाते हैं और हमारी बुद्धि कम हो जाती है, संसार के अधोभाग में नीचे गिर जाऐंगे।
  • इस बात को ध्यान में रखते हुए, हमें पूर्ण विश्वास विकसित करना चाहिए कि आत्म-गुण (अमम्, दमम्, सत्वम्, इत्यादि) अपने प्रयासों से नहीं बनाए जा सकते हैं, लेकिन हम उन्हें अपने स्वयं के आचार्य के माध्यम से श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) की कृपा / दया से प्राप्त करते हैं और इसलिए हमें यह करना चाहिएः
    • भौतिकवादी आकांक्षाओं के प्रति अलगाव।
    • भगवद्विषय की ओर लगाव विकसित करें।
    • वास्तविकता में सांसारिक / भौतिकवादी चीजें  सुखद नहीं हैं।
    • हमारे शरीर को बनाए रखने के लिए प्रसाद का उपभोग करें या इस पर विचार करें कि हम प्रसाद का उपभोग करते हैं क्योंकि यह तिरुवाराधन का अंतिम हिस्सा है (एक बार जब हम खाना तैयार करते हैं और श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) को भोग चढ़ाते हैं तो यह प्रसाद बन जाता है और जैसा कि दाता को भी इसके कुछ हिस्से का उपभोग करने की आवश्यकता होती है)।
    • सोचो कि अगर हमें अपने जीवन में दुख / कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तो हमें यह सोचकर इसे खुशी से स्वीकार करना चाहिए।
      • हमारे पूर्व कर्मों का फल – चूंकि हमने अब तक इतने सारे पुण्य / पाप किया है और हमें इसका नतीजा भुगतना होगा, और उन्हें सहन करके हम केवल अपने कर्म को कम कर रहे हैं।
      • श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) की क्रुपा का फल – क्योंकि हमने स्वयं को श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) को आत्मसमर्पण कर दिया है, उन्होने पहले से ही हमारे सभी संचित कर्म (कर्म का बड़ा सामान) माफ कर दिया है और वह हमें केवल थोड़ी सी दुःख दे रहे हैं ताकि हम इस संसार को नापसंद कर सकें और परमपद तक पहुंचने की इच्छा रखें – अगर हम यहां एक अच्छा जीवन प्राप्त करते हैं, तो हम संसार से बहुत जुड़े हो सकते हैं। तो श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) अपनी निर्बाध दया से बाहर हमें हमारे कर्म के अनुसार थोड़ा सा पीड़ा देता है और परमपद से लगाव विकसित करता है।
    • इस विचार को छोड़ दो कि हमारे अनुश्टानम् श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) को प्राप्त करने के लिए है उपायम् है। हमें श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) द्वारा किए गए पक्षों को समझना चाहिए और उनके लिए कैङ्कर्य के रूप में सबकुछ करना चाहिए।
    • पूर्वाचार्यों और महान श्रीवाष्णवों के ज्ञान और अनुश्टानम् के प्रती अनुलग्नक होना है।
    • दिव्य देशों के प्रति महान लगाव होना चाहिए – क्योंकि वे (दिव्य देश) श्री रंगनाथ द्वारा जीवात्माओं की ओर असीम प्यार के कारण आस्थित किया गया था।
    • मङ्गलशंसन – प्रार्थना करते हैं कि श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) के साथ इस खतरनाक संसार में कुछ नहीं हो, – जैसा कि हम इन दिनों से संबंधित कर सकते हैं, कई अर्चविग्रहम् पर हमला / विकृत, आदि होता हैं – और हमें हमेशा उस श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) की सुरक्षा के लिये प्रार्थना करना चाहिए। यह श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) की ओर भक्ति का उच्चतम स्तर है जैसा कि श्री विश्णुचित्त (पेरियाळ्ळवार्र्), श्री गोदा (आण्डाळ्), श्री रामनुज (एम्पेरुमानार्) इत्यादि द्वारा दिखाया गया है।
    • भौतिक चीजों में /से अलगाव रखें।
    • परमपद तक पहुंचने की वास्तविक इच्छा है – हर रोज हमें श्री शठकोप (नम्माळ्ळवार) की तरह रोना चाहिए, एम्पेरुमान् से पूछना चाहिए कब वह हमें अनंतकाल के लिए परमपद में मोक्षऔर कैङ्कर्य देने जा रहा है
    • सुनिश्चित करें कि हम श्रीविष्णव के सामने विनम्रता का अभ्यास करें और अविश्नवों को किसी भी सेवा से परहेज करें।
    • आहार नियति का पालन करें – विनियमित खाद्य आदतों।(http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-AhAra-niyamam_28.html)
    • श्रीवाष्णवों के साथ सहयोग के लिए इच्छुक।
    • अवैश्नवों के साथ संबंध से परहेज।

