लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – १२

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

 

१११) मुक्तात्मानुक्कु लीलाविभूति तदीयत्वाकारत्ताले उद्देश्यमाग निन्रतिरे

मुक्तात्मा के लिए, लीलाविभूति (यह भौतिक संसार) भोग्य वस्तु ही है क्योंकि यह भी भगवान् की ही सम्पत्ति है । यह हमने १०५ वें  सूत्र मे विस्तारपूर्वक देखा है ।

११२) उरङ्गिनानागिल् परक्क्षणत्तुक्कु उडलायिरुक्कुम् । उणर्तिरुन्तानागिलुम् अप्पडिये ।

 

जैसे कहा गया है — उरङ्गुवान् पोल् योगु शेय्द परुमाळ् अर्थात् वह परब्रह्म भगवान् जो शयन (योग-निद्रा) का छल कर निरन्तर सभी चिदाचित वस्तुओं का संरक्षण और श्रेय का चिन्ता कर रहे है। यथारूप वही भगवान् सबका संरक्षण जागृक अवस्था मे भी करते है ।

अनुवादक टीका: इस पासुर व्याख्यामे, श्रीनम्पिळ्ळै स्वामी कहते है – भगवान् स्वनेत्र बन्द (योग-निद्राका छल कर) करते है ताकि वह विभिन्न योजनाओंसे जीवोंका संरक्षणेत्यादि कार्यों पर दीर्घ आलोचन कर सकें (जैसे हम सभी किसी कार्य के सन्दर्भ में स्वनेत्र बन्द कर दीर्घ आलोचन करते है)। आऴ्वार नित्य इंगित करते है कि सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने वाले एक मात्र भगवान् ही है। भगवान् के इस दिव्य गुण से प्रभावित आऴ्वार परम श्रद्धा से अपना निर्वाह कर रहें है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह हुआ की भगवान् छल (योग-निद्रा) अवस्था और जागृक अवस्था दोनों अवस्थाओं में सदैव जीवोंका संरक्षण और परमश्रेय करने में तत्पर रहते है। यह प्रतिपाद्य विषय श्रीमद्रामायण की लीलाओं में दृग्गोचर है। भगवान् श्रीरामचन्द्र का शिविर समुद्रतट के किनारे पर था। हर रात्रिमे भगवान् के शिविर के चारों ओर तैनात वानर सेना टहलते है। भगवान् के शिविरके चारों ओर टहलते वानर सेना में प्रत्येक वानर बारी-बारी मे थक कर विश्राम करने चले जाते और अन्तोगत्वा शिविर की रक्षा करने मे कोई भी तैनात नही बचता। शिविर के अन्दर से यह दृश्य देखकर भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वयं शिविर के भीतर आकर विश्राम करते हुए वानर सेना के चारों ओर स्वयं चलकर उनका संरक्षण करते थे।  देखिए यह कितना सुन्दर दृश्य है। हमारे पूर्वाचार्य अतः बारम्बार कहते है की भगवान् ही जीवके परमकल्याण कारक और श्रेयोभिलाषी है क्योंकि जीवके जागृक-अवस्था और निद्रावस्था दोनों अवस्थाओं मे भगवान् जीवका संरक्षण करते है।

११३) चक्करवर्ति तिरुमगनुक्कु विल्लुकैवन्दिरुक्कुमापोलेयायिट्रु कृष्णनुक्कु कऴल् कैवन्दिरुक्किपडि

जैसे भगवान् श्रीरामचन्द्रको उनके शार्ङ्ग धनुष पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे धनुषका प्रयोग करते है, ठीक उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण को भी उनकी मुरली पर पूर्ण नियन्त्रण है और निपुणतासे मुरली का प्रयोग सुन्दर मधुर वेणु-ध्वनि का है।

