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श्री रामानुज वैभव

श्री:  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमदवरवरमुनये नमः  श्री वानाचल महामुनये नमः

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला में कहते हैं कि अपने सत सम्प्रदाय को स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान ने हीं रामानुज दर्शनम का नाम दिया हैं जिससे सभी जन इस नित्य सम्प्रदाय के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी के योगदान को स्मरण कर सकें। श्रीरामानुज स्वामीजी न हीं इस सम्प्रदाय के संस्थापक थे और न हीं एक मात्र आचार्य थे। परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी ने इस सम्प्रदाय के तत्त्वों को इतनी मजबूती प्रदान किये कि वह निरन्तर प्रचलित रहेगा और इसलिये उनका अधिक गुणानुवाद होता रहेगा। अगर प्रयत्न करें तो भगवान के गुणों को  सम्मिलित कर उनका वर्णन कर सकते है। परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी के गुण इतने असीमित हैं कि उन्हें सम्मिलित करना और उनके विषय में कहना बहुत कठिन कार्य हैं। परन्तु हमारे गुरु परम्परा के माध्यम से हमें श्रीरामानुज स्वामीजी के सम्बन्ध का सौभाग्य प्राप्त हुआ हैं और इसी बल के द्वारा हम धीरे धीरे श्रीरामानुज स्वामीजी के गुणों का अनुभव करके आनन्द प्राप्त कर रहे हैं।

जन्म और बाल्यवस्था

एक प्रसिद्ध श्लोक है, “अनंत: प्रथमम् रूपम लक्ष्मणाश्च थथा:। परम बलभद्रस्य तृत्ल्यस्तुकलौ कश्चिद भविष्यन्ती ॥” आदिशेष के हर युगों के सभी अवतारों का वर्णन किया गया हैं और उनके कलियुग के अवतार के विषय में भविष्यवाणी की गई हैं। “चरमोपाय निर्णय” में यह प्रमाणित किया गया हैं कि कलियुग में श्रीरामानुज स्वामीजी हीं श्रीआदिशेष के अवतार हैं।

श्रीरामानुज नूत्तन्दादि में, श्रीअमूधनार ने श्रीरामानुज स्वामीजी के जन्म को भगवान के जन्म से भी अधिक महत्त्व दिया है। वह श्लोक है “मण्मिशै योनिगल तोरूम पिरन्दु एङ्गल मादवने कण्णुर निर्किलुम काणगिल्ला उलगोर्गल एल्लाम अण्णल इरामानुशन वन्दु तोन्रिय अप्पोलुदे नण्णरु तलैक्कोण्डु नारणर्कायिनरे”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसे इस तरह समझाते हैं कि “हमारे स्वामी श्रीमन्नारायण इस संसार में कई रूप लेकर अवतार लिये परन्तु संसार के लोगों ने उन्हें स्वामी जैसे स्वीकार नहीं किया। परन्तु जैसे हीं श्रीरामानुज स्वामीजी ने इस संसार में अवतार लिया (जैसे श्रीभाष्य और आदि ग्रन्थ में समझाया गया है) संसार के लोगों ने सच्चे ज्ञान को समझा और भगवान के सच्चे दास हो गये”।

आर्ति प्रबन्ध में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के जन्म कि स्तुति इस तरह करते है “एनैप्पोल् पिळै सेय्वार् इव्वुलगिल् उण्डो, उनैप्पोल् पोरुक्क वल्लार् उण्डो अनैत्तुलगुम् वाळप् पिऱन्त एतिरास मामुनिवा एज़्हैक्कु इरन्गाय् इनि” जिसका अर्थ है “ऐसा कोई हैं जो मेरे जैसे गलती करता हो और आपके जैसा सहनशील  हो जो इन गलतियों को क्षमा कर सकता हो? हे हम दासों के स्वामी आप सब का उद्धार करने हेतु हीं जन्म लिये हैं! कृपया मेरी मदद करें”।

इससे हम समझ सकते हैं कि श्रीरामानुज स्वामीजी का अवतार सभी के दुख निवारणार्थ हुआ है और सभीका आध्यात्मिक  उद्धार करके सभी भगवान का अनंतकाल तक सेवा कर सके।

इनका जन्म श्री केशवाचार्यजी व कान्तीमती अम्माजी के पुत्र रूप में हुआ। इनके मामाजी श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी ने इनका नाम “इलैयाल्वार” रखा और श्रीवैष्णवमं में लाने के लिये इनका ताप संस्कार किया।

शुरुवाती दिनों में उन्होंने श्रीयादव प्रकाशाचार्यजी से वेदाध्ययन किया जो “भेद अभेद” (ब्रह्म व आत्मा दोनों एक समय में एक हीं है और अलग भी है) के सिद्धान्त के प्रवर्तक थे। यह प्रश्न आता सकता है – इन्होंने अलग सिद्धांतों कि शिक्षा इन आचार्य से क्यों ग्रहण किये? हमारे पूर्वाचार्य बताते हैं कि, इस सिद्धान्त को पूरी तरह समझकर इस में कमियों को सभी में उजागर कर सके और विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त कि स्थापना कर सके। श्रीपेरियवाचन पिल्लै अपने आचार्य श्रीकलिवैरिदास स्वामिजी के गुणगान करते हुए अपने व्याख्या पेरिया तिरुमोलि ५.8.७ में इस सिद्धान्त को अच्छी तरह समझाते है और “अन्तणं ओरुवन” (विशिष्ट ब्राह्मणा) के बारे में इसका विशेष उल्लेख किया गया हैं। वों कहते है “मुर्पड द्वयत्तैक् केटु, इतिहास पुराणन्गळैयुम् अतिगरित्तु, परपक्श प्रतिक्शेपत्तुक्कुडलाग न्यायमीमाम्सैकळुम् अतिगरित्तु, पोतुपोक्कुम् अरुळिचेयलिलेयाम्पडि पिळ्ळैयैप्पोले अतिगरिप्पिक्क वल्लवनैयिरे ओरुवन् एन्बतु” (जो पहले द्वय मन्त्र का श्रवण करता है और बाद में इतिहास और पुराण का अध्ययन करता है, न्याय और मीमांसा के अध्ययन से दूसरे सिद्धान्तों को तर्क वितर्क से विजय प्राप्त करता है और अपना सम्पूर्ण समय आल्वारों के दिव्य प्रबन्ध को अर्थ सहित सीखने व सिखाने मे व्यतीत करता है ऐसे  श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी को विशिष्ट विद्वान बताते हैं)। इससे हम समझ सकते हैं कि अपने सिद्धान्त को स्थापित करने के लिये पूर्व पक्षम (दूसरे विद्वानों के तर्क-वितर्क) सीखना कितना महत्त्वपूर्ण है।

श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीयादव प्रकाशाचार्य के यहाँ अध्ययन के समय, उनमें कुछ मत भेद हुए थे। श्रीरामानुज स्वामीजी भी अपनी तर्क शास्त्र का ज्ञान और उसे दूसरों को समझाने के कारण लोक प्रियता प्राप्त कर रहे थे। श्रीरामानुज स्वामीजी की उन्नति लोक प्रियता को सहन नहीं कर सके और श्रीयादव प्रकाशाचार्य के शिष्यों ने उन्हें काशी यात्रा के दौरान उनकी हत्या कि योजना बनाई। परन्तु श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी (जो भविष्य में एम्बार नाम से प्रसिद्ध हुए) के समय पर सलाह के कारण श्रीरामानुज स्वामीजी उनके इस षडयंत्र से बच गये और श्रीवरदराज भगवान और माता पेरुन्देवी अम्माजी जो शिकारी रूप में उस जंगल में आये। उनकी सहायता से बच कर काञ्चीपुरम आजाते है।

पञ्च संस्कारित होना

इस समय में श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी से काञ्चीपुरम में मिलते है जो श्रीवरदराज भगवान के विश्वास पात्र थे। श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी जो पूविरुंतवल्ली के निवासी थे श्रीवरदराज भगवान को निरन्तर पंखा सेवा किया करते थे। वह श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के प्रिय शिष्य थे। श्रीवरदराज भगवान को श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी से विशेष लगाव था और वें निरन्तर श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी से वार्तालाप करते रहते थे। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी के कहे अनुसार श्रीवरदराज भगवान के यहाँ नित्य समीप के एक कुंवे से प्रति दिन जल लाकर जल सेवा करना प्रारम्भ किया। इस बीच श्रीरामानुज स्वामीजी ने रक्षकाम्बाल से विवाह कर काञ्चीपुरम में रह रहे थे। उनके मन में कोई शंखा उत्पन्न होती तो वें श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी को कहते कि श्रीवरदराज भगवान से इन शंखाओं को दूर कराये। श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी श्रीवरदराज भगवान से श्रीरामानुज स्वामीजी के मन कि स्थिति को दर्शाते है और श्रीवरदराज भगवान श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी के द्वारा श्रीरामानुज स्वामीजी को ६ उपदेश देते है। वों हैं:

  • मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ।
  • जीवात्मा और परमात्मा भिन्न है, एक नहीं है।
  • मुझे प्राप्त करने का एक मात्र उपाय शरणागति है।
  • मुझे शरणागति करनेवाले को अपना अन्तिम क्षणों में मुझे स्मरण करने कि आवश्यकता नहीं है (मैं उनका स्मरण करता हूँ )।
  • इस जीवन के अन्त में शरणागत मोक्ष प्राप्त करेंगे।
  • श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को अपने आचार्य रूप में स्वीकार करें।

यह घटना श्रीरामानुज स्वामीजी के जीवन में  निर्णायक क्षण था  ।

श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीवरदराज भगवान के ६ उपदेशों को समाझाते है और श्रीरामानुज स्वामीजी से पूंछते हैं कि क्या यह उपदेश अपने विचारों से मिलते हैं या नहीं। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी को साष्टांग प्रणाम कर अपने विचारों से सहमती कि पुष्टी करते हैं। श्रीवरदराज भगवान और श्रीरामानुज स्वामीजी के अलौकिक विचारों के  सामंजस को देखकर श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी को बहुत आश्चर्य हुआ। श्रीवरदराज भगवान के उपदेशों को सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के दर्शन हेतु श्रीरंगम कि ओर प्रस्थान करते हैं।

श्रीमहापूर्ण स्वामीजी श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी जो श्रीनाथमुनि स्वामीजी के पौत्र थे, उन्के मुख्य शिष्यों में से एक थे। पहले श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी जो सम्प्रदाय के अग्रणी संत थे अपने काञ्चीपुरम यात्रा के समय श्रीरामानुज स्वामीजी पर अपना आर्शिवाद प्रदान कर कहा कि वे सम्प्रदाय के महान गुरु बने। श्रीरामानुज स्वामीजी ने भी श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के विषय में बहुत सुना था और उनके शिष्य बनना चाहते थे। परन्तु जब वें श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी को मिलने हेतु श्रीरंगम गये थे और जब वें कावेरी नदी के तट पर पहूंचे तब श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी अपनी ३ इच्छा को छोड़ कर परमपद के लिये प्रस्थान कर दिये। ३ इच्छाएं हैं; १) श्रीव्यास और श्रीपराशर ऋषियों के प्रति कृतज्ञता दिखाये, २) श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति कृतज्ञता दिखाये ३) श्रीभाष्य ग्रन्थ पर व्याख्या करना। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी कि ३ अंगुलियों को मुड़ी हुई देख श्रीरामानुज स्वामीजी ने उनकी इच्छाओं को पूर्ण करने का संकल्प करने के तुरन्त बाद, स्वयं से सीधी हो गई। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी से न मिलने के कारण निराश होकर काञ्चीपुरम अपना कैंकर्य को आगे बढ़ाने लौट आते है। इस बीच श्रीरंगम में श्रीवैष्णव जन श्रीमहापूर्ण स्वामीजी से विणति करते है कि श्रीरामानुज स्वामीजी को इस सम्प्रदाय में लाये और उन्हें शिक्षा प्रदान कर सम्प्रदाय का अगला आचार्य बनाये। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को अपना शिष्य बनाने हेतु काञ्चीपुरम कि ओर प्रस्थान किया।

काञ्चीपुरम के निकट मधुरांतकम नामक एक ग्राम में दोनों मिलते है। जब श्रीरामानुज स्वामीजी वहाँ एरिकाथ्था भगवान के मन्दिर में आते हैं तो श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को परिवार सहित देखकर अपना साष्टांग दण्डवत प्रणाम कर श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार करने कि विणति करते हैं। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी कहते है कि  सभी काञ्चीपुरम जाकर वहाँ उनको दीक्षा प्रदान करेंगे। परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी कहते है कि संसार में इतनी अस्थिरता है कि उन्होंने एक मौका श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी का शिष्य होने का खो दिया है और अब नहीं चाहते हैं कि ऐसा मौका फिर से खोये। इसलिये श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीमहापूर्ण स्वामीजी से आग्रह करते हैं कि आप तुरन्त मुझे पञ्च संस्कारित करें जिसे श्रीमहापूर्ण स्वामीजी भी तुरन्त मान जाते हैं। इस तरह श्रीरामानुज स्वामीजी स्वयं यह सिद्ध किया कि शास्त्र में दिखाये उचित मार्ग अनुसार आचार्य की शरण में आने का महत्त्व दर्शाया है। इसके बाद सभी काञ्चीपुरम आते है और श्रीमहापूर्ण स्वामीजी कुछ समय वहाँ बिताने का निश्चय करते हैं।

श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी श्रीमहापूर्ण स्वामीजी का काञ्चीपुरम में स्वागत करते हैं और वें श्रीवरदराज भगवान का मंगलानुशासन करते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को अपने तिरुमाली में रहने को कहते है। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी अपने परिवार सहित ६ महिने तक रहकर उन्हें दिव्य प्रबन्ध, रहस्य ग्रन्थ आदि का अध्ययन करवाते हैं।

सन्यासाश्रम ग्रहण करना

एक बार जब एक श्रीवैष्णव श्रीरामानुज स्वामीजी के तिरुमाली में पधार कर कहते हैं वे भूके हैं तो श्रीरामानुज स्वामीजी अपनी पत्नी से उन्हें कुछ प्रसाद देने को कहते हैं परन्तु उनकी पत्नी कहती हैं कुछ भी शेष नहीं हैं। वह श्रीवैष्णव निराश होकर लौट जाते हैं और जब श्रीरामानुज स्वामीजी  रसोई घर में जाकर देखते हैं तो बहुत प्रसाद शेष होता है। उन्हें बहुत क्रोध आया और यह क्रोध उन्होंने अपनी पत्नी पर दिखाया। पहिले भी श्रीरक्षकाम्बा ने श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी के प्रति से दुर्व्यवहार कर चुकी होति हैं। जब श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी को अपनी तिरुमाली में प्रसाद के लिये बुलाते हैं जिससे शेष प्रसाद को वह ग्रहण कर सके, उस समय उनकी पत्नी श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी को प्रसाद तो पवाती हैं, परन्तु बिना श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी के महानता और श्रीरामानुज स्वामीजी कि इच्छा को जाने शेष प्रसाद को बाहर फेंख देती हैं और जहाँ श्रीकाञ्चीपूर्ण स्वामीजी प्रसाद पाते हैं उसे धो कर पवित्र करती हैं। अन्त में एक बार कूंवे से जल निकालते समय श्रीरक्षकाम्बा और श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के मध्य झगड़ा हो जाता हैं। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी बुरा मानकर अपने परिवार सहित बिना श्रीरामानुज स्वामीजी को कहे श्रीरंगम छोड़ चले जाते है। श्रीरामानुज स्वामीजी को बाद में पता चलता हैं और बहुत दुःख होता हैं।

श्रीरामानुज स्वामीजी भगवद कैंकर्य करने का अपने लक्ष्य में दृढ़ हो जाते हैं और सन्यासाश्रम में प्रवेश करने का निश्चय कर लेते हैं। काञ्चीपुरम में श्रीवरदराज भगवान के मन्दिर में अनन्त सरस तालाब में  पवित्र स्नान कर श्रीवरदराज भगवान के पास जाकर उन्हें अपना आचार्य मानकर और उनसे बिनती करते हैं कि उन्हें त्रीदण्ड, काषाय वस्त्र, आदि प्रदान करें जो एक सन्यासी के लिये आवश्यक हैं। श्रीवरदराज भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी के इच्छा को स्वीकृत देकर उन्हें सन्यासाश्रम प्रदान कर “रामानुज मुनि” नाम देकर एक मठ भी देते हैं। यह सुनकर श्रीदाशरथी स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी तुरन्त काञ्चीपुरम आकर और उनसे पञ्च संस्कार ग्रहण कर निरन्तर उनकी सेवा करना प्रारम्भ करते है। श्रीयादवप्रकाशाचार्यजी भी उनके माँ के समझाने पर श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्य बन गये। इस प्रकार श्रीरामानुज स्वामीजी रामानुज मुनि बन गये और सन्यास जीवन बड़े उत्तम से बिताने लगे।

श्रीरामानुज स्वामीजी यतिराज (यतियों के राजा) के नाम से प्रसिद्ध हो गये, उदारता से श्रीयादवप्रकाशाचार्यजी को शिष्य रूप में स्वीकार किया, उन्हें सन्यासाश्रम में प्रवेश कराया और गोविन्द जीयर नाम प्रदान किया। वों श्रीयादवप्रकाशाचार्यजी को एक ग्रंथ भी लिखने के लिए कहते है जिसका नाम “यति धर्म समुच्चयम” जिसे श्रीवैष्णव सन्यासीयों के आचरण के लिये प्रमाण माना जाता हैं। यह श्रीरामानुज स्वामीजी के उदारता को दर्शाता है जिन्होंने श्रीयादवप्रकाशाचार्यजी को स्वीकार किया (जिसने उन्हें मारने का प्रयास किया था) और उन्हें एक विशेष कैंकर्य में लगाते हैं।

काञ्चीपुरम में रहकर शास्त्र के जरूरी भाग को श्रीदाशरथी स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी को सिखाते हैं।

श्रीरंगम में आना

श्रीरंगनाथ भगवान की इच्छा थी कि श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीरंगम लाया जाये ताकि वें सम्प्रदाय की सेवा कर सके और उसके वैभव को ऊँचाई तक पहुँचा सके। श्रीरंगनाथ भगवान कांचीपुरम के श्रीवरदराज भगवान से श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीरंगम भिजवाने की विणति करते हैं। परन्तु श्रीवरदराज भगवान श्रीरंगनाथ भगवान कि विणति पर ध्यान नहीं देते हैं। यह देख श्रीरंगनाथ भगवान एक योजना बनाते हैं जिसके अंतर्गत वे श्री तिरुवरंगाचार्य अरैयर को कांचीपुरम भेज श्रीवरदराज भगवान के सन्निधि में दिव्य गीत गाने के लिये भेजते हैं ताकि श्रीवरदराज भगवान प्रसन्न हो और वे बहुमान में श्रीरामानुज स्वामीजी को प्राप्त करें। श्री तिरुवरंगाचार्य अरैयर कांचीपुरम आकर श्रीकांचीपूर्ण स्वामीजी के द्वारा  श्रीवरदराज भगवान के सन्निधी में दिव्य गीत सुनाते हैं जिससे भगवान उनके गानों से मुग्ध हो जाते हैं। भगवान कहते हैं “आप जो भी मँगोगे वों आपको मिलेगा”। उसी क्षण श्री तिरुवरंगाचार्य अरैयर भगवान को श्रीरामानुज स्वामीजी को उनके साथ श्रीरंगम भेजने को कहते है। यह सुनकर भगवान बहुत उदास होते हैं क्योंकि उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी का साथ छोड़ना पड़ रहा हैं। लेकिन श्रीवरदराज भगवान अपना वचन निभाने के लिये श्रीयतिराज को श्री तिरुवरंगाचार्य अरैयर के साथ श्रीरंगम भेज देते हैं।

श्रीरंगम पहुँचने पर श्रीयतिराज और अरैयर स्वामीजी का भव्य स्वागत होता है। वों दोनों श्रीरंगनाथ भगवान के सन्निधि में जाते हैं वहाँ पर भगवान बहुत प्रसन्नता के साथ उनका स्वागत करते है। भगवान ने श्रीयतिराज को “उडयवर” (अध्यात्मिक और सांसारिक संसार के स्वामी) की पदवी तथा उनके लिये रहने के लिये मठ की व्यवस्था करते है और आज्ञा देते हैं कि वें मन्दिर कि गति विधियों में पूर्ण सुधार लावें। वों श्रीरामानुज स्वामीजी के सभी सम्बन्धीयों को मोक्ष देने का आश्वासन देते हैं। उड़यवर इससे अपने आप को श्रीमहापूर्ण स्वामीजी का बहुत बड़ा ऋणी मानते हैं और उन्हें धन्यवाद देते है। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी भी बहुत आनंदित व खुश महसूस करते है कि अपने सम्प्रदाय के अच्छे दिन आयेंगे। इसके बाद ‘उड़यवर’ मन्दिर की गतिविधियों में दक्षतापूर्वक सुधार का कार्य प्रारम्भ करते हैं और श्रीरंगम में ही निवास करते हैं।

इस तरह श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगम में रहते हुये मन्दिर की गतिविधियों को कुशलता पूर्वक निर्वाहन करते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी (जो उनके मौसेरे भाई है और जिन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी जब श्रीयादवप्रकाशाचार्य के साथ यात्रा में थे उनके प्राणों कि रक्षा किये थे) को सुधारना चाहते थे। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी शिव भक्त बनकर कालहस्थी में निवास कर रहे थे। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी से प्रार्थना करते है कि वे उन्हें आदेश देकर पुन: सम्प्रदाय में लाये। श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी स्वयं कालहस्थी जाते हैं और श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी जो कट्टर शिव भक्त बनकर शिवजी कि सेवा कर रहे थे। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के स्तोत्र रत्न व दिव्य प्रबन्ध के माध्यम से श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी भगवान श्रीमन्नारायण के सर्वोच्चता को समझाते हैं। भगवान के आदेशों को  श्रवण करके श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी कि बुद्धी शुद्ध होगयी और शिव सम्बन्ध को त्याग कर श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी के चरण कमलों को अपनाते हैं और वों भी उन्हें बड़े खुशी से अपनाकर पञ्च संस्कार कर अपने सात लाते हैं। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी के सात तिरुमला में रहकर सभी गूढ़ार्थ सीखकर श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी कि सेवा करते हैं। बाद में श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी श्रीरंगम में आकर हमेश के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी के साथ ही निवास करते हैं।

आपके आचार्य

श्रीरामानुज स्वामीजी फिर श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के तिरुमाली जाकर उन्हें सभी महत्त्व के विषय सिखाने का निवेदन करते हैं। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी प्रसन्न होकर श्रीरामानुज स्वामीजी को द्वय महामन्त्र का अर्थानुसन्धान कराते हैं। वों श्रीरामानुज स्वामीजी को निर्देश देते हैं कि “इस विषय पर अब भी बहुत सीखना हैं और इसलिये आप कृपया श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के प्रिय शिष्य श्री तिरुक्कोष्टिऊर नम्बी के पास जाकर सीखे”।

श्रीरामानुज स्वामीजी उसी समय पवित्र ग्राम तिरुक्कोष्टिऊर कि ओर प्रस्थान करते हैं। गाँव में आकर वें श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी के तिरुमाली के विषय में वहाँ के लोगों से पूंछते हैं। एक बार तिरुमाली कि दिशा प्राप्त होने के पश्चात वों हर कदम पर साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हुए उनके तिरुमाली पहूंचते हैं जिसे देख सभी जन आश्चर्य चकित हो जाते हैं और जिन्हें श्री तिरुक्कोष्टिऊर नम्बी कि महानता का भी तभी पता चला। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी के चरण कमलों पर गिरकर और उन्हें द्वय महामन्त्र का गुढार्थ सिखाने को कहते हैं। परन्तु श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी को उन्हें सिखाने में कोई अधीक रुचि नहीं दिखाते हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी निराश होकर श्रीरंगम लौट जाते हैं।

श्रीरामानुज स्वामीजी का श्रीरंगम में लौटने के बाद उन्हें श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी से रहस्य विषय सिखने कि बड़ी इच्छा हुई। श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी एक बार श्रीरंगम आये तब नम्पेरुमाल उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी को रहस्य विषय सिखाने का आदेश दिते है। श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी नम्पेरुमाल भगवान से कहते हैं कि शास्त्रानुसार यह विषय सभी को नहीं सिखाया जा सकता हैं। नम्पेरुमाल  कहते हैं कि क्योंकि श्रीरामानुज स्वामीजी में अच्छे शिष्य बनने के सभी गुण हैं तो उन्हें सिखाने में कोई गलत नहीं हैं। इसके बाद श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामि को सिखाने के लिये मान जाते हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुक्कोष्टिऊर अर्थ सिखने को जाते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुक्कोष्टिऊर जाते हैं तो श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी उन्हें लौटाकर फिर बाद में आने को कहते हैं। ऐसा १८ बार हुआ। इस स्थिति को सहन न कर श्रीरामानुज स्वामीजी एक शिष्य के माध्यम से श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी को सन्देश भेजते हैं कि उन्हें यह अर्थ सिखना हीं हैं। अन्त में श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को अर्थ सिखाने के लिये तैयार हो जाते हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी गीता के चरम श्लोक का रहस्य अर्थ सीखते हैं। श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी श्रारामानुज स्वामीजी से विनंती करते हैं कि इसका अर्थ किसी को भी न बताये। परन्तु श्रारामानुज स्वामीजी जिन्हें भी सिखने कि इच्छा थी सभी को सिखाये। यह सुनकर श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी बहुत क्रोधित हुए और उन्हें बुलाते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी को समझाते हैं कि जो शिक्षीत हैं उन्हें इस रहस्य अर्थ का सच्चा ज्ञान सीकखर बहुत लाभ होगा। श्रीरामानुज स्वामीजी का उदार स्वभाव देख श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी प्रणाम कर उन्हें “एम्पेरुमानार” (एम्पेरुमान भगवान श्रीमन्नारायण से भी अधिक महान) ऐसे कहते हैं। इसके बाद हमारा सम्प्रदाय भी “एम्पेरुमानार दर्शनम” (श्रीरामानुज दर्शनम) ऐसे जानने लगे। एम्पेरुमानार ने इस रहस्य अर्थ को श्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीदाशरथी स्वामीजी को उनके विणति करने पर सिखाया।

फिर श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी तिरुमालई आंडान  को निर्देश देते हैं कि वें श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीसहस्रगीति का अर्थानुसन्धान कराये। एम्पेरुमानार बड़े उत्साह से तिरुमालई आंडान से सभी आवश्यक अर्थ सिखते हैं। कभी कभी तिरुमालई आंडान और एम्पेरुमानार के विचारों में कुछ पाशुर्रों पर मत भेद हो जाता था और श्रीसहस्रगीति का “अरियाक कालत्तूल्ले” पाशुर सिखते समय तिरुमालई आंडान एम्पेरुमानार के अलग अर्थ बताने से नाराज हो गये और सिखाना बन्द कर दिया। यह घटना सुनकर श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी उसी क्षण श्रीरंगम आते हैं। वों तिरुमालई आंडान को एम्पेरुमानार कि महानता बताते हैं और शिक्षा जारी रखने का निर्देश देते हैं। तिरुमालई आंडान मान जाते हैं और शिक्षा जारी रखते हैं। फिर एक बार मत भेद होगया और एम्पेरुमानार कहते हैं “श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी इस तरह नहीं समझाते”।  तिरुमालई आंडान पूंछते हैं “आपको कैसे पता जबकी आपने कभी भी उनके दर्शन नहीं किये?” और एम्पेरुमानार कहते हैं “मैं श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के लिये एकलव्य जैसे हूँ”। यह सुनकर तिरुमालई आंडान को श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी कि एम्पेरुमानार के प्रति बात का स्मरण होता हैं जब वें स्वयं एम्पेरुमानार के मुख सुनते है। तब उन्हें यह अहसास होता हैं कि एम्पेरुमानार का अवतार विशेष हैं और यह विचार करते हैं कि वें इन पाशुरों का अर्थ स्वयं श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी से सुनने में वंचीत रह गये और एम्पेरुमानार को बड़े सम्मान से देखते हैं।

श्रीसहस्रगीति का अध्ययन समाप्त कर वें श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के पास जाते हैं और श्रीमहापूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को निर्देश देते हैं कि वें श्री तिरुवरंगप्पेरुमाल अरैयर के पास जाकर उनकी सेवा कर उनसे कुछ गुड़ार्थ सीखे। एम्पेरुमानार श्री तिरुवरंगप्पेरुमाल अरैयर के पास जाकर निस्वार्थ भाव से ६ महिने तक दूध बनाकर और हल्दी का लेप बनाकर सेवा किये। एक बार हल्दी का लेप एम्पेरुमानार ने तैयार किया वह श्री अरैयर स्वामि को सही नहीं लगा और वह अपनी नाराजगी बताये। एम्पेरुमानार उसी समय श्री तिरुवरंगप्पेरुमाल अरैयर को संतुष्ट करें ऐसा नया हल्दी का लेप बनाते  हैं। अरैयर स्वामि प्रसन्न होकर “चरमोपाय” का गोपनीय तत्त्व जो सभी के लिये आचार्य पर पूरी तरह निर्भर होके सिखाते हैं।

कोई आश्चर्य कर सकता हैं कि, एम्पेरुमानार क्यों अनेक आचार्यो  से शिक्षा ग्रहण करना पड़ा। जैसे एक राज कई मन्त्रीयों को नियुक्त करता हैं अपने युवराज को सशक्त बनाने के लिये, वैसे हीं श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी ने अपने कई शिष्यों को ज्ञान का धन दिया और उन सभी को यह निर्देश दिया कि सही समय पर सभी वह ज्ञान एम्पेरुमानार को प्रदान करें। श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के यह सभी शिष्यों को श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति बहुत लगाव और सम्मान था क्योंकि वों स्वयं श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी को बहुत प्रिय थे। श्रीरामानुज स्वामीजी के पहले के आचार्य को बहुत ख्याति इसलिये प्राप्य हुई क्योंकि वें श्रीरामानुज स्वामीजी के आचार्य हैं और यह कहने कि आवश्यकता नहीं हैं कि एम्पेरुमानार के शिष्यों को भी प्रसिद्धी उनके सम्बन्ध के कारण हीं मिली। जैसे एक हार में हीरा, हार के दोनों तरफ को ख्याति लाता हैं वैसे हीं एम्पेरुमानार उनसे पहिले और बाद में दोनों आचार्यों को ख्याति प्रदान किये हैं।

