अन्तिमोपाय निष्ठा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्री वानाचल महामुनये नमः

शास्त्र यह स्थापित करता है कि भगवान् का निरंतर कैङ्कर्य (सेवा) करना जीवात्मा का अंतिम लक्ष्य है। लेकिन जब कैङ्कर्य प्राप्ति के साधनों की बात आती है, तो कई रास्तों को परिभाषित किया जाता है। भक्ति और प्रपत्ति को कैङ्कर्य प्राप्ति करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। लेकिन भक्ति और प्रपत्ति से परे, आचार्य पर पूर्ण निर्भरता को अंतिम आशीर्वाद प्राप्त करने का अंतिम और सबसे सरल मार्ग माना जाता है।

आचिनोति यः शास्त्रार्थम् आचरे स्थापयत्यपि
स्वयं आचरते यस्माद् आचार्यस् तेन कीर्तितः

सरल अनुवाद — आचार्य वह है जो शास्त्रों को पूरी तरह से समझता है, शास्त्रों में दिए गए सिद्धांतों को स्थापित करता है और वह स्वयं उसी का अभ्यास करता है।

श्री वरवरमुनि (मामुनिगल) के ईड् कालक्शेप गोशठी और श्री रङ्गनाथ भगवान (नमपेरुमाल) श्री वरवरमुनि को सम्मानित कर रहे हैं

हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा यह भी समझाया गया है कि शास्त्र पर आधारित, एक अाचार्य को श्रीमन्नारायण के प्रति पूर्ण निष्ठावान होना चाहिए और पूरी तरह से श्रीमन्नारायण के वर्चस्व को स्वीकार करना चाहिए। अाचार्य को विशुद्ध रूप से ज्ञान, भक्ति (प्रेम भक्ति) और वैराग्य (पृथक्करण) में स्थित होना चाहिए और उपायान्तर (अन्य किसी भी या अन्य साधन को श्रीमन्नारायण के अलावा), उपेयान्तर (अन्य किसी भी लक्ष्य को श्रीमन्नारायण की सेवा के अलावा और अपने भक्त) और देवतान्तर (अन्य देवतों के लिए कोई लगाव) से निवृत्त होना चाहिए । हमारे पूर्वाचार्य इन सभी विशेषताओं से चिह्नित देदीप्यमान उधारण थे।

पिल्लई लोकाचार्य, श्री वरवरमुनि, श्री भट्टनात मुनि

पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी पूर्वाचर्यों द्वारा शिक्षित शास्त्र सम्मत सार को श्रीवचनभूषण दिव्य शास्त्र में प्रस्तुत करते है। अंत में, वह अंततः स्थापित करते हैं कि “आचार्य अभिमानमें उत्तारकम्“, जिसका अर्थ है कि आचार्य की शिष्यों के प्रति दया कैङ्कर्य प्राप्ति की अंतिम आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए शिष्यों का अंतिम मार्ग है । इस सिद्धांत को अनेक उदाहरणों के माध्यम से परवस्तु पट्टर्पिरान जीयर (श्रीवरवरमुनि के प्रमुख शिष्यों में से एक) ने अपने “अन्तिमोपाय निष्ठा” नामक दिव्य ग्रंथ में प्रतिपादन किया है । अंतिम = परम (चरम) / अंत, उपाय = पथ (साधन) और निष्ठा = दृढ़ विश्वास / निर्भरता। इसका अर्थ है “आचार्य (परम पथ (साधन)) पर पूर्ण निर्भरता”। परवस्तु पट्टर्पिरान जीयर स्वयं कहते है कि, यह पूरा ग्रन्थ श्रीवरवरमुनि के प्रत्यक्ष निर्देशों पर आधारित है और वह सिर्फ पेन / ताड़ के पत्तों की तरह है जो उनके आचार्य के शब्दों को दस्तावेज करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह नम्म्पिळ्ळै के ईडु के समान है, जिसे नम्म्पिळ्ळै ने स्वयं पढ़ाया था लेकिन वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै द्वारा दर्ज़ किया गया था। इसलिए, लेखक के अनुसार इन्हें श्रीवरवरमुनि के प्रत्यक्ष निर्देश के रूप में माना जाना चाहिए।

