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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 7

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 6

 

श्री पेरुमाळ कोईल महामहोपाध्याय जदगाचार्य सिंहासनाधिपति उभय वेदान्ताचर्य प्रतिवादि भयंकर श्री अणंगराचार्य स्वामीजी के कार्य पर आधारितII

समुद्र और भगवत्कल्याणगुण

साधारणतः हमारे पूर्वाचार्यों ने अपने ग्रंथों मे सागर को उपमान मानते हुए भगवान को समस्त-कल्याण-गुण-सागर (तिरुक्कल्याणगुणसागरं) से निर्दिष्ट किया है अर्थात भगवान ऐसे कल्याण गुणों के समुद्र है

स्वामि रामानुजाचार्य भी कुछ इसी तरह सकलहेयरहित-समस्तदिव्यगुणसंपन्न भगवान श्रीमन्नारायण के असीमित विशेष कल्याण गुणों को प्रकाशित करते हुए अपने कई ग्रंथों मे इनका वर्णन करते है । स्वामि रामानुजाचार्य के ग्रंथों मे हम यह भलि-भांति देख सकते है ।

शब्द जैसे – ” अनन्त-गुण-सागरं “, ” अपरिमितोदार-गुण-सागरं “ स्वामि रामानुजाचार्य के श्री-भाष्य ग्रंथ मे परब्रह्म श्रीमन्नारायण के विषय मे बरामद है । उदाहरण मे श्री-भाष्य के दूसरे अध्याय के शुरुवात मे कहा गया है –

प्रथमे अध्याये प्रत्यक्षादि प्रमाण गोचरात् अचेतनात्, तत्संसृष्टाद् वियुक्तास्च  चेतनात्, अर्थान्तरभूतं निरस्त-निखिल-अविद्यादि अपुरुषार्थगंधम् अनन्तज्ञानानन्दैकटानम् अपरिमितोदार-गुण-सागरं निखिल जगद्-एककारणं सर्वान्तरात्मभूतं परं ब्रह्म वेदान्तवेद्यं इतियुक्तं ” ।

सरलार्थ – वेदान्तसूत्रों के प्रथम अध्याय मे कहा गया है – परब्रह्म (जो), अचेतन तत्व (जिनकों हम अनुभव और समझ सकते है) से , भौतिक जगत मे बद्ध जीवात्मावों से , और  भौतिक जगत से विमुक्त जीवात्मावों से, भिन्न है , (जो) अज्ञानता और कलंक रहित है,  (जो) अपरिमित ज्ञान और आनन्द के भण्डार है, (जो) सागर रूपी असीमित असंख्य विशेष कल्याण श्रेष्ठ गुणों से संपन्न है, (जो) इस जगत के आधारभूत तथ्य है, (जो) सभी (अचेतन तत्व, चेतन तत्व इत्यादि) के अन्तर्यामी है, (ऐसे भगवान) वेदान्त से जाने जाते है।

यहा ध्यान पूर्वक समझना चाहिये की पूर्व उल्लिखित वाक्य मे ‘परब्रह्म’ शब्द का प्रयोग प्रथमा विभक्ति (कर्ताकारक/कर्तृवाच्य) मे किया गया और ना की द्वितीय विभक्ति (कर्मकारक) । यह ध्यान मे रखते हुए उपरोक्त वाक्य का अर्थनिर्णय/अनुवाद करना चाहिये । ” अपरमित-उदार-गुण-सागरं “ वाक्य तत्पुरुष समास से विग्रह कर अर्थ समझा नही सकते है । इसका कारण यह है की – अगर इस वाक्य मे प्रस्तुत शब्दों का समास – ” गुणानाम्-सागरः (विशेष गुणों के सागर) “ से किया जाये तो सागरः (सागर) पुल्लिंग शब्द हो जाता है और अतः यह वाक्य ” अपरमित-उदार-गुण-सागरः “ से प्रस्तुत होता । बजाय इस शब्द का प्रयोग नपुंसकलिंग मे किया गया है । इसीलिये इस वाक्य का समास बहुव्रीहि समास से किया जाना चाहिये और यही उचित है जो इस प्रकार है ” अपरिमितः उदारगुणसागरः यस्य तत् ” या “अनन्तः गुणसागरः यस्य तत् “ (जो अनन्त या अपरिमित कल्याण गुण रूपी सागर से सम्पन्न है, वही परब्रह्म है ) । श्रृतप्रकाशिकर ने भी तत्पुरुष समास के माध्यम से इस तथ्य को समझाया है ।

