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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३९)

७२)तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – १श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

ऐसे अधिकतम विषयों का गहरा ज्ञान होना चाहिये जो हमें शास्त्रों के अध्ययन करने से प्राप्त होगा। सम्पूर्ण व गहरे ज्ञान प्राप्ति के लिये हमें इन सिद्धान्तों को अच्छे आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करने से प्राप्त होगा।

  • तत्व त्रयम (भोक्तृ – आनंद प्राप्त करनेवाला – आत्मा, भोग्य – आनंद प्राप्त किया हुआ – पदार्थ और नियंत्रु – निर्वाहक – भगवान) को छोड़ अन्य कोई तत्व नहीं हैं – यह न जानना बाधा है। श्रुति कहती है “भोक्ता, भोग्यं, प्रेरितारम च मत्वा”। भोग्यम – वह जिसका आनन्द प्राप्त किया गया है। भोक्ता – वह जो आनन्द प्राप्त करता है। प्रेरिता – वह जिसकी भोग्य और भोक्ता दोनों उसकी सम्पत्ति है और वह जो इन दोनों को नियंत्रित रखता है। अत: यह ३ सत्य हैं। श्रीरामानुज दर्शन के मूल सिद्धान्तों को हमें मानना चाहिये कि तत्वत्रय हीं एक मात्र नीति है। शरीर अचित्त है – पदार्थ – जिससे आनन्द प्राप्त कर चुके हैं। वह जो शरीर में विराजमान हैं और जो सुख और दु:ख का अनुभव करता है उसे चित्त – जीवात्मा – आत्मा कहते है। वह जिसका शरीर दोनों चित्त और अचित्त हैं और उस पर नियंत्रण करता है वे ही सर्वेश्वर (श्रीमन्नारायण) हैं। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि इन तीन सत्य के आगे और कुछ भी नहीं है। जिसे इस तत्त्व पर स्पष्टता व दृढ़ विश्वास है वह दूसरे सिद्धान्तों को कभी नहीं मानेगा। और नहीं दूसरे के सिद्धान्तों को सुनकर हैरान होगा। आगे आगे भिन्न भिन्न मतों के सिद्धान्तों को समझाया है और यह भी समझाया गया है कि ऐसे सिद्धान्तों से भ्रमित होना हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदान्त के सार को श्रीभाष्य और अपने अन्य ग्रन्थ जैसे वेदार्थ संग्रह, वेदान्त दीपम, आदि में समझाया है। श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित दिव्य प्रबन्ध में वेदान्त के सार कि स्तुति कि गयी है। इनमें श्रीसहस्रगीति सबसे अधिक प्रसिद्ध है। श्रीसहस्रगीति के लिये ५ व्याख्या हैं – वो है श्रीतिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान द्वारा ६००० पडि, श्रीवेदांति स्वामीजी द्वारा ९००० पडि, श्रीपेरियावाचान पिल्लै द्वारा २४००० पडि, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के व्याख्यानों को सुनकर श्रीवडक्कु तिरुविधि पिल्लै द्वारा लिखे गये ईडु ३६००० पडि, श्रीवादि केसरी अलगीय मणवाल जीयर द्वारा रचित १२००० पडि। इनमें से ईडु ३६००० पडि हीं अत्यंत विस्तृत और व्यापक टिप्पणी मानी गई है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के ईडु व्याख्या के दो अरुमपधम हैं अप्पु अरुमपधम और जीयर अरुमपधम। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने इस ईडु व्याख्या के लिये ३ प्रस्तावना दिये हैं जिसमें हर प्रस्तावना में कई अद्भुत सिद्धान्त को शामिल किया है। प्रथम प्रस्तावना का नाम “मुदल श्रिय: पति” जिसमें पहिले वें समझाते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी स्वयं भगवान के कृपा पात्र थे जिन्हें सत्य का दिव्य ज्ञान भगवान ने दिया। अपने सिद्धान्तों को समझाने के पहिले उन्होंने अन्य सिद्धान्तों के विषयों में समझाते हैं और फिर उनकी त्रृटियों को समझाते हैं। अन्य सिद्धान्त के लोग तत्त्वों को कैसे समझते है यह कहकर वें प्रारम्भ करते हैं। वे ऐसे १७ सिद्धान्तों की चर्चा करते हैं और अन्त में वेदों के विपरीत के कारण सभी को अमान्य करते हैं। अन्त में इस बात कि पुष्टी करते हैं कि वेद हीं तत्वत्रय को समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इन ३ तत्व (चित, अचित, ईश्वर) को एक रहस्य ग्रन्थ “तत्वत्रय” में बड़े विस्तार से समझाते हैं। इस ग्रन्थ को “कुट्टी भाष्यम” (छोटा श्रीभाष्यम) कहते हैं क्योंकि इसमें श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीभाष्य के मुख्य पहलू समझाये गये हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ के लिये सुन्दर व्याख्या लिखे हैं जिसमे उन्होंने वेद के पेचिदे विषयों को बहुत ही भावपूर्ण तरीके से लिखा हैं। इस विषय के अध्ययन के दौरान हम श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रथम श्रिय: पति वह श्रीलोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित तत्वत्रय को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्यानों के साथ चर्चा करेंगे।
  • वैशेषिका में समझाये अनुसार यहाँ ६ तत्व (द्रव्य से प्रारम्भ होकर) है – इससे घबराना बाधा है। हम यह पहिले हीं देख चुके हैं कि हमारा सिद्धान्त तत्वत्रय पर आधारित है। सांक्य, वैशेषिका, पासुपथ, चार्वाक, बौद्ध, जैन विभिन्न सिद्धान्तों के विध्यालय हैं। हमें इन सिद्धान्तों को नहीं सुनना चाहिये और “क्या यह सही तत्व हैं?” इस तरह सुनकर घबराना नहीं चाहिये। जिसने भी श्रीरामानुज सम्प्रदाय को अच्छी तरह समझ लिया है वे इन दूसरे सिद्धान्तों को सुनकर या देखकर घबड़ायेंगे नहीं। सभी अन्य सिद्धान्तों को निकाल फेंकने की आवश्यकता है। हमारे श्रीरामानुज स्वामीजी कि स्तुति ऐसी हुई है “अरुसमयच चेडियतनै अडियारुत्तां वालिये, अदर्नतुवरुम  कुधरुत्तिगलै अरत्तुरंतान वालिये” – जुग जुग जीवो श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने षण मथम (६ सिद्धान्त – जो वेद के बाहर और विपरीत है) नामक पेड़ का सर्वनाश किया, जुग जुग जियो श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने घास फूस आदि लताओं का विनाश किया – कुदृष्टि मथम (वह तत्व जो वेद को स्वीकार कर गलत तरीके से पेश करते हैं)। उनके तिरुनक्षत्र दिन कि स्तुति ऐसे होती है “शंकर भास्कर यादव भाट्ट प्रभाकरर् थंगल मतम चाय्वुर वादियर  माय्गुवरेनरु चतुमरै वालनदिडु नाल” – वह दिन जब चारों वेद यह देख खुश हो रहे थे कि श्रीशंकरजी, श्रीसूर्य, श्रीयादव प्रकाश, श्रीभाट्टा, श्रीप्रभाकर, आदि पूरी तरह से परास्थ हो गये और विवादी गण भी परास्थ हो गये। हमें इन सिद्धान्तों के विषय में चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है जिन्हें पहिले ही निकाल दिया गया है।
  • नैयायिक में (न्याय विध्यालय) जैसे समझाया गया है कि १६तत्व (प्रमाण से प्रारम्भ कर) है, इससे घबराना बाधा है।
  • सांख्य में जैसे समझाया गया है कि २५तत्व (मूल प्रकृति से प्रारम्भ कर) है, इससे घबराना बाधा है।
  • पतंजली में जैसे समझाया गया है कि २६तत्व है, इससे घबराना बाधा है।
