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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २६

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरत्तु नम्बी को दिया। वंगी पुरत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधी परिहारंगल (बाधाओं को हटाना)” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया। इस ग्रन्थ पर अंग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेंगे। इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग “https://goo.gl/AfGoa9”  पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २५

mamuni-thiruvahindrapuram

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी – तिरुवहिन्द्रपुरम – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को विशदवाक्शिखामणि की उपाधि दी गयी है (अर्थात् वह जो केवल उतना कहता या लिखता है जितना कि उस तत्त्व को समझाने के लिये आवश्यक है)

५८) उक्ति विरोधी – भाषा / बोली में बाधाएं

उक्ति अर्थात शब्द, भाषा, बात करने का तरीका आदि। इस अंश में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि श्रीवैष्णवों को विशिष्ट श्रीवैष्णव परिभाषा का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये और वही बोलना चाहिये और सांसारिक जनों की तरह बात करने से बचना चाहिये। यह अंश बहुत बड़ा है। फिर भी यह बहुत महत्वपूर्ण है और इसका अपने दैनिक जीवन में भी पालन करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों ने सामान्य शब्दों के लिए कई विशिष्ट सुंदर श्रीवैष्णव शब्दों का प्रयोग किया है। इस विषय का अधिकांश भाग तमील शब्दों से संबंधित है परन्तु यही तत्त्व अन्य भाषाओं में भी लागू किया जा सकता है। अन्य भाषाओं में वहीं कार्य कई शब्दों में समझाया जा सकता है। श्रीवैष्णव होने के कारण हमें सम्मानजनक शब्द अथवा भाषा का प्रयोग करना चाहिये।

  • जब भी कोई श्रीवैष्णव हमें बुलाते है तो हमें “अड़ियेन्” कहकर उत्तर देना चाहिये। और जब सांसारीक जन बुलाते है तो हमें “जी कहिए” ऐसा कहकर उत्तर देना चाहिये। इसका उल्टा करना बाधा है। अगर गलती से या लापरवाही से हम ऐसा करें तो हमें उसका पश्चाताप होना चाहिये और तुरन्त क्षमा माँगना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक मुख्य बात, जब भी हमें सच में अपने अपराध का बोध हो तो उसे फिर से अपने जीवन में दोहराना नहीं चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों से वार्तालाप करते समय सम्मान जनक शब्दों का उपयोग नहीं करना जैसे कृपया गाईये, कृपया अपने हाथों को धोयीये, कृपया ताम्बुल और सुपारी स्वीकार कीजिये, कृपया शयन करिये ऐसा न कहना बाधा है। श्रीवैष्णव परिभाषा में जब हम किसी से वार्ता करते है तो “अरुळ” (हम पर कृपा करिये), “अमुदु” (प्रसाद) और “तिरु” (सत्कार) यह सामान्य शब्द है। इन्हें “पूज्योक्ति” कहते है – सम्मान के शब्द। इन्हें प्रपन्नोक्ति भी कहते है – प्रपन्नों की भाषा। आगे सांसारिकजन कौनसे शब्द का प्रयोग करते है और प्रपन्नों को इन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिये वह समझाया गया है। पहिले जो सही शब्द है इनके विषय में समझाया गया है और आगे जिस शब्द से बचना चाहिये वो समझाया गया है। जब हम श्रीवैष्णवों को “विण्णप्पम् अरुळिच्चेय्तरुळ” कहते है उसका अर्थ है अध्यापक स्वामी से कहना कि कृपया गाना प्रारम्भ करें। मन्दिर के सन्निधी में दिव्य प्रबन्ध गोष्ठी के समय मुख्य अध्यापक सबसे “सादित्तरुळ” यह कहकर गाने को कहते है और तनियन प्रारम्भ करते है। अन्य सभी उनके पीछे गाते है। विशेष उत्सव के समय अर्चक या मणियकारर कहते “अरुळप्पाडु साधु श्रीवैष्णवर्गळ्” या “अरुलप्पाडु तिरुवाय्मोलि विण्णप्पम् चेय्वार्”। गोष्ठी के मुख्य अध्यापक और अन्य भी कहते है “नायनरे नायनरे” – यह श्वान सेवा के लिये आज्ञा है। आऴ्वार स्वयं को श्वान बुलाते थे जिसका यह अर्थ था कि वें भगवान के सच्चे सेवक थे और उसके बाद गाना प्रारम्भ करते थे। यह कहीं स्थानो पर देखा जा सकता है। उसी तरह ऐसे उच्च शब्द श्रीवैष्णवों से वार्ता करते समय भी प्रयोग करना चाहिये।
  • सांसारिक लोगों से बात करते समय उच्च शब्दों का उपयोग करने के बजाय यह कहना की कहिये, प्रतीक्षा करिये/बैठीये, निवेदन करिये / तेल देना, विश्राम करिये आदि बाधा है। हमें श्रीवैष्णव परिभाषा का प्रयोग करने कि आवश्यकता भी नहीं हैं और करना भी नहीं चाहिये उन जनों के लिये जिन्हें शायद इन शब्दो की समझ न हो।
  • इन शब्दों का प्रयोग अच्छी तरह से न करना और उनके मूल्य को न जानना बाधा है – वह शब्द है: तीर्थमाडा (स्नान करना), प्रसादप्पड (प्रसाद ग्रहण करना – पाना), अमुदुपड़ी (चावल), करियमुदु (सब्जी), अदिसिल/ तिरुक्कण्णमुत्तु (पायसम – मीठा चावल), प्रसादम (भगवान और भागवतों का शेष प्रसाद), तीर्थ (पवित्र जल), तिरुमंजन (भगवान के अभिषेख के लिये जल), इलैप्प्रसादम/ इलैमुदु (केले के पत्ते में प्रसाद परोसना), मुनरावतु (चुना जो ताम्बूल और सुपारी के साथ प्रयोग होता है)।
  • सामान्य शब्दों का प्रयोग करना जैसे नहा लीजिए, खा लीजिए, चावल, पके हुए चावल, पानी, करी (सब्जी),  वेररिलै (पान के पत्ते), सुण्णाम्बू (चुने की लई) बाधा हैं।
  • इन उच्च शब्दों का प्रयोग देवतान्तर के लिये करना जिन्हें तिरुविल्लात तेवर भी कहते है अर्थात जिनका श्रीभगवान-श्रीमहालक्ष्मी से कोई सम्बन्ध न हो बाधा हैं। वह शब्द है: तिरुपती (दिव्य देश जहाँ भगवान आनन्द से अपने इच्छा से रहते है, उसे तिरुमला-तिरुपती भी मान सकते है), तिरुच्चोलै/ तिरुमालिरुन्चोलै (दिव्य बागीचा), तिरुप पोयगै (दिव्य तालाब), तिरुक्कोपुरम (मंदिर का दिव्य गोपुरं), तिरुमधिल (मंदिर के पास के दिव्य दुर्ग), तिरुविधि (मंदिर के आसपास के दिव्य मार्ग), तिरुमालीगै (आचार्य/ श्रीवैष्णवों का आवास), तिरुवासल (दिव्य मुख्य आगम मार्ग), तिरुमंडपम् (दिव्य मण्डप), तिरुच्चूररू (सन्निधि का अंदरूनी भाग), तिरुवोलक्कम (दिव्य सभा), तिरुप्पल्लियरै (पेरुमाल की दिव्य सन्निधि), तिरूप्पल्लिक कट्टिल (सिंहासन), तिरुमेरकट्टु (विधानं – छत में बांधा हुआ सजावटी वस्त्र), तिरुत्तिरै (दिव्य पटल), तिरुक्कोररोलियल (प्रसाद/ पात्र आदि ढंकने के लिए दिव्य वस्त्र), तिरुवेण चामरम, तिरुवालवट्टम (पंखा), तिरुवड़ी नीलै (चरण कमल/ पादुका), तिरुप्पडीक्कम (वह पात्र जिसमें तिरुवाराधन तीर्थ का संचय किया जाता है), तिरुमंजनक्कुडम (तिरुमंजनम/ तिरुवाराधन के लिए जल लेन का पात्र),  तिरूप्परिकरम (सामग्री), तिरुवंधिक काप्पु (आरती जो पुरप्पादु ले अंत में होती है), तिरुविलक्कु (दिव्य ज्योति), तिरुमालै (दिव्य गलमाल), तिरुवाभरणम् (दिव्य आभूषण), तिरूप्पल्लित तामं (तुलसी की माला), तिरुमेनि (शीष से नख तक भगवान का दिव्य स्वरुप), तिरुनाल (उत्सव/ त्यौहार), आदि अनुवादक टिप्पणी: भगवद, भागवत, आचार्य और आल्वारों के लिये कोई भी शब्द का प्रयोग करे तो पहिले श्री लगाना चाहिये। ऐसा करना हमारा उनके प्रति आदर बतलाता है। परन्तु यह किसी देवताओ के लिये नहीं करना चाहिये। श्रीभक्तिसार स्वामीजी नांमुगन तिरुवंदादि में कहते है “तिरुविल्लात ठेवरै थेरेन्मिन देवू” (मैं उन देवताओं को कभी देवता न समझूँगा जो कभी भी श्रीमहालक्ष्मी से सम्बन्ध न रखते हो)।
  • श्रीरंगम मंदिर को कोयिल ना कहकर श्रीरंगम बोलना, छिंकने के बाद “तिरुवरंगम” नहीं बोलकर इतर दिव्य देशों के नाम लेना, वेंकटेश भगवान को तिरुवेंकटम न बोलकर केवल वेंकटम बोलना, श्री वरदराज भगवान मंदिर को “पेरुमाल कोयिल” ना बोलते हुये कांचीपुरम बोलना, तिरुवनंतपुरम के जगह अनंतशयन बोलना बाधा है। दिव्य देशों के सम्बोधन होते है। तिरुमलाई – तिरुवेंकटम के लिए, कोयिल – श्रीरंगम के लिए, पेरुमाल कोयिल – कांचीपुरम के लिए, तिरुनारायणपुरम – मेलूकोटे के लिए ये सम्बोधन निश्चित हैं। उनको इतर नामों से बुलाना बाधा है। यें चार दिव्य देश श्रीवैष्णवो के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। श्रीवैष्णवो कों संप्रदाय के सम्बोधन उपयोग में लाना चाहिए, न की सामान्य भाषा। अनुवादक टिप्पणी: एक बार श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी एक श्रीवैष्णव गोष्ठी को उपदेश कर रहे थे तभी एक श्रीवैष्णव छिंकता है और “वेंकटम” ऐसा कहता है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को क्रोध आता है और वें कहते है तुम्हें “तिरुवरंगम” कहना चाहिये वह श्रीवैष्णव स्वीकार कर लेता है। परन्तु तिरुमला-तिरुपती से होने के कारण जब वह वापस तिरुमला जाकर श्रीअनन्तल्वान स्वामीजी के पास जाकर इसकी चर्चा करता है, तब श्रीअनन्तल्वान स्वामीजी उसे एक बात कहकर वापस भेजते है। वह फिर से भट्टर स्वामीजी के उपदेश सुनने वहां जाकर छिंकता है। वह फिर से “वेंकटम” कहता है – इस पर श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी कहते है “मैंने तुम्हें तिरुवरंगम कहने को कहा है – तो फिर यह गलती क्यों कर रहे हो?”। तब वह श्रीवैष्णव कहता है “श्रीपरकाल स्वामीजी स्वयं पेरिया तिरुमौली के वेरुवाताल में “वेंकटमे” कहते है जो श्रीरंगनाथ के लिये है”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी जो बहुत चतुर है उन्हें यह उत्तर देते है “देखों यह आल्वार नहीं कह रहे है, यह तो आल्वार परकाल नायकी के चित्त को प्रगट कर रहे है – अगर वह परकाल नायकी होती तो वह भी तिरुवरंगम कहती”। वह श्रीवैष्णव श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के बात से सहमत हो गये।

इस स्थान से श्री रामायण और अन्य पुराणों पुरुषों के नाम यहाँ संप्रदाय परिपेक्ष्य में समझाये गये है। इन सभी महा पुरुषों का कोई विशिष्ट नाम है जिसके द्वारा उनके किसी गुण का बोध होता है। यह बताया गया है हमें सामान्य पद्धती से उनका सम्बोधन ना करते हुये संप्रदाय में वर्णित विशिष्ट नामों से ही संबोधित करना चाहिए। सामान्यतः श्री रामायण को दिव्य शास्त्र का स्थान दिया गया है जो भक्ति के गुण को विशिष्टता से समझाती है।