अनुवादक टीका: यथा श्रीमद्रामायण मे उल्लिखित है – भगवान् श्रीरामचन्द्र का शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी तिरुप्पल्लाण्डु दिव्य-प्रबंध के अन्तिम पासुर ‘शार्ङ्गमेन्नुम् विल्लाण्डान्मे यही दर्शाते है की वह जो स्व धनुष का पूर्ण नियंत्रण करता है अर्थात् भगवान् श्रीरामचन्द्रका शार्ङ्ग धनुष भगवान् के पूर्ण अधीन में है। इस पासुर टीका मे टीक कर (पेरियवाच्चान् पिळ्ळै स्वामाजी) यह दर्शाते है की भगवान् का शार्ङ्ग धनुष सभी आयुधों का प्रतिनिधि है। इसका यह अर्थ हुआ की भगवान् सभी जीवों (नित्यसूरिगणों, मुक्तात्माओं, अन्य जीवात्माओं) के एक मात्र नियंत्रक है। यहां आण्डान् शब्द का केवल यह अर्थ नही की भगवान् यह दिव्यायुध को धरे है परन्तु भगवान् के परिपूर्ण नियंत्रण को भी दर्शाता है यथा एक राजा स्वप्रजा को परिपूर्ण नियंत्रण मे रखता है।

भगवान् श्रीरामचन्द्र

श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ३.६ ‘नावलम् पेरियतीविनिल् पदिग‘ मे श्रीकृष्ण भगवान् की वेणु माधुर्य कुशलता और वेणुधुण के आकर्षक प्रभाव का वर्णन अति सुन्दरता से करते है। श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामाजी, श्रीकृष्ण भगवान् के दिव्य शरीर के अंगों का वर्णन आकर्षक ढंग से करते है (जैसे उनके दिव्य करकमलों का सुन्दर स्थान/स्थिति, उनकी वेणु को स्पर्श करते हुए उनके अधर ताकि वेणु को बजा सकें, उनका एक तरफ़ा दिव्य अर्गभाग, वायु उच्छश्वसन और निश्वसन के कारण भगवान् के कोष्ठ का विस्तार और निपात होना)। श्रीकृष्ण भगवान् की दिव्य वेणुधुण के श्रवण से मन्त्रमुग्ध वृन्दावन की गोपिकाएँ, गाएँ और अन्य पशु, देवलोक के नृत्यक ऐसे खडे है जैसे उनके सभी के नेत्रों की गतिविधि प्रतिबन्धित है। इस प्रकार श्रीकृष्ण भगवान् का उनकी वेणु पर नियंत्रण और प्रभुत्व है।

 

११४) गणत्तारुण्डायिरुक्कच् चेय्देयुम् भारमिल्लैये अहङ्कार स्पर्शमुडैयार् इल्लामैयाले


श्रीभगवान् के दिव्य धाम (परमपद) मे ऐसे अनेक दिव्यसूरिगण है जो परिपूर्ण ज्ञानी (सुविज्ञ) है परन्तु उनमे स्वल्प मात्रा मे अभिमान व गर्व नही है। अतः ऐसे दिव्यसूरिगण को भार नही माना जाता है।अनुवादक टीका: श्रीपेरियाऴ्वार् स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुमोऴि दिव्य-प्रबंध ४.४.६ पासुर मे कहते है की जो सुदर्शनचक्र से सुशोभित तिरुक्कोष्ठियूर के अर्चाविग्रह भगवान् का ध्यान नही करता और भगवान् को नही भजता,वह केवल भू-भार है। इसी प्रकारेण तिरुप्पावै के मंगलाचरण पासुर – ‘पातङ्गळ् तीर्क्कुम्’ मे पासुर रचनाकार कहते है – वह सभी जो तिरुप्पावै के (३०) तीस पासुरों के ज्ञाता नही है वह भूमि के द्वारा कदापि स्वीकृत नही है। इनकी तुलना मे परमपद के दिव्यसूरिगण पूर्णतया सिद्ध और सुविज्ञ है अतैव किसी के लिए भी भार नही माना जाता है।

११५) शेषिक्कुपायभावम् स्वरूपानुबन्धियान पिन्बु शेषत्वनुक्कुम् प्रावण्यम् स्वरूपानुबन्धियागक् कडवदु

जैसे भगवान् (शेषि) का मोक्षोपाय (जीवका संरक्षण कर जीवको मोक्ष प्रदान करना) होना स्वाभाविक है वैसे ही जीवात्मा (शेष) का भगवान् मे रति होना भी स्वाभाविक है।