यह आचार्य निष्ठा विशेष रूप से पसंदों में प्रकट हुई थी, मधुरकवि आऴ्वार का नम्माऴ्वार के प्रति, आण्डाल का पेरियाऴ्वार के प्रति, दैववारि का आळवन्दार के प्रति, वडकु नम्बी का एम्पेरुमानार के प्रति, इत्यादि, कुछ नाम है। इस निष्ठा को भी चरम पर्व निष्ठा (विश्वास में अंतिम स्तर) के रूप में भी कहा जाता है। जबकि भगवान् पर कुल निर्भरता को प्रथम पर्व निष्ठा (विश्वास में प्रारंभिक स्तर) कहा जाता है, आचार्य पर कुल निर्भरता को चरम पर्व निष्ठा कहा जाता है। हमारे आऴ्वारों और आचार्यों ने अपने कई दिव्य प्रबन्धों और श्री सुक्ति में चरम परव निष्ठा पर कई मूल्यवान निर्देश दिए हैं।

यह ग्रन्थ मणिप्रवाल शैली में है (तमिळ् और संस्कृत शब्द का मिश्रण) और कई अन्य पूर्वाचार्यो के ग्रन्थों मे कई तरह लंबे वाक्य हैं, वाक्यांशों को सीधे अनुवाद करना मुश्किल है। अडियेन हर अनुभाग / पैराग्राफ के सार को जितना संभव हो मूल पाठ के करीब प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा।

बहुत विशेष सह-घटना – एम्पेरुमान् की दिव्य इच्छा से यह अनुवाद प्रयास १८ (18) लेखों में चला गया जो कि भागवद गीता के १८ (18) अध्यायों के समान है। १८ वें अध्याय में एम्पेरुमान् ने आत्मसमर्पण की महिमा का खुलासा किया, यहां भी अंतिम लेख में, आचार्य के प्रति समर्पण की महिमा प्रकट होती है। और भी अधिक विशेष है कि इस श्रृंखला का समय आळवन्दार की वार्षिक तिरुनक्षत्र दिवस के समय समाप्त हो रहा है। आळवन्दार पूरी तरह आचार्य निष्ठा में स्थित थे और अपने दैवीय भावनाओं को अपने स्तोत्र-रत्न में श्रीनाथमुनि की ओर प्रकट किया – इस दैवीय ग्रंथ “अन्तिमोपाय निष्ठा” को याद कर और इसका आस्वादन करने का उपयुक्त दिन हमारे लिए है ।

अडियेन् उन सभी श्रीवैष्णवों का बहुत आभारी है जिन्होंने मुझे इस तरह के लेखों को लिखने में प्रोत्साहित किया और करते रहे हैं। ऐसे श्रीवैष्णवों के आशीर्वाद के साथ, हमारे पूर्वाचार्यों, आऴ्वार और श्री-भू-नीला समेत एम्पेरुमान्, अडियेन इस पुस्तक को विशाल श्रीवैष्णव समुदाय को पेश कर रहे हैं।

अडियेन आभारी हूँ, श्रियःपति, आऴ्वारों और आचार्यों का के अडियेन को इस छोटे कैङ्कर्य को अस्मदाचार्य श्रीमद् परमहंस वानमामलै पट्टरपिरान रामानुज जीयर् (२९वीं पट्टम्) के कर-कमलों में समर्पित करने दिया।

अडियेन् श्री रङ्गनाथ स्वामी (बैंगलोर – http://antaryami.net  वेबसाइट के संपादक) के लिए ऋणी है, जिन्होने कुछ संस्कृत श्लोकों और प्रमाण के लिए ठीक समय पर और सुंदर अनुवाद प्रदान किया।

आइये इस लेख में इस दिव्य ग्रंथम का आनंद लें, जो हमारे पुर्वाचार्यों की महिमा इस पहलू में स्पष्ट रूप से समझाते हैं।

इस श्रृंखला में सभी लेखों वाले ईबुक –

अडियेन भरद्वाज रामानुज दासन्

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