  • पासुपथन में जैसे समझाया गया है कि ३६तत्व है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पासुपथ, पासुपथ आगमा पर आधारित है जो रुद्र पर केन्द्रित है।
  • चार्वाकों में समझाया गया है कि ४ भूत पृथ्वी से प्रारम्भ होकर तत्व हैं, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: चार्वाक केवल ४ तत्वों को (पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु) को हीं सत्य मानता हैं। मूलत: इस अवधारणा के आगे कुछ नहीं है। चारु वाक का अर्थ सुन्दर अलंकृत शब्द हैं। वे समझाते है की कोशिश करें कि इस जीवन को हुआ इतना सुखमय से जीयों क्योंकि यही सत्य है। उन्हें लोकायथ से भी जाना जाता है – पूर्णत: भौतिकता वादि व नास्तिक सिद्धान्त वाले हैं।
  • बौद्ध मत के अनुसार सच्चाई पाँच स्कन्ध, आदि पर आधारित है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया बौद्ध के ४ सिद्धान्त को समझाया गया है। वैभाषिका, सौत्रांतिका, योगाचर और माध्यमिक यह बौद्ध सिद्धान्त में ४ विध्यालय हैं। मूलत: यह सून्यवाधम यानि सबकुछ कुछ भी नहीं है।
  • जैन धर्मानुसार सत्य धर्म, अधर्म, आदि पर आधारित है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैन धर्म अहिंसा, त्याग पर केन्द्रित है। वेद और उसके सिद्धान्त के लिये कोई आदर सम्मान नहीं है।
  • मायावादियों के अनुसार जीवात्मा ही एक मात्र तत्व है इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: मायावादि एक मात्र आत्मा जिसका कोई नाम, रूप, सहायक, आदि नहीं है की उपस्थिति और आत्मा जो अज्ञानता से ढकी हुई है इस मायावी संसार को हीं सत्य मानता है। जैसेहीं अज्ञानता का नाश होता आत्मा अपने सच्चे स्वरूप में आती है और उसे ही मोक्ष कहते हैं।
  • भाट्टा और प्रभाकर के सिद्धान्त से घबराना और यह मानना की जीवात्मा के आगे ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुमारीला भट्ट और प्रभाकर यह दो अद्वैत वेदान्त सिद्धान्त के कट्टर दार्शनिक थे।

अब प्रारम्भ करते हैं अचित्त तत्व (पदार्थ – निर्विकार), जिसके विषय में बहुत संभ्रम थी जिनका स्पष्टीकरण किया गया है और जिन्हें गलत तरिके से पेश किया गया है उन्हें भी समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित तत्वत्रय ग्रन्थ में अचित तत्व के सिद्धान्त के विषय में जो बाते स्थापित की गई हैं पहिले उन विषय को समझायेंगे। एक बार इसे समझने से बाधाएं स्वयं दूर हो जायेगी। प्रत्येक को अलग से समझाने कि आवश्यकता नहीं है।

अचित तत्व श्रेणी के हैं। शुद्ध सत्वम, मिश्र सत्वम और सत्व सून्यम। अनुवादक टिप्पणी: सभी निर्विकार वस्तु में तीन गुणों में से एक से अधिक लक्षण जैसे सत्व, रजस और तमस गुण होते है। यहाँ पदार्थों को शुद्ध सत्वम कहते हैं क्योंकि उनमें पवित्र सत्व ही उनका गुण है। पदार्थ से उसके गुण हीं भिन्न होते हैं परन्तु पदार्थ को उसके गुणों से जाना जाता है इसलिये जब हम शुद्ध सत्वम गुण कहते यानि वह पदार्थ जो अच्छाईयों से भरा हुआ है।

  • शुद्ध सत्वम केवल परमपदधाम में ही देखा जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: परमपदधाम में सभी पदार्थ शुद्ध सत्व वर्ग के होते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि शुद्ध सत्वम राजस और तामस गुणों के बगैर है और पूर्ण रूप से शुद्ध है। वे समझाते हैं कि यह पवित्र पदार्थ स्वयं को कई रूपों में बदलते हैं जैसे कि मण्डप, गोपुरम, विमान, प्रसाद, आदि और भगवान नित्य और मुक्त जीवों को अपार आनन्द प्रदान करते है। इस भौतिक संसार में भगवान का जो दिव्य अर्चा स्वरूप है उसका हम दर्शन करते हैं और वह शुद्ध सत्वम वर्ग में आता है।
  • मिश्र सत्वम- रजस और तमस का मिश्रण है जिसे हम इस भौतिक संसार में देखते हैं। हालाँकि अचित्त नित्य है फिर भी निरन्तर समान रूप से बदलता है। इसलिये उसे तात्कालिक कहते हैं। हालाँकि चित्त जो ज्ञान से भरा हुआ है और जब भौतिक शरीर में विवश है, ज्ञान और आनन्द जो जीवात्मा के लिये मूलभूत है अचित्त से ढ़क जाता है। यह अचित विपरीत ज्ञान को उत्तेजित कर सकता है। कुछ समय बाद हम इसे विस्तृत रूप से देखेंगे।
  • सत्व शून्यम यह काल (समय) है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तत्वत्रय में यह समझाते है कि कुछ दार्शनिकों ने काल का तिरस्कार कर दिया है। परन्तु क्योंकि हम काल कि अस्तित्व सीधे तौर पर अनुभूति और शास्त्रों द्वारा महसूस कर सकते हैं, इसलिये काल को अस्वीकार करने का कोई प्रश्न ही नहीं आता है। काल एक ऐसा घटक है जो अचित्त को निरन्तर बदलाव के लिये सरल बनाता है। काल को भगवान के भूतकाल के उपकरण की तरह समझाया जाता है। काल का दोनों परमपदधाम और इस संसार में अस्तित्व है – जब कि परमपद में पूर्णत: आज्ञाकारी है (भगवान के पूर्णत: मुखोल्लास के लिये) और इस संसारके कार्य को नियंत्रण करने हेतु एक विशिष्ट भूमिका है।

मिश्र सत्वम के विषय पर अधिक जानकारी:

  • मूल प्रकृति (आदिकालीन विषय) एक ऐसी परिस्थिति हैं जहाँ पर सभी तीनों गुण –सत्व, रजस और तमस पूर्णत: संतुलित है। यह एक सूक्ष्म अवस्था है और यह तत्व जो भगवान का शरीर है। सृष्टि उत्पत्ति के समय जब गुणों का संतुलन बदल जाता है तब सूक्ष्म अवस्था टोस पदार्थ बनकर रंग बिरंगे नाम व रूप में बदल जाता है। सृष्टि के समय प्रकृति उपाधान कारणम है। भगवान के दिव्य संकल्प से सूक्ष्म स्थिति सकल बन जाती है। ऐसी अवस्था के इस तरह के बदलाव से २४ तत्त्वों का प्रार्दुभाव होता है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते है कि “पोंगैम्पुलनुम पोरियैंन्थुं करुमेन्द्रियम ऐम्भूतं इंगीव्वुयीरेय पिरकिरुति मानान्गार मनंगले”। अनुवादक टिप्पणी: जैसे श्रुति में बताये गये अनुसार भगवान घोषणा करते हैं “बहु स्याम” – मैं अनन्त हूँ। इस प्रतिज्ञा के साथ जटिल पदार्थ को तत्क्षसृष्टिण रंग बिरंगी पूर्ण स्वरूप में बदल देते हैं। इन पदार्थ के २४ तत्त्वों को इस तरह समझाया जाता है।
    • पोंगैम्पुलन – वह जो हमारी इच्छाओं को बढ़ाता है – पञ्च तनमात्रा – इंद्रियाँ के ५ उद्देश – शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद, गंध।
    • पोरियैंन्थुं – वह जो हमें इच्छाओं के जाल में फँसाता है – पञ्च ज्ञानेंद्रियाँ – ज्ञान के ५ इंद्रियाँ – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक।
    • करुमेन्द्रियाँ – वह जो हमें इन इच्छाओं में निरत करता है – पञ्च कर्मेन्द्रियाँ – ५ कार्य करने के इंद्रियाँ – मुँह, हस्त, पैर, मल त्याग कि इंद्रियाँ, प्रजनन कि इंद्रियाँ।
    • ऐम्भूथम – पञ्च तन्मात्रा कि तिरुमाली – पञ्च भूत – ५ महान तत्व – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी।
