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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ३०

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २९

६४) सख्य विरोधी – मित्रता में बाधाएं

सभी जनों के प्रति श्रीकुरेश स्वामीजी की दयाभाव के कारण उनकी बहुत प्रशंसा है

सख्य का अर्थ मित्रता / परिचित है। मित्रता अर्थात एक दूसरे के प्रति हितकारी भावना। शत्रुता न दिखाना मित्रता की ओर पहला कदम है। सात्विक जनों (भागवत – भगवान श्रीमन्नारायण के भक्त) की ओर मित्रता और आदर दोनों होना चाहिये और वह जो पवित्र ज्ञान से भरा हो, नित्य दिनचर्या में यथार्थ ज्ञान का प्रयोग करना है। हमें यह समझना चाहिये कि सच्ची मित्रता पवित्र है। भगवान श्रीराम का श्रीगुहा के साथ मित्रता को अध्यात्मिक समझना चाहिये। उनकी सुग्रीव महाराज के साथ मित्रता भी ऐसी ही है। अनुवादक टिप्पणी: दो प्रकार की मित्रता है। एक शारीरिक वेदिका पर आधारित – हम उनसे मित्रता करते हैं जो हमारे शरीर का पोषण करते है अथवा हमारे शरीर पर अनुग्रह करते है। उदाहरण के लिये जब हम गिरते हैं तो कोई हमें उठाता है और हम उससे मित्रता करते हैं। या हमारे साथ पढ़नेवाले के साथ हम मित्रता करते हैं। फिर अध्यात्मिक वेदिका पर भी मित्रता होती है – अर्थात यह समझना कि हम सभी भगवान और भागवतों के दास हैं और ऐसे भागवतों के साथ मित्रता करना जो हमारे मन को समझते हैं। इन भागवतों को आत्म बन्धु (जो आत्मा से सम्बंधित हैं) कहते हैं। सच्चे भागवत निरन्तर भगवद विषय की चर्चा करते हैं, भगवान/ आल्वार/ आचार्य, आदि के सुन्दर अनुभव को सभी के साथ बाँटते हैं। ऐसे भागवतों के साथ मित्रता प्रशंसनीय है क्यूंकि इस लीलाविभूति में हमारे अन्त श्वास तक वे ही हमारे साथ रहेंगे। सांसारिक जनों के साथ मित्रता का त्याग करना चाहिये क्योंकि वे हमें इस संसार में खींचते हैं और सांसारिक कार्य में लगाते हैं।

  • नीच सांसारिक जनों से मिलना बाधा है। यह वे हैं जो निरन्तर भोजन, मकान, कपड़ा, आदि के पीछे भागते हैं। वे हमेशा सांसारिक कार्य में लगे रहते हैं और ऐसे जनों में घुलना मिलना अर्थात समय नष्ट करना है और यह हमें हमारे अध्यात्मिक जीवन में उन्नत्ती करने से रोकते हैं।
  • महान भागवतों से मित्रता करना और उन्हें अपने बराबर मानना बाधा हैं। हमें कभी भी अन्य श्रीवैष्णवों को अपने बराबर नहीं समझना चाहिये – उन्हें हमेशा उच्च स्थान देना चाहिये। फिर भी हमें उनसे मित्रता रखनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्यशास्त्र के २२२ से २२५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भागवतों से कैसे व्यवहार करें यह समझाते हैं। हमें भागवतों को पने आचार्य के समान, यहाँ तक की स्वयं और भगवान से भी उच्च मानना चाहिये। भागवतों के प्रति आदर न होना अपचार माना गया है।
  • भागवतों से मित्रता रखना और उनमें दोष देखना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्यशास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसे पूर्ण विस्तार से समझाते हैं। हमें किसी में (संसारियों में) भी दोष नहीं देखना चाहिये। हमें हमेशा स्वयं में ही सभी गलतियों को देखना चाहिये। तिरुप्पावै के १५वें पाशुर में आण्डाल अम्माजी कहती हैं “नाने दान आयिडुक” (सभी दोष मेरे ही रहने दो)। श्रीरामायण में जब श्रीभरतजी अयोध्या से लौटते हैं और उन्हें जब ज्ञात होता है कि भगवान राम वन के लिये चले गये हैं और श्रीदशरथजी परमपद को प्राप्त हुए है तो वह पहले कैकयी के पास जाते हैं। वह पूरी घटना के लिये दशरथजी, कैकयी, मंथरा, आदि को दोष देते हैं परन्तु अन्त में कहते हैं “यह मेरे स्वयं के दोष हैं जो मुझे भगवान से बिछड़ने की परिस्थिति में लाये हैं”। ऐसी स्थिति से उभरना बड़ा कठिन है परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों ने हमारे लिये यह राह बनायी है और हम ऐसे भाव की चाह कर सकते हैं।
  • यह मानना की सबकुछ/सभी जन भगवान की वस्तु / सेवक हैं। सभी को सभी के साथ मित्रतापूर्वक रहना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान ही इस नित्यविभूति और लीलाविभूति के स्वामी हैं। और हर एक जीवात्मा किसी न किसी तरीके से भगवान की ही सेवा कर रही हैं। अगर एक आत्मा को अपने सच्चे स्वभाव का अनुभव हो जाता है तो वह भगवान की सेवा अपने प्राकृतिक स्थान पर रहकर सीधे कर सकता है। अगर आत्मा को अपने सच्चे स्वभाव का अनुभव नहीं होता है तो वह भगवान की सेवा अनुचित ढंग से करता है (जैसे देवतान्तर, माता-पिता, मित्र, सम्बन्धी, स्वयं के शरीर, आदि)। यह समझकर एक श्रीवैष्णव को प्राकृतिक दया दिखानी चाहिये और अन्य को अध्यात्मिक विषय में मदद करनी चाहिये।
  • अन्य जीवात्मा की ओर बैर की भावना रखना, जो भगवान के ही शेषी हैं, बाधा है। यह देखना चाहिये कि सबकुछ/ सभी में भगवान अंतरयामी होकर प्रवेश करते हैं – ऐसे व्यक्ति जिनकी ऐसी दृष्टी हो वे महान ज्ञानी हैं। अत: सभी को सभी से मित्रता रखनी चाहिये और किसी से दुश्मनी नहीं करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवान सबकुछ / सभी में अंतरयामी होकर प्रवेश करते हैं। चित और अचित दोनों में भगवान ही प्रवेश करते हैं – इसे भगवान का सर्व व्यापकत्वम ऐसा समझाया गया है। शरीर का अर्थ देह है और शरीरि का अर्थ हैं जो शरीर में है। शास्त्र कहता हैं “यस्य आत्मा शरीरं, यस्य पृथ्वी शरीरं, …” (आत्मा उसी का शरीर है, धरती उसी का शरीर है, आदि)। जैसे जीवात्मा एक शरीर में है वैसे ही भगवान उस जीवात्मा में हैं। अत: यह समझना कि सबकुछ /सभी का शरीर भगवान का है हमें दूसरों से बैर नहीं करना चाहिये। भगवान स्वयं गीता में कहते हैं “सुकृतं सर्व भूतानाम्” (मैं सभी का मित्र हूँ)। हमारे आचार्य भी सभी की ओर बहुत अनुकम्पा दिखाते थे ओर भगवान के पवित्र सन्देश का प्रचार करते थे।
  • श्रीवैष्णवों के साथ मित्रता कर उनको दुख या धोखा देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ जन बाहर से अच्छे मित्र दिखते हैं परन्तु भीतर से दूसरों के प्रति उनमें घृणा भावना होती है। और ऐसी भावना चेतना या अवचेतना दोनों स्थितियों में बाहर आ जाती हैं। ऐसे आचरण की यहाँ निन्दा की गयी है।
  • कुछ चाह कर किसी से मित्रता करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अगर कोई किसी से कोई चाह करके मित्रता करता है तो ऐसे आचरण को यहाँ नीचे देखा गया है। मित्रता प्रेम के आधार पर होनी चाहिये जिसमें किसी से कोई अपेक्षा नहीं होनी चाहिये।
  • दूसरों की गलतियों को भी उनके अच्छे गुण के समान मानना चाहिए, ऐसा न करना बाधा है। गहरे मित्रों के संग उनके दोष को भी अच्छे गुण माना जाता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी तीनों तत्वों (चित – जीवात्मा, अचित – वस्तु, ईश्वर – भगवान) को तत्वत्रय में विस्तार से समझाते हैं। ईश्वर प्रकरणम भाग में सूत्र १५० तक भगवान के कई सुन्दर गुणों को समझाया गया हैं विशेषकर १५१वें सूत्र में वात्सल्य गुण जहाँ भगवान अपनी पत्नी श्रीमहालक्ष्मी और नित्यसूरियों से भी अधिक अपने नवीन भक्तों के प्रति गहरी मित्रता और लगाव दिखाते हैं। इस भाग में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते हैं कि जैसे एक गाय अपने बछड़े को अपने सींग से धकेलती है परन्तु अपने अभी जन्मे बछड़े से प्रेम करती है भगवान वैसे ही अपने शरण में आये हुए से बड़ा प्रेम करते हैं। श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ज्ञानसारम के २५वें पाशुर में समझाते हैं “एट्रे कन्रिन् उडम्बिन वलुवन्रो कादलिप्पदु अन्रदनै ईन्रुगन्द आ” – जब एक गाय बछड़े को जन्म देती है तो उस बछड़े के शरीर पर लगी गंदगी को अपनी जीभ से साफ करती है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी एक और विशेष उदाहरण देते हैं – वे कहते हैं एक पुरुष प्रेमी को उसकी प्रेमीका का पसीना पसन्द आता है उसी तरह भगवान हमारे उन दोषों पर ध्यान न देकर हमसे प्रेम करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या में बड़ी सुन्दरता से कई उदाहरण के साथ समझाते हैं। उसी तरह हमारे आचार्य अन्य श्रीवैष्णवों में कुछ दोष हैं तो भी उनके गुणों की प्रशंसा किये हैं और उन्हें सकारात्मकता से लिये हैं।
  • जो हमारे प्रति प्रेम भाव रखते हैं उन्हें प्रेम दिखाना और जो हमारे प्रति बैर रखते हैं उनके प्रति बैर रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी को सभी के साथ स्नेह के साथ रहना चाहिये न कि उनके साथ पक्षपात करना चाहिये।
  • जो अपने आचार्य के साथ दुश्मनी रखता हो उससे सम्बन्ध रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यद्यपि हमें सभी के प्रति करुणामय होना चाहिये परन्तु हमें भगवान और आचार्य से बैर रखने वालों से सावधान रहना चाहिये। आचार्य ही वे हैं जो जीवात्मा और परमात्मा के मध्य में सम्बन्ध को प्रज्वलित करते हैं। जीवात्मा और परमात्मा दोनों पर कृपा दृष्टी रखने के कारण उनकी बड़ी स्तुति होती हैं। जीवात्मा को उसके सच्चे स्वभाव को स्मरण कराते हैं कि वह भगवान का सेवक हैं। परमात्मा अपनी सम्पत्ति (जीवात्मा) को अपने निकट लाते हैं, जीवात्मा को सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में इसे समझाते हैं।
  • आचार्य के शिष्यों / भक्तों के साथ स्नेह सम्बन्ध न रखना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के अन्त में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ४५१वें सूत्र में समझाते हैं कि जिनमें आचार्य निष्ठा हैं उनको दूसरे आचार्य निष्ठावालों से हितकारी सम्बन्ध प्राप्त होता हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने व्याख्या में समझाते हैं कि उनके ऐसे सम्बन्ध से हमारी आचार्य निष्ठा में वृद्धी होगी अत: हमें ऐसे अधिकारी से ही मित्रता करनी चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/07/virodhi-pariharangal-30.html

संग्रहण- https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २९

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २८

६३) दास्य विरोधी – दासत्व में बाधाएं

 श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी – दास्य भाव के आदर्श उदाहरण। श्रीरामानुज स्वामीजी जो स्वयं आदि शेष अवतार है, वे दासत्व के श्रेष्ठ उदहारण है. श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति उत्तम सेवक के प्रत्यक्ष उदाहरण है।

दास्य का अर्थ पूर्णत: नियंत्रण में रहना – अर्थात स्वामी की सेवा में रहना। यहाँ यह समझाया गया है कि हम सभी जन भगवान श्रीमन्नारायण के सेवक हैं जो सभी के स्वामी हैं। “दास भूता: स्वतस्सर्वे ही आत्मन: परमात्मन:” यह शास्त्र में से एक मुख्य और प्रामाणिक प्रमाण है – इसका अर्थ सभी जीवात्मा परमात्मा के स्वाभाविक सेवक हैं जो सर्वस्वामी हैं – यहाँ “ही” का अर्थ प्रसिद्ध है। हमारी भगवान के प्रति सेवा निर्हेतुक और जीवात्मा और परमात्मा के मध्य नित्य सम्बन्ध पर आधारित है। इस संसार में दूसरों के प्रति हमारी सेवा औपाधिक है (एक विशेष कारण पर आधारित है जैसे हमारा कर्म हमें एक निश्चित जन्म/ सम्बन्ध की ओर ले जाता है और हम इस सम्बन्ध के कारण सभी की सेवा करते हैं)। भगवान के प्रति हमारी सेवा दो प्रकार की हैं “स्वरूप पर्युक्त दास्य” और “गुण कृत्य दास्य”। “स्वरूप पर्युक्त दास्य” का अर्थ है जीवात्मा की भगवान के प्रति सेवा जो परमात्मा के साथ नित्य सम्बन्ध के कारण है, क्योंकि केवल भगवान स्वामी हैं और जीवात्मा स्वाभाविक सेवक है, जीवात्मा भगवान की सेवा करता है। “गुण कृत्य दास्य” का अर्थ जीवात्मा का भगवान के कई शुभ गुणों के कारण उनकी सेवा करना (सामान्यता जब भी किसी के पास दया, सौन्दर्य, सुन्दरता, ज्ञान, धन, बल, आदि गुण हो तो उनकी सेवा करना सब चाहेंगे)। हम में दोनों तरह के दास्य विद्यमान हैं। क्योंकि भगवान हमारे नित्य स्वामी हैं हम उनकी सेवा करते हैं और क्योंकि उनके पास कई शुभ गुण हैं हम उनकी सेवा करते हैं। फिर भी स्वरूप पर्युक्त दास्य होना अधिक प्रधान और मुख्य है, क्योंकि यह जीवात्मा के लिये सामान्य है। अनुवादक टिप्पणी: इस दास्य तत्व को हमारे पूर्वाचार्यों ने बड़े विस्तार से समझाया है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति के ईडु महा व्याख्यान के पाशुर में बड़े विस्तार से समझाया है। इस पाशुर में श्रीपरांकुश नायकी की सहेली उनका ध्यान एक क्षण के लिये भगवान से दूर करने के लिये कहती हैं कि “भगवान कृष्ण बहुत बुरे, निर्दयी, आदि है” और देखती है कि कैसे उसे भगवान से बिछड़ने से दुख होता है। परंतु यह सुनते ही श्रीपरांकुश नायकी (श्रीशठकोप स्वामीजी स्त्री भाव में) अपनी सखी से कहती है अगर वो ऐसे भी हैं तो भी वह उन्हीं से प्रेम करेंगी क्योंकि यह उनका स्वभाव है। इस व्याख्या में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी स्वरूप पर्युक्त दास्य का तत्व विस्तार से समझाते हैं। श्रीरामायण से एक उदाहरण देते हैं कि जब माता सीता माता अनुसुया (श्रीगौतम महर्षि कि धर्म पत्नी) से मिलती हैं तो उनसे कहती हैं कि अगर भगवान श्रीराम इतने महान न होते तो भी वह उनसे इतना और इसी तरह प्रेम करती – क्योंकि यह उनके लिये स्वाभाविक है। श्रीपरकाल स्वामीजी ने भी पाशुर में इसे सुन्दरता से कहा है “वेम्बिन पुलु वेम्बनरी उण्णातु” – एक कीट जिसका जन्म नीम के फल में हुआ है वह बाहर जाकर गन्ने के रस के लिये तलाश नहीं करेगा – यद्यपि नीम कड़वा और गन्ने का रस मीठा है। वह कीट उसके और नीम के मध्य के सम्बन्ध के कारण नीम के फल को ही पायेगा। यही ही तत्व श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के १०८ से ११४वें सूत्र में समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने प्रवचनों में इन सूत्रों की व्याख्या से इतनी सुन्दरता से अपने पूर्वाचार्यों के तत्व को बताया है। इस प्रस्तावना के साथ हम इस भाग में आगे बढ़ते हैं।

