विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २९

६४) सख्य विरोधी – मित्रता में बाधाएं

सभी जनों के प्रति श्रीकुरेश स्वामीजी की दयाभाव के कारण उनकी बहुत प्रशंसा है

सख्य का अर्थ मित्रता / परिचित है। मित्रता अर्थात एक दूसरे के प्रति हितकारी भावना। शत्रुता न दिखाना मित्रता की ओर पहला कदम है। सात्विक जनों (भागवत – भगवान श्रीमन्नारायण के भक्त) की ओर मित्रता और आदर दोनों होना चाहिये और वह जो पवित्र ज्ञान से भरा हो, नित्य दिनचर्या में यथार्थ ज्ञान का प्रयोग करना है। हमें यह समझना चाहिये कि सच्ची मित्रता पवित्र है। भगवान श्रीराम का श्रीगुहा के साथ मित्रता को अध्यात्मिक समझना चाहिये। उनकी सुग्रीव महाराज के साथ मित्रता भी ऐसी ही है। अनुवादक टिप्पणी: दो प्रकार की मित्रता है। एक शारीरिक वेदिका पर आधारित – हम उनसे मित्रता करते हैं जो हमारे शरीर का पोषण करते है अथवा हमारे शरीर पर अनुग्रह करते है। उदाहरण के लिये जब हम गिरते हैं तो कोई हमें उठाता है और हम उससे मित्रता करते हैं। या हमारे साथ पढ़नेवाले के साथ हम मित्रता करते हैं। फिर अध्यात्मिक वेदिका पर भी मित्रता होती है – अर्थात यह समझना कि हम सभी भगवान और भागवतों के दास हैं और ऐसे भागवतों के साथ मित्रता करना जो हमारे मन को समझते हैं। इन भागवतों को आत्म बन्धु (जो आत्मा से सम्बंधित हैं) कहते हैं। सच्चे भागवत निरन्तर भगवद विषय की चर्चा करते हैं, भगवान/ आल्वार/ आचार्य, आदि के सुन्दर अनुभव को सभी के साथ बाँटते हैं। ऐसे भागवतों के साथ मित्रता प्रशंसनीय है क्यूंकि इस लीलाविभूति में हमारे अन्त श्वास तक वे ही हमारे साथ रहेंगे। सांसारिक जनों के साथ मित्रता का त्याग करना चाहिये क्योंकि वे हमें इस संसार में खींचते हैं और सांसारिक कार्य में लगाते हैं।

