विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३६

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३५)

७०) अनाप्त विरोधी – अविश्वास योग्य तत्त्वों को समझने में बाधाएं।

स्वयं के लिये कुछ न चाहकर श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी की श्रीरामानुज स्वामीजी पर असीम श्रद्धा

अनाप्त (अविश्वासी व्यक्ति / पहलू जो किसी के लिये प्रतिकुल न हो)। इस भाग में जिन विषयों पर चर्चा हुई है वहीं तत्त्वों पर प्रकाश डालेंगे। अनुवादक टिप्पणी: यह भाग असल में इसके पूर्व भाग की ही अगली कड़ी है। जीवात्मा के आध्यात्मिक प्राकृतिक उन्नति के प्रतिकूल विषयों पर चर्चा करेंगे।

  • उपायान्तर (कर्म, ज्ञान भक्ति योग आदि साधनों से भगवान का नित्य कैंकर्य प्राप्त करना) में विश्वास करना जो प्रपत्ति (सम्पूर्ण शरणागति) के विरूद्ध है, यह बाधा है। आलवार समझाते हैं और स्वयं भी भगवान की सम्पूर्ण शरणागति का अभ्यास करते हैं, जो भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्ति का एक मात्र साधन हैं। अलग अलग कार्य जैसे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, आदि स्व प्रयत्न वाले कार्य हैं जो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के विपरीत है क्योंकि जीवात्मा स्वयं को भगवान का नित्य सेवक मानता है। इस तरह ऐसे उपायान्तरों में विश्वास रखना जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के प्रतिकूल है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्य / आलवारों ने यह सुनिश्चित किया है कि भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति ही उनके प्रति नित्य कैंकर्य का एक मात्र साधन है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के दूसरे प्रकरण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस सिद्धान्त को समझाते हैं। इस सूत्र में वे पहले समझाते हैं कि हम उपायान्तर का त्याग अपने अज्ञान और पात्रता के कारण नहीं अपितु इसलिए करते है क्यूंकि उपायान्तर भगवान के प्रति सम्पूर्ण शरणागति के प्रतिकूल है। अगले सूत्र में वे इस सिद्धान्त को और विस्तार से समझाते हैं। १२७वें सूत्र में स्वयं से प्रश्न करते हैं कि “क्यों वेदान्त इन तत्त्वों को उपाय ऐसे दर्शाता है?”। वें स्वयं इसका उत्तर भी देते हैं कि जैसे किसी बीमार को बीमारी के समय (माँ प्रेम से) उसके पसन्द के प्रसाद की वस्तु में दवा मिला कर देते हैं। यहाँ शास्त्र जो जीवात्मा का एक माँ की तरह ध्यान रखता है, उपायान्तर में भगवान (जो वास्तविक दवा हैं) रूपी दवा मिलाता है (उपायनतार स्व प्रयत्न पर आधारित हैं और अपने स्वभाव के कारण स्व प्रयत्न में लिप्त होना जीवात्मा को प्रिय हैं, जो अनेक वर्षों से इस संसार में हैं)। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस ओर सुन्दर और स्पष्टता से समझाते हैं कि जिस तरह दवा ही बिमारी को ठीक करती है न की प्रसाद की अधिकता, उसी तरह भगवान ही वास्तव में संसार बन्धन से छूटने के उपाय है और उपायान्तर कभी भी सच्चा उपाय नहीं हो सकते है। वे आगे समझाते हैं कि जब भोजन पदार्थों में मिलाई गई दवा से बीमारी का उपचार किया जाता है तब उससे ठीक होने में अधीक समय लगता है। उसी तरह कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि योगों से जीवात्मा को इस संसार के बन्धन से बाहर निकलने के लिये अधीक समय लगता है। परन्तु भगवान से सीधे सम्बन्ध करना वैसे ही है जैसे बिमारी को ठीक करने हेतु दवाई को सीधे पाना – इसका परिणाम तुरन्त होता है। आगे के सूत्रों में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कई आश्चर्य चकित करनेवाले अर्थ समझाते हैं – अपने आचार्य से इन विषयों से कालक्षेप सुनना चाहिये।