    • मानस – मन
    • अहंकार – अहम
    • महान – पदार्थ जो स्पष्ट स्थिति को उजागर करता है।
    • मूल प्रकृति – पदार्थ जो अस्पष्ट स्थिति को उजागर करता है।
  • शब्द, रूप, स्वाद, गंध, स्पर्श ५ भिन्न अनुभव हैं। इन अनुभवों से आकर्षित होनेवाले ज्ञानेन्द्रियाँ भी पाँच हैं – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक। कर्मेन्द्रियाँ जो इन इच्छाओं को रूप देता है वह भी पाँच है मुँह, हस्त, पैर, मल त्याग कि इंद्रियाँ, प्रजनन कि इंद्रियाँ। कोई भी स्वरूप पाँच तत्वों से बनता हैं – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी। अब तक हमने २० तत्व को देखा हैं। महान एक सिद्धान्त हैं जो जीवात्मा के परिश्रम को गती देता है। अहंकार – घमण्ड / आदर को गती देता है। मानस इच्छाओं को गती देता है। अन्त में मूल प्रकृति इस तरह २४ अचित्त तत्त्व हुये। २५वां तत्व जीवात्मा है और २६वां तत्व ईश्वर है।
  • जब पदार्थ के गुण सत्व, रजस और तमस गुण में समान मात्रा में वितरित होते हैं तब उस अवस्था को मूल प्रकृति कहते हैं। जब वह असंतुलित हो जाता है तब उसका असर प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख सकते हैं। जब ऐसा संतुलन खो जाता है तब पहिले महान प्रगट होता है। इसे महत तत्वम भी कहते हैं। जिस तरह किसी बीज को पानी में भिगोकर रखने के बाद जब बीज अंकुरित होता है ठीक उसी तरह हम इन तत्वों का वर्णन कर सकते हैं। यह महत तत्वम ३ अवस्थाओं में है – सात्विक, राजस और तामसिक। इन ३ महान अवस्थाओं से तीन प्रकार के अहंकार – वैकारिकम, तैजसम, भूताधि होते हैं। अहंकार एक ऐसा सिद्धान्त है जो वास्तविकता को घटाता है और भ्रम फैलाता है। उदाहरण के लिये शरीर और आत्मा को समान मानना एक ऐसी गलत फैमी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे तत्वत्रय में समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्याओं में पदार्थ के भिन्न भिन्न पहलुओं के लक्षणों के विषय में प्रमाण देकर समझाते हैं। सामान्यतया मूल प्रकृति को प्रधानम (प्रमुख अवस्था), अव्यक्तम (अस्पष्ट स्थिति) की तरह समझाते है। जब मूल प्रकृति को महत तत्वम में बदलते हैं – पदार्थ स्पष्ट अवस्था में आजाता है और उसका नाम, स्वरूप, आदि आजाते हैं। माहन से प्रारम्भ होकर प्रकृति २३ अन्य तत्वों में फैलती है।
  • वैकारिकम से दोनों कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती है और वे सूक्ष्म अवस्था में ही रहती हैं। मन भी वैकारिकम का एक उत्पादन है। भूताधि, पंचभूतम आदि जन्म लेते हैं। तैजसम वैकारिकम और भूताधि को अनेक बलाव में मदद करते हैं।
  • भूताधि से पंचतनमात्रा (ज्ञान का अनुभव करनेवाले पदार्थ) जो पंचभूत के सूक्ष्म पहलुओं के निर्माण होते है और यहाँ उनका अनुक्रम समझाया जायेगा। भूताधि से प्रथम शब्द तनमात्रम प्रगट होता है। यह आकाश (रंग रहित द्रव्य) कि स्पष्ट स्थिति है। शब्द तनमात्रम से आकाश और स्पर्श तनमात्रम प्रगट होते है। स्पर्श तनमात्रम से वायु और रूप तनमात्रम प्रगट होते है। रूप तनमात्रम से अग्नि और रस तनमात्रम प्रगट होते है। रस तनमात्रम से गन्ध तनमात्रम और जल प्रगट होते है। गन्ध तनमात्रम से पृथ्वी प्रगट होते है। अनुवादक टिप्पणी: तैत्रिय उपनिषध में इसे इस तरह समझाया है “आकाशात वायु:, वायोर अग्नि:, अग्नियैर आप:, अभय: पृथ्वी …” – आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी और इस तरह आता है। इस प्रक्रिया को सामान्यतया पंचीकरणम (पाँच तत्वों का मिश्रण) कहते हैं।
  • इस तरह सृष्टी के एक अंश अनुसार भगवान २४ तत्वों का प्रयोग कर पहिले कई ब्रह्माण्डों का निर्माण करते है और एक बार इन ब्रह्माण्डों का निर्माण हो जाता है तब अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्माजी द्वारा कई प्रजातियों का निर्माण करवाते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सृष्टि को ब्रह्माजी द्वारा इन भागों में विभाजित किया जाता है जैसे अद्वारक सृष्टि – स्वयं भगवान द्वारा निर्मित और सध्वारक सृष्टि – ब्रह्माजी, ऋषि, आदि द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से भगवान द्वारा निर्मित। जब तक ब्रह्माण्ड का निर्माण हो जाता है यह स्वयं भगवान के द्वारा होता है। एक बार ब्रह्माण्ड का निर्माण हो जाता है तब वे हर प्रत्येक ब्रह्माण्ड के लिये एक ब्रह्म को उत्पन्न करते हैं और ब्रह्माण्ड में आगे कि उत्पत्ति के लिये उनकी सहायता करते है। ब्रह्मा, सप्त ऋषि, मनु, आदि सभी को प्रजनन की क्रिया में व्यस्त कर ब्रह्माण्ड में विविध रंग बिरंगी जातियों और रूपों में उत्पत्ति करते हैं, उन्हें ब्रह्माण्ड में देखा जा सकता है। यह समझाया गया हैं कि ऐसे कई ब्रह्माण्ड हैं और सभी ब्रह्माण्ड को एक ब्रह्मा का नेतृत्व प्राप्त है। इस तरह हम समझ सकते हैं कि यह भौतिक संसार खुद ही बहुत विस्तृत है और हमारी कल्पना के बाहर है। परमपदधाम को सामान्यतया त्रिपाद विभूति (संसार से ३ गुणा बड़ा) ऐसा समझाया गया है। साथ ही सृष्टी जो हम देखते हैं वह आवर्ती मात्र है। वहाँ पर सृष्टी, स्थिति और संहार है। इस तरह के अनंत चक्र काल से है जिसका न प्रारम्भ है और न अन्त है।

इस प्रस्तावना के साथ ही हम शेष बाधाओं के इस विभाग में विस्तृत रूप से जानेंगे।

  • आकाश (रंग रहित द्रव्य) एक आवरण अभावम (जिसकी कोई सीमा नहीं है) और शाश्वत, निरन्तर, अविभाज्य और सर्वव्यापी है ऐसा समझकर घबराना बाधा है। आकाश पंचभूतों में से एक है जिसका निर्माण सृष्टी के एक भाग के रूप में सृष्टी के संग ही हुआ है। इसलिये उसे शाश्वत, निरन्तर, अविभाज्य नहीं समझ सकते हैं।
  • दिशा एक अलग पदार्थ है और इससे घबराना बाधा है। दिशाएँ जैसे पूरब, पश्चिम, आदि भिन्न पदार्थ नहीं है। चेन्नई में निवास करनेवाले के लिये श्रीरंगम दक्षिण में है। परन्तु आल्वार तिरुनगरी में निवास करनेवाले के लिये श्रीरंगम उत्तर में है। इसलिये यह तुलनात्मक है। अनुवादक टिप्पणी: तत्वत्रय के १२७वें सूत्र के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि वैशेषिका, आदि दिशा एक अलग पदार्थ जैसे पृथ्वी ऐसा नहीं समझाते है। इस विषय पर विद्वानों से अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • काल का अलग से कोई अस्तित्व नहीं हैं इससे घबराना बाधा है। काल निमिष, मणि, मुहूर्तम, आदि के नाम से जाना जाता है। यह सभी समय के परिवर्तन पर आधारित है, इस संसार में सब कुछ परिवर्तन शील है। “कालो ही धुरतिक्रम:”- (समय का प्रभाव अवश्यभावी है) यह प्रसिद्ध पद है। अनुवादक टिप्पणी: तत्वत्रय के १२५वें सूत्र के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि बौद्ध, आदि काल के उत्पत्ति को स्वीकार नहीं करते है। अगले सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी दर्शाते है कि क्योंकि काल दोनों अनुभूति और शास्त्र से समझा जा सकता है, ऐसे तत्त्व जो काल के अस्तित्व को ही नहीं मानते हैं उन्हें हम कैसे स्वीकार कर सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र के व्याख्यान में बहुत ही सुन्दर उदाहरण से इस सिद्धान्त को स्थापित करते हैं।
