विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३३

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३२)

६७) आश्रम विरोधी – अपने आश्रम में बाधाएं (जीवन का स्तर)

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य – गृहस्थ) – श्रीवेदान्ति स्वामीजी (शिष्य – सन्यासी)

आश्रम अर्थात जीवन का स्तर। वैदिक सम्प्रदाय में जीवन के ४ स्तर पहचाने गये है – ब्रह्मचर्य (उपनयन के पश्चात और विवाह से पूर्व), गृहस्थ (गृहस्थाश्रम – विवाहित जीवन), वानप्रस्थ (स्त्री के साथ वन में अलग से जीवन व्यतित करना) और सन्यास (जिसे तुरियाश्रम, उत्तमाश्रम भी कहते है – तपस्वी – अकेले रहना)। किसी आश्रम में रहने के लिये हर आश्रम के अलग अलग नियम और दिशा निर्देश है। सभी को अपने आश्रम के दिशा निर्देश को सीखना और बिना चूके पालन करना है। उस आश्रम के दिशा निर्देश के विपरित रहना बाधा है। विषय की लम्बाई को देखते हुए हर आश्रम के दिशा निर्देश को नहीं बताया गया है।

अनुवादक टिप्पणी: धर्म शास्त्रानुसार मनुष्य के जीवन को चार स्तर में बाँटा गया है।

पहला स्तर है ब्रह्मचर्य (विध्यार्थी / अविवाहित जीवन)। जब एक लड़का यज्ञोपवित संस्कार और ब्रह्मोपदेश (अपने आचार्य से पवित्र मन्त्र प्राप्त करना) प्राप्त करता है तब से प्रारम्भ होता है। हम आगे वर्ण के विषय में चर्चा करेंगे। केवल ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य वर्णवाले ही यज्ञोपवित और ब्रह्मोपदेश प्राप्त करते हैं। वर्णानुसार यज्ञोपवित को इस आयु में ही प्राप्त करते हैं (ब्राह्मण – ८ वर्ष, क्षत्रीय – ११ वर्ष और वैश्य – १२ वर्ष; उम्र की गणना माँ का गर्भ धारण के समय से होती है)। एक बार ब्रह्मोपदेश प्राप्त हो जाने पर वह बालक वेद और उससे जुड़े विषयों को गुरुकुल में आचार्य के सन्निधी में शिक्षा प्राप्त करने के योग्य हो जाता है। सामान्यत: वह बालक आचार्य के साथ उनके तिरुमाली- गुरुकुल में रहता है। वह लम्बे समय तक वहाँ शिक्षा प्राप्त करता है और मूल ग्रन्थ और वेद, उपनिषद, इतिहास, पुराण, स्मृति, आदि की अर्थ सहित शिक्षा प्राप्त करता है। क्षत्रीय बालक धनुर विद्या कि शिक्षा प्राप्त करता है – लड़ाई और शस्त्र का विज्ञान। शिक्षा प्राप्ति के समय विध्यार्थी को अपने शिक्षक के शारीरिक जरूरत का ध्यान रखना पड़ता है। विध्यार्थी जंगल जाकर लकड़ी इकट्ठा कर लाएंगे, भोजन के लिये भिक्षा भी मांगेंगे, आदि। जो भी दान प्राप्त होता है उसे शिक्षक को दिया जाता है और शिक्षक उसे विध्यार्थी को सही तरीके से प्रयोग करने को कहता है। विध्यार्थी भी गुरु की अच्छे से सेवा करते हैं। ब्रह्मचार्य का एक और अर्थ है ब्रह्म विध्या पर केंद्रित होना और एक साधारण और अलग से जीवन व्यतीत करना। आनन्द और खुशी के लिये कोई स्थान नहीं है जैसे सुगंधित द्रव्य लगाना, ताम्बूल पाना, आदि। जीवन के इस स्तर पर अगर सही शिक्षा प्राप्त हो तो वह पूर्ण मनुष्य के रूप में विकसित होगा और आध्यात्मिक जीवन की ओर सही रवैया रहेगा।