गध्यत्रय गाना

फिर एम्पेरुमानार श्रीरंगम में श्रीरंगनायकी अम्माजी और श्रीरंगनाथ भगवान के सामने उत्तर फाल्गुणी के दिन गध्यत्रय सुनाते हैं। वों अपने तिरुमाली में भगवान कि तिरुवाराधन करने कि प्रक्रिया को नित्य ग्रन्थ में संग्रह करते हैं।

इस वक्त एम्पेरुमानार श्रीरंगम में भिक्षा माँगकर पाते थे। कुछ जन जो श्रीरंगम के मन्दिर में यह बदलाव के विरुद्ध थे एक औरत को नियुक्त कर उन्हें जहरीले चावल देने को कहते हैं। वों बिना इच्छा के भी यह कार्य करने कि आज्ञा को स्वीकार करती हैं और एम्पेरुमानार को जब देती हैं तो बड़े पीड़ा के साथ देती है। एम्पेरुमानार को शख हुआ कि कुछ गलत है तो खाने को कावेरी नदी में फेंख देते हैं और उपवास करना प्रारम्भ कर देते हैं। यह घटना जब श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी को पता चली तो वें तुरन्त श्रीरंगम आ जाते है। एम्पेरुमानार कड़ी धुप में उनका स्वागत करने कावेरी के तट तक जाते हैं। श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी को देखते हीं एम्पेरुमानार उसी समय जमीन पर गिरकर साष्टांग दण्डवत प्रणाम करते हैं और श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी को उन्हें उठाने तक कि प्रतीक्षा करते हैं। श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी एक क्षण के लिये उन्हें उठाने के लिये हिचकिचाते है और श्रीकिदाम्बी आच्छान, एम्पेरुमानार के एक शिष्य उसी क्षण एम्पेरुमानार को उठाते है और श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी से कहते है “आप इतने बड़े आचार्य को कड़ी धुप में कैसे तड़पने  दे सकते हैं?”। श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी श्रीकिदाम्बी आच्छान से कहते हैं “मुझे एम्पेरुमानार कि देखबाल करने हेतु एक अच्छा व्यक्ति मिल गया है क्योंकि तुमने मेरा अनादर कर उन्हें उठाया। इसलिये तुम एम्पेरुमानार के लिये प्रसाद बनाओगे”। इस तरह सभी अपनी चिन्ता और सावधानी एम्पेरुमानार के प्रति बताते हैं।

श्री यज्ञमूर्ति को परास्त करना

श्री यज्ञमूर्ति नामक एक मायावाद था जो बहुत बड़े विद्वान थे जिन्होंने काशी में कई विद्वानों को परास्त कर वहीं पर सन्यासाश्रम में प्रवेश कर निवास करने लगे। पुरुस्कार और सम्मान रूप में उन्होंने काफी शाबाशीअर्जित किया और शिष्य भी बनाये थे। श्रीयज्ञमूर्ति ने श्रीरामानुज स्वामीजी की कीर्ति के बारे में काफी सुना था। इसलिये वें श्रीरंगम पधारकर श्रीरामानुज स्वामीजी को वाद विवाद के लिये ललकारा। श्रीरामानुज स्वामीजी भी इस वाद-विवाद के लिये तैयार हो गये। श्रीयज्ञमूर्ति ने कहा कि “यदि मैं हारता हूँ तो मैं आपकी खड़ाऊ (चरण पादुका) अपने सिर पर रखकर जाऊँगा, आपके नाम और आपके सिद्धान्तों को भी स्वीकार करूँगा।” इस पर श्रीरामानुज स्वामीजी ने कहा “अगर मैं हार जाता हूँ तो मै साहित्यिक प्रयास को  छोड़ दूँगा”। दोनों में १७ दिनों तह प्रचण्ड वाद विवाद हुआ। १७ वें दिन श्रीयज्ञमूर्ति विजयी होकर बहुत अहंकार से जाने लगे। श्रीरामानुज स्वामीजी बहुत खेद प्रगट किया और अपने मठ के भगवान (पेररूलालप पेरुमाल) से कहा “यह महान सम्प्रदाय जिसे महान निष्ठावान विद्वानों, आल्वारों से श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी आदि ने पोषण किया आज मेरे वजह से परास्त हो रहा हमें और इस सम्प्रदाय को मायावादी ध्वस्त कर देगा। यदि यही आपकी इच्छा है तो होने दीजिये” और बिना प्रसाद पाये विश्राम करने चल दिये। रात्री में स्वप्न में श्रीभगवान प्रगट होकर निर्देश दिया कि तुम श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी की रचनाओं को उपयोग कर श्रीयज्ञमूर्ति पर जीत हासिल करों। प्रात:काल उठते ही श्रीरामानुज स्वामीजी में एक नयी स्फूर्ति आगयी। प्रात: कालीन दिनचर्या समाप्त कर अपने मठ के श्रीभगवान से आज्ञा लेकर प्रस्थान किया। श्रीरामानुज स्वामीजी के इस शानदार आगमन की शैली देखकर श्रीयज्ञमूर्ति, जो बहुत बड़े विद्वान थे सोचता हैं कि कोई अलौकिक ईश्वरीय शक्ति इस स्पर्धा के मध्य में आ रही है और तुरन्त श्रीरामानुज स्वामीजी के चरणारविंद में अपने को समर्पित करके घोषणा करता है कि “मैं यह स्पर्धा हार गया हूँ”। इससे आश्चर्य चकित होकर श्रीरामानुज स्वामीजी पूछते है कि “क्या तुम स्पर्धा में आगे भाग नही लेना चाहते हो” और श्रीयज्ञमूर्ति कहता है “क्योंकि श्रीरंगनाथ भगवान ने आपसे चर्चा कि है तो अब मेरे समझ में आगया है कि आप स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान से अलग नहीं हो। आपके समक्ष आगे से मैं अपना मुह कभी नहीं खोलुंगा”। फिर भी श्रीरामानुज स्वामीजी ब्रम्ह के विशेष गुणों को वर्णन कर मायावाद के सिद्धान्त का नाश करते हैं। श्रीयज्ञमूर्ति को सब समझ में आजाता हैं और वे अपना एक दण्ड (मायावादी सन्यासी द्वारा लिये जाने वाला एक दण्ड) तोड़कर श्रीरामानुज स्वामीजी से निवेदन करते हैं कि उसे भी त्रीदण्डधारी सन्यासी (श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के सन्यासी से सम्बंधीत) की दीक्षा दें। श्री पेररूलालप पेरुमाल के ईश्वरीय शक्ति के पावन स्मृति में और श्रीयज्ञमूर्ति द्वारा हारने, श्रीरामानुज स्वामीजी का नाम स्वीकार करने के बाद श्रीयज्ञमूर्ति का नाम “श्रीअरूलालाप पेरुमाल एम्पेरुमनार” (श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी) रखते हैं। स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें दिव्य प्रबन्ध का गहराई तक ज्ञान सीखाते हैं। श्रीअरूलालाप पेरुमाल एम्पेरुमनार श्रीरामानुज स्वामीजी के संग रहते हुये उन्हें पूर्ण रूप से अपने आपको समर्पित करते हैं।

तिरुमला यात्रा और कैंकर्य

उडयवर ने श्रीरंगम में श्रीकुरेश स्वामीजी, श्रीदाशरथी स्वामीजी, श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी, आदि को शानदार ढंग से सिखा रहे थे। कई विद्वान श्रीरामानुज स्वामीजी कि वैभवता का गुणगान सुनकर उनकी शरण में श्रीरंगम में पधारे। जब श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी, एच्छान, तोण्डनूर और मरुधूर नम्बी श्रीरामानुज स्वामीजी को अपना आचार्य बनाने के लिये पधारे तब उन्होंने उन सभी को श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी के पास जाकर उनका शिष्य बनने को कहा। सभी खुशी से यह बात मान लिये और श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों पर पूर्ण निर्भर रहने कि आज्ञा दिये।

एक समय श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीसहस्रगीति पर कालक्षेप कर रहे थे। जब वें “ओझिविल कालम” समझा रहे थे तो उन्होंने शिष्यों से पूछा कि “क्या कोई तिरुमला तिरुपती में रहकर वहाँ वेंकटेश भगवान के कैंकर्य हेतु एक बगीचे का निर्माण कर प्रतिदिन उन्हें पुष्पमाला बनाकर अर्पण करने का कार्य करना चाहेगा”। श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी एक क्षण में खड़े होकर इस कैंकर्य को स्वीकार किया। श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें इस कैंकर्य के लिये आर्शिवाद प्रदान करते हैं। श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी तिरुमला जाकर एक बगीचे व तालाब का निर्माण कर उस बगीचे का नाम “श्रीरामानुज वाटिका” रखते हैं और भगवान वेंकटेश कि सेवा करते हैं।

उडयवर भी तीर्थ यात्रा में जाना चाहते हैं जिसके लिये श्रीरंगनाथ भगवान से प्रार्थना करते हैं। आज्ञा प्राप्त होने के पश्चात तिरुक्कोवलूर और काञ्चीपुरम में मंगलाशासन कर तिरुमला कि ओर प्रस्थान करते हैं।

अपने शिष्यों के साथ उडयवर तिरुमला तिरुपती के ओर प्रस्थान करते हैं लेकिन राह में एक जगह वें रास्ता भूल जाते हैं। वों एक किसान को देख उससे रास्ता पूछते हैं। किसान द्वारा सही मार्ग का वर्णन लेने के बाद श्रीरामानुज स्वामीजी कृतज्ञता से अभिभूत होकर किसान को साष्टांग प्रणाम कर उसका अमानवन (वह जो श्रीवैकुण्ठ कि राह बताता हैं) माना। अन्त में वें तिरुपती पहुँचते है और सप्तगिरि के चरणों में आलवारों कि पूजा करते हैं। कुछ समय के लिये वों तिरुपती में रहकर राजा को अपना शिष्य रूप में स्वीकार करते है और अपने कई शिष्यों को वहीं निवास करने कि आज्ञा देते हैं। यह समाचार पाकर श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी और अन्य शिष्य आकर उडयवर का स्वागत कर उन्हें सप्तगिरि आकर भगवान वेंकटेश का मंगलाशासन करने कि विणति करते हैं। सप्तगिरि कि पवित्रता को देख पहले तो श्रीरामानुज स्वामीजी मना करते है क्योंकि आलवार भी वहाँ नहीं चढ़ें थे परन्तु शिष्यों के मनाने पर श्रीरामानुज स्वामीजी पहाड के चरणों में जाकर स्वयं को शुद्ध कर पूरे दास भाव से चढ़ते हैं मानों परमपद में भगवान के सिंहासन पर चढ़ रहे हैं।

तिरुमला पहुँचने पर श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी उनका स्वागत श्रीवेंकटेश भगवान के मान सम्मान द्वारा करते हैं। यह देख श्रीरामानुज स्वामीजी लज्जीत होते हैं कि श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी जो उनके आचार्य हैं वें स्वयं उनका स्वागत करने पधारे हैं और वें उनसे पूछते हैं कि “आपको कोई साधारण मानव नहीं मिला जो मेरा स्वागत कर सके?” और श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी विनम्रता पूर्वक उत्तर देते हैं “मैंने मेरे चारों तरफ ढूंढा, परन्तु मुझसे नीच कोई नहीं मिला”। उडयवर और उनके शिष्य यह उत्तर सुनकर आश्चर्य चकित रह गये। फिर सभी जीयर, एकांगी, मन्दिर के सेवक आदि आकर श्रीरामानुज स्वामीजी का स्वागत करते हैं। उडयवर फिर मन्दिर कि परिक्रमा लगाकर, पुष्करणी में स्नान कर, द्वादश ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण कर, वराह भगवान कि पूजा कर, मुख्य मन्दिर में प्रवेश कर, श्रीविश्वक्सेन कि पूजा कर भगवान वेंकटेश का मंगलाशासन करते हैं। इसके बाद श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुपती जाने का निश्चय करते है क्योंकि वे कहते है कि यह स्थान नित्यसुरियों का निवास स्थान है और यहाँ हम रात में निवास नहीं कर सकते हैं। परन्तु श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी व अन्य उन्हें ३ दिन तक रहने के लिये राजी करते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी उनकी आज्ञा पालन कर बिना प्रसाद पाये वहाँ निवास करते हैं और भगवान कि दिव्य  वैभवता का आनन्द लेते हैं। इसके बाद श्रीरामानुज स्वामीजी भगवान श्रीनिवास से वहाँ से जाने की आज्ञा मांगते है और उसी समय भगवान पुन: पुष्टि करते है कि आप दोनों लीला विभूति और नित्य विभूति के मालिक हैं और उन्से विदाई लेते हैं।

तिरुमला से विदा लेकर एक वर्ष के लिये आप तिरुपती में निवास करते हैं। यहाँ पर श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी से आप श्रीरामायण का अर्थानुसन्धान करते हैं। इस अध्ययन के प्रवचनों की समाप्ती के बाद श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी से श्रीरंगम जाने कि आज्ञा मांगते हैं। श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को कुछ भेंट देना चाहते है। श्रीरामानुज स्वामीजी प्रार्थना करते हैं कि श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी (जो श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी की बहुत ही समर्पण भाव से सेवा करते हैं) को उनके साथ भेजे जो उन्हें सम्प्रदाय को प्रतिष्ठित करने में मदद कर सकेंगे। श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी खुशी से श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजी के साथ भेजते हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीरंगम कि ओर यात्रा प्रारम्भ करते हैं।

श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी के साथ गदिकाचलम (शोलिंगुर) पहुँचते हैं और वहाँ श्रीअक्कारक कणी भगवान का मंगलाशासन करते हैं। आगे तिरुप्पुत्कुझी पहुँच कर श्रीजटायु महाराज, मरगातवल्ली तायर और विजयराघवन भगवान का मंगलाशासन करते हैं। इसके बाद वें काञ्चीपुरम के आस पास कई दिव्यदेशों के दर्शन कर श्रीकांचीपूर्ण स्वामीजी के सामने पहुँचते हैं। इस बीच श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी अपने आचार्य श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी से बिछुड़ने के कारण बहुत कांतिहीन हो गये। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी के दु:ख को समझकर श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें अपने आचार्य के दर्शन प्राप्त करने को कहकर उनके साथ दो श्रीवैष्णवों को भी भेजते हैं। वों कांचीपुरम में रहकर श्रीकांचीपूर्ण स्वामीजी के साथ श्रीवरदराज भगवान कि सेवा करते हैं। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी के तिरुमाली पहुँचकर प्रवेश द्वार के पास जो बन्द था, इंतजार करते हैं। जब देखनेवालों ने श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी को श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी के विषय के बारें में बताया तो उन्होंने द्वार खोलने से इनकार कर दिया और वापिस श्रीरामानुज स्वामीजी के पास जाने को कहा और कहते हैं उनके चरण कमलों को हीं अपना शरण माने। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी अपने आचार्य की दिव्य इच्छा को समझकर वापिस श्रीरामानुज स्वामीजी के पास आते हैं। और उन्के सात गए दो श्रीवैष्णव यह पूरा वृतान्त श्रीरामानुज स्वामीजी को सुनाते है शैलपूर्ण स्वामीजी की आज्ञा सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी को बहुत आनन्द हुआ।

श्रीरंगम में वापसी

कुछ समय के बाद सभी कांचीपुरम से श्रीरंगम आते हैं। स्थानीय श्रीवैष्णव जन सभी का औपचारीक रूप से स्वागत करते हैं और श्रीरामानुज स्वामीजी क्रम से श्रीरंगनाथ भगवान कि सन्निधी में जाते हैं। श्रीरंगनाथ भगवान बड़े प्रेम से श्रीरामानुज स्वामीजी का स्वागत कर, उनकी यात्रा के विषय में पूछ, तीर्थ, श्रीशठारी देकर सम्मान करते हैं। फिर उडयवर कृपा कर अपनी नित्य दिनचर्या प्रारम्भ कर सभी को श्रीरंगम में श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के सिद्धान्त को सीखना शुरू करते हैं।

श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी भी प्रसन्नता से कालक्षेप और कैंकर्य में भाग लेते हैं। एक बार कुछ श्रीवैष्णव श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी कि प्रशंसा कर रहे थे तो श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी बहुत खुश हुए। यह देख श्रीरामानुज स्वामीजी उन्हें कहते हैं “जब कोई तुम्हारी तारीफ करें तो आप उसे सीधे से स्वीकार नहीं करे। बल्कि उन्हें आपको कहना चाहिये कि मैं इस प्रशंसा के योग्य नहीं हूँ”। यह सुनकर श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी कहते हैं “जब में कालहस्ती में था तब मैं बहुत हिन दशा में था। अगर कोई मेरे प्रशंसा करता हैं तो वों केवल आपकी दया के कारण जिसके कारण मुझमे बदलाव हुआ और मैं इस परिस्थिति में हूँ – इसलिये यह सभी प्रशंसा आप हीं के लिये हैं”। एम्पेरुमानार यह सुनकर श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी कि निष्ठा को स्वीकृति देते हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी को आलिंगन कर कहते हैं “आप अपने अच्छे गुण मुझे भी प्रदान कर दीजिए”। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी इस सांसारिक सुखों से पूर्णत: पृथक थे और एम्पेरुमानार ने अन्त में श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी को सन्यासाश्रम में प्रवेश करने की आज्ञा प्रदान किये। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी सन्यासाश्रम को स्वीकार करते है और एम्पेरुमानार ने उनका नाम एम्बार रखा।

श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी ने ज्ञानसारम व प्रमेय सारम की रचना की जिसमें अपने सम्प्रदाय के तत्त्वों का वर्णन किया गया हैं।

कश्मीर यात्रा व श्री भाष्यम

वेदान्त के सिद्धान्तों की स्थापना करने हेतु श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी और अन्य शिष्यों सहित भोधायन वृत्ति ग्रन्थ (ब्रम्ह सूत्र पर एक व्याख्या) को प्राप्त करने हेतु कश्मीर कि ओर प्रस्थान किये। इसे प्राप्त कर श्रीरंगम कि ओर प्रस्थान करते हैं। राह में कुछ भ्रष्ट लोग ग्रन्थ उनसे छीनकर भाग जाते हैं। एम्पेरुमानार इससे बहुत दुखी होकर शोक में डूब जाते हैं क्योंकि उस ग्रन्थ का पूर्ण अध्ययन भी उन्होंने नहीं किया था परन्तु श्रीकुरेश स्वामीजी उन्हें सांत्वना देते हैं और कहते है कि जब आप विश्राम कर रहे थे तब मैंने इस ग्रन्थ का पूर्ण अध्ययन कर लिया था। श्रीरंगम में लौटकर एम्पेरुमानार श्रीकुरेश स्वामीजी को आज्ञा देते हैं जैसे उन्होंने कहा है वैसे ही ब्रम्हसूत्र की व्याख्या को लिखें। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी को कहते हैं कि जहाँ उन्हें लगे कि यहाँ उन्होंने बनाये गये सिद्धान्तों के विरुद्ध या अनुरूप हैं वही वें श्रीब्रम्हसूत्र की व्याख्या लिखना बन्द कर सकते हैं। एक बार आत्मा का सच्चा स्वभाव समझाते समय एम्पेरुमानार बिना शेषतत्व के प्रभाव के उसे ज्ञातृत्त्वम (ज्ञान का घर) कहते है। श्रीकुरेश स्वामीजी यहाँ लिखना छोड़ा देते है क्यों की ज्ञान और शेषतत्व दोनों आत्मा के मुख्य स्वभाव हैं। एम्पेरुमानार क्रोधित हो जाते हैं और श्रीकुरेश स्वामीजी को जो वों कहते है उसे लिखने के लिये दबाव डालते हैं। फिर भी श्रीकुरेश स्वामीजी इंकार करते है और एम्पेरुमानार अपना गुस्सा प्रत्यक्ष दिखाते हैं। जब अन्य श्रीकुरेश स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजी के गुस्से के विषय पर पूछते है तो श्रीकुरेश स्वामीजी केवल कहते हैं “वों स्वामी हैं और मैं दास हूँ। वों मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं”। कुछ समय पश्चात एम्पेरुमानार को परिस्थिति का ज्ञात होता हैं और श्रीकुरेश स्वामीजी से क्षमा मांग सही अर्थ लिखाना प्रारम्भ करते हैं। इस तरह श्रीभाष्यम, वेदार्थ दीपम, वेदार्थ सारम, वेदार्थ संग्रह, गीता भाष्यम यह ग्रन्थ श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा से प्राप्त हुए और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के दु:ख को भी दूर किया जो इन तत्त्वों को स्पष्टता से समझाना चाहते थे।

दिव्य देश यात्रा

श्रीवैष्णव जन श्रीरामानुज स्वामीजी के पास जाकर उन्हें कहते कि “स्वामीजी आपने श्रीवैष्णव सम्प्रदाय को प्रतिष्ठित किया है और अन्य सिद्धान्तों को हराया है। अब कृपया तीर्थ यात्रा पर चलिये और राह में आनेवाले सभी दिव्यदेशों में पूजा करिये”। उनकी यह बात मानकर श्रीरामानुज स्वामीजी सभी श्रीवैष्णवों के साथ श्रीरंगनाथ भगवान (उत्सव विग्रह) के सन्निधी में गये और यात्रा के लिये आज्ञा लेकर यात्रा प्रारम्भ किया। श्रीरंगनाथ भगवान ने आज्ञा प्रदान किये।

सभी श्रीवैष्णवों के साथ श्रीरामानुज स्वामीजी यात्रा प्रारम्भ किये और भारतवर्ष के कई दिव्य देशों और क्षेत्रों में दर्शन किया। वें अपनी यात्रा चोलनाडु से प्रारम्भ कर और उस क्षेत्र में तिरुक्कुदंताई और अन्य दिव्यदेशों के दर्शन करते हैं। फिर वों तिरुमालिरुंचोलाई और अन्य मन्दिर से तिरुप्पुल्लाणि जाकर सेतु समुन्द्र के दर्शन कर आलवार तिरुनगरी पहुँचते हैं। वहाँ श्रीशठकोप स्वामीजी का मंगलाशासन “पोलिन्धु निनरा पिरान”  इस तरह करते हैं। श्रीशठकोप स्वामीजी एम्पेरुमानार को देख बहुर प्रसन्न हो उन्हें सभी सम्मान देते हैं। उडयवर वहाँ सभी नव तिरुपती के दर्शन करते हैं। राह में उनके सिद्धान्तों का विरुद्ध करने वालों को परास्थ कर विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त कि स्थापना करते हैं।

वहाँ से तिरुकुरुंगुड़ी पधारते हैं। नम्बि उडयवर का स्वागत कर अर्चकों के जरिये उनसे वार्तालाप करते हैं। वों पूछते हैं कि “मैंने यहाँ कई अवतार लेकर भी शिष्यों को इकट्ठा नहीं कर सका और कैसे आप यह कार्य कर सके?”। उडयवर कहते हैं “मैं तुम्हें  समझा सकता हूँ अगर आप मेरे शिष्य बनकर पूछेंगे तो”। उसी समय नम्बि श्रीरामानुज स्वामीजी को सिंहासन प्रदान कर उनके आगे विनम्रतापूर्वक खड़े हो गये। उडयवर सिंहासन के आगे बैठते है और अपने आचार्य श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को सिंहासन पर बैठे हैं ऐसा स्मरण करते है और नम्बि को द्वय महामन्त्र कि महिमा को समझाते है और भगवान से कहते है इसी द्वय महामन्त्र कि शक्ति से उन्होंने सभी को इस पवित्र राह पर चलने के लिये मनाया हैं। भगवान बहुत प्रसन्न होकर और श्रीरामानुज स्वामीजी को आचार्य रूप में स्वीकर करते है और एम्पेरुमानार खुश होकर भगवान का नाम “श्रीवैष्णव नम्बि” रखे।

फिर एम्पेरुमानार तिरुवण्परिसारम, तिरुवात्तारू और तिरुवनन्तपुरम को जाते हैं। तिरुवनन्तपुरम में एक मठ कि स्थापना कर कई पण्डितों के ऊपर विजय प्राप्त करते हैं। फिर उस क्षेत्र के कई दिव्यदेशों के भगवान कि पूजा करते है और पश्चिम तट से उत्तर भारत में पहुँचते हैं। वों मथुरा, सालग्राम, द्वारका, अयोध्या, बद्रीकाश्रम, नैमिशरण, पुष्कर में मंगलाशासन कर गोकुल, गोवर्धन, वृन्दावन, आदि भी जाते हैं और वहाँ भी अन्य सिद्धान्तों के कई पण्डितों को परास्थ करते हैं।

यहाँ से श्रीरामानुज स्वामीजी कश्मीर पहुँचते हैं और सरस्वती भण्डारम (साहित्यिक केन्द्र) जिसकी सभापती स्वयं सरस्वती देवी है। वों स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी का स्वागत कर उनसे चांदोज्ञ उपनिषद के श्लोक “तस्य यथा कप्यासम” [यह वों श्लोक हैं जिससे श्रीरामानुज स्वामीजी और उनके बाल्यावस्था के आचार्य श्रीयादवप्रकाशाचार्य के मध्य अनबन हो गई थी] का अर्थ समझाने को कहति है। श्रीरामानुज स्वामीजी ने इस श्लोक का विस्तृत से उत्तर दिया और उसका सही अर्थ भी स्थापित किया। सरस्वती देवी इस अर्थ से बहुत प्रसन्न हो उनकी श्रीभाष्य (ब्रम्ह सूत्र पर टीका) को मस्तक पर रख उनकी स्तुति की। वों उनकी स्तुति कर उनको “श्री भाष्यकार” कि पदवी दी और श्रीहयग्रीव भगवान कि विग्रह प्रदान की। जब उडयवर पूछते हैं कि वों इतनी आनंदित क्यों हुई तो वों कहती हैं पहले शंकरा पधारे थे और जब उन्होंने यही श्लोक का अर्थ उनसे पूछा तो वो समझा नहीं पाये और एक बेजोड़ अर्थ समझाये। वों कहती हैं “क्योंकि आप ने सही अर्थ समझाया है जिससे मैं संतुष्ट और आनंदित हुई हूँ”। वहाँ उपस्थित अन्य विद्वान जो वहाँ इस वार्ता को सुन रहे थे उत्तेजित होकर चर्चा करने के लिये श्रीरामानुज स्वामीजी के पास आये। श्रीरामानुज स्वामीजी ने सभी को हराकर श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के सिद्धान्तों को स्थापित किया। यह देख राजा अचम्बित हो गया और उडयवर के शिष्य बन गये। हारे हुए विद्वान गुस्सा हो गये और उन्होंने उडयवर को काले जादू के जरिये मारने कि साजिश रची। परन्तु इस जादू का उल्टी प्रतिक्रिया हुई और वें एक दूसरे से लड़ने लगे। राजा श्रीरामानुज स्वामीजी से विणति करते हैं कि उन सभी को बचा लीजिए और फिर सभी शान्त हो श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्य बन जाते हैं।

वहाँ से वे वाराणासी जाकर गंगा में स्नान कर कण्डमेन्नुम कडी नगर दिव्य देश में पूजा करते हैं। वहाँ से में पुरुषोत्तम धाम (जगन्नाथ पुरी) पधारते हैं और भगवान जगन्नाथ का मंगलाशासन करते हैं। वहाँ मायावादी विद्वान को हराकर मठ कि स्थापना करते हैं। वहाँ से श्रीकूर्मम, सिंहादरी और अहोबिलम पधारते हैं।

अन्त में वों तिरुमला आते हैं। उस समय कुछ शैवों ने यह विवाद किया कि भगवान वेंकटेश कि जो विग्रह हैं वों शिवजी की हैं। उडयवर फिर कहते हैं “आप अपने भगवान के शस्त्र भगवान वेंकटेश के पास रखें और हम शङ्ख और चक्र उनके सामने रखते हैं। स्वयं भगवान को यह निर्णय करने दीजिये कि वें कौन हैं और उसके अनुसार वों हीं शस्त्र वें धारण करेंगे”। उन्होंने सभी को गर्भगृह से बाहर भेजा और कपाट बन्द कर दिया और सभी रात्री में चलेगये। प्रात: काल में जब सभी वापिस आये और गर्भगृह के फाटक खोला तो श्रीरामानुज स्वामीजी व अन्य श्रीवैष्णव यह दृश्य देख आश्चर्य चकित हो गये, देखा कि भगवान ने शङ्ख और चक्र को धारण किया हैं। इसके पश्चात श्रीरामानुज स्वामीजी तिरुपती पधारे और अपनी यात्रा यहाँ से प्रारम्भ किये।

फिर वों कांचीपुरम, तिरुवल्लिक्केणी, तिरुन्ल्र्मलाई और उस क्षेत्र के अन्य दिव्यदेश के दर्शन करते हैं। फिर वों मधुरांतगम पधारते हैं और तोण्डै मण्डलम में कई मायावाद विद्वानों को परास्त करते हैं। फिर वों तिरुवहिन्ध्रपुरम और काट्टुमन्नार कोइल के स्थानों में दर्शन करते हैं।

इस तरह वें कई दिव्यदेशों कि यात्रा कर अपनी यात्रा समाप्त कर श्रीरंगम लौटते हैं। फिर वों श्रीरंगनाथ भगवान को अमलनाधिपिरान गाकर पूजा करते हैं। श्रीरंगनाथ भगवान श्रीरामानुज स्वामीजी के कुशलमंगल के बारें में पूछा और उडयवर कहते हैं “हम निरन्तर आपके ध्यान में मग्न रहते हैं, आप चिन्ता न करें”। वें श्रीरंगम में हीं निवास करते हुये कृपा पूर्वक अपना नित्य कैंकर्य करते हैं।