सूत्रम् २७४ – एक शिष्य के वास्तविक गुण

यह सूत्रम् एक सत् शिष्य (सच्चे शिष्य) के लिए कई पहलुओं की पहचान कराता है जो पूरी तरह से अपने आचार्य पर निर्भर हैं। वो हैंः

  • वस्तव्यम् आचार्य सन्निदियुम् भगवद् सन्निदियुम् – रहने का स्थान वह जगह है जहां उसका आचार्य रहते हैं और (यदि यह संभव नहीं है) जहां श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) रहते हैं।
  • वक्तव्यम् आचार्य वैभवमुम् स्व णिकर्शमुम्  – भाषण का विषय उनकी आचार्य की महिमा और उनकी गलतियों है।
  • जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – जप/अनुसन्दानम् वाक्य गुरु परम्परा और द्वय महा मन्त्रम् है।
  • परिग्राह्यम् पूर्वाचार्य वचनमुम् अनुश्टानमुम्  – पूर्वाचार्यों के निर्देशों और इतिहास को स्वीकार करें
  • परित्याज्यम् अवैश्न्णव सहवासमुम् अभिमानमुम् – अवैश्नवों के साथ कोई रिश्ता और कोई भी गतिविधि नहीं करना चाहिए जिससे एक अवैश्नव हमें अपने समूह का हिस्सा मानने लगे।
  • कर्त्तव्यम् आचार्य कैन्ङ्कर्यमुम् भगवत् कैन्ङ्कर्यमुम्– आचार्य, श्री रंगनाथ (एम्पेरुमान्) और उसके अडियारों की सेवा करने के लिए।

