लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ९

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

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नम्पिळ्ळै तिरुवल्लिकेणि

८१) अनुष्ठानम् साधनमागातु

भगवान् ही सभी फलों के सर्वोत्कृष्ट प्रदायक है

अनुष्ठान साधन नही होता अर्थात् सही साधन नही है ।

अनुवादक टिप्पणी : भगवद्प्राप्ति के लिये भगवान् ही एक मात्र उपाय साधन है । केवल उनके सङ्कल्प मात्र से ही सब कुछ होता है । कर्म-योग, ज्ञान-योग, भक्ति-योग केवल अचेतन यत्न ही है क्योंकि यह मात्र अज्ञानपरक ही है । इसके विपरीत देखें तो भगवान् तो सर्वदा ज्ञानमय, आनन्दमय तत्त्व और परम चेतन है । जब जीव कर्म, ज्ञान, भक्ति योग यत्नों द्वारा भगवद्प्राप्ति के पथ पर विश्वासपूर्वक चलता है तो अकारणकरुणालय भगवान् इन यत्नों के फलस्वरूप फल को प्रदान करते है । अत: वह जो परम ध्येय (लक्ष्य) प्रदान करता है, वह ही परम साधन है । ऐसे अनुष्ठान तो एक प्रपन्न के लिये सेवा (कैङ्कर्य) परक ही है जो वर्णाश्रम और शिष्टाचार के अनुसार वह करता है पर इन क्रियाओं के फलों (के प्रति अनासक्त रहता है) और फल प्रदाता अर्थात् भगवान् से भी कुछ माँगता भी नही है । इस विषय को विस्तारपूर्वक भगवद्प्रिय पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी ने स्वग्रन्थ “मुमुक्षुप्पडि” के २७१वें सूत्र मे कहते है – “कर्मम् कैङ्कर्यत्तिल् पुगुम्” अर्थात् ऐसे नित्य-नैमित्त क्रिय कैङ्कर्य के अंश है ।

८२) निषिद्धाचरणमुम् नमक्कु रक्षकमन्रु

पाप कर्म भगवान् को संतुष्ट कदापि नही करते। पाप कर्म और अधिक आपत्ति का कारण है

निषिद्धाचरण (शास्त्रों के विरुद्धाचरण) प्रपन्नों का शरण नही है अर्थात् हमारे रक्षक नही कह सकते है ।

अनुवादक टिप्पणी : यह सूत्र पिछले सूत्र से सम्बन्धित है । जब जीव समझ जाये कि उपरोक्त कर्मानुष्ठान पालन परम लक्ष्य के लिये साधन नही है तो एतद् प्रतिकूल विचार उत्पन्न हो सकता है कि – ” शास्त्र प्रतिकूल कार्य करें ” । परन्तु यह भी श्रेयस्कर (उपयुक्त) नही है क्योंकि इससे भगवद्मुखोल्लास नही होता । इस तत्त्व को स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी “मुमुक्षुप्पडि” के चरम-श्लोक प्रकरण “२०५-२१०” सूत्र संख्या मे समझाते है । उसी का सारांश निम्नलिखित है :

भगवान् कृष्ण भगवद्गीता मे कहते है – “सर्वधर्मान् परित्यज्य” इति अर्थात् सभी धर्मों का परित्याग करो अत: कुछ लोग इसके विपरीत अधर्म का पालन करो ऐसा सोचते है (इसका प्रतिकूल अर्थ ऐसा निकालते है) । यह ग्राह्य नही है क्योंकि प्रतिकूलाचरण का उपदेश भगवान् ने नही दिया । आगे यह विचार भी आ सकता है कि – क्या यह प्रतिकूलता बोधक नही है ? जब कहा गया है सर्व-धर्म का त्याग करो इसका सर्व-अधर्म अर्थ ही बोध होता है । यह भी ग्राह्य नही है क्योंकि “धर्म” का अर्थ “अधर्म त्याग” नही है । यहाँ फिर किस धर्म की बात भगवान् ने की है ? यहाँ धर्म अर्थात् शास्त्राज्ञान है । अगर मान भी ले कि “धर्म” “अधर्म-त्याग” है तो “धर्म-त्याग” अर्थात् अधर्म-त्याग अर्थात् अधर्म की स्वीकृति मानी जायेगी तो यह भी अग्राह्य है और इस संदर्भ मे यह अयोग्य है ।