आऴ्वारों को भगवान् मे अत्यन्त रति का दृश्य

अनुवादक टीका: मोक्ष का एक मात्र उपाय भगवान् ही है। जीवों का संरक्षण करना भगवान् का स्वाभाविक गुण है। अतः इस प्रकारेण जीवात्मा का भगवद्-कैङ्कर्य (स्वस्वामी का कैङ्कर्य) करना स्वाभाविक है। भगवान् के प्रति इस स्वाभाविक-कैङ्कर्य को अत्यन्त प्रेम, भक्तिभाव, और रतियुक्त से करना चाहिए। इस विषयको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी स्वग्रन्थ श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्रके ८०वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में बहुखूबी से समझाते है।

सर्वप्रथम, भगवद्-कैङ्कर्य विषय मे, इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी), पेरिय-उडयार् (जटायु), पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामीजी और चिन्तयन्ती को प्रेरणास्तोत्र मानकर श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उनका वर्णन ८०वें सूत्र मे करते है।

श्रीमद्रामायण से अभिज्ञात है की इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) सदैव श्रीरामचन्द्रजी के साथ ही रहते थे। श्रीरामचन्द्र की सन्निकटता मे इऴय-पेरुमाळ् (श्रीलक्ष्मणजी) ने उनकी सेवा विभिन्न प्रकार और अवस्थाओं मे की है। पेरिय-उडयार् (जटायु) और पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी के विषयमे कहते है की इन दोनों ने स्वदेहकी चिन्ता छोड़कर भगवान् के लिये शरीर को त्याग दिया। चिन्तयन्ती नामक गोपी ने भगवद्-विप्रलम्ब भावमे शरीर को त्याग दिया।

८० वें सूत्रकी व्याख्या मे, पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्यचरित्र का वर्णन विस्तार पूर्वक है। पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का दिव्य जन्म श्रीरङ्गम के कुछ कोस दूर तोट्टियम् तिरुनारायणपुरम नामक दिव्य क्षेत्र मे हुअा था। एक बार कुछ भगवद्-विरोधि भगवद्विग्रह को आग लगाने की कुचेष्टा करते है। यह जानकर पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी तुरन्त जलते भगवद्विग्रह को आलिंगन कर और इसके पारिणाम स्वरूप शरीर को त्याग देते है। यहां एक प्रश्न उठता है – क्या भगवान् के लिये शरीर को त्यागना क्या उपाय है ? – श्रेष्ठ एवं सिद्ध भगवान् ही उपायोपाय तत्त्वमे परम निष्ठ पिळ्ळै-तिरुनरैयूर्-अरयर्स्वामाजी का इस प्रकार के कार्य मे संलग्नता कितना उचित है।

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी ८० वें सूत्र एवं अनुवर्ती सूत्रों में इस तत्त्व का वर्णन करते है जिसकी अभूत पूर्व व्याख्या श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने हम भगवद्-बन्धुओं के लिये प्रेषित किया है यथा :

