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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ४५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन – ४४)

श्रीपार्थसारथी भगवान श्रीदेवी, भूदेवी और श्रीगोदम्बाजी के साथ – सबसे अधिक विश्वसनीय और पूजनीय

७५) अविश्वास विरोधी – अविश्वास में बाधाएं

अविश्वास विरोधी यानि अविश्वसनीय संसारी, देवतान्तर और सामान्य शास्त्रों का विश्वास करना।

विश्वास यानि भरोसा, आस्था। यहाँ जिन पहलूओं को जिन्हें हमें विश्वास नहीं करना और कब विश्वास करना यह बाधा है ऐसा समझाया गया है। सामान्य शास्त्र – साधारण धर्म ग्रन्थ के अनुसार आदेश। हालाँकि प्रपन्नों को इनका पालन करना चाहिये फिर भी यदि सामान्य शास्त्र में विशेष धर्म (भगवद / भागवतों कि ओर गोपनीय कैंकर्य) का पालन करते समय यदि कुछ त्रुटियाँ है तो भी उन त्रुटियों को दोष नहीं मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस विषय पर पहिले भी हम विस्तृत से चर्चा कर चुके है। यहाँ ३ पहलूओं के प्रति विश्वास – संसारी, देवतान्तर और सामान्य शास्त्र को बाधा ऐसे दर्शाया गया है।

  • जब हम सांसारिक पहलूओं पर केन्द्रित होते हैं तब हम सांसारिक जनों के अहसान के लिये उन पर विश्वास करना बंद कर देते हैं। और ऐसे कार्यों में लगाने से इस संसार बन्धन में हम अधिक फँस जाते है। इसलिये संसारियों पर अधिक विश्वास करने से बचना चाहिये।
  • जहाँ तक देवतान्तर का प्रश्न है यह ब्रह्म, रुद्र, आदि सभी देवताओं से सम्बंधीत है। वें भी आत्मा हीं है। वैधिक कर्मानुसार हम देवताओं का सम्मान करते है इससे अधिक और कोई महत्व नहीं देते हैं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी एक घटना में इसे बहुत सुन्दर ढंग से समझाते हैं जब कोई उनसे प्रश्न करते हैं कि क्यों कुछ श्रीवैष्णव वैधिक कर्मानुसार देवताओं कि पूजा करने में निरत रहते हैं और कोई अन्य मंदिर में नहीं। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी समझाते हैं कि शास्त्रानुसार यज्ञ, संध्या वन्दन, आदि में हम इन देवताओ कि पूजा करते हैं जहाँ भगवान श्रीमन्नारायण अन्तर्यामि रूप में विराजमान हैं। परन्तु वे स्वयं भी क्योंकि दास आत्मा है जो अपनी स्वतन्त्रता को उजागर करते हैं और स्पष्ट रूप से श्रीमन्नारायण भगवान की श्रेष्ठता को जानते हुये भी उनसे झगड़ते है, भगवान उन्हें पूर्ण रूप से निकाल फेंकते हैं।
  • शास्त्र को सामान्य शास्त्र और विशेष शास्त्र में बांटा गया हैं। सामान्य शास्त्र शरीर और सामान्य दैनिंदनी अनुष्ठान जो वर्णाश्रम धर्म पर आधारित है पर केन्द्रित होता है। यह आवश्यक है। विशेष शास्त्र आत्मा और उसकी नित्य भगवान से सम्बन्ध पर केन्द्रित करता है। यह गोपनीय सेवा है जो भगवान और भागवतों कि किया करते हैं। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी श्रीतिरुपल्लाण्डु के “अत्ताणीच चेवकम” में ऐसे समझाते हैं। आचार्य हृदयम के ३१वें चूर्णिकै में अझगिया मणवाल पेरुमाल नायनार समझाते हैं – “अत्ताणी चेवगत्तिल पोधुवानतु नलुवुम”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्या में समझाते हैं कि जब हम भगवद / भागवत कैंकर्य में निरत रहते हैं तो सामान्य शास्त्र पीछे रह जाता है और उसे बाद में भी कर सकते है या टाला भी जा सकता हैं। इस विषय में अधिक https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/20/virodhi-pariharangal-10/ में चर्चा कर चुके हैं।

७६) संग विरोधी – सम्बन्ध या मित्रता में बाधाएं

जिसने भगवद ज्ञान प्राप्त किया हो और अन्य जैसे शैव, आदि के अनुयायियों से सम्बन्ध रखता हो।

