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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 7

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 6

 

श्री पेरुमाळ कोईल महामहोपाध्याय जदगाचार्य सिंहासनाधिपति उभय वेदान्ताचर्य प्रतिवादि भयंकर श्री अणंगराचार्य स्वामीजी के कार्य पर आधारितII

समुद्र और भगवत्कल्याणगुण

साधारणतः हमारे पूर्वाचार्यों ने अपने ग्रंथों मे सागर को उपमान मानते हुए भगवान को समस्त-कल्याण-गुण-सागर (तिरुक्कल्याणगुणसागरं) से निर्दिष्ट किया है अर्थात भगवान ऐसे कल्याण गुणों के समुद्र है

स्वामि रामानुजाचार्य भी कुछ इसी तरह सकलहेयरहित-समस्तदिव्यगुणसंपन्न भगवान श्रीमन्नारायण के असीमित विशेष कल्याण गुणों को प्रकाशित करते हुए अपने कई ग्रंथों मे इनका वर्णन करते है । स्वामि रामानुजाचार्य के ग्रंथों मे हम यह भलि-भांति देख सकते है ।

शब्द जैसे – ” अनन्त-गुण-सागरं “, ” अपरिमितोदार-गुण-सागरं “ स्वामि रामानुजाचार्य के श्री-भाष्य ग्रंथ मे परब्रह्म श्रीमन्नारायण के विषय मे बरामद है । उदाहरण मे श्री-भाष्य के दूसरे अध्याय के शुरुवात मे कहा गया है –

प्रथमे अध्याये प्रत्यक्षादि प्रमाण गोचरात् अचेतनात्, तत्संसृष्टाद् वियुक्तास्च  चेतनात्, अर्थान्तरभूतं निरस्त-निखिल-अविद्यादि अपुरुषार्थगंधम् अनन्तज्ञानानन्दैकटानम् अपरिमितोदार-गुण-सागरं निखिल जगद्-एककारणं सर्वान्तरात्मभूतं परं ब्रह्म वेदान्तवेद्यं इतियुक्तं ” ।

सरलार्थ – वेदान्तसूत्रों के प्रथम अध्याय मे कहा गया है – परब्रह्म (जो), अचेतन तत्व (जिनकों हम अनुभव और समझ सकते है) से , भौतिक जगत मे बद्ध जीवात्मावों से , और  भौतिक जगत से विमुक्त जीवात्मावों से, भिन्न है , (जो) अज्ञानता और कलंक रहित है,  (जो) अपरिमित ज्ञान और आनन्द के भण्डार है, (जो) सागर रूपी असीमित असंख्य विशेष कल्याण श्रेष्ठ गुणों से संपन्न है, (जो) इस जगत के आधारभूत तथ्य है, (जो) सभी (अचेतन तत्व, चेतन तत्व इत्यादि) के अन्तर्यामी है, (ऐसे भगवान) वेदान्त से जाने जाते है।

यहा ध्यान पूर्वक समझना चाहिये की पूर्व उल्लिखित वाक्य मे ‘परब्रह्म’ शब्द का प्रयोग प्रथमा विभक्ति (कर्ताकारक/कर्तृवाच्य) मे किया गया और ना की द्वितीय विभक्ति (कर्मकारक) । यह ध्यान मे रखते हुए उपरोक्त वाक्य का अर्थनिर्णय/अनुवाद करना चाहिये । ” अपरमित-उदार-गुण-सागरं “ वाक्य तत्पुरुष समास से विग्रह कर अर्थ समझा नही सकते है । इसका कारण यह है की – अगर इस वाक्य मे प्रस्तुत शब्दों का समास – ” गुणानाम्-सागरः (विशेष गुणों के सागर) “ से किया जाये तो सागरः (सागर) पुल्लिंग शब्द हो जाता है और अतः यह वाक्य ” अपरमित-उदार-गुण-सागरः “ से प्रस्तुत होता । बजाय इस शब्द का प्रयोग नपुंसकलिंग मे किया गया है । इसीलिये इस वाक्य का समास बहुव्रीहि समास से किया जाना चाहिये और यही उचित है जो इस प्रकार है ” अपरिमितः उदारगुणसागरः यस्य तत् ” या “अनन्तः गुणसागरः यस्य तत् “ (जो अनन्त या अपरिमित कल्याण गुण रूपी सागर से सम्पन्न है, वही परब्रह्म है ) । श्रृतप्रकाशिकर ने भी तत्पुरुष समास के माध्यम से इस तथ्य को समझाया है ।