और अधिक सूत्रम् जो एक सच्चे सिद्धांत के अपेक्षित व्यवहार की व्याख्या करते हैं

  • सूत्रम् २७५ – आचार्यन की सेवा कैसे करें, सीखने के लिए शिष्य को शास्त्र और आचार्य के निर्देशों पर निर्भर होना चाहिए।
  • सूत्रम् २९८ – शिष्य के ज्ञान का उद्देश्य आचार्य के दिव्य गुण हैं; शिष्य की अज्ञानता का उद्देश्य आचार्य के दोष है; शिष्य की क्षमता का उद्देश्य आचार्य की सेवा करना है; शिष्य की अक्षमता का उद्देश्य शास्त्र द्वारा अस्वीकार किए गए कार्यों में शामिल होने से बचाना है।
  • सूत्रम् ३२१ – एक सच्चे शिष्य का मतलब है
    • एक जो आचार्य की सेवा करने के लक्ष्य के अलवा सभी अन्य लक्ष्य से पूरी तरह से अलग है।
    • वह जो हमेशा आचार्य को खुश करने और उनसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए आचार्य की सेवा करता है।
    • जो इस संसार से छुटकारा पाना चाहता है; आचार्य से अलग होने में एक भी पल सहन करने में असमर्थ।
    • एक जिसे भगवत् विषय में बहुत लगाव है जो अचर्य द्वारा पढ़ाया जाता है और अचर्य की सेवा करता है।
    • एक जो भगवान् और भागवतों की महिमा सुनते समय ईर्ष्या से मुक्त है (स्वयं, आचार्य और उसके साथी-श्रीवैश्णव सहित)।
    • सूत्रम् ३२२ – एक शिष्य को आचार्य के प्रति महान लगाव विकसित करना चाहिए ताकि वह सोच सके कि अचर्य तिरुमन्त्रम् है, भगवान् जो तिरुमन्त्रम् का उद्देश्य है, कैङ्कर्य जो नतीजा है और अज्ञानता, भौतिक सुख आदि को हटना।
    • सूत्रम् ३२३ – परमाचार्य श्री यामुनाचार्य (आळवन्दार्) ने इस सिद्धांत को “माता पिता युव तयः” में समझाया है, श्लोक श्री शठकोप (नम्माळ्ळवार) की ओर। उन्होंने पाया कि नम्माळ्ळवार वैश्णव कुल पति (वैष्णव के नेता) हैं और श्री शठकोप (नम्माळ्ळवार) उनके लिए सबकुछ है।
    • सूत्रम् ३२७ – शिष्य वोह करता है, जो आचार्य को प्रसन्न करता है।
    • सूत्रम् ३२८ – शिष्य को आचर्य की खुशी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
    • सूत्रम् ३२९ – इस प्रकार शिष्य को आचार्य की खुशी पर ध्यान देना चाहिए और उसको अपने गौरव के बारे में सोचने का कोई समय नहीं होगा।
    • सूत्रम् ३३०/३३१ – यहां तक कि यदि शिष्य आचार्य के क्रोध का प्राप्तकर्ता बन जाता है, तो यह केवल शिष्य के कल्याण के लिए है। इसलिए, शिष्य को चिंता नहीं करना चाहिए कि क्यों आचार्य उससे गुस्सा हो गया।
    • सूत्रम् ३३३ – शिष्य को आचार्य की शारीरिक / भौतिक जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए।
    • सूत्रम् ३४९ – शिष्य को हमेशा अपने जीवन के अंत तक आचार्य की ओर आभारी होना चाहिए। उसे लगातार यह सोचना चाहिए कि “आचार्य ने मेरे दिल में सुधार किया” और “उन्होने मेरे दिमाग को शुद्ध किया ताकि मैं भववान की पूजा कर सकूं”।
    • सूत्रम् ४५० – शिष्य को एम्पेरुमान् के पांच अलग-अलग रूपों पर विचार करना चाहिए (परा, व्यूह, विभव, अन्तर्यामि और अर्चावतारम् – http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-parathvadhi.html) अपने स्वयं के आचार्य के रूप में और् उपने आचार्य की जरूरत पर झुकना है।

इस प्रकार शिष्य को हमेशा अपने आचार्य के कमल पैरों पर विचार करना चाहिए  जो इस संसार और परमपद दोनों में अंतिम लक्ष्य है। शिष्य के लिए इस सिद्धांत के अलावा कुछ ज्यादा नहीं है।

शिष्य को अपने आचार्य की शारीरिक जरूरतों को स्वयं के जरूरतों के रूप में मानना चाहिए और उन्हें पूरा करना चाहिए। अगर शिष्य सोचता है कि वह अपनी संपत्ति दे रहा है (उसे सोचना चाहिए कि यह पहले से ही उसके आचार्य की संपत्ति है), जो उसके ज्ञान को नष्ट कर देगा। आचार्य की दया की वस्तु बनना बस पर्याप्त नहीं है – एक को अपने आचार्य के वश्य में पूरी तरह से होना चाहिए – केवल तभी उसे भगवान् के बारे में पूर्ण ज्ञान होगा। यदि शिष्य आचार्य द्वारा किए गए पक्षों पर लगातार ध्यान देता है, तो वह समझ जाएगा कि वह अभी भी अज्ञानी है और उसके आचार्य से सीखने के लिए बहुत कुछ है। वह अपने आचार्य की सेवा करने के लिए उनके द्वारा छोड़े गए अवसरों के लिए अत्यंत चिंता करेगा। शिष्य को आचार्य की खुशी और क्रोध को समान रूप से स्वीकार करना चाहिए और किसी भी मामले में एक आदर्श तरीके से व्यवहार करना चाहिए। सबसे बुद्धिमान श्री राम का स्वागत करते हुए श्री शब्री ने उन्हें कुछ फलों की पेशकश की और श्री राम की सेवा करने की लागत पर भी अपने आचार्य (परमपद!) में जाने और उनकी सेवा करने की अनुमति मांगी।