  • यह जानते हुये की अपने से प्रतिकूल लोगों से दोस्ती नही रखनी चाहिए, इस सोच में रहना की ऐसे लोगों के साथ मिलने से हमारी क्या दशा होगी, यह बाधा है। हमें यह दृढ़ संकल्प करना चाहिये कि अपने से प्रतिकूल स्वभाव वालों से हमें अपने सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ प्रतिकूल स्वभाव वालों से मतलब है वे जो देवतान्तर, संसार में लगे हैं और जो निरन्तर भगवद, भागवत, आचार्य अपचार में लगे हुये रहते हैं। क्योंकि ऐसे जनों के संगत में रहने से वे हमारे विचारों को भी अपने विचारो की तरह ढालने की कोशिश करते हैं।
  • सांसारिक सुख के प्रति लगाव, जो हमारे अन्तिम लक्ष्य में रुकावट है – यह बाधा है। कोई भी वस्तु जो भगवान के नित्य कैंकर्य के विरुद्ध हो और जिससे स्वयं को आनन्द प्राप्त होता है उसे प्रयोजनान्तर कहते हैं। ऐसे कार्यों को हमें त्यागना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमारे लिये भगवान के परमपदधाम में भगवान की नित्य सेवा ही, जो भगवान को आनंददायी है, हमारा अन्तिम लक्ष्य है। अन्य लक्ष्य जैसे सांसारिक सुख, देवताओं कि सेवा, सांसारिक जनों कि सेवा, कैवल्यम – स्व-आनन्द, स्व-आनन्द के लिये भगवान कि सेवा करना, घमण्ड से भगवान कि सेवा करना, आदि, सभी जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के लिये प्रतिकूल हैं और इसलिये इनका त्याग करना चाहिये।
  • श्रीमन्नारायण भगवान ही एक मात्र विश्वसनीय और पूजनीय भगवान हैं, इस सिद्धान्त के विरुद्ध देवतान्तरों में विश्वास रखना, यह बाधा है। श्रीवैष्णवों के लिये श्रीमन्नारायण ही एक मात्र पूजनीय भगवान हैं इस सिद्धान्त को समझना और उसका पालन करना बहुत मुख्य है। देवतान्तर का भजन और पूजन हमारे उपरोक्त सिद्धान्त के विपरीत है, इसलिए उसका त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीमन्नारायण भगवान स्वयं सबसे श्रेष्ठ हैं जिन्होंने कई देवताओं को इस संसार को चलाने के लिये और उन लोगो के लिए बनाया जो तामसीक और राजसीक को पूजा करने वाले हैं जिससे वे लोग भी धीरे धीरे आध्यात्मिकता को ग्रहण कर सके, नही तो नास्तिकता बड़ जायेगी। परन्तु भगवान के पवित्र भक्त जो सत्वगुण वाले हैं उनके लिये भगवान श्रीमन्नारायण हीं एक मात्र पूजनीय हैं। वैष्णव होना का अर्थ है श्रीमन्नारायण में सम्पूर्ण विश्वास रखना और उनकी हीं पूजा करना।
  • द्वय महामन्त्र के तत्त्वों में समझाये गए मन्त्रों के जो विपरीत हों उन मंत्रों में विश्वास रखना यह बाधा है। श्रीवैष्णवों को द्वय महामन्त्र को निरन्तर बोलना और ध्यान करना चाहिये क्योंकि इसमें मिठास और गूढ़ार्थ हैं। अपने संबन्धित गुणों के कारण, द्वय महामंत्र के प्रकाशन द्वारा यहाँ रहस्य त्रय (तिरुमंत्र- अष्टाक्षर, द्वय महामंत्र, गीता चरम मंत्र) को दर्शाया गया है। अत: श्रीवैष्णवों को रहस्य त्रय का निरन्तर पालन करना चाहिये। देवतान्तरों से सम्बंधित मंत्रों को पूरी तरह त्याग करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुपड्डी में श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी तिरुमन्त्र की विशेषताओं को समझाते हैं। वे पहले समझाते हैं कि भगवान श्रीमन्नारायण से सम्बन्धित दो मन्त्र है – व्यापकम (वह मन्त्र जो भगवान की सार्वभौमिकता को समझाते है) और अव्यापकम (वह मन्त्र जो भगवान के अन्य गुणों को अलग अलग रूपों से समझाते हैं)। स्वामीजी विशेषत: समझाते है कि व्यापक मन्त्र (नारायण, वासुदेव, विष्णु) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि विष्णु गायत्री में इसे दर्शाया गया है। वें आगे कहते है कि क्योंकि विष्णु गायत्री नारायण मन्त्र से प्रारम्भ होता है इसलिये विष्णु के मंत्रों में यह सबसे श्रेष्ठ है। आगे वे कहते है कि नारायण मन्त्र सम्पूर्ण मन्त्र है जो सभी आवश्यक अर्थों को बताता है जो दूसरे मंत्रों में नही है। यहाँ आवश्यक अर्थ से आशय है अर्थ पञ्चक (पाँच तत्त्व / स्वरूप – जीवात्मा, परमात्मा, उपाय, उपेय और विरोधी)। वे आगे और समझाते है कि नारायण मन्त्र वेद, ऋषी, आलवारों और आचार्यों को प्रिय है। द्वय महामन्त्र नारायण मन्त्र का विस्तृत रूप है और चरम श्लोक इस तत्त्व को और आगे समझाता है। इसलिये मुमुक्षु (जिन्हें मोक्ष और परमपद में भगवान श्रीमन्नारायण की चाह है) के लिये रहस्य त्रय ही केन्द्र है।