यहा इन दोनों समासों मे अंतर कुछ इस प्रकार से दर्शाया गया है – तत्पुरुष समास मे, भगवान को समुद्र से तुलना करते है, वे पानी वाले समुद्र नही बलकी असंख्य कल्याणगुणों के सागर(समुद्र) है । इसके विपरीत बहुव्रीहि समास मे, भगवान के प्रत्येक गुण सागर बनते हैं और भगवान इस गुणरूपीसागर का आश्रय है । दूसरा अनुवाद इस वाक्य का सच्चा अर्थ व्यक्त करता है अतः यह अनुवाद/अर्थनिर्णय यतार्थ है ।

भगवान को गुणों का सागर कहलाने वाले पद तो हर कहीं मिलते हैं किन्तु उनके गुणों को सागर कहलाने वाले पद भगवद्रामानुजाचार्य की रचनाओं मे ही मिलते हैं | यह तुलना या इस प्रकार का वर्णन केवल श्रीवैष्णव सांप्रदाय से संबंधित आचार्य ही कर सकते है और अगर किसी अन्य ग्रन्थ मे ऐसा प्रयोग मिल जाय तो वह अवश्य श्रीवैष्णव आचार्य की रचना होगी |

स्वामि रामानुजाचार्य ने यह तुलना संयोगवश नही किया है । बलकी वे आऴ्वारों के दिव्यप्रबंधो से भलि-भाँन्ति परिचित थे और इन सभी ग्रंथों को जांच कर उनका अनुसन्धान करने के पश्चात ही वे ऐसी तुलना कर पाएँ । पेरियतिरुवन्दादि मे, स्वामि नम्माऴ्वार कहते है – ‘‘ मिगुन् तिरुमाल्सीर्क्कड़लै युऴ्पोडिन्ड सिंदनैयेन् (६९) “ । इस स्तुति मे, भगवान से असंख्य प्रत्येक कल्याणगुण की तुलना महासागर से की गई है यानि उनके प्रत्येक गुण एक महासागर जैसे असीमित और विशाल है । जिस प्रकार अगस्त्य ऋषि ने खारे समुद्र का उपभोग किया उसी प्रकार अमृत-सदृश भगवान के ऐसे मधुर असंख्य कल्याणगुण रूपी सागर का उपभोग स्वामि नम्माऴ्वार ने किया । कहते है जिस प्रकार एक बादल ( मेघ ) समुद्र के पानि का भोग करता है उसी प्रकार स्वामि नम्माऴ्वार और हमारे पूर्वाचार्यों ने असिमीत विशाल समुद्र जैसे भगवान के प्रत्येक मधुर गुणो का उपभोग किये है । यहा यह व्यक्त किया जा रहा है की – स्वामि नम्माऴ्वार ने बजाय तत्पुरुष समास के बहुव्रीहि समास का प्रयोग किया है ।

स्वामि नाथमुनि

श्री यामुनाचार्य

स्वामि नम्माऴ्वार

स्वामि तिरुमंगै आऴ्वार

 

 

 

 

 

श्री पेरियवाच्चान्पिळ्ळै

श्री वेदान्ताचार्य (स्वामि वेदान्त देशिक)