  • वायु को देख नहीं सकते हैं, इससे घबराना बाधा है। हालाँकि वायु को देख नहीं सकते है लेकिन उसकी उपस्थिती को स्पर्श द्वारा महसूस किया जा सकता है, इसे अप्रत्यक्ष के तरह समझा नहीं सकते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-40.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३८)

७१) सिद्धान्त विरोधी – सिद्धान्त को समझने में बाधाएं – भाग – ३ (समापन भाग)

 श्रीरामानुज स्वामीजी – श्रीपेरुमबदुर – वह जिन्होंने हमारे सिद्धान्त का प्रचार सही रीति से किया

हम इस विषय पर चर्चा जारी रखेंगे। इनमें से कई विषयों को जानने के लिये अधिक ज्ञान की आवश्यकता है जिसे हम शास्त्रों का सही अध्ययन करके प्राप्त कर सकते हैं। इस विषय के बारें में सम्पूर्ण वह गहरी समझ प्राप्त करने हेतु इन सिद्धान्तों को आचार्य के मार्गदर्शन में हीं अध्ययन करना उत्तम है।

  • मोक्ष जिससे परमपदधाम में नित्य कैंकर्य का मार्ग प्रशस्त होता है की चाहना न करना बाधा है। पिछले भाग में हमने अस्थाई व गौण सांसारिक सुख से सम्बन्ध को त्यागने की आवश्यकता के विषय में देखा है। यहाँ मोक्ष को अनन्त व स्थिर परिणाम कहा गया है। ऐसे लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा न रखना बाधा है। जैसे “मुक्तिर मोक्ष: महानंद:” में समझाया गया है कि मोक्ष असीम और परम आनन्द है। जिसको एक बार जन्म मरण से छुटकारा प्राप्त हो जाता है उसका फिर पुर्नजन्म नहीं होता है। अनुवादक टिप्पणी: चांदोग्य उपनिषद में घोषणा की गई है कि “न च पुनर आवर्त्तते, न च पुनर आवर्त्तते” – वापिस नहीं आना है। दो बार कहने से यह महत्त्वपूर्ण वार्तालाप यह सिद्धान्त ओर अधिक ताकतवर हो जाता है। भगवान कृष्ण गीता के ८.१६ में कहते है “अ ब्रह्मा भुवनाथ लोका:” – ब्रह्म लोक से – सर्वश्रेष्ठ स्थान से न्यूनतम स्थान तक बारम्बार जन्म मरण होगा परन्तु जिसने मुझे प्राप्त कर लिया है उसके लिये इस भौतिक संसार में पुर्नजन्म नहीं है। यह विशिष्ट लक्षणों वाला परमपदधाम है – एक बार जीवात्मा वहाँ पहुँचते ही वह पूरी तरह पवित्र होकर और उसके ज्ञान का पूर्ण विस्तार होता है। इसलिये इस संसार में पुन: आने का कोई सम्भावना हीं नहीं है। परमपद में जीवात्मा कई स्वरूपों से भगवान के भांति भांति कैंकर्य निरत रहते है। इसे चांदोग्य उपनिषद में समझाया गया है “स एकता भवति, थ्रिता भवति …” – वों एक, तीन, आदि स्वरूप धारण कर सकता है। वहाँ इस तरह के परमानंद का कोई अन्त नहीं है और जीवात्मा का इस संसार में पुन: आने कि कोई संभावना नहीं है, वों भी ऐसे परमानंद का स्वाद चखने के पश्चात जो उसके लिये स्वाभाविक है। भगवान स्वयं जीवात्मा को वापिस संसार सागर में नहीं भेजेंगे क्योंकि उन्होंने जीवात्मा को परमपद में लाने के लिये बहुत परिश्रम किया है। इसलिये हमें भगवान के परमपदधाम में निरन्तर नित्य कैंकर्य की चाहना करनी चाहिये।
  • मुमुक्षु को लौकिक संसार में रुचि होना बाधा है। मुमुक्षु यानि जो मोक्ष कि चाह करता है। श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित तिरुविरूत्तम के प्रथम पाशुर में वर्णन किया गया है “इन् निन्र नीर्मै इन याम उरामै” – मैं इस संसार में फँसे होने की मेरी अभी की स्थिती को सहन नहीं कर सकता क्योंकि इस लौकिक संसार में जीवन के लिये मुझे अरुचि होनी चाहिये। ऐसी स्थिती से बाहर आने के लिये हमें परमपद प्राप्ति कि इच्छा होनी चाहिये। इसे “संसारत्तिल अडिक्कोधिप्पु” – ऐसे समझाया गया है यानि भौतिक संसार में रहना यानि गरम रेत पर चलाने के समान है। अनुवादक टिप्पणी: जब कोई गरम रेत पर चलते हुये फँस जाता है तो वह बड़ी आतुरता से छाया की ओर देखता है। संसार को गरम रेत और परमपदधाम को ठंडी छाव से तुलना की गयी है। स्वयं भगवान को ऐसे समझाया गया है “वासुदेव तरुछ्छाया” – वसुदेव छाँव देनेवाला वृक्ष। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के ११६ सूत्र (द्वय प्रकरणम का पहला सूत्र) में श्रीवैष्णव लक्षणम को समझाते है। कई लक्षणों में एक को चिन्हित करते हैं कि श्रीवैष्णवों को परमपदधाम पहुँचकर नित्य कैंकर्य करने का पूर्ण विश्वास होना चाहिये। इसके साथ उस लक्ष्य की पूर्ति के लिये निरन्तर लालसा होनी चाहिये। हम जिस अवस्था में हैं उसीमे हीं संतुष्ट नहीं होना चाहिये और आनन्दपूर्वक अपना जीवन निर्वाह करना चाहिये। बजाय इसके कि इस भौतिक संसार से मोक्ष पाने की निरन्तर लालसा होनी चाहिये ताकि परमपदधाम में निवास कर भगवान का नित्य कैंकर्य कर सकें। ऐसी चाहना न होना ही बाधा है।
  • यह न समझकर कि हमने जो कुछ भी प्राप्त किया है वह हमारे कर्मों का फल है जो अस्थायी आर नगण्य व तुच्छ है और ब्रह्म सकारात्मक है के विषय में जानने की इच्छा न रखना बाधा है। कर्म साध्य फलम – हमने यज्ञ, याग्य, आदि से जो कुछ प्राप्त किया है जैसे कि सांसारिक धन, स्वर्ग, आदि का सुख। यह अस्थाई हैं – हमारे पुण्य समाप्त होते ही यह समाप्त हो जायेंगे। वे शाश्वत नहीं हैं। परमपदधाम की निरन्तर कैंकर्य के आर्शिवाद से तुलना की जाये तो यह सब नगण्य, तुच्छ है। ऐसे सांसारिक आनन्द की कमियों को जानते हुये भी यदि कोई भगवान के नित्य कैंकर्य की चाहना नहीं करता है तो उसकी यह बहुत ही दयनीय दशा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान कृष्ण भगवद्गीता के ८.१५ श्लोक में समझाते हैं कि “मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयम शाश्वतम् …” – मुझे प्राप्त करके जो भक्तियोगी हैं, कभी भी दुखों से पूर्ण इस अनित्य जगत में नहीं लौटते जो दुख और शाश्वत का घर है, क्योंकि उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है। इस भौतिक संसार में चाहे पाताल लोक हो, ब्रह्म लोक हो, जन्म, मृत्यु, बीमारी, बुढ़ापा, आदि रहेंगे। इन चार समस्याओं के रहते दु:ख की सम्भावना रहती है। अत: हमें तुच्छ सांसारिक पहलुओं से सम्बन्ध त्याग कर परमपदधाम में भगवान का नित्य कैंकर्य और अपना लक्ष्य केन्द्रित करना चाहिये।
  • यह न जानना कि नारायण जिसे नारायण अनुवाकम प्रगट किया गया है वे ही ब्रह्म नाम से जाने जाते हैं बाधा है। नारायण सूक्त में देखा जाता हैं कि “नारायण परम ब्रह्म तत्वम नारायण: परा: नारायण परोज्योति: आत्मा नारायण: परा:”। यहाँ श्रृति में घोषणा की गई है कि सर्वश्रेष्ठ भगवान जो नारायण है वही परब्रह्म हैं जिनके बराबर कोई नहीं है। इसका सभी को अध्ययन करना चाहिये और समझना चाहिये।