भट्टर भाईयों का जन्म

एक दिन बारीश के कारण श्रीकुरेश स्वामीजी भिक्षा के लिये घर से बाहर जा न सके। वों सायंकालीन अनुष्ठान पूर्ण कर और प्रसाद भी नहीं पाया। रात्री में भोग के समय श्रीरंगनाथ भगवान के मन्दिर कि घण्टी बजने कि ध्वनी सुनाइ दी। उनकी धर्मपत्नी आण्डाल उनके पती कि स्थिति को देख उदास होकर श्रीरंगनाथ भगवान से कहती हैं “जब आपके भक्त उपवास कर रहे हैं तब आप भोजन का आनन्द ले रहे हैं”। उनकी भावनाओं को समझते हुए भगवान श्रीरंगनाथ उसी समय अपने सेवको द्वारा श्रीकुरेश स्वामीजी के तिरुमाली में प्रसाद देकर भेजते हैं। श्रीकुरेश स्वामीजी को प्रसाद के आगमन पर आश्चर्य हुआ और अपनी पत्नी कि ओर देखे और उनकी पत्नी जो भी हुआ उसे बताया। श्रीकुरेश स्वामीजी को अपनी इस दशा के लिये भगवान को तकलीफ देनेकी बात से दु:ख हुआ। फिर भी उन्होंने भगवान के द्वारा भेजे गये प्रसाद से दो मुट्ठी भर प्रसाद स्वीकार किया। थोड़ा स्वयं पाकर शेष अपनी पत्नी को दिया। इन दो मुट्ठी भर प्रसाद के कारण आण्डाल ने दो सुन्दर बच्चों को जन्म दिया। ११ दिन के असौच के पश्चात १२वें दिन श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी और अन्य श्रीवैष्णवों के साथ उत्साहित होकर दोनों बालकों को आर्शिवाद देने श्रीकुरेश स्वामीजी के तिरुमाली में पधारे। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी को दोनों बालकों को उनके निकट लाने को कहा। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी ने श्रीपराशर भट्टर को अपने हाथों में लेकर उसे श्रीरामानुज स्वामीजी के पास ले आये। श्रीरामानुज स्वामीजी ने बालक को बड़े प्रेम से अपने हाथों में लिया और आर्शिवाद दिया। उन्होंने श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी से कहा “इस बालक में पवित्र चमक और सुगन्ध हैं। तुमने ऐसा क्या किया?”। श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी ने उत्तर दिया कि “मैंने बलाक कि सुरक्षा के लिये द्वय महामन्त्र का श्रवण किया”। श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी से कहते “आप मुझसे भी आगे हैं। आप हीं इस बालक के आचार्य बनिये”। फिर उन्होंने इस बालक का नाम पराशर मुनि के स्मरण में “पराशर भट्टर” रखा और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी कि दूसरी इच्छा को पूर्ण किया। श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी को बालक का समाश्रयण करेने का निरीक्षण किया। श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीकुरेश स्वामीजी को आज्ञा देते हैं कि पराशर भट्टर को श्रीरंगनाथ भगवान और श्री रंगनायाकि अम्माजी को दत्तक दे दें। श्रीकुरेश स्वामीजी ने मान लिया। पराशर भट्टर के बचपन के समय रंगनायाकि अम्माजी स्वयं उनकी लालन पोषण करती थी और जब भी अम्माजी श्रीरंगनाथ भगवान को भोग लगाती तो श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी अपने हाथ सीधे भोग के पात्र में डाल भगवान का भोग भगवान से पहिले पा लेते और उसके बाद स्वयं भगवान भी आनंदित होकर प्रसाद पाते हैं। बहुत हीं छोटी उम्र में हीं श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी बहुत बुद्धिमान थे और श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी के बाद वें हीं सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी बने।

श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी के पूर्वाश्रम के भाई सीरिया गोविन्दप पेरुमाल कि पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया और श्रीरामानुज स्वामीजी ने उसका नाम “परांकुश नम्बी” रखा, श्रीशठकोप स्वामीजी के स्मरण में जिससे श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी कि तीसरी इच्छा भी पूर्ण हो गयी।

श्रीदाशरथी स्वामीजी का श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति बहुत लगाव था और श्रीरामानुज स्वामीजी भी उनके प्रति यही भाव रखते थे। जब श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीमहापूर्ण स्वामीजी कि बेटी अतुलाम्बा के यहाँ एक सेवक बनकर रहने को कहा तो बिना विचार किये उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी कि आज्ञा का पालन किया।

जब श्रीरामानुज स्वामीजी के आचार्य श्रीमहापूर्ण स्वामीजी ने श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के महान शिष्य श्रीमारनेर नम्बी के अन्तिम क्रिया किये तो वहाँ के अन्य श्रीवैष्णवों ने उनके इस कार्य को मान्य नहीं प्रदान किये क्योंकि श्रीमहापूर्ण स्वामीजी एक ब्राह्मण और श्रीमारनेर नम्बी एक क्षुद्र थे। उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी के पास जाकर इस घटना कि शिकायत किये। श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को बुलाया और इसका उत्तर मांगा। श्रीमहापूर्ण स्वामीजी ने श्रीमारनेरी नम्बी कि महानता को समझाया और दृढ़ रहे कि वों जो किये वों सहीं हैं। श्रीरामानुज स्वामीजी आनंदित हो गये और सभी को यह बात बताते हैं और कहते हैं कि वों श्रीमहापूर्ण स्वामीजी से सहमत हैं और केवल सभी को समझाने के लिये निवेदन कर पूछा।

तिरुनारायणपुरम यात्रा

इन दिनों में श्रीरामानुज स्वामीजी के मार्गदर्शन में सभी वैष्णव श्रीरंगम में आनन्द मंगल से रह रहे थे तब दुष्ट राजा जो शैव सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखता था,  विचार किया कि शिवजी की श्रेष्ठता को स्थापित किया जाना चाहिये। उसने सभी विद्वानों को बुलाया और उन्हें जबरदस्ती शिवजी की श्रेष्ठता को मानने के लिये मजबूर किया। श्रीकुरेश स्वामीजी का शिष्य नालुरान ने राजा से कहा “अनपढ़ अज्ञानी लोगों को मानने से क्या लाभ होगा? यदि आप सिर्फ श्रीरामानुज स्वामीजी और श्रीकुरेश स्वामीजी से मनवा सकते हो तो हीं, यह सत्य हो जायेगा”। यह सुनकर राजाने अपने सैनिको को श्रीरामानुज स्वामीजी के मठ से श्रीरामानुज स्वामीजी को बुलाने के लिये भेजा। इस समय श्रीरामानुज स्वामीजी स्नान के लिये बाहर गये थे और श्रीकुरेश स्वामीजी जो मठ में थे राजा के भाव को समझ गये और श्रीरामानुज स्वामीजी की तरह भगवा पोषाक धारण करके उनकी त्रिदण्ड को लेकर सैनिकों के साथ राजा के दरबार पहुँचे। स्नानादि से निवृत होकर श्रीरामानुज स्वामीजी जब मठ में वापिस आये तो इस विषय में उन्होंने पूरी जानकारी प्राप्त किये और घटित होनेवाली विपत्ति को ध्यान में रखके तुरन्त मठ छोड़ कर जाने को कहा। उन्होंने श्रीकुरेश स्वामीजी के वस्त्र धारण कर अपने शिष्यों के सहित श्रीरंगम से दूर बाहर निकल आये। जब सैनिकों को इनके श्रीरंगम से भाग जाने का समाचार मिला तो सैनिकों ने इनका पीछा किया। परन्तु श्रीरामानुज स्वामीजी ने थोड़ी मिट्ठी उठाई और उसे पवित्र करके उसे रस्ते में फैला दिया। सैनिकों को उस रेत पर पाँव रखने पर दर्द हुआ और इससे उन्होंने पीछा करना छोड़ दिया।

श्रीरामानुज स्वामीजी उस समय मेलकोटे (तिरुनारायणपुरम) कि ओर यात्रा किये जिसे उन्होंने सुरक्षित माना। जंगल के रास्ते में वे कुछ शिकारियों से मिले जो नल्लान चक्रवर्ती (श्रीरामानुज स्वामीजी का शिष्य) की आज्ञा से वहाँ थे। उन शिकारियों ने उन सभी जो ६ दिनों से नंगे पाँव चलते हुए भूखे प्यासे थे का स्वागत किया। उन्होंने उनकी कुशल मंगल के बारें में पूछताछ की और तब श्रीवैष्णवों ने कहा कि एम्पेरुमानार यहीं हैं और उनका दर्शन कराया और तब सभी शिकारियों ने बहुत सुखद अनुभव किया। शिकारियों ने उन्हें शहद और मोटा अनाज अर्पण किया जिसे एम्पेरुमानार को छोड़ सभी ने स्वीकार किया। यहाँ से शिकारियों ने पास के एक गाँव में सभी को ले गये यहाँ एक ब्राह्मण परिवार रहता था उन्हें उन सबको प्रसाद कि पूर्ण सामग्री दी।

ब्राह्मण की पत्नी (श्री चैलाचलाम्बाजी) ने सभी को प्रणाम करके प्रार्थना कि वें सभी पका हुआ प्रसाद को स्वीकार करें। श्रीवैष्णवों ने प्रसाद ग्रहण करने से मनाकर दिया और कहा कि वें हर किसी से प्रसाद ग्रहण नहीं कर सकते। तुरन्त अम्माजी ने जवाब दिया कि वह स्वयं एम्पेरुमानार  की शिष्या हैं और सभी को विस्तार से बताया कि कुछ समय पहिले हीं श्रीरामानुज स्वामीजी ने उसे श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षा दी थी। उसने कहा “उन दिनों में जब श्रीरंगम में थी राजा और उनके मन्त्रीगण श्रीरामानुज स्वामीजी के पास आकर आर्शिवाद लेते थे। परन्तु वों प्रतिदिन भिक्षा लेने जाते थे।” मैंने स्वामीजी से पूछा “इतना अन्तविरोध क्यों है?” और स्वामीजी ने कहा “जब मैं भिक्षा के लिये जाता हूँ तो उन्हें भगवान के विषय में ज्ञान देता हूँ”। मैंने स्वामीजी से प्रार्थना की कि मुझे भी ऐसा उपदेश प्रदान करें और तब उन्होंने मुझे श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की दीक्षा दी। जब हमें अपने गाँव को वापिस आना था तो मैंने स्वामीजी से उनका आर्शिवाद मांगा तब उन्होंने अपनी पवित्र चरण पादुका दे दी। हम फिर यहाँ आ गये। यह सभी सुनकर एम्पेरुमानार (अपनी पहचान बताये बिना) सभी श्रीवैष्णवों को उसके द्वारा बनाये प्रसाद को पाने को कहा। परन्तु एक श्रीवैष्णव को उन्होंने उसके क्रिया कलापों पर नजर रखने को कहा। उसने खाना बनाने के बाद पूजा घर में जाकर कोइलाल्वार (भगवान) को भोग लगाकर ध्यान में बैठ गई। श्रीवैष्णव ने देखा कि वहाँ भगवान की तरह कोई मूर्ति है लेकिन वह सामान्य मूर्ति की तरह नहीं दीखती है। उसने श्रीरामानुज स्वामीजी को पूर्ण वृतान्त बताया। एम्पेरुमानार ने तब उस ब्राह्मण पत्नी से पूछा “आप अन्दर क्या कर रही थी?”। उसने जवाब दिया “मैंने ध्यान लगाकर अपनी प्रार्थना श्री रामानुज स्वामीजी द्वारा दी गई चरण पादुका से की और उन्हें भोग लगाया”। उन्होंने उन पादुका को बाहर लाने को कहा और उसने वैसे हीं किया। उन्होंने महसूस किया कि यह उनकी हीं चरण पादुका हैं। तब उन्होंने उससे पूछा कि “क्या तुम्हें पता हैं एम्पेरुमानार यहाँ हैं?” और उसने दीपक लगाकर सभी के चरणारविंदों का निरीक्षण किया। जब उसने एम्पेरुमानार के पवित्र चरणों को देखा तब वह खुशी से अचम्बित हो गयी और कहा “यह एम्पेरुमानार के पवित्र चरणों के समान हैं परन्तु क्योंकि आप सफेद पोषाक धारण किये हो मैं आपको पहचान न सकी”। तब एम्पेरुमानार ने अपना सही परिचय दिया और उससे उनकी आज्ञा को पुन: सुनाने को कहा। उसने खुशी से कहा और उसके पश्चात एम्पेरुमानार सभी को प्रसाद पाने कि आज्ञा प्रदान किये। वों स्वयं नहीं पाते हैं क्योंकि वह भगवान को अर्पण नहीं किया हुआ था। तब उसने स्वामीजी को फल, दूध और शक्कर दिया और उसे स्वामीजी ने अपने भगवान को अर्पण कर स्वयं ग्रहण किया। फिर उसने श्रीवैष्णवों के पाने के बाद जो शेष प्रसाद बचा था उसे इकट्ठा कर अपने पती को देती हैं लेकिन स्वयं नहीं पाती हैं। इस पर उसके पती ने उससे पूछा कि ऐसा क्यों तब वह कहती हैं “आपने एम्पेरुमानार को अपने आचार्य रूप में स्वीकार नहीं किया। वों इतनी दूर से हमारे तिरुमाली में पधारे हैं। केवल अगर आप उनको स्वीकार करने का वचन देते हो तो मैं प्रसाद ग्रहण करूँगी”। वों मान जाता हैं और वह प्रसाद पाती हैं। प्रात: काल वह ब्राह्मण एम्पेरुमानार के पास जाकर उनके शरण हो जाता हैं। एम्पेरुमानार उसे निर्देश देते हैं और शिष्य रूप में स्वीकार करते हैं। एम्पेरुमानार फिर काषाय वस्त्र धारण कर और त्रीदण्ड लेकर वहीं कुछ दिनों तक निवास कर फिर पश्चिम कि ओर यात्रा प्रारम्भ करते हैं।

वों सालग्राम पहुँचते हैं जहाँ जैन और बौद्ध अधीक संख्या में रहते हैं और एम्पेरुमानार कि ओर ध्यान नहीं देते थे। उन्होंने श्रीदाशरथी स्वामीजी को आज्ञा दिये कि गाँव के तालाब पर जाकर अपने पवित्र चरणों को तालाब के जल से धोकर जल को पवित्र करें और जिसने भी वह पवित्र जल को ग्रहण किया वह एम्पेरुमानार की ओर आकर्षित हो गया। श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी ने  एम्पेरुमानार को हीं अपना सर्वस्व मान लिया और आगे जाकर आचार्य निष्ठा के एक महान अदाहरण हो गये। वहाँ से एम्पेरुमानार तोण्डनूर आकर वहाँ विट्ठल देव राय (उस क्षेत्र के राजा) कि बेटी को एक राक्षस से मुक्त किया। वह राजा और उसके परिवार एम्पेरुमानार के शिष्य बन गये और एम्पेरुमानार ने राजा को विष्णु वर्धन राय नाम दिया। यह घटना को सुनकर १२००० जैन विद्वान एम्पेरुमानार से वाद विवाद करने आगये और एम्पेरुमानार ने एक हीं समय उन सभी से वाद विवाद कर और उनके मध्य में एक पर्दा लगाते हैं। पर्दे के पीछे उन्होंने अपना वास्तविक हजार फणों वाले आदिशेष का रूप धारण करके सभी के सवालों का एक साथ जवाब दिया। परास्त हुये कई विद्वान एम्पेरुमानार के शिष्य बन गये और वों उन्हें अपनी महिमा बताते हैं। राजा भी एम्पेरुमानार का गुणगान करता हैं।

इस तरह एम्पेरुमानार तोण्डनूर में निवास करते समय उनका तिरुमण (तिलक करने का पासा) समाप्त हो गया और वें दु:खी हो गये। जब वें विश्राम कर रहे थे श्रीसम्पतकुमार भगवान उनके स्वप्न में आकर कहते हैं “मैं आपक मेलकोटे में इंतजार कर रहा हूँ। यहाँ तिरुमण भी हैं”। राजा के सहायता से एम्पेरुमानार मेलकोटे पधारते हैं और भगवान कि पूजा के लिये जाते हैं। परन्तु दु:खी होकर देखते हैं कि यहाँ तो कोई मन्दिर हीं नहीं हैं। थकावट के कारण वों कुछ समय के लिये विश्राम करते हैं और भगवान फिर से उनके स्वप्न में आकर अपना सही स्थान बताते हैं जहाँ उनको जमीन में रखा गया हैं। एम्पेरुमानार फिर भगवान को जमीन में से बाहर लाकर भगवान को श्रीसहस्रागीति का श्लोक निवेदन करते हैं जिसमें श्रीशठकोप स्वामीजी ने श्रीसम्पतकुमार भगवान के गुणों का वर्णन किया हैं। वहीं उन्हें तिरुमण मिट्टी प्राप्त होती हैं जिससे वों अपने शरीर पर द्वादश तिलक धारण करते हैं। बाद में एम्पेरुमानार पूरे नगर को साफ कर और मन्दिर क पुन: निर्माण करते हैं और भगवान कि सेवा कैंकर्य के लिये कई सेवको की व्यवस्था करते हैं।

उत्सव विग्रह कि कमी के कारण वहाँ उत्सव मनाना बहुत कठीन था। जब एम्पेरुमानार इस विषय पर चिन्तित थे तब भगवान फिर एक बार एम्पेरुमानार स्वप्न में आकर कहते हैं “रामप्रियन (उत्सव मूर्ति) दिल्ली के बादशाह के राजमहल में हैं”। एम्पेरुमानार उसी समय दिल्ली के लिये रवाना होते हैं और राजा से विग्रह को देने को कहते हैं। राजा एम्पेरुमानार को अपनी पुत्री के अंतरंग कक्ष में लाकर विग्रह दिखाते हैं। राजा कि पुत्री को उस विग्रह से बहुत लगाव था और उस विग्रह से बहुत प्रेम भी करती थी। भगवान को देख एम्पेरुमानार बहुत आनंदित हो गये और उस विग्रह को बाहर बुलाते हैं “शेल्वपिल्लै यहाँ आइये”। भगवान उसी समय कूदकर बाहर आकर एम्पेरुमानार के गोद में बैठ गये। यह देखकर राजा बहुत आश्चर्य चकित हुआ और बहुत आभूषण सहित भगवान को एम्पेरुमानार के साथ भेज दिया। राजकुमारी को भगवान कि जुदाई से बहुत दु:ख हुआ और वह एम्पेरुमानार के पीछे पीछे चली जाती हैं। श्रीतिरुनारायणपुरम की सीमा के नजदीक आने पर जिस तरह श्रीगोदाम्बाजी को अपने में समा लेते हैं उसी तरह भगवान ने राजकुमारी को भी अपने में समा लिया। भगवान उन्हें तुलुक्का नाचियार नाम रख और उनकी प्राण प्रतिष्ठा भगवान के चरणकमलों में करते हैं। उसके बाद गर्भगृह में उत्सव विग्रह कि प्रतिष्ठापना कर और वहाँ सभी उत्सव मनाते हैं।

श्रीरंगम में वापसी

इस तरह एम्पेरुमानार ने श्रीतिरुनारायणपुरम में १२ वर्ष तक निवास कर भगवान की कई तरह से कैंकर्य करते हुये कई श्रीवैष्णवों को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में विकसित कर लालन पालन किया। वें श्रीरंगम से मारुती सिरियाण्डान के द्वारा समाचार पाते हैं कि शैव राजा का देहान्त हो गया हैं जिससे वें बहुत आनंदित हुये। वों श्रीरंगम वापिस जाने का विचार करते हैं। उनके शिष्य स्वामीजी के श्रीरंगम लौटने के समाचार से दु:ख रूपी समुद्र में डूब जाते हैं। एम्पेरुमानार उन्हें सांत्वना देते हैं और समझाते हैं और उनकी इच्छा पूर्ति के लिये अपने स्वयं की एक विग्रह वहाँ स्थापना करने को मान जाते हैं। यह वहीं प्रसिद्ध विग्रह हैं जो “तामर उगन्ध तिरुमेनी” नाम से जानी जाती हैं। फिर वों श्रीतिरुनारायणपुरम को छोड़ श्रीरंगम पहुँचते हैं। वों श्रीरंगनायकि अम्माजी और श्रीरंगनाथ भगवान का मंगलाशासन कर श्रीरंगम से हीं अपने सम्प्रदाय का पोषण करते हैं।

श्रीरंगम में श्रीरंगनाथ भगवान का मंगलाशासन कर स्वामीजी मन्दिर का भ्रमण कर अन्य श्रीवैष्णवों के साथ श्रीकुरेश स्वामीजी के तिरुमाली पहुँचते हैं। श्रीकुरेश स्वामीजी पूर्ण भक्ति के साथ एम्पेरुमानार के चरण कमलों में गिर जाते हैं। दिव्य चरण कमलों को पकड़कर वहीं रुक जाते हैं। एम्पेरुमानार उन्हें उठाते हुए उनका अत्याधिक तीव्र भावना से आलिंगन कर अत्यन्त दु:खी होकर श्रीकुरेश स्वामीजी की ओर देखकर जिन्होंने अपने नेत्र गंवा दिये थे अचम्बित हो गये। नेत्रों में आँसू भरकर अपने लड़खड़ाती वाणी से श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीकुरेश स्वामीजी से कहते हैं “अपने सम्प्रदाय के लिये आप ने अपने नेत्र को गंवा दिये हैं” तब श्रीकुरेश स्वामीजी  विनम्रता से उत्तर दिया कि “यह केवल मेरे अपचारों का परिणाम हीं हैं” और एम्पेरुमानार सांत्वना देकर कहते हैं “आप कैसे कोई अपचार कर सकते हो? यह मेरे अपचार का परिणाम हैं जिसके लिये यह हुआ”। अन्त में सभी एक दूसरे को स्थिर करते हैं और उडयवर अपने मठ को लौटते हैं।

इस समय कुछ श्रीवैष्णव उडयवर के पास आकर यह सूचना देते हैं कि तिरुच्चित्रकूतम (जिसे अब चिदम्बरम नाम से जाने जाते है) का मन्दिर शैवों ने ध्वंस कर दिया हैं। उन्हें यह पता चला कि उत्सव विग्रह को सुरक्षता से तिरुपती लाया गया हैं। उसी समय वें तिरुपती चले गये और वहाँ श्रीगोविन्दराज भगवान का मन्दिर बनवाने का आदेश दिया और तिरुच्चित्रकूतम के श्रीगोविन्दराज भगवान की हूबहू मूर्ति बनवाकर उनकी प्राणप्रतिष्ठा करवाते हैं। वहाँ से तिरुमला जाकर श्रीवेंकटेश भगवान का मंगलाशासन कर श्रीरंगम कि ओर यात्रा प्रारम्भ करते हैं। राह में कांचीपुरम में श्रीवरदराज भगवान का मंगलाशासन कर श्रीरंगम लौटते हैं। उडयवर श्रीरंगम से हीं सम्प्रदाय के कैंकर्य में अग्रसर रहते हैं।

कुछ समय बाद उडयवर श्रीकुरेश स्वामीजी को बुलाकर श्रीवरदराज भगवान कि स्तुति करने को कहते हैं जो उनकी सभी प्रार्थना पूर्ण करते हैं और उन्हें आज्ञा देते हैं कि श्रीवरदराज भगवान से अपनी दृष्टी वापिस मांगे। श्रीकुरेश स्वामीजी हिचकिचाते हैं परन्तु उडयवर उन्हें ज़बरदस्ती ऐसा करने को कहते हैं। श्रीकुरेश स्वामीजी वरदराज स्तवं की रचना कर अन्त में प्रार्थना करते हैं कि वें भगवान को अपने आन्तरिक दृष्टी से देख सके। भगवान खुशी से उनकी यह इच्छा पूर्ण करते हैं और श्रीकुरेश स्वामीजी उडयवर को यह समझाते हैं। उडयवर इससे संतुष्ट नहीं होते हैं और श्रीकुरेश स्वामीजी को कांचीपुरम साथ लाकर श्रीवरदराज भगवान के समक्ष श्रीवरदराज स्तवम को पुन: पठन करने को कहे। उडयवर अन्य दूसरे कैंकर्य के लिये चले जाते हैं और तब तक श्रीकुरेश स्वामीजी स्तुति कर देते हैं। श्रीवरदराज भगवान श्रीकुरेश स्वामीजी से उनकी इच्छा पूछते को कहते हैं और श्रीकुरेश स्वामीजी कहते हैं “नालूरान को भी वहीं लक्ष्य प्राप्त हो जो मुझे प्राप्त होगा” और श्रीवरदराज भगवान मान जाते हैं। उडयवर वापिस आते हैं और यह सुनते हैं तो श्रीवरदराज भगवान और श्रीकुरेश स्वामीजी से नाराज हो जाते हैं और दोनों पर उनकी इच्छा न पूर्ण करने के लिये क्रोधित हो जाते हैं। तब श्रीवरदराज भगवान श्रीकुरेश स्वामीजी को आर्शिवाद प्रदान करते हैं जिससे वह श्रीवरदराज भगवान और उडयवर का दर्शन कर सके। श्रीकुरेश स्वामीजी के इस आर्शिवाद से श्रीवरदराज भगवान का दिव्य शृंगार, गहने आदि का दर्शन कर उडयवर को बताते हैं और इससे उडयवर को संतुष्टी हुई।

कोइल अण्णर होना (गोदाग्रज बनना)

जब उडयवर नाचियार तिरुमोझी पर प्रवचन दे रहे थे तब उन्होंने “नारु नरूम पोझील” पाशुर का अर्थ समझा रहे थे जहाँ श्रीगोदम्बाजी इच्छा प्रगट करती हैं कि वह श्रीसुन्दरबाहु भगवान को १०० घड़े क्षीरान और १०० घड़े माखन का भोग लगाये। उडयवर तुरन्त तिरुमालीरूंशोले दिव्य देश कि ओर अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं और श्रीगोदम्बाजी कि इच्छानुसार भोग निवेदन करते हैं। वहाँ से वें श्रीविल्लिपुत्तुर पधारकर श्रीगोदम्बाजी और श्रीरंगनाथ भगवान का मंगलाशासन करते हैं। उडयवर के इस कार्य से श्रीगोदम्बाजी बहुत प्रसन्न होकर कहती हैं यह कार्य एक भाई हीं कर सकता हैं और आनंदित होकर श्रीरंगम से मेरा बड़ा भाई (“नम कोइल अण्णर”) कहती हैं। वहाँ से वें आलवारतिरुनगरी में आकर श्रीशठकोप स्वामीजी और आदिनाथ भगवान का मंगलाशासन कर श्रीरंगम लौटते हैं और श्रीसम्प्रदाय का कैंकर्य सुचारु रूप से करते हैं।

श्रीरामानुज स्वामीजी के शिष्य

उनके कई शिष्य थे और उन्होंने ७४ सिंहाधिपती (आचार्य जो सम्प्रदाय को आगे लेकर जायेंगे और उसके तत्त्वों को सभी को सीखायेंगे) कि स्थापना भी किए। उनके समय कई श्रीवैष्णव कई कैंकर्य में निरत थे।

  • श्रीकुरेश स्वामीजी, श्रीदाशरथी स्वामीजी, श्रीनदाधूर स्वामीजी, श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी, आदि श्रीभाष्य का प्रचार करने में सहयोग करते थे।
  • श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के निजी अर्चाविग्रह का तिरुवाराधन करते थे।
  • श्रीप्रणतार्तिहराचार्य और उनके अनुज रसोई कि व्यवस्था संभालते थे।
  • श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के उपयोग में आनेवाला तेल को बनाते थे।
  • श्रीगोमठवंशावतंश श्रीबालाचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी के पात्र और चरणपादुका को साथ लेकर चलते थे।
  • श्रीधनुर्दासस्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के आभूषण, आदि कि व्यवस्था देखते थे।
  • श्रीअमंगी स्वामीजी के लिये दूध कि सेवा करते और श्रीउत्कलाचार्य प्रसाद वितरण में सहायता करते थे।
  • श्रीउक्कलम्माल स्वामीजी के लिये पंखी सेवा कैंकर्य करते थे।
  • श्रीमारुतीप पेरियाण्डान स्वामीजी के छोटे पात्रों को सम्मालते थे।
  • श्रीउत्कल वरदाचार्य मठ के लिये किराना की व्यवस्था करते थे।
  • श्रीतूय मुनि वेझम स्वामीजी के लिये पवित्र जल लाने की सेवा करते थे।
  • श्रीतिरुवरंगामालिगैयार मठ के भण्डार की व्यवस्था करते थे।
  • चण्ड और शुण्ड (श्रीधनुर्दासस्वामीजी के भतीजे) राज दरबार में राजा कि सेवा कर और वही धन मठ के सेवा रूप में दे देते।
  • श्रीइरामानुस वेलैक्कार्र श्रीरामानुज स्वामीजी के अंगरक्षक कि सेवा करते थे।
  • श्रीअगलंगा नात्ताझ्वान अन्य विद्वानों से वाद विवाद करते थे।

उनकी महिमा को कइयों ने बताया

श्रीरामानुज स्वामीजी कि महिमा को श्रीरंगनाथ भगवान, श्रीवेंकटेश भगवान, श्रीवरदराज भगवान, श्रीसम्पतकुमार भगवान, श्रीअझगर, तिरुक्कुरुंगुड़ी नम्बी, श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीनाथमुनि स्वामीजी, श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी, श्रीमहापूर्ण स्वामीजी, श्रीगोष्टीपूर्ण स्वामीजी, श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी, श्रीमालाकार स्वामीजी, श्रीवररंगाचार्य स्वामीजी, उनके कई शिष्य, ब्रह्म राक्षस और मूक व्यक्ति ने बताया हैं।