  • श्री रामायण में – पेरुमाल की जगह श्रीराम बोलना, नाचियार/पिराट्टी की जगह सीताजी बोलना, इलाया पेरुमाल की जगह श्रीलक्ष्मणजी बोलना, कृष्ण की जगह श्रीकृष्ण बोलना (कृष्ण गो चराने वाले हैं, अत: वे श्रीकृष्ण नहीं अपितु मित्र की तरह कृष्ण सम्बोधन पसंद करते हैं।), अलगिय सिंगर की जगह श्रीनृसिंहजी बोलना – भक्तिसार स्वामीजी ने नान्मुगम तिरुवंदादी में कहते है – अलगियान ताने अरियुरुवन ताने ” (सिंह मुख भगवान सबसे सुंदर है, विष्णु सहस्त्रनाम में भी कहा गया है कि “नारसिम्ह वपु श्रीमान”– सबसे सुंदर सिंह मुख धारण किये भगवान), गुह पेरुमाल की जगह गुह बोलना, तिरुवड़ी की जगह श्रीहनुमानजी बोलना, महाराज की जगह श्रीसुग्रीवजी बोलना, पेरिया उदइयार की जगह श्रीजटायुजी बोलना, तिरु तुलै की जगह श्रीतुलसीजी बोलना बाधा है। (गुह को भगवान श्री राम ने अपने भ्राता को स्थान दिया है। अत: उनको गुह पेरुमाल कहते हैं।)
  • अनुवादक टिप्पणी: इस का सार यही है की विशेष आदर से और उनको आनंद मिले ऐसे सम्बोधन से संबोधित करना चाहिए। उत्तर भारत में दक्षिण भाषा के शब्द प्रचलित न होने से यह संभव नहीं हो पाएगा। हमें बस इतना ध्यान रखना है की प्रत्येक शब्द अत्यंत आदर पूर्वक, जिसको सम्बोधन करते हैं उसे अच्छा लगे ऐसा और हमारे पूर्वाचार्य, आलवारों में प्रचलित हो ऐसा होना चाहिए।
  • आल्वान / आल्वार भगवान के बड़े भक्तों के लिये प्रयोग किया जाता हैं जैसे श्रीविभीषण आल्वान, श्रीगजेन्द्राल्वान, तिरुवाझियाल्वान (सुदर्शन चक्र), श्रीपाञ्चजन्याल्वान (शंख), श्रीभरताल्वान, श्रीशत्रुघनाल्वान, कोईलाल्वार (भगवान कि सन्निधी), नम्माल्वार (श्रीशठकोप स्वामीजी)। ऐसे न करना बाधा हैं। हम यह भी देख सकते है कि श्रीपेरियावाचन पिल्लै ने घण्टाकर्ण, जो मृत शरीर खानेवाला राक्षस हैं उनकी भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति को देखकर उन्हें भी “श्री घण्टाकर्णाल्वान” कहकर संबोधित किया। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: आल्वान / आल्वार वह हैं जो भगवद अनुभव में लीन हैं। भगवान के प्रति उनके लगाव को दर्शाने हेतु वह केवल कुछ व्यक्तिविशेष के लिये प्रयोग करते है। कई आचार्य को आल्वान उपाधी प्राप्त हुई हैं – श्रीकुरेश स्वामीजीइंगलाल्वान, नदातुराल्वान, मिलगाल्वान उनमें से कुछ है जिन्हें भगवान के प्रति उनकी अत्यंत प्रीति के लिए ऐसे संबोधन से शुशोभित किया गया.
  • “तीर्थ नारायण” के बजाय “सालग्राम” कहना बाधा है। सालग्राम दिव्य देश जहाँ के निकट कण्टकी नदी में भगवान शिला रूप में प्राप्त होते है। सामान्यत: भगवान को “सालग्राम” कहा जाता है। श्रीवैष्णव परिभाषा में यह सही नहीं है। उन्हें तीर्थ नारायण कहकर बुलाया जाता है (क्योंकि वें तीर्थ (जल) में प्राप्त होते है)। उन्हें “श्री मूर्ति” भी कहा जाता है। अनुवादक टिप्पणी: सालग्राम शिला बहुत पवित्र हैं। भगवान पत्थर रूप में प्राप्त होते हैं जिन्हें कोई भी अपने तिरुमाली में कम से कम आवश्यकता से पूजा कर सकता हैं। तीर्थ का अर्थ भी पवित्र हैं – इसलिये भगवान को तीर्थ नायनार भी बुलाते हैं। नायनार अर्थात “भगवान” या “सबसे अधीक सम्मान जनक”।
  • विशेष उपाधी को न जानना या प्रयोग न करना बाधा है। उन विशेष उपाधीयों मे शामिल हैं:
  • श्रीमत द्वारपति नायनार – भगवान के मन्दिर आदि के मुख्य द्वारपालों के नाम।
  • तिरुवासल काक्कुम मुदलीगल – यह द्वारपाल मन्दिर के अन्दर हैं (निकट सन्निधी के बाहर)। तिरुपावै के १६वें पाशुर में – “नायगनाय् निन्र नन्दगोपनुदैय कोयिल काप्पाने! तोरण वायिल काप्पाणे!”, भगवान के सेवक जो सभी क्षेत्रों कि रक्षा करते हैं ऐसे पहचाना गया है।
  • सेनै मुदलियार – श्रीविष्वक्सेनजी – भगवान के मुख्य सेनापती।
  • नम्बी मूत्ता पिरान – श्रीबलरामजी जिनकी भगवान कृष्ण के बड़े भ्राता ऐसे स्तुति किया गया है और वह जो हमेशा भगवान का खयाल रखते हैं।
  • श्री मालाकार – जैसे विष्णु पुराण में “माल्योपजीवन:” ऐसे बताया गया हैं, वह जो अपना जीवन पुष्पहार बेचकर बिताते है। अनुवादक टिप्पणी: उन्होने भगवान कृष्ण को सबसे अच्छा हार सबसे अच्छे इरादे से दिया और भगवान को बहुत खुश किया।
  • श्री विदुरजी – विदुर (ध्रुतराष्ट्र और पाण्डु के भाई) जिन्हें विदुराल्वान भी कहते थे भगवान कृष्ण के बहुत बड़े भक्त हैं। अनुवादक टिप्पणी: उनकी स्तुति “महा मथि” (वह जो बहुत विद्वान हो) ऐसे किया गया हैं। उन्होंने केले फेंककर भगवान कृष्ण को बड़े प्रेम भाव के कारण छीलके खिलाये। सच्चा ज्ञान अर्थात भगवान के प्रति उपासना।
  • श्री नन्दगोप – नन्द महाराज जिन्होंने भगवान कृष्ण को पाल पोसकर बड़ा किया। अनुवादक टिप्पणी: इनकी भी व्याख्यानों में बहुत जगह भगवान कृष्ण के प्रति लगाव के कारण स्तुति हुई हैं।
  • हमारे पूर्वाचार्य द्वारा जिन भगवान का नाम न लिया गया हो उन भगवान का नामस्मरण करना बाधा है। भगवान का नाम जैसे हरीश, सुरेश, नरेश आदि आये हैं परन्तु यह नाम हमारे आचार्य प्रयोग नहीं करते थे और इसलिये हमें भी उनका प्रयोग नहीं करना चाहिये।
  • जैसे हमारे पूर्वज बड़े आनन्द से प्रयोग करते थे वैसे आचार्यों का नामस्मरण किये बिना गाना बाधा हैं। हमारे पूर्वाचार्य सच्चे आचार्य कि स्तुति “पिल्लै”, “आल्वान”, “आण्डान”, “नम्बी” आदि का प्रयोग कर करते थे।
  • एकांतीयों (वह श्रीवैष्णव जो भगवान को हीं उपाय और उपेय मानते हैं) को उनके गाँव, वंश और जन्म पर परखना बाधा हैं। श्रीवैष्णव का उनके जन्म के आधार पर निर्णय नहीं करना चाहिए। यह बहुत बड़ा पाप हैं। उनके गाँव के आधार पर भेद करना भी पाप हैं। श्रीवचन भूषण के ७९ और १९४ से २०० सूत्र में यह तत्व को पूर्ण विस्तार से समझाया गया है। कृपया इसे पढ़े और स्पष्ट हो जाये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीवैष्णवों कि स्तुति को स्थापित करते है। उन्होने शास्त्र के प्रमाण देकर श्रीवैष्णव के स्थान की कई भ्रांतियाँ और सन्देह को दूर किया है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपने सुन्दर और विस्तृत व्याख्यान में कई प्रमाण दर्शाते हैं और विस्तार से समझाते हैं इसलिये यह तत्व स्पष्टता से समझा गया है। उदाहरण के लिये सूत्र ७९ कहता हैं “एकांती व्यापदेशतवय:” – यह श्लोक विष्वक्सेना संहिता से लिया गया हैं। इस व्याख्या में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी बड़े सुन्दरता से विस्तार से यह श्लोक को समझाते है – “जो केवल भगवान के हीं शरण में जाता है वह ही अपने गाँव, जाती आदि बढाई में नहीं पड़ता है परन्तु वह भगवान से अपने सुन्दर और नित्य सम्बन्ध कि बढाई में रहता है”। वह आगे यह भी समझाते हैं कि ऐसे भागवतों के लिये सबकुछ (गाँव, जाती, गोत्र आदि) भगवान ही हैं। सूत्र १९४ से २०० में भागवत अपचार विस्तार से समझाया गया हैं। यहाँ पर श्रीवैष्णव के शरीर त्याग करने के पश्चात क्या शब्द / या पंक्ति कहना हैं विस्तार से समझाया गया हैं। आल्वार कहते हैं “पणिकण्दाय चामारे” (चामारे का अर्थ “मरना है”। “मरणमानाल वैकुण्ठम” (जब कोई श्रीवैष्णव शरीर त्याग करता है वह श्रीवैकुण्ठम जाता है। आजकल श्रीवैष्णव परिभाषा में जब कोई श्रीवैष्णव शरीर त्याग करता है तो उसे “आचार्यन् तिरुवड़ी अदैन्तार”)। पूर्वाचार्य के ग्रन्थों में कई शब्द हैं जो श्रीवैष्णवों के शरीर त्याग करने से संबंधीत हैं जैसे “तिरुवडिच चार्न्तार” (तिरुवड़ी का अर्थ चरण कमल भी है और भगवान भी – तिरुवड़ी चार्न्तार का अर्थ चरण कमल को प्राप्त करना या भगवान को प्राप्त करना), “परमपदम् एय्तिनार” (परमपद को प्राप्त करना – सर्वोच्च तिरुमाली), “तिरुनाडू अलंकरित्तार” (व्यक्ति पवित्र स्थान पर पहूंचना और उसको सजाना), “अवतारं तीर्थं प्रसाधित्तायीररू” (अवतार का अन्त हो गया)।
  • इस बात से यह समझना चाहिये कि आदरणीय कौन से प्रकार के श्रीवैष्णव हैं वैसे पदों का प्रयोग करना चाहिये – ऐसा न करना बाधा है। परमपदधाम और तिरुनाडु दोनों का अर्थ एक ही हैं – केवल भाषा अलग हैं – पहिला संस्कृत और दूसरा तमील में है। फिर भी परमपदधाम सामान्य शब्द है और तिरुनाडु विशेष शब्द है। केवल आचार्य श्रेष्ठ जब देह त्याग करते है तो “तिरुनाडु अलंकरित्तार” ऐसे स्तुति करते है। यह बहुत कठिन है कि किस के लिए कौनसा शब्द का प्रयोग करना है – समय चलते इसे हमें अपने बड़ों से हीं सिखना हैं। अनुवादक टिप्पणी: अन्तिमोपाय निष्ठा में यह चरित्र समझाया गया हैं। श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर कहते हैं – श्रीरामानुज स्वामीजी के परमपदधाम जाने के कुछ समय तक श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कुछ समय तक इस धरती पर विराजमान थे। परन्तु जब वे भी परमपदधाम को प्रस्थान कर दिये तब एक श्रीवैष्णव श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के पास जाकर कहते हैं “श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी परमपदधाम को प्रस्थान कर दिये”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी उत्तर देते हैं “श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के लिये तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिये”। वह श्रीवैष्णव पूछता हैं “क्यों नहीं? क्या वें परमपदधाम को प्रस्थान किए ऐसे हम नहीं कह सकते क्या?”। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी बड़ी सुन्दरता से समझाते हैं कि परमपदधाम प्रपन्न और भक्तों/ भागवतों (वह जो भक्ति योग के परिश्रम से परमपदधाम को जाता है) के लिये सामान्य है – श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी का उद्देश वह नहीं था। तब वह श्रीवैष्णव पूछता हैं “क्या आपके मन में कोई और स्थान हैं?” और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी समझाते हैं “हाँ। तुम्हें यह कहना चाहिये श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में अंतरध्यान हो गये” – यह तथ्य मेरे आचार्य (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने समझाया था। इसी तरह कि घटनायें श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी के पेरियाल्वार तिरुमोझी के व्याख्यान में ४.४.७ पाशुर में भी समझाया गया हैं। मुलभुत रूप यह समझाया गया हैं कि सामान्यत: जो श्रीवैष्णव इस संसार को छोड़ कर जाते हैं उन्हें “तिरुवडीच चार्न्तार” से प्रगट करते है। अगर वह श्रीवैष्णव भागवत कैंकर्य में लिप्त थे तो उन्हें “तिरुनाडू अलंकरित्तार” कहा गया है। अगर वह श्रीवैष्णव आचार्य कैंकर्य में लिप्त थे तो उन्हें “आचार्य तिरुवड़ी अदैन्तार” कहा गया है।
  • श्रीवैष्णवो को कष्ट हो ऐसे बात करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें हमेशा अच्छी तरह बोलना चाहिये। शास्त्र में कहा गया हैं “सत्यम ब्रुयत प्रियं ब्रुयात” – सत्य बोलते समय भी सुखदता से बोलना चाहिये जो सामने व्यक्ति को स्वीकारनिय हो।
  • जो व्यक्ति हमें सुन रहा हैं उससे उसका हृदय ज़ोर से धड़कने लगे इस तरिके से बात करना बाधा हैं। अनुवादक टिप्पणी: श्रीराम “मृदु पुर्वंच भाषते” ऐसे जाने जाते हैं – वह जो पहिले मृदु शब्दों से जानकारी लेते हैं, दूसरों को कष्ट पहूंचे बिना मनोहरता से बात करते हैं। इसलिये हम भी अपने आचार्य के पथ का पालन करने का प्रयास कर सकते है।
  • अपनी गलतियों को न कहना, सांसारिक जनों का दोष देखना और अपने केवल अपने अच्छे गुणों को कहना बाधा है। जैसे कहा गया हैं “अहमस्मि अपराधानाम आलय:” मैं सभी दोषों का घर हूँ, हमें अपने आप को बहुत नीचा और नम्र स्थान पर देखना चाहिये। श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “तीवीनैयो पेरिताई” (मेरे कई दोष हैं)। अगर कोई अच्छे गुण हैं तो वह भगवान देखेंगे और उसे स्वीकार करेंगे। हमें अपनी बढाई का प्रचार करने कि कोई जरूरत नहीं है।
  • भगवान और भागवतों कि स्तुति न करना बाधा है। भगवान में कोई दोष नहीं हैं। उन्हें दोषरहित ऐसा कहा जाता है। भागवत भी पवित्र होते हैं – फिर भी इस संसार में रहने के कारण वें दोष से प्रभावित हो जाते है। हमें फिर भी उन दोषों कि ओर न देखते हुए उनके पवित्र गुणों कि बढाई करनी चाहिये। भागवतों में दोष देखना बहुत बड़ी गलती है।
  • केवल भगवान कि स्तुति पर केन्द्रीत होकर आचार्य कि स्तुति को र्निलक्षित करना बाधा है। जैसे हम पहिले ही चर्चा कर चुके है कि भगवान दोषरहित और पवित्र है। भागवतों को भी कसौटी कहा जाता है। एक श्रीवैष्णव का बेटा बुरी संगत में पडकर पथभ्रष्ट हो जाता है। उस श्रीवैष्णव को अपने पुत्र के इस परिस्थिति को देखकर बहुत दुख होता है। परन्तु एक दिन अचानक से वह पुत्र बदल जाता है और शिखा, यज्ञोपवित, ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक आदि सहित पिता को आदर भी देता है। वह श्रीवैष्णव आनंदित होकर उसी क्षण पूछता हैं “क्या तुमने श्रीकुरेश स्वामीजी के दर्शन किये?”। इससे हम यह समझ सकते हैं कि उस श्रीवैष्णव को यह पूर्ण विश्वास था कि केवल भागवतों कि कृपा से उनका लड़का बदल गया है। भागवतों कि महिमा भगवान कि महिमा से अधीक है। भागवतों में आचार्य हीं सबसे बड़े है – हमें अपने आचार्य के बारें में कभी भी उच्च बोलना चाहिये।
  • आध्यात्मिक विषयों में ज्ञानी होने से हमें निरन्तर आलवार / आचार्य के पाशुरों और स्तोत्र को गाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। पाशुरों को गाते समय हमें उनके दिव्य अर्थों का भी अनुसन्धान करना चाहिये। इसमें हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा रचित कई ग्रन्थ भी हैं जिन्हें पढ़कर हर समय स्मरण भी करना चाहिये।
  • हमारे आचार्य के सिखाये गुरु परम्परा मन्त्र और द्वय महामन्त्र का जाप छोड़ अन्य मन्त्र का जाप करना और ऐसे गुरु परम्परा मन्त्र और द्वय महामन्त्र के जाप का त्याग करना बाधा हैं। द्वय महामन्त्र (तिरुमन्त्र, द्वय मन्त्र और चरम श्लोक) रहस्य त्रय का सूचक हैं। अनुवादक टिप्पणी: जैसे हमने समझा हैं कि हमारे पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र का निरन्तर जाप करते थे और हमें यह भी समझना चाहिये कि द्वय महामन्त्र का जाप पहिले गुरु परम्परा का जाप किये बिना नहीं किया जा सकता है यानि हम पहिले अम्माजी या भगवान के पास नहीं जाते हैं बल्कि हम गुरु परम्परा के द्वारा ही जाते हैं। इसिलिए हमारे आचार्य द्वय महामन्त्र का जाप करने से पहिले गुरु परम्परा मन्त्र का जाप करते थे।

यहाँ गुरूपरम्परा मन्त्र हैं जिसे द्वय महामन्त्र के पहिले कहना चाहिये।

अस्मद् गुरूभ्यो नम: (हमारे स्वयं के आचार्य)
अस्मद् परमगुरूभ्यो नम: (हमारे आचार्य के आचार्य)
अस्मद् सर्वगुरूभ्यो नम: (सभी आचार्य)
श्रीमते रामानुजाय नम: (श्रीरामानुज स्वामीजी)
श्री पराङ्कुशदासाय नम: (श्रीमहापूर्ण स्वामीजी)
श्रीमद् यामुनमुनये नम: (श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी)
श्री राममिश्राय नम: (श्रीराममिश्र स्वामीजी)
श्री पुण्डरीकाक्षाय नम: (श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी)
श्रीमन्नाथमुनये नम: (श्रीनाथमुनि स्वामीजी)
श्रीमते शठकोपाय नम: (श्री शठकोप स्वामीजी)
श्रीमते विष्वक्सेनाय नम: (श्रीविष्वक्सेनजी)
श्रियै नम: (श्री अम्माजी 
श्रीधराय नम: (श्री भगवान)

श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के २७४ सूत्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है –जप्तव्यम् गुरु परम्परैयुम् द्वयमुम् – हमें निरन्तर गुरूपरम्परा और द्वय महामन्त्र का अनुसन्धान करना चाहिये।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २५

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २४

५७) प्रसाद विरोधी – शुद्ध प्रसाद में बाधाएं

श्रीरंगनाथ भगवान के प्रसाद से श्रीकुरेश स्वामीजी और आण्डाल अम्माजी को श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदव्यास भट्टर स्वामीजी प्राप्त हुए

प्रसाद का अर्थ वह भोजन है जो सबसे पहिले भगवान को अर्पण किया गया हो। भोजन जो तिरुमदप्पल्ली (रसोई) में बनाया गया हो। कच्चा दूध, फल, शक्कर आदि का एक बार भगवान को भोग लग गया तो वह प्रसाद हो जाता है। भगवान को भोग लगाना इसे तमील में ऐसे समझाया गया है “कंण्डरुलप पण्णुत्तल” – इसका अर्थ है वह जो भगवान को निवेदन किया गया हो जिसे कृपाकर वे अपनी दिव्य दृष्टी से देखकर पवित्र कर सके। प्रसाद स्वीकार का अर्थ प्रसाद को ग्रहण कर उसे पाना है। अनुवादक टिप्पणी: यह श्रीवैष्णवों के लिये सर्वश्रेष्ठ महत्त्वपूर्ण है कि केवल प्रसाद को ही भोजन में पाये। बिना भगवान को भोग लगाये पाना सर्व प्रथम पाप हैं – यह भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता के ३.१३ में समझाया हैं तिरुवाराधन को यागम् समझाया गया है और तिरुवाराधन में अर्पण किया हुए प्रसाद को पाने को अनुयागम् कहा गया है। दोनों ही श्रीवैष्णवों के लिये महत्त्वपूर्ण है। हमारे पूर्वाचार्य प्रसाद का बहुत सम्मान/ आदर करते थे। जब श्रीकुरेश स्वामीजी के तिरुमाली में भगवद प्रसाद भेजा गया था तो उसे पूरे हर्षोल्लास के साथ भेजा गया था। जिस पात्र में प्रसाद हो उसे सिर पर पूर्ण आदरपूर्वक रखते है। उसके साथ छत्र, चामर, वाद्य आदि भी होते है। एक और घटना में जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को प्रसाद दिया गया तो उन्होंने बड़े आनन्द से कहा “यां पेरू संमानम्” – यहीं वो सम्मान है जो हम प्राप्त करते है। अत: प्रसाद को पूर्ण आदर और सम्मान देना चाहिये। आजकल यह देखा जाता है कई जन (श्रीवैष्णव भी) प्रसाद का पूर्ण रूप से आदर नहीं करते है। कई जन प्रसाद ग्रहण कर दूसरों को दे देते है। कई जन प्रसाद लेकर मन्दिर में ही रख देते है। ऐसे व्यवहार से बचना चाहिये।

  • सांसारिक गाँव/ शहरों के मन्दिर में भगवान का प्रसाद ग्रहण करना और पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: प्रसाद जो सांसारिक जनों द्वारा बनाया और दिया गया हो तो भी उसका त्याग करना चाहिये। जब सांसारिक जन प्रसाद को बनाते और देते है तो वो सांसारिक विचार से करते है और उसका असर जो प्रसाद पाता है उस पर होता है। ऐसे प्रसाद से बचना उचित है। टिप्पणी: हमें सर्व प्रथम यह समझना चाहिये कि हम सांसारिक नहीं है, परंतु यदि सांसारिक बुद्धि वाले है और संसार में रत है तो भगवान के प्रसाद यह कहकर अनादर करना कि यह संसारी द्वारा पकाया गया है, अनुचित है।
  • दिव्य देश (अभिमान स्थल, आल्वार/आचार्य अवतार स्थल) के मन्दिर में प्रसाद पाने से बचना बाधा है। उसे वितरण करते ही पाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह समझाया गया है कि जब भी प्रसाद का वितरण हो उसे उसी क्षण पाना चाहिये। “प्रसाद प्रपत्ती मात्रेण: भोक्तव्य” व्याख्यान में भी लिखा है। हम यह स्मरण कर सकते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगम में खेल खेलनेवाले बच्चों से भी प्रसाद ग्रहण किये और तिरुवाराधन को पूरा किया जब की वह उनके खेल का हिस्सा था।
  • दिव्य देश के भगवान का प्रसाद विश्लेषण करने के पश्चात पाना बाधा है। वह कैसे बनाया गया है, किसने बनाया है आदि यह पुछताछ किये बिना उसे जैसे प्राप्त हुआ वैसे ही पाना चाहिये।
  • उपवास आदि के कारण प्रसाद का त्याग करना बाधा है। शास्त्रानुसार एकादशी का पालन करना चाहिये परन्तु दिव्य देश के मंदिरों में जब प्रसाद आदि देते है तो उसे सन्मान के साथ ग्रहण कर पाना चाहिये। भगवद प्रसाद का त्याग अर्थात उनका अपमान है। अनुवादक टिप्पणी: उपवास केवल विशेष दिवस पर किया जाता है जैसे एकादशी, पितृ तर्पण, ग्रहण आदि – ऐसे उपवास का कोई विकल्प नहीं है, उसे करना ही चाहिये। ऐसे उपवास के समय हमें भगवद प्रसाद प्राप्त हो तो हमें उस प्रसाद को सम्मान करते हुए ग्रहण करना चाहिये।
  • प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात आचमन कर स्वयं को शुद्ध करने कि इच्छा करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: कुछ भी पाने के पश्चात हम हाथ, पैर धोते है और आचमन करते है। परंतु मन्दिर में भगवान का प्रसाद पाने के पश्चात अगर हमारे हाथ मुँह को स्पर्श न हो तो ऐसा कुछ भी शुद्धीकरण करने कि आवश्यता नहीं है। प्रसाद पाने के पश्चात हाथ पर जो भी बचा हो उसे अपने माथे पर पोछ लेना चाहिये।
  • भागवत प्रसाद को दूषित मानना बाधा है। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमालै के ४१वें पाशुर में समझाते है कि “पोनगम शेय्द शेडम तरुवरेल पुनिदमन्रे” – अगर भागवत अपना शेष प्रसाद देते है तो वह सबसे अधीक पवित्र है। सामान्यत: किसी के द्वारा भोजन झूठा छोड़े जाने पर वह दूषित होने से हम उसे नहीं पाते है। ऐसे विचार हमें भागवत प्रसाद के समय नहीं आना चाहिये।
  • आचार्य प्रसाद को सामान्य मानना बाधा है। उसे बड़े आदर के साथ ग्रहण करना चाहिये।
  • आचार्य प्रसाद को सभी के सामने ग्रहण करने से हिचकिचाना बाधा है।
  • आचार्य के मुख से स्पर्श होकर यह प्रसाद दूषित हो गया है ऐसा समझना बाधा है।
  • आचार्य प्रसाद पाने के लिये पूरे दिन भूखे नहीं रह पाना बाधा है। हमें प्रति दिन आचार्य प्रसाद को बड़े ही उत्सुकता से पाना चाहिये। इस सम्बन्ध में हम श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर को स्मरण कर सकते है जो “मोर मुन्नार ऐयर” (जो श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शेष प्रसाद (दही के चावल) को उनके केले के पत्ते में सबसे पहिले पाते थे) के नाम से भी प्रसीद्ध थे। वे “चिरोपासित सत वृत्तर” के नाम से भी प्रसीद्ध थे – जो अपने अच्छे आचरण के लिये जाने जाते थे। यहाँ सत वृत्ति (अच्छा आचरण) अर्थात प्रतिदिन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रसाद पाने के पश्चात उसी पात्र में पाना। वह भी इसलिये क्योंकि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अपना प्रसाद दही के चावल से समाप्त करते थे और जीयर प्रसाद को वही से प्रारम्भ करते थे जिससे उनके प्रसाद में आचार्य का स्वाद आये और उसके पश्चात वो रसम चावल और नेगिलकरीयमुत्तु (कुलम्भु) चावल पाते थे। यही श्रीपरवस्तु पट्टरपिरान जीयर स्वामीजी हम पर “श्रीवचन भूषण मीमांसा भाष्य” नामक ग्रन्थ की कृपा किये।
  • भगवान को अर्पण किये हुए भोग पर जब उनके पाने के कोई निशान न दिखे तब भी ऐसे प्रसाद को खुशी से न पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अर्चावतार भगवान सामान्यत: अपने पवित्र नेत्रों से प्रसाद पाते है न की मुख से और उस भोग को प्रसाद में परिवर्तित करते है। इसलिये उनके द्वारा पाए गये प्रसाद पर कोई चिन्ह नहीं होंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें भगवद प्रसाद पाने में आनन्द नहीं लेना चाहिये।
  • जब आचार्य अपने निर्हेतुक कृपा से प्रसाद प्रदान करते है तो उसे उसी क्षण पा लेना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन से हम कई घटना ऐसी देख सकते है जहाँ उन्होंने स्वयं अपने शिष्य को अपना प्रसाद दिया है जैसे श्रीशैलेश स्वामीजी अपना शेष प्रसाद श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी श्रीवेदांती स्वामीजी को दिये है।
  • आचार्य के साथ बैठ कर प्रसाद पाना बाधा है। हमें आचार्य के प्रसाद पाने कि प्रतिक्षा कर फिर पाना प्रारम्भ करना चाहिये।
  • अपने आचार्य को प्रसाद पाते देख हमें पूर्णत: आनंदित होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • स्वयं भगवान के प्रसाद के पात्र से प्रसाद लेना बाधा है। हमें दूसरों के द्वारा प्रसाद वितरण करने तक रुकना चाहिए।
  • बिना अर्चक कि आज्ञा से प्रसाद लेना बाधा है।
  • भोग या प्रसाद जो भी अर्पण किया हो उसे दूषित करना बाधा है।
  • गुरु भाइयों को छोड़ प्रसाद पाना बाधा है। हमें दूसरों को प्रसाद देकर उनके साथ बैठकर प्रसाद पाना चाहिये।
  • प्रसाद के बर्तन या पत्ते को पीछे नहीं छोड़ना चाहिये जिससे संसारी, नास्तिक, पशु-कुत्ते आदि उसे स्पर्श न करें। ऐसा करना बाधा है।
  • भगवद/ भागवत प्रसाद को पाते समय शिष्टाचार न पता होना बाधा है। प्रसाद को बड़े आदर के साथ पाना चाहिये जैसे हमारे पूर्वाचार्य रखते थे और ऐसे तत्व का पालन न करना / उसे न जानना बाधा है।
  • प्रसाद को जमीन पर गिराना, पैर रखना, आदर न करना, आदि बाधा है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
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श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २४