  • स्वयं को स्वतन्त्र मानना और उस पर अभिमान करना बाधा है। यह बहुत बड़ी बाधा है। हमें यह समझना चाहिये कि हम पूर्णत: भगवान पर हीं निर्भर हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लैलोकाचार्य स्वामीजी मुमुक्षुप्पड़ी के ८३ और ८४वें सूत्र में इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से तिरुमन्त्र में “नम:” विषय द्वारा समझाते हैं। वे कहते हैं “नम:” (न मम – मेरे लिये नहीं) यह दिखाता है कि कोई भी स्वयं के लिये नहीं है परन्तु भगवान के प्रगट होने के लिये है। वो यह भी पहचानता है कि जब भी कोई स्वयं को दूसरे देवता का सेवक समझता है तो भगवान बड़ी आसानी से उसे अपनी प्रधानता, शुभ गुण, आदि बताते हैं और जीवात्मा को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। परन्तु जब कोई पूर्णत: अपने को स्वतन्त्र मानता हैं तो वह अपना मुलभुत शिक्षण शेषत्व को सिद्ध करने के लिये खो देता है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी “त्वमे” (तुम मेरे हो) और “अहमे” (मैं मेरा हूँ) क्रम को बड़ी सुन्दरता से दर्शाते हैं। जब भगवान कहते हैं “तुम मेरे हो” और जीवात्मा कहता है “मैं मेरा हूँ” तब भगवान इस स्थिति में घबरा जाते हैं, अचरज करते हैं कि इस जीवात्मा को ऊपर कैसे उठाऊँ।
  • भगवान श्रीमन्नारायण और भागवतों को छोड़ अन्य किसी का सेवक होना मूल्यहीन है, यह बाधा है। यहाँ पर विशेषकर देवतान्तरों के भजनो पर ध्यान केन्द्रीत है – श्रीवैष्णव को कभी भी अन्य देवताओं की सेवा में नहीं लगना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमारा सच्चा मूल्य तो भगवान और भागवतों की सेवा पर ही आधारीत है। श्री गोदाम्बाजी नाच्चियार तिरुमोलि में यह समझाती हैं “वानिडै वालुम अव्वानवरक्कु मरैयवर वेल्वियिल वगुत्त अवि कानिडैत्तिरिवदोर नरि पुगुन्दु कडप्पदुम मोप्पदुम शेय्वदोप्प ऊनिडै आलि शङ्गुत्तमरक्केन्रु उन्नित्तेलुन्द एन तड मुलैगल मानिडवरक्केन्रु पेच्चुप्पडिल वालगिल्लेन कण्डाय मन्मदने” – जब ब्राह्मण यज्ञ करते हैं तो वे देवताओं के लिये भेंट तैयार करते हैं और स्वयं रख लेते हैं – और अगर कोई जंगली लोमड़ी उस भेंट को छूले तो वह मूल्यहीन हो जाता है। उसी तरह मेरे द्वारा प्रगट की हुई भक्ति विशेषकर भगवान श्रीमन्नारायण के लिये ही प्राप्य है – यदि यह चर्चा होती है कि मेरी भक्ति दूसरे के लिये है तो उसी क्षण मैं अपना प्राण दे दूँगा। इसी तरह का विषय श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी द्वारा मुमुक्षुप्पडि के ६२वें सूत्र में समझाया गया है “देवर्गलुक्कु शेष्मान पुरोडासत्तै नाय्क्कु इडुमापोले, ईश्वर शेष्मान आत्म वस्तुवै संसारीगलुक्कु शेष्माक्कुगै” – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि जिसप्रकार जो भेंट पूजनीय देवताओं के लिये है अंततः कुत्ते को दी जाती है (जिसे सामान्यतया देखना और छूना भी नहीं चाहिये), उसीप्रकार जीवात्मा (जो भगवान का हैं) वह संसारियों की सेवा में लगा है (जो देवतान्तर, आदि हैं – जो भी इस संसार में हैं और अपने सच्चे स्वभाव को न जानते हुये है संसार के सुख भोगने में लगा है ऐसे संसारी) । अत: हमारे पूर्वाचार्यों ने हमें सचेत किया है कि हमें देवतान्तर से सम्बंधित कार्य को नहीं करना चाहिये जिसका हमारे स्वरूप पर विपरीत प्रभाव पड़े।
  • अपने वर्णानुसार स्वयं को किसी देवतान्तर का सेवक मानना बाधा है। सभी जीवात्मा केवल भगवान श्रीमन्नारायण के ही सेवक हैं। सभी वर्णों में कुछ भी भेद भाव नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: यह एक मनोहर पहलू है। वार्ता माला के ४५०वें प्रवेश में श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीदाशरथी स्वामीजी को श्रीवैष्णव यज्ञोपवित से साथ और श्रीवैष्णव बिना यज्ञोपवित के साथ को समझाते हैं। वें दोनों श्रीवैष्णव वर्गों में १० अन्तर बताते हैं। खासकर अन्तर का केन्द्र उन यज्ञोपवित धारण श्रीवैष्णव के बारें में हैं जिन्हें वेद की शिक्षा लेनी पडती है और नित्य/नैमितिक कर्म करना पड़ता है जिसमें देवतान्तर सम्बन्ध (इन्द्र, वरुण, वायु, सूर्य, आदि) और सात्ताध्य शामिल है (जो यज्ञोपवित धारण नहीं करते हैं)। श्रीवैष्णवों का वेदों से प्रत्यक्ष कोई प्रयोजन नहीं हैं और वे पूर्णत: दिव्यप्रबन्ध और उसके व्याख्यानों, कैसे भगवद, भागवत और आचार्य का कैंकर्य कर सकें ऐसे विषयों पर केन्द्रित होना चाहिए है। जब हम इसे देखते हैं तब हम यह सोचते हैं कि जब हम नित्य/नैमितिक कर्म कर रहे हैं तो हम देवतान्तर की पूजा कर रहे हैं। परन्तु इस संभ्रम को श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी बहुत सुन्दरता से समझाते हैं। एक व्यक्ति श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी के पास आकर पूछता है “आप देवतान्तर (जैसे इन्द्र, वरुण, वायु, सूर्य, आदि) आदि की पूजा अपने नित्यकर्मों में करते हो तब फिर आप उनकी पूजा उनके मन्दिरों में क्यों नहीं करते हो?”। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी उसी क्षण दीप्तमान उत्तर देते हैं कि “आप यज्ञ में अग्नि कि पूजा करते हैं परन्तु धरती में आच्छादित करते समय क्यों अग्नि से दूर रहते हो? उसी तरह क्यों कि शास्त्र कहता हैं नित्यकर्मों को भगवद आराधना मानकर करना चाहिये यह समझकर कि भगवान सभी देवता के लिये भी अन्तरयामी हैं। वही शास्त्र यह भी कहता है कि मन्दिर में हमें भगवान को छोड़ अन्य देवता की पूजा नहीं करनी चाहिये और इसलिये हम उनके मन्दिर भी नहीं जाते हैं। और जब इन देवताओं को मन्दिर में स्थापित करते हैं तो वे रजो गुण उत्पन्न करते हैं और अपने आप को श्रेष्ठ विचार हैं और क्योंकि हम सत्वगुणी हैं हम देवता जो रजोगुणी हैं उनकी पूजा नहीं करते हैं”। इसलिये श्रीवैष्णव (यज्ञोपवित वाले) जब नित्य/नैमितिक कर्म करते हैं तब यह नहीं मानना चाहिये कि वे देवतान्तर कि सेवा कर रहे हैं – श्रीवैष्णव के लिये ये सभी कार्य भगवद कैंकर्य का एक अंग है जो भगवान कि ही आज्ञा है।
  • केवल जन्म देने के कारण हमें अपने माता पिता का सेवक मानना बाधा है। हमारा जन्म एक विशेष परिवार में विशेष माता पिता के यहाँ होना हमारे कर्म पर आधारित है और शास्त्र के आधार पर उनके प्रति हमारी सेवा सीमित है। परन्तु भगवान सभी के लिये माता और पिता हैं। इसलिये भगवान के प्रति सेवा अति श्रेष्ठ है। अनुवादक टिप्पणी: अगर माता पिता श्रीवैष्णव हैं तो हमें स्पष्ट रूप से उनकी सेवा अच्छी तरह से करनी चाहिये जैसे अन्य श्रीवैष्णवों की करते हैं जो पहिले समझाया जा चुका है।
  • केवल विवाह सम्बन्ध मात्र से पति की सेवक होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान श्रीमन्नारायण परम पुरुष हैं। भगवान और जीवात्मा के मध्य एक मुख्य सम्बन्ध है भार्तृ – भार्या (पति – रक्षक और पत्नी रक्षिका)। यद्यपि एक स्त्री अपने कर्म के कारण एक पुरुष से विवाह करती है परन्तु सभी जीवात्मा के सच्चे पति तो भगवान ही हैं। यद्यपि एक स्त्री को धर्म शास्त्रानुसार अपने पति की ही सेवा करनी हैं – फिर भी भगवान के संग नित्य सम्बन्ध के मूलभूत को समझना और निरन्तर स्मरण रखना चाहिये। जैसे पहिले समझाया गया है कि अगर पति श्रीवैष्णव है तो उससे बड़े आदर और सम्मान के साथ व्यवहार करना चाहिये। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी जो बड़े आचार्य हैं उनको दो पत्नियाँ थी। वो एक बार अपनी पत्नियों से अलग अलग एक प्रश्न पूछते हैं। पहले वों अपनी पहली पत्नी से पूछते हैं “तुम मेरे बारें में क्या सोचती हो?”। पहली पत्नी उत्तर देती है “मैं आपको स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान के समान और मेरे आचार्य ऐसे देखती हूँ”। वह बहुत खुश होकर उसे तिरुवाराधन और उनके लिये प्रसाद बनाने को कहते है। फिर वही प्रश्न वें अपनी दूसरी पत्नी से पूछने पर वो कहती है “मैं आपको मेरा पती मानती हूँ”। वो उसे अपनी पहली पत्नी को प्रसाद बनाने में सहायता करने को कहते हैं। परन्तु जब उनकी पत्नी के मासिक काल के समय वो प्रसाद नहीं बना सकती तब वें अपनी दूसरी पत्नी से प्रसाद बनाने को कहते हैं परन्तु वह अपने प्रिय शिष्य को उस प्रसाद को पहिले छूने को कहकर फिर पाते हैं। अत: हम समझ सकते हैं कि सच्चे श्रीवैष्णव का उनकी पत्नी द्वारा आदर होना चाहिये।
  • सांसारिक लाभ के लिये सांसारिक जनों का सेवक बनना बाधा है। हमें कैंकर्य का नित्य लक्ष्य रखना चाहिये न कि अस्थाई लाभ पाना। अनुवादक टिप्पणी: एक बार एक राजा श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी की कीर्ति सुनकर श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को उससे मिलकर आर्थिक मदद लेने को कहते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी कहते हैं अगर भगवान श्रीरंगनाथ के अभय हस्त भी अपनी दिशा बदल दे तब भी वे किसी के पास मदद के लिये नहीं जायेंगे। हमारे पूर्वाचार्यों की ऐसी निष्ठा थी। किसी भी परिस्थिती में वे पूर्णत: भगवान पर ही निर्भर रहते थे और कभी भी किसी के लिये भी सांसारिक जनों के पास नहीं जाते थे।
  • तुच्छ सांसारिक सुख की ओर लगाव रखना और अपना मान गँवाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यता श्रीवैष्णवों की राजकुमार जैसी स्तुति होती है – अति आनंदमय श्रीमन्नारायण के सुन्दर और धनी सन्तान। किसी को उस अवस्था से नीचे नहीं आना चाहिये और सांसारिक जनों कि सेवा कर के अपना मान न गवाँये।
  • यह न जानना बाधा है कि जीवात्मा भगवान श्रीमन्नारायण की ही सेवक हैं, जो सभी जीवों के नित्य संबंधी है, जो सभी जीवात्मा के नित्य रक्षक है और सभी जीवात्मा के नित्य स्वामी हैं। जैसे श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के नव विध सम्बन्ध में कहा गया है कि भगवान ही ऐसे पूर्ण व्यक्ति हैं जो पूर्णत: कई रीति से जीवात्मा के सम्बन्धी हैं। जीवात्मा की पूर्ण सेवा ही तिरुमन्त्र का मुख्य विषय हैं जो सभी वेदों व वेदांतों का तत्व है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान श्रीमन्नारायण को सर्वस्वामी, लोकभर्ता (पती या सबका रक्षक), जगन्नाथ (संसार के स्वामी), आदि कहकर बुलाते हैं। अत: हमें इस सत्य को मानना चाहिये कि हम ऐसे महान भगवान के सेवक हैं और उसी तरह कार्य करना चाहिये।
  • अपने आप को पूरी तरह भगवान की ओर जो कि स्वामी है, उपलब्ध नहीं करना बाधा है। किसी की सेवा की अन्तिम स्थिति को पारतंत्रय कहते हैं – भगवान ही जीवात्मा को नियंत्रित करते है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीरामायण में श्रीभरतजी पूर्णत: भगवान राम को समर्पित रहते हैं। भगवान श्रीराम की जो भी इच्छा है भरतजी उसका पालन कर उस इच्छा को पूर्ण करते थे। सभी जीवात्मा को अपना सच्चा स्वभाव स्थापित करने के लिये ऐसे ही होना चाहिये।
  • पूर्णत: भगवान का होना आर्थात भागवतों का सेवक होना। यह न जानना बाधा है। तत शेषत्व (भगवान की ओर सेवा) तदिय शेषत्व (भागवतों कि ओर सेवा) की ओर ले जाता है। विशेषकर सभी को अपने आचार्य की सेवा करनी चाहिये – यह सभी जीवात्मा के स्वभाव के लिये मुख्य और योग्य है। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा की सामान्य स्थिति भगवद दास्यत्व है और पूरी तरह भगवान कि सेवा में रहना। इससे भी मुख्य – स्वरूप यातात्मयम (सच्चे स्वभाव का तत्व) – भागवत दास्य (भागवतों के सेवक होना)। पेरिया तिरुमोली में श्रीपरकाल स्वामीजी स्वयं भगवान को ही तिरुमन्त्र का तत्व इस तरह घोषित करते हैं “निन तिरुवेट्टेळुत्तुम् कट्रु नान उर्ट्रथुम उन्नडियार्क्कडिमै कण्णपुरत्तुरेयम्माने” (हे तिरुक्कण्णपुरम के प्रिय भगवान तिरुमन्त्र का तत्व सीखने के पश्चात मैंने यह समझा कि मैं आपके दासों का दास हूँ)। श्रीभक्तिसार स्वामीजी नान्मुगन तिरुवन्दादि के पाशुर में यह दर्शाते हैं “एत्तियिरुप्पारै वेल्लुमे मटवरै शारत्ति इरूप्पार तवम” (भागवतों कि ओर भक्ति स्वयं भगवान से अधीक है)। एत्तियिरुप्पवर – भगवत शेष भूतर – वह जो भगवान के शरण हो गया हो। ऐसे भक्तों की शरण में जो हुए हो उनकी स्थिति और अधिक महान है। श्रीरामायण में श्रीलक्ष्मणजी और श्रीभरतजी पूर्णत: श्रीरामजी के शरण थे। श्रीशत्रुघ्नजी पूर्णत: श्रीभरतजी के शरण थे। श्रीरामायण में कहा गया है कि “चत्रुघ्नो नित्यचत्रुघ्न:” (वह जिसने नित्य बाधाओं को पाराजित किया है)। हमारे पूर्वाचार्य कहते हैं कि “श्रीशत्रुघ्नजी भगवान राम के सुन्दर और दिव्य गुणों का पूरी तरह त्याग कर श्रीभरतजी की सेवा किये”। श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अवनदियार सिरुमामनिसराय एन्नैयाण्दार” – सिरुमामनिसर – वो जो पूर्णत: भगवान के शरण हुए हैं जो छोटे हैं पर बड़े ज्ञानी हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी ऐसे भक्तों को अपना स्वामी मानते हैं, यह घोषणा किये हैं। जब ऐसे भागवात हैं तो कोई कैसे उन्हे निर्लक्ष्य कर भगवान के श्रीचरण कमलों की सेवा कर सकता है? अत: जीवात्मा के लिये भागवत कैंकर्य भगवद कैंकर्य से भी अधिक मुख्य है।
  • यह न जानना कि अपने स्वामी की रुचि और अरुचि ही हमारी रुचि और अरुचि होना चाहिये। इस विषय में श्रीवैष्णवों को अपने बड़ों की राह पर चलना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी कैंकर्य के पहलू को समझाते हैं। २७५वें सूत्र में वे कहते हैं भगवद कैंकर्य हमें शास्त्र के जरिये सिखना चाहिये और आचार्य कैंकर्य शास्त्र और स्वयं आचार्य के जरिये सिखना चाहिये। फिर वें २७६वें सूत्र में समझाते हैं कि कैंकर्य में दो पहलू हैं। २७७वें सूत्र में वे क्या हितकारी (भगवान/आचार्य की पसन्द) हैं और क्या अहितकारी (भगवान/आचार्य की ना पसन्द) हैं कहते हैं। २७८वें सूत्र में समझाते हैं कि हितकारी / अहितकारी पहलू वर्णाश्रम धर्म और आत्मा स्वरूप के आधार पर हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस २७८वें सूत्र पर विस्तार से व्याख्या देते हैं। वे इस सूत्र के लिये ३ अलग व्याख्या देते हैं परन्तु अन्त में स्वयं कहते हैं पहली व्याख्या ही योग्य हैं। पहिले व्याख्या का तत्व हैं:
    • वर्णाश्रम में हितकारी उतने ही (नित्य / नैमित्तिक) कर्म करना जो शिष्य व बच्चों को वैधिक धर्म पालन करने के लिये आवश्यक हो और दूसरों के प्रति दया भाव से – यह अन्य जीवों के कल्याण पर केन्द्रित है (दया भाव)
    • नित्य / नैमित्तिक कर्मों को इस तरह से निभाना कि ऐसा न करने से पाप लगेगा, यह वर्णाश्रम के प्रतिकूल है – यह स्वयं को पापों से बचाने पर केन्द्रित है (स्वार्थ भाव)।
    • आत्म स्वरूप में हितकारी कर्म- स्वयं को भगवान के पूर्ण आधीन रखना।
    • आत्म स्वरूप में प्रतिकूल कर्म – ऐसे कर्म जिसमें भगवान को भागी नहीं बनाना जो हमारे दास्य स्वभाव को प्रभावित करता है (भगवान हमारे स्वामी है और हम उनके दास हैं) । उदाहरण के लिये एक पिता (जो उच्च है) प्रेमवश और खेल-खेल में अपने स्वयं के पुत्र को उठाता है और उसके पैरों को अपनी छाती से लगाता है। परन्तु उस पुत्र को यह कहकर अपने पैरों को नहीं हटाना चाहिये कि “पिताजी आप मुझसे उच्च है मैं कैसे अपने चरणों से आपके मस्तक को छु सकता हूँ” बजाय इसके वह अपने पिता को इसका पूर्ण आनन्द लेने दे।
  • अपने स्वयं के दासत्व के डर से भगवान को पूर्ण आनंदित न होने देना बाधा है। एक दास का धर्म है कि व अपने स्वामी को खुश रखें। इसके लिये उसे अपना सम्मान ही क्यों न खोना पड़े। हमें अपने स्वामी की खुशियों को लाने के लिये हमेशा उनकी सेवा के लिये तैयार रहना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी के १७७वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं कि एक शेष्दभूत (दास) को अपने शेषी (स्वामी) की खुशी को लाना स्वरूप (सच्चाधर्म) और प्राप्यम (लक्ष्य) है। इसलिये जीवात्मा को हमेशा इसके लिये कार्य रत रहना चाहिये।
  • भगवान जब जीवात्मा के शेषत्व को नष्ट करते हैं तब घबराना बाधा है। जब स्वयं भगवान नीचे आकर जीवात्मा की प्रेम से सेवा करते हैं तब जीवात्मा को भगवान को रोकना नहीं चाहिये – उन्हें सेवा करने देना चाहिये – ऐसे न करना हानिकारक हैं। अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पड़ी के ९२वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इसी तत्व को समझाते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपनी व्याख्या में एक सुन्दर उदाहरण देते हैं। भगवान जो श्रेष्ठ हैं आल्वार श्रीशठकोप स्वामीजी को ऊपर उठाने के लिये उनके हृदय में प्रवेश करते हैं। परन्तु आल्वार के प्रति प्रेम के कारण भगवान उनके सेवक बन जाते हैं और उनकी सेवा करते हैं। उस समय आल्वार यह नहीं कहते हैं कि “मैं साधारण जीवात्मा हूँ भगवान मेरी सेवा क्यों कर रहे हैं? मैं उन्हें ऐसे करने से रोकूँगा क्योंकि कि मुझे शास्त्र तत्व का ज्ञान है कि जीवात्मा सेवक है और भगवान स्वामी”। इससे विपरीत आल्वार ने भगवान को उनकी इच्छा पूर्ण करने दी यह जानते हुए कि भगवान को क्या चाहिये और यही मुख्य पहलू है।
  • सेवा में न रमकर (शामील होकर), बाधाओं में जुड़े रहना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी:  शास्त्र में कहा गया हैं “अकिंचितकरस्य शेषत्व अनुपपत्ति:” – भगवान कि सेवा करना जीवात्मा का स्वभाव है, अगर यह सेवा स्पष्ट नहीं है तो वह जीवात्मा स्वयं अपनी पहचान खो देता है। सभी को बाधाओं से बचना चाहिये – जैसे कोई अपने शरीर पर आनेवाली बाधाओं से बचता है वैसे ही हमें आत्मा को जो हानी पहुँचाता है उससे बचना चाहिये।
  • आचार्य की ओर हमारी सेवा अस्थाई / नियमबद्ध मानना बाधा है। आचार्य को भगवान के अपरावतार माना गया है – इसलिये आचार्य-शिष्य के मध्य के सम्बन्ध को भी नित्य मानना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य को भगवान के चरण कमल माना गया है। श्रीवचन भूषण के ४२७ सूत्र में इस तत्व को सुन्दरता से श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी समझाते हैं। भगवान के निकट सीधे जाना अर्थात “उनके हाथ पकड़ना और सहायता माँगना” और भगवान के निकट आचार्य के जरिये जाना अर्थात “उनके चरण कमलों को पकड़ना और उनकी सहायता माँगना” – स्पष्ट रूप से दूसरा विकल्प ही सही है। इस समझ से आचार्य के साथ सम्बन्ध भी नित्य माना जाता है।
  • यह न जानना कि हम भगवान के नित्य सेवक हैं, और भगवान नित्य स्वामी हैं, बाधा है। भगवान और जीवात्मा के मध्य स्वामी-दास्य भाव स्थायी है। यह समय, स्थान और परिस्थिति के सीमा से परे है।
  • देवतान्तर और पितृ (पूर्वज) की सेवा करना बाधा है। क्योंकि हम भगवान के नित्य सेवक हैं देवतान्तर, पितृ, आदि की सेवा का यहाँ त्याग किया गया है। यहाँ पितृ तर्पण, आदि (नैमितिक कर्म) जो शास्त्र से नियत किया गया है उसका त्याग नहीं करना है – क्योंकि इसे हम पहिले ही समझ चुके हैं कि हम आज्ञा कैंकर्य की सीमा में हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.com/2014/06/virodhi-pariharangal-29.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २८