फिर जब वह गुरुकुल से बाहर आता है तो वह युवा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने योग्य हो जाता है। गृहस्थाश्रम विवाहित जीवन है। जब कोई वैदिक विवाह के बन्धन में बंध जाता है तो वह अपनी स्त्री की रक्षा करने कि प्रतिज्ञा करता है। वह यह भी वचन लेता है कि उससे जो संतान जन्म लेगी उसे भी सही वैदिक धर्म में शिक्षा प्रदान करायेगा। भागवत में ऋषभ देव (भगवान के एक अवतार) कहते हैं हमें देव, पति, आचार्य और पिता का स्थान तभी ग्रहण करना चाहिये जब हम स्वयं पर निर्भर जनों को मोक्ष की राह पर ले जाने के लिये सक्षम हो। गृहस्थ का मुख्य कर्तव्य ब्रह्मचारी और सन्यासी का ध्यान रखना हैं। गृहस्थाश्रम जनों को चाहिये कि वे अनपेक्षित अतिथि का बड़े आदर से स्वागत कर उनका ध्यान रखें। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी गृहस्थाश्रम में सही तरीके से रहनेवाले कि “नल्ल कोट्पट्टुलगन्गल् ……….नल्ल पथत्ताल मनै वाल्वार कोण्ड पेण्डिर् मक्कले” ऐसे स्तुति करते है। यह पदिगम “नेदुमार्कदिमै” भागवतों के प्रति कैंकर्य के महत्त्व और स्तुति को स्थापित करता है। इस पदिगम के अन्त में श्रीशठकोप स्वामीजी यह कहते हैं कि जो भगवान श्रीमन्नारायण के भक्तों की सेवा पर केन्द्रित है उनका गृहस्थाश्रम जीवन बहुत सुन्दर होगा जो ऐसे कैंकर्य पर केन्द्रित होगा वह इस संसार में भी एक सुन्दर जीवन व्यतीत करेगा। यहाँ श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से एक मुख्य तत्त्व को समझाते है – वे कहते हैं आदर्श परिवार का अर्थ है जब पति श्रीवैष्णवों की सेवा करना चाहता है तो उसकी पत्नी और बच्चे भी उसी के विचार पर चलेंगे और सेवा भी करेंगे नाकि स्वार्थी बन बैठेंगे। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी शेल्व नम्बी के जीवन की एक घटना को उदाहरण के तौर पर दर्शाते हैं। सेल्व नम्बी जिनकी श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी बहुत प्रशंसा किये है हमारे पूर्वाचार्यों ने भी अपने व्याख्यानों में उन्हें एक आदर्श गृहस्थ कहा है। एक बार जब वे बाहर गये हुये थे तो कुछ श्रीवैष्णव उनके तिरुमाली में पधारे जिनका उनकी पत्नी ने स्वागत किया। परन्तु उसे जब पता चला कि उनके प्रसाद हेतु उसके पास चावल नहीं है तो उसने अगले साल की खेती के लिये जो धान (इसे बहुमूल्य माना जाता है क्योंकि अगले साल की जीविका उस पर ही निर्भर है) बचा के रखा था उस धान से चावल निकालकर उन अतिथि के लिये प्रसाद बनाती है। जब सेल्व नम्बी लौटकर आते है तो धान के विषय में पत्नी से पूछते है। वह कहती है “मैंने अभी धान को बो दिया है जिसका फल श्रीवैकुण्ठ में प्राप्त होगा” अर्थात “मैंने उसे श्रीवैष्णवों को दे दिया है और यही उच्च कैंकर्य है”। यह सुनकर सेल्व नम्भी अत्यन्त आनंदित होते है – ऐसा सेल्व नम्बी और उनकी पत्नी का समर्पण भाव था। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी तोण्डनूर, एच्चान, आदि का उदाहरण देते हैं कि कैसे वे गृहस्थ जीवन भक्तों का कैंकर्य करते हुए निर्वाह करते हैं।