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्रीवानाचलमहामुनये नमः श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २३

५६) तीर्थ विरोधी – तीर्थ (पवित्र जल) से सम्बंधित बाधाएं

श्रीदाशरथी स्वामीजी का श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर सभी नगरवासी पवित्र होते हुए। श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करते हुए।

तीर्थ का अर्थ है पवित्र जल। यह पवित्रता भगवान, आचार्य आदि के सम्पर्क में आने से आती है। जो जल भगवान के तिरुवाराधन में प्रयोग होता है उसे तीर्थ कहते है। उसे “भगवान का तीर्थ” भी कहते है। श्रीवैष्णव के परिभाषा में भगवान को स्नान कराने को “तिरुमञ्जन” कहते है। अन्य परिपेक्ष्य में भगवान के स्नान को “अभिषेक” भी कहते है। भगवान के स्नान के लिये जिस जल का प्रयोग होता है उसे “तिरुमञ्जन तीर्थ” कहते है। श्रीवैष्णव गोष्ठी (अन्य भी) में उसे एकत्रित कर सभी को वितरित किया जाता है। श्रीवैष्णव परिभाषा में श्रीवैष्णवों के स्नान किये हुए जल को भी “तीर्थादुथल” कहते है। आचार्य और उच्च कोटी के श्रीवैष्णवों के चरणामृत को “श्रीपादतीर्थ” कहते है। जो जल आचार्य के चरण पादुका के सम्पर्क में आता है उसे भी “श्रीपाद तीर्थ” कहते है। इस भाग में हम भगवान के तीर्थ, तिरुमञ्जन तीर्थ और श्रीपादतीर्थ से सम्बंधित “तीर्थ विरोधी” विषयों में अभ्यास सिखेंगे। अनुवादक टिप्पणी: तीर्थ के कई अर्थ है – पवित्र जल, पवित्र स्थान, स्वयं भगवान आदि। यहाँ हम केवल पवित्र जल जो कई प्रकार के है उस पर विषय को केन्द्रीत करेंगे।

  • भगवान का तीर्थ सांसारिक जनों या उनके घर से लेना बाधा है। मुमुक्षु वह है जो मोक्ष पर केन्द्रीत रहता है। जो सांसारिक लाभ पर केन्द्रीत होता है उसे भुभुक्षु कहते है। ऐसे जनों से भगवान का तीर्थ ग्रहण करना हानिकारक है क्योंकि ऐसे जनों से कोई भी सम्बन्ध हमारी निष्ठा पर प्रभाव डाल सकता है और पूर्वाचार्यों द्वारा दर्शाये गये मार्ग पर चलने से हमें डिगा सकता है।
  • साधनान्तर मनुष्यों (वह जो भगवान छोड़ अन्य सभी को उपाय मानता है) के सामने भगवान का तीर्थ ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: साधन का अर्थ कुछ पाने के लिये उपाय करना है। शास्त्र में भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्त करने के उपाय हेतु कई विधियाँ समझायी गयी है जैसे कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग आदि। कुछ जन प्रपत्ति को भी उपाय मानते है। परन्तु सच्चे प्रपन्न/ शरणागत केवल भगवान को ही एकमात्र उपाय मानते है। जो स्वयं के प्रयत्न को भगवान के प्राप्ति का उपाय समझते ऐसे जनों के सामने हमे कुछ भी पाना नहीं चाहिये।
  • मन्त्र उच्चारण (द्वय महामन्त्र छोड़ अन्य मन्त्र) करनेवालों के सामने भगवान का तीर्थ पाना बाधा है। शिष्य को आचार्य द्वारा बताये गये रहस्य त्रय ही उपयुक्त है उसके अतिरिक्त अन्य कोई मन्त्र है तो वह देवतान्तर मन्त्र है। अनुवादक टिप्पणी: भगवान ही उपाय और अम्माजी और भगवान के प्रति पवित्र कैंकर्य ही उपेय है, द्वय महामंत्र इस बात को अत्यंत स्पष्टता से प्रकाशित करते है, इसलिये हमारे पूर्वाचार्य द्वय महामन्त्र कि बड़ी स्तुति करते है। सभी मंत्रों में इस मन्त्र को मन्त्र-रत्न कहते है और हमारे पूर्वाचार्य इसका निरन्तर जप करने और स्मरण करने को कहते है। “पूर्व-दिनचर्या” रचना में श्रीएरुम्बी अप्पा यह दिखाते है कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के ओष्ठ निरन्तर द्वय महामन्त्र का जाप करते है और उनका मन सदा उसके अर्थ का अनुसंधान करता था।
  • दिव्य देश में तीर्थ लेने से पहिले भगवान के तीर्थ कि पवित्रता को जाँचना बाधा है। दिव्य देशों में तीर्थ लेने से हमे घबराना नहीं चाहिये। दिव्य देश अर्थात वह मन्दिर जहाँ आल्वारों ने अपने दिव्य प्रबन्धनों में भगवान कि स्तुति की है। यही नियम उस स्थान के लिए भी है जो आचार्य / आल्वारों से सम्बंधित है (उदाहरण – अभिमान स्थल, अवतार स्थल आदि) – वों भी दिव्य देश के समान है।
  • अन्य स्थानों पर भगवान के तीर्थ की शुद्धता को जाँचे बिना ग्रहण करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देश, अभिमान स्थल और आचार्य / आल्वारों का अवतार स्थान को छोड़कर – अन्य स्थानों प्र हमें यह सुनिश्चित कर लेना चाहिये कि वहां श्रीवैष्णव क्रम का पालन हो रहा है। उदाहरण के लिए हमारे पूर्वज मन्दिर में प्रवेश करने के पूर्व यह सुनिश्चित कर लेते थे कि मन्दिर में जहाँ आचार्य/ आल्वारों कि सन्निधी है वहाँ सही क्रम का पालन हो रहा है और भगवान के साथ उनकी भी उचित सेवा हो रही है।
  • सांसारिक जनों के सामने तीर्थ लेना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्य सांसारिक मानसिकता वाले लोगों से बचते थे और उनके सामने कुछ भी नहीं पाते थे।
  • अन्य श्रीवैष्णव के ग्रहण करने से पूर्व हमारा तीर्थ पाना बाधा है। हमें तीर्थ अन्य श्रीवैष्णव लेने के पश्चात ही लेना चाहिये। हमें जबरदस्ती कर आगे जाकर तीर्थ ग्रहण करने कि कोई आवश्यकता नहीं है।
  • किसी दिशा या स्थिति विशेष में तीर्थ लेने से बचना बाधा है। तीर्थ लेने के लिये ऐसा कोई नियम नहीं है जैसे पूर्व दिशा में होना, इत्यादि। हम श्रीवैष्णव गोष्ठी में कहीं भी हो हम तीर्थ ले सकते है।
  • तीर्थ ग्रहण करने के पश्चात उसे हमे अपने नेत्र और माथे पर बड़े आदर पूर्वक लगाना चाहिये – ऐसा न करना बाधा है।
  • तीर्थ ग्रहण करने के पश्चात हाथों को धोने का विचार करना भी बाधा है।
  • भगवद, आचार्य आदि का कोई भी कैंकर्य करने के पूर्व हाथों को धोना चाहिये। तीर्थ लेते समय हाथ ओष्ठ को छु सकते है – इस अशुद्धी को पवित्र करने हेतु हमें कोई कैंकर्य करने के पूर्व हाथों को धो लेना चाहिये।
  • तीर्थ को जमीन पर गिराना बाधा है। हमें तीर्थ ग्रहण करते समय अपना उपरी वस्त्र को हाथों के नीचे रखना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि तीर्थ जमीन पर न गिरे। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह समझाया गया है कि जो भी तीर्थ गिराता है वह बहुत बड़ा पाप करता है। तीर्थ या प्रसाद पर पैर रखने पर भी यही कहा गया है।
  • तीर्थ को माथे पर उछालना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले कहा गया है तीर्थ को नेत्र और माथे पर बड़े आदर पूर्वक लगाना चाहिये।
  • सांसारिक बाते करते हुए तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है। तीर्थ को बड़े आदर पूर्वक ग्रहण करना चाहिये और उस समय बाते करने से बचना चाहिये।
  • सांसारिक जनों द्वारा देखे जाने पर उस तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है।
  • हमें यह ज्ञान होना चाहिये कि भगवान के तीर्थ से भी बढ़कर श्रीवैष्णवों का श्रीपाद तीर्थ है। यह न समझना बाधा है।
  • तीर्थ कि सच्ची महिमा न जानकार, उसके देनेवाले के बाह्य रूप को देखकर ग्रहण करना बाधा है।
  • तीर्थ केवल एक बार ग्रहण करना पर्याप्त है यह तीर्थ देते समय क्या बोल रहे है उसपर आधारित है। सामान्यत: शातुमोरा के समय तीर्थ दिया जाता है और उस समय एक बार तीर्थ ग्रहण करना उचित है। यह न समझना बाधा है।
  • आचार्य का श्रीपाद तीर्थ जो आचार्य के कृपा से प्राप्त होता है उसे एक से अधीक बार ग्रहण करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: कुछ मठ/तिरुमाली श्रीपाद तीर्थ दो बार और कुछ में तीन बार दिया जाता है। शास्त्र में दोनों के लिये उचित प्रमाण है। इसलिये यह समझा जा सकता है कि श्रीपाद तीर्थ को केवल एक बार नही लेना चाहिये।
  • हमें यह समझना चाहिये कि सदाचार्य का श्रीपाद तीर्थ हमेशा पूजनीय है (जैसे मटके में रखा गंगा जल पूजनीय है)। हमें यह भी समझना चाहिये कि यह शिष्टाचार है (यह बड़ों द्वारा आचरण मे लाया गया है) और हमे भी यह करना चाहिये। यह न समझना बाधा है।
  • श्रीपाद तीर्थ की महिमा “वेधकप पोन” (वह कसौटी जो ताम्बे को सोने में बदल देता है) से कि जाती है। श्रीपाद तीर्थ के केवल सम्बन्ध मात्र से हम पवित्र हो जाते है। “श्रमणी विदुर ऋषि पत्निकलैप पुतराक्किन पुण्डरीकाक्षन् नेदुनोक्कू” आचार्य हृदय – भगवान श्रीमन्नारायण के पवित्र नेत्र जिन्हें पुण्डरीकाक्ष ऐसे स्तुति किया जाता है उन्होंने शबरी, विदुर और ऋषियों कि पत्नीयों को भी पवित्र कर दिया। भगवान के पवित्र नेत्र जैसे आचार्य के पवित्र नेत्र भी श्रेष्ठ है। ऐसे आचार्य के श्रीपाद तीर्थ को विशेष मानना चाहिये। और इसे विशेष ज्ञान कहते है। ऐसा ज्ञान न होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुरेश स्वामीजी के जीवन में एक सुन्दर घटना दर्शायी गयी है। एक श्रीवैष्णव का पुत्र उसके गलत संगत से अवैष्णव कि ओर बढ़ रहा था। परन्तु एक दिन अचानक वह अपने पिता के सामने सुन्दर वैष्णव वेष, तिलक आदि के साथ आया। उसके पिता ने तुरन्त पूछा कि क्या श्रीकुरेश स्वामीजी ने तुम्हें अपने पवित्र नेत्रों से देखा? ऐसा श्रीकुरेश स्वामीजी कि महिमा थी कि केवल अपने दृष्टि से किसी व्यक्ति में अच्छे पवित्र गुण लायेंगे।
  • केवल श्रीपादतीर्थ कि महिमा जानकार उसे ग्रहण करना और उसे पाने कि चाह नहीं होना बाधा है। केवल महिमा ही नहीं जानना चाहिये परन्तु ऐसे श्रीपाद तीर्थ को ग्रहण करने कि अति आर्तता भी होनी चाहिये।
  • किसी ऐसे तीर्थ को ग्रहण करना जिनका देवतान्तर सम्बन्ध हो वो जीवात्मा के सच्चे स्वभाव के विरुद्ध है। परिणाम जाने बिना ऐसे तीर्थ को ग्रहण करना बाधा है।
  • आनंदित होकर सबसे पहिले तीर्थ ग्रहण करना और अन्त में ग्रहण करने से हिचकिचाना बाधा है। तीर्थ को जो भी स्थिति हो यह समझकर कि वो हमें शुद्ध करेगा, बिना कुछ अधिक सोचे विचारे ग्रहण करना चाहिये।
  • श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करने से अस्वीकार करना क्योंकि उसमें स्वयं का श्रीपादतीर्थ है। विशेष समय में जब तिरुमाली में श्रीवैष्णव गोष्ठी होती है यह सामान्य प्रथा है कि वहाँ पधारे सभी श्रीवैष्णवों का श्रीपादतीर्थ लिया जाता है। उस श्रीपादतीर्थ को एकत्रीत किया जाता है और सभी को वितरीत किया जाता है। उस समय यह सोचकर कि उसमें अपना श्रीपादतीर्थ मिला हुआ है किसी को भी उस श्रीपादतीर्थ को अस्वीकार नहीं करना चाहिये। हमें यह विचार कर उस श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये कि उसमें वह जल है जो कई श्रीवैष्णवों के चरण साफ करने हेतु प्रयोग किया गया हो और यह हमें अधीक शुद्ध करेगा।
  • प्रायश्चित के लिये उपयोग तीर्थ जो कुछ कर्मों के लिये किया गया हो उसे प्रपन्नों को उपयोग नहीं करना चाहिये। ऐसा करना बाधा है।
  • शैव आदि से शारीरिक सम्पर्क में आने से हमें स्वयं को शुद्ध करने हेतु श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। जब शारीरिक सम्पर्क होता है तो हमें उस भाग को धोकर साफ कर श्रीपाद तीर्थ लेना चाहिये। उस पाप के लिये यह प्रायश्चित है। हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन कि घटना को स्मरण कर सकते है। जब एक पाषण्ड के शरीर कि भस्म फैलकर स्वामीजी को स्पर्श कि तो स्वामीजी उसी क्षण अपने माता के पास गये और उन्हें शुद्ध करने को कहा। उनकी आण्डाल माता जो शास्त्र में विद्वान है उन्होने एक ब्राम्हण श्रीवैष्णव का श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने को कहा और भट्टर स्वामीजी भगवान के पुरप्पाडु उत्सव के समय आये एक ब्राम्हण श्रीवैष्णव से विनंती कर उनका श्रीपादतीर्थ ग्रहण करके स्वयं को शुद्ध किया। यह घटना वार्तामाला ३२७ में है।
  • श्रीपाद तीर्थ को केवल शुद्ध मानना और श्रीपादतीर्थ के प्रति अधीक लगाव न होना बाधा है। उसे बहुत आनंददायक समझना चाहिये।
  • केवल दिन में एक बार श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने से संतुष्ट होना और उसे दोबारा लेने कि इच्छा न करना बाधा है। जैसे कि एक शिशु जो अभी माँ का दूध पी रहा है उसे अपनी माँ के दूध कि और अधीक ललक होती है वैसे हीं हमें अपने आचार्य के श्रीपादतीर्थ कि ललक होनी चाहिये। ऐसे न करना बाधा है।
  • यह समझे बिना कि यह हमारे आचार्य का इस संसार में अन्तिम जन्म है आचार्य के श्रीपादतीर्थ से वंचीत रहना बाधा है। जैसे सहस्त्रगीति में “मरणमानाल वैकुण्ठं” कहा गया है (जब हम मर जायेंगे तो हम परमपद जायेंगे) हमें अपने आचार्य को बड़े आदर से देखना चाहिये और उनके श्रीपादतीर्थ को ग्रहण करना चाहिये और जब तक वे संसार में है उनसे बहुमूल्य उपदेश सुनना चाहिये।
  • श्रीपादतीर्थ तीर्थ देनेवाले से सीधा ग्रहण करना चाहिये नाकी किसी ओर से। जैसे भगवान के तीर्थ वितरण के समय एक सह तीर्थकार देता है। ऐसा यहाँ नहीं होता है।
  • स्वयं श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना बाधा है। हमें आचार्य या जो तिरुवाराधन करते है उन्हीं से श्रीपादतीर्थ लेना चाहिये।
  • जब तक श्रीपादतीर्थ न मिले उसे पाने कि हमें बहुत ललक होनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ अनजाने से श्रीपादतीर्थ ग्रहण करने कि निन्दा कि गयी है।
  • श्रीपादतीर्थ देनेवाले और लेनेवाले दोनों का द्वय महामन्त्र पर ध्यान केन्द्रीत होना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: द्वय महामन्त्र का अर्थानुसंधान हमेशा गुरुपरम्परा मन्त्र के साथ करना चाहिये। यह हमें निरन्तर स्मरण करायेगा कि हम अम्माजी और भगवान के दास है, जब हम स्मरण करेंगे की सिर्फ भगवान ही उपाय है तब परमपद में उनकी नित्य सेवा की हमारी लालसा बढ़ती जायेगी। गुरुपरम्परा मन्त्र को निरन्तर कहने से हमें यह स्मरण होता है कि भगवान के साथ हमारा सम्बन्ध आचार्य के संबंध से ही है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २३

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

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thyaga-mandapam
श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी जो श्रीवरदराज भगवान के अति प्रिय सेवक हैं, उनका शेष प्रसाद पाने की इच्छा श्रीरामानुज स्वामीजी रखते हैं

५५) भोग्य विरोधी – प्रसाद / प्रसाद पाने में बाधाएं

भोग्य अर्थात वह जिसे पाया जाता है। इस भाग में वह स्थान जहाँ हम प्रसाद पा सकते है और जहाँ हम प्रसाद नहीं पा सकते है उस विषय पर विस्तार से चर्चा कि गयी है। अनुवादक टिप्पणी: जब प्रसाद लेने या ग्रहण करना होता है तो बहुत सी बाधाएं आती है। बहुत पहिले वैधीक (वेद का पालन करने वाले) “परान्न नियमं” का पालन करते थे – अर्थात किसी से भी भोजन गृहण नहीं करना (स्वयं पकाना) और केवल सन्निधी (मन्दिर, मठ) से ही गृहण करना। परन्तु आजकल बहुत बड़ा बदलाव है – बहुत लोगो को भोजन बनाना नहीं आता है और वे बाहर के भोजन पर ही निर्भर रहते है। सामान्यत: सात्विक भोजन ही भगवान को अर्पण किया जाता है और श्रीवैष्णवों द्वारा पाया जाता है। जो भी भोजन हम पाते है उसे पहले भली प्रकार से जांच लेना चाहिए कि वह भोजन श्रीवैष्णवों द्वारा ही बनाया गया है, वह भगवत प्रसाद है और उस समय के अनुकूल उसे पाना उचित है अथवा नहीं। उदाहरण के लिए श्रीवैष्णव द्वारा भी विभिन्न प्रसाद बनाये और भगवान को भोग लगाये जा सकते है – परन्तु एकादशी के दिन इन विभिन्न प्रकार के व्यंजनों को पाया नहीं जा सकता है (सिमित सात्विक भोजन पाना चाहिए)। जब प्रसाद का विषय आता है ३ प्रकार की निषेधता देखी जाती है – “जाती दुष्ट” (भोजन जो उसके स्वभाव से ही पाने योग्य नहीं है – प्याज, लहसुन आदि), “आश्रय दुष्ट” (सात्विक भोजन परन्तु वह जो अवैष्णवों के स्पर्श में आया है) और “निमित्त दुष्ट” (भोजन जो खराब हो गया हो आदि)। यह तीनों प्रकार के दुष्टता वाले अन्न को किसी भी परिस्थिति में हमें नहीं पाना चाहिये। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण १७.८ से १७.१० से विस्तार से समझाते है कि हमें किस प्रकार का अन्न नहीं पाना चाहिये जैसे वह भोजन जो कुछ घण्टों पहिले बना हो, वह भोजन जो उसका प्राकृतिक गुण खो चुका है, वह भोजन जो बासी हो गया है आदि। सबसे उत्तम है भोजन सम्बंधित विषय पर आदरणीय बड़ों से ज्ञान प्राप्त करे और उसे ही भोग लगाकर पाए जो श्रीवैष्णवों के लिए उचित है। आहार नियम पर पूर्ण चर्चा इस लिंक द्वारा प्राप्त हो सकती है। http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-aahaara-niyamam_28.html  और http://ponnadi.blogspot.in/2012/08/srivaishnava-ahara-niyamam-q-a.html