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २७

श्रीशठकोप स्वामीजी कि स्तुति “कृष्णा तृष्णा तत्वम” ऐसी कि गयी है – भगवान के प्रति भक्ति का मूर्त रूप

६१) स्नेह विरोधी – लगाव / मित्रता में बाधाएं

स्नेह का अर्थ मित्रता, स्नेह, लगाव, प्रेम आदि है। स्नेह कि परिपक्व स्थिति भक्ति है। छोटे जनों का श्रेष्ठ जनों के प्रति स्नेह भी भक्ति कहलाता है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के लिये हनुमानजी (तिरुवड़ी – जीवात्मा) का श्रीराम भगवान (पेरुमाल – परमात्मा) के प्रति प्रेम को भक्ति कहते है। और भगवान श्रीराम का हनुमानजी के प्रति प्रेम को स्नेह कहते हैं। इस भाग में हर बात के लिये दो पहलू पर चर्चा कि गयी है – पहला पक्ष है किससे बचना चाहिये और अगला पहलू किसका पालन करना चाहिए। यहाँ सारतत्व यह है कि हम प्रथम पक्ष को सामान्यत: होते देखते है परन्तु इस संसार में दूसरा पहलू बहुत कम देखने को मिलता है। यह जीवात्मा के स्वभाव के लिये सही नहीं है। हमें पहिले में कम या लगाव होना ही नहीं चाहिये और दूसरे में अधीक लगाव होना चाहिये। यह समझना बहुत आसान है।

  • प्राकृत बन्धुओं (सांसारिक सम्बन्धी – वह सम्बन्धी जो हमारे शारीरिक जन्म से जुड़े है) से लगाव रखना और आत्म बंधुओं (वह जो भगवद, भागवत और आचार्य के जरिये हमसे जुड़े हैं) से लगाव नहीं रखना बाधा है।
  • सांसारिक पहलू से लगाव रखना और भगवद विषय से लगाव नहीं रखना बाधा हैं। हमें भगवद विषय में लगाव को आगे बढ़ना चाहिये और सांसारिक पक्षों में लगाव का त्याग करना चाहिये। श्रीमहद्योगी स्वामीजी मून्राम तिरुवन्दादि के १४वें पाशुर में समझाते है कि “मार्पाल मनम शुलिप्प मङगैयर तोल कैविट्टु” जब हम भगवान श्रीमन्नारायण के प्रति लगाव को बढ़ाएंगे तो औरतों (और अन्य सांसारिक खुशियों) के प्रति हमारा लगाव अपने आप समाप्त हो जायेगा।
  • अपने शारीरिक सुख कि ओर लगाव रखना और आचार्य के शारीरिक सुख कि ओर लगाव न रखना। उपदेश रत्नमाला के ६६वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयिरैप्पेणुमवन् तेशारुम् शिष्यनवन् शीर्वडिवै आशैयुडन् नोक्कुमवनेन्नुम्” आचार्य का अर्थ वो जो शिष्य (आत्मा और आत्मा से जुड़े पक्षों जैसे ज्ञान, भक्ति आदि) का पालन पोषण करता है और शिष्य का अर्थ वो जो आचार्य के पवित्र शरीर का पोषण करता है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के तत्व को उपदेश रत्नमाला के पाशुरों से बड़ी सरल और सुन्दर रूप से प्रस्तुत करते हैं। श्रीवचन भूषण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य और शिष्य अपने कार्य को बदल नहीं सकते है। अर्थात आचार्य को केवल शिष्य के आत्म यात्रा (आत्मिक आवश्कताओं) पर केन्द्रीत होना चाहिये और शिष्य को केवल आचार्य के देह यात्रा (शारीरिक आवश्कताओं) पर केन्द्रीत होना चाहिये। और अगर आचार्य शिष्य के देह कि जरूरतों के बारें में विचार करें और शिष्य आचार्य के आत्मिक जरूरतों के विषय में विचार करें तो गड़बड़ी हो जायेगी – क्योंकि यह उनके लिये करने में असामान्य हैं।
  • जो हमें सांसारिक सुख प्रदान करते हैं उन जनों से लगाव रखना और आचार्य जो हमें तिरुमन्त्र के तत्व को प्रदान करते हैं उनसे लगाव न रखना बाधा हैं। सांसारिक सुख अर्थात खाना, वस्त्र, घर आदि। तिरुमन्त्र अर्थात अष्टाक्षर मन्त्र और उसकी स्तुति पेरिया तिरुमन्त्र ऐसे की जाती है क्यूंकि उसमें सभी महत्वपूर्ण ज्ञान समाहित है।
  • जहाँ हम निवास करते हैं उस स्थान में लगाव रखना और जहाँ आचार्य निवास करते हैं उस स्थान में लगाव नहीं रखना बाधा हैं। सभी को उस स्थान या शहर पर अधीक लगाव होना चाहिये जहाँ हमारे आचार्य निवास करते हैं। अनुवादक टिप्पणी: हम स्मरण कर सकते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला के ६४वें पाशुर में कहते हैं “तन्नारियुनुक्कुत्तानडिमै शेयवदु अवन इन्नाडुतन्निलिरुक्कुम नाल, अन्नेररिन्दुमदिलाशैयिन्नि आचार्यनैप्पिरिन्दिरुप्पारार् ? मनमे पेशु” –जब तक हमारे आचार्य इस संसार में है तब तक हम उनकी सेवा कर सकते है (वह सेवा उनके लिये सच में लाभ दायक रहेगी)। यह जानने के पश्चात कौन अपने आचार्य से अलग रहना चाहेगा?
  • देह यात्रा में लगाव रखना और आत्म यात्रा में लगाव नहीं रखना बाधा हैं। श्रीवैष्णवों को शारीरिक जरूरतों का पालन पोषण करना जरूरी नहीं है। उनको आत्मिक पक्ष पर केन्द्रीत होना चाहिये जैसे भगवद, भागवत और आचार्य कि सेवा करना।
  • पत्नी, बच्चे आदि जो भगवान और भागवतों से विरोधी/ शत्रुता कि भावना रखते हैं उनके साथ स्नेह रखना बाधा हैं। ऐसे पत्नी, बच्चे आदि के संग उतना ही सम्बन्ध रखना चाहिये जितना शास्त्र अनुमती देता है (जैसे खाना, वस्त्र, घर आदि) और किसी को भी ऐसे पत्नी, बच्चे आदि के संग प्रेम सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। उस पत्नी, बच्चों आदि से प्रेम सम्बन्ध रखने में कोई गलत नहीं हैं जो भगवद भागवत विषय कि ओर हितकारी हो क्योंकि वें भागवत होने के योग्य है।
  • अर्चावतार भगवान और मुख्य मन्दिर/दिव्यदेश जैसे कोइल (श्रीरंगम), तिरुमालै (तिरुमाला-तिरुपति) आदि कि ओर लगाव न रखना बाधा हैं। अर्चावतार कि स्तुति तिरुनेडुन्दाण्डगम में श्रीपरकाल स्वामीजी ने “पिन्नानार वणन्गुम सोदि” ऐसे की है –जो कोई भी विभव अवतारों (जैसे राम, कृष्ण आदि) का दर्शन करने में असफल रहे है उनके लिए अर्चावतार ही दीप्तिमान चमकती रोशनी है। हमें यह पूरी तरह समझ लेना चाहिये कि अर्चावतार भगवान ही हमारे पूर्ण रक्षक हैं। हमारे आल्वार और आचार्यों को दिव्य देश और इन दिव्य देशों में विराजमान अर्चावतार भगवान से बहुत लगाव था। इन दिव्य देशों में भी हमें कोइल (श्रीरंगम), तिरुमालै (तिरुमाला-तिरुपति), पेरुमाल कोइल (काञ्चीपुरम) और तिरुनारायणपुरम (मेलकोटे) क्षेत्रों में विशेष स्तुति होने के कारण अधीक लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीरंगम जैसे दिव्यदेश कि अधीक बढाई या स्तुति होती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि अन्य दिव्यदेश नीचे है। उदाहरण के लिये हमारे सम्प्रदाय के लिये श्रीरंगम मुख्य स्थान है और हमारे सभी आल्वार और आचार्य को इस दिव्यदेश के प्रति अधीक लगाव था। आल्वार और आचार्य के इस अधीक लगाव के कारण श्रीरंगम को अन्य दिव्यदेश से अधीक महत्ता (विशिष्टता) है।
  • मन्त्र रत्न को छोड़ अन्य मन्त्र कि ओर लगाव रखना बाधा हैं। मन्त्र रत्न अर्थात द्वय महा मन्त्र। हम इसे रहस्य त्रय से भी जोड़ सकते है। इन्हें अपने आचार्य से सिखा जा सकता है। यह रहस्य त्रय जीवात्मा के स्वभाव को समझाता है और जीवात्मा को मोक्ष के पथ पर ले जाता है। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वदिनचर्या में श्रीएरुम्बी अप्पा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिनचर्या को लिखते है। ९वें श्लोक में वें इस तरह दर्शाते हैं: मन्त्र रत्न अनुसन्धान सन्तत स्फुरिताधरम तदर्थ तत्व निध्यान सन्नद्ध पुलकोग्दमम् – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के होठ निरन्तर द्वय महा मन्त्र (जिसे मन्त्र रत्न भी कहते है – सभी मंत्रों में रत्न) का जाप करते रहते है। द्वयम का निरन्तर अर्थानुसंधान करने के कारण उनका शरीर एक स्पष्ट दिव्य पवित्र प्रतिक्रिया देता है जो ओर कुछ नहीं श्रीसहस्रगीति है। नायनार ने यह बताया है कि श्रीसहस्रगीति दिव्य ग्रंथ द्वय महामन्त्र का ही पूर्ण स्पष्टीकरण करता है। यह आचार्य हृदय के चूर्णिका २१० में दर्शाया गया है। अत: हमें मन्त्र रत्न कि ओर ही पूर्ण लगाव होना चाहिये। आजकल हम यह देखते हैं कि श्रीवैष्णव जन अन्य सम्प्रदाय के जनों के प्रभाव में आकर अन्य मन्त्र का जाप करते है। इससे बचना चाहिये और हमारे ऐसे विषयों में पूर्वाचार्यों के आर्दशों का पालन करना चाहिये।
  • अन्य मन्त्र देनेवाले कि ओर लगाव रखना और जिन्होंने तिरुमन्त्र दिया हैं उनकी ओर लगाव न रखना बाधा है। जो पेरिया तिरुमन्त्र (अष्टाक्षर) सिखाते हैं उन्हें आचार्य कहते हैं। यहाँ अन्य मन्त्र अर्थात वह मन्त्र जिनका प्रयोग उपासना में होता हैं। हमारे आचार्य कभी भी मन्त्र सांसारिक लाभ के लिये कहने को नहीं कहे हैं। इसीलिए जिन्होंने हमें पेरिया तिरुमन्त्र सिखाया हैं उन आचार्य कि ओर हमें हमेशा पूर्ण लगाव होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीसहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी सबसे पहिले पाशुर में श्रीमन्नारायण भगवान का नाम बतलाते है “एन पेरुक्कन्नलत्तु ओण पोरुलीरिल वण पुगल नारणन थीण कलल सेरे” आपको भगवान श्रीमन्नारायण के चरणों में आत्मसमर्पण करना हीं होगा – श्रीमन्नारायण भगवान सभी में अन्तरयामि रूप से विराजमान है, वह जिसके पास पवित्र गुण है और वह जो कभी भी अपने भक्तों कि रक्षा करने से नहीं चुकते है। ईडु महा व्याख्या अवतारिका (प्रस्तावना) में श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी यह समझाते हैं कि यह पाशुर तिरुमन्त्र पर केन्द्रीत है जो भजन द्वारा भगवान कि ओर ले जाता है। वह यह भी समझाते हैं कि हमारे पूर्वाचार्य इस मन्त्र के पवित्र अर्थों पर केन्द्रीत थे और अपने शिष्यों को भी यहीं सिखाते थे परन्तु अन्य लोग इस मन्त्र का प्रयोग जप, याग, होम आदि के लिये और अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिये करते थे। इससे यह स्थापित होता हैं कि हमें ऐसे जप, होम आदि अगर तिरुमन्त्र का उपयोग करके भी किया जा रहा हो तो भी उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखना है। और श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ३१५वें सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह समझाते हैं कि जिसने पेरिया तिरुमन्त्र सिखाया है (जो रहस्यत्रय का एक अंग है) वों हीं हमारे आचार्य है।

६२) भक्ति विरोधी भक्ति में बाधाएं

भक्ति अर्थात अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति/ तत्व से स्नेह, प्रेम। एक आस्तिक की भगवान के प्रति पूजा को भक्ति कहते है। इसे काधल ऐसा समझाते है (तमिल में प्रेम)। शास्त्र में मोक्ष प्राप्ति के लिये भक्ति को उपाय समझाया गया है – इसे साधना भक्ति कहते है। भगवान के सच्चे स्वभाव को जानने के पश्चात, निरन्तर उनका प्रेम से ध्यान करने को भक्ति योग कहते है जिसे मोक्ष साधन (मोक्ष प्राप्त करने का उपाय) ऐसा समझाते हैं। केवल योग्य जीव ही भक्ति योग को कर सकते है। (अनुवादक टिप्पणी: साधन भक्ति केवल तीन वर्ण (ब्राम्हण, क्षत्रीय और वैश्य) ही कर सकते है, क्योंकि कर्म योग और ज्ञान योग उसके अंग है जिसे केवल वें ही निभा सकते हैं)।