अगला आश्रम है वानप्रस्थम (दम्पति का वन में अलग अलग रहना)। एक अवस्था के पश्चात (५० वर्ष के बाद) दम्पति अपनी दिनचर्या से सन्यास लेकर वन की ओर प्रस्थान कर वहाँ निवास करते हैं। यह क्यों जरूरी हैं? क्योंकि जब यहीं कार्य अपने बच्चों, सम्बन्धियों के संग निरन्तर करते रहेंगे तो हम इसके आदि हो जाते हैं और भगवान की ओर अपना ध्यान कम कर देते है। जीवन का एक बहुमूल्य पहलू है भगवान के विषय में निरन्तर ध्यान करना। अपनी जरूरतों को कम से कम करना और अलग-अलग साधारण ढंग से जीवन निर्वाह करने से यह कार्य आसान हो जाता है। इस स्तर पर एक साधारण तिरुमाली में निवास करता है, साधारण प्रसाद बनाता है जो भी वन में उपलब्ध हो, कम से कम वस्त्र हो और पूरे समय भगवान का ध्यान करना। ऋषी मुनि जो वन में है उनकी सेवा का अवसर भी प्राप्त होता है। परन्तु श्रीवैष्णवों का जीवन पहले ही से साधारण है जो अर्चावतार भगवान और भागवतों के कैंकर्य मे लगा हुआ है और जिनको भगवान की स्तुति सुनने का बहुत अवसर प्राप्त होता है इसलिये उन्हें वानप्रस्थम आश्रम अलग से पालन करने की आवश्यकता नहीं है।

अन्तिम आश्रम है सन्यासाश्रम। इस अवस्था में मनुष्य अपने सभी लगावों का त्याग कर सन्यासी हो जाता है। सन्यासाश्रम अर्थात धन, परिवार, सम्बन्धी, आदि का त्याग कर पूर्णत: भगवद विषय में समय व्यतीत करना। श्रीवैष्णव सन्यासी को परमहंस परिवारजाक आचार्य से जाना जाता है। परमहंस का अर्थ बहुत बुद्धीमान जैसे हंस जो जल को दूध से (सार को असार) अलग करता है। और हंस को दलदल / किचड़ में आसानी से रहने की आदत है लेकिन उससे प्रभावित नहीं होते हैं – उसी तरह सन्यासी जो इस सांसारिक दुनिया में रहता है उसे सांसारिक सुख से कुछ भी फरक नहीं पड़ता है। ब्रह्मचर्य में जैसे ब्रह्म विध्या के निर्देशानुसार और सांसारिक सुख को सही तरीके से पालन करना चाहिये। परिवारजाक आचार्य का अर्थ है वह जो निरंतर भ्रमण करता है और सभी को उच्च ज्ञान प्रदान करता है। वे न केवल उपदेश देते हैं अपितु वे उच्च तत्त्वों के उदाहरण हैं। और श्रीवैष्णव सन्यासी के पास त्रीदण्ड, कमण्डल, शिखा, यज्ञोपवित, आदि होता है। श्रीयादव प्रकाशाचार्य अन्त में श्रीरामानुज स्वामीजी को अपना गुरु मानकर और उनसे सन्यासाश्रम ग्रहण कर एक नूतन नाम गोविन्दाचार्य पाते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य को निर्देश देते हैं कि सन्यासाश्रम के तत्त्वों पर शास्त्र के आधार पर एक लेख तैयार करें और जिसका परिणाम है “यति धर्म समुच्चयम”। हालाकि सन्यासी एक स्थान पर ३ दिन से अधिक नहीं रह सकते हैं परन्तु श्रीवैष्णव सन्यासी एक मठ (दिव्य देश के मन्दिर से जुड़े) में रहते है और उच्च तत्त्वों को सिखाते है। फिर भी कई सन्यासी भ्रमण कर उच्च ज्ञान का प्रसार प्रचार करते है।