हमारे जीयर् (श्री वरवरमुनि  (मणवाळ मामुनिगळ्)) ने अपने स्वयं के आचार्य निष्ठा और इस तरह के आचार्य निष्ठा की महिमाओं को उपदेश रत्न माला, यतिराज विम्सति और आर्ति प्रभन्द जैसे विभिन्न प्रभन्दम् के माध्यम से भी प्रदर्शित किया।

श्री रामानुज (भविश्यदाचार्यन्), श्रीशैलेस (तिरुवाइमोज़्हि पिळ्ळै), श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्)

उपदेश रत्न माला ६१
ज्ञानम् अनुट्टानम् इवै नन्ऱागवे उडैयन् आन
गुरुवै अडैन्दक्काल्
मानिलत्तीर्! तेनार् कमलत् तिरुमामगळ् कोज़्हुनन्
ताने वैकुन्दम् तरुम्

एक सच्चे आचार्य की आश्रय लेने के बाद जो ज्ञान और अभ्यास में अच्छी तरह से स्थित है, ओह इस दुनिया के लोग! श्रीमन् नारायणन् खुद इस तरह के शिष्य को परमपदम् में दिव्य कैङ्कर्य के साथ आशीर्वाद देंगे।

उपदेश रत्न माला ६२
उय्य निनैवुण्डागिल् उम् गुरुक्कळ् तम् पदत्ते वैयुम्
अन्बु तन्नै इन्द मानिलत्तीर्!
मेय् उरैक्केन् पैयरविल् मायन् परमपदम् उन्ग्कळुक्काम्
कैयिलन्गु नेल्लिक् कनि

ओह इस दुनिया के लोग! यदि आप अपना उत्थान करना चाहते हैं, तो आप अपने आचार्य की ओर कुल अनुलग्नक विकसित करें। परमपद जो भगवान् (जो सांप बिस्तर पर है) का निवास स्थान आपके हाथ में एक फल के रूप में आसानी से सुलभ होगा।

उपदेश रत्न माला ६४
तन् आरियनुक्कुत् तान् अडिमै सेय्वदु
अवन् इन्नाडु तन्निल् इरुक्कुम् नाळ्
अन्नेर् अऱिन्दुम् अदिल् आसै इन्ऱि
आचारियनैप् पिरिन्दिरुप्पार् आर् मनमे! पेसु

एक शिष्य को अपने आचार्य की सेवा करनी चाहिए जबकि वह आवश्यक अर्थ सीख रहा है। उसे अपने आचार्य से अलग होने के बारे में कभी नहीं सोचना चाहिए।

उपदेश रत्न माला ६५
आचारियन् सिच्चन् आरुयिरैप् पेणुमवन्
तेसारुम् सिच्चनवन् सीर् वडिवै आसैयुडन् नोक्कुमवन् एन्नुम्
नुण्णऱिवैक् केट्टु वैत्तुम्
आर्क्कुम् अन्नेर् निर्कै अरिदाम्

आचार्य को शिष्य के आध्यात्मिक कल्याण (जीवात्मा) पर ध्यान देना चाहिए। शिष्य को आचार्य के दैवीय रूप (भौतिक कल्याण) पर ध्यान देना चाहिए। इस गहरे सिद्धांत को जानने के बाद भी, इसका अभ्यास करना बहुत मुश्किल है।

उपदेश रत्न माला ६६
पिन्बज़्हगराम् पेरुमाळ् सीयर्
पेरुन्तिवत्तिल् अन्बदुवुमट्रु
मिक्क आसैयिनाल् नम्पिळ्ळैक्कान अडिमैगळ् सेय्
अन्निलैयै नन्नेन्ज्चे! ऊनमऱ एप्पोज़्हुदुम् ओर्

ओह प्रिय दिमाग! श्री पस्चात् सुन्दर देसिक (पिन्बज़्हगराम् पेरुमाळ् जीयर्) को परमपद जाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि वह खुशी से अपने आचार्य श्री कलिवैरि (णम्पिळ्ळै) की सेवा कर रहे थे। आपको लगातार इस तरह के समर्पण और समर्पित शिष्यों पर ध्यान देना चाहिए।