आल्वारों कि भक्ति (जो सबसे उच्च भक्त है) स्वयं भगवान की कृपा से है। श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्रगीति के प्रारम्भ में ही कहते है “मयर्वर मदि नलम अरुलिनन” –भगवान मुझ पर दोषरहित ज्ञान/पूजा का आशिर्वाद प्रदान किये है – यह भगवान की निर्हेतुक कृपा का परिणाम है। श्रीरामानुज स्वामीजी अपने श्रीभाष्य मंगल श्लोक में भगवान से उनकी इसी तरह के भक्ति कि अपेक्षा से प्रार्थना करते है “भवतु मा परस्मिन शेमुषी भक्ति रूपा”। क्योंकि भगवान अपने भक्तों को ऐसी भक्ति का आशिर्वाद प्रदान करते है, तो वह भक्ति प्राप्य (अन्तिम लक्ष्य – कैंकर्य) का एक अंग हो जाता है। इसलिये इसे साध्य भक्ति (अधिकारी के पूजा के आधार पर भक्ति जो स्वयं भगवान प्रदान करते है) और यह साध्य भक्ति साधन भक्ति से भिन्न है। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार बड़ी सुन्दरता से कई प्रकार की भक्ति और चूर्णिका ९५ से १०२ तक श्रीशठकोप स्वामीजी (और अन्य आल्वारों) की भक्ति के स्वभाव को स्थापित करते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने निपुण व्याख्यान से हम पर आशिर्वाद प्रदान करते है जिसके मदद से हम यह पवित्र तत्व को समझ सकते है। ३ प्रकार कि भक्ति पहचानी गयी है – साधन भक्ति, साध्य भक्ति और सहज भक्ति।

  • साधन भक्ति वह भक्ति है जो स्वयं के परिश्रम से बढ़ती है और भगवद प्राप्ति के लिये इसे उपाय माना गया है – यह भक्ति योग है जिसे शास्त्र में समझाया गया है।
  • साध्य भक्ति पवित्र योग है जो उच्च आचार्य जैसे श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी आदि द्वारा प्रगट कि गयी है। यह आचार्य पहिले ही भगवान के शरण हो चुके है और केवल भगवान को ही उपाय स्वीकार किये है। ऐसे साध्य भक्ति भूख के समान है – केवल जब कोई भूखा हो तभी वो अपनी पूर्ण संतुष्टी तक भोजन खा सकता है उसी तरह जब पवित्र भक्ति होती है तब वह जो कैंकर्य करते है उससे उन्हें पूर्ण संतुष्टी मिलती है। इसलिये यह साध्य भक्ति कैंकर्य का एक अंग हो जाता है।
  • सहज भक्ति ऐसे अधिकारी का जन्म इस पवित्र भक्ति के साथ ही हुआ है। उदाहरण के तौर पर श्रीशठकोप स्वामीजी का जन्म भगवान कि तरफ पवित्र भक्ति के साथ हुआ और ऐसी भक्ति स्वयं भगवान ने ही प्रदान की है। सहज का अर्थ “वह जो स्वयं से जन्म लिया हो”। यह सहज भक्ति साधन भक्ति और साध्य भक्ति से भिन्न हैं। इसी कारण से आल्वारों को विशेष स्थान प्राप्त हुआ है – भगवान की भक्ति करने के लिए भगवान की निर्हेतुक कृपा से वें भगवान के सीधे कृपा प्राप्त बने।

इस प्रस्तावना के साथ इस विषय के भिन्न पहलू पर हम चर्चा करेंगे।

  • भगवान को पाने के लिये भक्ति को साधन मानना बाधा है। जब हम भक्ति को मोक्ष का साधन मानते है तब उसमें स्व प्रयास हैं। परन्तु कुछ पाने के लिये स्व प्रयास करना सीधा उसके शेषत्व और पारतंत्र्य के विरुद्ध है। अत: भक्ति को साधन मानना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: यह तो स्थापित हो ही गया है कि केवल “भगवान” ही उपाय है। हमारा चरम श्लोक भी इसी तत्व को समझाता है। चरम श्लोक में “मामेकं” (केवल में) भगवान हीं उपाय इस तत्व को स्वीकार करने पर ज़ोर देता हैं। इसलिये भक्ति को उपाय मानना दोषपूर्ण है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी इस तत्व को श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के ११५वें सूत्र में बड़े विस्तृत रूप से सिखाते हैं। वह कहते हैं “प्रापकांतर परित्यागत्तुक्कु अज्ञान असक्तिकलन्रु, स्वरुप विरोधमे प्रधान हेतु” – अन्य उपाय जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग का त्याग करने का मुख्य कारण है वें आत्मा के सच्चे स्वभाव के विपरीत हैं (जो पूर्णत: भगवान पर निर्भर है) और ज्ञान/योग्यता के कमी के कारण नहीं। कोई कहते है कि जिनमें क्षमता है वे भक्ति योग कर सकते हैं और जो सक्षम नहीं हैं वें भगवान के शरण हो सकते हैं। ऐसे तर्क शास्त्र को हमारे पूर्वाचार्यों ने पूरी तरह अस्वीकार किया हैं। चाहे समर्थ हो या असमर्थ यह जीवात्मा का स्वभाव हैं की अपनी रक्षा और ऊपर उठाने के लिये भगवान के शरण होना।
  • स्मरण, संकिर्तन आदि सभी साध्य (परिणाम- कैंकर्य) के अंग है, यह न जानना बाधा हैं। भक्ति के प्रारम्भ दशा में जब भगवान रक्षा के लिये आते है तब जीवात्मा कि ओर से एक अद्वेष होता है। जब भगवान “त्वममे” (तुम मेरे हो) कहते है तब हमें “अहममे” (में मेरा हूँ) यह नहीं कहना चाहिये। हमें यह मानना चाहिये कि भगवान को अस्वीकार न करने की सोच भी भगवान ही उत्पन्न करते हैं।
  • हमारी भक्ति में सांसारिक इच्छाओं का मिश्रण होना और पवित्र भक्ति में स्थित नहीं होना बाधा हैं। सांसारिक इच्छाओं को हृदय में घर करने से बचाना चाहिये। उसी तरह सभी को निरन्तर पवित्र भक्ति के लिये प्रयास करना चाहिये।
  • प्रपत्ति और साध्य भक्ति को समान मानना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: प्रपत्ति भगवान के शरण होने का कार्य और भगवान को उपाय रूप में स्वीकार करना हैं। जैसे पहिले देखा गया हैं साध्य भक्ति हमारी भक्ति पवित्र हो सके इसीलिए भगवान से प्रार्थना के लिए है – दोनों भिन्न है। प्रपत्ति स्वरूप से सम्बन्धीत हैं और साध्य भक्ति हम कैसे अपना कैंकर्य बड़े प्रेम से करें इससे सम्बन्धीत हैं।
  • प्रपन्न के लिये यह न जानना कि साध्य भक्ति के लिये प्रार्थना करने से प्रपत्ति प्रभावहीन हो सकती है, यह बाधा हैं। यह बात स्पष्ट नहीं हैं – मैंने (डॉ व्ही व्ही रामानुजम स्वामी) अपने बड़ों से यह सुना हैं कि जब साध्य भक्ति निभाई जाती हैं तो सामान्यत: उसका अन्त प्रपत्ति में ही होता हैं।
  • जब प्रपन्न जन साध्य भक्ति के लिये प्रार्थना करते हैं तो यह भक्ति उनके कैंकर्य का एक अंग है यह न जानना बाधा हैं। क्योंकि प्रपन्न ऐसी श्रद्धा और भक्ति के लिए उच्च उत्कंठा के साथ प्रार्थना करते हैं, यह उसी प्रकार है जैसे भोजन के लिये भूख हैं जो कैंकर्य करना और भी सुगम कर देता हैं।  अनुवादक टिप्पणी: मुमुक्षुप्पडि में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी २७१ सूत्र में समझाते है कि एक प्रपन्न के लिये उनके कर्म हीं उनके कैंकर्य का एक अंग होगा, ज्ञान उनके स्वयं के ज्ञानाभिवृद्दि का अंग होगा, भक्ति कैंकर्य के प्रति लगाव का अंग, स्वयं प्रपत्ति जीवात्मा के सच्चे स्वभाव का अंग होगा।
  • आल्वारों कि भक्ति जो स्वयं भगवान कि निर्हेतुक कृपा से प्राप्त हुई है वह आल्वारों का आधार है, यह न जानना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे सामान्य जन भोजन, जल आदि से पोषण करते है वैसे हीं आल्वार जिन पर भगवान कि निर्हेतुक कृपा है उनका पोषण भगवान के प्रति भक्ति से ही होता है। श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसहस्रगीति में यह घोषणा किये हैं कि “उण्णुम सोरु परुगु नीर थिन्नुम वेट्रिलै एल्लाम कण्णन् एम्पेरुमान” – प्रसाद, जल, ताम्बूल आदि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हीं हैं।
  • यह मानना कि जब हम भगवान को सब जरूरत कि वस्तुएं देते हैं तो वह तृप्त और खुश होते है बिना यह जाने कि यह उनकी हीं कृपा हैं जो हमें सब कुछ प्राप्त हुआ हैं। यह बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता के ९.२६ में भगवान कहते हैं “पत्रं पुष्मं फलं तोयं यो मे भकत्या प्रयच्छति। तदहं भकत्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:” – एक पत्ता, फूल, फल और जल – जब भक्ति से मुझे अर्पण किया जाता है तो मैं उसे खुशी से स्वीकार करता हूँ। इसलिये यह समझना अति जरूरी है कि भक्ति एक मुख्य अंग है – न कि महँगे भोजन/वस्तु जो हम अर्पण करते हैं। भगवान के पास यह सब पहिले ही है –हम उन्हें कुछ नया नहीं दे सकते हैं। यह हमारी भक्ति हैं जिसे वें देखते हैं और यह हीं उन्हें सबसे अधिक संतुष्टी प्रदान करेगी।
  • भगवान के प्रति भक्ति हमारे हृदय में उत्पन्न होती हैं ऐसी भक्ति और परम भक्ति कि वृद्धि भगवान कि कृपा का ही फल हैं। यह न जानना बाधा हैं। ऐसी परम भक्ति की प्रार्थना श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगनाथ गद्य में कहते हैं “पारभक्ति परज्ञान परमभक्ति युक्तां माम कुरुश्व”। अनुवादक टिप्पणी: आचार्य हृदय में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार १०४ चूर्णिका में यह समझाते है कि भगवान को भक्ति उळवन (भक्ति किसान) कहते हैं – जैसे एक किसान अपने खेत में चावल बुआई करता है, खाद डालता है, घास निकालता हैं, अनाज काटता है और अन्त में चावल घर लाता है। भगवान निरन्तर जीवात्मा को जोतते है, भक्ति का बीज बोवते है, जीवात्मा को अध्यात्मिक कार्य में लगने के लिये कई अवकाश प्रदान करते है, बाधाओं से निकालने में सहायता करते है, एक बार जीवात्मा में भक्ति आ जाती है अन्त में जीवात्मा पर कृपा कर मोक्ष प्रदान कर जीवात्मा को नित्य कैंकर्य में लगाते हैं।
  • सभी अन्य उपायों का त्याग करने से किसी के सच्चे स्वभाव को कोई क्षती नहीं पहूंचेगी यह नही जानना बाधा हैं क्योंकि इसे भगवान पर पूर्ण विश्वास के आधार पर और उन्हें उपाय रूप में स्वीकार करके किया जाता है। क्योंकि स्वयं भगवान भगवद्गीता में कहते हैं “सर्व धर्मान परित्यज्य” (सभी धर्मों का त्याग कर दो) कर्म, ज्ञान, भक्ति योग उपाय रूप में त्याग करने में कोई गलत नहीं है क्योंकि हम भगवान के शरण होने के लिये उन्हीं के हीं नियमों का पालन कर रहे हैं।
  • पवित्र श्रद्धा से भगवान का मंगलाशासन करना ही जीवात्मा के स्वभाव के लिये सही है, यह नही जानना बाधा है। यद्यपि भगवान से यह कहना कि “आपका सब मंगल हो” सही नहीं दिखता है (वह पहले से ही सबसे श्रेष्ठ और पवित्र है)। परन्तु वह जो भगवान की भक्ति में पूरी तरह से लीन है वह भगवान की सुन्दरता, कोमल स्वभाव आदि को देखेगा और यह विचार करेगा कि ऐसे कृपालु भगवान का कुछ अशुभ न हो जाये और इसलिये मंगलाशासन प्रगट करता है। उपदेश रत्नमाला में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं –“पोंगुम परिवले विल्लिपुत्तुर पट्टरपिरान पेट्रान पेरियाल्वार एन्नुम पेयर” – पट्टरपिरान की भगवान के प्रति अपरिहार्य भक्ति के कारण उन्हें पेरीय आल्वर (बड़े आल्वार) नाम प्राप्त हुआ। हालाकि उन्होंने स्वयं श्रीमन्नारायण कि प्रधानता मदुरै राजा के दरबार में स्थापित कि परंतु जब उन्होंने बाहर आकर भगवान को गरुड वाहन में उन्हें आशिर्वाद प्रदान करते देखा तो वे गाने लगे “पल्लांडु पल्लांडु .. उन सेवडी सेव्वी तिरुक्काप्पू” (जीते रहो जीते रहो … आपके सुन्दर चरण कमल सुरक्षीत रहे)। यह हमारे स्वभाव के विपरीत नहीं है – अपितु यह तो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के सर्वथा योग्य है। इस श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाया गया है। इसे एक आचार्य के मार्गदर्शक में पढ़ा जा सकता हैं।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २७

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

“श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २६

६०) सम्बन्ध विरोधीसम्बन्ध में बाधाएं।

भगवान ही उनके माता पिता हैं, श्रीशठकोप स्वामीजी ऐसी घोषणा करते हैं। श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी ही उनके माता पिता हैं ऐसी घोषणा करते हैं।

सम्बन्ध का अर्थ है रिश्ता। वह इन आधार पर हो सकता है १) शरीर से संबंधी, २) मित्रता और ३) आध्यात्मिक पर आधारीत आत्म सम्बन्ध और आत्मा से संबंधीत विषय। इन तीनों में हमें यह समझना है कि तीसरा पक्ष ही मुख्य और स्तुति करने योग्य है। शरीर के संबंधी अर्थात पिता, माता, भाई, बहन और अन्य संबंधी। यह एक विशेष व्यवस्था के अंतर्गत होता है कि अपने कर्मानुसार जीव एक विशिष्ट परिवार में, विशिष्ट माता पिता के यहाँ जन्म लेता हैं। उसीतरह माता पिता के कर्मानुसार उन्हें वह सन्तान प्राप्त होती है जो तंदरुस्त/ कमजोर, अच्छे/ बुरे गुणवाला आदि हो। नाच्चियार तिरुमौली में आण्डाल अम्माजी वारणमायिरम के अन्तिम पाशुर फल श्रुति समझाते है (वह १० पाशुर गाने का परिणाम) “तूय तमिल मालै ईरैन्दुम वल्लवर वायु नन मक्कलैप् पेट्रु मगिल्वरे” (वह जो इन १० पाशुरों को पढ़कर प्रामाणीकता से पालन करेगा उन्हें अच्छी सन्तान प्राप्त होगी और वें सुख से जीवन व्यतित करेंगे)। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी यही तत्व को समझाते हैं “इवैयुम पत्तुम वल्लार्गल नल्ल पदत्ताल् मनै  वाल्वर कोण्ड पेण्डिर मक्कले” (जो भागवत कैंकर्य को समझते है और इन १० पाशुरों को पढ़ते/पालन करते है उनको विशिष्ट परिवार सुख प्राप्त होगा जिसमें सभी भगवान और भागवतों के प्रति कैंकर्यरत होते है)। तिरुमौली में श्रीपरकाल स्वामीजी कहते हैं “कणपुरम कै थोलुम पिल्लैयै पिल्लै एन्रेण्णप् पेरुवरे?” (अगर वो हमारा बालक भी हो और अगर वह बालक तिरुक्कण्णपुरम कि आराधना करता हैं तो उस बालक को छोटा नहीं बल्कि एक बड़ा भक्त मानना चाहिये)। वे तिरुनेडुन्दाण्डगम के २०वें पाशुर में कहते “पेरालन पेर ओदुम पेण्णै मण्मेल पेरुन तवत्तल एन्रल्लाल पेचलामे” (एक छोटी लड़की (स्वयं कि बिटिया) जो भगवान कि स्तुति करती हैं उसे नित्यसूरी (परमपदधाम कि नित्य निवासी) के समान समझना चाहिये)। भगवान कि कृपा से अपनी स्वयं का बच्चा भगवान के बहुत करीब हैं तो उसे को “मेरे छोटा बच्चा” ऐसे न समझना चाहिये बल्कि उसे बड़े आदर के साथ “सुकृतिना (पुण्यात्मा)” ऐसे समझना चाहिये। (अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन में इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाया गया हैं। श्रीकुरेश स्वामीजी कि धर्मपत्नी आण्डाल को सम्प्रदाय में बहुत बड़ी विद्वान माना गया हैं। उनके दो पुत्र श्रीपराशर भट्टर और श्रीवेदव्यास भट्टर जिनका जन्म भगवान श्रीरंगनाथ के प्रसाद से हुआ हैं। दोनों में से श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी विशेषकर उनकी बुद्धीमत्ता और पाण्डित्य के कारण विशेष कीर्ति योग्य है। उनको जन्म देनेवाली माँ आण्डाल अम्माजी भी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी का श्रीपाद तीर्थ ग्रहण करती थी। ऐसे पूंछने पर उन्होंने समझाया कि शिल्पकार भगवान कि मूर्ति बनाता हैं परन्तु एक बार उस मूर्ति कि प्राण प्रतिष्ठा हो जाने पर वह शिल्पी भी उसकी पूजा करता हैं। इसी तरह यद्यपि मैंने उसे जन्म दिया हैं परन्तु जैसे हीं उस पर भगवान कि कृपा हो गयी वों मेरे लिये भी पूजनीय हो गया। वह तिरुमौली के ८.२.९ पाशुर को बताती हैं जो इस तत्व को स्थापित करता हैं। इसी संदर्भ में अगर हमारे सांसारिक संबंधी सच्चे भागवत हो तो ऐसे सम्बन्ध का तो बहोत मन बढ़ाना और स्तुति भी करनी चाहिये। इस बात पर ज़ोर दिया गया हैं कि सांसारिक सम्बन्ध से अधीक भगवद, भागवत और आचार्य से उत्पन्न सम्बन्ध को अधिक महत्व देना चाहिये। इस पर भी ज़ोर दिया गया हैं कि जीवात्मा कि उन्नती के लिये केवल सांसारिक सम्बन्ध को महत्व नहीं देना चाहिये। मुख्य तत्व को स्पष्ट रूप से जानने के लिये एक लम्बी प्रस्तावना देना बहुत जरूरी था। इस प्रस्तावना के साथ हम इस विषय के आतंरिक तत्व को आसानी से समझ सकते हैं।

