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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ३९)

७२)तत्व विरोधी – सत्य / वास्तविकता को जानने में बाधाएं – भाग – १श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

ऐसे अधिकतम विषयों का गहरा ज्ञान होना चाहिये जो हमें शास्त्रों के अध्ययन करने से प्राप्त होगा। सम्पूर्ण व गहरे ज्ञान प्राप्ति के लिये हमें इन सिद्धान्तों को अच्छे आचार्य के मार्गदर्शन में अध्ययन करने से प्राप्त होगा।

  • तत्व त्रयम (भोक्तृ – आनंद प्राप्त करनेवाला – आत्मा, भोग्य – आनंद प्राप्त किया हुआ – पदार्थ और नियंत्रु – निर्वाहक – भगवान) को छोड़ अन्य कोई तत्व नहीं हैं – यह न जानना बाधा है। श्रुति कहती है “भोक्ता, भोग्यं, प्रेरितारम च मत्वा”। भोग्यम – वह जिसका आनन्द प्राप्त किया गया है। भोक्ता – वह जो आनन्द प्राप्त करता है। प्रेरिता – वह जिसकी भोग्य और भोक्ता दोनों उसकी सम्पत्ति है और वह जो इन दोनों को नियंत्रित रखता है। अत: यह ३ सत्य हैं। श्रीरामानुज दर्शन के मूल सिद्धान्तों को हमें मानना चाहिये कि तत्वत्रय हीं एक मात्र नीति है। शरीर अचित्त है – पदार्थ – जिससे आनन्द प्राप्त कर चुके हैं। वह जो शरीर में विराजमान हैं और जो सुख और दु:ख का अनुभव करता है उसे चित्त – जीवात्मा – आत्मा कहते है। वह जिसका शरीर दोनों चित्त और अचित्त हैं और उस पर नियंत्रण करता है वे ही सर्वेश्वर (श्रीमन्नारायण) हैं। हमें यह दृढ़ विश्वास होना चाहिये कि इन तीन सत्य के आगे और कुछ भी नहीं है। जिसे इस तत्त्व पर स्पष्टता व दृढ़ विश्वास है वह दूसरे सिद्धान्तों को कभी नहीं मानेगा। और नहीं दूसरे के सिद्धान्तों को सुनकर हैरान होगा। आगे आगे भिन्न भिन्न मतों के सिद्धान्तों को समझाया है और यह भी समझाया गया है कि ऐसे सिद्धान्तों से भ्रमित होना हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामानुज स्वामीजी ने वेदान्त के सार को श्रीभाष्य और अपने अन्य ग्रन्थ जैसे वेदार्थ संग्रह, वेदान्त दीपम, आदि में समझाया है। श्रीशठकोप स्वामीजी द्वारा रचित दिव्य प्रबन्ध में वेदान्त के सार कि स्तुति कि गयी है। इनमें श्रीसहस्रगीति सबसे अधिक प्रसिद्ध है। श्रीसहस्रगीति के लिये ५ व्याख्या हैं – वो है श्रीतिरुक्कुरुगैप्पिरान पिल्लान द्वारा ६००० पडि, श्रीवेदांति स्वामीजी द्वारा ९००० पडि, श्रीपेरियावाचान पिल्लै द्वारा २४००० पडि, श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के व्याख्यानों को सुनकर श्रीवडक्कु तिरुविधि पिल्लै द्वारा लिखे गये ईडु ३६००० पडि, श्रीवादि केसरी अलगीय मणवाल जीयर द्वारा रचित १२००० पडि। इनमें से ईडु ३६००० पडि हीं अत्यंत विस्तृत और व्यापक टिप्पणी मानी गई है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के ईडु व्याख्या के दो अरुमपधम हैं अप्पु अरुमपधम और जीयर अरुमपधम। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने इस ईडु व्याख्या के लिये ३ प्रस्तावना दिये हैं जिसमें हर प्रस्तावना में कई अद्भुत सिद्धान्त को शामिल किया है। प्रथम प्रस्तावना का नाम “मुदल श्रिय: पति” जिसमें पहिले वें समझाते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी स्वयं भगवान के कृपा पात्र थे जिन्हें सत्य का दिव्य ज्ञान भगवान ने दिया। अपने सिद्धान्तों को समझाने के पहिले उन्होंने अन्य सिद्धान्तों के विषयों में समझाते हैं और फिर उनकी त्रृटियों को समझाते हैं। अन्य सिद्धान्त के लोग तत्त्वों को कैसे समझते है यह कहकर वें प्रारम्भ करते हैं। वे ऐसे १७ सिद्धान्तों की चर्चा करते हैं और अन्त में वेदों के विपरीत के कारण सभी को अमान्य करते हैं। अन्त में इस बात कि पुष्टी करते हैं कि वेद हीं तत्वत्रय को समझाते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इन ३ तत्व (चित, अचित, ईश्वर) को एक रहस्य ग्रन्थ “तत्वत्रय” में बड़े विस्तार से समझाते हैं। इस ग्रन्थ को “कुट्टी भाष्यम” (छोटा श्रीभाष्यम) कहते हैं क्योंकि इसमें श्रीरामानुज स्वामीजी के श्रीभाष्य के मुख्य पहलू समझाये गये हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ के लिये सुन्दर व्याख्या लिखे हैं जिसमे उन्होंने वेद के पेचिदे विषयों को बहुत ही भावपूर्ण तरीके से लिखा हैं। इस विषय के अध्ययन के दौरान हम श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के प्रथम श्रिय: पति वह श्रीलोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित तत्वत्रय को श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के व्याख्यानों के साथ चर्चा करेंगे।