हमने आश्रम रीति को थोडा देखा है। जहाँ आश्रम पद्धत्ती पुरुषों के लिये है महिलाओं की जीवन शैली भी पुरुषों के आश्रम अनुसार बदलती रहती है। सामान्यता स्त्री का पालन पोषण उसके विवाह तक उसके पिता करते है तत् पश्चात उसका पति करता है। पति के वैकुंठवास होने के पश्चात उसके बच्चे करते है। यही वैदिक धर्म है। स्त्री का पालन पोषण बहुत अच्छे से होता है और वह समाज और तिरुमाली में एक अहम भूमिका निभाती है। सामान्यता वह यह सुन्दर तत्व अपने पिता और पति से आसानी से सीख लेती है। वह अपने बच्चो को कम उम्र में ही सांच देती है और भविष्य के लिये तैयार कर देती है। एक पत्नी जैसे अपने पति के कैंकर्य में मदद करती है। चाहे वह तिरुवाराधन हो या अतिथि सत्कार हो वह पति के कैंकर्य में शामील होती है। सामान्यतया एक निर्मल वातावरण में वे दोनों शास्त्र के ज्ञान और समझ को आसानी से विकसित कर सकते हैं। धर्म शास्त्र में यह कहा गया है कि अगर हमारे आचरण, अनुष्ठान, आदि में कुछ भी शंका हो तो एक बुजुर्ग औरत से ही पूंछकर उसे स्पष्ट कर लेना चाहिये – ऐसे वैदिक परिवारों में औरतों का स्थान था। श्रीकुरेश स्वामीजी की धर्मपत्नी आण्डाल, पिल्लै उरंग विल्ली धासर की धर्मपत्नी पोण्णाचियार, श्रीकोंगिलाचान की धर्मपत्नी कोंगिल पिराट्टी, आदि कुछ जाने माने श्रीवैष्णव हैं जिनकी ज्ञान, अनुष्ठान और कैंकर्य के लिये उनकी बढ़ाई हुई है। ऐसे कई उदाहरण हैं। इस परिचय के साथ इस अंश को देखेंगे।

यह मानना कि मैं एक आश्राम से हूँ और यह न मानना कि मैं केवल भगवान का सेवक हूँ,  बाधा है। कोई किसी भी आश्रम से क्यों न हो परन्तु जीवात्मा का स्वरूप शेषत्व और पारतंत्रय है। “दास भूता स्वस्थस सर्वे” सामान्य प्रमाण है – इसका अर्थ सभी जीवात्मा अप्रधान / दासत्त्व /भगवान के सेवक है। यह सेवा नित्य और शाश्वत है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार सुन्दरता से कैंकर्य के महत्त्व को सामान्य कर्मानुष्ठान से दर्शाते है। ३१वें चूर्णिकै में कहते “जात्याश्रम दीक्शैकलिल भेदिक्कुम धर्मंगलपोले अत्ताणिच चेवगत्तिल पोधुवानतु नलुवुम” – जैसे धर्म के कुछ पहलू को छोड़ देते है उनके वर्ण, आश्राम, संकल्प के आधार पर जब कोई भगवान और भागवतों की एकान्तिक कैंकर्य कर रहा हो तो इस कैंकर्य के समय सामान्य वर्णाश्रम, धर्म अनुष्ठान का त्याग किया जा सकता है। इस चूर्णिकै के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की व्याख्या बहुत सुन्दर है। वह बड़ी सुन्दरता से वर्ण, आश्रम और दीक्षा को समझाते है और फिर यह समझाते है की एक सच्चे ज्ञान प्राप्त करनेवाले मनुष्य के लिये कैसे सामान्य धर्म अनुष्ठान तुच्छ हो जाता है। अन्त में वह इस तरह निष्कर्ष निकालते हैं कि हमारे पूर्वाचार्य अभी तक अपने वर्ण/आश्रम अनुष्ठान का बड़े दया से पालन किये हैं। इसलिये हमे यह समझना चाहिये कि जब हम कैंकर्य में हो तो कर्मानुष्ठान का त्याग कर सकते हैं या कुछ समय पश्चात कर सकते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी यथार्थ में इसे बताये है – एक बार संध्या के समय जब वे नम्पेरुमाल का कैंकर्य कर रहे थे तो किसी ने उन्हें यह स्मरण कराया कि संध्यावंदन का समय हो गया है तो उन्होंने कहा कि हम अभी कैंकर्य में हैं तो उस पल की चिन्ता करने कि जरूरत नहीं है।