  • देह (सांसारिक) संबंधीयों को संबंधी मानना और भागवत संबंधीयों को संबंधी न मानना बाधा हैं। देह सम्बन्ध हमारे कर्मों से उत्पन्न होते हैं। परन्तु भागवत हमारे स्वरूप ज्ञान से उत्पन्न होते हैं और उसकी स्तुति भी होती हैं।
  • प्रपन्न होने के बावजूद सांसारिक सम्बन्ध रखना और श्रीवैष्णवों से सम्बन्ध नहीं रखना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: प्रपन्न वों हैं जो पूर्णत: आचार्य कृपा से भगवान के शरण हो गया हैं। ऐसे जनों को सांसारिक जनों से नाता रखने में कोई चाह नहीं होती हैं। वें पूरा ध्यान भगवान और भागवतों के कैंकर्य में हीं केन्द्रीत करते हैं।
  • केवल जन्म देनेवाले माता पिता को मोल देना और ज्ञान देनेवाले (आचार्य) माता पिता को मोल न देना बाधा हैं। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “अरियाधन अरिवित्त अत्ता! नी चेय्वन अडियेन अरियेने” – यहाँ आल्वार भगवान कि स्तुति आचार्य के समान करते हैं जो पवित्र और मुख्य तत्वों को सिखाते हैं। आचार्य वह हैं जो शिष्य में सच्ची समझ लाते हैं। माता पिता वों हैं जो देह देते हैं और आचार्य वह हैं जो सच्ची समझ देते हैं जो जन्म से भी उच्च हैं। हमें अपने जन्म देनेवाले माता पिता को भी पूर्ण सम्मान देना चाहिये और ज्ञान देनेवाले आचार्य को भी उच्च माता पिता मानना चाहिये जैसे सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी समझाते हैं कि “मेलात ताय् तंतैयरुम अवरे इनियावारे” – आज से भगवान हीं मेरे श्रेष्ठ माता पिता हैं जिन्होंने में कौन हूँ इस सत्य का अनुभव कराया हैं। अनुवादक टिप्पणी: इस मुख्य तत्व को हम श्रीमधुरकवि स्वामीजी के कण्णिनुण शिरूत्ताम्बु के चौथे पाशुर से जोड़ सकते हैं “अन्नैयाय अत्तनाय एन्नै आण्डिडुम तन्मैयान शडगोपन एन नम्बिये” श्रीशठकोप स्वामीजी जो पूर्णत: पवित्र गुणोंवाले हैं उनका मुझ पर माता पिता की तरह पूर्ण नियन्त्रण हैं। यहीं बात आलवन्दार में बताते हैं “माता पिता ….” जहाँ आलवन्दार यह घोषित करते हैं कि श्रीशठकोप स्वामीजी हीं उनके माता, पिता आदि सब कुछ हैं।
  • सांसारिक भाई बहन को भाई बहन मानना और अपने स्वयं के आचार्य के शिष्यों को भाई बहन न मानना बाधा। हमारे माता पिता के जन्में बच्चों को जैसे हम भाई बहन मानते हैं वैसे हीं आचार्य जो हमारे पिता हैं और उनके शिष्य उनके पुत्र/पुत्री ही है – तो ऐसे शिष्य हमारे स्वाभाविक भाई बहन है।
  • देह संबंधीयों को औपाधिक न मानना और भागवत संबंधीयों को निरुपाधीक न मानना बाधा हैं। हम सब अपने पूर्व कर्मानुसार उसी ही परिवार में जन्म लिये हैं – इसलिये वह नियमबद्ध हैं। परन्तु भागवत सम्बन्ध और आचार्य सम्बन्ध अनियमित हैं।
  • यह न जानना कि अचित सम्बन्ध (शरीर और शारीरिक सम्बन्ध) हटाये जाने योग्य और अस्थाई हैं और अयन सम्बन्ध (भगवान से सम्बन्ध – अयन का अर्थ शरणागतों की तिरुमाली) हटाने जाने योग्य नहीं है और स्थाई हैं, यह बाधा हैं। जीवात्मा और परमात्मा के मध्य में सम्बन्ध वहीं हैं जो सेवक और स्वामी के मध्य में हैं। भगवान स्वामी है और जीवात्मा भगवान का सेवक हैं – यह सम्बन्ध नित्य है और कभी समाप्त नहीं हो सकता हैं। सभी परिस्थिती में जीवात्मा भगवान का सेवक हैं। इसे अच्छी तरह समझना चाहिये।
  • यह न मानना कि अचित सम्बन्ध जीवात्मा के स्वभाव को नाश करता हैं और अयन सम्बन्ध जीवात्मा को इस संसार से ऊपर उठायेगा, बाधा हैं। क्योंकि यह शरीर पदार्थ से बना हैं जिसके ३ गुण हैं – सत्व, रजस और तम, यह जीवात्मा के सच्चे स्वभाव को पहचान ने से हमेशा रोकेगा। परन्तु एक बार वह जीवात्मा भगवान के शरण हो जाये तब भगवान उसे उसके सच्चे स्वभाव से अवगत करायेंगे। अनुवादक टिप्पणी: माणिक्क मालै में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै इस तत्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं। वों अचित और ईश्वर के मध्य में बहुत सुन्दर समानता लाते हैं। जब हम सांसारिक सुख कि ओर खिंचे जाते हैं तब अचित यह निश्चित करता हैं कि हम सांसारिक सुख में डुबे रहे और हम कही भी न जाये विशेषकर भगवान कि ओर। उसी तरह जब हम भगवान कि ओर जाते हैं तो भगवान यह निश्चय करते हैं कि हम अपने सच्चे स्वभाव में रहे और उनकी ओर बड़ी भक्ति रखे। वो एक सुन्दर उदाहरण देते हैं। हिरण्यकशिपु प्रकृति कि शरण लेता है और भगवान का विरोध करता हैं – उसका सर्वनाश हो गया। प्रह्लादजी भगवान कि शरण लेते हैं और प्रकृति से दूर रहते है – उनकी उन्नति हो गयी। किसी भी वस्तु कि ओर हम जितना जुड़े रहेंगे हम उतने ही अज्ञानी हो जायेंगे। हम जितना अधिक भगवान से जुड़ेंगे ज्ञान में वृद्धि के कारण हम उतने आनंदित होंगे। अन्त में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै सुन्दरता से सम्पन्न करते हैं –भगवद सम्बन्ध (आचार्य के जरिये) स्थापित करने के पश्चात अगर किसी को अपने शरीर और शारीरिक गतिविधियों से डर नहीं हैं तो ऐसे व्यक्ति के ज्ञान पर सन्देह करना चाहिये।
  • सभी सांसारिक पक्षों को भागवत सेवा में प्रयोग न करना और श्रीमन्नारायण भगवान (वह जो अन्तरयामी है) के साथ का सम्बन्ध ही हमारा पोषण करता हैं, यह न मानना बाधा हैं। श्रीमन्नारायण जगदीश्वर हैं जो सब जगह और सभी में रहते हैं। सहस्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते हैं “उडल्मिसै उयिरेनक करनथेंगुम परंथुलन” – जैसे जीवात्मा पूरे शरीर में होता हैं (अपने धर्म भूत ज्ञान के जरिये) वैसे हीं भगवान स्वयं हर जगह होते हैं। वेदों में यह दर्शाया गया हैं कि भगवान सभी विषय में अनगिनत जीवात्मा के द्वारा प्रवेश करने कि इच्छा प्रगट करते हैं और अत: यह संसार का जन्म जीवन के विभिन्न रूप में होता हैं।
  • यह मानना कि हम उन सभी सांसारिक जनों से जुड़े है क्यूंकि उनका भगवान से सम्बन्ध है (क्योंकि सांसारिक जन भी भगवान से जुड़े होते है) और यह न मानना कि श्रीवैष्णव जिनके पास पवित्र चेतना हैं उनके साथ हमारा नित्य सम्बन्ध हैं, बाधा है। यद्यपि शरीर के संबंधो का उनके मनुष्यत्व के कारण सम्मान करना चाहिये, पर यह अन्त नहीं हैं। हमें उन श्रीवैष्णवों कि सराहना करनी चाहिये जो निरन्तर दूसरों की प्रगती और उनकी सेवा के बारे में सोचते रहते हैं। हमें यह भी समझना चाहिये कि ऐसे श्रीवैष्णवों के साथ सम्बन्ध नित्य हैं। अनुवादक टिप्पणी: आलवान्दर अपने स्तोत्र रत्न के दूसरे श्लोक में यह घोषित करते है कि “नाथाय नाथ मुनये अत्र परत्र चापि नित्यं यदीय चरणौ शरणम मदीयं” इस संसार और परमपदधाम इन दोनों में श्रीनाथमुनि स्वामीजी (जो उनके दादाजी है) के चरण कमल हीं नित्य शरण हैं।
  • यह न सोचना कि भगवद सम्बन्ध दोनों बन्धन (संसार में बंधना) और मोक्ष (संसार से छुटना) के लिये सामान्य है और आचार्य सम्बन्ध केवल मोक्ष पर हीं केन्द्रीत है, यह बाधा हैं। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के व्याख्या के ४३३वें सूत्र में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि भगवान के शरण होने पर भगवान या तो हमारे असंख्य पाप कर्मों को देखते हुए हमें इस संसार में फिर से कुछ समय अधिक के लिये रखते है अथवा भगवान कृपा कर हमें इस संसार से उठाकर (क्योंकि भगवान स्वाभाविक कृपा करनेवाले हैं) इस संसार के दु:खों से मुक्त कर देते हैं। यह इसलिये कि भगवान निरंकुश स्वतन्त्र है (पूर्णत: स्वतन्त्र और किसी से भी नियंत्रण या कोई भी उन्हें प्रश्न नहीं कर सकता हैं) – यह पूर्णत: अन्त में उन्हीं कि इच्छा हैं। परन्तु आचार्य मुख्य रूप से दया करनेवाले है जो उनके शरण में आते हैं वों हमेशा उसे ऊपर उठाने का ही विचार करते हैं। श्रीलक्ष्मी अम्माजी हमेशा जीवात्मा कि ओर करुणामय रहती है और भगवान से निरन्तर जीवात्मा के उद्धार के लिये सिफारिश करती है – आचार्य भी ऐसे हीं होते है वें कृपा कर यह सुनिश्चित करते है कि शिष्य का कल्याण हो जाये। यह ४४७वें सूत्र में समझाया गया हैं – आचार्य अभिमानमे उत्थार्गम  – आचार्य कि कृपा हीं केवल हमारा उद्धार कर सकती हैं।
  • यह न मानना कि आचार्य के साथ सम्बन्ध हमारी प्राणवायु के समान है और यह मानना की यह सम्बन्ध केवल आचार्य द्वारा शिष्य को मुख्य तत्वों को देने से उत्पन्न होता है, बाधा है। जैसे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला में समझाते है कि “आचार्यन् शिष्यन् आरुयीरैप पेनुमवन” (आचार्य वह है जो जीवात्मा का पोषण कराते है) – वह केवल उपदेशक नहीं है, उन्हें सबकुछ समझना चाहिये और उन्हें पूर्ण आदर, सेवा और सत्कार सहित व्यवहार करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २६

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २५

mamuni-thiruvahindrapuram

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – तिरुवहिन्द्रपुरम – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को विशदवाक्शिखामणि की उपाधि दी गयी है (अर्थात् वह जो केवल उतना कहता या लिखता है जितना कि उस तत्त्व को समझाने के लिये आवश्यक है)

५८) उक्ति विरोधी – भाषा / बोली में बाधाएं

उक्ति अर्थात शब्द, भाषा, बात करने का तरीका आदि। इस अंश में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि श्रीवैष्णवों को विशिष्ट श्रीवैष्णव परिभाषा का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये और वही बोलना चाहिये और सांसारिक जनों की तरह बात करने से बचना चाहिये। यह अंश बहुत बड़ा है। फिर भी यह बहुत महत्वपूर्ण है और इसका अपने दैनिक जीवन में भी पालन करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों ने सामान्य शब्दों के लिए कई विशिष्ट सुंदर श्रीवैष्णव शब्दों का प्रयोग किया है। इस विषय का अधिकांश भाग तमील शब्दों से संबंधित है परन्तु यही तत्त्व अन्य भाषाओं में भी लागू किया जा सकता है। अन्य भाषाओं में वहीं कार्य कई शब्दों में समझाया जा सकता है। श्रीवैष्णव होने के कारण हमें सम्मानजनक शब्द अथवा भाषा का प्रयोग करना चाहिये।