भगवान् , प्रपन्न और लक्ष्य परक की दृष्टिकोण से देखें तो अधर्म-स्वीकृति अग्राह्य है क्योंकि भगवान् स्वाभाविक रूप से चाहते है कि सभी अधर्माचरण मे प्रवृत्त न हो । प्रपन्न जो भगवद्मुखोल्लास चाहता है वह कदापि अधर्माचरण मे प्रवृत्त नही होगा ।
अधर्माचरण प्रवृत्ति से भगवद्मुखोल्लास नही होता है ।

८३) विहिधाचरणमुम् नमक्कु रक्षमन्रु

शास्त्रोक्त आचरण भी हमारा शरण (रक्षक) नही है ।

अनुवादक टिप्पणी : ८१वें सूत्र मे निहित लक्ष्य अर्थात् भगवान् के अलावा अन्य कोई रक्षक (शरण) नही है ।

८४) तिरुवडिगळिल् कैङ्कर्यमे यात्रैयागप् पेरवेणुमेन्रु वाक्यशेषमाय्क् किडक्किरतु

श्रीनम्पेरुमाळ् के दिव्य चरणकमल

यात्रै : अर्थात् जीवन व्यापन ।
द्वयमहामन्त्र के द्वितीय भाग के अनुसार प्रपन्न जीव को सदैव भगवान् के दिव्यपादपद्मों की सेवा करने की प्रार्थना करना चाहिये और ऐसा  जीवन व्यापन करना चाहिये ।

अनुवादक टिप्पणी : द्वयमहामन्त्र दो भाग (वाक्य सम्युक्त) मन्त्र है । प्रथम भाग मे जीव भगवान् श्रीमन्नारायण के पादपद्मों का आश्रय ग्रहण कर भगवच्छरणागत होता है । दूसरे भाग मे, वह भगवद्पादपद्मों की सेवा प्रार्थना (करता है कि) केवल मात्र श्रीमहालक्ष्मी समेत श्रीमन्नारायण की सन्तुष्टी के लिये अन्याभिलाषिता रहित आजीवन सेवा तत्पर रहे । यहाँ दूसरा भाग – ” श्रीमते नारायणाय नम: ” के अर्थ विवरण मे पूर्वाचार्य कहते है – “श्रीमते नारायण” शब्द से दिव्य-दम्पति (युगल) है अर्थात् श्री समेत भगवान् नारायण । “आय” शब्द कैङ्कर्य प्रार्थना है – हे भगवन् ! मुझे अपनी सेवा मे नियुक्त करो । मुझे आपकी सेवा करने का अवकाश दे । “नम:” शब्द आनन्द बोधक है – सेवा (कैङ्कर्य) फलस्वरूप आनन्दमय रस की प्राप्ति अर्थात् अन्याभिलाषिताशून्य भगवद्सेवा फल रस है । भगवद्मुखोल्लास से प्राप्त आनन्द पुन: जीव के लिये आनन्दप्रदायक है क्योंकि भगवद्सेवाफल का इतर लाभ यही तो है । परम लाभ भगवद्मुखोल्लास ही तो है ।

८५) नूरायिरम्वरि एऴुदिक्किडन्तालुम् अवत्तिल् (अवट्ट्रिल्) पोगाते तात्पर्यत्तै ग्रहित्तिरुक्कुमवर्गळ् “मादवन् (माधवन्) पेर् सोल्लुवते (शोल्लुवते) ओत्तिन् सुरुक्कु (शुरक्कु)” एन्रिरुक्कुमवर्गळ्

श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ

अर्थ : शास्त्रों मे सहस्त्राधिक वाक्य है । बुद्धिजनों कि मति केवल उन सरतम विषय प्रतिपादक वाक्यों मे अनुरक्त है जो भगवन्नाम महिमा परक है । इस विषय को भूतदाऴ्वार सुन्दर पासुर मे प्रस्तुत करते हुए कहते है :

ओत्तिन् पोरुळ् मुडिवुम् इत्तनैये
उत्तमन् पेर् एत्तुम् तिरम् अरिमिन् एऴैगाळ्
ओत्तदनै वल्लीरेल् नन्रु अदनै मात्तीरेल्
मादवन् पेर् सोल्लुवदे ओत्तिन् सुरुक्कु