  • सूत्र ८६ – भगवद्-प्रेम से येन-केन प्रकारेण किया गया कार्य कदाचित भी उपाय नही माना जाता है। इस प्रकार का व्यक्तिकरण भगवद्प्रपन्नों मे भगवद्-प्रेम का ही परम स्वरूप है।
  • सूत्र ८७ – उपाय भावना से किए गए कार्य त्याज्य है और कैङ्कर्य भावना से किए गए कार्य सर्वदा स्वीकृत है।
  • सूत्र ८८ – भौतिक वस्तुओं मे रुचि रखने वाले भौतिकवादि, उन भौतिक वस्तुओं को पाने के लिये जिस प्रकार स्वप्राण त्यागने के लिये सदैव तत्पर रहते है ठीक उसी प्रकार भगवद्-प्रेम से ओत-प्रोत भगवद्प्रपन्नों के विभिन्न कार्य भगवद्-प्रेम के कारण स्वाभाविक है।
  • सूत्र ८९ – ऐसे भगवान् से अत्यन्त आसक्त एवं अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्नजनों का अनुष्ठान (शास्रविधि) और अननुष्ठान (अशास्रविधि) उपाय (अन्य मार्ग के माध्यम और स्वप्रयासों से भगवान् को प्राप्त करना) के भाग नही होते है।
  • सूत्र ९० – ऐसे कार्य जैसे भगवान् के प्राकट्य अप्राकट्य मे विलम्ब होने से उत्पन्न मनोवेदना को सार्वजनिक रूप से प्रकट करना ,भगवान् को संदेशवाहकों के द्वारा संदेश भेजना इत्यादि आऴ्वारोंमे द्रष्टव्य है परन्तु यह केवल भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम और भक्ति का ही व्यक्तिकरण है।
  • सूत्र ९१ – ऐसे कार्य जो विशेष और महान व्यक्तित्वों मे द्रष्टव्य है, वह सदा स्मरणीय और कीर्तनीय है क्योंकि आप सभी सर्वज्ञ है तथापि भगवान् के प्रति अन्याभिलाषित प्रेम से संभ्रांत है।
  • सूत्र ९२ – ऐसे कार्य भगवदनुभव और कैङ्कर्य के अङ्ग है। भगवान् स्वयंकी सम्पूर्ण हर्षता के लिये नियुक्त अन्याभिलाषित भगवद्प्रपन्न जनों को दिव्यानुग्रह से आऴ्वारों मे परिवर्तन करने का स्वप्रयत्न का प्रतिफल ऐसे कार्य होते है।

११६) प्राप्त विषयप्रावण्यम् स्वरूपमागैयाले अवध्यकरमन्रु । सीआज्ञमामित्तनै ।

चूंकि भगवान् के प्रति रति (जो जीव के स्वाभाविक रति विषय वस्तु है) जीव के लिये स्वाभाविक है और तुच्छ नही है।  वास्तव मे यह सराहनीय है।

अनुवादक टीका: भगवान् के प्रति रति और अत्यन्त प्रेम से उनकी सेवा करने की लालसा जीव के लिये स्वाभाविक है। इस तत्त्वको श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे सुन्दर ढंग से समझाया है और इन सूत्रों पर श्रीवरवरमुनि स्वामाजी ने अभूतपूर्व व्याख्या लिखा है यथा :

  • सूत्र ५२ – शेषत्वम् दु:खरूपमागवन्रो नात्तिल् काण्गिरदु एन्निल् – ऐसा माना जाता है की इस भौतिक जगत् मे किसी व्यक्ति की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है। श्रीवरवरमुनि स्वामाजी मनुस्मृति के श्लोक ‘सर्वम् परस्वं दु:खम्‘ – (अर्थात् किसी की सेवा करना सदैव दु:ख पूरित है) और ‘सेवा श्व वृत्ति‘ (अर्थात् सेवा श्वान की वृत्ति है अत: त्याज्य है) का उदाहरण से समझाते है की शेषत्व दु:ख पूरित है ।
  •  सूत्र ५३ – अन्द नियमम् इल्लै; उगन्द विषयत्तुक्कु शेषमायिरुक्कुम् इरुप्पु सुखमागक्काणगैयाले – सेवा वृत्ति दु:ख पूरित है यह असत्य है। आत्मीय जनों का भृत्य बनना सदैव सुखदायक और आनन्दप्रद है।
  •  सूत्र ५४ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। प्रणव मे अ-कार वाच्य शब्द भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के निधित्व का प्रतीक है। हमारा (जीवों) का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है और उनकी सेवा करने का फल सदैव आनन्दप्रद और सुखदायक है।
  •  सूत्र ५५ – शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपम् – आत्माका स्वाभाविक स्वरूप शेषत्व है। यह पूर्ववर्ति सूत्र मे संशय प्रश्न का उत्तर है।  अगर जीवों का शेषत्व भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों पर आधारित है तो क्या यह स्वाभाविक है या अस्वाभाविक है। क्या यहां यह कहना उचित होगा की भगवान् के असंख्य कल्याण गुणों के अभाव मे जीव स्वशेषत्व त्याग देगा ? इसका उत्तर यह है -भगवान् का शेष होना जीव का वास्तविक और स्वाभाविक रूप है जैसा शास्त्रों मे निर्देषित है।
  •  सूत्र ५६ –  शेषत्वम् इल्लादपोदु स्वरूपमिल्लै – जब शेषत्व नही है तो जीवात्मा स्वस्स्वरुप को त्याग देता है।