  • जब भी कोई श्रीवैष्णव हमें बुलाते है तो हमें “अड़ियेन्” कहकर उत्तर देना चाहिये। और जब सांसारीक जन बुलाते है तो हमें “जी कहिए” ऐसा कहकर उत्तर देना चाहिये। इसका उल्टा करना बाधा है। अगर गलती से या लापरवाही से हम ऐसा करें तो हमें उसका पश्चाताप होना चाहिये और तुरन्त क्षमा माँगना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक मुख्य बात, जब भी हमें सच में अपने अपराध का बोध हो तो उसे फिर से अपने जीवन में दोहराना नहीं चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों से वार्तालाप करते समय सम्मान जनक शब्दों का उपयोग नहीं करना जैसे कृपया गाईये, कृपया अपने हाथों को धोयीये, कृपया ताम्बुल और सुपारी स्वीकार कीजिये, कृपया शयन करिये ऐसा न कहना बाधा है। श्रीवैष्णव परिभाषा में जब हम किसी से वार्ता करते है तो “अरुळ” (हम पर कृपा करिये), “अमुदु” (प्रसाद) और “तिरु” (सत्कार) यह सामान्य शब्द है। इन्हें “पूज्योक्ति” कहते है – सम्मान के शब्द। इन्हें प्रपन्नोक्ति भी कहते है – प्रपन्नों की भाषा। आगे सांसारिकजन कौनसे शब्द का प्रयोग करते है और प्रपन्नों को इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिये वह समझाया गया है। पहिले जो सही शब्द है इनके विषय में समझाया गया है और आगे जिस शब्द से बचना चाहिये वो समझाया गया है। जब हम श्रीवैष्णवों को “विण्णप्पम् अरुळिच्चेय्तरुळ” कहते है उसका अर्थ है अध्यापक स्वामी से कहना कि कृपया गाना प्रारम्भ करें। मन्दिर के सन्निधी में दिव्य प्रबन्ध गोष्ठी के समय मुख्य अध्यापक सबसे “सादित्तरुळ” यह कहकर गाने को कहते है और तनियन प्रारम्भ करते है। अन्य सभी उनके पीछे गाते है। विशेष उत्सव के समय अर्चक या मणियकारर कहते “अरुळप्पाडु साधु श्रीवैष्णवर्गळ्” या “अरुलप्पाडु तिरुवाय्मोलि विण्णप्पम् चेय्वार्”। गोष्ठी के मुख्य अध्यापक और अन्य भी कहते है “नायनरे नायनरे” – यह श्वान सेवा के लिये आज्ञा है। आऴ्वार स्वयं को श्वान बुलाते थे जिसका यह अर्थ था कि वें भगवान के सच्चे सेवक थे और उसके बाद गाना प्रारम्भ करते थे। यह कहीं स्थानो पर देखा जा सकता है। उसी तरह ऐसे उच्च शब्द श्रीवैष्णवों से वार्ता करते समय भी प्रयोग करना चाहिये।
  • सांसारिक लोगों से बात करते समय उच्च शब्दों का उपयोग करने के बजाय यह कहना की कहिये, प्रतीक्षा करिये/बैठीये, निवेदन करिये / तेल देना, विश्राम करिये आदि बाधा है। हमें श्रीवैष्णव परिभाषा का प्रयोग करने कि आवश्यकता भी नहीं हैं और करना भी नहीं चाहिये उन जनों के लिये जिन्हें शायद इन शब्दो की समझ न हो।
  • इन शब्दों का प्रयोग अच्छी तरह से न करना और उनके मूल्य को न जानना बाधा है – वह शब्द है: तीर्थमाडा (स्नान करना), प्रसादप्पड (प्रसाद ग्रहण करना – पाना), अमुदुपड़ी (चावल), करियमुदु (सब्जी), अदिसिल/ तिरुक्कण्णमुत्तु (पायसम – मीठा चावल), प्रसादम (भगवान और भागवतों का शेष प्रसाद), तीर्थ (पवित्र जल), तिरुमंजन (भगवान के अभिषेख के लिये जल), इलैप्प्रसादम/ इलैमुदु (केले के पत्ते में प्रसाद परोसना), मुनरावतु (चुना जो ताम्बूल और सुपारी के साथ प्रयोग होता है)।
  • सामान्य शब्दों का प्रयोग करना जैसे नहा लीजिए, खा लीजिए, चावल, पके हुए चावल, पानी, करी (सब्जी),  वेररिलै (पान के पत्ते), सुण्णाम्बू (चुने की लई) बाधा हैं।
  • इन उच्च शब्दों का प्रयोग देवतान्तर के लिये करना जिन्हें तिरुविल्लात तेवर भी कहते है अर्थात जिनका श्रीभगवान-श्रीमहालक्ष्मी से कोई सम्बन्ध न हो बाधा हैं। वह शब्द है: तिरुपती (दिव्य देश जहाँ भगवान आनन्द से अपने इच्छा से रहते है, उसे तिरुमला-तिरुपती भी मान सकते है), तिरुच्चोलै/ तिरुमालिरुन्चोलै (दिव्य बागीचा), तिरुप पोयगै (दिव्य तालाब), तिरुक्कोपुरम (मंदिर का दिव्य गोपुरं), तिरुमधिल (मंदिर के पास के दिव्य दुर्ग), तिरुविधि (मंदिर के आसपास के दिव्य मार्ग), तिरुमालीगै (आचार्य/ श्रीवैष्णवों का आवास), तिरुवासल (दिव्य मुख्य आगम मार्ग), तिरुमंडपम् (दिव्य मण्डप), तिरुच्चूररू (सन्निधि का अंदरूनी भाग), तिरुवोलक्कम (दिव्य सभा), तिरुप्पल्लियरै (पेरुमाल की दिव्य सन्निधि), तिरूप्पल्लिक कट्टिल (सिंहासन), तिरुमेरकट्टु (विधानं – छत में बांधा हुआ सजावटी वस्त्र), तिरुत्तिरै (दिव्य पटल), तिरुक्कोररोलियल (प्रसाद/ पात्र आदि ढंकने के लिए दिव्य वस्त्र), तिरुवेण चामरम, तिरुवालवट्टम (पंखा), तिरुवड़ी नीलै (चरण कमल/ पादुका), तिरुप्पडीक्कम (वह पात्र जिसमें तिरुवाराधन तीर्थ का संचय किया जाता है), तिरुमंजनक्कुडम (तिरुमंजनम/ तिरुवाराधन के लिए जल लेन का पात्र),  तिरूप्परिकरम (सामग्री), तिरुवंधिक काप्पु (आरती जो पुरप्पादु ले अंत में होती है), तिरुविलक्कु (दिव्य ज्योति), तिरुमालै (दिव्य गलमाल), तिरुवाभरणम् (दिव्य आभूषण), तिरूप्पल्लित तामं (तुलसी की माला), तिरुमेनि (शीष से नख तक भगवान का दिव्य स्वरुप), तिरुनाल (उत्सव/ त्यौहार), आदि अनुवादक टिप्पणी: भगवद, भागवत, आचार्य और आल्वारों के लिये कोई भी शब्द का प्रयोग करे तो पहिले श्री लगाना चाहिये। ऐसा करना हमारा उनके प्रति आदर बतलाता है। परन्तु यह किसी देवताओ के लिये नहीं करना चाहिये। श्रीभक्तिसार स्वामीजी नांमुगन तिरुवंदादि में कहते है “तिरुविल्लात ठेवरै थेरेन्मिन देवू” (मैं उन देवताओं को कभी देवता न समझूँगा जो कभी भी श्रीमहालक्ष्मी से सम्बन्ध न रखते हो)।
  • श्रीरंगम मंदिर को कोयिल ना कहकर श्रीरंगम बोलना, छिंकने के बाद “तिरुवरंगम” नहीं बोलकर इतर दिव्य देशों के नाम लेना, वेंकटेश भगवान को तिरुवेंकटम न बोलकर केवल वेंकटम बोलना, श्री वरदराज भगवान मंदिर को “पेरुमाल कोयिल” ना बोलते हुये कांचीपुरम बोलना, तिरुवनंतपुरम के जगह अनंतशयन बोलना बाधा है। दिव्य देशों के सम्बोधन होते है। तिरुमलाई – तिरुवेंकटम के लिए, कोयिल – श्रीरंगम के लिए, पेरुमाल कोयिल – कांचीपुरम के लिए, तिरुनारायणपुरम – मेलूकोटे के लिए ये सम्बोधन निश्चित हैं। उनको इतर नामों से बुलाना बाधा है। यें चार दिव्य देश श्रीवैष्णवो के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। श्रीवैष्णवो कों संप्रदाय के सम्बोधन उपयोग में लाना चाहिए, न की सामान्य भाषा। अनुवादक टिप्पणी: एक बार श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी एक श्रीवैष्णव गोष्ठी को उपदेश कर रहे थे तभी एक श्रीवैष्णव छिंकता है और “वेंकटम” ऐसा कहता है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को क्रोध आता है और वें कहते है तुम्हें “तिरुवरंगम” कहना चाहिये वह श्रीवैष्णव स्वीकार कर लेता है। परन्तु तिरुमला-तिरुपती से होने के कारण जब वह वापस तिरुमला जाकर श्रीअनन्तल्वान स्वामीजी के पास जाकर इसकी चर्चा करता है, तब श्रीअनन्तल्वान स्वामीजी उसे एक बात कहकर वापस भेजते है। वह फिर से भट्टर स्वामीजी के उपदेश सुनने वहां जाकर छिंकता है। वह फिर से “वेंकटम” कहता है – इस पर श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी कहते है “मैंने तुम्हें तिरुवरंगम कहने को कहा है – तो फिर यह गलती क्यों कर रहे हो?”। तब वह श्रीवैष्णव कहता है “श्रीपरकाल स्वामीजी स्वयं पेरिया तिरुमौली के वेरुवाताल में “वेंकटमे” कहते है जो श्रीरंगनाथ के लिये है”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी जो बहुत चतुर है उन्हें यह उत्तर देते है “देखों यह आल्वार नहीं कह रहे है, यह तो आल्वार परकाल नायकी के चित्त को प्रगट कर रहे है – अगर वह परकाल नायकी होती तो वह भी तिरुवरंगम कहती”। वह श्रीवैष्णव श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के बात से सहमत हो गये।

इस स्थान से श्री रामायण और अन्य पुराणों पुरुषों के नाम यहाँ संप्रदाय परिपेक्ष्य में समझाये गये है। इन सभी महा पुरुषों का कोई विशिष्ट नाम है जिसके द्वारा उनके किसी गुण का बोध होता है। यह बताया गया है हमें सामान्य पद्धती से उनका सम्बोधन ना करते हुये संप्रदाय में वर्णित विशिष्ट नामों से ही संबोधित करना चाहिए। सामान्यतः श्री रामायण को दिव्य शास्त्र का स्थान दिया गया है जो भक्ति के गुण को विशिष्टता से समझाती है।

  • श्री रामायण में – पेरुमाल की जगह श्रीराम बोलना, नाचियार/पिराट्टी की जगह सीताजी बोलना, इलाया पेरुमाल की जगह श्रीलक्ष्मणजी बोलना, कृष्ण की जगह श्रीकृष्ण बोलना (कृष्ण गो चराने वाले हैं, अत: वे श्रीकृष्ण नहीं अपितु मित्र की तरह कृष्ण सम्बोधन पसंद करते हैं।), अलगिय सिंगर की जगह श्रीनृसिंहजी बोलना – भक्तिसार स्वामीजी ने नान्मुगम तिरुवंदादी में कहते है – अलगियान ताने अरियुरुवन ताने ” (सिंह मुख भगवान सबसे सुंदर है, विष्णु सहस्त्रनाम में भी कहा गया है कि “नारसिम्ह वपु श्रीमान”– सबसे सुंदर सिंह मुख धारण किये भगवान), गुह पेरुमाल की जगह गुह बोलना, तिरुवड़ी की जगह श्रीहनुमानजी बोलना, महाराज की जगह श्रीसुग्रीवजी बोलना, पेरिया उदइयार की जगह श्रीजटायुजी बोलना, तिरु तुलै की जगह श्रीतुलसीजी बोलना बाधा है। (गुह को भगवान श्री राम ने अपने भ्राता को स्थान दिया है। अत: उनको गुह पेरुमाल कहते हैं।)
  • अनुवादक टिप्पणी: इस का सार यही है की विशेष आदर से और उनको आनंद मिले ऐसे सम्बोधन से संबोधित करना चाहिए। उत्तर भारत में दक्षिण भाषा के शब्द प्रचलित न होने से यह संभव नहीं हो पाएगा। हमें बस इतना ध्यान रखना है की प्रत्येक शब्द अत्यंत आदर पूर्वक, जिसको सम्बोधन करते हैं उसे अच्छा लगे ऐसा और हमारे पूर्वाचार्य, आलवारों में प्रचलित हो ऐसा होना चाहिए।
  • आल्वान / आल्वार भगवान के बड़े भक्तों के लिये प्रयोग किया जाता हैं जैसे श्रीविभीषण आल्वान, श्रीगजेन्द्राल्वान, तिरुवाझियाल्वान (सुदर्शन चक्र), श्रीपाञ्चजन्याल्वान (शंख), श्रीभरताल्वान, श्रीशत्रुघनाल्वान, कोईलाल्वार (भगवान कि सन्निधी), नम्माल्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी)। ऐसे न करना बाधा हैं। हम यह भी देख सकते है कि श्रीपेरियावाचन पिल्लै ने घण्टाकर्ण, जो मृत शरीर खानेवाला राक्षस हैं उनकी भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति को देखकर उन्हें भी “श्री घण्टाकर्णाल्वान” कहकर संबोधित किया। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: आल्वान / आल्वार वह हैं जो भगवद अनुभव में लीन हैं। भगवान के प्रति उनके लगाव को दर्शाने हेतु वह केवल कुछ व्यक्तिविशेष के लिये प्रयोग करते है। कई आचार्य को आल्वान उपाधी प्राप्त हुई हैं – श्रीकुरेश स्वामीजीइंगलाल्वान, नदातुराल्वान, मिलगाल्वान उनमें से कुछ है जिन्हें भगवान के प्रति उनकी अत्यंत प्रीति के लिए ऐसे संबोधन से शुशोभित किया गया.
  • “तीर्थ नारायण” के बजाय “सालग्राम” कहना बाधा है। सालग्राम दिव्य देश जहाँ के निकट कण्टकी नदी में भगवान शिला रूप में प्राप्त होते है। सामान्यत: भगवान को “सालग्राम” कहा जाता है। श्रीवैष्णव परिभाषा में यह सही नहीं है। उन्हें तीर्थ नारायण कहकर बुलाया जाता है (क्योंकि वें तीर्थ (जल) में प्राप्त होते है)। उन्हें “श्री मूर्ति” भी कहा जाता है। अनुवादक टिप्पणी: सालग्राम शिला बहुत पवित्र हैं। भगवान पत्थर रूप में प्राप्त होते हैं जिन्हें कोई भी अपने तिरुमाली में कम से कम आवश्यकता से पूजा कर सकता हैं। तीर्थ का अर्थ भी पवित्र हैं – इसलिये भगवान को तीर्थ नायनार भी बुलाते हैं। नायनार अर्थात “भगवान” या “सबसे अधीक सम्मान जनक”।
  • विशेष उपाधी को न जानना या प्रयोग न करना बाधा है। उन विशेष उपाधीयों मे शामिल हैं:
  • श्रीमत द्वारपति नायनार – भगवान के मन्दिर आदि के मुख्य द्वारपालों के नाम।
  • तिरुवासल काक्कुम मुदलीगल – यह द्वारपाल मन्दिर के अन्दर हैं (निकट सन्निधी के बाहर)। तिरुपावै के १६वें पाशुर में – “नायगनाय् निन्र नन्दगोपनुदैय कोयिल काप्पाने! तोरण वायिल काप्पाणे!”, भगवान के सेवक जो सभी क्षेत्रों कि रक्षा करते हैं ऐसे पहचाना गया है।
  • सेनै मुदलियार – श्रीविष्वक्सेनजी – भगवान के मुख्य सेनापती।
  • नम्बी मूत्ता पिरान – श्रीबलरामजी जिनकी भगवान कृष्ण के बड़े भ्राता ऐसे स्तुति किया गया है और वह जो हमेशा भगवान का खयाल रखते हैं।
  • श्री मालाकार – जैसे विष्णु पुराण में “माल्योपजीवन:” ऐसे बताया गया हैं, वह जो अपना जीवन पुष्पहार बेचकर बिताते है। अनुवादक टिप्पणी: उन्होने भगवान कृष्ण को सबसे अच्छा हार सबसे अच्छे इरादे से दिया और भगवान को बहुत खुश किया।
  • श्री विदुरजी – विदुर (ध्रुतराष्ट्र और पाण्डु के भाई) जिन्हें विदुराल्वान भी कहते थे भगवान कृष्ण के बहुत बड़े भक्त हैं। अनुवादक टिप्पणी: उनकी स्तुति “महा मथि” (वह जो बहुत विद्वान हो) ऐसे किया गया हैं। उन्होंने केले फेंककर भगवान कृष्ण को बड़े प्रेम भाव के कारण छीलके खिलाये। सच्चा ज्ञान अर्थात भगवान के प्रति उपासना।
  • श्री नन्दगोप – नन्द महाराज जिन्होंने भगवान कृष्ण को पाल पोसकर बड़ा किया। अनुवादक टिप्पणी: इनकी भी व्याख्यानों में बहुत जगह भगवान कृष्ण के प्रति लगाव के कारण स्तुति हुई हैं।
  • हमारे पूर्वाचार्य द्वारा जिन भगवान का नाम न लिया गया हो उन भगवान का नामस्मरण करना बाधा है। भगवान का नाम जैसे हरीश, सुरेश, नरेश आदि आये हैं परन्तु यह नाम हमारे आचार्य प्रयोग नहीं करते थे और इसलिये हमें भी उनका प्रयोग नहीं करना चाहिये।
  • जैसे हमारे पूर्वज बड़े आनन्द से प्रयोग करते थे वैसे आचार्यों का नामस्मरण किये बिना गाना बाधा हैं। हमारे पूर्वाचार्य सच्चे आचार्य कि स्तुति “पिल्लै”, “आल्वान”, “आण्डान”, “नम्बी” आदि का प्रयोग कर करते थे।
  • एकांतीयों (वह श्रीवैष्णव जो भगवान को हीं उपाय और उपेय मानते हैं) को उनके गाँव, वंश और जन्म पर परखना बाधा हैं। श्रीवैष्णव का उनके जन्म के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए। यह बहुत बड़ा पाप हैं। उनके गाँव के आधार पर भेद करना भी पाप हैं। श्रीवचन भूषण के ७९ और १९४ से २०० सूत्र में यह तत्व को पूर्ण विस्तार से समझाया गया है। कृपया इसे पढ़े और स्पष्ट हो जाये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीवैष्णवों कि स्तुति को स्थापित करते है। उन्होने शास्त्र के प्रमाण देकर श्रीवैष्णव के स्थान की कई भ्रांतियाँ और सन्देह को दूर किया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने सुन्दर और विस्तृत व्याख्यान में कई प्रमाण दर्शाते हैं और विस्तार से समझाते हैं इसलिये यह तत्व स्पष्टता से समझा गया है। उदाहरण के लिये सूत्र ७९ कहता हैं “एकांती व्यापदेशतवय:” – यह श्लोक विष्वक्सेना संहिता से लिया गया हैं। इस व्याख्या में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़े सुन्दरता से विस्तार से यह श्लोक को समझाते है – “जो केवल भगवान के हीं शरण में जाता है वह ही अपने गाँव, जाती आदि बढाई में नहीं पड़ता है परन्तु वह भगवान से अपने सुन्दर और नित्य सम्बन्ध कि बढाई में रहता है”। वह आगे यह भी समझाते हैं कि ऐसे भागवतों के लिये सबकुछ (गाँव, जाती, गोत्र आदि) भगवान ही हैं। सूत्र १९४ से २०० में भागवत अपचार विस्तार से समझाया गया हैं। यहाँ पर श्रीवैष्णव के शरीर त्याग करने के पश्चात क्या शब्द / या पंक्ति कहना हैं विस्तार से समझाया गया हैं। आल्वार कहते हैं “पणिकण्दाय चामारे” (चामारे का अर्थ “मरना है”। “मरणमानाल वैकुण्ठम” (जब कोई श्रीवैष्णव शरीर त्याग करता है वह श्रीवैकुण्ठम जाता है। आजकल श्रीवैष्णव परिभाषा में जब कोई श्रीवैष्णव शरीर त्याग करता है तो उसे “आचार्यन् तिरुवड़ी अदैन्तार”)। पूर्वाचार्य के ग्रन्थों में कई शब्द हैं जो श्रीवैष्णवों के शरीर त्याग करने से संबंधीत हैं जैसे “तिरुवडिच चार्न्तार” (तिरुवड़ी का अर्थ चरण कमल भी है और भगवान भी – तिरुवड़ी चार्न्तार का अर्थ चरण कमल को प्राप्त करना या भगवान को प्राप्त करना), “परमपदम् एय्तिनार” (परमपद को प्राप्त करना – सर्वोच्च तिरुमाली), “तिरुनाडू अलंकरित्तार” (व्यक्ति पवित्र स्थान पर पहूंचना और उसको सजाना), “अवतारं तीर्थं प्रसाधित्तायीररू” (अवतार का अन्त हो गया)।
  • इस बात से यह समझना चाहिये कि आदरणीय कौन से प्रकार के श्रीवैष्णव हैं वैसे पदों का प्रयोग करना चाहिये – ऐसा न करना बाधा है। परमपदधाम और तिरुनाडु दोनों का अर्थ एक ही हैं – केवल भाषा अलग हैं – पहिला संस्कृत और दूसरा तमील में है। फिर भी परमपदधाम सामान्य शब्द है और तिरुनाडु विशेष शब्द है। केवल आचार्य श्रेष्ठ जब देह त्याग करते है तो “तिरुनाडु अलंकरित्तार” ऐसे स्तुति करते है। यह बहुत कठिन है कि किस के लिए कौनसा शब्द का प्रयोग करना है – समय चलते इसे हमें अपने बड़ों से हीं सिखना हैं। अनुवादक टिप्पणी: अन्तिमोपाय निष्ठा में यह चरित्र समझाया गया हैं। श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर कहते हैं – श्रीरामानुज स्वामीजी के परमपदधाम जाने के कुछ समय तक श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कुछ समय तक इस धरती पर विराजमान थे। परन्तु जब वे भी परमपदधाम को प्रस्थान कर दिये तब एक श्रीवैष्णव श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पास जाकर कहते हैं “श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी परमपदधाम को प्रस्थान कर दिये”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी उत्तर देते हैं “श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के लिये तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिये”। वह श्रीवैष्णव पूछता हैं “क्यों नहीं? क्या वें परमपदधाम को प्रस्थान किए ऐसे हम नहीं कह सकते क्या?”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि परमपदधाम प्रपन्न और भक्तों/ भागवतों (वह जो भक्ति योग के परिश्रम से परमपदधाम को जाता है) के लिये सामान्य है – श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी का उद्देश वह नहीं था। तब वह श्रीवैष्णव पूछता हैं “क्या आपके मन में कोई और स्थान हैं?” और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी समझाते हैं “हाँ। तुम्हें यह कहना चाहिये श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में अंतरध्यान हो गये” – यह तथ्य मेरे आचार्य (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने समझाया था। इसी तरह कि घटनायें श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के पेरियाल्वार तिरुमोझी के व्याख्यान में ४.४.७ पाशुर में भी समझाया गया हैं। मुलभुत रूप यह समझाया गया हैं कि सामान्यत: जो श्रीवैष्णव इस संसार को छोड़ कर जाते हैं उन्हें “तिरुवडीच चार्न्तार” से प्रगट करते है। अगर वह श्रीवैष्णव भागवत कैंकर्य में लिप्त थे तो उन्हें “तिरुनाडू अलंकरित्तार” कहा गया है। अगर वह श्रीवैष्णव आचार्य कैंकर्य में लिप्त थे तो उन्हें “आचार्य तिरुवड़ी अदैन्तार” कहा गया है।
  • श्रीवैष्णवो को कष्ट हो ऐसे बात करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें हमेशा अच्छी तरह बोलना चाहिये। शास्त्र में कहा गया हैं “सत्यम ब्रुयत प्रियं ब्रुयात” – सत्य बोलते समय भी सुखदता से बोलना चाहिये जो सामने व्यक्ति को स्वीकारनिय हो।
  • जो व्यक्ति हमें सुन रहा हैं उससे उसका हृदय ज़ोर से धड़कने लगे इस तरिके से बात करना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीराम “मृदु पुर्वंच भाषते” ऐसे जाने जाते हैं – वह जो पहिले मृदु शब्दों से जानकारी लेते हैं, दूसरों को कष्ट पहूंचे बिना मनोहरता से बात करते हैं। इसलिये हम भी अपने आचार्य के पथ का पालन करने का प्रयास कर सकते है।
  • अपनी गलतियों को न कहना, सांसारिक जनों का दोष देखना और अपने केवल अपने अच्छे गुणों को कहना बाधा है। जैसे कहा गया हैं “अहमस्मि अपराधानाम आलय:” मैं सभी दोषों का घर हूँ, हमें अपने आप को बहुत नीचा और नम्र स्थान पर देखना चाहिये। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “तीवीनैयो पेरिताई” (मेरे कई दोष हैं)। अगर कोई अच्छे गुण हैं तो वह भगवान देखेंगे और उसे स्वीकार करेंगे। हमें अपनी बढाई का प्रचार करने कि कोई जरूरत नहीं है।
  • भगवान और भागवतों कि स्तुति न करना बाधा है। भगवान में कोई दोष नहीं हैं। उन्हें दोषरहित ऐसा कहा जाता है। भागवत भी पवित्र होते हैं – फिर भी इस संसार में रहने के कारण वें दोष से प्रभावित हो जाते है। हमें फिर भी उन दोषों कि ओर न देखते हुए उनके पवित्र गुणों कि बढाई करनी चाहिये। भागवतों में दोष देखना बहुत बड़ी गलती है।
  • केवल भगवान कि स्तुति पर केन्द्रीत होकर आचार्य कि स्तुति को र्निलक्षित करना बाधा है। जैसे हम पहिले ही चर्चा कर चुके है कि भगवान दोषरहित और पवित्र है। भागवतों को भी कसौटी कहा जाता है। एक श्रीवैष्णव का बेटा बुरी संगत में पडकर पथभ्रष्ट हो जाता है। उस श्रीवैष्णव को अपने पुत्र के इस परिस्थिति को देखकर बहुत दुख होता है। परन्तु एक दिन अचानक से वह पुत्र बदल जाता है और शिखा, यज्ञोपवित, ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक आदि सहित पिता को आदर भी देता है। वह श्रीवैष्णव आनंदित होकर उसी क्षण पूछता हैं “क्या तुमने श्रीकुरेश स्वामीजी के दर्शन किये?”। इससे हम यह समझ सकते हैं कि उस श्रीवैष्णव को यह पूर्ण विश्वास था कि केवल भागवतों कि कृपा से उनका लड़का बदल गया है। भागवतों कि महिमा भगवान कि महिमा से अधीक है। भागवतों में आचार्य हीं सबसे बड़े है – हमें अपने आचार्य के बारें में कभी भी उच्च बोलना चाहिये।
  • आध्यात्मिक विषयों में ज्ञानी होने से हमें निरन्तर आलवार / आचार्य के पाशुरों और स्तोत्र को गाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। पाशुरों को गाते समय हमें उनके दिव्य अर्थों का भी अनुसन्धान करना चाहिये। इसमें हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा रचित कई ग्रन्थ भी हैं जिन्हें पढ़कर हर समय स्मरण भी करना चाहिये।
  • हमारे आचार्य के सिखाये गुरु परम्परा मन्त्र और द्वय महामन्त्र का जाप छोड़ अन्य मन्त्र का जाप करना और ऐसे गुरु परम्परा मन्त्र और द्वय महामन्त्र के जाप का त्याग करना बाधा हैं। द्वय महामन्त्र (तिरुमन्त्र, द्वय मन्त्र और चरम श्लोक) रहस्य त्रय का सूचक हैं। अनुवादक टिप्पणी: जैसे हमने समझा हैं कि हमारे पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र का निरन्तर जाप करते थे और हमें यह भी समझना चाहिये कि द्वय महामन्त्र का जाप पहिले गुरु परम्परा का जाप किये बिना नहीं किया जा सकता है यानि हम पहिले अम्माजी या भगवान के पास नहीं जाते हैं बल्कि हम गुरु परम्परा के द्वारा ही जाते हैं। इसिलिए हमारे आचार्य द्वय महामन्त्र का जाप करने से पहिले गुरु परम्परा मन्त्र का जाप करते थे।