अपने यतिराज विम्सति में, श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्) “रामानुजम् यतिपतिम् प्रणमामि मूर्द्ना” से शुरू करते हैं (मैं श्री रामानुज के कमल पैरों पर सजग होता हूं) और “तस्मात् अनन्य सरणो भवति इति मत्वा” के साथ समाप्त होता है (मेरे पास श्री रामानुज के अलावा कोई अन्य शरण नहीं है)। बीस सबसे दिव्य स्लोकों के दौरान, वोह श्री रामानुज की दया के लिए प्रार्थना करते हैं और उनकी सेवा करने के लिए उत्सुक है क्योंकि वोह उनके आचार्य श्रीशैलेस (तिरुवाइमोज़्हि पिळ्ळै) का दिव्य आदेश था (श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्) को भविश्यदाचार्य संनिधि में दैनिक पूजा करने का सम्मान दिया गया था, आज़्ह्वार् तिरुनगरि में श्रीशैलेस (तिरुवाइमोज़्हि पिळ्ळै) श्री रामानुजा की ओर श्री वरवरमुनि (मामुनिगल्) के महान लगाव को देख रहे हैं)।

आखिरकार आर्ति प्रभन्दम् ५५ में, श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्) अपनी प्रकृति के बारे में पूरी तरह से आनंददायक सोच महसूस करते हैं।

तेन्नरन्गर् सीररुळुक्कु इलक्कागप् पेट्रोम्
तिरुवरन्गम् तिरुप्पतिये इरुप्पागप् पेट्रोम्
मन्निय सीर् माऱन् कलै उणवागप् पेट्रोम्
मदुरकवि सोल्पडिये निलैयागप् पेट्रोम्
मुन्नवराम् नम् कुरवर् मोळिगळ् उळ्ळप् पेट्रोम्
मुज़्हुतुम् नमक्कवै पोज़्हुतु पोक्कागप् पेट्रोम्
पिन्नै ओन्ऱु तनिल् नेन्जु पेरामल् पेट्रोम्
पिऱर् मिनुक्कम् पोऱामै इल्लाप् पेरुमैयुम् पेट्रोम्

मेरे पास श्री रंगनाथ का पूरा आशीर्वाद है (श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्) को श्री रंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) द्वारा बहुत सम्मानित किया गया था, जहां उन्होंने पूरे साल श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्) से पूर्ण ईडु कालक्शेपम् को सुना और बाद में श्री वरवरमुनि (मामुनिगळ्) को उनके आचर्य के रूप में स्वीकार किया, “श्रीशैलेस दया पात्रम्” की तुलना में उन्हें।

मुझे श्रीरंगम में रहने के लिए श्री रंगनाथ (नम्पेरुमाळ्) द्वारा नियुक्त किया गया है।
मैं दृढ़ता के लिए श्री शठकोप (नम्माळ्ळवार) के पासुरम् का लगातार आनंद लेने में सक्षम होने के लिए धन्य हूं।
मुझे मदुरकवि आळ्ळवार के जैसे आचार्य निष्ठा का पालन करने में सक्षम होने के लिए धन्य हूं।
मैं आळ्ळवारों / आचार्यों के महान कार्यों पर लगातार ध्यान करने के लिए धन्य हूं।
मैं अपने काम को पूरी तरह से अपने काम में ही खर्च करने के लिए धन्य हूं।
मुझे आशीर्वाद है कि मेरा दिमाग आळ्ळवार / आचार्य के काम के अलावा किसी और चीज पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहा है।
मुझे अन्य श्रीवैश्णव की महिमा देखने पर कोइ भी ईर्ष्या नहीं है, ये मुझे आशीर्वाद है।

अनुवादक का टिप्पणी: अब शुरू हो रहा है, हम अपने पुरूवचर्यों के जीवन से विभिन्न घटनाओं को व्यावहारिक रूप से आचार्य पर कुल निर्भरता का प्रदर्शन करेंगे जैसा कि पहले ३ लेखों में बताया गया है।

जारी रहेगा……

अडियेन भरद्वाज रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/06/anthimopaya-nishtai-3.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

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