संग यानि मित्रता, सम्बन्ध। भगवद ज्ञान यानि भगवान श्रीमन्नारायण कि श्रेष्ठता के प्रति सच्चा ज्ञान। अनुवादक टिप्पणी: भगवान के प्रति सच्चा ज्ञान का अर्थ वों हीं श्रेष्ठ है यह समझना और हम उनके नित्य दास हैं। एक बार यह सच्चा ज्ञान प्राप्त हो जाता हैं तो हमारे रवैये में स्वाभाविक बदलाव आ जाता है। जो भी भगवान को नकारता है या अपमान करता है तो हम ऐसे जनों से स्वाभाविक रूप से मित्रता नहीं करते हैं। सच्चा ज्ञान आचार्य और भगवान के कृपा आर्शिवाद से प्राप्त होता हैं। जिसके पास सच्चा ज्ञान नहीं हैं वह भगवान कि श्रेष्ठता को स्वीकार नहीं कर सकता हैं। हमें ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। यहाँ यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि एक श्रीवैष्णव होने के कारण हमारा कर्तव्य बनता है कि हमें ऐसे अनुकूल व्यक्ति जिन्हें भगवान के विषय में जानने कि जिज्ञासा हो और उनकी पृष्ठ भूमिका पर अधिक ध्यान न देते हुये समझाना चाहिये क्योंकि इस सच्चे ज्ञान को बांटने से हम किसी को उसके सच्चे स्वभाव को जानने में बहुत बड़ी सहायता करते हैं।

७७) सन्तान विरोधी –  सन्तान विरोधी में बाधाएं

यदि स्वयं की सन्तान भी भगवद, भागवत और आचार्य का अपमान करता है तो ऐसे सन्तान को न त्यागना बाधा है। ऐसा वराह पुराण में समझाया गया है:

माजनिष्ठा स नो वम्सेजातों वात्राक्विश्रुज्यताम

आजान्ममरणम यस्य वासुदेवों नदैवतम

संतानम – स्वयं के बच्चे। यदि हमारे स्वयं के बच्चे चाहे पुत्र / पुत्री अगर वो भगवद, भागवत और आचार्य के प्रति अपचार करता है तो हमें उसका त्याग करना चाहिये। ऐसे सम्बन्ध को तोड़ देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: एक प्रपन्न के लिये यह मुख्य हैं कि वें अन्य हितकारी प्रपन्नों से हीं हिल मिले, यह सुनिश्चित करना बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे बच्चे या हमारे संबंधियों के सन्तान अगर वें भगवद, भागवत और आचार्य के प्रति घमण्ड से कोई कार्य करें तो वह सहन नहीं करना चाहिये। हालाँकि हमें बच्चों को सही ज्ञान और मार्गदर्शन देना चाहिये। परन्तु जब ऐसे कोशिश विफल हो जाती है तो सम्बन्ध नहीं रहता हैं। हम इन उदाहरण के साथ यह देख सकते है।

  • प्रह्लादजी भगवान श्रीमन्नारायण के बहुत बड़े भक्त थे। उनके पौत्र महाबली ने भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति यह भक्ति उनसे प्राप्त किया। परन्तु लालच के कारण उन्होंने इन्द्र का धन ले लिया और भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति अपराधिक कार्य किया। यह देख प्रह्लादजी ने उन्हें समझाने का प्रयास किया परन्तु वह बहरे कानों में गिर गया और स्वयं उन्होंने श्राप दिया कि वह अपनी पूर्ण संपत्ति खो देगा।
  • जब भगवान श्रीराम को माता कैकयी के कहने पर वनवास भेजा गया था तो वहाँ श्रीभरतजी नहीं थे। उनके लौटने पर जब उन्हें यह पता चला कि वह कैकयी थी जिसने श्रीराम को वन में भेजा तो उसी क्षण उसने माता का त्याग कर दिया।
  • जब रावण ने माता सीता का हरण किया तो विभीषणजी ने अपने बड़े भैया को माता को श्रीराम को लौटा देने को कहा। परन्तु रावण ने विभीषण कि नहीं सुनी। कई बार प्रयास करने के पश्चात विभीषण अंत में रावण का सब कुछ छोड़कर उसका त्याग कर श्रीराम के निकट जाकर पूर्णत: उनके शरण हो गया। अंत में उन्होंने रावण को मारने के लिये श्रीराम कि सहायता की।