यहा इन दोनों समासों मे अंतर कुछ इस प्रकार से दर्शाया गया है – तत्पुरुष समास मे, भगवान को समुद्र से तुलना करते है, वे पानी वाले समुद्र नही बलकी असंख्य कल्याणगुणों के सागर(समुद्र) है । इसके विपरीत बहुव्रीहि समास मे, भगवान के प्रत्येक गुण सागर बनते हैं और भगवान इस गुणरूपीसागर का आश्रय है । दूसरा अनुवाद इस वाक्य का सच्चा अर्थ व्यक्त करता है अतः यह अनुवाद/अर्थनिर्णय यतार्थ है ।

भगवान को गुणों का सागर कहलाने वाले पद तो हर कहीं मिलते हैं किन्तु उनके गुणों को सागर कहलाने वाले पद भगवद्रामानुजाचार्य की रचनाओं मे ही मिलते हैं | यह तुलना या इस प्रकार का वर्णन केवल श्रीवैष्णव सांप्रदाय से संबंधित आचार्य ही कर सकते है और अगर किसी अन्य ग्रन्थ मे ऐसा प्रयोग मिल जाय तो वह अवश्य श्रीवैष्णव आचार्य की रचना होगी |

स्वामि रामानुजाचार्य ने यह तुलना संयोगवश नही किया है । बलकी वे आऴ्वारों के दिव्यप्रबंधो से भलि-भाँन्ति परिचित थे और इन सभी ग्रंथों को जांच कर उनका अनुसन्धान करने के पश्चात ही वे ऐसी तुलना कर पाएँ । पेरियतिरुवन्दादि मे, स्वामि नम्माऴ्वार कहते है – ‘‘ मिगुन् तिरुमाल्सीर्क्कड़लै युऴ्पोडिन्ड सिंदनैयेन् (६९) “ । इस स्तुति मे, भगवान से असंख्य प्रत्येक कल्याणगुण की तुलना महासागर से की गई है यानि उनके प्रत्येक गुण एक महासागर जैसे असीमित और विशाल है । जिस प्रकार अगस्त्य ऋषि ने खारे समुद्र का उपभोग किया उसी प्रकार अमृत-सदृश भगवान के ऐसे मधुर असंख्य कल्याणगुण रूपी सागर का उपभोग स्वामि नम्माऴ्वार ने किया । कहते है जिस प्रकार एक बादल ( मेघ ) समुद्र के पानि का भोग करता है उसी प्रकार स्वामि नम्माऴ्वार और हमारे पूर्वाचार्यों ने असिमीत विशाल समुद्र जैसे भगवान के प्रत्येक मधुर गुणो का उपभोग किये है । यहा यह व्यक्त किया जा रहा है की – स्वामि नम्माऴ्वार ने बजाय तत्पुरुष समास के बहुव्रीहि समास का प्रयोग किया है ।

स्वामि नाथमुनि

श्री यामुनाचार्य

स्वामि नम्माऴ्वार

स्वामि तिरुमंगै आऴ्वार

 

 

 

 

 

श्री पेरियवाच्चान्पिळ्ळै

श्री वेदान्ताचार्य (स्वामि वेदान्त देशिक)

एक और तुल्य अनुवाद (व्याख्या) इसी प्रसंग मे बताने के योग्य है ।  परमाचार्य स्वामि आळवन्दार अपने स्तोत्र-रत्न के प्रारम्भ मे स्वामि नाथमुनि ( अपने पूज्य पितामह ) का गुणगान करते हुए कहते है – ” अगाध-भगवद्-भक्ति-सिंधवे “ । यहा एक प्रश्न उठ सकता है की – स्वामि नाथमुनि भक्ति के सागर है ( तत्पुरुष-सामास ) या वे सागर जैसे समान भक्ति से युक्त है ( बहुव्रीहि समास) । व्याख्यान मे निपुण भाष्यकार चक्रवर्ती श्री पेरियवाच्चान्पिळ्ळै इस वाक्य का अनुवाद आऴ्वारों के व्याक्यांशो का अनुसरण करते हुए ” काडल् कड़लिन् मिगप्पेरिडु (स्वामि नम्माऴ्वार का तिरुवाय्मोऴि ७-३-६) और “आशयेन्नुम् कड़ल्” (स्वामि तिरुमंगै आऴ्वार का पेरियतिरुमोऴि ४-९-३) इत्यादि पासुरों के आधार पर भक्ति को ही सागर मान कर बहुव्रीहि दृष्टि से निर्वाह किए हैं । इसी तुलना का वर्णन और इसका समर्थन देते हुए श्री वेदान्ताचार्य (स्वामि वेदान्त देशिक) ने अपने टिप्पणि मे कहा है | उन्होने पहले तत्पुरुष समास के आधारपर अर्थ बतलाया है और उसके बाद बहुव्रीहि समास पर आधारित अर्थ को बतलाया है – ” भक्तिम् वा सिंधुत्वेन रूपयित्वा बहुव्रीहि “ । बहुव्रीहि समास का उपयोग करते हुए लाक्षणिक रूप से उल्लिखित भक्ति ही महासागर के समान है ।

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/05/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-7/

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