वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी ८

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ७

वशिष्ट से कारण जानके, ब्रह्मा व्याकुल हुए, नहीं जानते कि क्या करना है। इस स्थल को तत्काल तैयार किया गया था, अलंकार किया गया था और निमंत्रण भेजे गए थे। शुभारंभ करने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। तो यह क्या था? वशिष्ट ने क्या कहा कि ब्रह्मा को आश्चर्यान्वित कर दिया?

वास्तव में ब्रह्मा ने एक पहलू को नज़र अंदाज कर दिया या उस पर बाद में विचार करने के लिए रखा था  जो अंततः इसके बारे में भूल गये I

वशिष्ट ने इसे ब्रह्मा को स्मरण कराया। यह वास्तव में महत्वपूर्ण और आवश्यक था। यही कारण है कि ब्रह्मा इसे सुनने पर विचलित हुए।

“वह यग्न  जीवन साथी के साथ किया जाना है। परंतु वोह तो तपस्या के लिए सरस्वती नदी के तट पर गई हुई हैं।

वह पत्नी ही है जो एक पती के साथ रहके पवित्र अनुष्ठान (सहधर्मचारिनी) निष्पादित करने में सहायक बनती है। उसके बिना एक याग संभव कैसे होगा? ”

यह वशिष्ट ने कहा था।

ब्रह्मा ने थोड़ी देर के लिए चिंतन किया और फिर सभा को संबोधित किया – मैं यह अतिविशाल यग्न की योजना बना रहा हूं। अब तक यह संदेश सभी चौदह लोकों तक पहुंच गया होगा। क्रोधित सरस्वती, जिन्होंने तपस्या में प्रवेश किया है, भी यह जान चुकी होंगी। क्या वे स्वयं नहीं पधारेंगी?

उत्तर देने में असमर्थ, दर्शक मौन थे।

ब्रह्मा के अहंकार ने उन्हें आमंत्रित करने की अनुमति नहीं दी। वशिष्ट ने स्थिति को समझ लिया। पुत्र ने पिता को सलाह दी। पुत्र ने पिता को आश्वासन दिया कि वह माता सरस्वती को लाने का प्रयास करेंगे। वह उन्हें बताएगा कि ब्रह्मा ने उनके द्वारा उन्हें निमंत्रण भेजा है  और उन्हें साथ लाने का निर्देश दिया है I

कदाचित माता सरस्वती को वशिष्ट का आगमन की सुगंध हो चुकी थी। वह वशिष्ट कि प्रतीक्षा कर रहीं थी ताकि वह अपनी परिवेदना का खुलासा कर सके।

परंतु असुर (राक्षसों)  कोई भी शुभ कार्य में प्रतिशोध ला सकते है , माता सरस्वती का यग्न में भाग लेने का मौके का भय था  I  वे किसी भी कीमत पर उन्हें रोकने के लिए दृढ़ थे। यदि याग पूर्ण तरह से संपन्न हो गया तो  ऋषि, मुनी और देवताओं को भयभीत करने वाले समस्याओं का समाधान परस्पर सम्मति से हो जाएगा। ब्रह्मा और ब्रुस्पाथी के भी  समस्या का समाधान हो जाएगा। यह असुरों के पसंद और लाभ के विरुद्ध था। इसलिए, वे याग को रोकने में गंभीरता से जुड़े हुए थे। वे इसे प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जायेंगे।

वशिष्ट माता सरस्वती को आमंत्रित करने प्रस्थान हुए। वह उन्के सामने साष्टांग किया और विनम्रता से उनसे मिलने का उद्देश्य व्यक्त किया।

सरस्वती, जो अपने पति के साथ तकरार के कारण अस्तव्यस्त में थीं – जाने या न जाने का चिंतन किया। उन्होंने अंततः पुष्टि की कि वह वशिष्ट के साथ नहीं जाएंगी।

उन्होंने वशिष्ट की निवेदन और परामर्श पर ध्यान नहीं दिया और अपने राय को बदलने से इंकार कर दिया।

निराशा में डूबे वशिष्ट , ब्रह्मा को इस घटना का वर्णन दिया।

चिंतन में अपनी आंखों को घुमाते हुए ब्रह्मा ने मनोविश्लेषण किया। उन्होंने आने से इन्कार कर दिया है। लेकिन याग पर कोई पुनर्विचार नहीं हो सकता है। हमें भयभीत नहीं होना है। हम याग को मेरी अन्य अर्धांगिनियों के साथ जैसे सावित्री से प्रारंभ कर सकते हैं। उन्होंने शुभारम्भ की व्यवस्था की।

असुरों की यह धारणा थी कि अगर सरस्वती उपस्थित नहीं हुई तो याग आरम्भ नहीं होगा। वे निराश हुए और पराजय अनुभव किया। उन्होंने कभी कल्पना नहीं किया की ब्रह्मा अपने अन्य पत्नियों की सानिध्य में याग प्रारंभ करेंगे।

“अभी हार हुई नहीं है। हम कुछ क्षति में शामिल होंगे और वो भी सरस्वती को उपयोग करते हुए “- निर्णय लिया असुरों ने । वेश बदलके और अपने स्वरुप को छिपाते हुए उन्होंने सरस्वती के समीप आये। उन्होंने मनगढ़ंत कहानियों के माध्यम से सरस्वती के मन बदलने का प्रयास किया।

ब्रह्मा  सावित्री समेत अन्य पत्नियों को प्रमुखता दे रहे थे। यह उनके प्रति अन्याय और अपमान था। सरस्वती का मानना ​​था कि असुर सत्य बोल रहे थे। उन्होंने उन उपायों के बारे में सोचना प्रारंभ कर दिया जो याग को विफल कर सकते थे।

असुर  चम्पासुर की मदद से तपस्या को भंग करेंगे।

चम्पासुर खुशी से उनके दुष्ट कार्य  के लिए सहमत हो गया। उन्होंने स्वयं को अदृश्य बनाकर एक असामान्य तरीके से यग्न कुंड को द्वंस करने की योजना बनाई। वह कितना असाधारण योजना थी?

उसने यागशाला को अंधेरा करदिया और कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। न केवल वस्तुएं, ब्रह्मा और अन्य अंधेरे में एक-दूसरे को नहीं देख पा रहे थे।

असक्षम और कार्य करने में असमर्थ, ब्रह्मा ने शास्त्र ज्ञान की सलाह को स्मरण किया- “महाध्यापथ्थि संप्राप्ते स्मर्थव्य भगवान हरि:” – गंभीर विपत्ति के समय, श्री हरि का ध्यान करो !! हाथ जोड़कर प्रार्थना आरंभ किया।

भगवान कष्टों को नाश करते है और संकट के समय एक मित्र के सामान सहयोगी बनते हैं। क्या वह अब इस विपत्ति से  मुक्त करने नहीं आयेंगे ?

एक अवर्णनीय, अन्धा करने वाला ज्योति चमका। लोगों के बीच भय और आतंक का कारण अँधेरा था  जो प्रकाश का आगमन से शीग्र पीछे हट गया।

ब्रह्मा आश्चर्यचकित हुए, मुँह खोल कर खड़े रहे। उन्होंने अपने आपको धीरे-धीरे शांत किया। उन्होंने सुस्पष्ट रूप से एक शब्द उच्चारित किया जो हर किसी ने सुना था, वह “धीपप्रकाश” शब्द था।

परंतु वह कौन थे ?

शीघ्र हि…..

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

Source – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/05/16/story-of-varadhas-emergence-8/

archived in https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/

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