  • सांसारिक जनों के घर में प्रसाद पाना बाधा हैं। संसारी कौन है यह हम चर्चा कर चुके है – वह जो आत्म ज्ञान और भगवद ज्ञान रहित है।
  • देह सम्बन्धी जनों के घर में प्रसाद पाना बाधा है। श्रीवैष्णवों में भी कुछ श्रीवैष्णव लक्षण जैसे आचरण आदि होना चाहिये।
  • जो भगवान से क्षणिक सांसारिक लाभ की आशा करते है उन लोगों द्वारा बनाया गया भगवद प्रसाद पाना यह भी बाधा है। कुछ जन अपनी सांसारिक इच्छा (जैसे परीक्षा उत्तीर्ण होना, अथवा विवाहोत्सव) पूर्ण होने पर विशेष प्रसाद भोग लगाने का संकल्प लेते है। एक बार इच्छा पूर्ण होते हीं वे विशेष भोग बनाते और भगवान को भोग लगाते है। भगवद प्रसाद होने के उपरान्त भी क्यूंकि वह प्रसाद सांसारिक इच्छा पूर्ति हेतु भोग लगाया गया है इसलिये ऐसे प्रसाद से बचना चाहिये।
  • दिव्य देश कि महिमा को पूर्ण रूप से जाने बिना वहाँ का भगवद प्रसाद पाना बाधा है। दिव्य देश में आल्वारों ने द्वारा स्तुति कि है। ऐसे स्तुति को अच्छी तरह समझना चाहिये।
  • केवल भगवान के प्रति भक्ति रखनेवालों के यहाँ प्रसाद पाना बाधा है। ऐसे लोगों को आचार्य, भागवतों आदि कि महिमा के विषय में ज्ञान नहीं है और इसलिये उनके तिरुमाली में प्रसाद नहीं पाना चाहिये।
  • श्रीवैष्णव के तिरुमाली में स्वयं द्वारा बनाया हुआ प्रसाद पाना – यह विषय स्पष्ट नहीं है। परंतु इसे ऐसे समझा जा सकता है कि प्रसाद केवल स्वयं के पाने के लिये बना है भगवान के भोग के लिए नहीं। भगवान स्वयं भगवद गीता ३.१३ में कहते है “तेत्वकम भुन्जथे पापा ये पचन्ति कारणात्” – ऐसे जन जो केवल स्वयं के तृप्ति के लिये भोजन बनाते है वह पाप ही खाते है।
  • तिरुमाली में प्रसाद पाना जहाँ प्रसाद पवानेवाला इस विषय पर केन्द्रीत होता है कि तदियाराधन में कितना धन खर्च हुआ है, वह बाधा है।
  • किसी के कीर्ति, यश आदि में दिया हुआ भोजन पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ लोग भोजन केवल इसलिये खिलाते है कि जिससे वो सब को यह बता सके कि वे दान पुण्य में कितने महान है। ऐसी जगह से बचना चाहिये।
  • विवाह में भोजन करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: अगर तदियाराधन मठ अथवा तिरुमाली में सही तिरुवाराधन विधि आदि से नहीं बना हो तो विवाह में प्रसाद पाने से बचना चाहिये। आजकल प्रसाद बनाने के तत्व में इतनी अशुद्धता है कि अवैष्णव जन प्रसाद बनाते है। ऐसे जगह में पाने से बचना चाहिये।
  • जिनके यहाँ कोई मृत्यु हुई हो उनके यहाँ प्रसाद पाना बाधा है।
  • पैसे देकर भोजन लाना और उसे पाना बाधा है। होटल और मंदिरों में बेचे जाने वाले भोजन को पाने से बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: अगर कोई तिरुवाराधन करता हो तो वहाँ प्रसाद पाने के पश्चात थोड़ा दान कर सकते है उस व्यक्ति के प्रति जिसने तिरुवाराधन विधि का प्रबन्ध किया है। परन्तु जो भोजन केवल बेचने के लिये बना है उसे खरीदना आत्मा के लिये हानिकारक है क्योंकि वह व्यक्ति केवल धन कमाने के लोभ में भोजन बेचता है और ऐसा भोजन करने से हमारा भी व्यवहार वैसी ही हो जाता है।
  • दूसरों का बचा हुआ शेष पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यहाँ यह समझना चाहिये कि सामान्य जनों का शेष भोजन पाने से सदैव बचना चाहिये। भगवान भगवद गीता में भी इस तत्व को समझाते है। भगवान कहते है किसी को किसी का शेष भोजन नहीं पाना चाहिये। अपने व्याख्या में श्रीरामानुज स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य आदि का शेष प्रसाद पाना सर्व-योग्य है। श्रीवेदान्ताचार्य अपनी व्याख्या में आगे और यह समझाते है कि पिता, बडे भाई, पति (पत्नी के लिये) आदि का शेष प्रसाद पा सकते है। श्रीभक्ताङिघ्ररेणु आल्वार के तिरुमालै के ४१वें पाशुर से हम यह समझ सकते है कि श्रीवैष्णवों का शेष प्रसाद पाने योग्य है।
  • बदले में कुछ पाने कि आशा से किसी को प्रसाद पवाना बाधा है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण के २८६ और २८७ सूत्र में यह दर्शाते है कि हम भगवान के सही दास तभी होंगे जब हम किसी भी कैंकर्य को श्रीविदुरजी, श्रीमालाकार स्वामीजी और कुब्जा के समान प्रेम से करेंगे। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का इन सूत्रों के लिये विश्लेषण बहुत ही सुन्दर है। वे यह समझाते है कि सामान्यत: अगर कोई मनुष्य कैंकर्य करता है तो उसके बदले में वह कुछ आशा करता है। इन सभी परिस्थितियों में इन भागवतों ने बिना कोई आशा के कैंकर्य किया। श्रीविदुरजी भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रेमभाव से केले का छिलका पवाये जिसे भगवान ने भी अत्यधिक प्रेम से पाया। श्रीमालाकार स्वामीजी ने भगवान कृष्ण के कहने पर बिना संकोच के उन्हें पुष्प दे दिया – यह भी न सोचा कि यहीं पुष्प उसके जीने का आधार है। कुब्जा पवित्र चन्दन का लेप भगवान कृष्ण को दी। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह भी दर्शाते है कि इन तीन भगवतों और घटना की अन्य विद्वानों ने भी स्तुति की है।
  • कुछ कार्य के लिये बनाया हुआ प्रसाद पाना बाधा है। कुछ वैधीक कार्य में थोड़ा सा प्रसाद कुछ देवता के लिये कुछ मन्त्र द्वारा अर्पण किया जाता है। उदाहरण के लिए श्राद्ध निमंत्रण पर। ऐसा प्रसाद पाना बाधा है।
  • कोई बड़े घमण्ड से प्रसाद पवाता है कि मैंने प्रसाद पवाया है। ऐसा प्रसाद पाना बाधा है।

आगे बढ़ने से पहिले आहार नियम से सम्बंधित, श्री उ.वे. वि.वि रामानुज स्वामी ने जैसा अपने बड़ो के आचरण को देखा है और जो अन्य ग्रंथ पढ़कर सिखा है वह समझाते है। आजकल यह तत्व समझनेवाले बहुत कम है और उन्हें पालन करनेवाले और भी कम है। प्रसाद को ३ गुणों के अनुसार से वर्गीकृत किया गया है सात्विक, रजस और तमस। रजस और तमस तो श्रीवैष्णवों को पूर्ण तरह निषेध है जिसकी भगवद गीता के १७वें भाग में चर्चा कि गयी है। आजकल लोग केवल बाह्य स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारें में सोचते है। आन्तरिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के विषय में ज्ञान बहुत थोड़ा है। अच्छे हृदयवाले लोग जो हमारे पहचान के हो उनको ही फल, सब्जियां, अन्न आदि उपजाना चाहिये और अच्छे मन से ही देना चाहिये। जो भोजन बनाता हो उसमें आचरण और अनुष्ठान दोनों ही होना चाहिये – नियमों का पालन के साथ स्वरूप ज्ञान होना चाहिये (कि वह जीवात्मा है जो भगवान की दास है)। वह श्रीवैष्णव सम्प्रदाय ग्रन्थों से भी परिचित होना चाहिए। पिल्लै लोकम जीयर द्वारा रचित “यतीन्द्र प्रवण प्रभावम” से एक घटना वर्णित है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी जो बड़े आचार्य थे उनको दो पत्नीयाँ थी। वो एक बार अलग अलग कर दोनों से एक प्रश्न किये। सर्वप्रथम उन्होंने अपनी पहिली पत्नी से पूछा कि “तुम मेरे विषय में क्या सोचती हो?” वह उत्तर देती है कि “मैं आपको को स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान ही जानती हूँ और अपना आचार्य मानती हूं”। वो प्रसन्न होकर उन्हें तिरुवाराधन और स्वयं उनके लिये प्रसाद बनाने को कहते है। फिर अपनी दूसरी पत्नी से भी यही प्रश्न करते है और प्रतिउत्तर में वह कहती है “मैं आपको अपना पति मानती हूं”। तब वह उन्हें अपनी पहिली पत्नी की प्रसाद बनाने में सहायता करने के लिए कहते है। जब उनकी पहिली पत्नी मासिक समय से होती है तब वह अपनी दूसरी पत्नी को प्रसाद बनाने कि आज्ञा देते है परन्तु उस पाने से पहले वे अपने प्रिय शिष्य को जो उच्च श्रीवैष्णव है प्रसाद को छुने को कहते है और तत्पश्चात पाते है। अत: वे अपने व्यवहार से यह बताते है कि हम श्रीवैष्णवों में सच्चा ज्ञान होना चाहिये ताकि भगवान और भागवतों के लिये प्रसाद बनाने का कैंकर्य प्राप्त कर सके। श्रीरामानुज स्वामीजी के समय उनके मठ में उनके सभी शिष्य महान थे व् उच्च कोटी के आचार्य बनने में सक्षम थे। कई सामान्य, सांसारिक, देहिक जनों को उन्होंने अपनी सेवा से निकाले दिया था। ऐसा उनके जन्म के आधार पर नहीं किया गया था। अपितु यह पूरी तरह भगवद विषय के प्रति के उनके समर्पण के आधार पर था। भोजन जो हम पाते है वह भगवद प्रसाद होना चाहिये। हम यह देख सकते है कि भोजन विरोधी और भोग्य विरोधी दोनों पवित्र हृदय और सात्विक व्यवहार पर केन्द्रीत है।

  • अवैष्णव द्वारा स्पर्श किये गए प्रसाद को पाना बाधा है।
  • अवैष्णव द्वारा स्पर्श किये गए पात्र जिसमें प्रसाद हो उसे पाना बाधा है।
  • अवैष्णव द्वारा बनाया हुआ प्रसाद, जो प्रसाद बनाते समय निरन्तर भगवद विषय छोड़ अन्य विषय का स्मरण करता हो ऐसा प्रसाद पाना बाधा है। भगवद विषय छोड़ अन्य विषय का अर्थ देवतान्तर भजन, गप्पे आदि।
  • प्रसाद बनाते समय दिव्य प्रबन्ध आदि का उच्चारण करना चाहिए और ऐसे प्रसाद को ही पाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव जन प्रसाद बनाते समय तिरुपल्लाण्डु, तिरुपावै आदि पाठ करते है और भगवान के दिव्य लीलाओं का स्मरण करते है। ऐसे विषय कि चर्चा करते समय भगवान के लिये जो प्रसाद बनाया गया हो वो स्वादिष्ट हो जाता है। हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के साथ तिरुमला में हुई एक घटना को स्मरण कर सकते है। श्रीप्रतिवादी भयंकर अण्णन स्वामीजी श्रीनिवास भगवान के तिरुमंजन के लिये जल सेवा का कार्य करते थे। वह जल लाकर उसमें इलायची आदि डालकर उसे सुगन्धीत कर भगवान के अर्चक को दे देते थे। एक दिन श्रीरंगम से एक श्रीवैष्णव तिरुमला में पधारे और उन्होंने अण्णन स्वामीजी के समक्ष श्रीरंगम में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की कीर्ति और जीवन के विषय में चर्चा करना प्रारम्भ किया। उस प्रक्रिया में अण्णन स्वामीजी जल में सुगन्धीत द्रव्य डालना भुल गये और अर्चकों को ऐसे ही दे दिया। कुछ समय पश्चात अण्णन स्वामीजी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तुरन्त अर्चकों के समीप जाकर अपनी गलती के विषय में कहा। अर्चकजनों ने जो उस जल का उपयोग कैंकर्य हेतु करना प्रारम्भ कर चुके थे कहा कि आज तो यह जल प्रतिदिन से भी अधीक सुगन्धीत है। यह सुनकर श्रीअण्णन स्वामीजी को बहुत अचम्बा हुआ और उन्हें स्मरण हुआ की यह केवल श्रीरंगम से पधारे श्रीवैष्णव के साथ श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के विषय में चर्चा करने से ही हुआ है। पश्चात वे श्रीरंगम जाकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य हुए।
  • भगवान और भागवतों हेतु न होकर स्वयं कि तृप्ति के लिये भोजन बनाकर पाना बाधा है।
  • उन पात्र से भोजन लेकर पाना जिन पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक न हो बाधा है। पात्र जिसमें प्रसाद बनाया, परोसा आदि जाये उस पर भगवान का तिलक होना चाहिये।
  • भगवान को भोग लगाये बिना प्रसाद पाना बाधा है।
  • सांसारिक जनों द्वारा भोजन पवाना और भोजन जो सार्वजनिक स्थलों में दिया जाये, वह पाना बाधा है। भगवान को जब भी भोग लगाते है तो उस स्थान को परदे से ढकना या कक्ष का दरवाजा बंद कर देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: प्रसाद को कभी भी ढक कर रखना चाहिये। प्रसाद के वितरण के समय ही उसपर से कपड़ा निकालना चाहिये।
  • उस प्रसाद को पाना जो केवल भगवान को निवेदन किया हो और नित्यसुरी जैसे आदिशेष, विष्वक्सेन आदि आल्वार और आचार्य को अर्पण नहीं किया हो, बाधा है। जब हम भगवान को भोग लगाते है तब हम एक क्रम का अनुसरण करते है। पहिले हम कहते है “सर्व मंगल विग्रहाय समस्त परिवाराय श्रीमते नारायणाय नम:” (भगवान श्रीमन्नारायण जो अपने अनेक रूप और परिवार के साथ यहाँ पधारे है, मेरा यह कैंकर्य स्वीकार करें)। “अडियेन मेवी अमर्गिनर अमुधे! अमुदु सेय्तरुल वेण्डुम्”। (मैं यह प्रसाद पूर्ण भक्ति से अर्पण कर रहा हूँ कृपया स्वीकार करें)। अत: पहिले हम भगवान को अर्पण करते है। तत्पश्चात श्रीदेवी, श्रीभूदेवी और श्रीनीलादेवीजी आदि को यह कहकर कि “श्री भूमी नीलादिभ्यो नम:”। पश्चात हम शंख, चक्र, अनन्त, गरुड, विष्वक्सेन आदि को अर्पण करते है। फिर हमें आल्वार और आचार्य को “परांकुश परकाल यतिवराधीभ्यो नम:” कहकर उन्हें अर्पण करते है। (श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीपरकाल स्वामीजी, आल्वार, श्रीरामानुज स्वामीजी और अन्य आचार्य भगवान का प्रसाद स्वीकार करें)। अन्त में हम अपने आचार्य को “अस्मद गुरुभ्यो नम:” कहकर अर्पण करते है। अत: प्रसाद पाने से पहले हम भोग भगवान, अम्माजी, नित्यसूरी, आल्वार और आचार्य को पहिले अर्पण करते है।
  • उस भोजन को पाना जिसके जाति या स्वभाव में ही दोष हो, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: प्याज, लहसुन, मुली, ढ़ोल का छड़ी, आदि सब्जियां उनके स्वभाव से अवगुण कारक है।
  • जो भोजन कीड़े, बाल (केशों), कृमी आदि से स्पर्श होता हो, वह भोजन पाना भी बाधा है।
  • अवैष्णवों के साथ बैठकर प्रसाद पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब हम प्रसाद पाते है तब हमारे आस पास कौन है यह सदैव देखना चाहिये।
  • व्यर्थ चर्चा करते हुए प्रसाद पाना बाधा है। प्रसाद पाने से पहिले हमें परिसेषनं (अन्तरयामी भगवान को भोग लगाना) करना चाहिये और तनियन, श्लोक आदि गाना चाहिये। केवल व्यर्थ सांसारिक चर्चा करते हुए पाने से बचना चाहिये।
  • द्वय महामन्त्र का निरन्तर जाप किये बिना प्रसाद पाना बाधा है।
  • केवल आनन्द भोग से प्रसाद पाना बाधा है। हमें सांसारिक आनन्द पर केन्द्रीत नहीं होना चाहिये। अपितु हमें प्रसाद कि शुद्धता पर केन्द्रीत होना चाहिये। अगर बड़े भी स्वाद लेकर चखते है वो कहते है “भगवान ने प्रसाद का आनन्द लिया है और शेष हमारे लिये दिया है”।
  • भगवद प्रसाद का बहुत आदर करना चाहिये और ऐसा न करना बाधा है।
  • प्रसाद को भगवद आराधना का अन्तिम भाग समझकर पाना चाहिये और ऐसा न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तिरुवाराधन का एक भाग है भगवान, आल्वार और आचार्य को भोग लगाना। अब यही भोग प्रसाद हो गया है। हमें उस प्रसाद को स्वीकार कर ही तिरुवाराधन के क्रम को समाप्त करना चाहिये। तिरुवाराधन को याग कहते है और तदियाराधन को अनुयाग कहते है। हमारा आचरण यह होना चाहिये कि प्रसाद पाना भगवद कैंकर्य का एक अंश है (जिससे भगवद कैंकर्य के लिये हमारे में ऊर्जा आये) और यह हमारे निजी आनन्द भोग के लिये नहीं है। यह तत्व श्रीवचन भूषण के प्रपन्न दिनचर्या के २४३ सूत्र में विस्तार से समझाया गया है। श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है कि हमें प्रसाद देह धारण के लिये पाना चाहिये और तिरुवाराधन कि प्रक्रीय को सम्पन्न करना चाहिये।
  • भागवतों को प्रसाद पवाने से पहिले स्वयं पाना बाधा है।
  • सदाचार्य को प्रसाद पवाने से पहिले स्वयं पाना बाधा है।
  • केवल प्राण वायु को पवाकर प्रसाद पाना बाधा है। परिशेषण विधि के अनुसार हमें प्रसाद को अलग अलग वायु अर्थात प्राण, अपान, व्यान, उधान और समान को अर्पण करना चाहिए। केवल मन्त्र उच्चारण करना और अर्पण करना पर्याप्त नहीं है। हमें आचार्य तनियन आदि भी बोलना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों द्वारा शुद्ध किये बिना भोजन को पाना बाधा है। श्रीवैष्णवों के देखने और स्पर्श मात्र से प्रसाद शुद्ध हो जाता है।
  • श्रीवैष्णव, जो सभी को शुद्ध करते है, उनको तदियाराधन विधि में देखकर भी उस विधि में भाग लेने से भागना। एरुम्बी अप्पा के वरवरमुनि दिनचर्या के व्याख्या में तिरुमलिसै अण्णाप्पंगार यह दर्शाते हैं कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का ऐसा दिव्य शोभा है की जिनकी उपस्थिति सभी श्रीवैष्णव तदियाराधन गोष्ठी (श्रीवैष्णव का समूह जो एक साथ प्रसाद पाते हैं) में शुभता लाती है। इसलिये प्रसाद पाने से पूर्व वरवरमुनि दिनचर्या का अनुसन्धान करते हैं।
  • अपने स्वयं कि तिरुमाली में सीमित प्रसाद पाना।
  • श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में सीमित प्रसाद पाना (जो अपने आचार्य जैसे अच्छे है)। अनुवादक टिप्पणी: तैत्तिरीय उपनिषद कहता हैं “अन्नं बहु कुर्वियात” (अधिक प्रसाद बनाओं और उसे बाटों)। हमें भी अधिक मात्रा में प्रसाद बनाकर श्रीवैष्णवों को बाँटना चाहिए और जितना जरूरत है उतना ही पाना चाहिये ताकि सरलता से कैंकर्य कर सके।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २२

