अन्तिमोपाय निष्ठा – ११ – एम्बार और अन्य शिष्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचल महामुनये नमः

अन्तिमोपाय निष्ठा

<< श्री रामानुज के शिष्यों की निष्ठा

पिछले लेख (अन्तिमोपाय निष्ठा – १० – श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के शिष्य) में हमने श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के शिष्यों की दिव्य महिमा देखी। हम इस लेख में ऐसी घटनाओं (मुख्य रूप से श्रीएम्बार् स्वामीजी की निष्ठा) का क्रम जारी रखेंगे।

श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी)

श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) का जन्म वट्टमणिकुल (एक विशेष पारिवारिक वंशावली) में हुआ था। आपश्री सबसे जानकार और बहुत अलग थे। आपश्री युवावस्था में यथारूप से अनुष्ठानों का पालन कर रहे थे। उस समय, आपश्री शिव के भक्त बन गये, शिवागम में प्रवेश किया, रुद्राक्ष माला धारणकर श्रीकालहस्ति की ओर प्रयाण किया और कई वर्षों तक श्रीकालहस्ति मे विराजमान रहें। आपश्री वहां शिव मंदिर के मुख्य पुजारी और नियंत्रक बन गए। श्रीशिव प्रसन्नपरक छड़ी / पत्तियां से शोभायमान आपश्री के करकमल थे। तमिल-भाषा-विशेषज्ञ आपश्री का श्रीमुख सदैव शिव महिमागान मे सेवारत था। उस समय, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी तिरुमलै से किसी विशेष कारण (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी में सुधार) के लिए श्रीकालहस्ति में आते हैं। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी अपने शिष्यों के साथ एक जंगली इलाके में बैठकर अपने शिष्यों के साथ चर्चा प्रारम्भ किया। उसी समय मे, आपश्री उस क्षेत्र में श्रीरुद्रदेव के लिए फूल तोड़ने हेतु आए। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी के सत्संग के निकटस्थ वृक्ष पर फूल तोड़ने हेतु आपश्री चढ़ने लगे। श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) की इस स्थिति को देखते हुए, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी उनके लिए बहुत खेद महसूस करते हैं और मन ही मन सोचते हैं “चूंकि यह जीवात्मा (आपश्री) एक महान विद्वान और बहुत अलग व्यक्ति हैं, अगर आपश्री स्वयं की वर्तमान भक्ति (जो बहुत नीच गति प्रदाता है और जो जीवात्मा के लिए कदापि वास्तविक नहीं है) को छोड़कर, भगवान् श्रीमन्नारायण (जो जीवात्मा के उपयुक्त स्वामी है) के भक्त बन जाए जो वह भक्ति सबसे उच्चतम कहलायेगी और यह पूरी दुनिया के लिए अत्यन्त लाभप्रद होगा”। ” आपश्री जिस निकटस्थ वृक्ष पर चढ़कर श्रीरुद्रदेव के लिए फूल तोड़ रहे थे ठीक उसी वृक्ष के करीब जाकर श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी भगवान् श्रीमन्नारायण की सर्वोच्चता स्थापित करने वाले वेदान्त छंदों को समझाते हुए अपने शिष्यों के साथ चर्चा कर रहे थे। आपश्री मंदिर में स्व-सेवाओं को और उद्यान मे फूल तोडने का उद्देश्य भूलकर, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) स्वामीजी के दिव्य वाणी का श्रवण करते हैं। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) स्वामीजी की दिव्य वाणी का श्रवणकर उत्साहित आपश्री और लंबे समय तक वहां रहते हैं।

श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) के अनुकूल दृष्टिकोण को देखते हुए, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) सोचते हैं, “हम इनके दिमाग को शुद्ध करने के लिए श्रीनम्माऴ्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी) के दैवीय श्रीसूत्ति से एक पासुर को समझाएंगे” और तिरुवाय्मोऴि (२.२.४) से निम्नलिखित पासुर को विस्तार से समझाते हैं।

तेवुम् एप्पोरुळुम् पडैक्क
पूविल् नान्मुगनैप् पडैत्त
तेवन् एम्पेरुमानुक्कु अल्लाल्
पूवुम् पूशनैयुम् तगुमे?