अनुवादक टिप्पणी : इस पासुर मे, भगवन्नाम महिमा कि यशोकीर्ति युक्त “माधव” को आऴ्वार् ने बताया गया है । माधव शब्द का अर्थ है : श्रीमहालक्ष्मी के पति अर्थात् श्रिय:पति । आऴ्वार् कह रहे है कि : हे मन्दमतियों ! हे अनभिज्ञयों ! अगर वेद का उच्चारण कर सकते हो तो ठीक है परन्तु अगर नही कर सकते तो, वेदों का आशय भगवन्नाम प्रतिपादन करना ही तो है और अन्तत: सभी इन दिव्य नामों से भगवान् की गुणगान करे । वेद सार इस नाम महिमा को ही तो जानना है और जिसे जानकर इन भगवन्नामों से भगवान् की स्तुति कर सकें । पूर्वाचार्य कहते है कि यह “माधव” नाम द्व्यमहामन्त्र से अभिज्ञात है क्योंकि यह युगलस्वरूप प्रतिपादक है अर्थात् भगवान् श्रीमन्नारायण “श्रिय:पति” है ।

८६) त्वरित्तिअलागिल् अवन् वैलक्षण्यत्त्तिल् ज्ञानम् इल्लैयागक् कडवतु इन्गे काल् पावित्तागिल् (पाविट्ट्रागिल्) सम्सारत्तिल् तण्मैयिल् ज्ञानमिल्लैयागक् कडवतु

अर्थ : वैलक्षण्यम् (वैलक्षण) – विशिष्टता / महत्ता । काल् पावुतल् – स्थितप्रज्ञता । तण्मै – नृशंसता

भगवान् की विशिष्टता कि अनभिज्ञता से, भगवान् को पाने कि तृष्णा जीव को नही होती है । अगर कोई जीव इस भौतिक जगत् मे शान्त व स्थितप्रज्ञता से जीवन व्यतीत कर रहा है तो वह इस भौतिक जगत् कि नृशंसता और निरर्थता से अनभिज्ञ है ।

अनुवादक टिप्पणी : पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी जी श्रीवैष्णव लक्षण का वर्णन मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के ११६वें सूत्र मे करते हुए कहते है – प्रपन्न जीव का मूल स्वभाव यह होना चाहिये कि चतुर्थ पुरुषार्थ व मोक्ष प्राप्ति व परमपद मे नित्य भगवद्सेवा की त्वरता (अत्यन्त चाहना) होनी चाहिये “पेत्तुक्कु त्वरिक्कै” । जब हम यथार्थ रूपेण समझ जायेंगे कि भौतिक जगत् के माया जालों के खिंचाव से इस घोर संसार मे पुन: वापसी है और हमारे कृत्य केवल तुच्छ प्रतीक है तो विवशता से उत्पन्न अन्तरंगिकि दर्द को जीव महसूसता है और इस संसार चक्र मे रहना उस के लिये असहनीय हो जाता है । इस परिपूर्ण क्षोभ पीडानुभव का उल्लेख भगवद्प्रिय श्रीशठकोप स्वामीजी ने तिरुविरुत्तम् नामक दिव्यप्रबन्ध के प्रथम पासुर मे किया है । श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है – “इनियाम् उरामै” – अब मै और सहन नही कर सकता – मानो कि ज्वालाग्नि पर खडा हूं ।

८७) ईश्वरनैप्पत्तिन (ईश्वरनैप्पट्ट्रिन) ऊत्तत्ताले (उट्ट्रत्ताले) उपायान्तरन्गळै नेगिऴुगैयोऴिय नास्तिक्यत्ताले विडुमन्रु; अतु विषयान्तरप्रावण्यहेतु

अर्थ : ऊत्तम् – इच्छा ; नेगिऴुगै – त्यागना ;
इसका यह अर्थ हुआ कि जब ईश्वर के प्रति अनुराग बढता है तो इतरोपायान्तर स्वयं छोड देते है । इसके विपरीत जब ईश्वर के प्रति अनुराग कम होता है तो विषयान्तरों के बन्धन मे फंस जाते है ।

अनुवादक टिप्पणी : स्वामी पिळ्ळै लोकाचार्च श्रीवचनभूषण दिव्यशास्त्र के ११५वें सूत्र मे कहते है : “परित्यागत्तुक्कुम् अज्ञान असक्ति (अशक्ति) गलन्रु; स्वरूप विरोतमे (विरोधमे) प्रतान (प्रधान) हेतु” अर्थात् कर्म-ज्ञान-भक्ति योग त्यागना उनमे अज्ञानता और अशक्ति की वजह से नही अपितु जीव के स्वरूपानुरूप नही होने के कारण त्याज्य है क्योंकि जीव भगवद्परतन्त्र है । अत: ऐसे स्वप्रयासों (हलांकि पूर्ण शक्य होते हुए भी) मे चरम लक्ष्य “चतुर्थ-पुरुषार्थ व भगवद्सेवा” पुष्टि हेतु नही पडना चाहिये । इस विषय का विस्तार पुष्टिकरण पिळ्ळै लोकाचार्य तदनन्तर सूत्रों मे करते है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इन सूत्रों की अद्भुत व्याख्या मे इस तत्त्व को और सुन्दरता से दर्शाया है ।