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

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५४) भोजन विरोधी – तदीयाराधन में बाधाएं

सामान्यत: भोजन अर्थात खाद्य पदार्थ प्रदान करना जिसे “भगवद तदीयाराधन” कहा जाता है। इस विषय में श्रीवैष्णव जो प्रसाद देते है और जो प्रसाद ग्रहण करते है, उनका भाव और इसके सम्बन्ध में जो मुख्य पहलु है उसे समझाया गया है। यहाँ सामान्यत: जो त्रुटियाँ होती है उसे दर्शाया गया है। मुख्य अभिप्राय यही है कि जो त्रुटियाँ है उसे पहचान कर ठीक कर ले। अनुवादक टिप्पणी: आज कल मुख्य समस्या यह है कि कई स्थानों पर सही तिरुवाराधन और भगवद भोग के बिना ही भागवत तदीयाराधन होता है। हर भोग को सबसे पहिले भगवान को अर्पण नहीं किया गया तो वह प्रसाद नहीं होता है। कई स्थानों पर भगवान को भोग लगाने में कई कठिनाईयां आती है परन्तु सही व्यवस्था कर यह देखना चाहिये कि पहिले भगवान को भोग लगे और उसके पश्चात तदीयाराधन मे सभी को प्रसाद दिया जाये।

  • जब कोई श्रीवैष्णव प्रेम से प्रसाद (भगवान को अर्पण किये गए भोजन का शेष) देते है तो उस प्रसाद में मात्रा, विशेषता, स्वाद आदि देखना बाधा है। हमें केवल प्रेम देखना चाहिये कि किस प्रेम से हमें प्रसाद दिया गया है और उसे स्वीकार कर पा लेना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवद्गीता में भगवान स्वयं कहते है कि वे प्रेम से अर्पण किया हुआ सब (एक पत्ता, एक फूल, एक फल या जल) जो भी है उसे स्वीकार करते है, प्रसाद की विशेषता नहीं देखते। इसलिये हमें केवल जिस प्रेम से प्रसाद दिया गया है उसे देखना चाहिये।
  • भगवद प्रसाद का आदर न करना बहुत बड़ी बाधा है।
  • जब प्रसाद देनेवाला से कोई भूल हो जाये तो हमें अचंभित नहीं होना चाहिये कि “इस व्यक्ति को प्रसाद देने भी नहीं आता है” यह बाधा है। हमें प्रसाद देनेवाले व्यक्ति में कोई दोष नहीं देखना चाहिये।
  • इसके आगे प्रसाद देनेवाले से जो भूल हो सकती है उस पर ध्यान केन्द्रित करेंगे (जिससे उन त्रुटियों से बचा जा सकता है)। अपने लिये अलग और अन्य के लिये अलग प्रसाद बनाना बाधा है। अतिथि को हमारे बराबर या उससे भी ऊँचा सम्मान देना चाहिये।
  • घमण्ड से प्रसाद देना (कि मैं प्रसाद दे रहा हूँ) बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक बार श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी अपनी तिरुमला यात्रा में तिरुक्कोवलूर पहूंचे। तिरुमला के रास्ते में उन्होंने यह विचार किया कि वह अपने एक धनी शिष्य एण्णायिर्त्तु एच्चान के तिरुमाली में जायेंगे। यह सुनकर उस शिष्य ने श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी के स्वागत कि भव्य तैयारी कि। श्रीरामानुज स्वामीजी एक ऐसी जगह पहुंचे जहाँ मार्ग दो भागों में विभाजित हो जाता है। उन्होंने मार्ग में किसी से उन दो रास्तों के विषय में पूछा। उसने कहा एक रास्ता एण्णायिर्त्तु एच्चान के तिरुमाली कि ओर जाता है जहाँ रजस गुणों वाले लोग जाते है और दूसरा रास्ता परुत्तिक्कोल्लै अम्मैयार के तिरुमाली के ओर जाता है जहाँ सात्विक गुणों वाले लोग जाते है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने उसी क्षण परुत्तिक्कोल्लै अम्मैयार के तिरुमाली में जाने का विचार किया। यह चरित्र पिल्लै लोकम जीयर द्वारा रचित रामानुजाचार्य दिव्य चरित्र में समझाया गया है। इससे हम यह समझ सकते है कि दूसरों का सम्मान करते समय हमें अहंकार को साथ नहीं जोड़ना चाहिये।
  • अतिथि स्वामी है और वह हमसे सेवा लेकर अपनी ही संपत्ति को स्वीकार कर रहे है यह विचार न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तैतरीय उपनिषद यह घोषणा करते है “अतिथि देवो भव:” – अतिथि (श्रीवैष्णवों) को भगवान के समान आदर देना चाहिये। भगवान सभी के स्वामी है – हम जो कुछ भी भगवान को अर्पण करते है उसके स्वामी वे स्वयं हीं है। जब श्रीवैष्णव पधारते है तो उन्हें वही सम्मान देना चाहिये। हमें यह विचार करना चाहिये कि जो भी हमारे पास है वह सभी अतिथि श्रीवैष्णव का है और वह बहुत करुणा से उसे स्वीकार करते है।
  • अतिथि को इस बात पर जांचना कि वह कितने प्रकार के पकवान पाता है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति सामान्य से अधिक पाता है तो उस व्यक्ति में हीन भाव नहीं रखना चाहिये।
  • अगर तदीयाराधन में कुछ कमी या गलती हो तो अतिथि को यह नहीं सोचना चाहिये कि “वह मुझे सही तरीके से भोजन नहीं पवा रहा है” – यह बाधा है।
  • यह सोचकर ग़ुस्सा करना कि हमें सही मान सम्मान नहीं मिला और प्रसाद का त्याग कर वहाँ से निकल जाना बाधा है।
  • अतिथि को बाहर मेहमानों के कमरे में बिठाकर प्रसाद पवाना और स्वयं अन्दर बैठकर प्रसाद पाना बाधा है। अतिथि को पूर्ण आदर देकर उनकी सेवा करनी चाहिये।
  • स्वयं पहिले पाना और तत्पश्चात अतिथि को परोसना बाधा है। हमें अतिथि को उनके संतुष्ट होने तक उनकी सेवा कर तत्पश्चात स्वयं पाना चाहिये।
  • जब हम अतिथि के साथ प्रसाद पाने के लिये बैठते है तब हमें अतिथि का प्रसाद पाकर उठने तक प्रतीक्षा कर फिर उठना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: तदीयाराधन के प्रारम्भ में कुछ श्लोक (आचार्य तनियन, देवराज अष्टकम, पूर्व/उत्तर दिनचर्या, वानमामलै जीयर प्रपत्ती/ मंगलाशासन आदि – मठ, तिरुमाली आदि पर निर्भर करके) का उच्चारण होता है और फिर भगवान का तीर्थ सभी को परिशेषणम (प्रसाद पाने के पूर्व अन्तरयामी भगवान को भोग लगाने कि एक साधारण क्रिया) के लिये देना। सभी श्रीवैष्णवों को इसे साथ में करना चाहिये। उसी तरह प्रसाद पाने के पश्चात भगवान का तीर्थ सभी को दिया जाता है और सभी वैष्णव इसे पाकर प्रसाद को सम्पन्न करते है। सभी वैष्णव एक साथ अपने हाथ को धोने के लिये उठते है। यह सामान्य प्रकिया है। तदीयाराधन के मध्य में उठना यह शिष्टाचार नहीं है।
  • अतिथि का इस बात से दुखी होना कि प्रसाद पवानेवाला स्वयं भीतर प्रसाद पाकर उसे प्रसाद बाहर पवा रहा है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह पहले चर्चा किये गए विषय से संबंधित है- यहाँ अतिथि के संदर्भ में समझाया गया है। अतिथि को इसे सामान्यतः लेना चाहिये और अपमान स्वरुप नहीं लेना चाहिए।
  • अतिथि का इस बात से घबराना कि प्रसाद पवानेवाला उसके पहिले ही प्रसाद पा लिया है, यह बाधा है।
  • अतिथि का यह सोचना कि प्रसाद पवानेवाला उसे छोड़कर उठकर चला गया। यह बाधा है।
  • प्रसाद पवानेवाले को करुणा से अतिथि को बड़े विनम्र शब्दों से बुलाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है। जैसे पहिले कहा गया है, यहाँ अतिथि भी श्रीवैष्णव होना चाहिये।
  • प्रसाद पवानेवाला अवैष्णवों को प्रसाद पवाने में भी अत्यंत विनम्रता और आथित्य करता है जहाँ उसकी जरूरत नहीं है, यह बाधा है।
  • अतिथि का नाराज/क्रोध होना यह सोचकर कि प्रसाद पवानेवाला उससे विनम्र शब्दों से स्वागत नहीं किया, यह बाधा है।
  • अतिथि को इस बात से गर्व होना कि प्रसाद पवानेवाले ने उसका उदारता से स्वागत किया बाधा है।
  • अतिथि द्वारा मानवता नहीं दिखाना और यह अतिथेय से कहना कि “आपको मेरे लिए स्वागत करने कि आवश्यकता नहीं है”। यह बाधा है।
  • अतिथि से पहिले स्वयं तीर्थ ग्रहण करना बाधा है। बुनियादी तौर पर हमें अतिथि का प्रसाद होने तक प्रतिक्षा करनी चाहिये।
  • स्वयं पहिले पाकर, शेष अतिथि को देना बाधा है। पहिले अतिथि को पवाना फिर स्वयं पाना यह सभ्यता है। अत: पहिले स्वयं पाना और बचा हुआ अन्य को देना सदाचार नहीं है।
  • स्वतन्त्रता से अतिथि द्वारा प्रसाद पाना प्रारम्भ करना बाधा है। श्रीवैष्णव तदीयाराधन में कुछ श्लोक, आचार्य तनियन आदि पहिले गाया जाता है। तत्पश्चात भगवान का तीर्थ दिया जाता है जिसके प्रयोग से परिशेषणम किया जाता है। उसके पश्चात हीं हमें पाना चाहिये।
  • अगर कोई अतिथि सभी श्रीवैष्णवों के पाने के पश्चात आता है तो उसे इस बात से नहीं घबराना चाहिये कि यह बचा हुआ खाना है। ऐसा करना बाधा है।
  • श्रीवैष्णवों के साथ उनकी सच्ची निष्ठा को समझे बिना प्रसाद आदान प्रदान करना बाधा है। वह प्रसाद आचार्य निष्ठ श्रीवैष्णवों का शेष हो सकता है अथवा उन श्रीवैष्णवों द्वारा प्रदत्त हो सकता है जो अच्चार्य निष्ठा में स्थित है। जब कोई आचार्य अभिमानी होता है तो उसे ऐसे प्रसाद के प्रति बहुत अनुराग होता है। ऐसी निष्ठा होने के बावजुद ऐसे प्रसाद का त्याग करना अपचार है। (डॉ वी.वी.रामानुजम स्वामी) एक व्यक्तिगत अनुभव कह रहे है। २० साल पूर्व वे श्रीधनुर्दास स्वामीजी के तिरुमाली में कैंकर्य कर रहे थे। उस समय सिंगपपेरुमाल के मन्दिर में एक महा संप्रोक्षण किया गया था। तिरुमाली में एक बहुत बड़ा तदीयाराधन का आयोजन किया गया था। श्रीपेरेम्बूतूर से उनके एक प्रिय मित्र पधारे थे। उन्होंने उन्हें तिरुमाली में आकर प्रसाद पाने को कहा। परंतु उन्होंने यह कहकर कि “मैं धनुर्दास स्वामीजी के वंशज के यहाँ प्रसाद नहीं पाता” आना अस्वीकार किया। अनुवादक टिप्पणी: प्रमेय रत्न में श्रीकुरेश स्वामीजी और उनकी पत्नी आण्डाल अम्माजी से संबंधित एक घटना समझायी गई है। बहुत लम्बी यात्रा के पश्चात श्रीकुरेश स्वामीजी और अम्माजी घर को लौट रहे थे। दोनों थके हुए और भुखे भी थे। वें एक श्रीवैष्णव के तिरुमाली में आते है जो उन्हें रहने को एक स्थान और प्रसाद देता है। स्वामीजी अपनी अनुष्ठान कर प्रसाद पाते है परन्तु अम्माजी नहीं पाती है और स्वामीजी से कहती है “आप श्रीवैष्णव नाम और रूप देखकर उनका प्रसाद पा लिये। परन्तु हमें उनकी निष्ठा का पता नहीं है। इसलिये मैं अपने घर जाने तक इंतजार करूंगी”। यह सुनकर स्वामीजी अचंभित होते है और अम्माजी से कहते है “मेरी आप जैसी निष्ठा क्यों नहीं है? कृपया भगवान से प्रार्थना कीजिये कि मेरे में भी आप जैसी निष्ठा आ जाये”। यह अम्माजी कि निष्ठा और स्वामीजी कि नम्रता है।
  • श्रीवैष्णवों कि आचार्य निष्ठा देखकर प्रसाद न पाना बाधा है।
  • खराब हाथों से प्रसाद पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे हाथ मुह, नाक आदि अथवा अन्य कोई शरीर का निचला भाग को छुने से खराब हो जाता है। हमें तुरन्त अपने हाथों को पानी से धो लेना चाहिये।
  • बर्तन में प्रसाद पाना बाधा है, यद्यपि सभी को प्रसाद वितरण करने के लिए बर्तन का उपयोग करने कि विनती करनी चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: हमें प्रसाद वितरण करने वाले पात्र में कभी भी प्रसाद नहीं पाना चाहिये। आजकल हम इस बुनियादी तत्व से पूर्णत: अज्ञान हो जाते है आज के संस्कृति के प्रभाव से जैसे खराब हाथों से पाना, मुख्य पात्र में प्रसाद पाना, गंदगी का ध्यान न देना आदि।
  • जैसे तिरुमालै के ४१ पाशुर में कहा गया है “पोनगम शेय्द शेडम तरुवरेल पुनिदम अन्रे”, अर्थात हमें जानना चाहिये कि श्रीवैष्णवों का शेष प्रसाद सबसे अधीक पवित्र और शुद्ध है। इसमें विश्वास न रखना बाधा है। यह श्रीभक्ताङ्घ्रिरेणु आल्वार के पवित्र शब्द है। शेष प्रसाद दो प्रकार के होते है – पाण्डा शेष (प्रसाद वितरण करने वाले पात्र में शेष) और पात्र शेष (श्रीवैष्णव द्वारा प्रसाद पाकर उस पत्ते पर शेष)। यहाँ आल्वार, पात्र शेष अर्थात – श्रीवैष्णव द्वारा पाए गए पात्र / पत्ते का शेष के विषय में कह रहे है। यह सुगमता से समझा जा सकता है कि इस शेष प्रसाद की महिमा में श्रद्धा उत्पन्न होना अत्यंत कठिन है (क्यूंकि सामान्यतः लोग दूसरों के द्वारा पाए गए प्रसाद के शेष को हीन भाव से देखते है)।  अनुवादक टिप्पणी: इस संदर्भ में, हमें स्मरण होना चाहिए -“मोर मुन्नार ऐयर” – वे जो प्रथम दद्ध्योधन से प्रसाद प्रारम्भ करते थे यह सोचकर की श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा पाए गए अंतिम पकवान का स्वाद न बदले) – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के प्रिय शिष्य जो नियमानुसार उनके द्वारा पाए गए पत्ते में ही प्रसाद पाया करते थे। पूर्वाचार्यों के ग्रंथों के अनुसार उन्होंने 30 वर्षों तक ऐसा ही किया। अंततः वे सन्यासी होकर परवस्तु पट्टरपिरान जीयर नाम से प्रख्यात हुए।
  • जब श्रीवैष्णव प्रसाद का पात्र परोसने के लिये हाथ में लेते है उन्हें देखते रहना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह सेवा करने के लिये आगे बढ़ना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों को परोसने के लिये स्वयं ही प्रसाद के पात्र को हाथ में लेना चाहिये। ऐसा न करना बाधा।
  • तदीयाराधन के समय प्रसाद पवानेवाले को स्वयं अपनी पत्नी के साथ परोसना चाहिये नाकी अपने तिरुमाली के सेवको या सांसारिक जनों द्वारा, ऐसा न करना बाधा है।
  • प्रसाद पाने के पश्चात अतिथि को स्वयं अपना पत्ता उठाना चाहिये यह विचार करके कि यह एक श्रीवैष्णव कि तिरुमाली है जिसे बहुत सम्मान देना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • अगर घर के वैष्णव प्रसाद के पत्ते उठाने से मना भी करते है तो अतिथि को बल पूर्वक यह जिम्मेदारी लेकर पत्ते को उठाना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • पत्ते को निकालते समय यह सावधानी रखनी चाहिये कि प्रसाद तिरुमाली में सभी जगह बिखरे नहीं।
  • अन्य श्रीवैष्णवों से आगे बढ़कर हाथ धोना बाधा है। हमें हमारा समय आने पर ही संयम से हाथ, पैर आदि धोना चाहिये।
  • अन्य श्रीवैष्णव द्वारा उपयोग किये हुए जल से हाथ, पैर आदि को धोने से हिचकिचाना बाधा है। हमें इसे अपना सौभाग्य समझना चाहिये।
  • उस स्थान को शुद्ध करना जहाँ श्रीवैष्णवों ने प्रसाद पाया है, बाधा है। उस स्थान को प्राकृतिक रूप से साफ किया जा सकता है जहाँ अन्य श्रीवैष्णव प्रसाद पायेंगे। मठ, तिरुमाली में यह सामान्यत: देखा जाता है कि श्रीवैष्णव प्रसाद पाने के पश्चात अन्य के लिये उस स्थान को गाय के गोबर से साफ किया जाता है।
  • भस्म से जगह को साफ करना बाधा है।
  • सावधान न होना और उस स्थान पर पैर रखना जहाँ श्रीवैष्णवों ने प्रसाद पाया है बाधा है।
  • अन्य श्रीवैष्णवों को दिये बिना पान, सुपारी और चुना पाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: तदीयाराधन के पश्चात पान, सुपारी और चुना पाना यह एक सामान्य प्रथा है।
  • अन्य श्रीवैष्णवों को देनेवाले पान पर स्वयं के पाये हुए शेष चुना लगाना बाधा है।
  • अतिथि का उन श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में त्रुटियाँ देखना जिन्होंने उन्हें तदीयाराधन करवाया, यह बाधा है।
  • अतिथि जो तदीयाराधन करानेवाले के हृदय को हानि पहूंचाते है वह बाधा है।-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २१

 श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २०

५२) गृह विरोधी – गृह स्थान में विरोधी।

परुत्तिक कोल्लै अम्माल के तिरुमाली में आकर जब श्रीरामानुज स्वामीजी यह देखते है कि अपने फटे हुए वस्त्र में बाहर आने में अम्माल लज्जा अनुभव कर रही है तब वे कृपा कर उन्हें अपना प्रपन्न पाकै (अपना वस्त्र) प्रदान करते है। अपनी तिरुवेंकट यात्रा में श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं उन साध्वी स्त्री के सात्विक गुणों को देखकर उनके तिरुमाली में पधारते है – यह घटना श्रीपिल्लै लोकम जीयर स्वामीजी के रामानुजार्य दिव्य चरित्र में दर्शाया गया है।