७८) वर्ण विरोधी – वर्णाश्रम संबन्धित बाधाएं

किसी के वर्ण के विपरीत कार्य करना बाधा है।

वर्णाश्रम मनुष्य के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और क्षुद्र के आधार पर किया गया है। सभी मनुष्य को शास्त्रानुसार उनके लिये बताये कार्यों को ही करना चाहिये। किसी को भी अपने वर्ण के विपरीत कार्य नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: इस विषय को विस्तार से चर्चा कर चुके हैं https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2018/11/05/virodhi-pariharangal-34/ । सभी वर्ण में कुछ कर्तव्य होते हैं। भिन्न भिन्न वर्ण के मुख्य कार्य हैं:

  • ब्राह्मण के लिये ६ मुख्य कार्य पहचाने गये हैं। अध्ययन (वेदों को पढ़ना), अध्यापनम (अन्य को वेद सिखाना), यजनम (स्वयं के लिये यज्ञ करना), याजनम (अन्य के लिये यज्ञ करना), दान (दान देना), परिग्रह (दान स्वीकार करना)।
  • क्षत्रिय के लिये अध्ययन (वेदों को पढ़ना), यजनम (स्वयं के लिये यज्ञ करना) और दान (दान देना) कार्य लागू हैं। अन्य को वेद सिखाना, अन्य के लिये यज्ञ करना और परिग्रह (दान स्वीकार करना) यह लागू नहीं है। परन्तु इसके स्थान पर उन्हें शस्त्र का उपयोग करना, नागरिकों की रक्षा करना और राष्ट्र का काम देखना पड़ता है।
  • वैश्य के लिये भी अध्ययन (वेदों को पढ़ना), यजनम (स्वयं के लिये यज्ञ करना) और दान (दान देना) कार्य हीं लागू हैं-अन्य को वेद सिखाना, अन्य के लिये यज्ञ करना और परिग्रह (दान स्वीकार करना) यह लागू नहीं है। परन्तु इसके स्थान में इन्हें खेती, गौ पालना, बिज़नस, आदि करना चाहिये।
  • क्षुद्र केवल अन्य ३ वर्ण के लोगों की सहायता करता हैं।

श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २७६, २७७ और २७८ सूत्र में कैंकर्य के विषय में समझाते हैं। पहिले २७६ सूत्र में कहते हैं “कैंकर्य दो प्रकार कि है”। सूत्र २७६ में कहते हैं “वें उन्हें जो अनुकूल हैं उसे करते हैं और जो प्रतिकूल कार्य हैं उससे बचते हैं”। २७७ सूत्र में कहते हैं “अनुकूल और प्रतिकूल किसीके वर्ण, आश्रम और सच्चे स्वभाव जैसे जीवात्मा पर आधारित है”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस सूत्र के लिये विस्तृत व्याख्या द्वारा समझाते हैं। वें कहते हैं हमें सभी कैंकर्य (नित्य, नैमितिक कर्मानुष्ठान और भगवद/भागवत का कैंकर्य) निस्वार्थ भाव से भगवान कि सेवा समझ करना चाहिये। यहाँ तक कि वर्णाश्रम धर्म का पालन करना भी भगवान का कैंकर्य की तरह समझना चाहिये और हमारे शेष कार्य शास्त्रों और आचार्य द्वारा सिखाये मार्गानुसार भगवान की दिव्य इच्छानुसार होनी चाहिये।

७९) जप विरोधी – मन्त्र जाप में बाधाएं

मूल मन्त्र के जाप के समय अपना ध्यान भगवान श्रीमन्नारायण जो इन मंत्रो के देवता है कि ओर केन्द्रित न करके सांसारिक अनुकूलता और अन्य देवताओं को स्मरण करना बाधा है।