८८) कळवु वेळिप्पडुगैयिरे आत्म समर्प्पणम् पण्णुगैयावतु

अर्थ : जीव भगवद्सम्पत्ति है । भगवान् पर पूर्णतया निर्भर है और भगवद्परतन्त्र है । आत्मा को स्वयं है समझना चोरी है । आत्म समर्पण (स्वयं अर्पण) (जो स्वाभाविकता से भगवद्सम्पत्ति है) भगवान् को करना इस चोरी को प्रदर्शित करता है ।

अनुवादक टिप्पणी : जब हम किसि वस्तु को दूसरों को देते है तो हम यही समझते है कि यह हमारी सम्पत्ति या हम इसके मालिक है । इसी दृष्टान्त मे देखें, जब जीव भगवान् को आत्म-समर्पण करता है , तो जीव की स्वतन्त्रता परक बुद्धि प्रकाशित होती है अत: उस भावना से अपने आपको समर्पित करता है । इस विषय पर पूर्वाचार्य श्रीशठकोप स्वामी का पासुर उदाहरण देते हुए कहते है : श्रीशठकोप स्वामी ने कहा : मैने अपने आप को (भगवान्) के प्रति समर्पण किया परन्तु इस कृत्य पर पुण: विचार कर कहते है कि पूर्वोक्त कथन असत्य है और इस कृत्य के लिये वह शर्मिंदित है । यह ६३वें सूत्र मे पूर्व चर्चित है ।

८९) परत्वम् पोले वेदम् ; अवतारम् पोले इतिहास पुराण्न्गळ् ; अर्चावतारम् पोले तिरुवाय्मोऴि

तिरुक्कुडन्तै – नाच्चियार् सहित आरावमुदन् भगवान् – वह भगवान् जिनने तिरुवाय्मोऴि और अन्य प्रबन्धों के प्रकाशन मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई

अर्थ : परत्वम् – परत्व (अर्थात् वह स्वरूप जो परमपद मे नित्य और मुक्तों को दर्शनीय है) ; अवतारम् – (अर्थात् वह स्वरूप जो भगवान् के अवतार काल मे दर्शनीय है) ; अर्चावतारम् – (अर्थात् वह स्वरूप जो सभी के लिये दर्शनीय है)

इस सूत्र का यह अर्थ हुआ कि वेद परत्व तुल्य है, इतिहास-पुराण अवतार तुल्य है, तिरुवाय्मोऴि अर्चावतार तुल्य है । इसका विस्तार अर्थ कुछ इस प्रकार से है : वेद, इतिहास-पुराण सभी की बात नही है । योग्य व्यक्तियों के लिये ही है । पर इन योग्य व्यक्तियों को भी समय अनुसार ही यह योग्यता प्राप्त है । इसके विपरीत देखें तो, अर्चावतार तुल्य तिरुवाय्मोऴि परम सुलभ है अर्थात् अन्य दिव्यप्रबन्ध भी परम सुलभ है और सभी के लिये है । आचार्य हृदय मे अऴगियमणवाळ पेरुमाळनयनार् स्वामी इस तत्त्व को विस्तार से समझाते है । सूत्र ७०वें स्वामी जी कुछ इस प्रकार कहते है :

आचार्य हृदय सूत्र ७० : ” अतवा वेदवेद्यन्यायत्ताले परत्वपरमुदुवेदम् व्यूह व्याप्ति अवतारणान्गळिल् ओतिननीति केट्टमनु पडुकतैगळाय् आगमूर्त्तियिल् पण्णिय तमिळानवारे वेदत्तै द्राविडमागच् चेय्तारेन्नुम् “