  • उत्तमाश्रम (सन्यासी) में होने का घमण्ड करना बाधा है। जब कोई सन्यासी बन जाता है तो कई जन उसके चरणों में आकर उसकी पूजा और स्तुति “यति”, “जीयर स्वामी”, आदि कहकर करते है, क्योंकि सन्यासी कठोर जीवन बिताते हैं। परन्तु सन्यासी को स्तुति सुनकर घमण्ड नहीं करना चाहिये – उन्हें यह निरन्तर सोचना चाहिये कि वह भगवान और भागवतों के सेवक हैं और उसके अनुसार रहना चाहिये।
  • अवैष्णव आश्रमी (सन्यासी) स्वपच से भी हीन होता है। यह न जानना बाधा है। स्वपच अर्थात जो कुत्ते को पकाकर खाता है। आश्रमी यहाँ सन्यासी को कहते हैं। क्योंकि अवैष्णव आश्रमी शिखा, यज्ञोपवित, नित्यकर्म जैसे संध्यावन्धन, आदि का त्याग कर देते हैं और मुख्य बात वे भगवान श्रीमन्नारायण को सर्वोंत्तम नहीं मानते इसलिये उन्हें हीन समझना चाहिये। ऐसे अवैष्णव सन्यासी को पाखण्डी कहते हैं। अनुवादक टिप्पणी: “आचार्य हृदय” में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार भागवतों की महिमा बड़े विस्तार से समझाते है। वो उन जनों का उपहास भी करते है जो की अपने वर्ण और आश्रम पर केन्द्रीत होते हैं न कि वर्णाश्रम के धर्म के तत्त्वों को समझने की ओर जो भगवान श्रीमन्नारायण के पूजा की ओर है। ८६ चूर्णिकै में वे समझाते है वह वर्ण, आश्रम, ज्ञान और अनुष्ठान जो भगवान पर केन्द्रीत न हो वह निरर्थक है। सन्यासी जिसमें भक्ति न हो वह स्वपच से भी नीचा है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सभी पहलू को बड़े सुन्दरता से शास्त्र के प्रमाण सहित समझाते हैं। वे कहते हैं “श्वपचोपि महिपाल विष्णुभक्तो ध्विजातिक: विष्णु भक्ति विहिनस्तु यतिच्च स्वपचाधम” – जब एक स्वपच पूर्णत: भगवान विष्णु की पूजा करता है तो उसे ब्राह्मण और सन्यासी से भी बड़ा समझना चाहिये। अगर वह भगवान विष्णु की पूजा नहीं करता है तो वह स्वपच से भी गिरा हुआ है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने २१७ सूत्र में इसी तत्त्व को समझाया है।
  • अपने स्वयं के आश्रम में सेवा कैंकर्य भाव नहीं होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के लिये वे जो भी कर्म करते हैं वह कैंकर्य का एक हिस्सा हो जाता है। मुमुक्षुपड्डी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी २७१वें सूत्र में यह समझाते हैं कि “कर्मम कैंकर्यत्थिले पुगुम” – प्रपन्नों द्वारा शास्त्रानुसार जो भी कार्य किया जाता है उसे भगवान की सेवा ही समझी जाती है। इसलिये हमारे कर्म को सेवा भाव से ही करना चाहिये।
  • अन्य के आश्रम को विपरीत आदर देना बाधा है। हाथ, पैर, आदि धोने के लिये जल सभी श्रीवैष्णवों को देना चाहिये। परन्तु चन्दन का लेप, पुष्प, ताम्बूल, सुपारी, आदि ब्रह्मचारी और सन्यासियों को निवेदन नहीं करना चाहिये। इसके जैसे अन्य कई तत्त्व भी हैं जिन्हे अपने अपने आश्रम के सम्बन्ध में समझना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी सूत्र ३०३ और ३०४ में भगवद अपचार के विषय में विस्तार से समझाते है। एक ऐसा अपचार वहाँ पहचाना गया हैं “वर्णाश्रम विपरीतमान उपचारम”– अन्य को सम्मान करते समय वह कार्य को वर्णाश्रम धर्म के विपरित है। क्योंकि वर्णाश्रम शास्त्र द्वारा स्थापित किया गया है और जो भगवान श्रीमन्नारायण को प्रिय है, हमें इसमें दिये हुए दिशा निर्देशानुसार चलना चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसके लिये कुछ सुन्दर उदाहरण देते हैं – क्षुद्र का वेद मन्त्र का उच्चारण करना अन्यों के सम्मान के लिये (जो केवल ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य हीं उच्चारण कर सकते है), सन्यासी का ताम्बूल, सुपारी, आदि का अर्पण करना, आदि कर्म। इसलिये हमें बड़ी सावधानी से उस कार्य से बचना चाहिये जो हमारे वर्ण और आश्रम के लिये वर्जित है।