सरल अनुवादः एम्पेरुमान् (श्रीमन्नारायण) ने ब्रह्मा को बनाया है, जो सभी प्राणियों और विभिन्न पहलुओं को बनाने के लिए व्यष्टि सृष्टि, यानी, भगवान् सबसे पहले स्वयं समष्टि सृष्टि करते/बनाते हैं – जहां वह पंच भूत बनाते हैं और ब्रह्मा के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से व्यष्टि सृष्टि का प्रदर्शन करते हैं)। एम्पेरुमान् (श्रीमन् नारायण) के अलावा, क्या कोई और फूल और प्रार्थना स्वीकार करने के लिए योग्य है? (कोई और योग्य नहीं है)।

यह सुनकर, तमिल-भाषा-विशेषज्ञ, आपश्री हाथों मे पकडे हुए फूल की टोकरी छोड़कर पेड़ के नीचे उतरकर बोल पडे “नहीं! नहीं!” और कहते हैं, “मैंने अपने जीवन में इतना समय व्यर्थ कर दिया है इस तमो गुण से भरे हुए देवता के लिये नियमित रूप से उनके स्नानादि के लिए जल लाने की सेवा, इत्यादि” और श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी के कमल चरणों में गिरते हैं। उद्देश्यकी पूर्तीसे प्रसन्न श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी आपश्री के शुद्धीकरण हेतु बाह्य स्नान करने का उपदेश देते हैं। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी को अपने आचार्य के रूप में स्वीकार करने की महान इच्छा के साथ आपश्री ने स्वयं की रुद्राक्ष माला, पाषण्ड वेश (घमंडी जहर / घमंड) को हटाकर, पवित्र जल की धारा मे नहा कर आद्र वस्त्र सहित श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी के समक्ष लौटे। अति प्रसन्न श्रीशैलपूर्ण (पेरिय-तिरुमलै-नम्बि) स्वामीजी आपश्री का तुरंत पंच संस्कार करते हैं, उन्हें स्पष्ट रूप से बताते हैं कि त्याज्य (क्या छोड़ना है) और उपादेय (क्या स्वीकार किया जाना चाहिए) और निर्देश “भगवान के अलावा अन्य सभी चीज़ों को सभी छोड़ दें, श्रीमन् नारायण को पकड़ो और हमारे धर्म के प्रति वफादार रहो “। श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं और श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) स्वामीजी के साथ तिरुमलै जाने के लिए प्रारम्भ करते हैं।

उस समय, श्रीकालहस्ति के कई पाषण्डि (घमंडी) वहां आते हैं और कहते हैं, “आपश्री हमारे प्रमुख हैं इसलिए आपश्री हमें नहीं छोड़ सकते हैं” और श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) दूर से जवाब देते हैं “अपनी छड़ीयों और पत्तियों को पकडे रहो; मैं इस कब्र में और नहीं रहूंगा”। सीता पिराट्टि (सीता मैय्या) ने जैसे किसी भी लगाव के बिना लंका छोड़ दिया और जैसे मुक्तात्मा अर्चिरादि गति में यात्रा करने के लिए हार्दन् (एम्पेरुमान् / भगवान् का एक रूप) के मार्गदर्शन के साथ परमपद की ओर जाते हैं, वैसे ही श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) तिरुमलै (जिसको भूलोक वैकुण्ठ माना जाता हैं) जाते हैं श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) के मार्गदर्शन के साथ, वहां श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) नंबी के करीबी विश्वासी के रूप में रहते हैं और हमेशा उनकी सेवा करते हैं।

उडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) तिरुमलै (तिरुपति) आकर श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) से श्रीमद्रामायण के आवश्यक सिद्धांतों को सीखते हैं और सीखने के पश्चात श्रीरंगम लौटने की योजना बनाते हैं। एक विशेष अवतार के रूप में श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी को देखते हुए और उन्हें खुद को आळवन्दार (श्री यामुनाचर्य) के रूप में देखते हुए, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) अपने बेटों को उडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) का आश्रय लेने के लिए कहते हैं और उन्हें बताते हैं, “मैं अब भी आपको कुछ मूल्यवान पेशकश करना चाहता हूं”। उडयवर (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी), आपश्री के स्वाचार्य की ओर आपश्री की भक्ति को देखकर, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) से आपश्री को उनके साथ भेजने का आशीर्वाद देने का अनुरोध करते हैं। आपश्री को, श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) खुशी से उदगदारा (दान करने के लिए पवित्र पानी का उपयोग करके ताकि लेनदेन पूरा हो सके) की प्रक्रिया के माध्यम से श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी को दान करते हैं। उडयवर् के साथ आपश्री श्रीरंगम के लिये निकलते हैं और ४/५ दिनों तक यात्रा करते हैं और आपश्री स्वाचार्य से अलग होने के कारण उदासीन हो जाते हैं। उडयवर् (श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी) पूछते हैं “आप इतने दुखी क्यों हैं?” और कहते हैं “यदि आप अपने आचार्य से अलगाव से निपटने में असमर्थ हैं, तो आप तिरुवेङ्गडम् (तिरुपति व तिरुमला) वापस चले जाएं”। आपश्री खुशी से ४/५ दिनों तक यात्रा करते हैं और श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) के तिरुमालिगै (निवास) तक पहुंचते हैं और उनके चरणकमलों पर गिरते हैं। आपश्री को देख कर श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) ने कहा, “मैंने उदगदारा प्रक्रिया के द्वारा आपको उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) को दे दिया है। अब आप यहां क्यों लौट आए?” और आपश्री बताते हैं कि वह उनसे अलग होने में असमर्थ हैं। श्रीशैलपूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) कहते हैं, “हम उस गाय को चारा नहीं दे सकते हैं जो किसी और को बेचा गया था। अब आपको पूरी तरह श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के प्रति आत्मसमर्पण करना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए” और प्रसाद दिये बिना ही बाहर निकाला जाता है। अपने आचार्य के इरादों को समझते हुए, आपश्री ने फैसला किया कि उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) के चरणकमल ही एकमात्र शरण हैं और पुनः श्रीरंगम लौटते हैं। पुनः लौटकर आपश्री रामानुजाचार्य स्वामीजी की खुशी से सेवा करते हुए श्रीरंगम मे निवास करते हैं।

एक बार एक सभा (जनसमूह) में जहां उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) और उनके शिष्य उपस्थित थे, उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) के शिष्यों ने आपश्री के ज्ञान, भक्ति, वैराग्य इत्यादि की महिमा शुरू कर दी। आपश्री इसे स्वीकार करते हैं और हाँ कहते हैं ”हाँ! यह सही है” और दूसरों से ज्यादा स्वयं की महिमा करते हैं। इसे देखते हुए, श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी कहते हैं, “यदि अन्य आपकी महिमा करते हैं, तो आपको बहुत विनम्र होना चाहिए और कहें कि आप उनकी प्रशंसा के योग्य नहीं हैं। इसके बजाय आप स्वयं की महिमा कर रहे हैं। क्या यह उचित शिष्टाचार है?” प्रत्युत्तर मे श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) कहते हैं “स्वामी! अगर ये श्रीवैष्णव मेरी महिमागान करते हैं तो इसमे क्या आपत्ति है । हाथों में छड़ी और मटका, गर्दन पर रुद्राक्ष माला इत्यादि से शोभित इस देह का कालहस्ति निवास ही प्रशंसा के योग्य है अर्थात इतनी ही है इस दास की महिमा। लेकिन, हे महाराज, आपकी उच्चता ने मुझे शुद्ध करने में इतना एहसान किए हैं जैसा कि कहा गया है ”पीतगवाडैप्पिरानार् बिरमगुरुवाय् वन्तु‘, (भगवान् स्वयं प्रथम गुरु के रूप में प्रकट होते हैं)। मैं इतना गिर गया था – एक नित्य संसारि से अधिक गिर गया – लेकिन आपने मुझे ऐसा बदल दिया है कि ये श्रीवैष्णव मेरी महिमा कर रहें हैं। इसलिए, हर बार जब मैं या कोई मेरी महिमा करता है, तो वास्तविक्ता में आपकी उच्चता की महिमा ही हो रही है “। उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) कहते हैं, “प्रिय गोविंद पेरुमाळ् (भगवान्)! शानदार! शानदार!” और श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) की निष्ठा को देखकर बहुत प्रसन्न हो जाता हैं।