  • यह न समझना कि शास्त्रों के कर्म भाग स्वयं भगवान ने ही प्रतिस्थापित किया है जिसे सबको पालन करना चाहिये – बाधा है। वेदों को दो भागों में बाँटा गया है। कर्म भाग हमें यागम (त्याग), यज्ञम (पूजा), आदि समझाता हैं। कर्म दो प्रकार के हैं। आज्ञा कर्म – नित्य, नैमित्तिक कर्म। यह नित्य / नैमित्तिक कर्म हमें करना चाहिये। अकारणे प्रत्यवायम – जब ऐसे कर्म नहीं किये जाते हैं तो वह पाप कि ओर ले जाता है। एक और प्रकार का कर्म है काम्य कर्म – यह वैकल्पिक है और सामान्यता सांसारिक लाभ कि ओर केन्द्रित है। हम अपने नित्य कर्म यह संकल्प के साथ करते है “श्री भगवद आज्ञा भगवत कैंकर्यं रूपं” – कर्म जो भगवद आज्ञा है और भगवद कैंकर्य का एक अंश है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी वेदों के दो भाग करने के तत्त्व को समझाते हैं – श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के पहले सूत्र पर व्याख्या में पूर्व भाग और उत्तर भाग को समझाते हैं। वे आगे कहते हैं कि पूर्व मीमांसा (जैमिनी सूत्रम) के साथ में “अथातो धर्म जिज्ञासा” उत्तर मीमांसा (वेद व्यास ब्रह्म सूत्रम) जो “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” से प्रारम्भ होता है। इसलिये पूर्व भाग में कर्मानुष्ठान द्वारा भगवान की विविध पूजा पद्धत्ति को समझाने पर केन्द्रित किया गया हैं और उत्तर भाग में ऐसे भगवान जिनकी पूजा की जाती है उनके गुणों को समझाया गया है। तैत्रीय उपनिषद में भी यह दर्शाया गया हैं कि “स आत्मा, अङ्गान्यन्या देवता:” – सभी देवता भगवान के अंश है और भगवान द्वारा अनवरत हैं। इसे जानने के लिये विद्वान जन स्वयं को कर्मानुष्ठान से भगवान की पूजा में व्यस्त रखते हैं (स्वयं भगवान की आज्ञा द्वारा)। इस विषय पर उनकी व्याख्या वास्तव में विस्तृत है – परन्तु यह सुन्दर विश्लेषण / प्रस्तुति अपने सत सम्प्रदाय के मूलभूत सिद्धान्त जिसे आचार्य के सही मार्गदर्शन में अध्ययन करने की आवश्यकता है।
  • यह न जानना कि वेदों के ब्रह्म भाग भगवन के स्वरूप, रूप, गुण, वैभव, आदि को विस्तार से समझाता है और भगवान को पूर्णत: प्राप्त करने में समाप्त होता है – बाधा है। ब्रह्म भाग – उपनिषद है। यह भगवान श्रीमन्नारायण के सच्चे स्वभाव, रूप, गुण, अवतार, आदि को समझाता हैं। स्वरूप का अर्थ सच्चा स्वभाव है – सर्वश्रेष्ठ, अन्तर्यामी, आदि। रूप का अर्थ है भगवान के दिव्य स्वरूप की सुन्दरता, मृदु स्वभाव, आदि। गुण में उनके सभी पवित्र लक्षण शामील है – गुण जो उनके श्रेष्ठता को दर्शाता है जैसे ज्ञान, शक्ति, आदि और गुण जो उनके सादगी जैसे मिलनसार, मातृत्व की तरह सहिष्णुता आदि। वैभव, आदि – उनके अवतार, अपार सम्पत्ति, आदि शामील हैं। एक बार यदि कोई इनको (स्वरूप, रूप, गुण, वैभव, आदि) समझ जाता हैं तो स्वयं उसमें भगवतप्राप्ति की लालसा जागृत होती है और वह उन्हें प्राप्त करने के तरीकों कि खोज करता है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ ब्रह्म भाग में उपनिषद और ब्रह्म सूत्र शामील हैं। वेदान्त सूत्र एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण साहित्य है जो ब्रह्म के लक्षणों को स्थापित करते हैं। बोधायन ऋषि ने सर्व प्रथम ब्रह्म सूत्र की व्याख्या की थी जिसे काश्मीर में सुरक्षित रखा गया था। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी की इच्छा पूर्ति के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीविशिष्टाद्वैत सिद्धान्त की स्थापना के लिये इस सूत्र की विस्तृत व्याख्या लिखने की प्रतिज्ञा की थी। इस प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी के साथ काश्मीर तक प्रयाण किया और बोधायन वृत्ति ग्रन्थ लेकर पुन: श्रीरंगम की ओर प्रस्थान किया। कुछ बदमाशों ने जब इस विषय के बारें में सुना तो उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी का पीछा किया और उनसे ग्रन्थ को पुन: छीन लिया। श्रीरामानुज स्वामीजी बहुत दु:ख और शोक में डूब गये, लेकिन श्रीकुरेश स्वामीजी ने उन्हें बताया कि जब आप विश्राम कर रहे थे उस समय आपने सम्पूर्ण ग्रन्थ को कंठस्थ कर लिया है। वे श्रीरंगम लौट आते हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीकुरेश स्वामीजी की सहायता से श्रीभाष्य (ब्रह्म सूत्र पर विस्तृत व्याख्या) ग्रन्थ कि रचना किये। श्रीरामानुज स्वामीजी पुन: काश्मीर जाते हैं और वहाँ सरस्वती देवी शारदा पीठ में उनका हर्षोल्लास के साथ स्वागत करती हैं। वे श्रीरामानुज स्वामीजी से श्रीभाष्य स्वीकार कर उसका अवलोकन करती हैं। साहित्य की महान स्पष्टता को देखकर वे अति प्रसन्न होकर श्रीरामानुज स्वामीजी को “श्री भाष्यकार” की उपाधि से सम्मानीत करती हैं। उपनिषद के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी ने अलग से कोई व्याख्या नहीं लिखी हैं। श्रीवेंकटेश भगवान के सन्मुख उन्होंने स्वत: वेदार्थ संग्रह पर व्याख्या प्रस्तुत किया। इस वेदार्थ संग्रह में वें विशेषकर उपनिषद के ऐसे पहलुओं पर ज़ोर देकर समझाया है जिन्हें अद्वैत गलत तरीके से पेश करते हैं। कुछ व्याक्यांश जैसे “तत्वमसी, अहं ब्रह्मासमी, आदि” अद्वैती गलत तरीके से समझाते है और ऐसे व्याक्यांश बहुत साफ तरीके से, सही सन्दर्भ के साथ और कई प्रमाणों के माध्यम से श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदार्थ संग्रह में समझाया हैं। इस तरह भगवान के अद्भुत पहलुओं को श्रीरामानुज स्वामीजी की रचनाओं के जरिये मूल तरीके से बिना किसी संशय भ्रम के हम समझ सकते हैं।
  • परमपद में नित्य सेवा कैंकर्य ही अन्तिम लक्ष्य है यह न मानना बाधा है। भगवान श्रीमन्नारायण के निकट पहुँचना ही परमपुरुषार्थ (श्रेष्ठ लक्ष्य) है। इस लक्ष्य में भगवद अनुभव सर्व प्रथम कदम है। ऐसा अनुभव हमें प्रीति के मार्ग में अग्रसर होकर भगवान के अद्भुत गुणों को समझाते हैं। ऐसा प्रेम हमें उनके कैंकर्य जो उनके आनन्द के लिये हो की ओर आगे बढ़ाता है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे “अकिञ्चितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” में कहा गया हैं – किसीके दासत्व का सच्चा स्वभाव छोटे छोटे कैंकर्य कर अनवरत रख सकते हैं। वेदान्त हमें दासत्व के सही स्वरूप में रहकर मोक्ष प्राप्ति समझाते हैं। शेषत्व आत्मा का मुख्य गुण हैं। वह शेषत्व हमें भगवान के आनन्द के लिये निस्वार्थ कैंकर्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। इस अन्तिम लक्ष्य के विषय में कोई दूसरा ज्ञान केवल एक मिथ्याबोध है।