  • वैशेषिका में समझाये अनुसार यहाँ ६ तत्व (द्रव्य से प्रारम्भ होकर) है – इससे घबराना बाधा है। हम यह पहिले हीं देख चुके हैं कि हमारा सिद्धान्त तत्वत्रय पर आधारित है। सांक्य, वैशेषिका, पासुपथ, चार्वाक, बौद्ध, जैन विभिन्न सिद्धान्तों के विध्यालय हैं। हमें इन सिद्धान्तों को नहीं सुनना चाहिये और “क्या यह सही तत्व हैं?” इस तरह सुनकर घबराना नहीं चाहिये। जिसने भी श्रीरामानुज सम्प्रदाय को अच्छी तरह समझ लिया है वे इन दूसरे सिद्धान्तों को सुनकर या देखकर घबड़ायेंगे नहीं। सभी अन्य सिद्धान्तों को निकाल फेंकने की आवश्यकता है। हमारे श्रीरामानुज स्वामीजी कि स्तुति ऐसी हुई है “अरुसमयच चेडियतनै अडियारुत्तां वालिये, अदर्नतुवरुम  कुधरुत्तिगलै अरत्तुरंतान वालिये” – जुग जुग जीवो श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने षण मथम (६ सिद्धान्त – जो वेद के बाहर और विपरीत है) नामक पेड़ का सर्वनाश किया, जुग जुग जियो श्रीरामानुज स्वामीजी जिन्होंने घास फूस आदि लताओं का विनाश किया – कुदृष्टि मथम (वह तत्व जो वेद को स्वीकार कर गलत तरीके से पेश करते हैं)। उनके तिरुनक्षत्र दिन कि स्तुति ऐसे होती है “शंकर भास्कर यादव भाट्ट प्रभाकरर् थंगल मतम चाय्वुर वादियर  माय्गुवरेनरु चतुमरै वालनदिडु नाल” – वह दिन जब चारों वेद यह देख खुश हो रहे थे कि श्रीशंकरजी, श्रीसूर्य, श्रीयादव प्रकाश, श्रीभाट्टा, श्रीप्रभाकर, आदि पूरी तरह से परास्थ हो गये और विवादी गण भी परास्थ हो गये। हमें इन सिद्धान्तों के विषय में चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है जिन्हें पहिले ही निकाल दिया गया है।
  • नैयायिक में (न्याय विध्यालय) जैसे समझाया गया है कि १६तत्व (प्रमाण से प्रारम्भ कर) है, इससे घबराना बाधा है।
  • सांख्य में जैसे समझाया गया है कि २५तत्व (मूल प्रकृति से प्रारम्भ कर) है, इससे घबराना बाधा है।
  • पतंजली में जैसे समझाया गया है कि २६तत्व है, इससे घबराना बाधा है।
  • पासुपथन में जैसे समझाया गया है कि ३६तत्व है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पासुपथ, पासुपथ आगमा पर आधारित है जो रुद्र पर केन्द्रित है।
  • चार्वाकों में समझाया गया है कि ४ भूत पृथ्वी से प्रारम्भ होकर तत्व हैं, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: चार्वाक केवल ४ तत्वों को (पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु) को हीं सत्य मानता हैं। मूलत: इस अवधारणा के आगे कुछ नहीं है। चारु वाक का अर्थ सुन्दर अलंकृत शब्द हैं। वे समझाते है की कोशिश करें कि इस जीवन को हुआ इतना सुखमय से जीयों क्योंकि यही सत्य है। उन्हें लोकायथ से भी जाना जाता है – पूर्णत: भौतिकता वादि व नास्तिक सिद्धान्त वाले हैं।
  • बौद्ध मत के अनुसार सच्चाई पाँच स्कन्ध, आदि पर आधारित है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यतया बौद्ध के ४ सिद्धान्त को समझाया गया है। वैभाषिका, सौत्रांतिका, योगाचर और माध्यमिक यह बौद्ध सिद्धान्त में ४ विध्यालय हैं। मूलत: यह सून्यवाधम यानि सबकुछ कुछ भी नहीं है।
  • जैन धर्मानुसार सत्य धर्म, अधर्म, आदि पर आधारित है, इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैन धर्म अहिंसा, त्याग पर केन्द्रित है। वेद और उसके सिद्धान्त के लिये कोई आदर सम्मान नहीं है।
  • मायावादियों के अनुसार जीवात्मा ही एक मात्र तत्व है इससे घबराना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: मायावादि एक मात्र आत्मा जिसका कोई नाम, रूप, सहायक, आदि नहीं है की उपस्थिति और आत्मा जो अज्ञानता से ढकी हुई है इस मायावी संसार को हीं सत्य मानता है। जैसेहीं अज्ञानता का नाश होता आत्मा अपने सच्चे स्वरूप में आती है और उसे ही मोक्ष कहते हैं।
  • भाट्टा और प्रभाकर के सिद्धान्त से घबराना और यह मानना की जीवात्मा के आगे ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुमारीला भट्ट और प्रभाकर यह दो अद्वैत वेदान्त सिद्धान्त के कट्टर दार्शनिक थे।