एक आचार्य अपने शिष्य को स्पष्ट रूप से बताते हैं कि क्या स्वीकार किया जाना चाहिए और क्या त्यागना है। शिष्य सिद्धांतों का पालन करने में असमर्थ है। आचार्य तब उसे ठीक करता है जहां वह गलती करता है (जैसा कि ‘स्कालित्ये सासितारम्‘ में कहा गया है)। शिष्य एक विद्वान से मिलते हैं जो देखता है कि शिष्य आचार्य द्वारा निर्देशित आदेशों का पालन करने के लिए तैयार नहीं है और विद्वान परेशान हो जाता है और कहता है, “आचार्य को केवल उन शिष्यों को निर्देश देना चाहिए जो आचार्य के निर्देशों के आधार पर पूरी तरह से कार्य करने के लिए तैयार हैं। आपके आचार्य ने क्यों निर्देश दिया?” – यह मेरे आचार्य (मामुनिगळ् (श्री वरवरमुनि स्वामीजी) द्वारा समझाया गया था।

  • आचार्य को उन शिष्यों निर्देश / निर्देशित करना चाहिए जो पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर रहे हैं
  • एक असली आचार्य का निर्देश एक सच्चे शिष्य के लिए अंतिम लक्ष्य का हिस्सा है

श्रीवेदान्ति जीयर् (नञ्जीयर्) के एक शिष्य जो एक अलग जगह पर रहते हैं श्री वेदान्ति जीयर् (नञ्जीयर्) के पास जाते हैं और उनकी कुछ समय तक सेवा करते हैं। फिर वह अपने शहर वापस लौटने का फैसला करते हैं। श्रीवेदान्ति जीयर् (नञ्जीयर्) के एक करीबी विश्वासी (शिष्य) ने इन श्रीवैष्णव को वापस लौटते देखा और उन्हें दुख के साथ कहा “ओह! यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपको जीयर् के चरणकमलों को छोड़ना पड़ा और अपने निवास पर लौट आये” और वह श्रीवैष्णव जवाब देते हैं “जहां भी मैं हूं, मेरे पास अभी भी है मेरे आचार्य की दया “और खुद को सांत्वना देते हैं। एक श्रीवैष्णवी (श्रीवेदान्ति जीयर् (नन्जीयर्) के करीबी शिष्य) इस वार्तालाप को सुनते हैं, और यह देखते हैं कि घर लौटने वाले श्रीवैष्णव अपने आचार्य से अलगाव के बारे में परेशान नहीं है और कहते हैं, “एनत्तु उरुवाय् उलगिडन्द ऊऴियान् पादम् मरुवादार्क्कु उण्डामो वान्?” – मुदल् तिरुवन्तादि ९१ – यदि कोई व्यक्ति पृथ्वी को बचाने वाले श्रीवराह पेरुमाल् के चरणकमलों की पूजा नहीं करता है, तो वह परमपद कैसे पहुंचेगा? – संदर्भ यह है – यदि यह एम्पेरुमान् (श्री रंगनाथ) के चरणकमलों के बारे में कहा जाता है, तो आचार्य के चरणकमलों की रोज पूजा ना करने के बारे में क्या कहना)। यह घटना मेरे आचार्य (मामुनिगळ् (श्री वरवरमुनि स्वामीजी) द्वारा सुनाई गई है। इससे, हम समझ सकते हैं कि यदि शिष्य अपने सदाचार्य से दूर चला जाता है, तो वह नहीं जान पाएगा कि क्या स्वीकारने योग्य है और क्या त्याज्य है। फिर, अज्ञानता उनका उपभोग करेगी और परमात्मा के पास पहुंचने के अंतिम परिणाम को पूरा नहीं करेगी।