इसे हम अब संक्षेप में देखेंगे।

  • श्रीरंगनाथ भगवान (श्रीरंगम) ने श्रीरामानुज स्वामीजी को दोनों (अध्यात्मिक और भौतिक) संसार का प्रदान बनाया और जिसे अपने अनुयायी को बाँटने की पूरी छूट दिये।
  • श्रीवेंकटेश भगवान (तिरुमला तिरुपती) ने श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीरंगनाथ भगवान द्वारा श्रीरामानुज स्वामीजी को प्रदान की गई उपाधि को फिर से स्थापित कर उन्हें “उडयवर” कहा। श्रीरामानुज स्वामीजी ने तुम्बैयूर्क कोण्डी जो श्रीरामानुज स्वामीजी की आज्ञा से दही बेचती थी को मोक्ष प्रदान किया।
  • श्रीवरदराज भगवान (कांचीपुरम) श्रीरामानुज स्वामीजी को श्रीयज्ञमूर्ति को परास्त करने में सहायत की और श्रीयादवप्रकाश (जो पहिले दूसरे सिद्धान्त के थे और श्रीरामानुज स्वामीजी उनके शिष्य थे) को उडयवर का शिष्य बनकर सन्यासाश्रम ग्रहण करने की आज्ञा दिये।
  • श्रीसम्पत कुमार भगवान उडयवर को मेलकोटे को एक दिव्य क्षेत्र बनाने दिया आर उनके प्रिय पुत्र बनकर श्री सेल्वाप पिल्लै (उत्सव मूर्ति) को पहचान कर आलिंगन करने दिया।
  • श्रीअळगर (तिरुमालीरुंचोलै) श्रीरामानुज स्वामीजी की महानता को दो प्रसंगों से उजागर करते हैं। एक बार भगवान ने कहा कि श्रीरामानुज स्वामीजी के जीतने भी आत्मीय हैं वें मेरे सन्निधी में आये। सभी श्रीवैष्णव आये किन्तु श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के परिजन नहीं आये। भगवान ने जब नहीं आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि आप ने श्रीरामानुज स्वामीजी के आत्मीय शिष्यों को बुलाया है, लेकिन हम तो नीच (अनाहुत) हैं। तब भगवान ने कहा कि आप भी गुरु परम्परा में हीं हैं। और श्रीकिदाम्बी आच्छान से कहा कि जो लोग श्रीरामानुज स्वामीजी के शरण में आते हैं वें कभी अनाथ नहीं होते हैं।
  • श्रीतिरुक्कुरुंगुड़ी नम्बी ने श्रीरामानुज स्वामीजी को आचार्य रूप में स्वीकार किया और श्रीवैष्णव नम्बी के नाम से प्रसिद्ध हो गये।
  • श्रीशठकोप स्वामीजी इस संसार में दु:खी जनों को देख बहुत दु:खी हो गये परन्तु जब उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी का प्रार्दुभाव का पूर्वानुभाव किया तो खुशी से “पोलिग! पोलिग! पोलिग!” गाया।
  • श्रीनाथमुनि स्वामीजी ने कहा “यदि हम शिक्षा देंगे तो कुछ लोगों को सहायता होगी लेकिन अगर श्रीरामानुज स्वामीजी शिक्षा देते हैं तो सभी को फायदा होगा जैसे वीर नारायणपुरम का तालाब गाँव में सभी को फायदा देता हैं”।
  • श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को “आम मूधल्वन” (अपने सम्प्रदाय के योग्य आचार्य) घोषित करते हैं।
  • श्रीमहापूर्ण स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी को उनकी महानता को देख साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया हालाकि दोनों में आचार्य शिष्य सम्बन्ध था।
  • श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने उन्हें “एम्पेरूमानार” (भगवान से बड़े) कि उपाधि दी जब उन्हें ज्ञात हुआ कि रामानुज स्वामीजी ने गोपनीय मन्त्रार्थ को जिन्हे सीखने कि इच्छा हैं उन सभी को बताया।
  • श्रीमालाधर स्वामीजी का श्रीरामानुज स्वामीजी के साथ कुछ मतभेद था। एक बार उन्हें एम्पेरूमानार कि महानता का अहसास हुआ तो उन्होंने उनकी बहुत प्रशंसा की और उनके पुत्र को एम्पेरूमानार का शिष्य बनने कि आज्ञा दिये।
  • श्रीमालाकार स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी को “आचार्य अभिमान” के विषय में गोपनीय शिक्षार्थ विषयों के बारे में समझाया और अपने पुत्र को श्रीरामानुज स्वामीजी का शिष्य बनने कि आज्ञा दिये।
  • उडयवर के शिष्यों ने स्वामीजी के चरण कमलों में शरणागति की और उन्हें हीं उपाय और उपेय माना।
  • श्रीरंगामृत स्वामीजी ने रामानुज नूत्तन्दादि कि रचना किये जो बाद में ४००० दिव्य प्रबन्ध पाठों का एक विशेष अंग बन गया हैं।
  • राजकुमारी के शरीर में जो ब्रह्म राक्षस था उसने श्रीयादवप्रकाशाचार्य की ओर ध्यान न देकर श्रीरामानुज स्वामीजी को नित्यसुरीयों का मुखिया बताया।
  • एक गुंगा जिस पर उडयवर ने कृपा कि और जो कई वर्षो तक अंर्तध्यान हो गया, कई वर्षों के पश्चात आकर कहा “उडयवर और कोई नहीं स्वयं विश्वक्सेन भगवान हैं”। वों फिर अंर्तध्यान हो गया।
  • इस तरह कई महान हस्तियों ने श्रीरामानुज स्वामीजी कि महानता को उजागर किया हैं।

श्रीनाथमुनि स्वामीजी से लेकर कई आचार्य हैं, उडयवर विशेष महान क्यों हैं? क्योंकि –

  • हालाकि कई अवतार हुये जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण विशेष माने जाते हैं – उन्होंने लोगों को शरण देना, गीता, आदि का उपदेश दिया हैं।
  • हालाकि कई दिव्यदेश हैं लेकिन श्रीरंगम, तिरुपती, कांचीपुरम और मेलकोटे को विशेष स्थान है क्योंकि वहाँ श्रीरामानुज स्वामीजी के साथ विशेष सम्बन्ध हैं।
  • हालाकि कई सन्त हुए है जैसे वेद व्यास, पराशर, सौनका, शुख, नारद भगवान, आदि हुये सभी विशेष हैं क्योंकि वेदों, वेदान्त, पुराण और इतिहास आदि का प्रकाशन किया हैं।
  • हालाकि कई आल्वार हुये है लेकिन श्रीशठकोप स्वामीजी विशेष हैं क्योंकि उन्होंने सत्य, सिद्धांत, आदि का प्रकाशन किया हैं।
  • उसी तरह उडयवर विशेष हैं क्योंकि उन्होंने इन सभी पहलू पर अपना योगदान देकर अपने सिद्धान्तों और सम्प्रदाय को एक मजबूत नींव प्रदान की हैं। आगे सम्प्रदाय की उन्नती कि राह स्पष्ट कर दिये हैं।

उनके जीवन के अन्तिम दिन

उड़यवर के सभी शिष्य उनके आचार्य निष्ठा के कारण अपने आचार्य के चरण कमलों के प्रति विश्वसनीय थे और क्योंकि एम्पेरूमानार श्रीशठकोप स्वामीजी के हीं चरण कमल है और श्रीशठकोप स्वामीजी ने स्वयं श्रीसहस्रगीति के “पोलिग पोलिग पोलिग” के पाशुर में एम्पेरूमानार के अवतार होने कि घोषणा किये थे। और उड़यवर को श्रीशठकोप स्वामीजी का हीं शिष्य माना गया है क्योंकि उन्होंने आल्वार के श्रीसहस्रगीति के अनुसार हीं हमारे सम्प्रदाय कि स्थापना किये है। उन्हें श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी का भी शिष्य माना जाता हैम क्योंकि उन्होंने श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के हृदय कि बात को स्पष्ट रूप से समझा था और उनकी इच्छा को पूर्ण भी किये हालाकि वों दोनों एक दूसरे से सभी भी नहीं मिले थे।

जब उड़यवर श्रीरामायण से शरणागति के तत्त्व को श्रीविभीषण शरणागति कि घटना को समझा रहे थे तो पिल्लै उरंगा विल्ली धासर स्वामीजी व्याकुल हो गये। उड़यवर ने यह देखा और धासर से पूंछा आप इतने परेशानी में क्यों है। धासर ने कहा “अगर विभीषण जो सब कुछ त्याग कर भगवान राम के शरण में आया उसे भी स्वीकार करने से पूर्व रुकाया गया तो हमारी क्या गति हैं? क्या हमें मोक्ष मिलेगा?”। उड़यवर उत्तर देते हैं “सुनो पुत्र! अगर मुझे मोक्ष कि प्राप्ति होगी तो तुम्हें भी होगी; अगर श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को होगी तो मुझे भी होगी; अगर श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी को होगी तो श्रीमहापूर्ण स्वामीजी को भी होगी और यह सिलसिला श्रीशठकोप स्वामीजी तक चलेगा क्योंकि उन्होंने श्रीसहस्रगीति में स्वयं को मोक्ष प्राप्त होने कि घोषणा कर चुके थे” और धासर को शान्त करते हैं।

दिव्य प्रबन्ध श्रीरामानुज नूत्तन्दादि में श्रीअमूधनार ने यह स्थापित किया कि हमें मोक्ष केवल एम्पेरूमानार हीं प्रदान कर सकते है और उनकी और उनके भक्तों कि सेवा करना हमारे जीवन का एक मात्र लक्ष्य हैं।

श्रीदाशरथी स्वामीजी एम्पेरूमानार से उनकी एक प्रतिमा बनाने के लिये प्रार्थना करते हैं जिसे उनके जन्म स्थान भूतपूरी में प्रतिष्ठापन करेंगे ताकि भविष्य में भी सभी उनकी पूजा कर सकेंगे। एम्पेरूमानार से आज्ञा प्राप्त होने के पश्चात एक सुन्दर प्रतिमा एक भक्त शिल्पकार द्वारा बनायी गई। श्रीरंगम में एम्पेरूमानार के पूर्ण संतुष्टी होने तक प्रतिमा बनायी गयी जिसे उन्होनें छाती से लगाया और भूतपूरी भेजा जिसे गुरु पुष्य के दिन प्रतिष्ठापना किया गया।

श्रीरामानुज स्वामीजी इस तरह आनंद दायक जीवन १२० वर्ष तक बिताये। वों इस संसार को छोड़ नित्यसूरीयों के सात परलौकिक संसार जाने कि हठ किये। वों श्रीरंगनायकि अम्माजी के माध्यम से श्रीरंगनाथ भगवान के पास जाते हैं और गध्यत्रय का अनुसन्धान करते है और श्रीरंगनाथ भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें तुरन्त इस संसार के बन्धन से मुक्त कर दे। श्रीरंगनाथ भगवान फिर एम्पेरूमानार को आज से ७वें दिन इस संसार से मुक्त करने कि स्वीकृति प्रदान करते हैं और यह बात उन्हें सूचित करते हैं। एम्पेरूमानार श्रीरंगनाथ भगवान से एक विणति करते हैं कि “सभी जन जो भी मुझसे कैसे भी जुड़ा है उसे आप मुझे जो लाभ प्रदान करेंगे वों हीं लाभ देंगे” और भगवान खुशी से मान जाते हैं। उडयवर श्रीरंगनाथ भगवान से विदा लेकर शानदार ढंग से बाहर आकर और मठ पहुँचते हैं। इसके बाद ३ दिनों तक अपने शिष्यों पर सुन्दर अर्थों कि बारीश करते हैं और वें सब विस्मित हो जाते है कि “क्यों स्वामीजी तुरन्त इतने सुन्दर दिशा निर्देश हम सब को दे रहे हैं?”। इस रहस्य को ओर अधिक गुप्त न रख एम्पेरूमानार दयापूर्वक कहते है कि “मैं आज से ४ते दिन परमपद कि ओर प्रस्थान का विचार कर रहा हूँ और भगवान ने भी इसकी स्वीकृति दे दिये हैं”। यह सुनते हीं शिष्यगण सभी टूट जाते हैं और जैसे हीं उडयवर उन्हें छोड़ चले जायेंगे वों भी इस संसार को छोड़ देंगे। उडयवर कहते हैं “अगर आप ऐसे करोगे तो आप मुझसे सम्बंधित नहीं रहोगे और इसलिये आप ऐसा नहीं कर सकते हो” और उन्हें सांत्वना दिते  है।

फिर से एम्पेरूमानार सभी को बहुमूल्य दिशा निर्देश प्रदान करते हैं और अपने कई शिष्यों को कई कार्यों के लिये नियुक्त किये। उन्होंने सभी को श्रीकुरेश स्वामीजी के प्रिय पुत्र श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को पूर्ण सहयोग देने कि आज्ञा किये। वों फिर उनसे जो भी गलती हुई हो उसके लिये क्षमा याचना मांगे और फिर अपनी अन्तिम निर्देश दिये। वों मुख्यता कहते है कि एक दूसरे के गुणों कि सराहना करें और भाई कि तरह एक दूसरे से हाथ मिलाकर कार्य करें। वों सभी को कैंकर्य पर ध्यान देने को कहते हैं नाकी कार्य के बदले में कुछ पाने कि इच्छा रखना। वों श्रीवैष्णवों कि ओर वैर भावना न करना और सांसारिक जनों कि स्तुति न करने का महत्त्व दर्शाते हैं।

श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को श्रीरंगनाथ भगवान कि सन्निधी में लाकर तीर्थ और अन्य सम्मान प्रदान कर अन्य को कहते है कि मेरे पश्चात श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी हीं सम्प्रदाय को आगे लेकर जायेंगे। वों श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को आज्ञा देते है कि मेलुकोटे जाकर वेदान्त को सुधारे (जो आगे जाकर नञ्जीयर (श्रीवेदांती स्वामीजी) के नाम से प्रचलित हुए)। बड़े आचार्य होने के कारण शिष्य भट्टर उनके सात रहने कि आग्ना देते हैं।

परमपद प्रस्थान करने के दिन वों अपना नित्यानुष्ठान कर्म करते हैं जैसे स्नान करना, १२ ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण किया, संध्यावन्दन आदि, अपने भगवान का तिरुवाराधन किया, गुरुपरम्परा का स्मरण किया, पद्मासन में विराजमान हो गये, परवासुदेव पर ध्यान केन्द्रीत किया और श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के पवित्र रूप को स्मरण किया, लेटकर, अपनी आँखे खोल, अपना सिर श्रीगोविन्दाचार्य स्वामीजी के गोद में रखा और अपने पवित्र चरणों को श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के गोद में रखकर दीप्तिमान रूप जो आदिशेष रूप में था परमपद के लिये प्रस्थान किये। यह देख उनके सभी शिष्य जमीन पर गिर गये जैसे बिना जड़ के पेड़, और रोने लगे। कुछ समय बाद स्वयं को सान्त्वना दिया। श्रीरंगनाथ भगवान उनकी कमी (और परमपदनाथ के लाभ) को जानकार उदास हो गये और पान ताम्बूल पाने से इन्कार कर दिया। वों फिर अपने सभी सामाग्री को उत्तम नम्भी के जरिये भेजते हैं। मठ में एम्पेरुमानार के विमला चरम तिरुमेनी को स्नान कराया गया, १२ ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाया गया और सभी उपचार जैसे दीप, धूप, आदि अर्पण किया गया। पिल्लान जो एम्पेरुमानार का अभिमान पुत्र था अन्तिम पवित्र क्रिया को किये। श्रीरंगम के श्रीवैष्णव इस अन्तिम यात्रा को बड़े धूम से करते है और उपनिषद, दिव्य प्रबन्ध का अनुसन्धान करते हैं, बाजा और वाध्य भी बजाते हैं, अरैयर सेवा, स्तोत्र का अनुसन्धान, पुष्प और बुने हुए चावल को गलियों के राह पर फेंका जहाँ से अन्तिम यात्रा होनी हैं। श्रीरंगनाथ भगवान की आज्ञानुसार एम्पेरुमानार को श्रीरंगनाथ भगवान के वसंत मण्डप में यति संस्कार विधि से रखा गया। फिर श्रीदाशरथी स्वामीजी श्रीरंगनाथ भगवान कि आज्ञानुसार एम्पेरुमनार कि विशेष विग्रह को ऊपर जलाते हैं।

फिर कई श्रीवैष्णवों को यह दु:ख का समाचार प्राप्त हुआ और उन्हें बहुत पीड़ा हुई। कुछ तो यह सुनते हीं उनसे बिछड़ना सहन न कर अपने प्राणों का त्याग दिये। जो श्रीरंगम आये श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी को देख आनंदित हो गये।

इस तरह एम्पेरुमानार सभी के उज्जीवन के लिये अपना जीवन व्यतित किया। कोई भगवान कि किर्ति को समझा सकता हैं परन्तु एम्पेरुमानार कि किर्ति को कोई नहीं समझा सकता हैं। एम्पेरुमानार के सहस्राब्दी उत्सव  में रहकर हमने उनके जीवन और स्तुति का अनुभव किया हैं। यह अनुभव हमारे हृदय में निरन्तर रहे और अपने आलवर और आचार्य के इच्छानुसार रामानुज दास बनकर रहे।

श्रीमन महाभूतपुरे श्रीमत केशव यज्वन:
कान्तीमध्याम प्रसूधाय यतिराजाय मंगलम:  

श्रीमते रम्यजामातृ मुनीन्द्राय महात्मने
श्रीरंगवासिने भूयान्नित्य श्री नित्य मंगलम

अडियेन सपना राजेन्द्र लड्डा रामानुज दासि
अडियेन रघुनाथ रांदड रामानुज दासन्

आधार – http://ponnadi.blogspot.com/2017/04/sri-ramanuja-vaibhavam.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

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श्रीवैष्णव तिरुवाराधन प्राक्कथन

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

तिरुवाराधन

भगवान श्रीमन्नारायण अपनी निर्हेतुक कृपा से मंदिर, मठ, तिरुमाली में अर्चाविग्रह के रूप में अवतरित होते हैं। अर्चावतार तो भगवान की कृपा का अति उत्तम प्रकाशन है। विशेष रूप से हमारे तिरुमाली में विराजमान भगवान ही अति सुलभ हैं और उनकी सेवा अत्यंत सहज है। शास्त्र के नियमों के अनुसार भगवान की सेवा करने के इस विधि को तिरुवाराधन कहते हैं।

यह श्रीवैष्णवों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है। भगवान जो घर में विराजमान हैं, उनका ठीक ठीक ध्यान अवश्य रखना चाहिए। हमें हमारे घर के भगवान के प्रति आदर और प्रेम होना चाहिए। तिरुवाराधन की महिमा, तिरुवाराधन का क्रम, और तिरुवाराधन के प्रमाण ई-बूक में प्रकाशित किए गए हैं, जिनमें सभी जानकारी एकसाथ उपलब्ध है।

जैसे हम आगे देखेंगे, हमारे पूर्वाचार्योंने तिरुवाराधन को बहुत बड़ा महत्त्व दिया है। आज की गतिमान दुनिया में अनेक लोगोंके पास समय का आभाव है। परंतु कितनी भी व्यस्तता हो, सभी कार्योंसे समय निकालकर हमे थोड़ा समय उन भगवान के ध्यान, सेवा में देना चाहिए जो अपनी उच्चतम निर्हेतुक कृपा के कारण हमारे घर में अवतरित हुये हैं। भगवान का अपनी कृपा से हमारे घर में विराजमान होना, इस भाग्य का हम कोई मूल्य नहीं कर सकते। भगवान का प्रतिदिन तिरुवाराधन (कमसे कम दिन में एक बार) करके उन्हे थोड़ा प्रेम और समय देना इससे भगवान के उपकार का बदला चुकानेका दूसरा कोई मार्ग नहीं है। बस वही प्रतिदिन निष्ठा से सेवा करना यही प्रपन्न (शरणागत) का सच्चा स्वरूप है।

इस ग्रंथ के लिए श्री वरवरमुनी स्वामीजी लिखित “जीयर पड़ी”, एवं कांची श्री उभय वेदान्त प्रतिवादी भयंकरम अण्णङ्गराचार्य स्वामीजी लिखित “नित्यानुष्ठान पद्धति” मुख्य संदर्भ ग्रंथ का उपयोग हुआ है। दास श्री एरुम्बी वेंकटेश स्वामीजी का भी कृतज्ञ है जिन्होने उपरोक्त स्रोतोंका उपयोग करके प्रमाणम् का प्रथम प्रारूप बनाया।

भगवान, आल्वार, आचार्य और अस्मदाचार्य की निर्हेतुक कृपा से दास यह ईबूक समस्त श्रीवैष्णव समुदाय के सेवा में प्रेषित कर रहा है।

तिरुवाराधन की महिमा

श्रीवैष्णवोंके घरोंमें नित्या तिरुवाराधन के महत्त्व को प्रकाशित करना का विनम्र प्रयास इस लेख में कर रहे हैं। तिरुवाराधन तथा संध्यावंदन आदि वैदिक अनुष्ठान का महत्त्व दिनों दिन श्रीवैष्णवोंके घरों में कम होता जा रहा है। श्रीवैष्णवोंके लिए उभय वेद (संस्कृत वेद तथा द्रविड वेद) उच्चतम प्रमाण हैं तथा भगवान एक मात्र ही उपेय हैं।

भगवान श्रीमन्नारायण अपनी निर्हेतुक कृपा से अपने आपको पाँच स्वरूप में विस्तारित करते हैं। पर (श्री वैकुंठ में), व्यूह (वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, संकर्षण, और क्षीराब्धिनाथ), विभव (श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि), अंतर्यामी (हृदयस्थ परमात्मा), और अर्चाविग्रह। भगवान के पाँच स्वरूप के पूर्ण विवरण के लिए http://ponnadi.blogspot.in/2012/10/archavathara-anubhavam-parathvadhi.html इस लिंक पर क्लिक करें। इन पाँच अवतारों में से अर्चावातार भगवान सबसे अत्यंत कृपालु हैं । अर्चावतारोंमें भी हमारे घर में विराजने वाले अर्चा भगवान सबसे अधिक कृपालु हैं । प्रत्येक श्रीवैष्णव का मुख्य कर्तव्य है की वह अपने घर के अर्चा भगवान की सेवा सुचारु रूप से करे।

श्रीवैष्णव बनते समय हम आचार्य से पंचसंस्कार (समाश्रयण) ग्रहण करते हैं। समाश्रयण का अर्थ है शुद्धिकरण प्रक्रिया – वह प्रक्रिया जिससे एक अनधिकृत व्यक्ति को भगवान की सेवा कैंकर्य करनेका अधिकारी बनाया जाता है।

https://srivaishnavagranthamshindi.files.wordpress.com/2017/09/df985-pancha-samskaram.jpg?w=405&h=462

श्री रामानुज स्वामीजी को पंच संस्कारित करते हुये श्री महापूर्ण स्वामीजी

हम पंचसंस्कार को निम्नलिखित  प्रमाण “ताप: पुण्ड्र: तथा नाम: मंत्रो यागश्च पंचम:” (अर्थार्थ  “ताप, पुण्ड्र:, नाम:, मंत्र, याग यह पाँच संस्कार हैं) समझते हैं । पंचसंस्कार के दौरान होने वाली पांच क्रियाएँ हैं:

ताप: बाहुमूल में तप्त शंख चक्र को अंकित किया जाता है।

पुण्ड्र: शरीर के १२ भागों पर पासा और श्रीचूर्ण द्वारा ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण कराया जाता है।

नाम: आचार्य द्वारा एक नया दास्य नाम दिया जाता है (उदा. रामानुजदास, मधुरकविदास, श्रीवैष्णवदास, ई.) जिससे हमारा भगवान/आचार्य के साथ संबंध स्थापित होता है।

मंत्र: आचार्य से परम गोपनीय मंत्र मंत्रोपदेश द्वारा प्राप्त होता है। इस मंत्र के जप से संसार बंधन से छुटकारा मिलता है। मंत्र तीन होते हैं: मूल मंत्र, द्वय मंत्र, और चरम श्लोक।

याग: भगवान की सेवा (तिरुवाराधन) का क्रम सिखाया जाता है।

हमारे पूर्वाचार्यों के अनुसार पंच संस्कार से दो धेय्य प्राप्त होते हैं।

  • तत्व ज्ञानान मोक्ष लब्ध:” भगवान का ज्ञान प्राप्त होनेपर जीव को मोक्ष मिलता है। आचार्य द्वारा शिष्य को रहस्यत्रय (मूलमन्त्र, द्वय मन्त्र, चरम श्लोक का रहस्यार्थ) की शिक्षा के द्वारा अर्थ पंचक के विषय मे ज्ञान प्राप्त होता है (अर्थ पंचक: परस्वरूप – भगवान, स्वस्वरूप – जीवात्मा,   उपायस्वरूप – भगवान को प्राप्त करने का उपाय, उपेयस्वरूप – जीवन का लक्ष्य, विरोधी  स्वरूप –  भगवतप्राप्ति में बाधाएँ)। उपरोक्त ज्ञान प्राप्त होनेपर जीव परम लक्ष्य (श्री वैकुंठधाम में श्रिय:पति भगवान के नित्य कैंकर्य प्राप्त होना) के प्राप्ति का अधिकारी बनजाता है।
  • जबतक इस शरीर में प्राण है, तबतक भगवान, आचार्य तथा भागवत का कैंकर्य करना। वर्तमान परिस्थिति में प्रत्येक व्यक्ति बहुत सुलभता और सहजता से भगवान के अर्चाविग्रह की सेवा कर सकता है (मुख्य रूप से घरमें तिरुवाराधन द्वारा और दिव्य देशों में कैंकर्य के द्वारा) ।

इस लेख में हम विविध प्रमाणोंको देखेंगे जो प्रत्येक श्रीवैष्णव के घर में दैनिक तिरुवाराधन के महत्त्व को दर्शाते हैं।

वर्तमान की दुखदायी परिस्थिति है की अनेक श्रीवैष्णवोंके घरों में तिरुवाराधन क्वचित ही हो रहा है। कई घरोमें ऐसा देखा जाता है की वहाँ पर शालिग्राम भगवान होते हुए भी वें पूर्णत: दुर्लक्षित हैं। अनेक जन इतने व्यस्त होगये हैं की उन्हे इस बात का विस्मरण होगया है की हमारे दुराचरण को ना देखते हुये साक्षात भगवान हमारे घर में अवतरित हुए हैं और विराज रहे हैं, इतने सुलभ हैं भगवान।

तिरुवाराधन क्रम का उचित ज्ञान ना होना और तिरुवाराधन का महत्व नहीं पता होना यह तिरुवाराधन ना होने के मुख्य कारण हैं।

निम्नलिखित अनुभागों में वेद, इतिहास, पुराण, श्रीमद्भगवद्गीता, दिव्य प्रबंध, पूर्वाचार्योंके अनुष्ठान/उपदेश/सूक्तियाँ और रहस्य ग्रंथ आदि में उल्लेखित तिरुवाराधन की महिमा को बताया गया है।

वेद:

जो वेदों को प्रमाण मानते हैं उन्हे वेदोंके निर्देशोंका पालन अवश्य करना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में कुछ अपवाद छोडकर बाकी सभी जनोंने बहुत से आचार विचार अनुष्ठान छोड दिये हैं। परंतु वेदोंके अनुसार सभी वैदिक जनोंको पंचकाल परायण होना आवश्यक है जिसमे दिन के पाँच करके प्रत्येक भाग में विशिष्ट कार्य किया जाता है। सम्पूर्ण दिवस मुख्य रूप से मध्यभाग के तिरुवाराधन पर केन्द्रित होता है। दिन के पाँच भाग हैं –

  • अभिगमन: ब्रह्ममुहूर्त (लगभग प्रात: ४ बजे) के पूर्व निद्रा से जगना। प्रातर्विधि, दन्तधावन, स्नान, संध्यावंदन करना इत्यादि ।
  • उपादान: तिरुवाराधन मे उपयोग होने वाली सामग्री एकत्रित करना।
  • इज्या (याग): एकत्रित किए हुये सामग्री का उपयोग करके तिरुवाराधन करना।
  • स्वाध्याय: अपने वर्ण अनुसार वेद और दिव्य प्रबंधोंका अध्ययन/अध्यापन करना।
  • योग: ध्यान द्वारा हमारा मन भगवान पर केन्द्रित करना।
  • यहाँ ईज्या का अर्थ है भगवान की तिरुवाराधन सेवा, जो हर श्रीवैष्णव को अपने घर के भगवान के लिए करना आवश्यक है। तिरुवाराधन के साथ हम भगवान के बारे में जानने का प्रयत्न करते हैं तथा उनकी लीलाओं का स्मरण भी करते हैं।
  • केवल पंच संस्कारों से शुद्ध होने के बाद ही किसी को तिरुवाराधन करने का अधिकार प्राप्त होता है।
  • श्री पेरियावाचान पिल्लै स्वामीजी ने पेरुमाल तिरुमोळि व्याख्यान में १.७ पाशुर – “मरम तिगलुम …” में “इरु-मुप्पोलुदु” (अर्थार्थ २+३ काल) को पंचकाल का वर्णन बताया है।

 

इतिहास/पुराण – उपब्रह्मण – जिनसे हम वेदों कों समझ सकते हैं।

श्री रामायण में भगवान श्रीराम स्वयं अपने कुलधन/कुलदेव श्री रंगनाथ (उस समय श्री नारायण नाम से संबोधित होते थे) की तिरुवाराधन सेवा करते हैं। श्री रंगनाथ (श्री नारायण) प्रथम श्री ब्रह्माजी से सेवित थे। तत्पश्चात् श्री रंगनाथ भगवान की सेवा रघुवंश के राजाओं के द्वारा (इक्ष्वाकू से श्रीराम तक) हुयी। श्री रामायण का श्लोक “सहपत्न्या विशालाक्ष्या नारायणं उपागमतु” में वर्णन है की कैसे श्री सीता अम्माजी भी भगवान श्री राम को तिरुवाराधन में सहायता करती थीं।

विभीषण जी को श्री रंगनाथ भगवान के अर्चाविग्रह को प्रदान करते हुये श्री रामचन्द्र भगवान

पूराणों में भी, तिरुवाराधन का महत्त्व कई जगह बताया गया है।

श्रीमद् भागवत में यह श्लोक है जिसमें श्री प्रह्लाद महाराज के कुछ उपदेश इस तरह दर्शाये गये है –

श्रवणम् किर्तनम् विष्णो: स्मरणम् पाद्यसेवनम् ।

अर्चनम् वंदनम् दास्यम् सख्यम् आत्मनिवेदनम् ॥

इस श्लोक में भगवान की पूजा के अलग अलग प्रकार बताये गये है। इसमें से बहुत सी विधीयाँ तिरुवाराधन के हि अलग अलग अंग है। श्रीभगवान का नाम लेना, उनकी अर्चना करना, उनके गुणों का गुणगान करना और ऐसे बहुत सारे साधन है जो तिरुवाराधन का एक अंग है।