यहाँ गुरूपरम्परा मन्त्र हैं जिसे द्वय महामन्त्र के पहिले कहना चाहिये।

अस्मद् गुरूभ्यो नम: (हमारे स्वयं के आचार्य)
अस्मद् परमगुरूभ्यो नम: (हमारे आचार्य के आचार्य)
अस्मद् सर्वगुरूभ्यो नम: (सभी आचार्य)
श्रीमते रामानुजाय नम: (श्रीरामानुज स्वामीजी)
श्री पराङ्कुशदासाय नम: (श्रीमहापूर्ण स्वामीजी)
श्रीमद् यामुनमुनये नम: (श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी)
श्री राममिश्राय नम: (श्रीराममिश्र स्वामीजी)
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम: (श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी)
श्रीमन्नाथमुनये नम: (श्रीनाथमुनि स्वामीजी)
श्रीमते शठकोपाय नम: (श्री शठकोप स्वामीजी)
श्रीमते विष्वक्सेनाय नम: (श्रीविष्वक्सेनजी)
श्रियै नम: (श्री अम्माजी 
श्रीधराय नम: (श्री भगवान)

श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २७४ सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है –जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – हमें निरन्तर गुरूपरम्परा और द्वय महामन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/06/virodhi-pariharangal-26.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २४

५७) प्रसाद विरोधी – शुद्ध प्रसाद में बाधाएं

श्रीरंगनाथ भगवान के प्रसाद से श्रीकुरेश स्वामीजी और आण्डाल अम्माजी को श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदव्यास भट्टर स्वामीजी प्राप्त हुए

प्रसाद का अर्थ वह भोजन है जो सबसे पहिले भगवान को अर्पण किया गया हो। भोजन जो तिरुमदप्पल्ली (रसोई) में बनाया गया हो। कच्चा दूध, फल, शक्कर आदि का एक बार भगवान को भोग लग गया तो वह प्रसाद हो जाता है। भगवान को भोग लगाना इसे तमील में ऐसे समझाया गया है “कंण्डरुलप पण्णुत्तल” – इसका अर्थ है वह जो भगवान को निवेदन किया गया हो जिसे कृपाकर वे अपनी दिव्य दृष्टी से देखकर पवित्र कर सके। प्रसाद स्वीकार का अर्थ प्रसाद को ग्रहण कर उसे पाना है। अनुवादक टिप्पणी: यह श्रीवैष्णवों के लिये सर्वश्रेष्ठ महत्त्वपूर्ण है कि केवल प्रसाद को ही भोजन में पाये। बिना भगवान को भोग लगाये पाना सर्व प्रथम पाप हैं – यह भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता के ३.१३ में समझाया हैं तिरुवाराधन को यागम् समझाया गया है और तिरुवाराधन में अर्पण किया हुए प्रसाद को पाने को अनुयागम् कहा गया है। दोनों ही श्रीवैष्णवों के लिये महत्त्वपूर्ण है। हमारे पूर्वाचार्य प्रसाद का बहुत सम्मान/ आदर करते थे। जब श्रीकुरेश स्वामीजी के तिरुमाली में भगवद प्रसाद भेजा गया था तो उसे पूरे हर्षोल्लास के साथ भेजा गया था। जिस पात्र में प्रसाद हो उसे सिर पर पूर्ण आदरपूर्वक रखते है। उसके साथ छत्र, चामर, वाद्य आदि भी होते है। एक और घटना में जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को प्रसाद दिया गया तो उन्होंने बड़े आनन्द से कहा “यां पेरू संमानम्” – यहीं वो सम्मान है जो हम प्राप्त करते है। अत: प्रसाद को पूर्ण आदर और सम्मान देना चाहिये। आजकल यह देखा जाता है कई जन (श्रीवैष्णव भी) प्रसाद का पूर्ण रूप से आदर नहीं करते है। कई जन प्रसाद ग्रहण कर दूसरों को दे देते है। कई जन प्रसाद लेकर मन्दिर में ही रख देते है। ऐसे व्यवहार से बचना चाहिये।

  • सांसारिक गाँव/ शहरों के मन्दिर में भगवान का प्रसाद ग्रहण करना और पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: प्रसाद जो सांसारिक जनों द्वारा बनाया और दिया गया हो तो भी उसका त्याग करना चाहिये। जब सांसारिक जन प्रसाद को बनाते और देते है तो वो सांसारिक विचार से करते है और उसका असर जो प्रसाद पाता है उस पर होता है। ऐसे प्रसाद से बचना उचित है। टिप्पणी: हमें सर्व प्रथम यह समझना चाहिये कि हम सांसारिक नहीं है, परंतु यदि सांसारिक बुद्धि वाले है और संसार में रत है तो भगवान के प्रसाद यह कहकर अनादर करना कि यह संसारी द्वारा पकाया गया है, अनुचित है।
  • दिव्य देश (अभिमान स्थल, आल्वार/आचार्य अवतार स्थल) के मन्दिर में प्रसाद पाने से बचना बाधा है। उसे वितरण करते ही पाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह समझाया गया है कि जब भी प्रसाद का वितरण हो उसे उसी क्षण पाना चाहिये। “प्रसाद प्रपत्ती मात्रेण: भोक्तव्य” व्याख्यान में भी लिखा है। हम यह स्मरण कर सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगम में खेल खेलनेवाले बच्चों से भी प्रसाद ग्रहण किये और तिरुवाराधन को पूरा किया जब की वह उनके खेल का हिस्सा था।
  • दिव्य देश के भगवान का प्रसाद विश्लेषण करने के पश्चात पाना बाधा है। वह कैसे बनाया गया है, किसने बनाया है आदि यह पुछताछ किये बिना उसे जैसे प्राप्त हुआ वैसे ही पाना चाहिये।
  • उपवास आदि के कारण प्रसाद का त्याग करना बाधा है। शास्त्रानुसार एकादशी का पालन करना चाहिये परन्तु दिव्य देश के मंदिरों में जब प्रसाद आदि देते है तो उसे सन्मान के साथ ग्रहण कर पाना चाहिये। भगवद प्रसाद का त्याग अर्थात उनका अपमान है। अनुवादक टिप्पणी: उपवास केवल विशेष दिवस पर किया जाता है जैसे एकादशी, पितृ तर्पण, ग्रहण आदि – ऐसे उपवास का कोई विकल्प नहीं है, उसे करना ही चाहिये। ऐसे उपवास के समय हमें भगवद प्रसाद प्राप्त हो तो हमें उस प्रसाद को सम्मान करते हुए ग्रहण करना चाहिये।
  • प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात आचमन कर स्वयं को शुद्ध करने कि इच्छा करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: कुछ भी पाने के पश्चात हम हाथ, पैर धोते है और आचमन करते है। परंतु मन्दिर में भगवान का प्रसाद पाने के पश्चात अगर हमारे हाथ मुँह को स्पर्श न हो तो ऐसा कुछ भी शुद्धीकरण करने कि आवश्यता नहीं है। प्रसाद पाने के पश्चात हाथ पर जो भी बचा हो उसे अपने माथे पर पोछ लेना चाहिये।
  • भागवत प्रसाद को दूषित मानना बाधा है। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमालै के ४१वें पाशुर में समझाते है कि “पोनगम शेय्द शेडम तरुवरेल पुनिदमन्रे” – अगर भागवत अपना शेष प्रसाद देते है तो वह सबसे अधीक पवित्र है। सामान्यत: किसी के द्वारा भोजन झूठा छोड़े जाने पर वह दूषित होने से हम उसे नहीं पाते है। ऐसे विचार हमें भागवत प्रसाद के समय नहीं आना चाहिये।
  • आचार्य प्रसाद को सामान्य मानना बाधा है। उसे बड़े आदर के साथ ग्रहण करना चाहिये।
  • आचार्य प्रसाद को सभी के सामने ग्रहण करने से हिचकिचाना बाधा है।
  • आचार्य के मुख से स्पर्श होकर यह प्रसाद दूषित हो गया है ऐसा समझना बाधा है।
  • आचार्य प्रसाद पाने के लिये पूरे दिन भूखे नहीं रह पाना बाधा है। हमें प्रति दिन आचार्य प्रसाद को बड़े ही उत्सुकता से पाना चाहिये। इस सम्बन्ध में हम श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर को स्मरण कर सकते है जो “मोर मुन्नार ऐयर” (जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शेष प्रसाद (दही के चावल) को उनके केले के पत्ते में सबसे पहिले पाते थे) के नाम से भी प्रसीद्ध थे। वे “चिरोपासित सत वृत्तर” के नाम से भी प्रसीद्ध थे – जो अपने अच्छे आचरण के लिये जाने जाते थे। यहाँ सत वृत्ति (अच्छा आचरण) अर्थात प्रतिदिन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रसाद पाने के पश्चात उसी पात्र में पाना। वह भी इसलिये क्योंकि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपना प्रसाद दही के चावल से समाप्त करते थे और जीयर प्रसाद को वही से प्रारम्भ करते थे जिससे उनके प्रसाद में आचार्य का स्वाद आये और उसके पश्चात वो रसम चावल और नेगिलकरीयमुत्तु (कुलम्भु) चावल पाते थे। यही श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर स्वामीजी हम पर “श्रीवचन भूषण मीमांसा भाष्य” नामक ग्रन्थ की कृपा किये।
  • भगवान को अर्पण किये हुए भोग पर जब उनके पाने के कोई निशान न दिखे तब भी ऐसे प्रसाद को खुशी से न पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अर्चावतार भगवान सामान्यत: अपने पवित्र नेत्रों से प्रसाद पाते है न की मुख से और उस भोग को प्रसाद में परिवर्तित करते है। इसलिये उनके द्वारा पाए गये प्रसाद पर कोई चिन्ह नहीं होंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें भगवद प्रसाद पाने में आनन्द नहीं लेना चाहिये।
  • जब आचार्य अपने निर्हेतुक कृपा से प्रसाद प्रदान करते है तो उसे उसी क्षण पा लेना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन से हम कई घटना ऐसी देख सकते है जहाँ उन्होंने स्वयं अपने शिष्य को अपना प्रसाद दिया है जैसे श्रीशैलेश स्वामीजी अपना शेष प्रसाद श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी श्रीवेदांती स्वामीजी को दिये है।
  • आचार्य के साथ बैठ कर प्रसाद पाना बाधा है। हमें आचार्य के प्रसाद पाने कि प्रतिक्षा कर फिर पाना प्रारम्भ करना चाहिये।
  • अपने आचार्य को प्रसाद पाते देख हमें पूर्णत: आनंदित होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • स्वयं भगवान के प्रसाद के पात्र से प्रसाद लेना बाधा है। हमें दूसरों के द्वारा प्रसाद वितरण करने तक रुकना चाहिए।
  • बिना अर्चक कि आज्ञा से प्रसाद लेना बाधा है।
  • भोग या प्रसाद जो भी अर्पण किया हो उसे दूषित करना बाधा है।
  • गुरु भाइयों को छोड़ प्रसाद पाना बाधा है। हमें दूसरों को प्रसाद देकर उनके साथ बैठकर प्रसाद पाना चाहिये।
  • प्रसाद के बर्तन या पत्ते को पीछे नहीं छोड़ना चाहिये जिससे संसारी, नास्तिक, पशु-कुत्ते आदि उसे स्पर्श न करें। ऐसा करना बाधा है।
  • भगवद/ भागवत प्रसाद को पाते समय शिष्टाचार न पता होना बाधा है। प्रसाद को बड़े आदर के साथ पाना चाहिये जैसे हमारे पूर्वाचार्य रखते थे और ऐसे तत्व का पालन न करना / उसे न जानना बाधा है।
  • प्रसाद को जमीन पर गिराना, पैर रखना, आदर न करना, आदि बाधा है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २३