  • उच्च तत्त्वों को समझने के पश्चात भी अगर कोई सामान्य धर्म का त्याग करने से डरता है तो यह बाधा है। इसे हम पहले ही विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। एक बार हम जीवात्मा के सच्चे स्वभाव जैसे नित्य दास इसको समझलें तब कैंकर्य कर्मानुष्ठान से भी उच्च हो जाता है।
  • अपने आश्रम के विपरीत कार्य करना बाधा है। हमें इससे बचना चाहिये। उदाहरण के तौर पर यह कहा गया है कि सन्यासी को अग्नि से दूर रहना चाहिये और इसलिये वे होम, यज्ञ, आदि को करने से अयोग्य हो जाते है। वे भोजन भी नहीं बना सकते हैं क्योंकि उसमें अग्नि लगती है। वे पान, ताम्बूल भी भगवान (स्वयं के अर्चाविग्रह) के तिरुवाराधन के समय अर्पण नहीं कर सकते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सभी आश्रम में कई बंधन है – ब्रह्मचारी और सन्यासी को कठोर जीवन बिताना चाहिये। ब्रह्मचारीयों को ज्ञान प्राप्त करने में और आचार्य सेवा पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये – इसके विपरीत से बचना चाहिये। गृहस्थ को भगवद/भागवत/आचार्य कैंकर्य, सन्यासीयों कि सेवा, आदि पर केन्द्रीत होना चाहिये – इसके विपरीत से बचना चाहिये। सन्यासी को दिव्य ज्ञान का प्रचार सभी के लिये करना चाहिये – इसके विपरित से बचना चाहिये। सभी भागवतों को किसी भी आश्रम से क्यों न हो भगवद/भागवत/आचार्य कैंकर्य में निरत होना चाहिये – इसके विपरित से बचना चाहिये।
  • ऐसे बाधाओं का त्याग न करना जो अपने आश्रम के विपरित हो बाधा है।
  • सन्यासी होने के कारण स्वयं को महान मानना और आचार्य कैंकर्य करने में शर्म करना बाधा है। श्रीवेदान्ति स्वामीजी एक सन्यासी होने पर भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की सेवा किये जो एक गृहस्थ थे। उसी तरह श्रीपिन्भझगिया पेरुमाल जीयर श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी की सेवा किये। श्रीपोन्नडिक्काल जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी (सन्यास ग्रहण करने से पूर्व) कि सेवा किये। ये घटनायें हमें दिखाती हैं कि शिष्य का आचार्य की जो किसी भी आश्रम में हो सेवा करने का महत्त्व। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवेदान्ति स्वामीजी एक सन्यासी होकर भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की बड़े आदर पूर्वक पूजा किये। एक बार जब वे अपने आचार्य की पालकी सेवा कर रहे थे तब उन्होंने कहा कि अगर यह त्रीदण्ड मेरे आचार्य की सेवा के मध्य में आता है तो मैं उसे तोड़ कर फेंक दूँगा। श्रीपिन्भझगिया पेरुमाल को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रति बहुत लगाव था और उनके प्रति छोटे से छोटा कैंकर्य भी किये। श्रीपोन्नडिक्काल जीयर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य बनकर उनकी सेवा किये। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि शिष्य अगर सन्यासी हो तो भी उन्हैं अपने आचार्य की सेवा करनी चाहिये यद्यपि आचार्य गृहस्थ हो।
  • हमें अपने आश्रम के लक्ष्य को सीखना और समझना चाहिये और अपने आश्रम की सीमा में रहकर आचरण करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/07/virodhi-pariharangal-33.html

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