विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३७

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३६)

७१) सिद्धान्त विरोधी – सिद्धान्त को समझने में बाधाएं – भाग – १

पेरिय पेरुमाल (श्रीरंगनाथ भगवान) – प्रथमाचार्य

श्रीशठकोप स्वामीजीश्रीरामानुज स्वामीजीश्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजीश्रीवरवरमुनि स्वामीजी

सिद्धान्तम् का अर्थ प्रमाणित सिद्धान्त। किसी विशेष विषय में गलत समझ/सोच का त्याग कर उसके स्थान पर सही सोच को स्थापित करना ही सिद्धान्त है। हम जो भी सिद्धान्त को प्रस्तुत करते हैं वह वेदानुसार हो, शास्त्रों द्वारा प्रमाणित हो और उस विषय पर विद्वानों द्वारा स्पष्टीकरण किया गया होना चाहिये। हमारे सिद्धान्तो को शास्त्रों द्वारा प्रतिष्ठित प्रमाणों को ही प्रमाण कहते हैं। सभी आस्तिक (विद्वान जो वेदों को ही अन्तिम अधिकारी मानते हैं) वेदों को ही शाश्वत और दोषरहित प्रमाण मानते हैं। भगवान वेद व्यास के अलौकिक शब्द हैं “वेदांत शास्त्रम परम नास्ति न दैवम केशवात परम” (वेदों से बड़ा कोई ग्रन्थ नहीं है और केशव से बड़ा कोई भगवान नहीं हैं)। परम अर्थात श्रेष्ठ जिसके “बराबर या ऊँचा कोई नहीं हैं” को दिखाता है। श्रीशठकोप स्वामीजी के श्रीसहस्रगीति के प्रथम तनियन में समझाया गया है “द्राविड वेद सागरम्” (श्रीसहस्रगीति द्राविड वेदों का सागर है)। आलवारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्धों को वेदों के समान मानते हैं। इस सिद्धान्त द्वारा जो मुख्य तत्त्व स्थापित किया गया है वह है “नारायण परम ब्रम्ह तत्वम नारायण: पर: … यच्च किंचित जगत यस्मिन ध्रुसयते श्रुयतेपिच, अंतर बहिस च तत सर्वं व्याप्य नारायणा स्तिथ:” (नारायण ही सर्वोच्च ब्रह्म है वे ही सर्वोच्च सिद्धान्त हैं … इस भूमण्डल में हम जो कुछ देखते/सुनते हैं वे ही अन्दर बाहर सब कुछ प्रदर्शित करते हैं)। इसका अर्थ यह हुआ कि नारायण ही प्रत्येक वस्तु के अन्दर अंतर्यामी रूप में निवास करते हैं। वह उन्हें सभी के स्वामी मानकर पकड़ते है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे सिद्धान्त का नाम विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त है – पूर्ण रूप से वैदिक सिद्धान्त (वेद, वेदान्त, आदि पर आधारित सिद्धान्त)। यह सिद्धान्त नित्य और शाश्वत है। महान ऋषि जैसे श्रीपराशर, श्रीव्यासजी, श्रीबोधायन, श्रीतनक, श्रीध्रमिड, आदि ने सबसे पहले इसका अर्थ सहित प्रचार किया। कुछ समय पश्चात आल्वारों का अवतार हुआ और उन्होंने द्राविड वेद जो वैदिक वेदों का सार ही दर्शाते हैं उनका प्रचार किया। श्रीरामानुज स्वामीजी ने ब्रह्म सूत्र और भगवद्गीता की विस्तृत व्याख्या की है। उन्होंने अपने अन्य ग्रन्थ में उपनिषद के मुख्य तत्त्व को समझाया। श्रीश्रृत प्रकाशिकाचार्यजी एक प्रमुख आचार्य हुये हैं जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी की रचनाओं को विस्तार पूर्वक समझाया है। आल्वारों के पाशुरों को कई व्याख्या के माध्याम से समझाया गया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी एक प्रमुख आचार्य हुये हैं जिंन्होने आल्वारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्धों के अर्थों का सविस्तार वर्णन किया है। उनके शिष्य श्रीपेरियवाचान पिल्लै और वडक्कु तिरुविधि पिल्लै ने श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित श्रीसहस्रगीति की व्याख्या के उनके प्रयास में सहयोग प्रदान किया। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार ने बड़ी सुन्दरता से श्रीसहस्रगीति के सार को अद्भुत रहस्य ग्रन्थों में प्रमाण प्रस्तुत किया। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने इन रहस्य ग्रन्थों के विषय में बड़ी सुन्दर ढंग से व्याख्या की है और अपने अद्भुत व्याख्यानों में दिव्य प्रबन्ध, वेदान्तम और रहस्य ग्रन्थ आदि के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी प्रदान की है। अत: इस सिद्धान्त को कई विद्वानों के परिवार ने कई पीढ़ियों तक पोषण किया है। इस सिद्धान्त में तीन मुख्य तत्त्व हैं – १) चित्त (असंख्य जीवात्मा), २) अचित (अपार माया) और ईश्वर (स्वतन्त्र सर्वोच्च भगवान)। यहाँ ईश्वर (एकमात्र स्वतन्त्र सर्वोच्च भगवान) और चित्त (चेतन) / अचित (निर्विकार जड़) – ये दोनों में महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध हैं। पहला शरीर / शरीर भाव – भगवान सभी जड़ चेतनों की आत्मा में निवास करते हैं (शरीरि अर्थात शारीरिक) इस तरह वे (जड़ चेतन) भगवान के शरीर के अवयव हैं। दूसरा – विशेषण/विशेष भावम – एक विशेष उद्देश्य है जिसके चित और अचित दो सहज गुण हैं। सारांश यह है कि भगवान चित/अचित के साथ एक विशिष्ट तत्त्व है इनके जैसा दूसरा कोई तत्त्व नहीं है। और श्रीमन्नारायण ही सर्वोच्च भगवान हैं यह कई प्रमाणों व शास्त्रों से प्रमाणित हो चुका है। यहाँ तत्त्वों को गहराई से समझाया गया है। इसलिये वेद, वेदान्त आदि का मूलभूत सिद्धान्तों की पूर्व जानकारी होना जरूरी है। यह विस्तृत विभाग है।

  • वैदिक सिद्धान्त के विपरीत के प्रमाणों को मानना बाधा है। वेदों में प्रतिष्ठापित तत्त्वों के विपरीत यदि कोई भी ऐसे सिद्धान्त समझाता है – समझाने वाला चाहे कोई भी हो – ऐसे सिद्धान्तों को नहीं मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस पहलू को समझने में एक बहुत महत्त्वपूर्ण तथ्य है। हमें यह समझना चाहिये कि यहाँ शास्त्र और शास्त्र का तात्पर्य है। विद्वान पण्डित अपने पूर्वाचार्य आदि जो शास्त्र व शास्त्र तात्पर्य के सिद्धान्तों को बिना किसी संशोधन के मूल सिद्धान्तों को अर्थ पूर्ण ढंग से समझाते हैं। उदाहरण के लिये शास्त्रों में वर्णाश्रम धर्म (कर्मानुसार समाज का विभाजन) के बारे में बहुत ही ज़ोर देकर समझाया गया है। इसके साथ ही शास्त्रों में भगवद कैंकर्य (भगवान कि गुप्त सेवा) और भागवत धर्म (भागवतों कि सेवा) भी समझाया गया है। यहाँ हमारे पूर्वाचार्यों ने शास्त्रों के सार को अच्छी तरह समझकर और दोनों वर्णाश्रम धर्म और भगवद कैंकर्य / भागवत धर्म को बहुत संतुलित तरीके से समझाया है। उन्होंने दोनों कि विशेषताओं को महत्त्वपूर्ण तरीके से प्रतिष्ठापित किया है फिर भी वर्णाश्रम धर्म से भगवद कैंकर्य / भागवत धर्म ही उत्तम है। हमारे पूर्वाचार्यों की प्रतिभा को समझने के लिये यह एक अच्छा उदाहरण है।
  • यह न समझना की वेदों में जो भी समझाया गया है वह स्व स्पष्ट नही है चाहे वह प्रत्यक्ष, आदि के विपरीत ही क्यों न हो – बाधा है। सामान्यता प्रमाण अर्थात साक्ष्य। हमारे पूर्वाचार्यों ने ३ प्रमाण को समझाया हैं– प्रत्यक्षम (इंद्रियाँ – दृष्टि, स्पर्श, ध्वनी, सुगन्ध और स्वाद के द्वारा अनुभव करना), अनुमान (हमारे पूर्व ज्ञान के आधार पर – उदाहरण के लिये यदि हम धुआँ देखते हैं तो समझते हैं कि वहाँ अग्नि है – यह हमारे पूर्व में अग्नि और धुवें को एक साथ देखने के आधार पर है), शब्दम् (वेद और उसके सहायक साहित्य जो वेदों के सिद्धान्त को विस्तार से समझाते हैं)। इनमें से वेदों को स्व: प्रमाणित (स्वयं में प्रमाण) – बिना किसी शंका के – सिद्धान्तों को शब्दश: मानना। इसे “अविवादित अधिकारी” ऐसे समझाया जाता है। जिस तरह भगवान के अस्तित्व को मानते है वैसे ही आस्तिक वह जो वेद के अधिकार को पूर्णत: स्वीकार करते है। अनुवादक टिप्पणी: वेद और शास्त्र मुख्यत: जीवात्मा के लिये हैं। उपर समझाये गये ३ तत्त्वों में – भगवान पहले ही सर्वज्ञ हैं (जो सब कुछ जानते हैं) और इसलिये उन्हें वेदों की आवश्यकता नहीं है। अचित (तत्त्व) में ज्ञान का अभाव है और इसलिये वेद उनके लिये उपयोगी नहीं है। परन्तु जीवात्मा के लिये अपने जीवन निर्वाह के लिये वेद ही मार्ग दर्शक है और आध्यात्मिक रूप से उच्चतम उन्नति करना और मूल भूत रूप से मुक्ति (भगवान का नित्य कैंकर्य) पाना। एक माता अपने बच्चे का जीतना ध्यान रखती है उससे १००० गुणा अधिक ध्यान वेद शास्त्र अपने बच्चों (जीवात्मा) का करते हैं। वेदों में जो भी समझाया गया है वह जीवात्मा के आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करने के लिये हैं। अत: कुछ विषय जो अपनी अंतदृष्टि के विपरीत दिखती हो फिर भी हमें वेदों को मानना चाहिये और उसका पूर्णत: पालन करना चाहिये। उदाहरण के लिये शास्त्र कहते हैं कि हमें एकादशी (पूर्णिमा और अमावस्या के ११वें दिन) के दिन अपना पूर्ण ध्यान भगवान पर केन्द्रित करना चाहिये और खाद्य पदार्थ, सांसारिक वस्तुओं, आदि का त्याग करना चाहिये। हमें आश्चर्य होगा कि शास्त्र हमें प्रसाद पाने से क्यों रोक रहा है (यह अनुभव किया गया है कि बहुतों को उपवास रखना बहुत कष्ट देय है) – लेकिन यदि यहाँ हम यह समझेंगे कि शास्त्र हमें उच्च आध्यात्मिकता को विकसित करने का एक मंच प्रदान करने में सहायता करता है तब हम शास्त्र में समझाये गये तत्वों को पूर्णत: मानेंगे और उनका पालन करेंगे।
  • स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि में पूर्ण विश्वास न होना जो वेद और वेदान्त के अर्थ को विस्तृत रूप से समझाते हैं – बाधा है। वेद उप बृहमणम – यह सभी वेदों के तत्त्वों को समझने के लिये सहायक साहित्य हैं। इनमें स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि साहित्य है। वेदों के तत्त्वों को ध्यान में रखते हुये जो साहित्य भण्डार है उसे स्मृति कहते हैं। इतिहास – ऐतिहासिक लेख – श्रीरामायण और महाभारत। पुराणों में विष्णु पुराण, आदि है। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि यह सभी सही प्रमाण है। भगवान स्वयं कहते हैं कि “श्रुतिश स्मृतिर ममैवाज्ञा, आज्ञाच्चेती मम द्रोही, मद भक्तोपी न वैष्णव:” (श्रृति और स्मृति यह मेरे आदेश है जो इसका पालन नहीं करते हैं वे विश्वासघाती हैं। चाहे वह मेरा भक्त ही क्यों न हो वह वैष्णव नहीं माना जायेगा)। श्रृति (वेद), स्मृति, इतिहास, पुराण, आदि सभी मिलकर इन्हें शास्त्र कहते हैं। भगवान कृष्ण भगवद्गीता के १६.२४ में यह घोषणा करते हैं कि “तस्माच्छास्त्रां प्रमाणं ते” अर्थात शास्त्रों को पूर्णत: समझकर उन्हे प्रमाण की तरह मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र का प्रारम्भ “वेदार्थम अरुधियिडुवदु स्मृति इतिहास पुराणङ्गलाले” ही ऐसे करते है – इसका अर्थ है स्मृति, इतिहास और पुराण वेदों को ही समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। वे कहते हैं कि प्रमाथ (आचार्य) प्रमाणों के माध्यम से प्रमेय (लक्ष्य) निर्धारित करते हैं। वे बहुत हीं सुन्दर तरिके से स्थापित करते हैं कि वेद ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है। इसलिये हमें पहले यह समझना आवश्यक है कि सर्वश्रेष्ठ प्रमाण क्या है और उसे आचार्य के द्वारा सहायक साहित्य के माध्यम से समझना चाहिये। पश्चात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते हैं कि कई सहायक साहित्य है जो यहाँ पर दर्शाये गये हैं जो वेदों के अर्थ को अच्छी तरह से समझने में कितने सहायक और कीमती हैं। इसे अच्छी तरह से अध्ययन करना और समझना चाहिये जो हमें इस मूलभूत सिद्धान्तों को समझायेगा।