मूल मन्त्र – श्रीअष्टाक्षर महमन्त्र। “मंतारम त्रायति इति मंत्र:” – वह जो किसी कि रक्षा करता है जो उसका ध्यान देता है उसे मन्त्र कहते हैं। हमें मन्त्र के देवता की ही जानकारी होनी चाहिये और उसका ध्यान करना चाहिये। भगवान श्रीमन्नारायण श्रीअष्टाक्षर महामन्त्र के देवता हैं। अन्य कि ओर ध्यान देना या कैंकर्य छोड़ अन्य कोई लाभ लेने से मन्त्र का कोई फल नहीं मिलेगा। अनुवादक टिप्पणी: हर मन्त्र के ३ मुख्य पहलू होते हैं – चन्दा, ऋषि (जो मन्त्र का प्रचार करता है) और देवता (मन्त्र जिनके लिये जपा जाता है)। मुमुक्षुप्पडि में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४ सूत्र में दर्शाते हैं – मंत्रत्तिलुम मंत्रत्तुक्कु उल्लिडान वस्तुविलुम मंत्र प्रदनान आचार्यन पक्कलिलुम प्रेमम गनक्क ऊणडानाल कार्यकरमावतु श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि शिष्य को मन्त्र, भगवान और आचार्य में पूर्ण विश्वास होना चाहिये और इन तीनों के प्रति पूर्ण लगाव विकसित करना चाहिये। वें उसके समान एक सुन्दर संस्कृत श्लोक भी कहते हैं जो वहीं तत्व बताता है – मंत्रे तत देवतायांच तथा मंत्रप्रदे गुरौ, त्रिशू बकतीस सधाकार्या सा ही प्रथम साधनम। अत: मन्त्र के सभी पहलूओं को समझकर जाप करने से अधिक लाभ प्राप्त होगा। श्रीसहस्रगीति जो द्वय मन्त्र का अर्थ समझाता है को ध्यान लगाकर निरन्तर जाप करना चाहिये। हम श्रीएरुम्बी अप्पा के पूर्व दिनचर्या में पहचान सकते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी निरन्तर द्वय महामन्त्र का जाप करते थे और उसे श्रीसहस्रगीति के अर्थ के आधार पर जाप करते थे। इसे ९वें श्लोक में देख सकते है “मन्त्र रत्न अनुसन्धान …”। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २७४ सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भी दर्शाते है “जपतव्यम गुरूपरंपरैयुम द्वयमुम” – गुरूपरम्परा मन्त्र और द्वय महामन्त्र का निरन्तर जाप करना चाहिये।

८०) आराधना विरोधी – पठन में बाधाएं

निस्वार्थ भाव से सिर्फ अपने सही लक्षणों की पूर्ति के लिये भगवान का तिरुवाराधन करने के सिवाय भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिये सांसारिक पदार्थ जो दोषपूर्ण है जैसे जाति, आश्रय, निमित्त और शास्त्र में जो निषेद हैं जैसे मांस, मदीरा, आदि तिरुवाराधन में अर्पण करना बाधा है।

तिरुवाराधन के समय बिना कुछ अपेक्षा किये भगवान की पूजा करनी चाहिये। भगवान की पूजा का परिणाम हीं सुखद पूजा है। यह सामान्य और सबकी जानकारी का ही नियम है – “यदन्न: पुरुषोभवती तदन्नस तस्य देवता” – शास्त्रानुसार हम जो भी पाते है उसे पहिले अपने भगवान को अर्पण कर फिर पाना चाहिये। उदाहरण के लिये एक सन्यासी जिसे सुपारी और ताम्बूल खाना वर्ज है वह भगवान को तिरुवाराधन में अर्पण नहीं कर सकता है। यह हम अनुष्ठान विरोधी में चर्चा कर चुके हैं  (https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/03/20/virodhi-pariharangal-10/)।

अनुवादक टिप्पणी: तिरुवाराधन भगवान कि पूजा करने कि एक प्रक्रिया हैं। यह विस्तार से https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/09/04/srivaishnava-tiruvaradhanam/ में समझाया गया है। भगवान कि पूजा में बाधाएं भी https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2016/10/17/virodhi-pariharangal-16/ में समझाया गया है।

जब खाध्य पदार्थों का प्रश्न आता है तब इनके सेवन में ३ प्रकार के प्रतिबंध हैं – जाति दुष्ट अन्न (पदार्थ जो पाने योग्य नहीं है जैसे कि प्याज, लहसून, आदि), आश्रय दोष अन्न (सात्विक अन्न जो अवैष्णव के सम्पर्क में आया हैं) और निमित्त दोष अन्न (गंदे/वर्जित पदार्थ)। यह विस्तार से https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/2017/12/02/virodhi-pariharangal-23/ में समझाया गया हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/11/virodhi-pariharangal-45.html

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