गरुड पुराण में, भक्त की आठ विशेषता बताते हुए भगवान ने स्वयं कहा है कि –

मद् भक्त जन वात्सल्यम्, पूजायाम् अनुमोदनम्, स्वयं अपि अर्चनम् चैव …

यहाँ दो महत्त्व कि बात है “पूजायाम् अनुमोदनम्” – जब कोई दूसरा मेरी पूजा आराधना करता है उसे देख खुश होता है। और “स्वयं अपि अर्चनम्” – वह जो स्वयं मेरे पूजा आराधना करता है। आचार्य हृदय के ८५वें चूर्णिकै में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इसकी व्याख्या करते है। ऐसे बहुत से प्रसंग हमें इतिहास में देखने को मिलते है।

श्रीमद्भगवद गीता – श्रीकृष्ण के मुख से वाणी

गीता के बहुत से श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण ने तिरुवाराधन का महत्त्व बताया है।

दो बार कहते हैं – “मन्मना भव मद्भक्त: मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसी युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ” ॥ ९.३४ ॥

उन्होंने कहा है कि – जो उनकी पूजा करता है,  भक्ति करता है, सदैव स्मरण करता है और खुद को भगवान के कार्य में रखता है।

हमारे पूर्वाचार्य ने भी यही बताया है कि “ये यथा माम प्रपद्यन्ते ताम्स तथैव भजामि अहम ”। इस श्लोक से सूचित होता है कि “भगवान अपने भक्त के इच्छानुसार अवतार लेकर उसकी पूजा स्वीकार करते हैं । यही अर्थ “तमर उगंधदु एव्वुरुवं अव्वुरुवम दाने ” (मुदल तिरुवंदादि) पाशुर से प्रकाशित होता है ।

भगवान गीताजी के ९.२६ श्लोक “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति: । तदहं भक्त्युपहृतम श्रामि प्रयतात्मन: ॥” में कहते हैं कि जो प्रेम से एक तुलसीदल, फूल, फल, जल मुझे अर्पण करता है मैं उसे ग्रहण कर लेता हूँ। अगले श्लोक में “यत्करोषि यद श्रासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यत्तपस्याषि कौंतेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ ९.२७ ॥ ” कहते हैं कि आप जो भी करते हो वह मुझे अर्पण समझकर करो। यह सब हमारे तिरुवाराधन क्रम के स्वाभाविक भाग है और यह भगवान के सबसे उदार स्वभाव को बताता है। कैसे भक्तिभाव से अर्पण किए हुए किसी भी वस्तु को भगवान ग्रहण कर लेते है।

वह आगे और कहते हैं “यज्ञशिष्टाशिन: ….” श्लोक ३.१३ में कि जो अन्न खुद के आनंद के लिए बनाते है, भगवान को भोग लगाये बिना खाते हैं वह पाप है। भगवान ने कहा है कि तुम्हें सिर्फ प्रसाद पाना है – उसके सिवा कुछ भी नहीं पाना है। याग तिरुवाराधन है और अनुयाग प्रसाद ग्रहण करना है।

दिव्य प्रबन्ध जो हमारे लिये अति महत्त्वपूर्ण है, इसमें कई पाशुर हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रीतीसे तिरुवाराधन विधि के विषय में बताते हैं, जो भगवान कि सरल पूजा विधी है।

तमर उगंधदु एव्वुरुवं (मुदल तिरुवंदादि)

श्रीमहद्योगी स्वामीजी ने बहुत सुन्दर रीतिसे भगवान के उन अवतारों और गुणों का वर्णन किया है जिनमें उनके भक्त उन्हें देखना चाहते है। पूर्वाचार्यों के जीवन से बहुत सारे प्रसंगों को चुना है।

चुट्टु नन मालैगल – तिरुविरुत्तम में नित्यसूरीयों द्वारा तिरुवाराधन।

तिरुविरुत्तम में श्रीशठकोप स्वामीजी ने परमपदधाम में नित्यसूरीयों द्वारा तिरुवाराधन के विषय में जानकारी प्रदान की है। इस पाशुर में उन्होंने कहा है कि जब नित्य सूरी भगवान को धूप सेवा करते है तब भगवान उस धूप में ढक जाते हैं और उन्हें वहाँ से चुपके से  लीलाविभूति जाने का अवसर मिलता है।

  • इस लीलाविभूति में भगवान कृष्ण बनकर आते हैं
  • माखन चोरी करने में व्यस्त हो जाते हैं और जितना हो सके उतना पा लेते हैं और
  • नीला देवी के संग विवाह करने हेतु सात सांडों को मारते हैं ।
  • उनके मनपसन्द कुडक कूत्तु नृत्य करते हैं (हाथों, सिर में मटका और कमर में मृदंग)।
  • और फिर वापस परमपदधाम में आकार विराजमान हो जाते है जैसे कुछ हुआ हीं नहीं है।

“परिवथिल ईसनैप पाड़ी” (तिरुवाईमोलि)

तिरुवाईमोलि में श्रीशठकोप स्वामीजी भगवान के ‘स्वारातत्व गुण’ (भगवान के सहजतासे पूजे जानेवाले गुण) का वर्णन करते हैं । ईडु व्याख्या में श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदांती स्वामीजी के सुन्दर वार्ता पर प्रकाश करते हैं जहां श्रेपराशर भट्टर स्वामीजी कहते हैं कि भगवान को कोई सा भी पुष्प अर्पण किया जा सकता है। वह एक स्थान पर यह भी कहते हैं कि कुछ पत्ते लाकर उसे जलाओं तो भगवान उस सुगन्ध को भी स्वीकार करेंगे।

यहाँ एक और मुख्य बात कही गयी है – कि इतर देवता हमसे कठीन कार्य की अपेक्षा करते हैं जैसे की मुझे एक बकरा बली में चढ़ाओ “अाठ्ठै अरुत्तु ता” या मुझे एक बालक की बली चढ़ाओ “पिल्लैक करि ता ”। परन्तु भगवान श्रीमन्नारायण अपने भक्तों से केवल प्रेम पूर्वक समर्पण की अपेक्षा करते हैं ।

चैय्या तामरैक कण्णन पदिगम  (तिरुवाईमोलि)

यह पाशुर पूर्णत: घर के अर्चाभगवान का वैभव वर्णन करता है। श्रीशठकोप स्वामीजी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अपने घर के अर्चा भगवान सबसे अद्भुत अवतार हैं । श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीशठकोप स्वामीजी के दिव्य अनुभावों को तिरुवाईमोलि नूत्तंदादी के २६वें पाशुर “एयिदुम अवरक्कु इंनिलत्तिल अर्चावतारम एलिदु ” दर्शाते हैं । इस जगत में हम सब के लिये अर्चावतार भगवान सबसे सुलभ हैं ।

तेरित्तू एलुदि वाचित्तुम केट्टुम वणाँगी वलिपट्टुम पूसित्तुम पोक्किनेन पोदु   (नान्मुगन तिरुवन्दादि)

यह श्रीभक्तीसार स्वामीजी की दिनचर्या है। वो स्वयं कहते हैं कि वो कैसे अपना दिन व्यतीत करते हैं – पढ़ना, लिखना, सीखना और भगवान कि सेवा करना।

पूर्वाचार्यों के अनुष्ठान, उपदेश और वार्ताएं


अनेक आचार्यों ने स्वयं अपने तिरुमाली के भगवान से भी बढ़कर दिव्यदेश के भगवान, आल्वार, आचार्यों का तिरुवाराधन किया है।

  • श्रीनाथमुनि स्वामीजी:- कात्तुमन्नार कोयिल में यह कहा गया है कि श्रीनाथमुनि स्वामीजी स्वयं भगवान का तिरुवाराधन करते थे।
  • श्रीदेवराज मुनि स्वामीजी को श्रीरामानुज स्वामीजी के व्यक्तिगत भगवान के श्रीविग्रह कि सेवा का कैंकर्य स्वयं श्रीरामानुज स्वामीजी ने प्रदान किया।
  • तिरुवाईमोलि पिल्लै और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी दोनों ने आल्वार तिरुनगरी में भविष्यदाचार्य श्रीरामानुज स्वामीजी कि तिरुवाराधन किया है।

 

उपदेश

  • श्रीरामानुज स्वामीजी ने संस्कृत में “नित्य ग्रन्थ” कि रचना की है जिसमें तिरुवाराधन का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह श्रीरामानुज स्वामीजी के नव रत्न में अंतिम रत्न है।

  • श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने तमिल में “जीयर पड़ी” कि रचना कि है जिसमें तिरुवाराधन का वर्णन है जो श्रीरामानुज स्वामीजी के ग्रन्थ की तुलना में छोटा है।

उपरोक्त आचार्यों द्वारा अनुष्ठान और उपदेश हम श्रीवैष्णवों के पालन के लिये है।

वार्ताएं  

कई ऐसी घटनाएं हैं जहाँ पूर्वाचार्यों ने पालन कर तिरुवाराधन कि महत्वता को बताया है।

श्रीरामानुज स्वामीजी और वंगी पुरत्तु नम्बी

पेरिया तिरुमोलि ६.७.४ – पेरियवाच्चान पिल्लै के व्याख्यान – इस पाशुर में श्रीपरकाल स्वामीजी भगवान कृष्ण का वर्णन करते हैं कि बालकृष्ण भगवान जैसे ही माखन चोरी करते समय पकड़े जाते यशोदा मैय्या से डरकर स्वयं रोना प्रारम्भ कर देते। इस संदर्भ में एक सुन्दर घटना समझायी गयी है। श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी से तिरुमाली में तिरुवाराधन क्रम सिखाने कि विनती करते हैं । श्रीरामानुज स्वामीजी अपने व्यस्थता के कारण समय देकर यह सिखाने में असमर्थ थे। परन्तु एक बार श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी के अनुपस्थिति में श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी और श्रीहनुमत दासर को तिरुवाराधन सिखाने लगे। उसी समय श्रीआन्ध्रपूर्ण स्वामीजी पधारते हैं और उन्हें देखकर भावविभोर हो जाते हैं । श्रीरामानुज स्वामीजी कहते हैं – “इतने समय तक मुझे शंखा थी, परन्तु अभी मैं समझ रहा हूँ कि भगवान होकर भी बालकृष्ण माखन चोरी करते समय पकड़े जाने पर क्यों डर गये थे। मैं अभी उसी अवस्था में हूँ। जब तुमने विनंती की थी तब मैंने तुम्हें नहीं पढ़ाया परन्तु कुछ कारण वश इन लोगों को वही पढ़ा रहा हूँ। हालांकि मैं आचार्य हूँ और तुम शिष्य हो अत: मुझे तुमसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे ऐसे कार्य के लिये मुझे तुमसे डर लग रहा है”।

भट्टर – सोमाशियाण्डान

एक बार श्रीसोमाशियाण्डान ने श्री भट्टर स्वामीजी को तिरुवाराधन की विधी सिखाने को कहा । तब श्रीभट्टर स्वामीजी ने उन्हें बहुत विस्तार से वह विधी सिखायी। फिर एक दिन जब श्रीसोमाशियाण्डान श्रीभट्टर स्वामीजी के तिरुमाली में पधारे तो उन्होंने देखा की श्रीभट्टर स्वामीजी के लिये जो केले के पत्ते पर परोसा हुआ था उसे ग्रहण करने हेतु वे तैयार थे। तभी श्रीभट्टर स्वामीजी ने उनके एक शिष्य को बुलाकर उनके नित्य आराधन के भगवान को वहाँ लेकर आने को कहा और उनको भोग लगाकर श्रीभट्टर स्वामीजी ने प्रसाद पाना प्रारम्भ किया। यह देखकर श्रीसोमाशियाण्डान ने श्रीभट्टर स्वामीजी से पुछा कि उनको बतायी हुयी विधी तो बहुत विस्तृत है। तब श्रीभट्टर स्वामीजी ने कहा उन्होंने श्रीसोमाशियाण्डान को जो भी सिखाया है वह उनके लिये कम हीं है। इसका गूढ अर्थ यह है कि अगर श्रीभट्टर स्वामीजी अपने मन कि परिस्थिति के लिये असल तिरुवाराधन प्रारम्भ करें तो वों पिघल जाते परन्तु श्रीसोमाशियाण्डान के लिये जो भी सिखाया गया वह छोटा है क्योंकि उन्हीं लम्बे सोम यज्ञ करने का अनुभव है।

एरुम्भी अप्पा – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी

  • जब श्रीएरुम्भी अप्पा श्रीरंगम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के यहाँ शरण लेने पधारे उस समय वहां से बहुत सुन्दर कालक्षेप, आदि सुनकर आये परन्तु अपने तिरुमाली जाने से पहिले श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का प्रसाद लिये बिना चले गये। वहाँ से अपने तिरुमाली मे आने के पश्चात उनके तिरुवाराधन भगवान (श्रीराम) ने उनका द्वार खोलने की अनुमति नहीं दी और उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पास जाने का आदेश दिया।
  • पूर्व और उत्तर दिनचर्या में श्री एरुम्भी अप्पा श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के तिरुवाराधन कि बड़ाई करते है।

रहस्य ग्रन्थ

कई जगह पर तिरुमाली के भगवान कि चर्चा विशेषकर रहस्य ग्रंथों में की गयी है।

मुमुक्षुपडी
द्वय प्रकरनम – सूत्र १४१ – इवैयेल्लाम नमक्कु नम्पेरुमाळ पक्कलिले काणलाम इस व्याख्या में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं कि सभी दिव्य गुण (वात्सल्य, स्वामित्व, सौशील्य, सौलभ्य, ज्ञान, शक्ति, आदि) हमारे भगवान में हैं।

टिप्पणी: हालाकी सामान्यता भगवान श्रीरंगनाथ को कहते है परन्तु इस सन्दर्भ में सभी अर्चा अवतार (हमारे तिरुमाली के भी) के लिये कहा गया है।

आचार्य हृदय

चूर्णिकै ७५ – वीटिंबा इंबप पाक्कलिल द्रव्य भाषा निरूपणम समं इंबमारियिल आराइच्चि – इस व्याख्या में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है कि वीटिंबं  का अर्थ है अर्चा अवतार भगवान जो उनके  तिरुमाली में है जिनके हृदय और सोच केवल भगवान में स्थित है। यह विशेषकर तिरुमाली के अर्चावतार के महिमा को दर्शाता है।

अन्तिम निर्णय

उपर दिये हुए ग्रन्थ में से जैसे कि वेद, इतिहास, पुराण, दिव्य प्रबन्ध, पूर्वाचार्यों के ग्रन्थ, अनुष्ठान, उपनिषद और विविध रहस्य ग्रन्थ हमें तिरुवाराधन का कितना महत्त्व है यह पता चलता है। यह श्रीवैष्णवों का कर्तव्य है कि वह अपने दिनचर्या में थोड़ा समय अपने तिरुमाली के अर्चावतार के तिरुवाराधन के लिये व्यतीत करें। और तिरुवाराधन के पश्चात प्रसाद ग्रहण करें। (सिर्फ भगवान को भोग लगाने के बाद हीं हर वस्तु को ग्रहण करें)।

हमारे पूर्वजों ने यह कहा है कि तिरुवाराधन का क्रम हमें अपने आचार्य से भलीभाँती सिखाना चाहिए। आजकल तो बहुत सारी ग्रन्थ भी प्राप्त होते है जिसमें तिरुवाराधन का क्रम सरल रीतीसे बताया गया है। उनका भी उपयोग कर सकते है।

प्रेमभाव से प्रतिदिन तिरुवाराधन करके हम भगवान कि निर्हेतुक कृपा को जान और प्राप्त कर सकते हैं ।

पुराने जमाने कि एक रीती अनुसार एक बार भगवान कि तिरुवाराधन समाप्त होने के पश्चात प्रसाद पहिले भागवतों को तदियाराधन रूप में पवाया जाता है। वों जो यात्रा में जाते हैं इसी तदियाराधन पर निर्भर रहते हैं और श्रीवैष्णव अपने तिरुमाली में प्रतिदिन अर्पण करते थे। परन्तु आजकल यह बहुत कम देखने को प्राप्त होता है। जब भी मौका प्राप्त हो हम इसे कर सकते है।

तिरुवाराधन की विधी

तैयारी

  • सिर के उपर से स्नान करना।
  • ऊर्ध्व पुण्ड्र धारण करना – १२ स्थानों पर ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक धारण करना (गुरु परम्परा के श्लोक का अनुसंधान करना, आचार्य तनियन, द्वादश नाम दोनों भगवान और अम्माजी के)।
  • संध्या वन्दन।
  • माध्यांहिकम (दिन के समय पर निर्भर होना) – तिरुवाराधन दोपहर के समय करना चाहिये, परंतु आजकल के समय यह यथार्थ में संभव नहीं है। हम अधीक से अधीक शास्त्र का नियम पालन कर सकते हैं और जहाँ नहीं कर पाते वहाँ भगवान से क्षमा याचना कर सकते हैं ।
  • पञ्च पात्र के पात्रों कि तैयारी करना, धूपम, दीपम, पुष्प, तीर्थ, सुगंधीत पावडर, आदि कि तैयारी।
  • आचार्य श्रीपादतीर्थ – आचार्य के चरण पादुका अथवा तिरुवड़ी वस्त्र (एक वस्त्र पर आचार्य चरणों के चिन्ह) हमेशा साथ में रखना चाहिये जो हमारे तिरुवाराधन का एक क्रम है। गुरु परम्परा मंत्र का अनुसंधान करते हुए हम श्रीपादतीर्थ अथवा तिरुवड़ी ले सकते हैं । यह तिरुवाराधन का बहुत मुख्य भाग है।
  • तिरुमाली के सभी भागवत तिरुवाराधन के विविध कैंकर्य में भाग ले सकते हैं । जैसे पुष्पमाला तैयार करना, उस स्थान कि सफाई करना जहां तिरुवाराधन किया गया हो, प्रसाद बनाना, आदि।

 

क्रम

पात्र और उनके उपयोग

  1. अर्घ्य पात्र – भगवान के श्रीहस्थ प्रक्षालन के लिए।
  2. पाद्य पात्र – भगवान के श्रीचरण प्रक्षालन के लिए।
  3. आचमनीय – भगवान के श्रीमुख प्रक्षालन के लिए।
  4. कंदूषम (भगवान के श्रीमुख कुल्ला करने के लिए जल), स्नानीय (भगवान के तिरुमंजन के लिए जल), मधुवर्गं (मधु अर्थात शहद इ.), पानीय (भगवान को पिलाने के जल लिए), कंदूषम (क्रम के अनुसार हर आसान के लिए ) ।
  5. सर्वार्थतोय (शुद्धोदक) – भगवान को समर्पित किये जाने वाली हर वस्तु को पवित्र/शुद्ध करने के लिए ।
  6. प्रतीग्रह (पतितपावनी) – हर उपचार के बाद जल डालने के लिए पात्र ।
  7. आचार्य के तीर्थ के लिए ।
  8. तिरुक्कावेरी – भगवान के लिए शुद्ध जल भरकर रखने के लिए पात्र ।

तिरुवाराधन का एक मुख्य पहलू यह है कि, हमको यह बात को सदा स्मरण रखना चाहिये कि हमारे आचार्य हीं भगवान कि सेवा कर रहे हैं और हम तो आचार्य के हाथों का एक उपकरण हैं – यह सब आचार्य हमारे हाथों से करवा रहे हैं।

हमारे पूर्वज हमें यह कह गये हैं कि पहिले हमें उसी पद्धती से आचार्य, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी (और अन्य आल्वार), श्रीविश्वक्सेन (और श्रीतिरुवनन्त्लावन, श्रीगरुडजी, श्रीसुदर्शनजी, श्रीपाञ्चजन्यजी) इन सब कि सेवा के पश्चात भगवान और अम्माजी कि सेवा करनी चाहिये। उदाहरण के लिये अर्ध्य, पाद्य, आचमनी पहिले आचार्य से प्रारम्भ कर अन्त में भगवान का करना चाहिये। आचार्य के सेवा के लिये अलग से पात्र होना चाहिये। श्रीभोग, श्रीपुष्प, श्रीचन्दन, आदि पहिले भगवान को अर्पण कर फिर आल्वार, आचार्य और अन्त में अस्मदाचार्य।

यह विधी सरल पद्धती से निम्न रीतीसे समझायी गयी है। यह शायद पूर्ण न हो और यह प्रत्येक तिरुमाली, परिवार, दिव्य देश, आदि में अलग हो सकता है। सभी अपने परिवार के बड़ों से अपने परिवार कि रीति जान सकते हैं। परन्तु यह हमें एक तिरुवाराधन क्रम का एक भाव बता देता है और जो योग्य है उसे करने में वह इसका पालन कर सकता है।

  • सभी तैयारी होने के बाद, यह श्लोक बोलते हुए तुलसी लाना “तुलस्यमृत जन्मासी”।
  • दिया लगाना – सामान्य तनियन, वैय्यम तग़लिया, अंबे तग़लिया, एवं थिरूक्कंडेन पाशुर बोलना।
  • पंचपात्र कि तैयारी करना।
  • तिरुकावेरी में (तीर्थ का पात्र) तीर्थ बनाना।
  • द्वय मन्त्र का उत्तर वाक्य बोलते हुए (श्रीमते नारायण नम:) – तीर्थ और तुलसी लेकर, तीर्थ से सभी पुजा सामाग्री पर संप्रोक्षण करना।
  • अन्य सभी पात्र में तीर्थ मिलाना।
  • धीरे से दोनों हाथों से ताली बजाकर भगवान का उत्थापन करना और यह श्लोकों/पाशुरों का अनुसंधान करना कौशल्या सुप्रजा श्लोक, कुर्माधीन दिव्य लोकान श्लोक, नायगनाइ निँर नन्दगोपनुडैया, मारी मलै मुलाईन्जिल, अन्रू इववूलगम अलंदान एवं अँगनमा न्यालत्तु अरसर।
  • पूर्ण भाव से साष्टांग दण्डवत करना।

हर आसन के प्रारम्भ में तिरुकावेरी से शुद्ध जल लेकर हर वट्टिल में संकल्प के साथ डालना चाहिये। अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय, आदि करने के पश्चात भगवान के मुख को शुद्ध वस्त्र से पोंछना चाहिये।

मन्त्रासन – भगवान को तिरुवाराधन के लिये आवाहन करना

पहिले दिन के पुष्प को निकालना – “उडुथुक कलैन्दा” पाशुर का गान करना।

  • अर्घ्य देना (भगवान के श्रीहस्थ प्रक्षालन के लिए), पाद्य (भगवान के श्रीचरण प्रक्षालन के लिए), आचमनीय (भगवान के श्रीमुख प्रक्षालन के लिए) – यह करते समय ॐ अर्घ्यम समर्पयामि, ॐ पाद्यम समर्पयामि, ॐ आचमनीय समर्पयामि का अनुसंधान करना चाहिये या तिरुक्कैगल विळक्कियरूला वेन्डुम, तिरुवडिगल विळक्कियरूला वेन्डुम, आचमनं कंदरुला वेन्डुम का अनुसंधान करना चाहिये।
  • सभी १०८ दिव्य देश के भगवान को तिरुवाराधन के लिये आमंत्रित करना।
  • इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि यह तिरुवाराधन हमारे आचार्य हमारे हाथों से करवा रहे हैं । हम स्वयं आचार्य के हाथ हीं हैं ।

स्नानासन – भगवान का तिरुमंजन

  • सालग्राम भगवान को एक उचित स्थान पर विराजमान करें (तिरुमंजन वेधिके या एक पात्र)।
  • अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय कराना।
  • स्नान कराना – ॐ स्नानीयं समर्पयामि या स्नानीयं कंदरुला वेन्डुम
  • अब तिरुमंजन करना – पुरुष सूक्तम, नारायण सूक्तम, विष्णु सूक्तम, श्री सूक्तम, भू सूक्तम, नीला सूक्तम का अनुसंधान करना – जितना समय मिले उतनी बार। अन्त में “वेन्नै अलैन्ता कुणुन्गुम” पधिगम और  तिरुमंजन काल पाशुरों का गान करना।
  • अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय, धूप, दीप, गर्म दूध और फल निवेदन करना।
  • तीर्थ को एक पात्र में खाली करना।

अलंकारासनम्भगवान का श्रृंगार करना

  • शालिग्राम भगवान को उनके मूल स्थान पर बिराजमान करना।
  • पात्र में शुद्ध तीर्थ भरकर रखें।
  • अर्घ्य पाद्य आचमनीय करना ।
  • चन्दन तथा पुष्प से श्रृंगार करना ।

(“गंधद्वाराम् दुरधारशाम्….” श्लोक निवेदन करना)

(“पूछुं चान्तु एन नेंजमे…” पाशुर निवेदन करना)

(सूचना: सामान्यत: शालिग्राम भगवान को ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण नहीं कराया जाता है। केवल चन्दन निवेदन किया जाता है।)

  • धूप निवेदन करना (“धूर्वस्य …” श्लोक निवेदन करना)
  • दीप निवेदन करना (“उध दीप्यस्य…” श्लोक निवेदन करना)
  • मंत्र पुष्पम निवेदन करना, वेदारंभम् (वेद आरंभ) करना
  • द्वादश नाम अर्चना करना
  • दिव्य प्रबंध का पाठ करना
  • पोधु तनियन निवेदन करना (“श्रीशैलेश दयापात्रम…” से प्रारम्भ करके)
  • तिरुपल्लाण्डू, तिरुपल्लियेलुचि, तिरुप्पावै, अमलनादीपिरान, स्थल पाशुर (आप जिस दिव्य देश से आए हो अथवा जिस दिव्य देश में आप अभी हो उस दिव्य देश का पाशुर), कण्णिनुण् शिरुत्तांबु, कोईल तिरुवायमोलि, रामानुज नुत्तंदादि, उपदेश रत्नमालै इत्यादि का पाठ करना

सूचना:

  • समयानुकूल ज्यादा से ज्यादा पाठ करें
  • श्री रामानुज नुत्तंदादि को प्रपन्न गायत्री के नाम से जाना जाता है – श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने कहा है की जैसे एक ब्राह्मण प्रतिदिन नियम से गायत्री का जप करता है, ठीक उसी तरह एक शरणागत को चाहिए की कमसे कम श्री रामानुज नुत्तंदादि का पाठ एकबार प्रतिदिन करे।
  • ४००० दिव्य प्रबंधोंका पाठ भी एक मास में होना चाहिए। प्रतिदिन उस दिन के नक्षत्र के अनुसार पाठ होने चाहिए। अधिक विस्तृत जानकारी के लिये http://kaarimaaran.com/sevakalam.html इस संकेतस्थल को देखें।

बीच के समय में भगवान के लिये भोग बनाएँ। भगवान का भोग बनाने के लिये स्वतंत्र पात्र का उपयोग करना चाहिए। जिस पात्र में भोग बनाया गया हो उसी पात्र में भोग नहीं लगाना चाहिए। उस भोग को अलग पात्र में निकाल लेना चाहिए। भगवान के भोग बनानेके, भोग लगानेके पात्र हमें अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिये नहीं लेना चाहिए। यह पात्र केवल भगवान के लिये ही होने चाहिए।

भोज्यासनम् – भगवान को भोग निवेदन करना

  • अर्घ्यम्, पाद्यम्, आचमनीयम् निवेदन करना
  • भोग को भगवान के सामने रखना
  • भोग को जल से प्रोक्षण करके भोग पर तुलसी रखना
  • भगवान को भोग निवेदन करना। (“कूड़ारै वेल्लुम सीर…”, “नारु नरूम्पोलिल…”, “उलगमुण्डा पेरुवाया…” पाशुर निवेदन करना और “या प्रीतिर्विदुरार्पिते…” श्लोक निवेदन करना)
  • भगवान को ताम्बूल और चन्दन निवेदन करना
  • भगवान का प्रसाद आल्वार, आचार्य को निवेदन करना

पुनर्मन्त्रासनम् – मंगलाशसनम्/शात्तुमुरै

  • अर्घ्यम्, पाद्यम्, आचमनीयम् निवेदन करना
  • आरती निवेदन करना – “तद्विष्णोर्परमपदम्…” बोलना
  • भगवान, तिरुमलै वेंकटेश्वर भगवान, श्रीरंगनाथ भगवान, श्री तिरुनारायणपुर भगवान, जगन्नाथ भगवान, श्री रामचन्द्र भगवान, पार्थसारथी भगवान, गोदाम्बाजी, शठकोप स्वामीजी, रामानुज स्वामीजी, वरवरमुनि स्वामीजी, सभी आचार्य इनके मंगल स्तोत्र का पाठ करना (https://guruparamparai.wordpress.com/mangala-slokams)
  • शात्तुमुरै पाशुर, तिरुपल्लाण्डु पाशुर, वालि तिरुनाम का पाठ करना
  • तिरुवाराधनम करनेवाले व्यक्ति तीर्थ, श्रीपादतीर्थ, भगवान की चरणोंमें अर्पित तुलसी लेकर सभी को वितरीत कर सकते हैं
  • दैनिक नक्षत्र के अनुसार आल्वार, आचार्य का वालि तिरुनाम का पाठ करना (https://guruparamparai.wordpress.com/vazhi-thirunamams/)

पर्यंकासनम् – भगवान को विश्राम करनेके लिये विनती करना

  • “पन्नाकदीश पर्यङ्के …”, “क्षीर सागरा…” श्लोक निवेदन करना
  • साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना (“उपचारापदेशेन…” श्लोक बोलते हुये) (तिरुवाराधनम करते हुये होनेवाले अपचारोंके लिये पूर्ण हार्दिकता से क्षमा मांगते हुये)
  • भगवान का पट बंद करते हुये “उरगल उरगल उरगल…”, “पनिक्कडलील पल्ली कोलै पलगविट्टु …” पाशुर निवेदन करें