इस भाग में प्रपन्नों के निवास गृह कि बनावट को विस्तार से समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: सामान्यत: हमारे पूर्वाचार्य दिव्य देश, अभिमान स्थल, आचार्य/आल्वार आदि के अवतार स्थान पर रहने को केन्द्रीत रहते थे। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में समझाते है कि “उन कोयिलील वालुम वैट्टणवन एन्नुम वनमै कण्डाये”- श्रीवैष्णव के लिये अंतिम लक्ष्य तो भगवद और भागवतों के कैंकर्य में व्यस्त रहना और उस स्थान पर निवास करना है जो भगवान को प्रिय है। दिव्य देशों कि “उगन्थरुलिन निलंगल” ऐसी स्तुति होती है – वह स्थान जहाँ पर भगवान कि निर्हेतुक कृपा होती है। दिव्य देश आदि में रहने का उद्देश्य भगवद विषय में शिक्षीत होकर श्रीवैष्णवों से चर्चा कर अपने ज्ञान को बढ़ाना और निरन्तर भगवद – भागवतों के कैंकर्य में रहना। भागवतों कि संगत में रहने से हम स्वतः ही संसारी जीवों से दूर हो जाते है। इस तत्व को इस अंश में पूर्णत: समझाया गया है।

  • उस स्थान पर अपना गृह (निवास स्थान) का होना, जो देवतान्तर (अन्य देव जैसे ब्रम्हा, रुद्र, आदि) से सम्बन्ध के कारण निन्दक है। यह बाधा है।
  • उन गलियों में रहना, जहाँ पाषण्डी जन निवास करते है बाधा है (बाह्य – वह जो वेदों को स्वीकार नहीं करते है और कुदृष्टि – वह जो वेदों को स्वीकार तो करते है परन्तु उसका गलत अर्थ करते है)।
  • सांसारी जनों के निकट में रहना बाधा है।
  • उस स्थान में निवास करना रहना जहाँ भगवान के दिव्य चिन्ह जैसे ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक, शङ्ख, चक्र आदि नहीं है, यह बाधा है।
  • उस स्थान में निवास करना जो सांसारियों का या उनके प्रियजनों का है, यह बाधा है।
  • हमारे आचार्य को जो स्थान प्रिय नहीं है, उस स्थान में निवास करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह समझना चाहिये कि जब भी एक घर का निर्माण होता है, उसे पहिले अपने आचार्य को समर्पित करना चाहिये तत्पश्चात उनकी अनुमती और आशीर्वाद से उस तिरुमाली का उपयोग करना चाहिये। यह आज भी गृह प्रवेश के रस्म के समय यह देखा जाता है कि आचार्य को बुलाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। आचार्य हृदयम में एक सुन्दर घटना ८५वें चूर्णिका में देखी गयी है जिसका प्रारम्भ “म्लेच्चनुम् भक्तन आनै” से होता है। भागवतों कि कीर्ति को समझाते हुए अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार यह दर्शाते है कि जब नदुविल तिरुवड़ी पिल्लै भट्टर ने नव तिरुमाली का निर्माण किया तब उन्होंने सिर्फ पिल्लै वानमामलै दासर से प्रवेश करने और अपने चरणों को सभी कक्षों में रखने कि प्रार्थना की। यह इतना ही नव तिरुमाली को पवित्र करने के लिए प्रयाप्त है।
  • उस निवास स्थान में रहना जहाँ भागवतों के प्रवेश और किसी भी समय उनका रहने को पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें अपने तिरुमाली को ऐसे निर्माण करना चाहिये कि भागवत किसी भी समय पूर्ण स्वतन्त्रता से प्रवेश कर सके (जैसे स्वयं ही उस तिरुमाली के स्वामी हो) और जीतने दिन उनको रहने कि इच्छा हो उतने दिन रह सके। श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में श्रीवैष्णवों के स्वागत और उनके आगमन पर उनकी अच्छी तरह देखभाल करने में निपुण ऐसे तिरुक्कोष्टीयूर के जनों कि बहुत बढाई करते है।
  • उस निवास स्थान पर विराजमान होना जहाँ सांसारिक विषयों पर केन्द्रित संबंधी आते है, यह बाधा है। जब कोई सम्बन्धी श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी की तिरुमाली में आते थे, तब वे उन संबंधियों द्वारा उपयोग किये गए मिट्टी के सभी पात्र तोड़ देते थे और श्रीदाशरथी स्वामीजी द्वारा प्रयोग किये गये पात्र ले आया करते थे। अनुवादक टिप्पणी: गुरु परम्परा प्रभावम ६००० पड़ी में श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी कि स्तुति कि गयी है। उसमें इस घटना को भी दर्शाया गया है। एक बार श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के सम्बन्धी (जो श्रीवैष्णव नहीं थे) उन्हें मिलने आते है। उनके जाने के पश्चात श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी सभी पात्रों को नष्ट कर उस स्थान को शुद्ध करते है। फिर वे श्रीदाशरथी स्वामीजी के तिरुमाली में जाकर उन पात्र को लेकर आते है, जिन्हें उन्होंने त्याग दिया है और वह उन पात्रों का प्रयोग करते है। अत: उन्होंने यह स्थापित किया कि जिनका शुद्ध आचार्य सम्बन्ध है उनसे संबंधित (उनके द्वारा त्यागा हुआ भी) सब कुछ पवित्र और स्वीकारनीय है और जो संसारी द्वारा उपयोग किया गया हो, उसका त्याग कर देना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ अर्चावतार भगवान (सालग्राम श्रीमूर्ति, विग्रह भगवान आदि) तिरुवाराधन कक्ष में न विराजे हो, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: पञ्च संस्कार के एक भाग के अनुसार शिष्य अपने आचार्य से तिरुवाराधन करने कि विधि सिखता है। यह सीखने के पश्चात हमें अर्चावतार भगवान कि अराधना अपने तिरुमाली में करनी चाहिये जो कृपा कर हमारे तिरुमाली में पधारे है। अर्चावतार भगवान कि हमारे पूर्वाचार्यों ने बहुत स्तुति की है।
  • उस तिरुमाली में रहना जिसके प्रवेश द्वार पर शंख हो बाधा है। यद्यपि शंख भगवान के पवित्र शस्त्र और चिन्ह है, परंतु इनका बहुतेरे जन स्वतन्त्रता पूर्वक प्रयोग करते है। केवल शंख का प्रयोग करने कि यहाँ निन्दा कि गयी है।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ श्रीआचार्य का श्रीपाद तीर्थ न हो बाधा है। हमारे पूर्वाचार्यों ने यह समझाया है कि सभी तिरुमाली में आचार्य श्रीपाद तीर्थ और भगवान का तीर्थ होना ही चाहिये। यह सामान्य अभ्यास है कि कुमकुम या चन्दन का लेप आचार्य के चरण कमलों को लगाकर उसकी छाप एक सफेद नये कपड़े पर लेकर और उसे बड़े आदर के साथ अपने तिरुमाली में रखा जाता है। कभी कभी आचार्य कि चरण पादुका को भी रखते है। श्रीपाद तीर्थ इन दोनों – कपड़े पर आचार्य के चरण पादुका कि छाप या चरण पादुका से बनाया जा सकता है। एक और शैली है श्रीपाद तीर्थ बनाने की – तुलसी के पेड़ के नीचे कि मिट्टी को एक बार आचार्य के श्रीपाद तीर्थ के साथ मिलाकर एक ठोस खण्ड बनाया जाता है। जब वह सुख जाता है तो इसे “तीर्थवड़ी” कहा जाता है – सादे जल को इसमें मिलाने से श्रीपाद तीर्थ बन जाता है। किसी भी परिस्थिती में शिष्य को प्रतिदिन श्रीपाद तीर्थ को ग्रहण करना ही चाहिये।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक कि सामग्री और भगवान का प्रसाद न हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह सामग्री श्रीवैष्णव के नित्य प्रति दिन के लिये आवश्यक है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ मन्त्र जपने कि माला लटकी हुई है, बाधा है। अगर हमें केवल अपने मन्त्र उच्चारण का हिसाब रखना हो तो वह हम अंगूली के लकीरों से भी रख सकते है। अनुवादक टिप्पणी: अन्य सम्प्रदाय में मन्त्र उच्चारण के लिये कहा गया है परन्तु हमारे सम्प्रदाय में मन्त्र (मूल मन्त्र, द्वय मन्त्र आदि) के अर्थानुसन्धान पर केन्द्रीत रहने के लिए कहा गया है। हमारे सम्प्रदाय में इतनी गिनती की माला जपना है, ऐसा कोई नियम नहीं है केवल गायत्री मन्त्र जो संध्या वन्दन का एक अंग है जो प्रथम ३ वर्णआश्रम (ब्राम्हण, क्षत्रीय, वैश्य) के लिये है।
  • कुत्ते, लोमड़ी, भेड़िया, पाषण्ड के समीप के तिरुमाली में रहना बाधा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ शैव, बौद्ध, जैन, शार्वाक (बाह्य और कुदृष्टी) सम्प्रदाय के ग्रन्थ हो बाधा है। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी तिरुमालै के ७वें पाशुर में कहते है “काण्बरो केटपरो ताम” – क्या वें कभी अन्य सम्प्रदाय के ग्रन्थ को देखेंगे या सुनेंगे। इस पाशुर के व्याख्या में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै समझाते है कि कैसे श्रीकुरेश स्वामीजी की बाल्यावस्था में उनके पिताजी ने उन्हें अन्य सम्प्रदाय के विषय में सुनने पर सजा दी थी।
  • उस तिरुमाली में रहना जिसे केवल शुक्रवार, अमावस आदि के दिन ही गाय के गोबर से साफ किया हो, बाधा है। यह समझना चाहिये कि सभी का घर प्रतिदिन साफ और पवित्र करना चाहिये। यही तथ्य अर्जन विरोधी में भी समझाया गया है। अनुवादक टिप्पणी: क्योंकि भगवान सभी के तिरुमाली में विराजमान है इसलिये उसे भगवान का मन्दिर यह सोचकर हमें अपने तिरुमाली को प्रतिदिन साफ और पवित्र रखना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में विराजमान होना जहाँ रसोई घर में पका हुआ प्रसाद सामान्य जनों कि दृष्टी में आता है, यह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: एक बार प्रसाद बनाने के पश्चात भगवान को निवेदन करने से पूर्व किसी को भी उस भोजन को देखना/ सूंघना/ चखना नहीं चाहिये। इसलिये पके हुए प्रसाद को ढककर सुरक्षीत रखना चाहिये। इसलिये हम देखते है कि भगवान को जो भोग लगता है उसे ढककर ले जाया जाता है। इसे हमें अपने तिरुमाली में भी पालन करना चाहिये।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ बहुत राख़ छलकाया गया है, बाधा है। राख़ सामान्यत: शैव अपने ललाट पर लगाते है और श्रीवैष्णवों को उसे स्पर्श करना पूर्णत: गलत है। अनुवादक टिप्पणी: पुनः यह विषय घर कि स्वछता और पवित्रता को सही तरीके से रखने को प्रदर्शित करता है।
  • जहाँ पके हुए चावल को कोने में रखते है उस तिरुमाली में निवास करना बाधा है। इसे सामान्यत: उत्तर-पूर्वी (इशान्य) कोने में रखते है। अनुवादक टिप्पणी: जब पके हुए चावल उस ही दिन संपन्न न हो तब उसे एक घड़े में जल मिलाकर रात भर रखते है। इससे चावल सुरक्षीत रहते है और अगले दिन के लिये एक पौष्टीक आहार भी रहते है। पुराने जमाने में (१५ वर्ष पूर्व भी) कई परिवार (कई श्रीवैष्णव परिवार भी) इस तरह चावल को सुरक्षित करते थे और अगले दिन सवेरे उसे वैसे ही अथवा दही में मिलाकर पाते थे। इस प्रथा कि यहाँ निन्दा कि गयी है। भगवान कृष्ण भगवद्गीता में समझाते है कि किसी को भी वह भोजन नहीं पाना चाहिये जो पहिले बना हुआ है जैसे रात के समय सवेरे का भोजन और सवेरे के समय रात का भोजन क्योंकि ऐसे भोजन बासी हो जाते है और हमारे सात्विक स्वभाव के लिये सही भी नहीं है। परन्तु आजकल लोगों को भोजन का कोई मोल नहीं है इसलिये जो भी बचा है उसे फेंक देते है – यह भी बहुत गलत है क्योंकि शास्त्र कहता है “अन्नं न निन्द्यत” (भोजन को व्यर्थ न करो)। इसलिये भोजन को नष्ट किये बिना हमें अधिक भोजन नहीं बनाना चाहिये और जब अधिक हो तो उस प्रसाद को जिसे जरूरत है उसे दे ताकी प्रसाद का अपमान न हो।
  • उस घर में रहना जहाँ विश्राम करते समय हाथ, पैर आदि में धागे बांधते है।  अनुवादक टिप्पणी: यह तो आजकल के जमाने कि चाल हो गयी है श्रीवैष्णव परिवारों में भी हाथ, पैर, गले आदि में धागे बांधते है जो कि देवतान्तर से सम्बंधित होता है। कभी लोग उसे हनुमानजी या वेंकटेश भगवान का कहते है। जो कुछ भी हो वह हमारे सम्प्रदाय के विरुद्ध है। श्रीवैष्णवों के लिये सबसे प्रमुख रक्षा कवच तो उनका ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक है। सामान्यतः जो श्रीवैष्णवों को धारण करना है वह है:
    • ब्राम्हण, क्षत्रीय और वैश्य के लिये यज्ञोपवित।
    • अरै नाण कयिरु (कटी सूत्र) – कमर में बाँधने का सूत्र (सभी के लिए अनिवार्य) – यह आवश्यक है क्यूंकि कौपिनम (कोवणम – कौपिन वस्त्र – परंपरागत भीतरी परिधान) इसमें अवश्य बंधा जाना चाहिए
    • रक्षाबन्धन – रक्षा कवच जो यज्ञ, दीक्षा आदि के समय बांधे जाते है। सामान्यत: सफेद या पीला रंग
  • उस तिरुमाली में निवास करना जहाँ भगवान के लिये जिन पात्र में प्रसाद बनता हो उस पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक न हो। सभी बर्तन को भगवान के चिन्ह से सजाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीमहद्योगी स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में यह बताते है कि “एन्नैयुम एन उदैमैयैयुं उन चक्करप पोरी ओट्रिक्कोन्डू” – आपके चक्र के चिन्ह को मेरे आत्मा और मेरी संपत्ति (शरीर, धन आदि) पर लगाए। यह सभी श्रीवैष्णवों का कर्तव्य है कि अपने सभी वस्तु पर भगवान का चिन्ह लगाये।
  • उस तिरुमाली में निवास करना जो अभी तक भागवतों के चरण स्पर्श से पवित्र नहीं हुई है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम नडुविल तिरुवड़ी पिल्लै भट्टर और पिल्लै वानमामलै दासर के उदाहरण को आगे देख चुके है।
  • पाषण्डी जनों के जाने के पश्चात उस घर को पवित्र कर के ही वहाँ निवास करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ पशु को देवता का चिन्ह माना जाता है, बाधा है। पशुओं को गावों में विशेष चिन्ह से पहचानना एक सामान्य रिवाज है। यह स्पष्ट कर लेना की यह कोई देवतान्तर का चिन्ह नहीं है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ के लोग उन धार्मिक श्लोक का उच्चारण करते है जिन्हें हमारे पूर्वाचार्य नहीं गाते थे। वह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे सम्प्रदाय को सत सम्प्रदाय या शुद्ध सम्प्रदाय कहते है। हमारे पूर्वाचार्य आल्वारों के पाशुर, पूर्वाचार्यों के स्तोत्र, व्याख्या और रहस्य ग्रन्थों पर केन्द्रीत थे – यह सब देवतान्तर भजन, उपयान्तर निष्ठा आदि रहित है। हमारे आचार्यों द्वारा जो भी स्वीकार किया गया है, उसके अतिरिक्त कुछ भी करना चाहे वह आचार्यों/ आलवारों के कार्यों के अनुरूप हो अथवा न हो। इसलिए इस तरह के कार्यों में संलग्न होने से बचना ही उत्तम है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ तुलसी नहीं लगायी जाती, वह बाधा है। घर के भगवान के तिरुवाराधन के लिये अगर अपने घर में ही तुलसी लगायी जाये तो अच्छा है।
  • उस तिरुमाली में रहना जहाँ दिव्य प्रबन्ध के पाठ के गान को न सुन पाये वह बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: घर में भी हमें दिव्य प्रबन्ध, स्तोत्र पाठ, रहस्य ग्रन्थ आदि का पाठ नियमित रूप से करना चाहिये। इस तरह परिवार के सभी सदस्य भगवद गुणानुभाव और कैंकर्य कर सकते है।

५३) क्षेत्र विरोधीहमारी जो भूमि है, उस से सम्बंधित बाधाएं

 श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीअनंताल्वान स्वामीजी का बगीचा देखते हुए जो तिरुवेंकट भगवान के लिये बनाया गया है

इसे पिछले भाग का अविराम कहा जा सकता है। गृह विरोधी में किसी के तिरुमाली सम्बंधीत विषय को समझाया गया है। इस विषय का स्थान जहाँ तिरुमाली का निर्माण किया जाता है उसको बताया गया है। अनुवादक टिप्पणी: क्षेत्र का सामान्यता अर्थ है उपजाऊ भूमि। इसका एक और अर्थ कोई भी भूमि जो खेती, कृषी या अन्य काम के लिये प्रयोग होती है। पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में सामान्यतः गृह और क्षेत्र की चर्चा एक साथ होती है।

  • उस भूमि पर अपन स्वामित्व जताना जो देवतान्तरों की है, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ भूमि अन्य देवता या उनके मन्दिर के भी हो सकते है। श्रीवैष्णवों को उसका उपयोग स्वयं के लिये नहीं करना चाहिये।
  • उस भूमि को लेना जिस पर देवतान्तर का चिन्ह हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: देवतान्तर के कई चिन्ह है जैसे त्रीयाक पुण्ड्र, त्रीशुल, आदि। ऐसे चिन्ह के भूमि पर कभी भी समझौता करने से बचना चाहिये।
  • उस स्थान पर भूमि लेना जो भगवान को प्रिय नहीं है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहिले देखा गया है दिव्य देश, आल्वार/आचार्य अवतार स्थल, आदि भगवान को प्रिय है और हमें इन्हीं स्थानों पर भूमि लेनी चाहिये।
  • उस भूमि पर अपना कब्जा करना जो भगवान से चोरी/ छीनी गयी है, बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ लोग मन्दिर कि भूमि आदि को चुरा लेते है। ऐसे भूमि से तो बचना चाहिये क्योंकि यह हमारे स्वरूप विरुद्ध है। ऐसे भूमि से अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।
  • दूसरों कि भूमि को चुराना/कब्जा करना बाधा है।
  • उस भूमि पर दावा करना यह सोचकर कि “यह मेरी भूमि है” बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें यह समझना चाहिये कि सब कुछ भगवान का है हमें तो केवल एक अवसर मिला है उस संपत्ति का उपयोग करने हेतु।
  • उस भूमि पर कब्जा करना जो आचार्य कि सेवा हेतु उपयोग में न आवें। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवेदान्ती स्वामीजी के जीवन में एक सुन्दर घटना बताई गयी है। एक बार जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने परिवार सहित कूरकुलोत्तम गाँव में थे तो श्रीवेदान्ती स्वामीजी के बगीचे को श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के कोई परिवारवालों ने नुकसान पहूंचाया। श्रीवेदान्ती स्वामीजी के गृह कार्य करनेवाले उदास होकर कुछ अपशब्द कह दिये। यह सुनकर श्रीवेदान्ती स्वामीजी उदास हो गये और अपने परिचारकों को समझाते हुए कहे कि यह बगीचा श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के संतुष्टी के लिये है न की नम्पेरुमाल के लिये है। इससे हम यह समझ सकते है कि हमारा धन सबसे पहिले आचार्य कैंकर्य हेतु उपयोग करना हैं।
  • उस भूमि पर कब्जा करना जो पूर्णत: भगवद, भागवत, आचार्य के लिये समर्पित न हो बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीअनंताल्वान स्वामीजी कि निष्ठा देख सकते है उन्होंने केवल श्रीरामानुज स्वामीजी कि आज्ञा सुनकर तिरुमला में भगवान वेंकटेश के लिये एक सुन्दर बगीचा और तालाब बनाया।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/05/virodhi-pariharangal-21.html