११७) जीवपरङ्गळ् इरुवरुक्कुम् अपहतपाप्मत्वादिगळ् उण्डायिरुक्कच्चेय्तेयुम् जीवात्मावुक्कु हेयमुण्डाय् भगवदनुग्रहत्ताले कऴियुम् परमात्मा हेय सम्सारग्गनर्हनाये इरुक्कुम्

भगवान् स्वत: विशुद्ध और निष्कलंक है

अपहतपाप्मा गुण से शुरूवात होकर जीवात्मा और परमात्मा दोनों मे आठ गुण समान है। यह गुण जीवात्मा मे तभी प्रकट होते है जब जीवात्मा देह को त्यागकर भगवान् की कृपा से मोक्ष प्राप्त करता है। इसे स्वरूपाविर्भाव कहते है। भगवान् का कोई भौतिक शरीर नही है जो उनके कल्याण गुणों को गुप्त रखता है अर्थात् भगवान् का स्वरूप विशुद्ध और पारलौलिक है। आठ समान गुण है –

  • अपहतपाप्मत्वम् –  अपराधों और दोषों से असम्बन्धित या मुक्ति
  • विरजत्वम् –  वृद्धावस्था से मुक्ति
  • विमृत्यत्वम् – मृत्यु से मुक्ति
  • विशोकत्वम् – शोक से मुक्ति
  • विजिगत्सत्तवम् – क्षुधा से मुक्ति
  • अपिबासत्वम् – पिपासा से मुक्ति
  • सत्यकामत्वम् – दिव्य गुण जो रसास्वादनीय है
  • सत्यसङ्कल्पत्वम् –  स्वसङ्कल्पों को पूरा करने की क्षमता

अनुवादक टीका : जीवात्मा स्वाभाविक रूपसे विशु्द्ध और सत्त्वगुणों से सम्पन्न है। भौतिक जगत् मे कर्मसे बन्धित जीवोंका ज्ञान और आनन्द प्रतिबन्धित होता है। भगवान् की कृपासे उन जीवोंका उद्धार होता है अर्थात् कर्म के बन्धन से मुक्त होता है तो मुक्तात्मा कहलाते है और अन्ततोगत्वा परमपद को पहुँचते है। उस समय, मुक्तात्मा सम्पूर्ण ज्ञान, आनन्द और भगवान् की कृपासे प्राप्त आठ सत्त्व गुणों को भली-भाँती समझता है।

भगवान् कदापि कर्म से बन्धित नही होता है। वास्तविकता मे, जीवोद्धार हेतु भगवान् इस भौतिक जगत् मे निर्हेतुक कृपा से प्रगट होते है। अत एव ऋगवेद कहता है – ‘ स उ श्रेयान् भवति जायमान: ‘ – अर्थात् इस भौतिक जगत् मे भगवान् के प्राकट्य से भगवान् स्वयं  प्रशंनीय हो जाते है। जब भगवान् परमपद से भौतिक जगत् मे प्रगट होते है तो वह अपने सत्त्वगुणों को यथारूप और दिव्य पारलौलिक शरीर सहित पधारते है। उनका शरीर जीवात्माओं के शरीर से भिन्न है। इस विषय को अति उत्तम से श्रीशठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ – ‘ अदियम् शोदि उरुवै अङ्गु वैत्तु इङ्गुप् पिरन्दु ‘ पासुर मे समझाते है। श्रीशठकोप स्वामीजी इस पासुर मे यह कहते है की परमपदमे भगवान् (जो नित्य है) का जो दिव्य मंगल आकर्षक स्वरूप द्रष्टव्य है वही स्वरूप इस भौतिक जगत् मे प्रगट होता है।

११८) नीर्मैक्केल्लैयान तिरुमलै अाश्रयणीयस्थलम् ; मेन्मैक्केल्लैयान परमपदमनुभवस्थानम्