अनुयागम् – तिरुवाराधन (याग) सम्पन्न

  • अपने आचार्यपीठ की परंपरानुसार देवराज अष्टकम् अथवा वरवरमुनि पूर्व/उत्तर दिनचर्या अथवा वानमामलै जीयर प्रपत्ति/मंगलाशासनम् का पाठ करना
  • श्रीवैष्णव अतिथियोंकों प्रसाद पवाना
  • स्वयं प्रसाद ग्रहण करना

अधिक जानकारी

  • अनध्ययन कालम्
    • अनध्ययन काल में हम आल्वार के पाशुर का पाठ नहीं करते हैं। “जितन्ते स्तोत्र” के प्रथम २ श्लोक, “कौसल्या सुप्रजा राम…”, “कूर्मादिन…” आदि श्लोक निवेदन करते हुये भगवान का पट खोलना चाहिए। आल्वार पाशुर का मानसिक अनुसंधान करने के लिये कोई प्रतिबन्ध नहीं।
    • वैसेही तिरुमंजन के समय सूक्तोंका का पाठ करना
    • मंत्र पुष्प में “चैंराल कुडैयाम” के स्थान पर “एंपेरुमानार दरिशनम एन्रे” पाशुर का पाठ करना
    • शात्तुमुरै में उपदेश रत्तिनमालै, तिरुवायमोलि नुत्तंदादि के पाशुरोंका पाठ करनेके बाद में “सर्व देश दशा काले…” और वालि तिरुनामम का पाठ करना चाहिए।

लघु तिरुवाराधनम (३० मिनट का क्रम)

  • भगवान का पट खोलना
  • अर्घ्यम्, पाद्यम्, आचमनीयम् निवेदन करना
  • तिरुमंजन करना
  • तिरुपल्लाण्डु, तिरुप्पावै इत्यादि – जो भी हम उपलब्ध समय में पाठ कर सकें (अनध्ययन काल में हम दिव्य प्रबंध तनियन और उपदेश रत्तिनमालै का पाठ कर सकते हैं।)
  • भगवान, आल्वार, आचार्य को भोग निवेदन करना
  • शात्तुमुरै
  • श्रीपादतीर्थ
  • भगवान का पट बंद करना

महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ

  • पूर्व/उत्तर दिनचर्या में उपलब्ध वर्णन के अनुसार तिरुवाराधन दिनमें ३ बार करना चाहिए। जितना हो सके हमें करना चाहिए।
    1. प्रात: संध्यावंदन के पश्चात् लघु तिरुवाराधन
    2. मध्याह्न काल में विस्तृत तिरुवाराधन
  • सायंकालीन संध्यावंदन के पश्चात् लघु तिरुवाराधन
  • एकादशी के दिन पूर्ण पंच पक्वान, अन्न का भोग नहीं लगता. सूखा मेवा, अथवा सादा भोग लगता है।
  • द्वादशी के दिन तिरुवाराधन जल्दी करके बादमें तीर्थ, तुलसी, प्रसाद लेकर पारणम करना चाहिए।
  • अनध्ययन काल में हमें ४००० दिव्य प्रबंध का पाठ नहीं करना चाहिए। पुर्वाचार्य स्तोत्र, उपदेश रत्तिनमालै, तिरुवायमोलि नुत्तंदादि, आल्वार/आचार्य तनियन, वालि तिरुनाम का पाठ करना चाहिए। धनुर्मास प्रारम्भ होनेपर तिरुपल्लियेलुचि और तिरुप्पावै का पाठ कर सकते हैं।
  • यात्रा के समय हमें भगवान को साथ लेकर चलना चाहिए अथवा हमारे अनुपस्थिति में भगवान की सेवा की व्यवस्था करनी चाहिए। भगवान को आप्त श्रीवैष्णवोंके पास सौंप सकते हैं जो भगवान की प्रेम पूर्वक सेवा कर सकें।
  • अशौच के समय हम तिरुवरधानम नहीं कर सकते हैं। इस समय भगवान की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
  • घर में भगवान विराजमान हो और उनकी हम सेवा न करें इसका अर्थ है किसीको हमारे घर आमंत्रित करें और उसको दुर्लक्षित करदें।

शास्त्र की आज्ञा और पूर्वाचार्योंके निर्देश का पालन करके हार्दिकता से प्रेमपूर्वक अपने घर के भगवान का तिरुवाराधन करना चाहिए। इस प्रकार हम भगवद/भागवत/आचार्य कैंकर्य में पूर्ण रूप से और स्वाभाविक रूपसे संलग्न हो सकते हैं तथा भगवान, आल्वार, आचार्य और अस्मदाचार्य के अत्यंत प्रिय बन सकते हैं।

भगवान के तिरुवारधानम में आनेवाली बाधाओं का विस्तृत वर्णन http://ponnadi.blogspot.in/2014/03/virodhi-pariharangal-16.html इस संकेतस्थल पर उपलब्ध है।

संदर्भ: जियर पड़ि, काँचीपुरम प्र. भ. अण्णंगराचार्य स्वामीजी लिखित “नित्यानुष्ठान पद्धति”

दासानुदास सपना रामानुज दासी, दासानुदास केशव रामानुज दास एवं दासानुदास कण्णन रामानुज दास ।

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2012/07/srivaishnava-thiruvaaraadhanam.html

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १२

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उस पर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है। उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ पर हिन्दी में देख सकते है।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १

भगवद, आल्वार और आचार्य – हमारे विचारों और ध्यान का उद्देश

४३) स्मरण विरोधी – विचारों / ध्यान / चिंतन में बाधाएं

स्मरण का अर्थ किसी पर ध्यान या चिंतन करना। इस अंश में किस पर ध्यान करना है और किस पर ध्यान नहीं करना है इसका उल्लेख किया गया है।

  • जैसे विष्णु पुराण में बताया गया है “अन्ये तु पुरुषव्याग्र चेतसा येपी अपाश्रया: अशुद्धास्ते समस्ता तु देवात्या: कर्मयोनय:” अर्थात हमें किसी भी देवतान्तर जैसे रुद्र, स्कंध, दुर्गा आदि पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करना चाहिए अपितु केवल भगवान श्रीमन्नारायण के दिव्य स्वरुप पर ही मन को केन्द्रित करना चाहिये। देवतान्तर पर केन्द्रित करना महान बाधा है। यह भी सत्य है कि जिसका कोई रुप या नाम न हो ऐसी वस्तु पर भी केन्द्रीत करना कठिन है। इसलिये हमें उन भगवान के पवित्र नामों या अर्चावतार पर, जो शुभ और ध्यान लगाने में सरल है, उन पर पूर्णत: ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
  • अपने आचार्य के पवित्र रुप का ध्यान न करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी एक उत्सव के समय एक श्रीरंगम आते है और वहां पूरे समय के लिये निवास करते है। श्रीरामानुज स्वामीजी पूरे उत्सव में स्वामीजी की सेवा करते है। जब वो प्रस्थान करते है, तब श्रीरामानुज स्वामीजी उनसे पूछते है “कृपया मुझे कुछ अच्छे उपदेश प्रदान करें जिनकी मैं शरण ले सकु”। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कुछ पल के लिये अपने नेत्रों को बन्द कर फिर कहते है “हम श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के सानिध्य में आध्यात्मिक विषय पर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उस समय जब वे नदि में स्नान कर रहे होते थे और जब पीठ को उपर कि तरफ कर डुबकी लगाते थे तो उनकी पीठ सुन्दर चमकते हुए ताम्बे का मटके कि तरह दिखाई पड़ती थी मैं हमेशा उस पवित्र दृष्टी की शरण होता था। आप भी उसे ही अपना शरण मानो” – यह घटना बहुत प्रसिद्ध है। यह घटना ६००० पदि गुरु परम्परा प्रभावम में भी समझायी गयी है। यह घटना यह बताती है कि शिष्य का आचार्य के पवित्र रुप पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। यह कहा गया है कि श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी तिरुक्कोष्टीयूर मन्दिर के गोपुर पर बैठकर श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी का ध्यान करते थे और “यामुनैत्तुरैवर” (यामुनाचार्य) मन्त्र का जप करते थे। यह घटना अन्तिमोपाय निष्ठा में भी दिखायी गयी है।
  • भागवतों के समूह में ध्यान नहीं करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी श्रीसहस्त्रगीति के कई पाशुरों में भागवतों कि स्तुति करते है जैसे “पयिलुम चुदरोली” और “नेडुमार्क्कडिमै” पधिगम। श्रीकुलशेखर स्वामीजी भगवातों के प्रति अपना प्रेम और तपस्या पेरुमाल तिरुमोझी के “तेट्टरुम तिरल” पधीगम में कहते है। अन्य आचार्य और आल्वार भी यही कहते है कि हमें भागवतों का हमेशा स्मरण और ध्यान करना चाहिये।
  • सांसारिक लोगों के विषयों पर चिंतन करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपरकाल स्वामीजी परिय तिरुमोझी में कहते है “नण्णाद वाळ अवुणर” अर्थात “एक क्षण के लिये भी मैं उनके बारे में विचार नहीं करूंगा, जो ठंडे तिरुक्कड़ल्मल्लै (महाबलिपुर्) दिव्यदेश में स्थलशयन भगवान का ध्यान नहीं करते है”। सांसारिक जनों को केवल खाना, कपड़े, आराम कि वस्तु मिले वे लोग बस इसी विषय पर केन्द्रित रहते है।
  • उस दिव्यदेश का ध्यान न करना जो भगवान और भागवतों को प्रिय हो, वह बाधा है। और अन्य क्षेत्र जो भगवद, आल्वारों और आचार्य से संबंधीत न हो उस पर केन्द्रीत करना भी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: यह कहा जाता है कि भगवान अर्चा अवतार का रूप हम सब जीव पर कृपा करने हेतु लेते है। वह कई मन्दिर, मठ, तिरुमाली आदि में जीवात्मा कि सहायता करने हेतु विराजमान होते है। इन क्षेत्रों में जहाँ आल्वारों ने स्तुति कि है उस क्षेत्र को दिव्यदेश कहा गया है। जो आचार्य को प्रिय है उन्हें अभिमान स्थल कहा गया है। सामान्यत: कई क्षेत्र है जो श्रीवैष्णवों को प्रिय है। हमारा केन्द्र और ध्यान उसी स्थान पर रहना चाहिये जो भगवान, आचार्य और आल्वारों से संबंधीत हो।
  • भागवतों के लिए प्रिय विषय पर ध्यान न देकर सांसारिक विषय पर ध्यान देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: आल्वारों और आचार्य का ध्यान हमेशा इस बात पर होता है कि हम सब भगवद विषय में लगे रहे। सांसारिक जनों का ध्यान हमेशा धन, आनंददायक वस्तुये जैसे खेल, संगीत, सिनेमा आदि पर ही केन्द्रीत रहता है। प्रपन्न होने के कारण हमें हमेशा आचार्य और आल्वारों के मार्ग पर चलना है न कि सांसारिक जीवों के।
  • भगवद और भागवतों के अच्छे गुणों का ध्यान न करना और अवैष्णवों के गुणों का गुण गान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: उदाहरण जब हम किसी श्रीवैष्णव को देखते है, जिन्हें भगवान और उनके भक्तों के प्रति बहुत लगाव तब हमें भी ऐसे गुणों कि तरफ ध्यान देना चाहिये ताकि हम भी ऐसे गुण स्वयं में आत्मसात कर सके। जब हम धन, उच्च स्थान अन्य में (अन्य श्रीवैष्णव भी) देखते है,जो हमें इस संसार से बाँधे रखता है,  तो हमें उनसे प्रेरणा नहीं लेना चाहिये।
  • इस बात का विश्लेषण करना कि भगवान के अर्चा अवतार के विग्रह किस धातु से बने है यह बहुत बड़ी बाधा है। यह सोचना कि सोने का विग्रह उच्च और लकड़ी के विग्रह हीन यह गलत है। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह कहा गया है कि अर्चा विग्रह के धातु का विश्लेषण करना यानी अपने माँ कि पवित्रता पर संदेह करने के समान है।
  • उसी तरह, ज्ञान और भक्ति में श्रेष्ठ श्री वैष्णव का उनके जन्म, धन, अनुष्ठान आदि पर भेद करना बाधा है। तिरुपति में श्रीभक्तांघ्रीरेणु स्वामीजी भगवातों कि स्तुति पाशुर के (मेम्पोरुल पाशुर के पश्चात) अन्त तक करते है। सभी को इस पाशुर को निरन्तर याद कर भगवातों के प्रति सम्मान और आदर का परिचय देना चाहिए। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव को उनके जन्म के आधार पर आंकना ऐसा ही जैसे अर्चा अवतार भगवान को उस धातु जिससे उन्हें बनाया गया है के आधार पर आंकना, यह बड़ा पाप है।
  • अपने आचार्य को सामान्य मनुष्य समझना बाधा है। प्रमाण वाक्य के अनुसार ,”आचार्य स हरी साक्षात – चररूपी नमस्या:” आचार्य स्वयं हरी है, जो हिल मिल सकते है। हमें कभी भी आचार्य को साधारण जीव नहीं समझना चाहिये।
  • हमें आचार्य के प्रति बहुत कृतज्ञ होना चाहिये। कृतज्ञता होना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी यह दर्शाते है कि आचार्य के माध्यम से में भगवान प्राप्त होते है और भगवान के द्वारा आचार्य की प्राप्ति होती है। इसलिये आचार्य हम पर सबसे बड़ी कृपा कर हमें भगवद प्राप्ति करा कर इस संसार बन्धन से मुक्त कर रहे है। इसलिये सभी को यह स्मरण रहना चाहिए और हमेशा आचार्य के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिये।
  • भागवतों को तुच्छ समझना बहुत बड़ी बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी श्रीवैष्णवों को आचार्य के समान समझना चाहिये। श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी भगवद, भागवत, असह्य अपचार के बारें में दर्शाते समय अन्य श्रीवैष्णव को तुच्छ समझना बहुत बड़ा भागवत अपचार है यह समझाते है। हमें हमेशा अन्य भागवतों को भगवान और स्वयं से उच्च समझना चाहिये और उन्हें अधिक सम्मान और महत्त्व देना चाहिये।
  • आल्वारों के पाशुरों को दिव्य प्रबन्ध कहते है। वे “अरुलीच्चेयल” नाम से भी प्रसिद्ध है। उन्हें तमील भाषा में लिखा गया है। कुछ कहते है संस्कृत देव भाषा है और तमिल कमतर है। परन्तु श्रीपरकाल स्वामीजी कहते है “चेन्नीरत्त तमिलोसै वडचोल्लागी” – जिसका अर्थ “सुन्दर तमील ध्वनी संस्कृत हो गयी”। जैसे आचार्य हृदयं में नायनार ने यह पहचाना कि “आगस्त्यमुम अनादी” – तमील भाषा जो अगस्त्य ऋषी ने प्रगट कि वह भी नित्य है। क्योंकि वह एक ऋषी द्वारा प्रगट हुई है उसे संस्कृत से छोटा नहीं माना जा सकता है। अनुवादक टिप्पणी: अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार अपने आचार्य हृदयं ग्रन्थ में श्रीशठकोप स्वामीजी और उनके दिव्य प्रबन्ध कि स्तुति करते है। इस ग्रन्थ में वह यह स्थापित करते है कि हम आल्वारों का जन्म के आधार पर भेद नहीं करते, क्योंकि वे स्वयं भगवान के कृपा पात्र है, उनकी महिमा अपार है। उसी तरह वह यह स्थापित करते है कि यद्यपि वह दिव्य प्रबन्ध तमील में है, उनकी महिमा अपार है। वे बड़ी सुन्दरता से यह समझाते है कि अगर हम पवित्र संस्कृत में लिखी ग्रन्थ को अपनाते है तो हमें बौद्ध शास्त्र को अपनाना चाहिये। अगर हमें लेखक के जन्म के आधार पर किसी को अस्वीकार करना है, तो हमें महाभारत और भगवद्गीता को अस्वीकार करना चाहिये क्योंकि दोनों हीं लेखक ब्राह्मण नहीं है। अत: वे बड़ी सुन्दरता से यह स्थापित करते है कि प्रबन्ध कि स्तुति उसकी भाषा या उसके लेखक के जन्म पर निर्भर नहीं होती है परन्तु उस प्रबन्ध के तत्व पर होती है – अर्थात जब तक वह भगवान श्रीमन्नारायण कि स्तुति कर रहा है वह स्वीकारनीय है।
  • आत्म यात्रा (आत्मा की गतिविधियों) कि महिमा को भूल देह यात्रा (शरीर की गतिविधियों) पर केन्द्रीत होना बाधा है। आत्म यात्रा अर्थात जीवात्मा के कल्याण को देखना और उसीप्रकार व्यवहार करना। देह यात्रा अर्थात देह के कल्याण के बारें में सोचना और वैसे ही व्यवहार करना। आत्म कल्याण की तुलना में हमें देह कल्याण पर केन्द्रीत नहीं होना चाहिये।
  • उन गतिविधियों के स्वभाव और विशेषताओं के विषय में सोचना,जो भगवत अनुभव पर केन्द्रित न हो,यह बाधा है। भगवान का दास होना और भगवत इच्छा से कार्यरत होना यह जीवात्मा का स्वभाव है– इसके विपरीत होना यह जीवात्मा के स्वभाव के लिए उचित नहीं है।
  • अपना स्वभाव जो की पूरी तरह से उपाय रूप में भगवान पर अवलंबित है, उसे भूल जाना बाधा है। भगवान सिद्ध साधन कहलाते है –अर्थात “उपाय जो की हमेशा फल प्राप्ति कराने के लिए तैयार हो।” हमें इस पक्ष को कभी भूलना नहीं चाहिए।
  • साध्य साधन (उपायान्तर जैसे कर्म, ज्ञान, भक्ति योग) के विचारों के प्रति आकर्षित होना, बाधा है। साध्य साधन का अर्थ है “स्वयं के प्रयत्न से अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना”।
  • केवल भगवद कैंकर्य के विषय पर ध्यान केन्द्रीत करना और भागवत कैंकर्य का विस्मरण करना, यह बाधा है।
  • भगवान और भागवतों के लिए किये गए कार्यों के विषय में सोचना (अभिमान से) और उनके प्रति किये हुए प्रतिकुल व्यवहार से घबराना नहीं। यह दोनों बाधाएं है।
  • आचार्य ने हम पर असीम कृपा की है, निरन्तर धन्यवाद प्रगट करना चाहिये, ऐसा न करना बाधा है।
  • यह सोचना कि अन्त समय में भगवान के विषय में सोचना आवश्यक है, वह बाधा है। जो कर्म, ज्ञान, भक्ति योग में लगा हुआ है, उसे परमपद कई जन्म के पश्चात प्राप्त होगा। ऐसे व्यक्ति को अन्त समय में भगवान के विषय में सोचना आवश्यक है। परन्तु प्रपन्नों को अन्तिम स्मृति कि कोई आवश्यकता नहीं है। जैसे भगवान वराह चरम श्लोक में कहते है “अहं स्मरामि मत भक्तं” – अपने भक्तों के अन्तिम समय में, मैं उनका स्मरण करता हूँ और उनका कल्याण करता हूँ, प्रपन्नों को मोक्ष प्रदान कर परमपद प्रदान करें यह भगवान कि ज़िम्मेदारी है। अनुवादक टिप्पणी: जैसे हम अपने बहुत से पूर्वाचार्यों के जीवन में देख सकते है कि जब वे अपनी तिरुमेनी (शरीर) छोड़ते है, तो वे अपने आचार्य को स्मरण करते है न कि भगवान का। यह स्थापित किया जा सकता है कि अन्त समय में अपना मन स्थिर हो तो हमें अपने आचार्य का स्मरण करना चाहिये न कि भगवान का – क्योंकि हमें आचार्य अभिमान निष्ठा वाले ऐसा समझा जाता है।

हम अगले अंक के अगले भाग में इस विषय को आगे बढ़ाएंगे।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2014/02/virodhi-pariharangal-12.html

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प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – १०

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देख सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ९

श्रीरामानुज स्वामीजी शास्त्र का तत्व लाये – दिव्य देशों में विराजमान भगवान का कैंकर्य

नित्य कर्मानुष्ठान

४१) अनुष्ठान विरोधी – नित्य दैनिक क्रियाओं में बाधाएं

अनुवादक टिप्पणी: बाधाएं जानने से पहिले इस विषय पर विस्तार पूर्वक विश्लेषण करेंगे। इस विषय मे क्या करे और क्या न करे इसपर बहुत भ्रांतियां है।

  • अपने अनुष्ठान में बहुत से पहलु है। हम सम्प्रदाय के तत्त्वों के प्रति कैसा आचरण करें यहाँ यही मूल केंद्र है।
  • यानि कर्म और कैंकर्य के मध्य में मतभेद समझना। जबकी कर्म सामान्य धर्म है जिसे पालन करना जरूरी है और कैंकर्य विशेष धर्म है जो सामान्य धर्म से भी अधिक मुख्य है।
  • कर्म तीन प्रकार के है
    • नित्य कर्म – नित्य दैनिक क्रियाओं जैसे संध्या वंदन आदि
    • नैमित्तीक कर्म – सामयिक कार्य जैसे तर्पण आदि
    • काम्य कर्म – कार्य जो सांसारिक लाभ के लिये किया जाता है।
  • कैंकर्य तीन प्रकार के है
    • भगवद कैंकर्य – भगवान के प्रति सेवा (नित्य और नैमीतिक कर्म भगवान के कैंकर्य का एक भाग है जो भगवान स्वयं हमें यह करने की आज्ञा करते है)।
    • भागवत कैंकर्य – भगवतों के प्रति कैंकर्य
    • आचार्य कैंकर्य – अपने स्वयं के आचार्य के प्रति कैंकर्य
  • यह तत्व हमारे समझने के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। वर्णाश्रम धर्म का त्याग कोई भी कभी भी नहीं कर सकता है। मुमुक्षुपड्डी के २७० और २७१ सूत्र में यह पक्ष बहुत अच्छी तरह समझाया गया है – अवतारिका २७० में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कहते है “कर्म, ज्ञान, भक्ति योग का कोई स्वरूप त्याग नहीं है” (जिसका अर्थ वह केवल उपाय बुद्धि त्याग है – यानि कर्म करना चाहिये परन्तु वह भगवान को पाने का उपाय नहीं होना चाहिये परंतु कैकर्य स्वरूप होना चाहिए) – हमें भगवान को प्रसन्न करके कुछ पाने हेतु कोई उपाय नहीं करना चाहिए। सभी नित्य (प्रति दिन संध्या वंदन आदि) और नैमित्तीक (तर्पण आदि) कर्म कैंकर्य समझकर करना चाहिये। यह अगले सूत्र में दर्शाया गया है “कर्मं कैंकर्यत्तिले पुगुम …” (कर्म कैंकर्य में आता है) – श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अतिरिक्त अन्य कौन इसे भली प्रकार से समझा सकता है?
  • परन्तु कब यह सामान्य कैंकर्य अप्रधान बन जाता हैं? अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार के आचार्य हृदय के ३१वें चूर्णिका के व्याख्यान में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी समझाते है – “अत्ताणि चेवगत्तिल पोधुवानाथू नलुवूम।” श्रीवरवरमुनि स्वामीजी व्याख्या में यह समझाते है कि हम भगवद/भागवत कैंकर्य में लगे रहे, सामान्य कैंकर्य तो बाद में या छोड़ा भी जा सकता है।
  • आजकल यह देखा जा सकता है कि कई श्रीवैष्णव बुनियादी अनुष्ठान भी नहीं करते है यह कहते है कि “यह श्रीवैष्णवों के लिये जरूरी नहीं है”।
  • परन्तु हमारे पूर्वाचार्यों ने यह स्पष्ट रूप से वर्णन किया है कि सामान्य कैंकर्य करना जरूरी है और वह स्वयं बिना चूके इसका पालन करते थे – क्योंकि वे शास्त्र का कठोरता से पालन करते थे। केवल जब भगवद कैंकर्य में मतभेद होता था तो वे सामान्य कैंकर्य को अस्थाई रूप से त्याग कर देते थे।
  • ६००० पदी गुरु परम्परा प्रभावम में बताया गया है कि श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी से यह प्रश्न पूचा गया कि हम क्यों नित्य / नैमितिक कर्म करते है, जबकी हम अन्य देवताओं कि पुजा नहीं करते है। श्रीकलिवैरिदास स्वामीजी अच्छी तरह यह समझाते है कि नित्य / नैमितिक कर्म वैधिक अनुष्ठान का एक भाग है, जो वेद का एक अंग है इसलिये हम इसे करते है।
  • पेरियावाच्चन पिल्लै “परन्त रहस्य चरम श्लोक प्रकरण” में यह समझाते है “नम्माचार्यर्गल इवर्रै अनुष्ठीप्पारुम अनुष्ठीयातारुमाय् पोरुगिरतु” – हमारे कुछ आचार्य ने यह दिखाया है कि वर्णाश्रम का कर्तव्य पालन करना चाहिये और कुछ ने यह बताया है कि वर्णाश्रम का कर्तव्य टाला जा सकता है। इस उदाहरण के साथ हम इसे समझ सकते है: १२० बीस साल की उम्र होने पर भी श्रीरामानुज स्वामीजी संध्या वंदन करते थे और खड़े होकर अर्घ्य देते थे। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी संध्या वंदन को छोड़ भगवान श्रीरंगनाथ की पंखी सेवा करते थे। अत: सामान्य कैंकर्य का तत्व इस पर आधारीत है कि हम भगवद / भागवत कैंकर्य कर रहे है कि नहीं।
  • यह पक्ष श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी ने श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में समझाया है और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने सूत्र २७६ से २७८ तक में बहुत सुन्दर तरिके से समझाया है।
    • सुत्रं २७६ – कैंकर्य दो प्रकार के है।
    • सुत्रं २७७ – चाहनेवाला कार्य करना और न चाहनेवाला कार्य से बचना यह दो प्रकार है।
    • सुत्रं २७८ – चाहनेवाला और न चाहनेवाला कार्य वर्णाश्रम धर्म और आत्म स्वरूप पर निर्भर है। सभी पहलू को जाँचकर इस छोटे से सूत्र के लिये श्रीवरवरमुनि स्वामीजी एक बड़ा और व्यापक व्याख्यान लिखते है। वह इस तत्व को दूसरे तरिके से समझाते है और अन्त में कहते है “अगर वर्णाश्रण धर्म का त्याग करना जरूरी माना जाता है, तो वह प्रत्यक्ष में भगवान (और अम्माजी) कि इच्छा का विरोध करना है। इसलिये इसे उचित नहीं समझा जा सकता है”। इसलिये वह कहते है कि दूसरों के प्रति करुणा भाव से वर्णाश्रम धर्म का पालन करना उचित है। ताकि सभी को इसका पालन करके लाभ प्राप्त हो।
  • अन्त: में यह देखा गया है कि हमारे पूर्वाचार्य पूर्णत: शास्त्र के नियम अनुसार जीवन व्यतित किये है और नित्य और नैमित्तीक कैंकर्य को किये और वे कभी भी काम्य कर्म में नहीं लगे – यह कर्म सांसारिक लाभ के लिये किया जाता है। नित्य और नैमितिक कर्म करना जरूरी है – इसे नहीं करना, शास्त्रों में अमान्य है। परन्तु काम्य कर्म वैकल्पिक है।
  • इसलिये हमें अपने पूर्वाचार्य के पदचिह्नों पर चलना चाहिये और उनके बताये अनुसार मूल तत्व को अपनाना चाहिये।