अर्थात् श्रीमद्रामायण श्लोक “वेदवेद्येपरेपुंसि जाते दशरथात्मजे वेदः प्राचेतसादासीत् रामायणात्मना” से प्रतिपादित करते हुए स्वामी कह रहे है कि वह परमेश्वर भगवान् श्रीमन्नारायण, जो वेद के विषय है, महाराज दशरथ के आत्मज (पुत्र) के रूप मे अवतरित हुए तो वेद स्वयं श्रीमद्रामायण के रूप मे प्रकट हुआ । इस वेदवेद्य न्याय के अनुसार, भगवान् के विभिन्न अवतार (परवासुदेवोद्भव) का प्रतिपादन, वेदोद्भव विभिन्न प्रमाण देते है । वेद परत्व सूचक है अर्थात् परत्व की परिभाषा वेद मे है, व्यूह की परिभाषा पाञ्चरात्र मे है, अन्तर्यामित्व मनुस्मृति मे प्रतिपादित है, विभवावतार इतिहास और पुराणों मे उल्लिखित है, भगवान् का अर्चावतार जो कृपा करुणा का दिव्यसाकार स्वरूप है जो सर्वसुलभ है आऴ्वार के दिव्यप्रबन्ध (तिरुवाय्मोऴि) मे प्रतिपादित है ।

आचार्य हृदय सूत्र ७३ मे, श्रीसहस्रगीती के विशुद्ध सत्त्व का प्रतिपादन करते है हुए कहते है :

घट का उदाहरण

मृत् घटं पोलन्रे पोर्कुडम् – अर्थात् मिट्टि का घडा स्वर्ण घडा के समान नही होता है । स्वर्ण घडा स्वाभावत: शुद्ध होता है । इस घडे को कोई भी कभी स्पर्श कर सकता है । परन्तु मिट्टि के घडे को स्पर्श करने के लिये बहुत से नियम है जैसे योग्य व्यक्ति ही अनुकूल समय मे स्पर्श कर सकते है । अगर अयोग्य व्यक्ति इसको गलती से भी स्पर्श कर ले तो यह पात्र अयोग्य हो जाता है । इसी के अनुसार दिव्यप्रबन्ध भी स्वर्ण घडे के समान यह अत्यन्त विशुद्ध है और सभी इसका अवलोकन कर सकते है ।

९०) किण्णगत्तिल् इऴिवार् देशिकरैप् पिडित्तुक्कोण्डु इऴियुमापोले पेरिय पेरुमाळै अनुभविक्कुम्पोतु पिराट्टियैक् कूडक्कोण्डायित्तु इळिवतु

पेरिय पेरुमाळ् और पेरिय पिराट्टि

बाढ़ के प्रभाव से प्रवाहित तीव्रगति नदी जल मे अनुभवी व्यक्तियों कि सहायता से प्रवेश करना चाहिये । ठीक उसी प्रकार, बाढ़ रुपी गुण सागर स्वरूप भगवान् श्रीरङ्गनाथ के दिव्य गुणों का अनुभव केवल अनुभवी श्रीजगन्माता श्रीजी की सहायता से ही हो सकती है । इसका उदाहरण श्रीमद्वाल्मीकि रामायण मे है यथा ” सहपत्न्या विशालाक्ष्या नारायणुपागमत् ” ।

अनुवादक टिप्पणि : पूर्वाचार्य इस श्लोकोद्धरण से यह कहते है कि जब भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वपरिवार उपास्य देव के तिरुवाराधन करते थे तो श्रीसीता (श्रीविशालाक्षि – विशाल नेत्रों वाली श्रीजी) सदैव साथ देती थी । यहाँ श्रीरामचन्द्र उपास्य देव की उपासना (अर्थात् श्रीमन्नारायण) कर हमे भगवद् आराधन कैसे करना है यह दर्शा रहे है । हमारे पूर्वाचार्य सर्वदा कहते है कि भगवान् का सन्निकर्ष पाना है तो आचार्य माध्येन (अर्थात् श्रीजी के पुरुषकार) से ही लभ्य है और युगल सेवा ही हम भगवद्दासों का मुख्य उद्देश्य है । श्रीशठकोप स्वामीजी इस तथ्य को प्रतिपादित करते हुए स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि १०.७.१ पासुर मे कहते है : सेन्जोर्कविगाळ् उयिर्कात्ताट्चेय्म्मिन् अर्थात् भगवान् अनेक दिव्य सागर रूपी गुणों का साकार स्वरूप है । हे महान कवियों ! ऐसे भगवत्तत्त्व मे प्रवेश करते हुए (भगवान् के दिव्य असंख्य कल्याण गुणों की महिमा गान करते हुए) स्वयं कि रक्षा करो क्योंकि इस सागर रूपी गुणाश्रय स्वरूप मे दूब जावोगे ।

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-9.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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