नीर्मै – सरलता, सौलभ्यता – अर्थात् सरलता से कोई भी भगवान् की सन्निकटता (का सान्निध्य) प्राप्त कर सकते है। ऐसी सरलता केवल तिरुमला (श्रीनिवास भगवान्) मे दृश्यमान है। परत्व की पराकाष्ठा परमपद मे दृश्यमान है जहां जीव भगवान् के गुणों का नित्य रसास्वादन करता है।

अनुवादक टीका : श्रीनिवास भगवान् सरलता और सौलभ्यता के प्रतीक है। तिरुमऴिशै आऴ्वार नान्मुगन् तिरुवन्दादि ४५ पासुर मे कहते है की श्रीनिवास भगवान् नित्य सूरियों और संसारियों के लिये समान है। उत्तरवर्ति पासुर मे तिरुमऴिशै आऴ्वार कहते है की तिरुमला मे जन्तु (जानवर) भी श्रीनिवास भगवान् की सौलभ्यता का लाभ उठाते है। कुलशेखराऴ्वार पेरुमाळ् तिरुमोऴि ४.५ – अडियारुम् वानवरुम् अरम्बैयरुम् किडन्तियन्गुम्  पासुर मे कहते है सभी प्रकार के जीव तिरुमला मे रहकर तिरुमला के अधिपति श्रीनिवास भगवान् की सेवा और वन्दना करते है। पूर्वाचार्य आगे कहते है यह जीव त्रिश्रेणी के होते है – १) अनन्य प्रयोजनपरर जीव – अन्याभिलाषा रहित अनन्य भक्त जिन्हें अडियार् कहते है। २) प्रयोजनान्तरपरर जीव व वानवर् — वह सारे देव जो साम्सारिक सुखों की अभिलाषा रखते है। ३) अन्यशेषपरर व अरम्बै – रम्भा, ऊर्वशी इत्यादि जो अन्य देवों की सेवा करते है।

परमपद आनन्दप्रद और हर्षमय है। वहां आनन्द की कोई सीमा नही होती है। वहां भगवान् ही पूर्ण केन्द्रबिन्दु है और भगवान् का परत्त्व पूर्णतया दृष्टिगोचर है।

119) स्वरूपानुरूपमान प्राप्यानुसन्धानम् पण्णिनाल् पोय्प्पुक्कल्लन्दु निर्क वोण्णादु

जीवात्मा भगवान् के प्रति स्वदासत्व तत्त्व को समझकर तथा (स्वस्वरूपानुरूप ज्ञान के फलसे प्राप्त) स्वस्वरूपानुरूप कैङ्कर्य की अभिलाषा, का नित्यानुसन्धान करते रहने से, वह (जीवात्मा) अवश्य भगवद्धाम को पहुँचता है।

अनुवादक टीका : श्रीशठकोप स्वामीजी स्वग्रन्थ तिरुवाय्मोऴि ३.३ पासुर ‘ओऴिविल् कालम्’ मे कैङ्कर्य प्राप्तिकी अत्यन्त इच्छा को व्यक्त करते है। भगवान् की निर्हेतुक कृपासे जीवके वास्तविक स्वरूप अर्थात् जीव भगवान् का दास है इस सिद्धतत्त्वको समझकर श्रीशठकोप स्वामीजी स्वरुपानुरूप कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना ३.३ पासुर मे करते है। इस पासुर मे श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है की दोषरहित वह भगवान् की सेवा हर अवस्था, हर समय, हर रूप और भगवान् की सन्निकटता मे सेवा करते है। हमारे पूर्वाचार्य कहते है हम प्रपन्नजनों को सदैव कैङ्कर्य प्राप्तिकी प्रार्थना भगवान् से करते रहना चाहिए जो भगवान् को आनन्ददायक है।द्वयमहामन्त्र जाप का प्रतिफल और ध्येय (लक्ष्य) यही तो है। द्वयमहामन्त्र के दो खण्ड (भाग) है – प्रथम भाग मे हम पहले श्रीमहालक्ष्मी के पुरुषकार के माध्यम से भगवान् के दिव्य चरणों को उपाय मानते है। दूसरे भाग मे अन्याभिलाषा रहित केवल दिव्य दम्पति के परमसुख के लिये दिव्य दम्पति के प्रति हम विशुद्ध सेवा की प्रार्थना करते है। एरुम्बियप्पा स्वामीजी, पूर्वदिनचर्या स्तोत्र मे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दिव्य दिनचर्या का सुन्दर वर्णन लिपिबद्ध किये है। इस स्तोत्र मे, एरुम्बियप्पा स्वामीजी कहते है की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अधर सदा द्वयमहामन्त्रका जाप करते है और उनका मन सदा द्वयमहामन्त्र के अर्थांका (अर्थात् तिरुवाय्मोऴि का) अनुसन्धान करता है। इस प्रकिया से, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को दिव्यानुभूति होती है और उनके दिव्य शरीर मे अनेकानेक रूपान्तरण जैसे रौंगटे खडे होना इत्यादि द्रष्टव्य है।