  • नीच सांसारिक जनों से मिलना बाधा है। यह वे हैं जो निरन्तर भोजन, मकान, कपड़ा, आदि के पीछे भागते हैं। वे हमेशा सांसारिक कार्य में लगे रहते हैं और ऐसे जनों में घुलना मिलना अर्थात समय नष्ट करना है और यह हमें हमारे अध्यात्मिक जीवन में उन्नत्ती करने से रोकते हैं।
  • महान भागवतों से मित्रता करना और उन्हें अपने बराबर मानना बाधा हैं। हमें कभी भी अन्य श्रीवैष्णवों को अपने बराबर नहीं समझना चाहिये – उन्हें हमेशा उच्च स्थान देना चाहिये। फिर भी हमें उनसे मित्रता रखनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्यशास्त्र के २२२ से २२५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भागवतों से कैसे व्यवहार करें यह समझाते हैं। हमें भागवतों को पने आचार्य के समान, यहाँ तक की स्वयं और भगवान से भी उच्च मानना चाहिये। भागवतों के प्रति आदर न होना अपचार माना गया है।
  • भागवतों से मित्रता रखना और उनमें दोष देखना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्यशास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे पूर्ण विस्तार से समझाते हैं। हमें किसी में (संसारियों में) भी दोष नहीं देखना चाहिये। हमें हमेशा स्वयं में ही सभी गलतियों को देखना चाहिये। तिरुप्पावै के १५वें पाशुर में आण्डाल अम्माजी कहती हैं “नाने दान आयिडुक” (सभी दोष मेरे ही रहने दो)। श्रीरामायण में जब श्रीभरतजी अयोध्या से लौटते हैं और उन्हें जब ज्ञात होता है कि भगवान राम वन के लिये चले गये हैं और श्रीदशरथजी परमपद को प्राप्त हुए है तो वह पहले कैकयी के पास जाते हैं। वह पूरी घटना के लिये दशरथजी, कैकयी, मंथरा, आदि को दोष देते हैं परन्तु अन्त में कहते हैं “यह मेरे स्वयं के दोष हैं जो मुझे भगवान से बिछड़ने की परिस्थिति में लाये हैं”। ऐसी स्थिति से उभरना बड़ा कठिन है परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों ने हमारे लिये यह राह बनायी है और हम ऐसे भाव की चाह कर सकते हैं।
  • यह मानना की सबकुछ/सभी जन भगवान की वस्तु / सेवक हैं। सभी को सभी के साथ मित्रतापूर्वक रहना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान ही इस नित्यविभूति और लीलाविभूति के स्वामी हैं। और हर एक जीवात्मा किसी न किसी तरीके से भगवान की ही सेवा कर रही हैं। अगर एक आत्मा को अपने सच्चे स्वभाव का अनुभव हो जाता है तो वह भगवान की सेवा अपने प्राकृतिक स्थान पर रहकर सीधे कर सकता है। अगर आत्मा को अपने सच्चे स्वभाव का अनुभव नहीं होता है तो वह भगवान की सेवा अनुचित ढंग से करता है (जैसे देवतान्तर, माता-पिता, मित्र, सम्बन्धी, स्वयं के शरीर, आदि)। यह समझकर एक श्रीवैष्णव को प्राकृतिक दया दिखानी चाहिये और अन्य को अध्यात्मिक विषय में मदद करनी चाहिये।
  • अन्य जीवात्मा की ओर बैर की भावना रखना, जो भगवान के ही शेषी हैं, बाधा है। यह देखना चाहिये कि सबकुछ/ सभी में भगवान अंतरयामी होकर प्रवेश करते हैं – ऐसे व्यक्ति जिनकी ऐसी दृष्टी हो वे महान ज्ञानी हैं। अत: सभी को सभी से मित्रता रखनी चाहिये और किसी से दुश्मनी नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान सबकुछ / सभी में अंतरयामी होकर प्रवेश करते हैं। चित और अचित दोनों में भगवान ही प्रवेश करते हैं – इसे भगवान का सर्व व्यापकत्वम ऐसा समझाया गया है। शरीर का अर्थ देह है और शरीरि का अर्थ हैं जो शरीर में है। शास्त्र कहता हैं “यस्य आत्मा शरीरं, यस्य पृथ्वी शरीरं, …” (आत्मा उसी का शरीर है, धरती उसी का शरीर है, आदि)। जैसे जीवात्मा एक शरीर में है वैसे ही भगवान उस जीवात्मा में हैं। अत: यह समझना कि सबकुछ /सभी का शरीर भगवान का है हमें दूसरों से बैर नहीं करना चाहिये। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं “सुकृतं सर्व भूतानाम्” (मैं सभी का मित्र हूँ)। हमारे आचार्य भी सभी की ओर बहुत अनुकम्पा दिखाते थे ओर भगवान के पवित्र सन्देश का प्रचार करते थे।