  • हमारा अन्तिम लक्ष्य एकमात्र भगवतप्राप्ति है, जिससे स्वयं भगवान ही आनंदित होते हो इसके विपरीत दैहिक व भौतिक सुख की ओर लगाव रखना, यह बाधा है। भोग्यम – वह जिससे कोई आनंदित हो। जीवात्मा जो भगवद/ भागवतों का कैंकर्य करते हैं जिससे भगवान आनंदित होते है। जब भगवान में यह आनन्द देखते है जीवात्मा भी प्रफुल्लित होता है। दूसरे सभी सांसारिक सुख जीवात्मा की वास्तविक दशा में बाधक हैं। अनुवादक टिप्पणी: पेरुमाल तिरुमोली में श्रीकुलशेखर स्वामीजी घोषणा करते है कि “पड़ियायक्किडन्दु उन पवलवाय काण्बेने” – यहाँ आलवार प्रार्थना करते हैं कि उन्हें श्रीवेंकटेश भगवान के मंदिर के गर्भ गृह की सीढ़ी (थली) बनाये जिस से वे भगवान श्रीवेंकटेश की भव्य मुस्कुराहट का दर्शन भी कर सकें। सीढ़ी (थली) एक अचित की तरह है (जिसे ज्ञान नही है) लेकिन चूंकि वह भगवान के आनन्द को देख सकते है और प्रत्युत्तर में वे भी आनंदित होते हैं। क्योंकि प्रत्युत्तर में आनंदित होना ज्ञान की दशा है यह श्रीवैष्णव सत सम्प्रदाय का उच्चत्तम सिद्धान्त दर्शाता है। अर्थात हमें मालिक के अधीन रहना चाहिये की शुद्ध विचार हो फिर भी हमें भगवान के आनन्द का प्रत्युत्तर जरूर देना चाहिये ताकि उससे भगवान को और अधिक आनन्द प्राप्त हो। यह एक भोले भाले छोटे बच्चे की अवस्था की तरह है जो कि पूर्णत: अपने पिता के वश में हैं फिर भी पिता जब अपने पुत्र को खुशी देता है तब बच्चा भी पिता के आनन्द का प्रत्युत्तर देता है और इससे पिता को अपार आनन्द मिलता है। अत: भगवान प्रारम्भ में खुशी का अनुभव करते हैं और जीवात्मा बाद में अनुभव करता हैं – वह भी सिर्फ भगवान के आनन्द के लिये करते हैं।
  • भंध शास्त्र (सांसारिक, धन, वैभव, आदि का साहित्य पढ़ना) पर ध्यान केन्द्रित करना जो मोक्ष शास्त्र (मोक्ष सम्बन्धित साहित्य) के विपरीत है यह बाधा है। मोक्ष शास्त्र भगवान के प्रति नित्य कैंकर्य करने कि राह दिखाते हैं। भंध शास्त्र हमें इंद्रिय सुख के लिये बारम्बार इस संसार में जन्म लेने के लिये अग्रसर करते हैं। हमें मोक्ष शास्त्र पर केन्द्रित होना चाहिये और भंध शास्त्र पर ध्यान नहीं देना चाहिये।
  • स्वयं के दैहिक पक्ष में रूचि रखना जो अपने अन्तिम लक्ष्य आचार्य सेवा के विपरीत है, यह बाधा है। चरम कैंकर्य – चरम पर्व निष्ठा – अन्तिम सेवा “अपने आचार्य ही सबकुछ है और ऐसे आचार्य की सेवा करना” की तरह है। उपदेश रत्नमाला के ६५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयीरैप्पेणुमवन् तेशारुम् शिष्यनवन् शीर्वडिवै आशैयुडन् नोक्कुमवनेन्नुम्” – आचार्य को शिष्य के सच्चे स्वभाव पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये और शिष्य को अपने आचार्य के शरीर और शारिरीक आवश्यकता की ओर ध्यान पूर्ण भक्ति के साथ केन्द्रित करना चाहिये। जैसे आचार्य कि नित्य सांसारिक जरूरत (जैसे प्रसाद, वस्त्र, तिरुमाली, आदि) की पूर्ती शिष्य का कर्तव्य है और शिष्य को चाहिये कि वह स्वयं सांसारिक आवश्यकता को छोड़ आचार्य कि ओर लगाव रखें। केवल स्वयं की आवश्यकता में निरत रहना – इसे त्यागना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: उपदेश रत्नमाला में श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र की गूढ बातों का सार है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी द्वारा समझाये गये इन सिद्धान्तों के सार को बहुत ही सुन्दर तरीके से बहुत ही सरल तमिल पाशुरों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। आचार्य और उनकी सेवा कैंकर्य विषय पर ही श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी ने पूरा ध्यान केन्द्रित किया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उसे अच्छी तरह से समझाते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/09/virodhi-pariharangal-36.html

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