  • यह न समझना कि कई साहित्य जिसके कुछ अंश सात्विकता कि जानकारी देते है जिन्हें सात्विक जनों ने अपना लिया हैं वे ही मुख्य प्रमाण हैं बाधा है। उपबृम्हमण में विशेषकर पुराण में वे पहलू जो सात्विक है वें मुख्य प्रमाण हैं। यहाँ राजस और तामस पहलू भी है। इन्हें अनदेखा कर देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मत्स्य पुराण में यह कहा गया है कि “यस्मिन कल्पेतु यत प्रोक्तम पुराणम ब्राह्मणा पूरा, तस्य तस्यतु माहात्मीयम तत स्वरूपेण वर्णयते” – पुराण ब्रह्माजी द्वारा प्रगट किया गया है, देवता जो सात्विक, राजसिक और तामसिक स्वभाव के है उनकी स्तुति के लिये, जब भी और ज्यो भी गुण ब्रह्माजी में है श्रेष्ठ हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३रें सूत्र में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्यानों द्वारा दर्शाते हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि पुराणों को एक विशेष सन्दर्भ में हमें जानना चाहिये और पूर्वाचार्यों ने (जो शुद्ध सात्विक हैं) पुराणों में सात्विकता को अधिक महत्त्व दिया हैं। पुराणों के सात्विक विभाग पूरी तरह भगवान श्रीमन्नारायण के विषय पर हीं कहा गया है। यह श्रीवैष्णवों के लिये मुख्य केन्द्र बिन्दु है।
  • यह न मानना कि रज/ तम गुणोंवाले व्यक्तित्व से संबन्धित सात्विक पहलू, सात्विकों के लिये अनुपधेयम (मान्य नहीं) है, एक बाधा है। पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी, शिवजी, लिंगम, आदि जो रज/ तम व्यक्तित्व वाले हैं उनके सात्विक गुणों को ग्रहण करना चाहिये। यहाँ मूल पाठों में अनुपधेयम (अमान्य) ऐसा कहा गया है – परन्तु यह मुद्रण की गलती होकर उपधेयम (मान्य) होना चाहिये। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी शिवजी के सात्विक गुणों की स्तुति ऐसे करते हैं “नुणणुणरविन नीलार कणदत्तममानुम” (शिवजी जो सबसे बड़े ज्ञानी है और स्वयं विषपान करके सम्पूर्ण संसार की रक्षा किये है और इस तरह उनका कण्ठ नीलकंठ है)। यहाँ आलवार शिवजी की बढ़ाई करते हैं क्योंकि जब उनका सत्व गुण सर्वाधिक प्रबल था तब उस समय वें भगवान वेंकटेश की पूजा के लिये आये थे। और लिंग पुराण में प्रसिद्ध प्रमाण श्लोक देखा गया है “वैकुण्ठेथु परे लोके … आस्थे विष्णुरचिन्तयात्मा” – यह श्लोक तिरुवाराधन के समय प्रतिदिन श्रीवैष्णव मन्त्र पुष्पांजली के समय गाते हैं।
  • दिव्य प्रबन्धों में पूर्ण दृढ़ विश्वास न होना बाधा है, दिव्य प्रबन्ध दोषरहित हैं क्योंकि उनमें रज, तम, सात्विक आदि गुणों का कोई भेद नहीं है, क्योंकि वह पूर्णतः सात्विक है और पूर्वाचार्यों ने इसे मान्य किया है। आल्वार जिन पर स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण की कृपा से उनके प्रति शुद्ध ज्ञान और भक्ति हैं उन आलवारों द्वारा रचित दिव्य प्रबन्ध भी अति शुद्ध है। क्योंकि इन्हे हमारे समस्त पूर्वाचार्यों ने स्वीकार कर इनका अनुकरण किया है इनमें त्रुटी निकालने की कोई सम्भावना नहीं है। इस सिद्धान्त में दृढ़ विश्वास होना श्रीवैष्णवों के लिये आवश्यक है।