इस विषय में हम अब बाधा देखेंगे।

  • ऐसी दिनचर्या का पालन करना जो भगवद, भागवत और आचार्य कैंकर्य के अंतर्गत नहीं आती है। यह ३ हमारे स्वरूप के लिये स्वाभाविक है। इन ३ कैंकर्य को छोड़ दूसरा कुछ भी करना बाधा है।
  • उपर बताये ३ कैंकर्यों में हमें यह विचार नहीं करना चाहिये कि केवल भगवद कैंकर्य हीं स्वाभाविक है और अन्य दो अर्थात आचार्य और भागवत कैंकर्य अतिरिक्त है। जैसे भगवद कैंकर्य स्वाभाविक है, आचार्य कैंकर्य भी स्वाभाविक है। प्रणवम में यह समझाया गया है कि जीवात्मा स्वाभाविक रूप से भगवान की दास है। क्योंकि आचार्य और भागवत, भगवान को प्रिय है, इसीलिए उनका कैंकर्य करना भी जीवात्मा के लिये स्वाभाविक है। अनुवादक टिप्पणी: पेरिय तिरुमौली में श्रीपरकाल स्वामीजी स्वयं तिरुमन्त्र का तत्व भगवान को सुनाते है जैसे “नीन तिरुवेट्टेलुत्तुम कट्रू नान उट्रूतुम उन्नादियार्क्कदीमै कण्णपुर्त्तुरैयम्माने” – तिरुक्कण्णापुरम के प्रिय भगवान! तिरुमन्त्र का तत्व सिखने के पश्चात मैंने यह समझा कि मैं आपके भक्तों का दास हूँ। इससे यह समझना सरल है कि आचार्य और भागवतों का दास बनना यह मुख्य सिद्धान्त है और यह भगवान का दास बनने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • अन्रुसमस्यम – अनुकम्पा (दया)। लोक संग्रहं – संसार का कल्याण (शास्त्र का पालन करके)। श्रीवैष्णवों द्वारा सामान्य कैंकर्य (बुनियादी वर्णाश्रम धर्म) अन्रुसम्स्यार्थ (साधारण मनुष्यों के प्रति करुणा भाव से) पालन किया जाता है और यह लोक संग्रहार्त्थं नहीं है (संसार के कल्याण हेतु शास्त्र के तत्व का निर्वाह करना)। श्रीभगवद्गीता के ३.२२ में भगवान कृष्ण कहते है कि उनके लिये कोई नियत कार्य नहीं है फिर भी अपने अनेक अवतारों के समय वह शास्त्रानुसार उसका पालन करते है। अनुवादक टिप्पणी: उसके पिछले श्लोक में ३.२१ में भगवान कहते है कि समाज में जो भी बड़े महान जन करते है सामान्य जन उसी राह पर चलते है। इसीलिये हमारे पूर्वाचार्य अपनी अनुकम्पा से सामान्य कैंकर्य का पालन करते थे। अन्रुसमस्यम और लोक संग्रहं के मध्य सूक्ष्म भेद उनके उद्देश और भाव है। इसे करुणा भाव से करना (यानि यह भगवान कि इच्छा है और वर्णाश्रम धर्म कि आज्ञा जो इस सांसारिक दुनिया के लिये जरूरी है और मार्गदर्शक को इसका पालन करना चाहिये ताकि दूसरे जन उनकी राह में चल सके और आध्यात्मिक में प्रगति कर सके) और इसके विपरीत मार्गदर्शक के लिये करना (अहंकार का रंग कि मैं इसे पूरी अच्छी तरह से कर रहा हूँ और बाकि सब इसी राह पर चले और कामयाब हो)।
  • करुणा स्वरुप किया गया कोई भी कार्य जो जीवात्मा के स्वरुप अनुरूप नहीं है, वह कैंकर्य का एक हिस्सा नहीं हो सकता है। उसे कैंकर्य का एक भाग समझना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जीवात्मा का सच्चा स्वभाव भगवद भागवतों कि निर्हेतुक सेवा करना है – इसके सिवा करुणा भाव से कुछ भी करना (शास्त्र के विशेष समत्ती के सिवा) वह कैंकर्य नहीं समझा जाएगा।
  • अगर भगवान हमारे सामने है तो (जैसे सवारी में या सन्निधि में इकट्ठा होना) हमें सामान्य धर्म (जैसे संध्या वंदन आदि) करने के लिए अपनी उपस्थिती का त्याग नहीं करना चाहिए, दूसरों के प्रति अपनी करुणा भाव को दर्शाते हुए। केवल भगवान के अपनीसन्निधि में जाने के पश्चात हमें अपने दिनचर्या में लगना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह परम संहिता में समझाया गया है “येन  येनदाता गच्छति तेन तेन सह गच्छति ” – जब भी परम परमेश्वर जायेंगे उनके शिष्य (यहाँ पर मुक्तात्मा) पीछे जायेंगे। यह भट्टर स्वामीजी के चरित्र से समझ सकते है जिसका प्रमाण पहिले भी दे चुके है। एक बार जब वे श्री रामानुज स्वामीजी को पंखी कर रहे थे और संध्या वंदन का वक्त हो गया, एक श्री वैष्णव ने भट्टर स्वामीजी को यह याद कराया। भट्टर स्वामीजी ने उत्तर दिया “अगर मैं श्री रामानुज स्वामीजी के प्रत्यक्ष सेवा कार्य के लिए इस वक्त संध्या वंदन को छोड़ दूँ, चित्र गुप्त (धर्म राज यम के सहायक) इसकी पाप में गिनती नहीं करेंगे।” यह कहा जाता है की जब श्री रामानुज स्वामीजी सवारी के लिये बाहर जाते थे सभी उनकी सुरक्षा हेतु साथ रहते और उनकी सन्निधि में वापस आने तक उनके साथ ही रहते थे। इसीलिए हमारे पूर्वचार्यों का कहना है की जब हम कैंकर्य मे व्यस्त हो तब कर्म अनुष्ठान विलम्ब से कर सकते है।
  • जब श्रीवैष्णव जन भगवान के दिव्य गुणों का अनुभव या उसकी चर्चा कर रहे हो तो हमें संध्या वन्दन आदि करना है यह कहकर उस गोष्ठी को मध्य में छोड़ कर नहीं जान चाहिये। यद्यपि इस कार्य को दूसरों के लिए करुणा भाव से किया गया है तथापि यह कार्य वह भगवत/भागवत के अनुभव की कीमत चुकाकर नहीं कर सकते।
  • प्रपन्नों के लिये केवल भगवान ही उपाय है। इसलिये सभी कार्य करते समय हमें वह उपाय समझकर नहीं परंतु कैंकर्य समझकर करना चाहिये। उस कैंकर्य को बिना कोई आशा से करना चाहिये और जीवात्मा के लिये यह स्वाभाविक है। इसमे शामिल है:
    • ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना (तिरुमण / श्रीचूर्ण)
    • तीर्थ, प्रसाद आदि को ग्रहण करना
    • भगवान के श्रीचरणों का प्रक्षालन करना (तिरुवाराधन का एक भाग)
    • दिव्य प्रबन्ध पाशुरों का गान करना
    • दिया लगाना (मन्दिर में, तिरुमाली में, भगवान कि सन्निधी में आदि)
    • पुष्प माला बनाकर भगवान को अर्पण करना
    • बगीचे में भगवद कैंकर्य के लिये पुष्प लगाना।
    • श्रीवैष्णवों की सेवा करना।
    • दिव्य प्रबन्ध, रहस्य ग्रन्थ को सिखना और सिखाना।
  • जिसे हमारे पूर्वाचार्य ने कभी नहीं किया उस कार्य को करना बाधा है। तिरुप्पावै में श्रीगोदाम्बाजी कहती है “चेय्यातन चेय्योम”।
  • कैंकर्य कोई कारण हेतु नहीं करना चाहिये उसे तो केवल भगवान के आनन्द के लिये करना चाहिये।
  • हमें भगवान के आनन्द के लिये कैंकर्य करना चाहिये नाकि स्वयं की खुशी के लिये। सहस्त्रगीति में श्रीशठकोप स्वामीजी यह घोषणा करते है “तनक्केयाग एनैक  कोल्लुम इदे” – कृपया आप मुझे अपने कार्य के लिये, आपके आनन्द के लिये उपयोग करें (मैं आपके आनन्द को छोड़ और कोई कार्य नहीं करना चाहता हूँ)। श्रीलक्ष्मणजी भगवान राम और माता सीता को कहते हैं कि मुझे उस कार्य कि आज्ञा करें, जिससे आपको आनन्द प्राप्त होता हो। श्रीगोदाम्बाजी तिरुप्पावै के अन्त में इसी की प्रार्थना करती है “मट्रै नम् कामंगल माट्रु”
  • अत: हमने भगवान के आनन्द को ही अपना एक मात्र लक्ष्य समझ कर सभी कैंकर्य करने के महत्त्व को देखा । यह भी देखा कि कैसे बिना कोई आशा से हमें कैंकर्य करना चाहिये जो श्रीवैष्णवों के लिये स्वाभाविक है।

-अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ९

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देख सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ८

 

३८) आवश्यक विरोधी – जिन सिद्धांतों को स्मरण रखना और जिनसे बचना आवश्यक है. उनमें उत्पन्न होने वाली बाधाएं

हमें इन बाधाओं को स्मरण भी करना चाहिये और इनसे बचना भी चाहिये। जब हमारा थुक (राल) किसी को छुता है, तो वह अशुद्ध हो जाता है। मनुष्य शरीर में नौ बाहरी मार्ग है (हमारे शरीर को नव द्वार पट्टन कहा जाता है– नौ दरवाजे वाला शहर– २ आँखे, २ कान, मुह, २ नासिका छिद्र, पेशाब संबंधी इंद्रिय और मल उत्सर्जन इंद्रिय)। हमारे हस्त इन किसी भी भाग को छू लेने पर दूषित हो जाते है और इसे शुद्ध करना पड़ता है। हम हाथ को जल से धोकर शुद्ध कर सकते है। जब हाथ पैरों को छुते है तब कहीं भी हाथ लगाने से पूर्व उन्हें साफ धोना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: यह विषय और आनेवाले और दो विषय अशुद्धी पर हीं है। आधुनिक सभ्यता में अशुद्धी को पूर्णत: नकारा गया है। सामान्यत: मुंह/ होठों (चुसना, जुबान से चाटना आदि) को छूकर हाथ से खाने / पीने को अशुद्धी कहते है। अन्य अशुद्धी के पहलु भी है जैसे

  • खाना / पीना
    • खाने के मुख्य पात्र को अशुद्ध हाथ लगाना।
    • बायें हाथ से खाना / पीना।
    • चम्मच, नली आदि से खाना / पीना भी अशुद्धी है।
    • उस स्थान को साफ न करना जहाँ हमने प्रसाद पाया है। गाय के गोबर से उसे साफ करना चाहिये।
    • खाने के पश्चात हमें हाथ, पैर को साफ धोना चाहिये और मुंह का कुल्ला करना चाहिये।
  • अशुद्ध वस्त्र
    • एक बार शरण की गयी धोती या साडी, रात में शयन के समय पहनी जाये अथवा शयन करने वाले बिस्तर को भी छुले तो वह अशुद्ध हो जाता है। उसे धोने के लिए डालना चाहिये और स्नान के पश्चात उसे छुना भी नहीं चाहिये।
  • जन्म / मरण
    • सगे सम्बन्धी के जन्म मरण के समय हम असौच हो जाते है और अत: कोई कैंकर्य भी नहीं कर सकते (तिरुमाली के भगवान का भी)। फिर भी संध्या वंधन असौच में भी नहीं त्याग सकते है।
    • नाई, अस्पताल, आदि स्थान हमें अशुद्ध कर देते है। वहाँ से घर पर लौटकर स्नान करना चाहिये।
    • मनुष्य को शौचालय जाकर आने के पश्चात स्नान करना चाहिये और स्वयं को शुद्ध करना चाहिये।
    • स्त्रीयों को अपने माहवारी के दौरान सबसे अलग रहना चाहिये और किसी से भी घुलना मिलना नहीं चाहिये।
    • जो अशुद्ध है उनसे करीबी सम्बन्ध रखने से स्वयं भी दूषित हो जाते है और ऐसी दशा में हमको शुद्ध होना चाहिये।

हमें अपने बड़ों से इन सब अशुद्धी के बारें में सिखना चाहिये। इस विषय में हम बाधाओं को देखेंगे।

  • श्रीवैष्णव और आचार्य के तिरुमाली के समीप थुककर आदि से अशुद्ध करना। अनुवादक टिप्पणी: आजकल सड़कों पर थूकना सामान्य हो गया है। इससे बचना चाहिये और यह बहुत बड़ी भूल है।
  • श्रीवैष्णव और भगवान के गुजरने (सवारी) की राह को अशुद्ध करना।
  • उस बगीचे को दूषित करना जहाँ नित्य सूरी पुष्प का अवतार लेकर भगवान का कैंकर्य करते है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीकुलशेखर स्वामीजी, पेरुमाल तिरुमौली में यह दर्शाते है “ऊनेरु सेल्वम्” 4थे पधिगम “एम्पेरुमान् पोन्मलैमेल् एतेनुम् आवेने” – मुझे इस पवित्र तिरुवेंकट के पहाड़ों पर कुछ भी बना दीजिये। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी. श्रीरंगराज स्तव में यह दर्शाते है कि नित्यसूरी गण दिव्यदेश के बगीचे और सड़कों में पधारकर भगवान को प्रसन्न करने हेतु पुष्प और वृक्ष का रूप लेते है।
  • जहाँ आचार्य विराजमान है, उस स्थान को प्रदूषित करना।
  • प्रदूषित करने के पश्चात आचार्य के निकट जाकर उन्हें जल आदि देकर उनकी सेवा करना।
  • दूषित होने के पश्चात हमें इससे बचना चाहिये
    • भगवान के अर्चा विग्रह को स्पर्श करना
    • भागवतों को स्पर्श करना
    • भागवतों से दूर जाने से बचना
    • श्रीवैष्णव के तिरुमाली और बगीचे से जाने से बचना।

३९) शरीर शुद्धी विरोधी – स्वयं के शरीर को शुद्ध करने में बाधाएं

शरीर शुद्धी अर्थात स्वयं के शरीर को शुद्ध रखना। यह दूसरे कि पवित्रता रखने में भी लागू है। जिस भी कार्य से अपवित्रता होती है वह बाधा है और उससे बचना चाहिये।

  • जान बुझकर नदी, तालाब आदि का जल, जो भगवान के कैंकर्य में लगता है उसे दूषित करना। हमें इस बात का बहुत ध्यान रखना चाहिये और इस प्रकार के जल कि शुद्धता को खराब नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य और श्रीवैष्णवों के लिये रखे हुये जल को स्वयं के उपयोग में लेना। हमें स्वयं के उपयोग हेतु इस जल को नहीं लेना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों के उपयोग के पश्चात जो जल शेष है उसे “शेषम” कहते है और वह अबसे ज्यादा शुद्ध होता है। हमें ऐसे जल को हमारे हाथ, पैर, आदि धोने में उपयोग नहीं करना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के उपयोग पश्चात बचे हुए जल को श्रीपादतीर्थ के रूप में ग्रहण करना चाहिये।
  • हमें आचार्य और श्रीवैष्णवों के श्रीपादतीर्थ को हमारे हाथ, पैर, आदि धोने में उपयोग नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य जिस स्थान पर अपने हस्त को धोते है उस स्थान को पवित्र मानना चाहिये। एक शिष्य को उस स्थान पर अपने हाथ, पैर को नहीं धोना चाहिये।
  • हमें जल को इस तरह नहीं फेकना चाहिये कि वह दूषित जल श्रीवैष्णवों पर गिरे।
  • भागवतों के छुने मात्र से हम पवित्र हो जाते है। इसे छोड़ और कोई दूसरा विकल्प देखना भी अपचार है।

४०) स्नान विरोधी – स्नान करने में बाधा

स्नान अर्थात नदी, तालाब, आदि में स्नान करना जहाँ कोई पूरी तरह पानी में डुबता है और अपनी शरीर की गंदगी निकालता है। इसे तमील में निराट्टम या तीर्थामादुतल से पहचाना जाता है। ब्राम्हणों (दूसरे भी) की दिनचर्या में इसका अति मुख्य स्थान है। हमारे पूर्वज इसे अवगाहन स्नान ऐसे बताते है (नदी, तालाब आदि के जल में पूर्णत: डुबना) वह जिससे सच्ची शुद्धता प्राप्त होती है। आज कल के दिनचर्या में ऐसे मौक़े बहुत कम आते है – हम आज कल स्नान गृह में स्नान करते है जहाँ नहाने के लिए लोटे का इस्तेमाल किया जाता है।

  • हमें सिर्फ स्वच्छता हेतु स्नान नहीं करना चाहिये। हमें शास्त्र के नियमानुसार स्नान करना चाहिये।
  • प्रपन्न होकर कोई विशेष दिन पुण्य कमाने के लिये स्नान करना बाधा है। विशेष दिन यानि संक्रांती, पुण्य काल, ग्रहण आदि। प्रपन्न होकर हमने अपनी पूरी जवाबदारी भगवान के चरण कमलों में दे दिया है। इसलिये ऐसे अवसर पर स्नान करने का कोई प्रश्न ही नहीं है। यह पूर्णत: जीवात्मा के स्वभाव के विरुद्ध है।
  • प्रपन्न के सिद्धांतों के विरुद्ध, कार्य करने के पश्चात, विशेष करुणा से और सम्प्रदाय के संरक्षण हेतु, यह सोचकर दुखी होना चाहिए कि इस शरीर बंधन के कारण ऐसा कार्य करना पड़ा। ऐसे कार्य के लिए भयभीत न होना बाधा है। यह सीधे स्नान से सम्बंधित प्रतीत नहीं होता है।
  • नदी के घाटों पर जहाँ पर भगवान के कैंकर्य हेतु जल लिया जाता हो उस स्थान पर स्नान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीशठकोप स्वामीजी अपने तिरुविरुत्तम के पहिले पाशुर में कहते है कि हमारे पास गंदा शरीर है अलुक्कुडम्बुम – श्रीपरकाल स्वामीजी भी तिरुक्कुरुन्दाण्डगम में शरीर के लिये यही शब्द का प्रयोग करते है। इसलिये किसी को भी वहाँ जाकर अपना शरीर को नहीं धोना चाहिये जहाँ भगवान के कैंकर्य हेतु जल लाया जाता हो। उस स्थान को हो सके उतना पवित्र रखना चाहिये।
  • उस घाट में स्नान करना जहाँ संसारी जन भी स्नान करते है, वह बाधा है। हमें उस स्थान पर स्नान नहीं करना चाहिये क्योकि संसारी द्वारा छुवा हुआ जल हमें छु लेगा। आचार्य हृदय के ३२वें चूर्णिका में अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनार एक घटना को दर्शाते है “साधन साध्यंगलिल मुतलुम मुडिवुम वर्णधर्मिगल दासवृत्तिगलेन्रु तुरैवेरीविडुवित्ततु” – जो कर्म (उपाय का पहला चरण) और कैंकर्य (ऊपेय का अन्तिम चरण) के मध्य में मतभेद समझ सकता है वह यह कहता है “आप वर्ण धर्म के अनुयायी हो और हम भगवद दासत्व के अनुयायी है – इसलिये हम आप के साथ एक ही घाट में स्नान नहीं कर सकते है”। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी तिरुव्हिंद्रपुरम कि एक सुन्दर घटना दर्शाते है। वहाँ एक श्रीवैष्णव थे (सन्यासी/जीयर) उनका नाम “विल्लीपुत्तुर पगवर” था जो अपना अनुष्ठान किसी घाट में करते थे, यद्यपि वहाँ के अन्य ब्राह्मण अपना अनुष्ठान किसी दूसरे घाट में करते थे। वह ब्राह्मण उन्हें अपने घाट पर आकर अनुष्ठान करने को कहते है जहाँ केवल ब्राह्मण ही अनुष्ठान करते है और विल्लीपुत्तुर पगवर प्रमाण देकर उत्तर देते है “हम भगवान श्रीमन्नारायण के दास है और आप वर्ण धर्म के अनुयायी हो – तो हम दोनों का मिलने का तो प्रश्न हीं नहीं आता” और उस स्थान से चले जाते है।
  • नदी में स्नान करते समय हमें उस घाट में स्नान नहीं करना चाहिये जहाँ से जल संसारीयों के उपयोग किये हुए घाट से आता है। अनुवादक टिप्पणी: इसका अर्थ यह है कि हम संसारीयों के बचे हुए जल से स्नान कर रहे हैं जो कि सही नहीं है।
  • हमें उस घाट में स्नान नहीं करना चाहिये जहाँ आगे श्रीवैष्णव स्नान कर रहे हो। हमें श्रीवैष्णवों के घाट के पश्चात स्नान करना चाहिये। इससे सम्बंधीत हम श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के जीवन से एक घटना देख सकते है। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कावेरी नदी में स्नान करने हेतु जाते थे। एक श्रीवैष्णव “तिरुमंजन अप्पा” जो भगवान श्रीरंगनाथ कि सेवा करते थे वह श्रीवैष्णव निरन्तर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के स्नान के पश्चात स्नान करते थे और इससे ज्ञान, वैराग्य आदि कि कृपा उन पर हो गयी और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को अपने आचार्य रूप में स्वीकार कर लिया।
  • दुसरे मंत्रों के साथ स्नान करना। सामान्यत: स्नान के समय कुछ मंत्रों का उच्चारण होता है। हमें अवैष्णव मंत्रों से सावधान रहना चाहिये।
  • सामान्यत: यह देखा जाता है कि “इमम्मे गंगे यमुने सरस्वती” श्लोक का स्नान से पहिले उच्चारण होता है। प्रपन्नों को यह नहीं करना चाहिये। श्रीरंगनाथ भगवान की इस तरह स्तुति होती है “तिरुवरंगप पेरुनगरुल तेण्णिर्प पोन्नित तिरैक्कैयाल अडिवरुडप पल्ली कोल्लुम करुमणि”“कावेरी नदी की लहरे श्रीरंगम में आदि शेष पर शयन कर रहे श्रीरंगनाथ भगवान को बहुत हल्के से छु कर जाती है” हमें यह उच्चारण करना चाहिये “गंगैयिल पुनितमाय  काविरी” “कावेरी जो गंगा से भी अधिक पवित्र है”। जीवात्मा को स्नान के समय विरजा नदी का भी स्मरण करना चाहिये जो परमपद के सीमा पर बहती है।
  • भगवद, आल्वार a आचार्य के उत्सवों में उपस्थित होने के पश्चात सेवार्त्ति (जो उत्सवों मे दर्शन हेतु आये है) को छुने के बावजूद स्नान नहीं करना चाहिये। भगवद, आल्वार और आचार्य के उपस्थिति में भीड़ के छुने को नकारा जाता है।
  • जब श्रीवैष्णव जन इस संसार को छोड़ कर जाते है – तो उनका शरीर को “विमल चरम विग्रह” समझा जाता है – पवित्र शरीर। ऐसे तिरुमेनी (शरीर) को भगवान के अर्चा विग्रह के समान समझा जाता है। इसलिये ऐसे शरीर को असौच नहीं समझना चाहिये और इससे बचना चाहिये। अन्तिम क्रिया होने के पश्चात स्नान किया जाता  है – परंतु उसे केवल अवबृता स्नान समझना चाहिये (उत्सव के समापन का एक भाग समझे जैसे तीर्थ वारी)।
  • अवैष्णव / अभागवतों को छुने के पश्चात स्नान करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • आचार्य के तीर्थ उत्सव के दिन शिष्य को अच्छे से स्नान करके भगवद और भागवत आराधन को निभाना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब मठ/तिरुमाली में आचार्य का तिरुनक्षत्र, तीर्थ उत्सव मनाया जाता है तो शिष्य को आर्थिक और प्राकृतिक रूप से उपस्थित रहना चाहिये। आचार्य का तिरुनक्षत्र और तीर्थ उत्सव मनाना यह शिष्य का कर्तव्य है।
  • स्नान के पश्चात शरीर को सुखाने के लिये सिर आदि को हिला कर ऐसे नहीं सुखाना चाहिये कि हमारे शरीर की पानी की बुँदे समीप खड़े श्रीवैष्णव पर गिरे।
  • श्रीवैष्णवों को वेदकप पोन (पारस) कहा जाता है – उनके स्पर्श से हम शुद्ध हो जाते है। उनका स्पर्श हमें अशुद्ध करेगा ऐसा सोचना और उसके लिये स्नान करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी सूत्र २२१ में कहते है “वेदकप पोन पोले इवर्गलोट्टै सम्बन्धं” – श्रीवैष्णवों से सम्बन्ध रखना अर्थात पारस के स्पर्श में आना – जब एक पारस लोहे को छुता है तो वह लोहा सोना बन जाता है। उसी तरह श्रीवैष्णवों के छुने मात्र से हम शुद्ध हो जाते है।
  • भगवान का अभिषेक (तिरुमंजन) करने के पश्चात स्नान करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: जब हम भगवान का अभिषेक करते है तो दूध, दही, शहद आदि हमारे उपर भी गिर जाते है। यह बहुत बड़ा सौभाग्य है। हमें कभी भी यह विचार नहीं करना चाहिये कि हम अशुद्ध हो गये है और इसे साफ करने कि कोशिश भी नहीं करनी चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों को स्नान कराने के पश्चात स्नान नहीं करना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों के हमारे तिरुमाली में आकर वापस जाने के पश्चात हमें स्नान नहीं करना चाहिये।
  • केवल शरीर को साफ करने हेतु स्नान करना बाधा है। हमें स्नान करते समय आध्यात्मिक बातों को ध्यान में रखना चाहिये और उसका पालन करना चाहिये।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ८

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देख सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ७


३६) गति विरोधी – चलने (और अन्य कार्य में) में बाधाएं

सामान्यता गति यानी चलना (गमनम् पर आधारित- जाना), उस पथ पर (जैसे अर्चिरादिक गति – परमपदधाम जाने का उज्ज्वल पथ) और शरण लेने वाला (जैसे अगति – वह जिसके पास कोई शरण न हो)। इस विषय में हमें श्रीवैष्णवों (वह जिसने आचार्य कृपा द्वारा भगवान कि शरण ली है), को संसारियों (भौतिक विचारों वाले लोग), आदि के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये यह चर्चा कि गयी है। हमने पहिले श्रीवैष्णव, मुमुक्षु, संसारी आदि के विषय में चर्चा कि है।

  • श्रीवैष्णव द्वारा उपयोगी बिस्तर पर चलना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णव द्वारा जो भी वस्तु उपयोग किया गया है, उसे पवित्र मानना और उसका सम्मान करना चाहिये। हमारे परम्परा में किसी भी वस्तु पर चलना पाप माना गया है। परन्तु अन्य सभ्यता में पैर उपर रखना, पैरों से वस्तुओ को आगे / पिछे करना, आदि इसे सामान्य माना गया है। हमारे सभ्यता में दूसरों को पैर लगाना अपमान माना गया है।
  • हमारे निकट आने वाले श्रीवैष्णवों को रोकना, उनका अनादर माना जाता है। हमारे निकट आते ही, हमें मान तजकर, उन्हें साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना चाहिये और स्वयं आगे बढ़ना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में यह दर्शाया गया है कि जब भी एक श्रीवैष्णव दूसरे श्रीवैष्णव को मिलते है तो दोनों को एक दूसरे को लम्बी साष्टांग दण्डवत प्रणाम करना चाहिये परन्तु आज कल यह सभ्यता लुप्त होती जा रही है।
  • पिछले विषय के विपरीत संसारी के प्रति नम्र होना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: हमारे पूर्वाचार्यों ने यह समझाया है कि सांसारीयों के प्रति बहुत लगाव रखने से संसार में फँसे रहेंगे – इसलिये उनके प्रति अधिक लगाव होने से हमारी आध्यात्मिक उन्नती कम हो जायेगी।
  • भगवान के मंदिरों के गोपुरों, विमान को देखते ही हमें उसकी पुजा करनी चाहिये और उसकी सुन्दरता को निरखना चाहिये। ध्यान न देना या जल्दी वहाँ से निकल जाना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: पेरिय तिरुमौली के एक पाशुर की व्याख्या में श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै एक घटना बताते है, जहाँ श्रीवेदांति स्वामीजी कहते है कि उन्होंने यह देखा कि श्रीपिल्लै तिरुनारैयूर अरयर और श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी मन्दिर कि प्रदीक्षणा लगाते हुए मन्दिर के गोपुर, श्रीवैष्णवों कि तिरुमाली आदि कि प्रशंसा करते थे।
  • अन्य देवताओं के मन्दिर के गोपुर, विमान आदि को देखते ही श्रीवैष्णवों को वहाँ से तुरन्त निकल जाना चाहिये नाकि वहाँ रहकर उनकी पुजा करें या उनको स्पर्श करें। ऐसा करना विरोधी है। अनुवादक टिप्पणी: इससे आधारित श्रीसहस्त्रगीति के अपने ईडु व्याख्या पर श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी एक घटना बताते है। धनुर्दास स्वामीजी के भतीजे वण्डर और चोण्डर एक दिन श्रीअगलंगा नाट्टाझवान के साथ घुम रहे थे। उन्हें सताने के लिये श्रीअगलंगा नाट्टाझवान ने उन्हें एक जैन मन्दिर दिखाकर भगवान का मन्दिर कहा और प्रणाम करने को कहा। उन्होंने उनकी आज्ञा का पालन किया परन्तु जब उन्हें पता चला कि यह जैन मन्दिर है वह मूर्छित हो गये। यह सुनकर धनुर्दास स्वामीजी वहाँ आकर अपना चरण रज देते है और उसे उन पर लगाने के पश्चात वें उठाते है।
  • भगवान का मन्दिर देख सभी को, घड़ी के कांटे के जैसे चलते है वैसे प्रदक्षीणा लगानी चाहिये। विपरित दिशा में जाना विरोधी है।
  • कहीं जाते समय अगर कोई भागवत दिव्य प्रबन्ध आदि का पाठ कर रहे हो तो हमें रुककर उसे सुनकर और धीरे से वहाँ से जाना चाहिये। इस समय जल्दी से वहाँ से निकल जाना उचित नहीं होगा।
  • सांसारिक विषयों कि जहां चर्चा हो रही हो तो वहाँ से कान बन्द कर तुरन्त निकल जाना चाहिये।
  • आचार्य या श्रीवैष्णवों के साथ चलते समय उनकी परछाई पर कदम नहीं रखना चाहिये।
  • हमें इस तरह चलना चाहिये कि हमारी परछाई भी उन पर न गिरे।
  • हमें इसका भी ध्यान रखना चाहिये कि हमारी परछाई संसारीयों पर न पड़े और सांसारियों कि परछाई हम पर न पड़े।
  • भगवद, भागवतों के लिये कुछ भी सामाग्री लाने के लिये जाये तो ब्रम्हा, शिव आदि के तिरुमाली के निकट से भी नहीं गुजरना चाहिये। शाण्डिल्य स्मृति यह समझाता है कि उनकी तिरुमाली स्मशान के जैसे है।
  • पुजा के लिये उपयोग हेतु सामाग्री पर पैर रखना देवतान्तर के समान है और इसे असौच मानना चाहिये और इसे नहीं करना चाहिये।
  • हमें अवैष्णवों कि संगत में नहीं चलना चाहिये।
  • हमारे यात्रा में जो भी श्रीवैष्णव हमारी संग करते है हमें उनका आभार प्रगट करना चाहिये। इसे तुच्छ समझना विरोधी है।
  • श्रीवैष्णवों को जब विदा करते है तो कुछ दूर तक उन्हें छोड़ने जाना चाहिये और तब तक प्रतिक्षा करनी चाहिये जब तक वें हमारी आँखों से ओझल न हो जाये। घर के दरवाजे से उन्हें विदा करना अनुचित है। अनुवादक टिप्पणी: पूर्वज यह समझाते थे कि गाँव के नदी के तट तक श्रीवैष्णवों को पहूंचाने जाना चाहिये जो गाँव से बाहर होती है।
  • जब आचार्य या श्रीवैष्णव भागवत जन पधारते है, तो हमें स्वयं को आगे बढ़कर उनका स्वागत करना चाहिये। हम जहाँ हैं वहाँ बैठे रहे तो यह ठीक नहीं है।
  • सांसारियों के साथ व्यवहार करते समय जब वें आते या जाते हैं उनके प्रति अधिक विचार करना यह ठीक नहीं है।
  • सांसारिक लाभ के कारण हमें सासारियों के तिरुमाली में नहीं जाना चाहिये।
  • दिव्य देशों को “उगन्तु अरुलिन निलंगल” से जाना जाता है – भगवान यहाँ स्वयं बहुत अनुकम्पा से अवतरित हुए है – यह वो मन्दिर है जिसकी आल्वारों द्वारा बहुत स्तुति कि गयी है। आचार्यों को भी कुछ क्षेत्रों पर बहुत विशेष लगाव था ऐसे स्थानों को अभिमान स्थल कहते है (श्रीरामानुज स्वामीजी को तिरुनारायणपुरम के प्रति बहुत लगाव था, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को राजा मन्नार कोईल के प्रति बहुत लगाव था आदि)। अगर कोई ऐसे स्थानों पर जाता है तो अपना बहुत समय भगवान कि स्तुति और पुजा करते हुए बिताना चाहिये। केवल वहाँ घुमना अच्छा रवैया नहीं है। अनुवादक टिप्पणी: तीर्थ यात्री का मूल उद्देश वहाँ जाकर भगवान कि पुजा करना और महान श्रीवैष्णवों को मिलकर उनका संग गृहण करना है।
  • शारीरिक सम्बन्धियों के यहाँ केवल शरीर सम्बन्ध के कारण कोई कार्य / उत्सव में जाना विरोधी है।
  • श्रीवैष्णवों के यहाँ कोई कार्य / उत्सव मे जाने से बचना जो पूर्णत: कैंकर्य के लिये समर्पित हो विरोधी है।
  • भगवान सभी के हृदय में अंतर्यामी रूप में विराजमान है। इसलिये हमें उतावला होकर नहीं चलना चाहिये और अंतर्यामी भगवान में विघ्न नहीं डालना चाहिये। हमें अपनी चाल में नम्र होना चाहिये ताकि दूसरों को तकलीफ न हो। अनुवादक टिप्पणी: श्रीप्रह्लादजी के चरित्र में यह कहा गया है कि जब उन्हें पहाड़ के उपर से निचे फेंका गया था तो उन्होंने अपने हृदय को बहुत दृढ़ता से पकड़ लिया था ताकि हृदय में विराजमान भगवान को कोई चोट न लगे। यहीं भाव हमारा भी होना चाहिये।
  • हमें निरन्तर सदाचार्य के पिछे जाना चाहिये (सदाचार्य वह है जिन्होने हमारा पञ्च संस्कार किया हो या फिर हमें भगवद विषय में ज्ञान प्रदान किया हो) और उनकी अच्छी तरह सेवा करना चाहिये। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उपदेश रत्नमाला के ६४, ६५ और ६६वें पाशुर में इस तत्त्व को बड़ी सुन्दरता से समझाते है। कृपया इन्हें पढे और इसे स्पष्ट कर ले। अनुवादक टिप्पणी: ६४वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि जब तक आचार्य इस संसार में है तब तक शिष्य को अपने आचार्य कि निरन्तर सेवा करनी चाहिये और यह कहते है कोई भी इससे कैसे बच सकता है। ६५वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी यह समझाते है कि आचार्य कि ज़िम्मेदारी शिष्य का ध्यान रखना है और शिष्य कि ज़िम्मेदारी यह है कि अपने आचार्य कि सांसारिक जरूरत कि वस्तुएं का खयाल रखना है और यह भी कहते है कि इस तत्त्व को समझना और पालन करना बहुत कठिन है। ६६वें पाशुर में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी के बारें में यह दर्शाते है कि वे श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी के ऐसे शिष्य थे कि उनकी निरन्तर सेवा करते थे और उनकी सेवा हेतु उन्होंने परमपद को भी ठुकरा दिया और अपने हृदय को यही निर्देश देते है कि पूरी निष्ठा के साथ ऐसा ही भाव रखे।
  • किसी को भी भगवद / भागवत कैंकर्य छोड़ सांसारिक लाभ के पिछे नहीं भागना चाहिये।
  • सदाचार्य के व्यवस्था हेतु हमें हर समय रहना चाहिये – जब आचार्य जाने को कहे तभी जाना चाहिये और जब आचार्य आने को कहे तो आना चाहिये – उनसे कोई विरोध या सवाल नहीं करना चाहिये – हमे केवाल सदाचार्य का पालन करना चाहिये।
  • दिव्य प्रबन्ध कि गोष्ठी की सवारी में किसी को भी आगे नहीं जाना चाहिये – नम्र होकर पिछे रहना चाहिये। किसीको भी पिछे रहने से घबराना नहीं चाहिये और अंतिम पंक्ति में चलना चाहिये।
  • जो जल्दी नहीं चल सकते है ऐसे गोष्ठी में हमें उनकी मदद करनी चाहिये। जिन व्यक्ति को मदद कि जरूरत है उसे अंदेखा करना विरोधी है।
  • जब हम आचार्य कि कोई भी सहायता करते है तो हमें सभ्य रहना चाहिये। इसे हमें सामान्यतः नहीं लेना चाहिये।