५६) तीर्थ विरोधी – तीर्थ (पवित्र जल) से सम्बंधित बाधाएं

श्रीदाशरथी स्वामीजी का श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर सभी नगरवासी पवित्र होते हुए। श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करते हुए।

तीर्थ का अर्थ है पवित्र जल। यह पवित्रता भगवान, आचार्य आदि के सम्पर्क में आने से आती है। जो जल भगवान के तिरुवाराधन में प्रयोग होता है उसे तीर्थ कहते है। उसे “भगवान का तीर्थ” भी कहते है। श्रीवैष्णव के परिभाषा में भगवान को स्नान कराने को “तिरुमञ्जन” कहते है। अन्य परिपेक्ष्य में भगवान के स्नान को “अभिषेक” भी कहते है। भगवान के स्नान के लिये जिस जल का प्रयोग होता है उसे “तिरुमञ्जन तीर्थ” कहते है। श्रीवैष्णव गोष्ठी (अन्य भी) में उसे एकत्रित कर सभी को वितरित किया जाता है। श्रीवैष्णव परिभाषा में श्रीवैष्णवों के स्नान किये हुए जल को भी “तीर्थादुथल” कहते है। आचार्य और उच्च कोटी के श्रीवैष्णवों के चरणामृत को “श्रीपादतीर्थ” कहते है। जो जल आचार्य के चरण पादुका के सम्पर्क में आता है उसे भी “श्रीपाद तीर्थ” कहते है। इस भाग में हम भगवान के तीर्थ, तिरुमञ्जन तीर्थ और श्रीपादतीर्थ से सम्बंधित “तीर्थ विरोधी” विषयों में अभ्यास सिखेंगे। अनुवादक टिप्पणी: तीर्थ के कई अर्थ है – पवित्र जल, पवित्र स्थान, स्वयं भगवान आदि। यहाँ हम केवल पवित्र जल जो कई प्रकार के है उस पर विषय को केन्द्रीत करेंगे।

  • भगवान का तीर्थ सांसारिक जनों या उनके घर से लेना बाधा है। मुमुक्षु वह है जो मोक्ष पर केन्द्रीत रहता है। जो सांसारिक लाभ पर केन्द्रीत होता है उसे भुभुक्षु कहते है। ऐसे जनों से भगवान का तीर्थ ग्रहण करना हानिकारक है क्योंकि ऐसे जनों से कोई भी सम्बन्ध हमारी निष्ठा पर प्रभाव डाल सकता है और पूर्वाचार्यों द्वारा दर्शाये गये मार्ग पर चलने से हमें डिगा सकता है।
  • साधनान्तर मनुष्यों (वह जो भगवान छोड़ अन्य सभी को उपाय मानता है) के सामने भगवान का तीर्थ ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: साधन का अर्थ कुछ पाने के लिये उपाय करना है। शास्त्र में भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्त करने के उपाय हेतु कई विधियाँ समझायी गयी है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। कुछ जन प्रपत्ति को भी उपाय मानते है। परन्तु सच्चे प्रपन्न/ शरणागत केवल भगवान को ही एकमात्र उपाय मानते है। जो स्वयं के प्रयत्न को भगवान के प्राप्ति का उपाय समझते ऐसे जनों के सामने हमे कुछ भी पाना नहीं चाहिये।
  • मन्त्र उच्चारण (द्वय महामन्त्र छोड़ अन्य मन्त्र) करनेवालों के सामने भगवान का तीर्थ पाना बाधा है। शिष्य को आचार्य द्वारा बताये गये रहस्य त्रय ही उपयुक्त है उसके अतिरिक्त अन्य कोई मन्त्र है तो वह देवतान्तर मन्त्र है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान ही उपाय और अम्माजी और भगवान के प्रति पवित्र कैंकर्य ही उपेय है, द्वय महामंत्र इस बात को अत्यंत स्पष्टता से प्रकाशित करते है, इसलिये हमारे पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र कि बड़ी स्तुति करते है। सभी मंत्रों में इस मन्त्र को मन्त्र-रत्न कहते है और हमारे पूर्वाचार्य इसका निरन्तर जप करने और स्मरण करने को कहते है। “पूर्व-दिनचर्या” रचना में श्रीएरुम्बी अप्पा यह दिखाते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के ओष्ठ निरन्तर द्वय महामन्त्र का जाप करते है और उनका मन सदा उसके अर्थ का अनुसंधान करता था।
  • दिव्य देश में तीर्थ लेने से पहिले भगवान के तीर्थ कि पवित्रता को जाँचना बाधा है। दिव्य देशों में तीर्थ लेने से हमे घबराना नहीं चाहिये। दिव्य देश अर्थात वह मन्दिर जहाँ आल्वारों ने अपने दिव्य प्रबन्धनों में भगवान कि स्तुति की है। यही नियम उस स्थान के लिए भी है जो आचार्य / आल्वारों से सम्बंधित है (उदाहरण – अभिमान स्थल, अवतार स्थल आदि) – वों भी दिव्य देश के समान है।
  • अन्य स्थानों पर भगवान के तीर्थ की शुद्धता को जाँचे बिना ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देश, अभिमान स्थल और आचार्य / आल्वारों का अवतार स्थान को छोड़कर – अन्य स्थानों प्र हमें यह सुनिश्चित कर लेना चाहिये कि वहां श्रीवैष्णव क्रम का पालन हो रहा है। उदाहरण के लिए हमारे पूर्वज मन्दिर में प्रवेश करने के पूर्व यह सुनिश्चित कर लेते थे कि मन्दिर में जहाँ आचार्य/ आल्वारों कि सन्निधी है वहाँ सही क्रम का पालन हो रहा है और भगवान के साथ उनकी भी उचित सेवा हो रही है।
  • सांसारिक जनों के सामने तीर्थ लेना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्य सांसारिक मानसिकता वाले लोगों से बचते थे और उनके सामने कुछ भी नहीं पाते थे।
  • अन्य श्रीवैष्णव के ग्रहण करने से पूर्व हमारा तीर्थ पाना बाधा है। हमें तीर्थ अन्य श्रीवैष्णव लेने के पश्चात ही लेना चाहिये। हमें जबरदस्ती कर आगे जाकर तीर्थ ग्रहण करने कि कोई आवश्यकता नहीं है।
  • किसी दिशा या स्थिति विशेष में तीर्थ लेने से बचना बाधा है। तीर्थ लेने के लिये ऐसा कोई नियम नहीं है जैसे पूर्व दिशा में होना, इत्यादि। हम श्रीवैष्णव गोष्ठी में कहीं भी हो हम तीर्थ ले सकते है।
  • तीर्थ ग्रहण करने के पश्चात उसे हमे अपने नेत्र और माथे पर बड़े आदर पूर्वक लगाना चाहिये – ऐसा न करना बाधा है।
  • तीर्थ ग्रहण करने के पश्चात हाथों को धोने का विचार करना भी बाधा है।
  • भगवद, आचार्य आदि का कोई भी कैंकर्य करने के पूर्व हाथों को धोना चाहिये। तीर्थ लेते समय हाथ ओष्ठ को छु सकते है – इस अशुद्धी को पवित्र करने हेतु हमें कोई कैंकर्य करने के पूर्व हाथों को धो लेना चाहिये।
  • तीर्थ को जमीन पर गिराना बाधा है। हमें तीर्थ ग्रहण करते समय अपना उपरी वस्त्र को हाथों के नीचे रखना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि तीर्थ जमीन पर न गिरे। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह समझाया गया है कि जो भी तीर्थ गिराता है वह बहुत बड़ा पाप करता है। तीर्थ या प्रसाद पर पैर रखने पर भी यही कहा गया है।
  • तीर्थ को माथे पर उछालना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले कहा गया है तीर्थ को नेत्र और माथे पर बड़े आदर पूर्वक लगाना चाहिये।
  • सांसारिक बाते करते हुए तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है। तीर्थ को बड़े आदर पूर्वक ग्रहण करना चाहिये और उस समय बाते करने से बचना चाहिये।
  • सांसारिक जनों द्वारा देखे जाने पर उस तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है।
  • हमें यह ज्ञान होना चाहिये कि भगवान के तीर्थ से भी बढ़कर श्रीवैष्णवों का श्रीपाद तीर्थ है। यह न समझना बाधा है।
  • तीर्थ कि सच्ची महिमा न जानकार, उसके देनेवाले के बाह्य रूप को देखकर ग्रहण करना बाधा है।
  • तीर्थ केवल एक बार ग्रहण करना पर्याप्त है यह तीर्थ देते समय क्या बोल रहे है उसपर आधारित है। सामान्यत: शातुमोरा के समय तीर्थ दिया जाता है और उस समय एक बार तीर्थ ग्रहण करना उचित है। यह न समझना बाधा है।
  • आचार्य का श्रीपाद तीर्थ जो आचार्य के कृपा से प्राप्त होता है उसे एक से अधीक बार ग्रहण करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: कुछ मठ/तिरुमाली श्रीपाद तीर्थ दो बार और कुछ में तीन बार दिया जाता है। शास्त्र में दोनों के लिये उचित प्रमाण है। इसलिये यह समझा जा सकता है कि श्रीपाद तीर्थ को केवल एक बार नही लेना चाहिये।
  • हमें यह समझना चाहिये कि सदाचार्य का श्रीपाद तीर्थ हमेशा पूजनीय है (जैसे मटके में रखा गंगा जल पूजनीय है)। हमें यह भी समझना चाहिये कि यह शिष्टाचार है (यह बड़ों द्वारा आचरण मे लाया गया है) और हमे भी यह करना चाहिये। यह न समझना बाधा है।
  • श्रीपाद तीर्थ की महिमा “वेधकप पोन” (वह कसौटी जो ताम्बे को सोने में बदल देता है) से कि जाती है। श्रीपाद तीर्थ के केवल सम्बन्ध मात्र से हम पवित्र हो जाते है। “श्रमणी विदुर ऋषि पत्निकलैप पुतराक्किन पुण्डरीकाक्षन् नेदुनोक्कू” आचार्य हृदय – भगवान श्रीमन्नारायण के पवित्र नेत्र जिन्हें पुण्डरीकाक्ष ऐसे स्तुति किया जाता है उन्होंने शबरी, विदुर और ऋषियों कि पत्नीयों को भी पवित्र कर दिया। भगवान के पवित्र नेत्र जैसे आचार्य के पवित्र नेत्र भी श्रेष्ठ है। ऐसे आचार्य के श्रीपाद तीर्थ को विशेष मानना चाहिये। और इसे विशेष ज्ञान कहते है। ऐसा ज्ञान न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुरेश स्वामीजी के जीवन में एक सुन्दर घटना दर्शायी गयी है। एक श्रीवैष्णव का पुत्र उसके गलत संगत से अवैष्णव कि ओर बढ़ रहा था। परन्तु एक दिन अचानक वह अपने पिता के सामने सुन्दर वैष्णव वेष, तिलक आदि के साथ आया। उसके पिता ने तुरन्त पूछा कि क्या श्रीकुरेश स्वामीजी ने तुम्हें अपने पवित्र नेत्रों से देखा? ऐसा श्रीकुरेश स्वामीजी कि महिमा थी कि केवल अपने दृष्टि से किसी व्यक्ति में अच्छे पवित्र गुण लायेंगे।
  • केवल श्रीपादतीर्थ कि महिमा जानकार उसे ग्रहण करना और उसे पाने कि चाह नहीं होना बाधा है। केवल महिमा ही नहीं जानना चाहिये परन्तु ऐसे श्रीपाद तीर्थ को ग्रहण करने कि अति आर्तता भी होनी चाहिये।
  • किसी ऐसे तीर्थ को ग्रहण करना जिनका देवतान्तर सम्बन्ध हो वो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के विरुद्ध है। परिणाम जाने बिना ऐसे तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है।
  • आनंदित होकर सबसे पहिले तीर्थ ग्रहण करना और अन्त में ग्रहण करने से हिचकिचाना बाधा है। तीर्थ को जो भी स्थिति हो यह समझकर कि वो हमें शुद्ध करेगा, बिना कुछ अधिक सोचे विचारे ग्रहण करना चाहिये।
  • श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करने से अस्वीकार करना क्योंकि उसमें स्वयं का श्रीपादतीर्थ है। विशेष समय में जब तिरुमाली में श्रीवैष्णव गोष्ठी होती है यह सामान्य प्रथा है कि वहाँ पधारे सभी श्रीवैष्णवों का श्रीपादतीर्थ लिया जाता है। उस श्रीपादतीर्थ को एकत्रीत किया जाता है और सभी को वितरीत किया जाता है। उस समय यह सोचकर कि उसमें अपना श्रीपादतीर्थ मिला हुआ है किसी को भी उस श्रीपादतीर्थ को अस्वीकार नहीं करना चाहिये। हमें यह विचार कर उस श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये कि उसमें वह जल है जो कई श्रीवैष्णवों के चरण साफ करने हेतु प्रयोग किया गया हो और यह हमें अधीक शुद्ध करेगा।
  • प्रायश्चित के लिये उपयोग तीर्थ जो कुछ कर्मों के लिये किया गया हो उसे प्रपन्नों को उपयोग नहीं करना चाहिये। ऐसा करना बाधा है।
  • शैव आदि से शारीरिक सम्पर्क में आने से हमें स्वयं को शुद्ध करने हेतु श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। जब शारीरिक सम्पर्क होता है तो हमें उस भाग को धोकर साफ कर श्रीपाद तीर्थ लेना चाहिये। उस पाप के लिये यह प्रायश्चित है। हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन कि घटना को स्मरण कर सकते है। जब एक पाषण्ड के शरीर कि भस्म फैलकर स्वामीजी को स्पर्श कि तो स्वामीजी उसी क्षण अपने माता के पास गये और उन्हें शुद्ध करने को कहा। उनकी आण्डाल माता जो शास्त्र में विद्वान है उन्होने एक ब्राम्हण श्रीवैष्णव का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने को कहा और भट्टर स्वामीजी भगवान के पुरप्पाडु उत्सव के समय आये एक ब्राम्हण श्रीवैष्णव से विनंती कर उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करके स्वयं को शुद्ध किया। यह घटना वार्तामाला ३२७ में है।
  • श्रीपाद तीर्थ को केवल शुद्ध मानना और श्रीपादतीर्थ के प्रति अधीक लगाव न होना बाधा है। उसे बहुत आनंददायक समझना चाहिये।
  • केवल दिन में एक बार श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने से संतुष्ट होना और उसे दोबारा लेने कि इच्छा न करना बाधा है। जैसे कि एक शिशु जो अभी माँ का दूध पी रहा है उसे अपनी माँ के दूध कि और अधीक ललक होती है वैसे हीं हमें अपने आचार्य के श्रीपादतीर्थ कि ललक होनी चाहिये। ऐसे न करना बाधा है।
  • यह समझे बिना कि यह हमारे आचार्य का इस संसार में अन्तिम जन्म है आचार्य के श्रीपादतीर्थ से वंचीत रहना बाधा है। जैसे सहस्त्रगीति में “मरणमानाल वैकुण्ठं” कहा गया है (जब हम मर जायेंगे तो हम परमपद जायेंगे) हमें अपने आचार्य को बड़े आदर से देखना चाहिये और उनके श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये और जब तक वे संसार में है उनसे बहुमूल्य उपदेश सुनना चाहिये।
  • श्रीपादतीर्थ तीर्थ देनेवाले से सीधा ग्रहण करना चाहिये नाकी किसी ओर से। जैसे भगवान के तीर्थ वितरण के समय एक सह तीर्थकार देता है। ऐसा यहाँ नहीं होता है।
  • स्वयं श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना बाधा है। हमें आचार्य या जो तिरुवाराधन करते है उन्हीं से श्रीपादतीर्थ लेना चाहिये।
  • जब तक श्रीपादतीर्थ न मिले उसे पाने कि हमें बहुत ललक होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ अनजाने से श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने कि निन्दा कि गयी है।
  • श्रीपादतीर्थ देनेवाले और लेनेवाले दोनों का द्वय महामन्त्र पर ध्यान केन्द्रीत होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: द्वय महामन्त्र का अर्थानुसंधान हमेशा गुरुपरम्परा मन्त्र के साथ करना चाहिये। यह हमें निरन्तर स्मरण करायेगा कि हम अम्माजी और भगवान के दास है, जब हम स्मरण करेंगे की सिर्फ भगवान ही उपाय है तब परमपद में उनकी नित्य सेवा की हमारी लालसा बढ़ती जायेगी। गुरुपरम्परा मन्त्र को निरन्तर कहने से हमें यह स्मरण होता है कि भगवान के साथ हमारा सम्बन्ध आचार्य के संबंध से ही है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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