वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी १० – १

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

वरदराज भगवान् आविर्भाव कि कहानी

<< भाग ९

असुर यागशाला को लूटने के लिए तरस रहे थे , ब्रह्मा के इस याग को ध्वंस करके, भगवान के पवित्र रूप का दर्शन करने की अभिलाषा और अपने पद को संरक्षित रखने की कामना को नाश करने के लिए लालस थे ।

बड़ी संख्या में एकत्र हुए, उन्होंने याग के समीप गमन किया। जैसा कि उनकी आदत है, ब्रह्मा झुके और भगवान के लिए देखा।

तब ही, गरजते हुए आवाज़ के साथ भगवान नरसिंह उस कक्ष के मद्य से उत्पन्न हुए,  पश्चिम की ओर मुख करते हुए I उन्होंने याग, ब्रह्मा और अन्य जनों को विपत्ति से बचाया। यह हम पुराण के श्लोकों (छंद) से सीखते हैंI

“न्रुसिम्हो याग्न्शालाया: मध्ये शैलाश्च पश्चिमे I
तत्रैवासित मक़म रक्षण असुरेभ्य: समंतत: I I”

ब्रह्मा आश्चर्यचकित होक खड़े थे, अभिभूत।

“ओह इमैयोर तलइवा! (देवतओं के नेता – जनजाति जो कभी भी अपनी आंखें झुकाते नहीं ) इससे पहले कि हम आप से अनुरोध करें और प्रार्थना करें, जिस क्षण हम आपको स्मरण करते हैं, आप हमारे रक्षा के लिए शीग्र आते हैं और सुरक्षा प्रदान करते हैं। क्या इस प्रकार की प्रतिष्ठा और विशिष्टता आपके अलावा कोई अन्य हो सकता है क्या?

तेजोमंडल के रूप में प्रकाश का चक्र, अंतरिक्ष के चारों ओर फैलता है, आपका अंतरिक्ष पर पूर्ण अधिकार हैं, आप सर्वव्यापी हो। आपके पास मातृत्व है और करुणा भी। आपकी अनूठी विशेषता का वर्णन करने की क्षमता किसको हो सकती है?

इसके अतिरिक्त आपका आधिपत्य नरहारी, नरसिम्हा के रूप में उभरा है। आपके सभी अवतारों (भूमि पे अवतार और आविर्भाव) में, यह सर्वोच्च के रूप में मानने का सम्मान है। यह मेरे नेत्रों के लिए एक प्रीतिभोज है। मैं धन्य हो गया हूँ। इस प्रकार ब्रह्मा ने अनेक शब्दों से स्तुती कीया।

वेदांत देसिकन कहते है – “त्रिणी जगंत्याकुंड महिम वैकुंट कान्तिरवा”

भगवान को वैकुंटन कहते है I

वैकुंट कान्तिरवन या ” भगवत सिम्हम” – अर्थात भगवान् सिंह के रूप में I (कन्तिरवा, मतलब जो कंठ से गरजते हो, अर्थात सिंह) I

वह मनुष्य और सिंह के मिश्र के रूप में उभरे, प्रहलाद के कवच और रक्षा के लिए हि नहीं; यह तीनों लोकों की रक्षा और संरक्षित करने के लिए भी था – वेदांत देसिकन दृढ़तापूर्वक कहते है दशावतार स्तोत्र में।

ब्रह्मा की इस स्थिति में ये शब्द कितने सच हैं?

वेल्वी की रक्षा करने के लिए भगवान को नरसिम्हा के रूप में प्रकट होने की अत्यावश्यक नहीं था । फिर भी, यह उनके करुणामय दिल में पाया था कि वह याग को बचाने के बाद मानव जाति की रक्षा के लिए यहां रुकेंगे। यही कारण है कि वह धरती पर उतरे थे।

ब्रह्मा ने स्वयं को इसमें लुप्त कर दिया “मूरी निमिरन्धू मुलंगिप पुरापाटटू” (तिरुप्पवै से) –  सिंह की सौन्दर्य गर्जना के साथ सीधे प्रगति कर रही थी I

न केवल ब्रह्मा, वशिष्ट, मारिची और अन्य संत, जो भी इच्छाओं पर विजय प्राप्त किया हैं, भगवान का यह दर्शन को पसंद किया।

उनकी सुंदरता मनमध को भी मोहित कर देगी। केवल इस कारण से, भगवान को कामन नाम से भी जाने जाते है। तमिल में, कामन को “वेळ” कहा जाता है। यह वेळ, प्यार से, इस स्थल में निवास करने के लिए चुना है (वेळ इरुक्कै)। इसे इरुक्कै के नाम से जानने लगे।

“अळगियन ताने अरियुरुवन ताने”  अत्यन्त मनोहरता का यह सुंदर आकार। यह सिंह के आकृति में भगवान है) ! – तिरुमलिसै का प्रकाश ने कहा (तिरुमलिसै आळवार नान्मुगन तिरुवंदादी में) I

यही कारण है कि भगवान को “अळगीय सिंगम” कहा जाता है। सहस्रनाम भी उन्हें “नारसिम्ह वपू: श्रीमान” के रूप में संदर्भित करती हैं, जिसका तात्पर्य ऐश्वर्य के आधिपति है। उनकी विशाल संपत्ति उनका सौंदर्य और शिष्टता है।

उनके अवतारों में से कुछ में जानवरों का रूप है। कुछ अन्य अवतारों में, वह मानव रूप में है।

पराशर भट्टार श्री रंगराजा स्तवं में विस्तृत करते हैं कि, “कुछ लोगों को दूध पीने कि आदत होती है बिना चीनी का स्वाद कभी चके हुए। कुछ चीनी को चके होंगे लेकिन दूध नहीं I लेकिन जब दूध में चीनी जोड़ा जाता है, जब दूध और चीनी मिश्रित होते हैं, और मिश्रण का उपभोग करते है, तो उपभोक्ता पछताते है कि जीवन में इतने दिन अभी तक ऐसे स्वाद को गवा दिया ।

यदि जानवरों के रूप में भगवान का “जन्म” दूध के समान है, तो उनके मानव रूपों की तुलना चीनी से की जा सकती है। लेकिन अवतार जो दूध और चीनी (मानव और पशु का मिश्रण) के मिश्रण की तरह है, केवल नरसिम्हावतार है। कितना मधुरता से समझाया!

शास्त्रों का कहना है, “सत्यम विधातुम निज ब्रुथ्या भशितम” – तीव्र पक्षपाती और उपासक के लिए, भगवान रक्षा करने के लिए दौड़ते हैं, जैसे  प्रहलाद के मामले में हुआ था , जो एक प्रबल अनुयायी और उपासक हैं।

ब्रह्मा भी समान रूप से समर्पित,भक्त अनुयायी थे। तो यहां भी भगवान नरहारी यग्न के उद्धारकर्ता के रूप में प्रकट हुए।

“ध्रवंती दैत्य: प्रनामंति देवता:” –  जब जन भगवान की स्तुति में गाते हैं, वहां से दुष्टात्मा भाग जाते है। और देवताएँ उन गायकों की आराधना करते हैं।

प्रसिद्ध केसरी की प्रतिष्ठा कितनी महान है?

हमारे भगवान की भव्यता को जानना और आनंद लेना – वेलुकै के शासक हमें अनंत आनंद देंगे। यह अतृप्य है।

उनका एक अन्य नाम भी है – मुकुंध नायकन। इसका क्या अर्थ है?

हम खोज करेंगे।

अडियेन श्रीदेवी रामानुज दासी

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/05/19/story-of-varadhas-emergence-10-1/

संग्रहण- https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s