अब प्रारम्भ करते हैं अचित्त तत्व (पदार्थ – निर्विकार), जिसके विषय में बहुत संभ्रम थी जिनका स्पष्टीकरण किया गया है और जिन्हें गलत तरिके से पेश किया गया है उन्हें भी समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा रचित तत्वत्रय ग्रन्थ में अचित तत्व के सिद्धान्त के विषय में जो बाते स्थापित की गई हैं पहिले उन विषय को समझायेंगे। एक बार इसे समझने से बाधाएं स्वयं दूर हो जायेगी। प्रत्येक को अलग से समझाने कि आवश्यकता नहीं है।

अचित तत्व श्रेणी के हैं। शुद्ध सत्वम, मिश्र सत्वम और सत्व सून्यम। अनुवादक टिप्पणी: सभी निर्विकार वस्तु में तीन गुणों में से एक से अधिक लक्षण जैसे सत्व, रजस और तमस गुण होते है। यहाँ पदार्थों को शुद्ध सत्वम कहते हैं क्योंकि उनमें पवित्र सत्व ही उनका गुण है। पदार्थ से उसके गुण हीं भिन्न होते हैं परन्तु पदार्थ को उसके गुणों से जाना जाता है इसलिये जब हम शुद्ध सत्वम गुण कहते यानि वह पदार्थ जो अच्छाईयों से भरा हुआ है।