  • साम्यापत्ति (जीवात्मा का ब्रह्म के बराबर स्तर तक पहुँचना) सामरस्यम (समान आनन्द होना) कि इंद्रिय को प्रगट करता है, यह न जानना बाधा है। श्रृति में मोक्ष को “परमं साम्यमुपैती”, “सोस्नुते सर्वान्कामान सहब्रह्मणा”, आदि ऐसे समझाया गया है। विशेषकर भगवान, नित्यसूरीगण और मुक्तामा में समान ज्ञान और आनन्द होता हैं। फिर भी भगवान स्वामी है और जीवात्मा उनके दास हैं। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा के लिये भगवान के चरण कमलों तक पहुँचना ही वास्तविक आर्शिवाद है। वह जो भगवान के निकट पहुँचता है उसे साम्यापत्ति मोक्ष से आर्शिवाद प्रदान करते है जिसे श्रीपरकाल स्वामीजी अपने पेरिया तिरुमोझी में इस तरह पहचानते हैं – “थम्मैये ओक्क अरुल चेयवर” – भगवान मुक्तामा को अपने गुण प्राप्ति का आर्शिवाद प्रदान करते हैं। साम्यापत्ति मोक्ष का अर्थ मुक्तामा भगवान कि निर्हेतुक कृपा से आठ गुण प्राप्त करना हैं। यह गुण भगवान में पूर्णत: हैं। इन आठ गुणों से भी आगे कुछ गुण जैसे श्रिय:पति, शेष सायित्वम (वह जो आदि शेष पर विश्राम कर रहा हो), उभय विभूति नाथम (नित्य विभूति और लीला विभूति के निर्वाहक), आदि भगवान में हीं हैं। आठ गुण हैं: अपहठपाप्म – सभी पापों से मुक्त, विजरा: – बुढ़ापे से मुक्त, विमृत्यु: – मृत्यु से मुक्त, विशोक: – दु:खों से मुक्त, विजिगत्सा: – भूख से मुक्त, अपिपासा: – प्यास से मुक्त, सत्यकामा: – सभी इच्छा पूर्ण करने योग्य, सत्य संकल्प: – कोई भी कार्य पूर्ण करने योग्य।
  • यह कल्पना करना कि स्वरूप ऐक्यम (परमात्मा और जीवात्मा का मिलन) है बाधा है। जैसे पहले समझाया गया है कि अद्वैत जन ऐसा भ्रम फैलाते हैं कि जीवात्मा ही ब्रह्म बनते है।
  • यह न जानना कि इस संसार चक्र से छूटने के पश्चात भगवान के कैंकर्य के लिये कई स्वरूप धारण करते हैं और इस भ्रम में रहना कि इस संसार चक्र से छूटने के पश्चात कोई स्वरूप / शरीर नहीं रहता है – यह बाधा है। हमें यह समझना चाहिये कि मुक्तात्मा के लिये कैंकर्य हीं अन्तिम लक्ष्य है। कैंकर्य करने हेतु जीवात्मा को एक शरीर या रूप कि आवश्यकता है। श्रीसरोयोगी स्वामीजी मुदल तिरुवन्दादि के ५३वें पाशुर में समझाते है “शेन्राल् कुडैयाम् इरुन्दाल् शिङ्गशनमाम् निन्राल् मरवडियाम्…” – जब भगवान भ्रमण करते है तो आदिशेषजी छत्र का रूप धारण करते हैं, जब वें बैठते हैं तो आदिशेषजी सिंहासन का रूप धारण करते हैं, जब भगवान खड़े हो जाते हैं तो आदिशेषजी खड़ाऊ का रूप धारण करते हैं, आदि। इस तरह आदिशेषजी (जो नित्यसूरी हैं – नित्य मुक्त जीवात्मा) छत्र, खड़ाऊ, सिंहासन, आदि रूप धारण कर कई कैंकर्य करते हैं। उसी तरह मुक्तात्मा भी कई रूप लेकर बहुत कैंकर्य करते हैं। कैसे कोई बिना शरीर के कैंकर्य कर सकता हैं? अनुवादक टिप्पणी: इस पाशुर की व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बहुत ही सुन्दर ढंग से समझाते हैं कि श्रीअम्माजी और श्रीमन्नारायण के मुखोल्लास के लिये श्रीआदिशेष कोई भी रूप धारण करते हैं। वे और कहते हैं कि इस पाशुर में केवल आदिशेषजी कि चर्चा हुई है परन्तु सभी जीवात्मा का परमपद में यहीं होता है जिसे उपलक्षणम (उदाहरण / बराबरी) कहते हैं। चांदोग्य उपनिषद में इन प्रमाणो को देख चुके हैं “स एकता भवति, थ्रिता भवति …”।
  • मुक्ति का अर्थ अर्चिरादि मार्ग से जाना (वह राह जो अर्चि से प्रारम्भ होता है) जो अन्त में परमपद को पहुँचाता है और जीवन मुक्ति (इस जीवन और संसार से मुक्ति पाना) से भ्रम होना – यह न मानना बाधा है। सच्चा मोक्ष / मुक्ति का अर्थ इस संसार के जन्म मरण के चक्र से मुक्ति पाना, परमपद पहुँचना, भगवान परवासुदेव का अनुभव करना और अनन्तकाल तक उनका कैंकर्य करना और उनका पूर्ण मुखोल्लास के लिये बिना किसी त्रुटि के निरन्तर सेवा करना। जीवात्मा (जो मुक्त हो गया हो) मृत्यु के समय अपना शरीर त्यागकर अर्चिरादि मार्ग से जो प्रकाशित राह हैं स्वयं भगवान उसकी मदद करते है और परमपद पहुँचाते हैं। इस अन्तिम दशा को “मुक्तिर मोक्ष: महानंद:” कहते हैं – सुखद मोक्ष। श्रीशंकराचार्यजी के अद्वैत सिद्धान्त में, वेदान्त के वाक्यों का अध्ययन करना व समझना जैसे कि “तत्वमसि” और समझना कि मैं ही ब्रह्म हूँ और उसे ही मुक्ति मानते हैं। अद्वैत सिद्धान्त अनुसार इसी जीवन में मोक्ष की प्राप्ति होती है। परन्तु ऐसी समझ अस्पष्ट व भ्रम करनेवाली है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के पाशुर में अर्चिरादि मार्ग को समझाते है “सूळ्वीसुम्बणीमुगिल”। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी “अर्चिरादि” नामक रहस्य ग्रन्थ में अर्चिरादि मार्ग व परमपद में सुखद अनुभावों को विस्तार से समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी स्वयं मुमुक्षुप्पड़ी के २७वें सूत्र में दर्शाते हैं कि परमपद में भगवान का कैंकर्य करना, जो हमारा अन्तिम लक्ष्य है इसे “प्रमेय शेखर” और “अर्चिरादि गति” (उनके १८ रहस्य ग्रन्थों में से २ ग्रन्थ) में समझाया गया है। श्रीनायनार बताते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी अपनी दिव्य भावनाओं से भगवान को तिरुमोगुर आप्तन ऐसा कहते है जिसका अर्थ भगवान जो जीवात्मा के अर्चिरादी गति में साथ हो – राह जो जीवात्मा को मोक्ष भूमि कि ओर ले जाता है। आप्तन का अर्थ विश्वसनीय व्यक्ति – उनमें विश्वास करना चाहिये कि वे हमें परमपदधाम को सुरक्षित पहुँचायेंगे।
  • प्रपन्नों के इस जीवन के अन्त में उनके कर्म नष्ट हो जाते हैं, उसका सूक्ष्म शरीर जीवात्मा के संग जाता है और विरजा नदी में स्नान करने के पश्चात पूर्ण रूप लेता है और इसमें सन्देह करना बाधा है। हालाँकि भगवान कि कृपा से किसी के कर्म (सद्कर्म / अपकर्म) उसके जीवन के अन्त में मिट जाता है और अर्चिरादि मार्ग द्वारा आगे बढ़ता है तथापि जीवात्मा का सम्बन्ध अचित से पूरी तरह नष्ट नहीं होता है क्योंकि उसका सूक्ष्म शरीर अब तक जीवात्मा के साथ जुड़ा रहता है। यह सब भगवान के संकल्प मात्र से होता है। परमपद की सीमापर एक दिव्य नदी है विरजा। जैसे हीं जीवात्मा इस नदी में स्नान करता है भगवान जीवात्मा का “अमानवन” के रूप में हाथ पकड़कर ऊपर उठा लेते हैं। भगवान के इस कृपा के स्पर्श से सूक्ष्म भौतिक शरीर पूर्णत: कट कर अलग हो जाता है तब तक जीवात्मा का इस भौतिक संसार से सम्बन्ध रहता है। “भौतिक पहलुओं के सम्पूर्ण नष्ट होने से उसकी अज्ञानता भी पूरी तरह से नष्ट हो जाती है” और इसके बाद ही जीवात्मा के पूर्ण ज्ञान का विस्तार हो जाता है। अनुवादक टिप्पणी: स्थूल शरीर – पंच भूतों (पाँच तत्त्व – भूमि, जल, हवा, अग्नि और आकाश) से बना हुआ है। सूक्ष्म शरीर – मन, वासना / रुचि यह हमें अपने पिछले अनुभव से प्राप्त होता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी आचार्य हृदय के १०४वें चूर्णिकै के अपनी व्याख्या में बड़ी सुन्दरता से समझाते है। यह चूर्णिकै बड़ी सुन्दरता से यह स्थापित करता है कि कैसे भगवान जीवात्मा जो इस संसार में पूर्णत: डूबा हुआ है को परमपद प्राप्ति कर वहाँ कैंकर्य के लिये कष्ट सहते हैं। इस चूर्णिकै में नायनार एक किसान का उदाहरण देते हैं कि कैसे किसान मेहनत कर अपनी मन पसन्द फसल तैयार करने के लिये कष्ट उठाना पड़ता है। इस पहलू को उसी चूर्णिकै में आगे श्रीनायनार समझाते हैं कि “सूक्ष्मवोट्टुम नीरिले कलुवि” – वें समझाते है “जैसे धान कि गंदगी को निकालने के लिये जल का प्रयोग होता है” उसी तरह श्रीविरजा नदी के पवित्र जल से जीवात्मा को स्नान कराकर उसके सूक्ष्म शरीर को निकाल देते हैं। यहाँ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी एक सुन्दर प्रश्न करते हैं – जब जीवात्मा के सम्पूर्ण कर्मों को निकाल देते हैं तो फिर सूक्ष्म शरीर में वासना, (भौतिक इच्छाओं के कण) आदि का क्या आवश्यक है? इसका वें स्वयं जवाब देते हैं कि यह भगवान का एक संकल्प मात्र है कि जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को विरजा नदी तक ले जाना है और जीवात्मा का वहाँ तक जाने के लिये एक शरीर की आवशयकता होती है। इसलिये स्वयं भगवान ही जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को विरजा नदी तक पहुँचने तक रखते हैं। इस सिद्धान्त को स्थापित करने हेतु श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पूर्वाचार्यों कि आज्ञाओं को प्रस्तुत करते हैं। जैसे कि जीवात्मा विरजा नदी में स्नान करता है उसका सूक्ष्म शरीर धुल जाता है और अमानवन भगवान स्पर्श मात्र से वह आध्यात्मिक शरीर का स्वरूप धारण करता है (उसी चूर्णिकै में श्रीनायनार स्वामीजी ने भी इसे समझाते है)। यहाँ श्रीएरुम्बी अप्पाजी के पाशुर को स्मरण करना चाहिये “मन्नुयिरगाल इंगे मणवाल मामुनिवन पोन्नडियां सेंगमलप पोधुगलै उन्निच चिरत्ताले तीणडील अमानवनुम नम्मैक करत्ताले तिणडल कदन” – वह जो यहाँ दृढ़ता से हैं, वह जो निष्ठा से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों को पकड़े हैं, अमानव अपने कर्तव्य से बाध्य होकर उनका स्पर्श करते हैं। इस पाशुर का पठन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी विरचित उपदेश रत्नमाला के अन्त में करते हैं।
  • एक विस्मयपूर्ण भक्ति योग में रहना जो इस संसार चक्र से मुक्ति पाकर भगवान के पास जाने का साधन है और प्रपत्ति हीं भगवद्प्राप्ति का वास्तविक साधन है यह न मानना बाधा है। शास्त्र में मुक्ति (परमपद में नित्य कैंकर्य) के कई साधन बताये गये हैं। भगवद्गीता में समझाया गया है कि भक्ति योग जिसे शास्त्रों में भगवान तक पहुँचने के लिये सर्वश्रेष्ठ साधन बताया गया है। परन्तु यह भक्ति योग मूलत: जीवात्मा के स्वयं के परिश्रम पर निर्भर करता है फिर भी वह जीवात्मा के सही स्वभाव के विपरीत है जैसे कि स्वाभाविक लक्षण शेषत्व और पारतंत्रय आदि है। इसलिये हमारे आल्वारों और आचार्यों ने भक्ति योग ही उपाय है इसे अस्वीकार करके प्रपत्ति जो जीवात्मा के लिये सहज है को उपाय माना है। यह हमारे लिये उचित होगा कि हम अपने पूर्वाचार्यों के पद चिन्हों का पालन करें।
  • प्रपत्ति शब्द सीधा भगवान कि ओर संकेत करता हैं इसे स्पष्ट रूप से न समझना बाधा है। प्रपत्ति शरणागति है – पूर्णत: भगवान के शरण होना और उनके हीं सहारे को मानना। हालाँकि ऐसे दिखता है कि “हमने” उन्हें पकड़ रखा है लेकिन यह सत्य नहीं है। शरणागति का वास्तविक अर्थ है “त्वमेव उपाय भूतो मे भव – इति प्रार्थना मति:” – यह प्रार्थना करने की मानसिक स्थिति है “आप केवल मेरा उपाय हो जाओं”। यानि प्रपत्ति में स्वयं भगवान उपाय हो जाते हैं। क्योंकि वें उपाय है हमारी यह सोच कि “मैं शरण हो रहा हूँ” उपाय नहीं हैं। वों एक हीं उपाय और उपेय हैं। अत: यह कहा जा सकता हैं कि प्रपत्ति हीं भगवान को दर्शाता हैं। अनुवादक टिप्पणी: गीताजी के चरम श्लोक में भगवान अर्जुन को आज्ञा देते हैं कि सभी धर्मों को त्याग कर सिर्फ मेरी शरण में आवो मैं तुम्हें सारी चिन्ताओं से मुक्त कर दूँगा। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी में इस चरम श्लोक को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। यहाँ भगवान कृष्ण कहते “मामेकं शरणम्” – मुझे हीं सिर्फ उपाय मानो। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी “एक” शब्द की विस्तृत व्याख्या करते हैं। यहाँ वे पहचानते हैं कि “एक” शब्द प्रमाणित करता है कि केवल शरणागत होना उपाय नहीं है और भगवान ही उपाय हैं। हमारे सत सम्प्रदाय के इस सूक्ष्म सिद्धान्त को समझना कि यह सिद्धान्त बहुत ही महत्वपूर्ण है। कई सूत्रों में “एक” को विस्तार से समझाया गया है। इस सिद्धान्त को अच्छी तरह से समझने के लिये हमें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मुमुक्षुप्पड़ी के कालक्षेप के सुन्दर व्याख्या को श्रवण करना चाहिये।
  • शरणागति जो अधिकारी विशेषण है (योग्यता प्राप्त व्यक्ति का सहायक) को उपाय समझना बाधा है। जैसे समझाया गया है कि समर्पण कि प्रक्रिया मोक्ष चाहनेवाले व्यक्ति का सिर्फ एक गुण है – अधिक कुछ नही। इस उपाय से भ्रमित होना सही नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: अधिकारी विशेषण का अर्थ वह सहायक जो मनुष्य की विशिष्ट पहचान करता है। यहाँ अधिकारी वह है जो मोक्ष कि “चाहना” करता है – ऐसे जीवात्मा के लिये शरणागति एक प्राकृतिक है क्योंकि भगवान की शरणागति ही जीवात्मा का सच्चा स्वभाव है। मुमुक्षुप्पड़ी के ५५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी घोषणा करते हैं कि “शेषत्वमे आत्मावुक्कु स्वरूपं” – भगवान का दास बनकर रहना जीवात्मा का सच्चा स्वभाव है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से प्रमाणों से स्थापित करते है कि जीवात्मा दास है और श्रीहरी स्वामी है। अगले सूत्र में कहते है कि “शेषत्वमिल्लाधपोधु स्वरुपमिल्लै” – जब शेषत्व नहीं है तो उसका सच्च स्वभाव नष्ट हो जाता है। इसलिये जीवात्मा के सच्चे स्वभावनुसार भगवान के शरण होना एक स्वाभाविक क्रिया है – उसे कोई विशेष साधन नहीं मानना चाहिये। कालक्षेप में इस सिद्धान्त को समझाने के लिये एक अच्छा उदाहरण सुना है। एक परोपकारी मनुष्य अपने तिरुमाली में सबको प्रसाद बाँट रहा है। वहाँ एक व्यक्ति आता है और उसे पाने की इच्छा करता है। यहाँ पर प्रसाद के लिये उपाय है परोपकारी मनुष्य का सभी को खिलाने का करुणामय भाव है। परन्तु जिसे वहाँ पाना है उसे “भूख” होनी चाहिये – यही भूख अधिकारी विशेषण है – बिना भूख के वह प्रसाद नहीं पा सकता है जो वहाँ बाँटा गया है। परन्तु यह भूख उपाय नहीं है – यह तो केवल प्रसाद पानेवाले के लिये एक मूलभूत सहायक है।