  • यह न मानना कि सात्विक जनों के लिये पूर्वाचार्यों द्वारा जो दिव्य वाक्य कहे गये हैं वे प्रामाणिक हैं – यह बाधा है। जैसे आल्वारों को भगवान श्रीमन्नारायण का आर्शिवाद प्राप्त है वैसे पूर्वाचार्यों पर आल्वारों का आर्शिवाद है। उनकी आज्ञा को सर्वोपरी मानना चाहिये और उनकी स्तुति करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: धर्म शास्त्र में कहा गया है कि “धर्मज्ञ समयम प्रमाणं वेधश च” – महान व्यक्तियों के विचार एक आज्ञा की तरह है, वेद भी एक अधिकारी है, आज्ञा है। यहाँ धर्माज्ञा का अर्थ “जो धर्म को जानता हो” – हमारे लिये सिद्ध धर्म (प्रमाणित किया हुआ सही सिद्धान्त) भगवान हैं और इस तरह धर्माज्ञा आल्वारों और आचार्यों को दर्शाता है जो पूर्णत: भगवान के गुणों, नाम, रूपों के लक्षणों के जानकार हैं। इसलिये हमें पूर्वाचार्यों के वाक्यों पर पूर्ण विश्वास होना चाहिये। उपदेश रत्नमाला के ३६वें श्लोक में “तेरूलुत्तवाल्वार्हल् शीर्मैयरीवारार् अरुलिच्चैयलैयरिवारार् अरुल्पेत्त नाथमुनि मुदलान नम् देशिकरैयल्लाल् पेदै मनमे उण्डो पेशु” श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह पहलू को समझाते है – हे मूढ़ मन! विवेचन कर बताओ कि (श्रीशठकोप स्वामीजी की) कृपा के पात्र श्रीमन्नाथमुनि स्वामीजी प्रभृति हमारे पूर्वाचार्यों के सिवा दूसरा कौन यथार्थज्ञाननिधि आल्वारों का अथवा दिव्यप्रबंधों का वैभव जान सकता है। कहिये क्या हमारे पूर्वाचार्य श्रीनाथमुनि स्वामीजी से प्रारम्भ कर कोई है जिन पर आल्वारों पर अपनी निर्हेतुक कृपा किये हैं? हमारे पूर्वाचार्यों के कई घटनाएं हैं जो कई ग्रन्थों में अभिलिखित किया गया है। हमें निरन्तर इनका अध्ययन, श्रवण, विचार करें और अपने स्वयं के कल्याण के लिये इनका पालन सच्ची श्रद्धा व भक्ति के साथ करें।
  • पाञ्चरात्रं में विश्वास न होना जिसे स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण ने कहा है – बाधा है। स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण द्वारा कहे श्रीपाञ्चरात्र संहिता पर हमें कण भर भी संशय नहीं होना चाहिये जो “भगवद शास्त्र” के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसे स्वयं वेद के समान मान्य देना चाहिये। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी ने हमें “आगम प्रामान्यम” नामक ग्रन्थ से अनुग्रहित किया है जो पाञ्चरात्रं आगम की प्रामाणिकता को सविस्तार स्थापित करता है।
  • इन तत्त्वों में पूर्ण विश्वास करना जैसे कि जीतने भी प्रमाण हैं सभी भगवान के स्वरूप (सच्चा स्वभाव) जैसे नाम, रूप, गुण, धन, आदि पर केन्द्रित है – बाधा है। भगवद गीता के १५.१५ में भगवान कृष्ण यह घोषण करते है कि “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेध्यो:” – सम्पूर्ण वेद केवल मेरे विषय पर हीं कह रहा है। सभी वेदों का मुख्य उद्देश एक मात्र भगवान कि स्तुति करना है। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोझी में कहते है “वेदप्पोरुले एन  वेंकटवा” (वेंकटवा ही वेदों के मतलब और उद्देश हैं)। यहाँ भगवान का अर्थ उनके सच्चे स्वभाव, रूप, गुण, धन, आदि है। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के १५.१५ श्लोक को श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रीभाष्य में समझाते हैं कि जैसे मनुस्मृति १२.