३७) स्थिती विरोधीहमारे रहने में विरोधी (और आचरण)

स्थिती यानी अस्तित्व और बैठना भी। यह विषय यह समझता है कि हमें कैसे विभिन्न परिस्थितीयों में व्यवहार करना चाहिये। संसारी यानी वह जिसे स्वयं का सच्चा स्वभाव भी नहीं मालूम है (यानी भगवान और भागवतों का दास जैसे)। वह अच्छे खाना, कपड़े, आदि पर केन्द्रित करता है। इस विषय पर बाधा आनेवाले पर चर्चा करेंगे।

  • सांसारी के पहने हुए कपड़ों द्वारा छुवा जाना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन चरित्र कि एक घटना को हमने पढ़ा है जहाँ एक देवतान्तर भक्त के कपड़े स्वामीजी को छु जाते है और इसका प्रायश्चित्त स्वामीजी एक भागवत के श्रीपादतीर्थ लेकर करते है।
  • सांसारी के समान या वही आसान पर बैठना।
  • हमारे कपड़ों को श्रीवैष्णवों द्वारा स्पर्श कराना। अनुवादक टिप्पणी: हमें श्रीवैष्णव के निकट बहुत सावधानी से रहना चाहिये और उन्हें नहीं छुना चाहिये। वें भगवद, भागवत आचार्य के कोई कैंकर्य मे कार्यरत होंगे। उस समय हम बहुत मैले / दूषित हो सकते है – इसलिये हमें उन्हें छुने से बचना और उनकी पवित्रता को प्रदूषित करने से बचना चाहिये।
  • स्वयं को श्रीवैष्णवों के बराबर समझना और उनके साथ एक हीं आसान पर विराजमान होना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र में स्वामी श्रीपिल्लै लोकाचार्यजी मुख्यत: एक अपचार को पहचानते है वह यह है की स्वयं को अन्य श्रीवैष्णव के बराबर समझना। हमें हमेशा नम्र रहना चाहिये और अन्य श्रीवैष्णव से नीचा समझना चाहिये।
  • हमें संसारीयों को हमसे बढ़कर नहीं समझना चाहिये और उनसे ऊपर के आसन पर भी नहीं विराजमान होना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: संसारी यानी वह जो हमारे शारीरिक लगाव को अनेक तरीको से बढ़ाते है। संसारी हमारी प्रशंसा करते है तो उससे हमें बचना चाहिये और खुदको उनका दास समझना विरोधी है। एक वह जिसके फल स्वरूप किसी की संसारी वस्तुओं मे चाहना बढ़ती है और उसे संसार के जन्म मरण के सरकश पथ मे ही रखती है।
  • सांसारी जन रहनेवाले तिरुमाली में हमें नहीं रहना चाहिये।
  • हमें संसारीयों कि आने कि प्रतिक्षा नहीं करनी चाहिये यह सोच के साथ कि उनके आने से हमे लाभ होगा।
  • सांसारी के संग में किसी को नहीं रहना चाहिये।
  • सांसारीयों से भरे हुए स्थान में हमें नहीं रहना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों से भी नीचे स्थान पर विराजमान होने को अस्वीकार करना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों से निचले स्थान पर बहुत आनंद से विराजमान होना चाहिये।
  • श्रीवैष्णवों रहने कि तिरुमाली में रहने से डरना।
  • श्रीवैष्णवों के आने कि प्रतिक्षा को लज्जित समझना।
  • श्रीवैष्णवों के संग से दूर रहना।
  • श्रीवैष्णवों से भरे हुए स्थान में रहने से बचना।
  • उस स्थान में रहना जहाँ आचार्य या भगवान बाहर गये या सवारी में है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य देशों आदि में यह देखा जाता है कि भगवान कि पालखी मन्दिर के गलियों में निरन्तर निकलती रहती है। भगवान कि यह हम जीव पर निर्हेतुक कृपा है कि वह स्वयं बाहर आकर हम पर कृपा करते है (जो वृद्ध, बिमार, अपंग, आदि है और मन्दिर नहीं जा सकते है)। जब भगवान कि सवारी हमारे तिरुमाली के सामने आती है तो उनके आने से पहिले हमें बाहर आकर उनके आने का स्वागत करना चाहिये (पुष्प, फल आदि को अर्पित कर)।

आदि केशव पेरूमाल, श्रीदेवी और भू देवी संग – भूतपुरी में पुरप्पाडु के समय

  • आचार्य और श्रीवैष्णवों को देखते ही हमें उसी क्षण साष्टांग दण्डवत कर उनका सम्मान करना चाहिये। ऐसा न करना बाधा है।
  • इसके विपरीत अगर कोई संसारी आता है और बहुत नजदीक वाले है तो भी हमें उनका भव्य स्वागत करने कि कोई जरूरत नहीं है। अनुवादक टिप्पणी:योनित्य …” श्रीरामानुज स्वामीजी की इन तनियन को याद करना चाहिये, जहाँ यह बताया गया है कि श्रीरामानुज स्वामीजी, भगवान के चरण कमलों के अलावा सभी कुछ को तिनके के समान मानते थे।
  • आचार्य और श्रीवैष्णवों के आगमन पर सामान्य रहना। अनुवादक टिप्पणी: श्रीवैष्णवों के आगमन पर हमें उत्साहित होना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि उनका पूरा ध्यान रखा गया है।
  • जब भगवान का तिरुवाराधन चल रहा हो और कोई श्रीवैष्णव पधारते है तो उसी समय तिरुवाराधन को विराम कर श्रीवैष्णव का सत्कार करना चाहिये, उनके बारें मे पूछना, उनके आराम से ठहरने कि व्यवस्था करना और तत्पश्चात फिर से तिरुवाराधन प्रारम्भ करना चाहिये। हम भगवान के तिरुवाराधन मे व्यस्त है ऐसे बताकर श्रीवैष्णवों को प्रतिक्षा नहीं करानी चाहिये। यह समझना अति आवश्यक है कि भागवत आराधना भगवद आराधना से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • जब हम एक श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर रहे हो तो कोई दूसरे श्रीवैष्णव वहाँ पधारते है तो हमें पहिले श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण करना अधुरा नहीं छोड़ना चाहिये। हमें उन दूसरे पधारे हुए श्रीवैष्णव से विनम्र निवेदन कर उन्हें रुकने के लिये प्रार्थना करनी चाहिये और पहिले श्रीवैष्णव से श्रीपादतीर्थ ग्रहण कर फिर दूसरे श्रीवैष्णव से ग्रहण करना चाहिये।
  • श्रीवैष्णव जो अपना श्रीपादतीर्थ प्रदान कर रहे हो तो उन्हें भी सहयोग करना चाहिये और मध्य में नहीं छोड़ना चाहिये।
  • जंगमा विमानम् यानि चलनशील वस्तु – जो उत्सवों में और श्रीवैष्णवों (जो भगवान को अपने हृदय में रखते है) में दोनों वाहनों को दर्शाता है ,अजंगमा विमानम् यानि अचलनशील वस्तु – मन्दिर में गरुड स्तम्भ। हमें इन दोनों वस्तु कि परछाई के ऊपर पैर रखकर नहीं जाना चाहिये।
  • हमें इस तरह नहीं खड़ा होना चाहिये कि देवतान्तर मन्दिर कि परछाई या उनके गोपुर कि परछाई हमारे उपर पड़े।
  • देवतान्तर को प्रिय पेड़ के छाव में भी हमें नहीं रुकना चाहिये (उदाहरण नीम का पेड़)। श्रीशठकोप स्वामीजी को प्रिय इमली के पेड़ की छाव में रह सकते है।
  • देवतान्तर के स्थान और उनके प्रिय स्थान में नहीं रहना चाहिये।
  • भागवतों कि तिरुमाली छोड़ अवैष्णवों कि तिरुमाली में नहीं रुकना चाहिये। अवैष्णवों कि तिरुमाली को टालना बहुत अच्छी बात है। अनुवादक टिप्पणी: इस तत्त्व को महाभारत के एक घटना से सीख सकते है। जब भगवान कृष्ण, दुर्योधन के पास दूत बनकर जाते है तो वह दुर्योधन, भीष्म और द्रोणाचार्य कि तिरुमाली छोड़ विदूरजी कि तिरुमाली में जाते है जो उनके एक बहुत बड़े भक्त थे। दुर्योधन के पूछने पर भगवान कृष्ण यह उत्तर देते है कि “क्योंकि पाण्डव मुझे प्रिय है तो में उनको न चाहनेवालों कि तिरुमाली में नहीं रुक सकता” – भगवान स्वयं भागवतों के यहाँ ठहरने कि इच्छा रखते है और इस तत्त्व को समझाते है।
  • जब आचार्य खड़े हो तो शिष्य को नहीं बैठना चाहिये।
  • जब आचार्य चल रहे तो हमको नहीं बैठना चाहिये। हमें भी आचार्य के साथ चलना चाहिये और उनको अगर कोई सहायता कि आवश्यकता है तो उसे पूर्ण करनी चाहिये।
  • जब आचार्य शिष्य को खड़े होने का आदेश करते है और फिर भी हम उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते है तो यह गलत स्वभाव है।
  • भगवद, भागवत और आचार्य के दिशा में पैर पसारना तो पूर्णत: असभ्य है।
  • मंदिरों में भी जब श्रीवैष्णव जन पधारते है तो हमें खड़े होकर उनका सन्मान करना चाहिये। श्रीवैष्णवों को मन्दिर में आते देखकर भी बैठना असभ्य है।
  • भगवान और भागवतों के सन्मुख हमें आंखें बन्द कर ध्यान में नहीं बैठना चाहिये। हमें आंखें खोलकर भगवान कि सुन्दरता को निहारना चाहिये और भागवतों कि सुंदर उपस्थिती को चखना चाहिये। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के जीवन कि एक घटना है जहाँ स्वामीजी एक बार यह देखते है कि कोई आंखें बन्द कर भगवान के सामने उनकी प्रार्थना कर रहा है और वह उसके प्रति दु:ख प्रगट करते है और कहते है कि वह आंखें बन्द कर भगवान के सुन्दर भव्य दर्शन को खो रहा है। आगे यह भी कहा गया है कि वह मनुष्य अपनी आंखें खो बैठता है।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ७

श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः  श्रीवानाचलमहामुनये नमः  श्रीवादिभीकरमहागुरुवे नमः

श्रीवैष्णवों को अपने दैनिक जीवन में कैसी चुनोतियों का सामना करना पड़ता है इसका उपदेश श्रीरामानुज स्वामीजी ने वंगी पुरुत्तु नम्बी को दिया । वंगी पुरुत्तु नम्बी ने उसपर व्याख्या करके “विरोधि परिहारंगल” नामक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया । इस ग्रन्थ पर अँग्रेजी में व्याख्या श्रीमान सारथी तोताद्रीजी ने की है उसके आधार पर हम लोग हिन्दी में व्याख्या को देखेगें । इस पूर्ण ग्रन्थ की व्याख्या को हम लोग https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/virodhi-pariharangal/ यहाँ पर हिन्दी में देखे सकते है ।

<– विरोधी परिहारंगल (बाधाओं का निष्कासन) – ६

 श्रीरामानुज स्वामीजी और  श्री वंगी पुरत्तु नम्बी

 

३४(शयन विरोधी – शयन में बाधाएं

शयन यानि निद्रा, विश्राम और आराम करना। श्रीवैष्णव परिभाषा में इसे इस तरह कहते है “कण् वळर्गै” स्नान करने के समान कहते है जैसे “नीराट्टम्”। कुछ बाधाएं इस विषय में यहाँ बतायी गयी है। हम उन्हें देखेंगे।

  • सांसारीक मनुष्य के घर में विश्राम करना विरोधी है। मुमुक्षु यानि जो मोक्ष कि अभिलाषा करता है। संसारी यानि जो मोक्ष कि अभिलाषा नहीं करता है। श्रीशठकोप स्वामीजी संसारी कि जीवन मृत्यु को तिरुविरुत्तम के पहिले पाशुर में समझाते है “पोय्न निन्र ञानमुम पाल्ला आलुक्कुडम्बुम” – अज्ञानता से बाहर वही पापों को दोहराना और उसके परिणाम स्वरूप सांसारिक देह लेकर फिर से जन्म लेना।
  • सांसारिक लोगों के साथ बैठना या सोना।
  • सांसारिक लोगों के बिछौना पर विश्राम करना।
  • उनके चरणों के नजदीक सोना।
  • सांसारी के बिछौने से भी नीचे सोना (उदाहरण: वो बिछौना पर विश्राम करें और हम जमीन पर)।
  • उन्हें विश्राम के लिये स्थान देना।
  • सांसारी विश्राम किये हुए स्थान को पवित्र नहीं करना।
  • श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में विश्राम नहीं करना। अनुवादक टिप्पणी: जब भी अवसर प्राप्त होता है हमें श्रीवैष्णवों के तिरुमाली में विश्राम करना चाहिये यह विचार करके कि यह उत्तम सौभाग्य है।
  • यह विचार करके कि वें हमारे समान है उनके साथ विश्राम करना। अनुवादक टिप्पणी: हमें अन्य श्रीवैष्णवों को हमसे उच्च समझना चाहिये।
  • बिना उनको सम्मान दिये उनके पवित्र बिछौने पर हम विश्राम करना।
  • उनके चरण कमलों के समीप विश्राम करने से हिचकिचाना।
  • उनसे भी उच्च स्थान पर विश्राम करना (उदाहरण: वों जमीन पर विश्राम करें और हम बिस्तर पर)।
  • बिना उन्हें उचित स्थान दिये हमारा विश्राम करना।
  • उनके सोये हुए स्थान को उनके उठने के पश्चात उसे पवित्र करना। अनुवादक टिप्पणी: यह एक सामान्य दस्तुर है जहाँ हम पिछले रात को विश्राम किये उस स्थान को अगले दिन जल से धोकर पवित्र करें। परन्तु जब हम अन्य श्रीवैष्णवों को पवित्र समझते है हमें उनके विश्राम स्थान पर ऐसे पवित्र करने का कार्य नहीं करना चाहिये।
  • विहित विषयं यानि आनन्द जो शास्त्र में माना / नियत किया गया है – यहीं भी एक बाधा है। यहाँ एक श्रीवैष्णव कि पत्नी ऐसा दर्शाया गया है (श्रीवैष्णवी के लिये उसका पति)। कोई भी यह विचार कर अपनी पत्नी के साथ नहीं सोता कि यह समागम शास्त्र में आज्ञा किया गया है और इसका आनन्द लेना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी श्रीवचन भूषण दिव्य शास्त्र के १०१ वें सूत्र में समझाते है “मट्रैयिरुवर्क्कुम् निषिद्ध विशय निव्रुत्तिये अमैयुम्; प्रपन्ननुक्कु विहित विशय निव्रुत्ति तन्नेट्रम्” – श्रीवरवरमुनि स्वामीजी इस उच्च तथ्य को अपने सुन्दर तरिके से समझाते है। वह जो सांसारिक लाभ से जुड़े है और वह जो उपायन्तर (कर्म, ज्ञान, भक्ति योग) के पीछे है – दूसरों कि स्त्रियों से अलग हो गये है यह पर्याप्त है (सामान्यता दूसरों कि स्त्रियों की लालसा करना शास्त्र में निन्दक है)। दूसरे अपने स्वयं कि स्त्री के साथ समागम का आनन्द लेते है अपने धर्म को पूर्ण करने हेतु, परन्तु प्रपन्नों के लिये ऐसे समागम उनके स्वरुप विरोधी है, इसलिये इससे भी बचना चाहिये। आगे और भी अन्य ग्रन्थों में समझाया गया है जैसे एरुम्बी अप्पा द्वारा रचित विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णयं कि हमारे पूर्वाचार्य जो उच्च प्रपन्न थे फिर भी इस समागम में कुछ दिनों के लिये रहते थे ताकि एक या दो उच्च श्रीवैष्णव को जन्म दे सके बिना स्वयं के आनन्द और पश्चात पूर्णत: इस कार्य को त्याग कर देते और अपना पूर्ण समय केवल भगवद विषय में लगा देते। यह एक पेचिदा विषय है और सभी को इसके तथ्य अपने आचार्य से सुनना चाहिये।
  • यह सोच कर कि हमारी पत्नी भी एक श्रीवैष्णव है हमें उसके साथ कोई मन में सुख कि भावना लेकर नहीं सोना चाहिये। ऐसे विचार नहीं होना विरोधी है।
  • ऐसे विचारों के साथ नहीं सोना चाहिये जिससे विषय आनन्द मन में उत्पन्न हो।
  • भगवान का विचार किये बिना विश्राम करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सोने जाने के पहिले सभी को इन पाशुरों को गाना चाहिये जैसे श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी कि तिरुमोली “उरगल् उरगल्”, “पनिक्कडलिल् पळ्ळि कोळै”, “अरवत्तमळियिनोडुम्”, आदि। पञ्च काल परायण के लिये विश्राम करना जीवात्मा और परमात्मा के लिये समागम है (वैधिक दिन को ५ भागों में बाटा जाता है और अंतिम भाग को योग कहते है) – भगवान के नाम, रूप, गुण, आदि को विश्राम से पहिले याद करने को बहुत महत्त्व है।
  • अपने आचार्य और पूर्वाचार्य को स्मरण किये बिना विश्राम करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें आचार्य कि तनियन, वाळि तिरुनामम् (ध्यान श्लोक्), आदि को विश्राम से पहिले कहना चाहिये ताकि हमको भगवान से जोड़ने में आचार्य का हमारे उपर जो उपकार है उसे हमें यह स्मरण करा सके।
  • हमारे शारिरीक कार्य के विषय में विचार करते हुए विश्राम करना बाधा है।
  • आत्मा और उसके स्वभाव के बारें में विचार करते हुए आराम नहीं करना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: सभी को आत्मा को भगवान और भागवतों का दास मानना चाहिये और अत: ऐसे रवैये का विचार करना चाहिये।
  • सोते समय हमें अपने पैर भगवद, भागवत और आचार्य कि ओर नहीं पसारना चाहिये।
  • सोते समय मन्दिर, अपने तिरुमाली के तिरुवाराधन कमरे कि और आचार्य के मठ कि ओर नहीं पसारना चाहिये।
  • जब हम आचार्य का कैंकर्य करते है तब हमें विश्राम नहीं करना चाहिये।
  • आचार्य के विश्राम से पहिले हमें नहीं सोना चाहिये।
  • आचार्य के उठने के पश्चात भी हमें नहीं सोना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी: सोने को एक सामान्य कार्य समझ सकते है। परन्तु सभी कार्य में हमें ध्यान पूर्वक सभी कार्य का विश्लेषण करना चाहिये। जैसे पहिले बताया गया है वैधिका यानि एक दिन को पाँच भाग में बाटा जाता है – अभिगमनं (उठना और सुबह के कार्य), उपाधानं (तिरुवाराधन के लिये सामग्री इकट्ठा करना), इज्जा (अपने तिरुमाली के भगवान कि तिरुवाराधन), स्वाध्यायम (उभय वेदान्त को सिखना और सिखाना) और योगम (विश्राम करना – जीवात्मा और परमात्मा का समागम)। योगम भाग को हम सामान्यत: विश्राम करना मानते है और जब विश्राम को अच्छी तरह नियंत्रण में रखेंगे तो तमोगुण कम होगा और सत्वगुण बढ़ेगा। अधिक सोना यानि तमोगुण का सीधा बढाना और हमें अपने दिनचर्या को सुधार कर सुबह जल्दी उठकर और शरीर और मन को भगवद / भागवत कैंकर्य में लगाकर इसको सुधारणा है ।
३५) उत्थान विरोधी उठने में बाधाएं

उत्थानम यानि बिछौने से उठना। हम इस विषय में बाधाएं देखेंगे।

  • जब आचार्य या अन्य श्रीवैष्णव हमें उठाते है तो बहुत धीरे से उठना चाहिये। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवैष्णव हमें उठाते है तो हमें दु:ख प्रगट करना चाहिये की उन्हें हमें उठाना पड़ा। नाकि उनके सन्मुख हम पहिले हीं उठकर बैठ गये। अत: उनके उठाते हीं हमें एक हीं क्षण में बड़े उत्साह के साथ उठना चाहिये।
  • जब सांसारिक लोग उठाते है तब तुरन्त उठना ।
  • भगवान और आचार्य के कीर्ति को याद किये बिना उठना बाधा है। ज्ञानी जन “हरी: हरी:” का जप करते उठते है। “हरिर् हरति पापानि” श्लोक और द्वय महामन्त्र का जप करते हुये उठना हर एक के लिये अच्छा है। अनुवादक टिप्पणी: शास्त्र में ब्रम्ह मुहूर्त में उठने का नियम है (४ बजे) और उठते ही भगवान श्रीमन्नारायण कि महिमा को स्मरण करें। सामान्यत: बड़ो में यह देख जाता है कि उठते हीं गुरु परम्परा का मन्त्र “अस्मद् गुरुभ्यो नम: से लेकर श्रीधराय नम: … ”, रहस्य त्रय (तिरुमंत्र, द्वय मन्त्र, चरम श्लोक), आचार्य तनियन, “हरिर् हरति पापानि” श्लोक्, “कौसल्या सुप्रजा” श्लोक, नदातूर अम्माल का परमार्थ द्वय श्लोक, गजेन्द्र मोक्ष और परत्ववादि पञ्च श्लोक गाते है।
  • जब आचार्य या श्रीवैष्णव हमारी प्रतिक्षा कर रहे हो तो अपने अनुसंधान जैसे दिव्य प्रबन्ध, स्तोत्र, इतिहास, पुराण या जप पर हीं ध्यान देना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: जब श्रीवैष्णव हमारे तिरुमाली में आते है तो हम हमारे नित्य पाठ का अनुसंधान करते हुए उनको प्रतिक्षा नहीं कराना चाहिये। उसे जल्द समाप्त कर उनकी सेवा में लगना चाहिये और फिर अनुसंधान कर सकते है।
  • जब आचार्य किसी के भी गोद पर विश्राम कर रहे हो तो हमें तुरन्त नहीं उठना चाहिये यह कहकर कि मेरा पाव दु:ख रहा है। हम श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी और श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी का संयोग को स्मरण कर सकते है। श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी (आचार्य) श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी (शिष्य) के गोद पर अपना माथा रखकर विश्राम कर रहे थे – श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी बिना हिले बहुत समय तक वैसे हीं बैठे रहे और जब श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी निद्रा से उठे तो उन्होंने श्रीवेदान्ति देशिक स्वामीजी कि उनके आचार्य कि सेवा के कारण और उनके इच्छाशक्ति के कारण बहुत प्रशंसा कि। हम कर्ण का उनके आचार्य श्रीपरशुराम के साथ हुई घटना को भी स्मरण कर सकते है। जब कर्ण श्रीपरशुराम के निकट धनुष बाण कि शिक्षा ग्रहण कर रहा था तो एक दिन परशुराम कर्ण के गोद पर सर रखकर विश्राम करने लग गये। उस समय एक बिच्छु आकर कर्ण को काटने लगा। वह फिर भी नहीं हिला। यह घटना महाभारत में मिल जाती है।
  • जब भी श्रीवैष्णवों कि गोष्ठी चल रही हो तो मध्य में उठकर वहाँ से निकल कर जाना अपचार है और यह गोष्ठी के लिये भी अपमान माना जाता है। अनुवादक टिप्पणी: दिव्य प्रबन्ध या कालक्षेप कि गोष्ठी में कभी भी पहिले आकर और अन्त तक रहना चाहिये। लोगों का मध्य में आना और जाना दूसरों के लिए विघ्न है।
  • श्रीवैष्णवों को उन पर चिल्लाकर जगाना बाधा है। श्रीवैष्णवों को जगाना या उनको एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने के लिये बड़े विनम्रता से कहना चाहिये।
  • बिना कार्य आचार्य को जगाना बाधा है। अनुवादक टिप्पणी: हमें अपने आचार्य के उठने से पहिले उठना चाहिये और उनके जागने कि प्रतिक्षा करनी चाहिये। आचार्य को कोई जागने के लिए विवश नहीं सकता। हम श्रीपराशर भट्टर के जीवन में यह देख सकते है। यह आय् जनन्याचार्य कि तिरुप्पावै के ८वें पाशुर के ४००० पड़ी व्याख्या में दिखाया गया है कि सभी श्रीवैष्णवों को सुबह जल्दी उठना चाहिये, स्वयं को तैयार होना है, और जाकर श्रीपरशर भट्टर स्वामीजी के दरवाजे के पास देखे और धीरे से उन्हें जगाये। क्योंकि वें श्रीकुरेश स्वामीजी और आण्डाल अम्माजी के प्रिय पुत्र थे और श्रीरंगनाथ भगवान / श्रीरंगनाचियार के गोद लिये हुए संतान थे और बहुत बड़े ज्ञानी और सम्प्रदाय के सेनापति थे, उनके शिष्य उनकी बहुत प्रशंसा करते और उनकी सेवा करते थे।
  • आचार्य के उठाने से पहिले नहीं उठना बाधा है। हमें आचार्य के विश्राम के पश्चात विश्राम करना चाहिये और उनके जगने से पहिले जगना और यह सुनिश्चित करें कि उनको कोई तकलीफ तो नहीं है।
  • आचार्य के अन्य शिष्यों को “सब्रम्हचारी” कहते है। उनका बड़ा सम्मान करना चाहिये। उनके समक्ष जम्हाई नहीं लेना, उनके सामने पैर पसार कर नहीं बैठना आदि। इन्हें अपचार समझा जाता है और इससे बचना चाहिये।
  • इन सब्रम्हचारी का आदर करना चाहिये। उनके प्रणाम करने से पूर्व हमें “अड़िएन” कहना चाहिये और प्रणाम करना चाहिये। ऐसे न करना अपचार है।
  • सभी को आचार्य के प्रति, उनके पत्नी के प्रति और उनके पुत्रों के प्रति आदर रखना चाहिये। उठते हीं उनको प्रणाम कर उनकी सेवा करनी चाहिये। ऐसे न करना अपचार है।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

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