  • बिना पुरुषकार के शरण होना बाधा है। सामान्यता पुरुषकार का अर्थ सिफारिश है। जीवात्मा को ऊपर उठाने के लिये भगवान को समझाना कि आप ही उपाय हैं। क्योंकि हम कृत्य अकरणम् (शास्त्रों की आज्ञा का पालन नहीं करना), अकृत्य अकरणम् (शास्त्रों द्वारा वर्जित कार्यों में निरत रहना), भगवद अपचार (भगवान के प्रति अपराध करना), भागवत अपचार (भागवतों के प्रति अपराध करना), आदि से भरे हुये हैं, भगवान हमारा तिरस्कार कर सकते हैं। हमारे में इतने अवगुण होते हुये भी माता श्रीमहालक्ष्मीजी भगवान को समझाती हैं कि वे इन्हें स्वीकार करें और इनकी रक्षा करें। पुरुषकार का यही मुख्य अर्थ हैं। यह कहा गया हैं कि बिना पुरुषकार के शरणागति असफल हैं। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वाचार्यों ने श्रीमहालक्ष्मी अम्माजी के पुरुषकार की भूमिका को विस्तार से समझाया हैं। शरणागति गध्य में श्रीरामानुज स्वामीजी पहिले अम्माजी के पास जाते हैं और फिर भगवान के शरण होते हैं। हमारे सत सम्प्रदाय में द्वय महामन्त्र की बहुत स्तुति होती है क्योंकि यह अम्माजी की भूमिका को पूर्णत: प्रकाशन करता है। द्वयम के पहिले खण्ड में यह समझाया गया हैं कि अम्माजी के पुरुषकार से श्रीमन्नारायण के शरण होना चाहिये और सिर्फ भगवान को हीं उपाय मानना चाहिये। द्वयम के दूसरे खण्ड में यह समझाया गया है कि इस दिव्य युगल जोड़ी की हमें एक साथ सेवा करनी चाहिये जिससे भगवान का मुखोल्लास होगा। मुमुक्षुप्पड़ी में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी अम्माजी के भूमिका और पुरुषकार को समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी १३५वें सूत्र में समझाते है कि काकासुर (कागभुसण्डी) ने गलत इरादे से माता सीता जो प्रभु श्रीराम के संग थी को दु:ख पहुँचाया लेकिन अन्त में माता सीता हीं के पुरुषकार से काकासुर को अभयदान दिया। परन्तु दूसरी तरफ रावण श्रीराम के हाथों मारा गया क्योंकि माता सीता उस वक्त श्रीराम के संग नहीं थी। इसलिये जब हम भगवान के शरण होते हैं और यदि अम्माजी भगवान के साथ हैं तो भगवान जीवात्मा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं और यदि अम्माजी के पुरुषकार को अनदेखा करेंगे तो अपने इच्छा के विरुद्ध परिणाम प्राप्त होते हैं।
  • आचार्य के विषय में यह विचार करना कि वे केवल पुरुषकार हैं नकि स्वतन्त्र उपाय है बाधा है। सामान्यतया आचार्य को अम्माजी का सहायक/दास समझा जाता है। आचार्य अम्माजी की तरह ही दयालु, बिना किसी भेदभाव के सभी के प्रति करुणामय हैं। परन्तु श्रीरामानुज नूत्तन्दादि के ९५वें पाशुर में समझाया गया हैं कि “विण्णिन् तलैनिन्नु वीडलिप्पानेम्मिरामानुजन्” – समस्त आत्माओं को मोक्षप्रदान करने के लिए श्रीवैकुंठ से भूतल पर अवतार लेकर श्रीरामानुज स्वामीजी पधारे हैं, आचार्य भी स्वतन्त्र उपाय हो सकते हैं। यह श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ४४७वें पाशुर का भी सार है “आचार्य अभिमानमे उत्तारकम” – हमारे उज्जीवन के लिए आचार्य की कृपा ही सर्वश्रेष्ठ आर्शिवाद है। अनुवादक टिप्पणी: अंतिमोपाय निष्ठा में आचार्य को स्वयं भगवान का अपरावतार समझाया गया है। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४२७वें सूत्र में समझाते हैं कि सीधे भगवान के पास पहुँचने का अर्थ है भगवान का हाथ पकड़ने के लिये सहायता मांगना और आचार्य के द्वारा भगवान के निकट पहुँचने का अर्थ है भगवान के चरण कमलों को पकड़ना। आचार्य को भगवान के चरण कमल माना गया है। भगवान के चरण कमलों के जैसे आचार्य भी बहुत दयालु हैं। अत: उन्हें स्वतन्त्र उपाय माना गया है।
  • उपाय और उपेय को दो भिन्न भिन्न तत्त्व समझना बाधा है। अन्तिम लक्ष्य तो परमपदधाम में भगवान के निकट पहुँचना और उनके आनंद के लिये नित्य कैंकर्य करना है। इस अन्तिम लक्ष्य प्राप्ति के लिये वों हीं एकमात्र साधन है। अत: उपाय और उपेय भगवान हीं हैं।
  • अन्य सिद्धान्तों के विध्यालय के जनों से सम्बन्ध रखना जो भगवान को जगत शरीरत्वम (पूर्ण ब्रम्हाण्ड में निवास करनेवाली अकृष्ट आत्मा), आदि सिद्धान्त को नहीं मानते हैं – बाधा है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति में समझाते है “उडन्मिसै उयिरेनक् करनथेंगुम परनतुलन” – जैसे आत्मा सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई है (ज्ञान के द्वारा), स्वयं भगवान भी सर्वत्र व्याप्त हैं। यहाँ पर भगवान हर ब्रह्माण्ड के हर तत्त्व में व्याप्त है और सबकुछ उनका शरीर है – यही विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त है। रावण को परास्त करने के पश्चात ब्रह्माजी भगवान श्रीराम कि बहुत स्तुति करते हैं। वें श्रीराम की श्रेष्ठता को “सीता लक्ष्मी भवान विष्णु:” कहकर स्थापित करते हैं – श्रीसीताजी श्रीमहालक्ष्मीजी हैं और आप विष्णु है और “जगत सर्वं शरीरं ते” – सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपका शरीर है। परन्तु कुदृष्टिवाले (जो शास्त्र को गलत ढंग से पेश करते हैं) इन सिद्धान्तों को स्वीकार नहीं करते हैं। अत: हमें ऐसों से मित्रता नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी:  विष्णु का अर्थ है जो सर्व व्यापी है। वासुदेव का अर्थ जो सर्वत्र रहते हैं। नारायण का अर्थ है जो स्वयं सबके निवास स्थान हैं और वे स्वयं भी सब में व्याप्त हैं। भगवान के यह तीन नाम उनके सर्वत्र व्यापी गुण को दर्शाते हैं। वे सब वस्तुओं की आत्मा है यह जगत शरीरत्वम की पुष्टी करता है। यह बहुत साधारण विचार है। आत्मा की तरह आत्मा का भी एक शरीर है, परमात्मा के लिये सबकुछ उसके शरीर जैसे है। इस मतभेद में केवल एक समानता है – आत्मा शरीर के एक निश्चित अंग पर है और वह पूर्ण शरीर में ज्ञान के द्वारा फैली हुई है (यानि आत्मा शरीर के सभी अंगों में प्राकृतिक रूप में उपस्थित नहीं है) – क्योंकि आत्मा स्वभाव में अणु है। परन्तु परमात्मा विभु है – इसलिये इस ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण कण में वे शारीरिक रूप से व्याप्त हैं। वेद के इस तत्त्व को अन्य विध्यालय के विद्वानों को मान्य नही है और ऐसों से मित्रता हमारे ऊपर विपरीत परिणाम कर सकता है यदि हम स्वयं इस मूल सिद्धान्तों में दृढ़ नहीं है। इसलिये ऐसे लोगों से मित्रता से बचने की सिफारिश की जाती है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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