  • शुद्ध सत्वम केवल परमपदधाम में ही देखा जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: परमपदधाम में सभी पदार्थ शुद्ध सत्व वर्ग के होते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि शुद्ध सत्वम राजस और तामस गुणों के बगैर है और पूर्ण रूप से शुद्ध है। वे समझाते हैं कि यह पवित्र पदार्थ स्वयं को कई रूपों में बदलते हैं जैसे कि मण्डप, गोपुरम, विमान, प्रसाद, आदि और भगवान नित्य और मुक्त जीवों को अपार आनन्द प्रदान करते है। इस भौतिक संसार में भगवान का जो दिव्य अर्चा स्वरूप है उसका हम दर्शन करते हैं और वह शुद्ध सत्वम वर्ग में आता है।
  • मिश्र सत्वम- रजस और तमस का मिश्रण है जिसे हम इस भौतिक संसार में देखते हैं। हालाँकि अचित्त नित्य है फिर भी निरन्तर समान रूप से बदलता है। इसलिये उसे तात्कालिक कहते हैं। हालाँकि चित्त जो ज्ञान से भरा हुआ है और जब भौतिक शरीर में विवश है, ज्ञान और आनन्द जो जीवात्मा के लिये मूलभूत है अचित्त से ढ़क जाता है। यह अचित विपरीत ज्ञान को उत्तेजित कर सकता है। कुछ समय बाद हम इसे विस्तृत रूप से देखेंगे।
  • सत्व शून्यम यह काल (समय) है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तत्वत्रय में यह समझाते है कि कुछ दार्शनिकों ने काल का तिरस्कार कर दिया है। परन्तु क्योंकि हम काल कि अस्तित्व सीधे तौर पर अनुभूति और शास्त्रों द्वारा महसूस कर सकते हैं, इसलिये काल को अस्वीकार करने का कोई प्रश्न ही नहीं आता है। काल एक ऐसा घटक है जो अचित्त को निरन्तर बदलाव के लिये सरल बनाता है। काल को भगवान के भूतकाल के उपकरण की तरह समझाया जाता है। काल का दोनों परमपदधाम और इस संसार में अस्तित्व है – जब कि परमपद में पूर्णत: आज्ञाकारी है (भगवान के पूर्णत: मुखोल्लास के लिये) और इस संसारके कार्य को नियंत्रण करने हेतु एक विशिष्ट भूमिका है।

मिश्र सत्वम के विषय पर अधिक जानकारी:

  • मूल प्रकृति (आदिकालीन विषय) एक ऐसी परिस्थिति हैं जहाँ पर सभी तीनों गुण –सत्व, रजस और तमस पूर्णत: संतुलित है। यह एक सूक्ष्म अवस्था है और यह तत्व जो भगवान का शरीर है। सृष्टि उत्पत्ति के समय जब गुणों का संतुलन बदल जाता है तब सूक्ष्म अवस्था टोस पदार्थ बनकर रंग बिरंगे नाम व रूप में बदल जाता है। सृष्टि के समय प्रकृति उपाधान कारणम है। भगवान के दिव्य संकल्प से सूक्ष्म स्थिति सकल बन जाती है। ऐसी अवस्था के इस तरह के बदलाव से २४ तत्त्वों का प्रार्दुभाव होता है। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते है कि “पोंगैम्पुलनुम पोरियैंन्थुं करुमेन्द्रियम ऐम्भूतं इंगीव्वुयीरेय पिरकिरुति मानान्गार मनंगले”। अनुवादक टिप्पणी: जैसे श्रुति में बताये गये अनुसार भगवान घोषणा करते हैं “बहु स्याम” – मैं अनन्त हूँ। इस प्रतिज्ञा के साथ जटिल पदार्थ को तत्क्षसृष्टिण रंग बिरंगी पूर्ण स्वरूप में बदल देते हैं। इन पदार्थ के २४ तत्त्वों को इस तरह समझाया जाता है।
    • पोंगैम्पुलन – वह जो हमारी इच्छाओं को बढ़ाता है – पञ्च तनमात्रा – इंद्रियाँ के ५ उद्देश – शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद, गंध।
    • पोरियैंन्थुं – वह जो हमें इच्छाओं के जाल में फँसाता है – पञ्च ज्ञानेंद्रियाँ – ज्ञान के ५ इंद्रियाँ – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक।
    • करुमेन्द्रियाँ – वह जो हमें इन इच्छाओं में निरत करता है – पञ्च कर्मेन्द्रियाँ – ५ कार्य करने के इंद्रियाँ – मुँह, हस्त, पैर, मल त्याग कि इंद्रियाँ, प्रजनन कि इंद्रियाँ।
    • ऐम्भूथम – पञ्च तन्मात्रा कि तिरुमाली – पञ्च भूत – ५ महान तत्व – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी।
    • मानस – मन
    • अहंकार – अहम
    • महान – पदार्थ जो स्पष्ट स्थिति को उजागर करता है।
    • मूल प्रकृति – पदार्थ जो अस्पष्ट स्थिति को उजागर करता है।
  • शब्द, रूप, स्वाद, गंध, स्पर्श ५ भिन्न अनुभव हैं। इन अनुभवों से आकर्षित होनेवाले ज्ञानेन्द्रियाँ भी पाँच हैं – कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक। कर्मेन्द्रियाँ जो इन इच्छाओं को रूप देता है वह भी पाँच है मुँह, हस्त, पैर, मल त्याग कि इंद्रियाँ, प्रजनन कि इंद्रियाँ। कोई भी स्वरूप पाँच तत्वों से बनता हैं – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी। अब तक हमने २० तत्व को देखा हैं। महान एक सिद्धान्त हैं जो जीवात्मा के परिश्रम को गती देता है। अहंकार – घमण्ड / आदर को गती देता है। मानस इच्छाओं को गती देता है। अन्त में मूल प्रकृति इस तरह २४ अचित्त तत्त्व हुये। २५वां तत्व जीवात्मा है और २६वां तत्व ईश्वर है।
  • जब पदार्थ के गुण सत्व, रजस और तमस गुण में समान मात्रा में वितरित होते हैं तब उस अवस्था को मूल प्रकृति कहते हैं। जब वह असंतुलित हो जाता है तब उसका असर प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख सकते हैं। जब ऐसा संतुलन खो जाता है तब पहिले महान प्रगट होता है। इसे महत तत्वम भी कहते हैं। जिस तरह किसी बीज को पानी में भिगोकर रखने के बाद जब बीज अंकुरित होता है ठीक उसी तरह हम इन तत्वों का वर्णन कर सकते हैं। यह महत तत्वम ३ अवस्थाओं में है – सात्विक, राजस और तामसिक। इन ३ महान अवस्थाओं से तीन प्रकार के अहंकार – वैकारिकम, तैजसम, भूताधि होते हैं। अहंकार एक ऐसा सिद्धान्त है जो वास्तविकता को घटाता है और भ्रम फैलाता है। उदाहरण के लिये शरीर और आत्मा को समान मानना एक ऐसी गलत फैमी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे तत्वत्रय में समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्याओं में पदार्थ के भिन्न भिन्न पहलुओं के लक्षणों के विषय में प्रमाण देकर समझाते हैं। सामान्यतया मूल प्रकृति को प्रधानम (प्रमुख अवस्था), अव्यक्तम (अस्पष्ट स्थिति) की तरह समझाते है। जब मूल प्रकृति को महत तत्वम में बदलते हैं – पदार्थ स्पष्ट अवस्था में आजाता है और उसका नाम, स्वरूप, आदि आजाते हैं। माहन से प्रारम्भ होकर प्रकृति २३ अन्य तत्वों में फैलती है।
  • वैकारिकम से दोनों कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती है और वे सूक्ष्म अवस्था में ही रहती हैं। मन भी वैकारिकम का एक उत्पादन है। भूताधि, पंचभूतम आदि जन्म लेते हैं। तैजसम वैकारिकम और भूताधि को अनेक बलाव में मदद करते हैं।
  • भूताधि से पंचतनमात्रा (ज्ञान का अनुभव करनेवाले पदार्थ) जो पंचभूत के सूक्ष्म पहलुओं के निर्माण होते है और यहाँ उनका अनुक्रम समझाया जायेगा। भूताधि से प्रथम शब्द तनमात्रम प्रगट होता है। यह आकाश (रंग रहित द्रव्य) कि स्पष्ट स्थिति है। शब्द तनमात्रम से आकाश और स्पर्श तनमात्रम प्रगट होते है। स्पर्श तनमात्रम से वायु और रूप तनमात्रम प्रगट होते है। रूप तनमात्रम से अग्नि और रस तनमात्रम प्रगट होते है। रस तनमात्रम से गन्ध तनमात्रम और जल प्रगट होते है। गन्ध तनमात्रम से पृथ्वी प्रगट होते है। अनुवादक टिप्पणी: तैत्रिय उपनिषध में इसे इस तरह समझाया है “आकाशात वायु:, वायोर अग्नि:, अग्नियैर आप:, अभय: पृथ्वी …” – आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी और इस तरह आता है। इस प्रक्रिया को सामान्यतया पंचीकरणम (पाँच तत्वों का मिश्रण) कहते हैं।
  • इस तरह सृष्टी के एक अंश अनुसार भगवान २४ तत्वों का प्रयोग कर पहिले कई ब्रह्माण्डों का निर्माण करते है और एक बार इन ब्रह्माण्डों का निर्माण हो जाता है तब अप्रत्यक्ष रूप से ब्रह्माजी द्वारा कई प्रजातियों का निर्माण करवाते हैं। अनुवादक टिप्पणी: सृष्टि को ब्रह्माजी द्वारा इन भागों में विभाजित किया जाता है जैसे अद्वारक सृष्टि – स्वयं भगवान द्वारा निर्मित और सध्वारक सृष्टि – ब्रह्माजी, ऋषि, आदि द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से भगवान द्वारा निर्मित। जब तक ब्रह्माण्ड का निर्माण हो जाता है यह स्वयं भगवान के द्वारा होता है। एक बार ब्रह्माण्ड का निर्माण हो जाता है तब वे हर प्रत्येक ब्रह्माण्ड के लिये एक ब्रह्म को उत्पन्न करते हैं और ब्रह्माण्ड में आगे कि उत्पत्ति के लिये उनकी सहायता करते है। ब्रह्मा, सप्त ऋषि, मनु, आदि सभी को प्रजनन की क्रिया में व्यस्त कर ब्रह्माण्ड में विविध रंग बिरंगी जातियों और रूपों में उत्पत्ति करते हैं, उन्हें ब्रह्माण्ड में देखा जा सकता है। यह समझाया गया हैं कि ऐसे कई ब्रह्माण्ड हैं और सभी ब्रह्माण्ड को एक ब्रह्मा का नेतृत्व प्राप्त है। इस तरह हम समझ सकते हैं कि यह भौतिक संसार खुद ही बहुत विस्तृत है और हमारी कल्पना के बाहर है। परमपदधाम को सामान्यतया त्रिपाद विभूति (संसार से ३ गुणा बड़ा) ऐसा समझाया गया है। साथ ही सृष्टी जो हम देखते हैं वह आवर्ती मात्र है। वहाँ पर सृष्टी, स्थिति और संहार है। इस तरह के अनंत चक्र काल से है जिसका न प्रारम्भ है और न अन्त है।