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – २०

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १९

वैत्तमानिधि (महान निधि) – तिरुक्कोलुर – हमारी सच्ची सम्पदा

५१) अर्जन विरोधी – धन कमाने में बाधाएं

अर्जन का अर्थ धन कमाना है। यह विषय बहुत बड़ा है। कुछ पहलु स्पष्ट भी नहीं है। बड़ों से पुछने पर भी मुझको (व्ही॰व्ही॰रामानुजन स्वामी) संतोषजनक उत्तर नही मिले। मैंने जितना समझा है उतना लिखा है। सामान्यत: धन कमाना, धर्म मार्ग की सीमाओं में होना चाहिये। हमें अपने वर्ण और आश्रम के मर्यादा के भीतर रहकर धन कमाना चाहिये। जैसे पुराने तमिल में कहावत है कि “पोतुमेनर मनमे पोन् चेय्युम मरुन्तु” जितना चाहिये उतने में संतुष्ट रहना उत्तम दवा है, हमें अपने मन को जो उपलब्ध है उसके लिये तैयार करना चाहिये। सभी शास्त्र विरुद्ध तरीके से बचना चाहिये। दूसरों को धोका देकर, झूठ बोलकर, अपहरण कर आदि से धन कमाने से दूर रहना चाहिये। लालच से तो पूरी तरह दूर रहना चाहिये। जल्दी धन कमाना, गलत तरीके से धन कमाना, अपने विवेक के विरुद्ध धन कमाना आदि पुराने जमाने में भी होता था। मैं (व्ही॰व्ही॰रामानुजन स्वामी) यह निर्धारित करता हूँ कि भ्रष्टाचार कि राशी राजनीति और अन्य धन कमाने के तरीके पुराने जमाने में नहीं थे। इसे हमे ध्यान में रखना चाहिये। अब हम इसमें बाधाएं देखेंगें। अनुवादक टिप्पणी: धन कमाने का सामान्य तत्व यह देखा गया है कि कुछ भी सेवा के बदले में उसका मोल मांगना। जो कुछ भी इच्छापूर्वक दिया गया हो उसे संतुष्ट होकर अपनाना चाहिये और अपने शरीर के लिए जरूरत से अधिक धन कमाने का लालच नहीं करना चाहिये। और श्रीवैष्णवों के लिये सच्चा धन तो भगवान के चरण कमल हीं है। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी स्तोत्र रत्न में यह घोषणा भी करते है “धनं मदीयं तव पाद पङ्कजं” – आपके चरण कमल हीं मेरा धन है। भगवान और भागवतों कि सेवा कैंकर्य को भी धन कहा गया है। हमारे आल्वार और आचार्य पूरी तरह सांसारिक धन से दूर रहे और केवल भगवान और भागवतों कि सेवा पर हीं केन्द्रीत रहे। इसलिये हमें भी सच्चे धन कि ओर पूरी तरह केन्द्रीत रहना चाहिये नाकि सांसारिक धन कमाने में।

  • वैष्णव होने के पश्चात भी दान स्वीकार करना बाधा है। सामान्यत: धर्म शास्त्र में ब्राह्मणों को दान देना और और उसे स्वीकार करना दोनों अधिकार प्राप्त है। यहाँ हमें यह समझना चाहिये कि दान एकत्रित करना और बटोरना दोनों अपराध है। जब कोई दान स्वीकार करता है तो जिसे जरूरत हो उसे दे देना चाहिये।
  • अगर कोई गलती करता है तो उसे उस गलती के लिये दान देने कि सलाह करना और ऐसे दान हितकारी होगा ऐसा कहना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आज कल देखा जाता है कि कई लोग गलती के लिये साधक को उस दुख से दूर करने हेतु दान देने कि परामर्श देते है। कभी कभी जो परामर्श देते है उन्हे हीं उस दान का लाभ मिलता है। ऐसे कार्य से निश्चित रूप से बचना चाहिये। हमारे भगवान, आल्वार और आचार्य सांसारिक दुखों को दूर करने हेतु को उपचार नहीं बताते है। उनकी उपस्थिती का कारण सभी को संसार बन्धन से मुक्त करना है। सभी को यह समझना चाहिये और दूसरों को यह सलाह देना चाहिये कि सिर्फ भगवान, आल्वार और आचार्य कि पूजा कर पूरी तरह उनकी शरण हो जाये।
  • दान द्वारा दूसरों से धन स्वीकार करना बाधा है। सामान्यत: जब भी दान दिया जाता है दान देनेवाला हाथों में जल लेकर उसे जमीन पर छोड़ता है और यह निश्चित करता है कि वह धन दान लेनेवाले का है। इसे तमील में ऐसे समझाया गया है धारै वार्त्तुक कोदुत्तल। वैदीक धर्म में दान करने पर “श्रोतृीयाय श्रीवैष्णवाय साम्प्रदते नमम” यह उच्चार करते है कि वह वस्तु अब दान देनेवाले कि नहीं है। भगवान वामन अवतार लेकर धरती पर आये और बली राजा से दान स्वीकार किये – इस घटना की आल्वारों ने अपने पाशुरों में बड़ी स्तुति कि है। उन्होंने यह काम अपने भक्तों कि रक्षा हेतु अपनी महानता को कम करके भी किये है। यह भगवान का निस्वार्थ चरित्र है। परन्तु यह कहा गया है कि इस तरह हमें अपने स्वार्थ के लिये दान को स्वीकार नहीं करना चाहिये।
  • अपने जीवन के अंतिम साँस लेनेवाले लोगों से दान स्वीकार करना बाधा है। काल दानं – वह जो अपने शरीर का त्याग करते समय अपने पापों को मिटाने हेतु दान करता है। कुछ अनाज, सोना आदि दान में देते है। परन्तु किसी भी लालच में इसे स्वीकार नहीं करना चाहिये। यह श्रीवैष्णवों के सच्चे स्वभाव को नष्ट कर देता है।
  • श्राद्ध में भोजन कर धन एकत्रीत करना बाधा है। श्राद्ध का अर्थ वह वैदीक कर्म जो माँ, पिताजी आदि के मृत्यु के तिथी के दिन प्रति वर्ष करते है। वह जो पितृ के प्रति भी किया जाता है उसे भी श्राद्ध कहते है। इसमें वह जो यह कर्म करता है ३ ब्राह्मणों को आमंत्रित करता है जिनको पितृ (जिनके लिये हम श्राद्ध करते है), विश्वदेवर और विष्णु का स्थान मानते है, उन्हें कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन खिलाते है और अन्त में संभावना और ताम्बूल देते है। पुराने जमाने में जब भी किसी को निमंत्रण दिया जाता था श्रीवैष्णव उसे स्वीकार कर उस वैदीक कर्म को पूर्ण करते थे। श्रीवैष्णवों को निमंत्रण देने का अभ्यास था। परन्तु आजकल देखा जाता है कई जन श्राद्ध में भोजन करने को रोजगार बना लिये है और उससे धन कमाते है। यह आसानी से समझा जा सकता है कि यह क्रिया घृणा योग्य है।
  • दूसरों को कोई रस्म बताकर धन कमाना बाधा है। सरल और अज्ञानी जनों को उनके सेहत, धन आदि के विषय में कुछ रस्म बताकर धन कमाना पूरी तरह धोखा देना है और इससे बचना भी चाहिये।
  • किसी के घर आदि के विषय में ज्योतिष सलाह देकर धन कमाना बाधा है।
  • गाँव के मुखिया होने कि वजह से (सांसारिक विषय, जमीन कि लड़ाई आदि को सुलझाने के लिये) धन कमाना बाधा है। श्रीरामायण के उत्तर काण्ड के ६९वें सरगम में एक घटना बतायी गयी है। एक ब्राह्मण एक कुत्ते को क्रोध के कारण चोट पहूंचाता है। वह कुत्ता श्रीराम के दरबार में वैसे ही घायल अवस्था में आकर उस ब्राह्मण कि शिकायत करता है। श्रीराम उस ब्राह्मण को दरबार में बुलाकर विषय के बारें में उससे पूछते है। वह ब्राह्मण कहता है “मैं बहुत भूखा था, भोजन के लिये भीख माँग रहा था और बहुत थका हुआ था। क्योंकि यह कुत्ता उस समय मुझे परेशान कर रहा था मुझे क्रोध आया और मैंने उसे चोट पहूंचाई। मुझे जो भी सजा मिले मैं स्वीकार करूँगा”। श्रीराम उस कुत्ते के निकट जाकर उसे उचित दण्ड देने को कहते है। वह कुत्ता उस ब्राह्मण को एक गांव का मुखिया बनाने को कहता है और श्रीराम भी यह आज्ञा कर देते है। ब्राह्मंड उस कुत्ते से पूछता है ऐसा दण्ड क्यों? वह कुत्ता उत्तर देता है “मेरे पिछले जन्म में मै भी एक गाँव का मुखिया था। जहाँ तक मुझे स्मरण है मैंने सभी को समान-रूप से देखा, सभी से सभ्य तरीके से व्यवहार किया और सभी गांववालों का पूर्ण ध्यान रखा। फिर भी मैंने इस तुच्छ योनी में अगला जन्म पाया। मुझसे कोई अन्याय/ अपराध बना तों होगा यद्यपि वह अनजाने ही हुआ हो। या मेरे सहायको से कोई अपराध हुआ होगा। जिसके कारण मैं इस परिस्थिति में हूँ”I अत: हम यह समझ सकते है कि किसी गाँव कि मुखिया होना भी कठीन कार्य है और इससे बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह स्मरण रखना है कि किसी भी देश के राजा को उसके प्रजा के पापों के लिये दण्ड भोगना पड़ता है। ऐसे ही तत्व गाँव के मुखिया होने पर भी समझा जा सकता है। गलत तरिके से धन कमाने से बचना चाहिये।
  • बच्चों को मूलभूत शिक्षा देने में धन कमाना भी बाधा है। हमें शिक्षा से धन कमाने पर ध्यान केन्द्रीत नहीं करना चाहिये – अगर शिष्य स्व-इच्छा से गुरु दक्षीणा अपने गुरु को देता है तो उसे खुशी से स्वीकार कर सकते है और शिक्षक भी जितना दिया गया है उसमें संतुष्ट होना चाहिये।
  • अपने पांडित्य/ ज्ञान की बढाई कर धन कमाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह कहा गया है कि “विद्या ददाति विनय:” – ज्ञान से विनम्रता आती है। जब कोई ज्ञानी हो तो उसे अपने ज्ञान कि बढाई धन कमाने के लिये नहीं करनी चाहिये। अपितु वे ज्ञान से अधिक विनम्र होंगे और निस्वार्थ शिक्षा और व्यवहारिक उदाहरण से दूसरों को भी सिखायेंगे।
  • दूसरों कि बढाई कर के धन कमाना बाधा है। सहस्रगीति के पाधिगम “चोन्नाल विरोधं”, के पहिले पाशुर में श्रीशठकोप स्वामीजी कहते है “एन नाविलिंकवि यान् ओरुवर्क्कुम कोडुक्किलेन्” – मैं अपनी प्रिय कविता भगवान को छोड़ अन्य किसी को भी नहीं दूँगा। श्रीशठकोप स्वामीजी आगे कवियों को यह परामर्श भी देते है कि धनी लोगों कि प्रशंसा कर धन मत कमाओं, जिस के फलस्वरूप नीचे गिर जाओ। अनुवादक टिप्पणी: पुराने जमाने में कवि जन बहुत गरीब होते थे और वे राजा या कोई अमीर व्यक्ति के पास जाकर उनकी कविता द्वारा स्तुति करते थे। खुश होकर अपनी बढाई सुनकर राजा/ अमीर व्यक्ति उन्हें तोफे देते थे। आजकल के जमाने में भी कई जन धनी लोगों कि बिना वजह गुण गान कर उनसे धन प्राप्त करते है और इस संसार से पूरी तरह बन्ध जाते है। इस तरह के व्यवहार की हमारे आल्वारों और आचार्यों से निन्दा कि है क्योंकि यह स्वभाव भगवान के दासों के स्वभाव से बिल्कुल विपरीत है।
  • दूसरों का धन/संपत्ति चुराकर धन कमाना बाधा है।
  • दूसरों को धोखा देकर, छल-कपट से धन कमाना बाधा है।
  • जो यात्रा पर है उनका धन चुराना भी बाधा है।
  • दूसरों को अप-शब्द बोलकर धन कमाना बाधा है। श्रीगोदम्बाजी तिरुपावै के दूसरे पाशुर में कहती है “तीक्कुरलैच्चन्रोदोम” जिसका अर्थ है “हम किसी भी कीमत पर दूसरों को अप शब्द नहीं बोलेंगे”। अनुवादक टिप्पणी: पेरियवाच्चान पिल्लै और अळगिय मणवाल पेरुमाल नायनार अपने व्याख्यान में माता सीता कि महिमा को दर्शाते है जब वे अशोक वन में थी, राक्षसीयों द्वारा कष्ट देने पर भी उन्होंने भगवान राम को एक शब्द नहीं कहा। आय जनयाचार्य बड़ी सुन्दरता से दर्शाते कि हमें श्रीवैष्णवों कि गलतीयों को अपने मन में भी नहीं लाना चाहिये क्योंकि हृदय में अन्तरयामी भगवान विराजमान होते है – हृदय में लेने से भगवान को पता चल जायेगा – इसलिये दूसरों कि भी गलतियां लाने से बचना चाहिये।
  • दूसरों को यह अहसास दिलाना कि हम बहुत महान है और उन्हें हमारी अधीन होकर रहना है और उनसे धन आदि कमाना भी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: कुछ लोग अपनी पहचान बड़े लोगों से है उसकी ढींगे मारते है और दूसरों को यह विश्वास दिलाते है कि वह बहुत ताकतवर है। जब लोग उन पर विश्वास करते है तो सांसारिक सुख के लिये वें उन्हें धन आदि देना प्रारम्भ कर देते है। ऐसे स्वभाव कि यहाँ निन्दा की गयी है।
  • पुराण पढ़कर और पुराणों पर प्रवचन कर कमाना बाधा है। पुराण पढ़कर प्रवचन देना गलत नहीं है परन्तु उससे धन कमाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे पहले समझाया गया है जो अपनी खुशी से देता है उसे लेना गलत नहीं है।
  • ग्रन्थों को चुराकर धन कमाना बाधा है। पुराने जमाने में साहित्य को ताड़ के पत्तों पर लिखा जाता था। वह सभी हाथ से लिखते थे जो वे बहुत कष्ट लेकर लिखे है। वह अनमोल धन है। उसे चुरा कर बेचना बहुत बड़ा पाप है। अनुवादक टिप्पणी: आज के दिनों कि परिस्थिती में हम यह देख सकते है कि लोग दूसरे के काम को चुराते है, प्रकाशित करते है और धन कमाते है और मूल लेखक को उसके हक का कुछ भी नहीं देते है।
  • कान के बाली को उठाकर धन कमाना बाधा है। इसका अर्थ स्पष्ट नहीं है।
  • उच्च परिवार/ जाति में जन्म लेने के लिये किसी कि प्रशंसा कर धन कमाना बाधा है। कुलाधिकम – अभिजात्यम – उच्च परिवार में जन्म लेना। हम यह देख सकते है कुछ जन लोगों से कहते है कि “यह व्यक्ति का जन्म उच्च परिवार में हुआ है, आप इनका सन्मान/पूजा करें और इन्हें धन दे” और फिर ऐसा धन ग्रहण करते है। ऐसे व्यवहार कि निन्दा होती है। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीकुरेश स्वामीजी कि महिमा को स्मरण कर सकते है। – उनकी “मुक्कूरुम्बु अरुत्तवर” कहकर स्थिति कि गयी है – वह जो पूर्ण रूप से तीनों दोषों से मुक्त है यानि यह सोचना कि मैंने बड़े परिवार में जन्म लिया है, मैं बहुत धनी हूँ, मैं बहुत ज्ञानी हूँ – यद्यपि श्रीकुरेश स्वामीजी बड़े परिवार में जन्म लिये, धनी थे और शास्त्र के बहुत बड़े ज्ञानी थे। उन्होंने कभी स्वयं अपनी बढाई नहीं कि – श्रीवैष्णवों का यही सच्चा स्वभाव है।
  • स्वयं के परम्परागत स्वभाव कि बढाई करना कि मै इन सब का पालन करता हूँ और धन कमाना बाधा है।
  • सब को यह विश्वास दिलाना कि “अहं ब्रम्हा” और उससे कमाना। “अहं ब्रम्हा” अद्वैत तत्व है। अद्वैतों (कुदृष्ठी – जिसकी आँखों कि रोशनी खराब हो) ने इसका अर्थ इस तरह निकाला है कि जीवात्मा और ब्रम्हा समान है। यह तत्व श्रीरामानुज दर्शन से बिल्कुल विपरीत है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि “मैं महान हूँ” और ऐसे शिक्षा से धन कमाता हूँ। ऐसे कार्य कि भी यहाँ निन्दा की गयी है।
  • शास्त्र आदि में अपने ज्ञान कि बढाई करना बाधा है। हमें अपने स्वयं के ज्ञान के प्रचार में कभी नहीं लगना चाहिये और उससे धन नहीं कमाना चाहिये।
  • अपनी बहादुरी कि बढाई कर धन कमाना बाधा है। आज कल हम देखते है चोर आदि यह काम करते है।
  • जादु आदि दिखाकर धन कमाना बाधा है।
  • अज्ञान जनों को अपनी ओर आकर्षित कर धन कमाना बाधा है। मन्त्र, काला टीका, सम्मोहित करना आदि से दूसरों से धन लुटा जाता है। ऐसे कार्य निन्दनिय है।
  • वैद्य होकर धन कमाना बाधा है। चिकित्सा संबंधी व्यवसाय में दूसरों कि सहायता करना चाहिये नाकि धन कमाना।
  • धन का खजाना दिखाने का वचन देकर धन कमाना बाधा है।
  • निम्न जनों (सांसारी – वह जो सांसारिक खुशी कि ओर लगे हुए है) के लिये काम कर धन कमाना बाधा है।
  • कीमियागर बनकर धन कमाना। यह एक रसायन विद्या है जिसमें लोहे, ताम्बे आदि को सोने में परिवर्तित करते है। यह आज के जमाने में करना सम्भव नहीं है। परन्तु दूसरों को यह भरोसा देना कि यह किया जा सकता है और उन्हें धोखा देना बाधा है।
  • राजा कि बढाई कर धन कमाना बाधा है। इसे अधीक समझाने कि आवश्यकता नहीं है। यह आज कल सामान्य है।
  • सांसारिक समाचार आदि दिखाकर धन कमाना बाधा है। कुछ लोग केवल दूसरों कि गप्पे लगाकर जीते है – ऐसा व्यवहार निन्दनिय है।
  • जानवरों के काटने से जहर निकालने में निपुण होकर उससे धन कमाना बाधा है। साँप, बिच्छु आदि काटने से मनुष्य के शरीर में जहर फैलता है। कुछ दवा और मन्त्र द्वारा इसको ठीक किया जा सकता है। इसे दूसरों कि मदद के उद्देश से करना चाहिये नाकि व्यापार करना चाहिये।
  • भगवद विषय सिखाकर धन कमाना। यद्यपि श्रीसहस्रगीति और उसके व्याख्या दोनों को मिलाकर भगवद विषय कहते है, वह भगवान के विषयों में एक सामान्य शब्द है। उसे कोई सांसारिक लाभ के लिये नहीं दूसरों के उद्धार के लिये कहना चाहिये।
  • किसी की भगवान के प्रति श्रद्धा की बढाई करना बाधा है। हमें भगवान के प्रति श्रद्धा कोई लाभ हेतु नहीं करना चाहिये। उसका प्रचार नहीं करना चाहिये।
  • दिव्य प्रबन्ध का अनुसंधान कर धन कमाना बाधा है। किसी को भी दिव्य प्रबन्ध गाकर सांसारिक लाभ नहीं पाना चाहिये।
  • अपनी या दूसरों कि स्तुति कर धन कमाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आल्वार इस तरह कि स्तुति कर धन कमाने कि कड़ी निन्दा करते थे। उन्होंने पक्की तरह यह स्थापित किया कि हमारी जीभ (बोली) भगवान और भागवतों कि स्तुति करने हेतु है और उसे कोई दूसरे कार्य हेतु उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • बलिदान करके कमाई से अर्जित करना एक बाधा है। हमेशा यह देखा जाता है की जब धन का प्रस्ताव आता है तब कुछ लोग मौखिक रूप से “ना” बोलते है परंतु उनके हाथ उसे स्वीकार करने हेतु पूरी तरह खुले रहते है, ऐसे बर्ताव की यहा निंदा की गयी है। दूसरों के प्रति विश्वास / दयालु होने का दिखावा करना बाधा है।
  • अपनी असहाय परिस्थिती दिखाकर धन कमाना बाधा है।मेरा कोई और रक्षक नहीं है यह बताकर धन कमाना बाधा है।
  • भगवान / आचार्य के कैंकर्य के नाम पर धन कमाना और इस तरह के पैसे को निजी परिस्थिती के लिये उपयोग करना बाधा है।
  • सन्यासी होने का दिखावा कर धन कमाना बाधा है।
  • भगवान के लिये पुष्प वाटिका आदि है ऐसा बताकर धन कमाना बाधा है।
  • भगवान को पुष्प हार अर्पण करने का दिखावा कर धन कमाना बाधा है।
  • तिरुपति जैसे दिव्य देशों कि सहायता करता हूँ ऐसा बहाना कर धन कमाना बाधा है। आज कल यह सामान्यत: देखा जा सकता है दिव्य देशों के कैंकर्य के नाम पर धन जमा करते है। इसकी यहाँ निन्दा कि गयी है।
  • उत्सवों के समय श्रीवैष्णवों के लिये रहने, भोजन आदि कि व्यवस्था के नाम पर धन कमाना बाधा है।
  • उत्सवों में विशेष पूजा आदि करवाने का वादा करना बाधा है। सामान्यत: यह देखा जाता है कि कुछ पाशुर जैसे “पोलिग पोलिग” (सहस्रगीति), “उलगमुंड पेरुवाया’” (सहस्रगीति), “कंगुलुम पगलुम” (सहस्रगीति), “नारु नरुम पोळिल” (नाचियार तिरुमौली), आदि गाया जाता है, तब भगवान को विशेष भोग लगाया जाता है। यह भी देखा जाता है कि जब स्थल पाशुर (जहाँ उत्सव हो रहा है उस विशेष दिव्य देश से संबन्धित पाशुर) विशेष भोग चढ़ाया जाता है। इस परिस्थिती का कोई लाभ लेकर धन नहीं कमाना चाहिये।
  • दिव्य प्रबन्ध के शातुमोराई कर धन कमाना बाधा है।
  • तिरुवद्यनम करने का वादा कर धन कमाना बाधा है। तिरुवद्यनम यानि दोनों उभय वेद पारायण (संस्कृत वेद और द्राविड वेदों का उच्चारण करना) और पितृ कैंकर्य (श्राद्ध)।
  • भगवान का तिरुवाराधन कर धन कमाना बाधा है। आजकल स्वयं के तिरुमाली के भगवान के तिरुवाराधन करने हेतु लोग दूसरों को नियुक्त करते है। यह सही व्यवहार नहीं है। हमें अपने तिरुमाली में स्वयं ही तिरुवाराधन करना चाहिये। जैसे हम अपना संध्यावंदन स्वयं करते है वैसे ही भगवान कि तिरुवाराधन हमें हीं करनी चाहिये – इससे कोई बच नहीं सकता है।
  • खेतों में शारीरिक मेहनत कर धन कमाना बाधा है। हमारे वर्ण और आश्रम के अनुसार हमारे लिये जो सही है वों ही करना चाहिये।