  • श्रीवैष्णवों के साथ मित्रता कर उनको दुख या धोखा देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ जन बाहर से अच्छे मित्र दिखते हैं परन्तु भीतर से दूसरों के प्रति उनमें घृणा भावना होती है। और ऐसी भावना चेतना या अवचेतना दोनों स्थितियों में बाहर आ जाती हैं। ऐसे आचरण की यहाँ निन्दा की गयी है।
  • कुछ चाह कर किसी से मित्रता करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अगर कोई किसी से कोई चाह करके मित्रता करता है तो ऐसे आचरण को यहाँ नीचे देखा गया है। मित्रता प्रेम के आधार पर होनी चाहिये जिसमें किसी से कोई अपेक्षा नहीं होनी चाहिये।
  • दूसरों की गलतियों को भी उनके अच्छे गुण के समान मानना चाहिए, ऐसा न करना बाधा है। गहरे मित्रों के संग उनके दोष को भी अच्छे गुण माना जाता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तीनों तत्वों (चित – जीवात्मा, अचित – वस्तु, ईश्वर – भगवान) को तत्वत्रय में विस्तार से समझाते हैं। ईश्वर प्रकरणम भाग में सूत्र १५० तक भगवान के कई सुन्दर गुणों को समझाया गया हैं विशेषकर १५१वें सूत्र में वात्सल्य गुण जहाँ भगवान अपनी पत्नी श्रीमहालक्ष्मी और नित्यसूरियों से भी अधिक अपने नवीन भक्तों के प्रति गहरी मित्रता और लगाव दिखाते हैं। इस भाग में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते हैं कि जैसे एक गाय अपने बछड़े को अपने सींग से धकेलती है परन्तु अपने अभी जन्मे बछड़े से प्रेम करती है भगवान वैसे ही अपने शरण में आये हुए से बड़ा प्रेम करते हैं। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ज्ञानसारम के २५वें पाशुर में समझाते हैं “एट्रे कन्रिन् उडम्बिन वलुवन्रो कादलिप्पदु अन्रदनै ईन्रुगन्द आ” – जब एक गाय बछड़े को जन्म देती है तो उस बछड़े के शरीर पर लगी गंदगी को अपनी जीभ से साफ करती है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी एक और विशेष उदाहरण देते हैं – वे कहते हैं एक पुरुष प्रेमी को उसकी प्रेमीका का पसीना पसन्द आता है उसी तरह भगवान हमारे उन दोषों पर ध्यान न देकर हमसे प्रेम करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या में बड़ी सुन्दरता से कई उदाहरण के साथ समझाते हैं। उसी तरह हमारे आचार्य अन्य श्रीवैष्णवों में कुछ दोष हैं तो भी उनके गुणों की प्रशंसा किये हैं और उन्हें सकारात्मकता से लिये हैं।
  • जो हमारे प्रति प्रेम भाव रखते हैं उन्हें प्रेम दिखाना और जो हमारे प्रति बैर रखते हैं उनके प्रति बैर रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी को सभी के साथ स्नेह के साथ रहना चाहिये न कि उनके साथ पक्षपात करना चाहिये।
  • जो अपने आचार्य के साथ दुश्मनी रखता हो उससे सम्बन्ध रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यद्यपि हमें सभी के प्रति करुणामय होना चाहिये परन्तु हमें भगवान और आचार्य से बैर रखने वालों से सावधान रहना चाहिये। आचार्य ही वे हैं जो जीवात्मा और परमात्मा के मध्य में सम्बन्ध को प्रज्वलित करते हैं। जीवात्मा और परमात्मा दोनों पर कृपा दृष्टी रखने के कारण उनकी बड़ी स्तुति होती हैं। जीवात्मा को उसके सच्चे स्वभाव को स्मरण कराते हैं कि वह भगवान का सेवक हैं। परमात्मा अपनी सम्पत्ति (जीवात्मा) को अपने निकट लाते हैं, जीवात्मा को सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में इसे समझाते हैं।
  • आचार्य के शिष्यों / भक्तों के साथ स्नेह सम्बन्ध न रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के अन्त में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४५१वें सूत्र में समझाते हैं कि जिनमें आचार्य निष्ठा हैं उनको दूसरे आचार्य निष्ठावालों से हितकारी सम्बन्ध प्राप्त होता हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्या में समझाते हैं कि उनके ऐसे सम्बन्ध से हमारी आचार्य निष्ठा में वृद्धी होगी अत: हमें ऐसे अधिकारी से ही मित्रता करनी चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/07/virodhi-pariharangal-30.html

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