जब अकाल से कोङ्गुनाडु (कोयंबटूर क्षेत्र) प्रभावित हुआ, तो एक ब्राह्मण और उनकी पत्नी वहां रहने के लिए श्रीरंगम से आते हैंं। उन दिनों, एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) ७ घरों में मधुकरी (भोजन के लिए प्रार्थना / भिक्षा) करते थे। जब वह सड़कों पर चलते थे, अगळङ्गनाट्टाऴ्वान् प्राक्रार (मंदिर के चारों ओर सात परतों में से एक) के पास, सभी श्रीवैष्णव श्रीरामानुजाचर्य स्वामीजी के चरणकमलों पर झुकते थे। ब्राह्मण और उनकी पत्नी (जो उस पड़ोस में रहते थे) अपने घर के ऊपरी छत से श्रीरामानुजाचर्य स्वामीजी की ओर देखते थे। एक दिन, एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) उनके घर जाते हैं और महिला ऊपर से नीचे आती है। वह एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) से पूछती है “सभी राजा आपके कमल पैरों पर झुकते हैं, लेकिन यहां आप भोजन के लिए भिक्षा मांग रहे हैं। इसका क्या कारण है?” और एम्पेरुमानार् ((श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) जवाब देता हैं “चूंकि मैं उन्हें अच्छे निर्देश देता हूं वे मेरी पूजा कर रहे हैं”। वह उनके चरणकमलों पर झुकती है और पूछती है, “कृपया मुझे भी अच्छे निर्देश दें”। एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) उनकी दिव्य कृपा के कारण तुरंत (द्वय महामंत्र) निर्देशित करते हैं। इसके बाद, सामान्य स्थिति उनकी मूल भूमि पर लौटती है और वह श्रीरंगम छोड़ने के लिए तैयारी करते हैं। महिला चिंतित हो जाती है कि वह छोड़ने से पहले एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य स्वमीजी) से मिलने में सक्षम नहीं हो सकती हैं। उस समय, एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य स्वमीजी) मधुकरी के लिए वहां पहुंचे और वह उनसे (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) से कहती है, “हम अपने मूल स्थान लौट रहे हैं; कृपया उन दिव्य निर्देशों को दोबारा दोहराएं ताकि यह मेरे दिल में गहरी जड़ें जैसे रह सके।” एम्पेरुमानार् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) अपनी दया के कारण उसे तुरंत निर्देश देते हैं। वह फिर से पूछती है “कृपया मुझे हमेशा बचाने के लिए कुछ और आशीर्वाद दें”। उडयवर (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) तुरंत अपने पदुका को निकाल कर उन्हें उस महिला को देते हैं जिसका नाम पेरिय पिराट्टियार् है। उस दिन से, उसने उन पदुका को अपने तिरुवाराधन (पूजा) में रखा और प्यार के साथ उनकी पूजा की। यह घटना वार्तामाला से अच्छी तरह से जाना जाता है। इससे हम समझते हैं कि, इस संसार में लोग एम्पेरुमानार (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) को भी अनदेखा करेंगे – इस तरह के मामले में आचार्य की ओर पूर्ण भक्ति विकसित करना और उन आचार्य से संबंधित कुछ स्वीकार करना (जैसे इस मामले में पादुकाओं) और उनको कुल शरण के रूप में स्वीकार करना दुर्लभ है। ऐसे लोग जिन्होंने आचार्य में विश्वास विकसित किया है, कोङ्गु देश के पेरियपिराट्टियार् की तरह होना चाहिए। हम पोन्नाचियार् (पिळ्ळैयुऱङ्गाविल्लि दास की पत्नी), तुम्बियूर्क्कोण्डि, एकलव्य, विक्रमादित्य के जीवन को भी याद कर सकते हैं जो सभी आचार्य निष्ठावान थे।

अनुवादक टिप्पणीः इस प्रकार, हमने श्रीएम्बार् (श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी) और उडयवर् (श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी) के अन्य शिष्यों को देखा की कैसे उन्होंने श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी पर कुल निर्भरता प्रकट की।

जारी रहेगा………..

अडियेन् भरद्वाज रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/06/anthimopaya-nishtai-11.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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