१२०) नम् मुदलिगळ् गुरुपरम्परै मुन्नाग द्वयानुसन्धानम् पण्णुगिरदु

गुरु परम्परा

द्वयमहामन्त्र (मन्त्ररत्न – मन्त्रों मे रत्न मन्त्र) का विषय – श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् – जीवों का एकमात्र शरण

 

अनुवादक टीका : हम सभी इस विषय से परिचित है की हमारे पूर्वाचार्य सदा द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करते थे। इससे यह बात और भी सुस्पष्ट होती है की द्वयमहामन्त्र का उच्चारण व जाप स्वतंत्र भाव से कदापि नही किया जा सकता है अर्थात् गुरुपरम्परा का अनुसन्धान किये बिना द्वयमहामन्त्र का उच्चारण करना वर्जित है। जीव कदापि द्वयमहामन्त्र के विषय अर्थात् श्रीरङ्गनाच्चियार् और श्रीरङ्गनाथ भगवान् को स्वतंत्र भाव से उनकी शरण नही लेता परन्तु केवल गुरुपरम्परा के माध्यम से ही उभय का शरण लेता है। अत एव हमारे पूर्वाचार्य सदैव द्वयमहामन्त्र जाप के पहले सर्वप्रथम गुरुपरम्परा का अनुसन्धान करते थे।

अस्मद्गुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य )  
अस्मद् परमगुरुभ्यो नम: (स्वाचार्य के आचार्य – परमाचार्य )
अस्मद् सर्व गुरुभ्यो नम:  (सभी पूर्वाचार्य और वर्तमानाचार्य)
श्रीमते रामानुजाय नम: (श्रीरामानुज स्वामीजी)
श्री पराङ्कुश दासाय नम: (श्रीपेरियनम्बि – श्रीपराङ्कुशदास स्वामीजी)
श्रीमद्यामुनमुनये नम: (आळवन्दार – श्रीयामुनमुनि स्वामीजी)
श्री राम मिश्राय नम: (मणक्काल् नम्बि – श्री राममिश्र स्वामीजी)
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम: (उय्यकोण्डार् – श्री पुण्डरीकाक्ष स्वामीजी)
श्रीमन् नाथमुनये नम: (श्रीनाथमुनिगळ् – श्रीनाथमुनि स्वामीजी)
श्रीमते शठकोपाय नम: (नम्माऴ्वार – श्रीशठकोप स्वामीजी)
श्रीमते विष्वकसेनाय नम: (सेनै मुदलियार् – श्रीविष्वकसेन)
श्रियै नम: (पेरिय पिराट्टि – श्रीमहालक्ष्मी)
श्रीधराय नम: (पेरिय पेरुमाळ् – श्रीरङ्गनाथ भगवान्)

श्रीपिळ्ळै-लोकाचार्य स्वामाजी उपरोक्त विषय का विवेचन श्रीवचनभूषण २७४ सूत्र मे अती सुन्दर ढंग से करते है। वह कहते है – जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – प्रत्येक प्रपन्न को नित्य गुरुपरम्परा सहित द्वयमहामन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिए।

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/09/divine-revelations-of-lokacharya-12.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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