इस विषय से प्रारम्भ कर एक छोटी सी चर्चा मुष्टि कूडै पर हुई। क्योंकि अधीक विषय कई समय से चलन में नहीं है इसीलिए कुछ विषय हमने बड़े ही विस्तार से चर्चा नहीं किये है। मैं श्री व्ही॰व्ही॰रामानुजम स्वामी अपने समझ के अनुसार लिख रहा हूँ। इस समझ में कुछ कमीयाँ भी हो सकती है। चर्चा में कई जगह “मुष्टि”, “मुष्टि पुगुरुगै”, “मुष्टि कूडै”, “मौष्टिका व्यावृत्ति” आदि का उपयोग हुआ है। मुष्टी यानी सामान्यत: मुठ्ठि – मुख्यत: यह हाथ भर चावल पर केन्द्रीत है। हम श्रीवेदान्तचार्य स्वामीजी कि श्रीसूक्ति को फिर से पढ़ सकते है “यो सौदयालु: पूरादाना मुष्टिमुचे कुचेलमुनये धत्तेस्म”– अपने स्वाभाविक कृपा से भगवान कुछ समय पहिले ही कुचेला के एक मुट्ठी टूटे हुए चावल के बदले में कुचेला को बहुत धन प्रदान किये है। यह दान माँगने का पहलू ब्राम्ह्णों के वर्ण धर्म में है। सुबह अपने नित्य अनुष्ठान के पश्चात उन्हें कुछ चुने हुए घरों में जाकर भगवान का नाम लेकर भिक्षा “भवाती भिक्षाम देही” यह कहकर मांगना है। थोड़ा चावल माँगकर उन्हें अपना जीवन व्यतित करना है। महाभारत में जब पाण्डव अज्ञात में ब्राम्ह्ण वेष धारण किये तो वे दान स्वीकार कर के ही रहते थे। श्रीकुरेश स्वामीजी जो बहुत धनवान शासक थे अपना सारा धन दान कर श्रीरंगम में आकार श्रीरामानुज स्वामीजी के शरण आ गये और भीक्षा माँगकर अपना जीवन व्यतित करते थे। एक दिन बारीश के कारण वह भिक्षा ग्रहण करने नहीं जा सके। उस समय आण्डाल (उनकी धर्मपत्नी) को अपने पति को भूखा देखकर बहुत दुख हुआ और उन्होने श्रीरंगनाथ भगवान से प्रार्थना की। श्रीरंगनाथ भगवान उसी समय अपना प्रसाद भेजे जिसकी कृपा से श्रीकुरेश स्वामीजी और आण्डाल को दिव्य पुत्र हुए जिन्हें हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और वेदव्यास भट्टर स्वामीजी के नाम से जानते है। भिक्षा को यहाँ “मुष्टी” कहते है। भिक्षा पात्र को “मुष्टी कूडै” कहते है। प्रतिदिन सभी को भिक्षा मांगकर दान स्वीकार कर जीना चाहिये। उस दान को भगवान के तिरुवाराधन के लिये, श्रीवैष्णवों के सत्कार आदि के लिये उपयोग मे लाना चाहिये और अन्त में प्रसाद स्वीकार करना चाहिये। ब्राम्हणों को कभी भी भविष्य के लिये धन एकत्रीत नहीं करना चाहिये। पुराने जमाने में ऐसे बहुतसी पाबंदीया थी और उसे बड़ी कठोरता से पालन किया जाता था।

  • श्री विष्णुचित्त स्वामीजी पेरियाल्वार तिरुमोली में कहते है “पिच्चै पुक्कागिलुम एम्पिरान् तिरुनाममे नच्चुमिन्” – अगर आप को भिक्षा भी मांगनी पड़ी तो भी आप मेरे प्रिय भगवान श्रीमन्नारायण का नाम प्रेम से स्मरण करें – परन्तु कभी भी भगवान का नाम चिल्लाकर लेना और धन कमाना बाधा है। यहाँ हम समझ सकते है की “धन अर्जन के लिए जबरदस्ती जोर देकर भीक मांगना” और इससे बचना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह पाशुर “कासुम् करैयुदै” पाधिगम का एक भाग है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी व्याख्या में समझाते है कि आल्वार सभी को यह प्रेरणा देते थे कि सभी अपने बच्चों का नाम भगवान के नाम पर रखे और आगे यह भी कहते है कि हमें अपनी जीविका भिक्षा मांगकर करना चाहिये नाकि कोई सांसारिक व्यर्थ नाम रखकर। अपने बच्चों का नाम भगवान के नाम पर रखे तो हम उनको पुकार कर निरन्तर भगवान का स्मरण कर सकते है। बच्चों का नाम भगवान के नाम पर रखे तो हम उनकी माता को नरकीय स्थानों पर जाने से रोक सकते है। विशेषकर ३रे पाशुर में श्रीवरवरमुनी स्वामीजी श्रीतिरुवैमोलि पिल्लै द्वारा बताई गयी श्रीनालूराचान पिल्लै से सम्बंधित एक घटना का वर्णन करते है। एक बार एक ब्राम्हण कि पत्नी एक बच्चे को जन्म देती है। उस ब्राम्हण को उसका नाम किसी देवता पर रखने कि इच्छा थी जिससे उसकी समृद्धि हो। कोई कहता है वैश्रवणन (कुबेर का नाम जो धन का देवता है)। वहाँ एक आस्तिक था वो कहता है “ऐसा कोई अर्थ रहित नाम मत रखिये। इसका नाम श्रीमन्नारायण के नाम पर रखे – उसको अगर उसकी जीविका के लिये भीख भी मांगना पड़े तो भी अच्छा है”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि जब उस बच्चे का नाम भगवान के नाम पर होगा तो भगवान स्वयं उसकी रक्षा करेंगे ताकि उस बच्चे को भीख भी न मांगना पड़े – हमें भगवान पर पूर्ण विश्वास होना चाहिये कि वो हमारी रक्षा करेंगे। इस भाग मे भिक्षा मांगने पर अधीक चर्चा कि गयी है (जो ब्राम्हणों के जीविका के लिये जरूरी है), इसमे हम यह भी समझ सकते है कि वह दान जो हमें धन/संपत्ति दूसरों से दान में प्राप्त हुई है।
  • श्रीवैष्णव होकर दान के लिये भिक्षा मांगने से घबराना बाधा है। अपने वर्णाश्रम धर्म (ब्राम्हण/ ब्रम्हचारी/ सन्यासी) के अनुसार दान के लिये भिक्षा मांगना सही है। अनुवादक टिप्पणी: हम श्रीकुरेश स्वामीजी को स्मरण कर सकते है जिन्होंने दान हेतु भिक्षा मांगी। श्रीरामानुज स्वामीजी ने भी तब तक सन्यासी होकर स्वयं भिक्षा मांगी जब तक उन्हें जहर देकर मारने का प्रयास हुआ। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के आदेशानुसार किदाम्बी आचान को उनके लिये भिक्षा मांगने के लिये नियुक्त किया गया। पुराने जमाने में ब्रम्हचारी को गुरुकुल में भिक्षा मांगकर गुरु को देने कि प्रथा सामान्य थी।
  • पेट भरने के लिये भिक्षा मांगना और उससे धन कमाना बाधा है। उसे बुनियादी कार्य के लिये ही और कैंकर्य करने हेतु करना चाहिये।
  • भिक्षा अपने वर्णाश्रम के धर्म को समझते हुए मांगना चाहिये। यह समझ न होना बाधा है।
  •  भिक्षा यह समझ कर मांगना चाहिये कि हमारे पूर्वाचार्यों ने भी इसे किया है और यह हमारे शारीरिक सुविधा के लिये योग्य है। यह समझ न होना बाधा है।
  • जो दान में दिया है उससे संतुष्ट न होकर अपनी नाराजगी प्रगट करना बाधा है। हमें कुछ हीं स्थानों पर कुछ हीं समय पर मांगना और जो मिला है उससे संतुष्ट होना चाहिये।
  • दान में अधीक मिलने में अधीक संतुष्ट होना बाधा है। हमें यह सोचना चाहिये कि भगवान हम पर आज अधीक प्रसन्न होकर अधीक दिये है और हमें उसी दिन जरूरत जनों को दे देना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: भगवद गीता के २.१४ में भगवान कहते है “ मात्र स्पर्शस तु कौन्तेय सितोष्ण सुक धुक्क ध: आगमापायिनो नित्यास् तां तिथिक्षव भारत” – “हे कौंतेय (कुन्ती पुत्र अर्जुन) हमें गर्मी/सर्दी, खुशी/गम आदि जो इंद्रीयों से समझे जाते है उनसे घबराना नहीं चाहिये। हे भरत (भरत के वंशज) तुम्हें इस भेद-भाव को सहन करना सिखकर उससे ऊपर उठना चाहिये”। इसलिये तात्पुर्तिक खुशी या गम को कुछ समय सहन करना चाहिये।
  • पिछले बात की तरह हमें थोड़े से दान से भी संतुष्ट रहना चाहिये – हमें अधीक के लिये कभी भी लालच नहीं करनी चाहिये।
  • हमें भगवान का नाम ज़ोर से लेना चाहिये जैसे “गोविन्दा! गोविन्दा!” ताकि दान देनेवाला भगवान का नाम सुन सके। ऐसा न करना बाधा है।
  • भगवान का नाम शिष्टाचार के अनुसार लेना चाहिये और उसे उसी भावना से लेना चाहिये।
  • हमें यह नहीं सोचना चाहिये कि भगवान का नाम लेना दान लेने का एक जरिया है। यह हमारे आगमन का सूचक है इससे लोगों को दान देने के लिये मजबूर नहीं करना है।
  • उस घर से दान कि भिक्षा मांगना जहाँ अन्य देवी देवता कि पूजा होती हो बाधा है। हमें देवता कि पूजा करनेवालों से दान ग्रहण नहीं करना चाहिये।
  • हमें उस घर से दान नहीं लेना चाहिये जहाँ भगवद तिरुवाराधन को नीचा देखा जाता है।
  • उस घर से दान ग्रहण करना जहाँ शुक्रवार को पोछा लगाया जाता है बाधा है। प्रति दिन पोछा न लगाकर केवल केवल शुक्रवार को पोछा लगाने वाले निंदा के पात्र है। अनुवादक टिप्पणी: यह शास्त्र मत हो सकता है कि शुक्रवार को पोछा नहीं करना चाहिए।
  • उस घर से दान लेना जहाँ के लोग भगवान का नाम सुनने से संतुष्ट न हो। यह बाधा है।
  • भगवान/भागवतों का जहाँ अपमान हो उस घर से दान लेना बाधा है।
  • उस घर से दान लेना जहाँ घरवाले भिक्षा मांगना एक श्रीवैष्णव कार्य है यह नहीं समझते है और ऐसे श्रीवैष्णव का अपमान करना बाधा है। भिक्षा श्रीवैष्णव धर्मानुष्ठान है – इसे निम्न नहीं जानना चाहिये।
  • उस गाँव में जाना जो देवतान्तर को प्रिय हो या वहाँ के जन देवतान्तर कि पूजा को अधीक महत्त्व देते है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: ऐसे बहुत से गाँव है जो देवतान्तर के लिये विख्यात है – श्रीवैष्णवों को इससे बचना चाहिये।
  • उस गाँव में दान लेना जहाँ भगवान श्रीमन्नारायण का कोई मन्दिर न हो बाधा है।
  • उस घर से दान नहीं लेना जहाँ भगवद तिरुवाराधन नियमित रूप से नहीं होता है।
  • प्रपन्न होकर दिव्य प्रबन्ध का उच्चारण किसी विशेष उत्सव के दिन दान लेने जाते समय करना बाधा है। दिव्य प्रबन्ध प्रति दिन अर्थ के साथ उच्चारण याद करना चाहिये – इसे सिर्फ किसी विशेष दिन नहीं करना चाहिये।
  • जब भी किसी को समय मिले दिव्य प्रबन्ध को पाठ करना चाहिये और उसके अर्थ को स्मरण करना चाहिये। हमारा कीमती समय सांसारिक चर्चा में व्यर्थ हो रहा है। श्रीशठकोप स्वामीजी पेरिय तिरुवन्दादि में आश्चर्य करते है कि “कैसे लोग अपना समय भगवान और उनके विशेष गुणों को स्मरण किये बिना बिताते है?”
  • रहस्य मन्त्र/ग्रन्थों का सार्वजनीक स्थानों पर बात करना बाधा है। रहस्य यानी वह जो केवल आचार्य से हीं सुनना चाहिये और अनजाने मे उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये।
  • गलत संगत होना बाधा है। गलत संग यानी बुरे दीमाग वाला, मूर्ख, जो किसी का सच्चा स्वभाव को नहीं समझता आदि। उपनिषद घोषणा करता है कि “असन्नेव सा भवतिअसत ब्रह्मेधि वेदाचेत” – जो भगवान के होने को नहीं मानता वह असत्य के समान हीं है।
  • सांसारिक सुखो से अपनी आंखों को नहीं हटाना बाधा है। हमें भगवद/भागवत विषय पर केन्द्रीत होना चाहिये और सांसारिक विषयों से बचना चाहिये जैसे स्त्री, नेतागीरी आदि। श्रीभक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी अपने तिरुमालै में सांसरिक सुख कि ओर लगे हुओं कि कड़ी निन्दा करते है।
  • हमें सावधानी से कदम रखना चाहिये और अपने लक्ष्य कि ओर पूर्ण केन्द्रीत रहना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • दान मांगने जाते समय शान्त न रहना बाधा है।
  • आचार्य से अमुधु पड़ी कूङै (दान एकत्रित करने के लिए दिया गया बर्तन) को स्वीकार न कर उनकी सेवा न करना बाधा है।
  • ऐसी टोकरी खुशी से अपने सिर पर उठाना चाहिये और इसे किरीट समझना चाहिये। यह दान की टोकरी उठाना कोई छोटा काम नहीं है। ऐसा न करना बाधा है।
  • दान स्वीकार करने हेतु जाते समय हमें निरन्तर द्वय महा मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये। श्रीवैष्णवों के लिये निरन्तर द्वय मन्त्र का उच्चारण करना स्वाभाविक है। द्वय मन्त्र को अर्थानुसंधान कर स्मरण करना चाहिये। श्रीरंगनाथ भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीरंगम में रहकर द्वय मन्त्र को स्मरण करने कि आज्ञा किये है – “द्वयं अर्थानुसंधेन सह यावच्चरीर पादम अत्रैव श्रीरंगे सुकमास्व” – द्वय मन्त्र को उसके अर्थ सहित स्मरण कर अपना शेष जीवन श्रीरंगम में व्यतित करों।
  • जिनका पञ्च संस्कार न हुआ है उनसे दान स्वीकार करना बाधा है। पञ्च संस्कार वह क्रीया है जो एक व्यक्ति को श्रीवैष्णव सत सम्प्रदाय कि ओर अग्रेसर करता है। जब तक कोई इस प्रक्रीया से नहीं होता हम उनसे कुछ भी स्वीकार नहीं कर सकते है।
  • जो साँप के आकार कि बाली कानों में पहनता है उनसे दान स्वीकार करना बाधा है। सामान्यत: श्रीवैष्णव सादी कान कि बाली पहनते है या फिर भगवान के जो शंख और चक्र है उसकी।
  • जिनमें अहम और गर्व का भाव हो उनसे दान स्वीकार करना बाधा है। हमें अपने आप को दास समझना चाहिये।
  • जब भी दान स्वीकार करते है उसमें एक भाग आचार्य, एक श्रीवैष्णवों का और एक भाग भगवान के लिये स्वीकार करना चाहिये। केवल अपने जरूरत के लिये ग्रहण करना सही नहीं है।
  • जो भी दान संग्रह किया जाता है उसे पहिले आचार्य के पास लाकर और तत्पश्चात उनकी आज्ञा हो तो अपने घर ले जाना चाहिये।
  • दान (कच्ची वस्तु) जो भी संग्रह करते है उसे सभी को दिखाना नहीं चाहिये। उसे बन्द डब्बे में घर ले जाकर, पकाकर, भगवान को भोग लगाकर फिर प्रसाद रूप में पाना चाहिये।
  • सांसारिक जनों कि प्रशंसा कर दान संग्रह नहीं करना चाहिये।
  • कुछ कमाते समय श्रीवैष्णवों पर दबाव नहीं डालना चाहिये।
  • आचार्य के धन/संपत्ति को चुराकर कमाना बहुत बड़ा पाप है।
  • भगवान के धन/संपत्ति को चुराकर कमाना बाधा है। मन्दिर के धन, संपत्ति आदि को नहीं चुराना चाहिये और ऐसे कार्य को बहुत बड़ा पाप समझा जाता है।
  • उन जनों से भिक्षा माँगना जो भगवान कि संपत्ति/धन को हीं चुराते है बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भिन्न भिन्न प्रकार के अपचार के बारें में समझाते है – भगवद अपचार, भागवत अपचार और असह्य अपचार। वह भगवान के धन को चुराने को भगवद अपचार समझाते है। यह भी नहीं दूसरों को भगवान के धन को चुराने में मदद करना और उसे भिक्षा माँगकर स्वीकार करना भी भगवद अपचार है। इससे पूर्णत: बचना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: इस लम्बे विषय को समाप्त करने के लिये यह मुख्य है कि धन कमाते समय हमें सावधान रहना चाहिये। शास्त्र के दिखाये आदर्श को देखते हुए आज के पटकथा में जहाँ पूरी प्रणाली बिगड़ी है अभी हम बड़े कठीन परिस्थिती में है। शास्त्र विरोधी कमाया हुआ बहुत सारा धन अभी भी प्रचलन मे है। हमारे जरूरतों को कम करने हेतु यह ओर एक निर्देशन है। भगवान से निरन्तर प्रार्थना करता हूँ इस सांसारिक सोच और जीवन शैली से हमारी रक्षा करें।

अगले अंक में हम अन्य विषय में चर्चा करेंगे।

हिंदी अनुवाद- अडियेन केशव रामानुजदास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2014/04/virodhi-pariharangal-20.html

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