९ कहती है “शरीरजै: कर्म दोषै: याति स्तावरताम नर:, वाचिकै: पक्षी मृगतां मानसैर अंतयजातिताम” – जब कोई व्यक्ति दूसरों को अपने हाथों से कष्ट देता है वह पेड़ बन जाता है; यदि वह शब्दों द्वारा किसी को कष्ट देता है तो वह पक्षी/जानवर बनता है और जब वह दिमाग से किसी को कष्ट पहूँचाता है तो वह नीच कुल में जन्म लेता है। यहाँ हालाँकि अलग प्रकार के शरीर (मानव, पौधे, जानवर, पेड़, आदि) को समझाया गया है अंततोगत्वा वह जीवात्मा के वर्तमान क्रिया और उसके परिणाम स्वरूप आगे जन्म के बारे में समझाते हैं। उसी तरह जब भी वेद देवताओं जैसे अग्नि, यायु, आदि के विषय पर चर्चा करता है तो अंततोगत्वा वे सिर्फ भगवान श्रीमन्नारायण के विषय में ही कहते हैं जो सभी तत्त्वों की आत्मा में निवास करते हैं। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के पेरियाल्वार तिरुमोली के पाशुर के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी गीता के उसी श्लोक का उल्लेख करते हैं और पाशुर में भी यहीं कहा गया है। वे बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि “वेदों के उद्देश मुझे भगवान वेंकटेश की तरह ही मेरे समक्ष दिखते हैं”।
  • यह न समझना कि सभी शब्द परमात्मा को संभोधित करते हैं जो निरन्तर चित्त और अचित्त के साथ ही हैं बाधा है। ब्रह्माजी श्रीरामायण में श्रीरामजी को स्तुति कर इस तरह बुलाते हैं जैसे “भवान नारायणो देव: जगत सर्वं शरीरं ते”– आप नारायण है, सर्व श्रेष्ठ भगवान हैं। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपका शरीर है। जो भी हम देखते, सुनते हैं वे सभी परब्रह्म श्रीमन्नारायण के शरीर के विषय में ही है। यह जीवात्मा में स्पष्ट रूप से दिखायी देता है और वस्तुओं में जीवात्मा के द्वारा दिखायी देता है। जो भी वस्तु जिसका नाम व रूप है ऐसे वस्तु भीतर से भगवान द्वारा व्याप्त होती है। अनुवादक टिप्पणी: वेदार्थ संग्रह में श्रीरामानुज स्वामीजी समझाते हैं कि जिसने वेदान्त का अध्ययन किया है वह सब में भगवान का दर्शन करता है। उदाहरण के लिये ऐसा व्यक्ति अगर एक बकरी को देखता हैं तो वें जीवात्मा को उस बकरी के अन्दर देखते हैं और जीवात्मा के अन्दर परमात्मा का दर्शन करते हैं। परन्तु जिसने वेद नहीं पढ़ा हो वह केवल बकरी को देखेगा क्योंकि तत्त्वत्रय – जीव, ईश्वर और माया के सिद्धान्त से परिचित नहीं हैं।
  • यह न समझना कि भगवान सबकी आत्मा में निवास करते हैं यह बाधा है। यह पिछले सारांश की तरह ही है। अनुवादक टिप्पणी: नारायण सूक्तम में यह समझाया गया है कि “अंतर भहिस च तत  सर्वं व्याप्य नारायण स्थित:” – सभी वस्तुओं के अन्दर और बाहर भगवान श्रीमन्नारायण व्याप्त हैं। इसी तत्त्व को श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर में समझाते हैं “परन्ध धण परवैयुल नीर थोरुम परन्दुलन परंध अण्डम इधेन नील विशुम्बु ओलिवर करन्ध सिल इदं थोरुम इदं थिगल पोरुल थोरुम करंधेंगुम परनढुलन इवै उणड करने” – समुद्र के ठण्डे जल की एक छोटीसी बूंद में भगवान जीतने आराम से व्याप्त हैं उतने ही आराम से वे स्वयं ही इतने विशाल ब्रह्माण्ड में निवास करते हैं। उसी तरह वे पृथ्वी रूपी ग्रह और उससे बड़े ग्रह में निवास करते हैं और बारीक से बारीक स्थानों में भी निवास करते हैं और जीवात्मा उन स्थानों में वास करते हैं। वे ऐसी जगहों में वास करते हैं फिर भी ऐसी जीवात्मा को उनकी उपस्थिती का भान नहीं होता है। सम्हार के समय भगवान इन सबका नाश भी करते हैं और स्वयं को अन्दर रखकर उनकी रक्षा भी करते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/09/virodhi-pariharangal-37.html

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