इस प्रस्तावना के साथ ही हम शेष बाधाओं के इस विभाग में विस्तृत रूप से जानेंगे।

  • आकाश (रंग रहित द्रव्य) एक आवरण अभावम (जिसकी कोई सीमा नहीं है) और शाश्वत, निरन्तर, अविभाज्य और सर्वव्यापी है ऐसा समझकर घबराना बाधा है। आकाश पंचभूतों में से एक है जिसका निर्माण सृष्टी के एक भाग के रूप में सृष्टी के संग ही हुआ है। इसलिये उसे शाश्वत, निरन्तर, अविभाज्य नहीं समझ सकते हैं।
  • दिशा एक अलग पदार्थ है और इससे घबराना बाधा है। दिशाएँ जैसे पूरब, पश्चिम, आदि भिन्न पदार्थ नहीं है। चेन्नई में निवास करनेवाले के लिये श्रीरंगम दक्षिण में है। परन्तु आल्वार तिरुनगरी में निवास करनेवाले के लिये श्रीरंगम उत्तर में है। इसलिये यह तुलनात्मक है। अनुवादक टिप्पणी: तत्वत्रय के १२७वें सूत्र के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि वैशेषिका, आदि दिशा एक अलग पदार्थ जैसे पृथ्वी ऐसा नहीं समझाते है। इस विषय पर विद्वानों से अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • काल का अलग से कोई अस्तित्व नहीं हैं इससे घबराना बाधा है। काल निमिष, मणि, मुहूर्तम, आदि के नाम से जाना जाता है। यह सभी समय के परिवर्तन पर आधारित है, इस संसार में सब कुछ परिवर्तन शील है। “कालो ही धुरतिक्रम:”- (समय का प्रभाव अवश्यभावी है) यह प्रसिद्ध पद है। अनुवादक टिप्पणी: तत्वत्रय के १२५वें सूत्र के व्याख्या के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दर्शाते है कि बौद्ध, आदि काल के उत्पत्ति को स्वीकार नहीं करते है। अगले सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी दर्शाते है कि क्योंकि काल दोनों अनुभूति और शास्त्र से समझा जा सकता है, ऐसे तत्त्व जो काल के अस्तित्व को ही नहीं मानते हैं उन्हें हम कैसे स्वीकार कर सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र के व्याख्यान में बहुत ही सुन्दर उदाहरण से इस सिद्धान्त को स्थापित करते हैं।
  • वायु को देख नहीं सकते हैं, इससे घबराना बाधा है। हालाँकि वायु को देख नहीं सकते है लेकिन उसकी उपस्थिती को स्पर्श द्वारा महसूस किया जा सकता है, इसे अप्रत्यक्ष के तरह समझा नहीं सकते हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/10/virodhi-pariharangal-40.html

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