एक और तुल्य अनुवाद (व्याख्या) इसी प्रसंग मे बताने के योग्य है ।  परमाचार्य स्वामि आळवन्दार अपने स्तोत्र-रत्न के प्रारम्भ मे स्वामि नाथमुनि ( अपने पूज्य पितामह ) का गुणगान करते हुए कहते है – ” अगाध-भगवद्-भक्ति-सिंधवे “ । यहा एक प्रश्न उठ सकता है की – स्वामि नाथमुनि भक्ति के सागर है ( तत्पुरुष-सामास ) या वे सागर जैसे समान भक्ति से युक्त है ( बहुव्रीहि समास) । व्याख्यान मे निपुण भाष्यकार चक्रवर्ती श्री पेरियवाच्चान्पिळ्ळै इस वाक्य का अनुवाद आऴ्वारों के व्याक्यांशो का अनुसरण करते हुए ” काडल् कड़लिन् मिगप्पेरिडु (स्वामि नम्माऴ्वार का तिरुवाय्मोऴि ७-३-६) और “आशयेन्नुम् कड़ल्” (स्वामि तिरुमंगै आऴ्वार का पेरियतिरुमोऴि ४-९-३) इत्यादि पासुरों के आधार पर भक्ति को ही सागर मान कर बहुव्रीहि दृष्टि से निर्वाह किए हैं । इसी तुलना का वर्णन और इसका समर्थन देते हुए श्री वेदान्ताचार्य (स्वामि वेदान्त देशिक) ने अपने टिप्पणि मे कहा है | उन्होने पहले तत्पुरुष समास के आधारपर अर्थ बतलाया है और उसके बाद बहुव्रीहि समास पर आधारित अर्थ को बतलाया है – ” भक्तिम् वा सिंधुत्वेन रूपयित्वा बहुव्रीहि “ । बहुव्रीहि समास का उपयोग करते हुए लाक्षणिक रूप से उल्लिखित भक्ति ही महासागर के समान है ।

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/05/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-7/

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द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम् 6

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद् वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

द्रमिडोपनिषद प्रभाव् सर्वस्वम्

<< भाग 5

आल्वार् और भगवद्रामानुजाचार्य – २

परित्राणाय साधूनाम्

श्रीमद्भगवद्गीता का चतुर्थाध्याय श्लोक सर्वप्रसिद्ध है |

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

” सामान्य व्यक्ति को भी यह अर्थ समझ पडता है कि भगवान श्रीकृष्ण साधुओं का रक्षण व दुष्टों का विनाश करते हुए धर्म का स्थापन करने हर युग अवतार करते हैं | यह अर्थ आसानी से मिल जाता है | लेकिन, अगर हम पूछें कि “धर्म” का क्या अर्थ है?  साधु कौन बनता है और दुष्ट कौन है? तो इन पदों का वास्तविक अर्थ निश्चय करना कठिन हो जाता है | रक्षण और विनाश शब्दों का क्या अर्थ है?  यहीं भाष्यों ही अपेक्षा उठती है | गीता के लिए उपलब्ध अनेक भाष्यों में भी यह प्रश्न उठता है कि क्या इन सब भाष्यों मे प्रतिपादित अर्थ गीता-संदेश से अविरोधित हैं |

विविध भाष्यों मे कहे गए अर्थों की परीक्षा हम इस प्रसङ्ग में नहीं करेंगे | इतना ही हमारा अनुभव का विषय बनेगा कि भगवद्रामानुजार्य से प्रतिपादित अर्थ न सुन्दर ही है, पर यही उत्तम अर्थ भी है |

साधु कौन बनता है?

सर्वप्रथम यह जानने योग्य है कि साधु कौन है जो कृष्ण का प्रिय है और उनसे सुरक्षित है?  इस पद का भाष्य करते समय रामानुजाचार्य को आल्वारों की स्मृति चलती है | वे ऐसे विशेषणों का उपयोग करते हैं जिनसे आल्वारों का स्वभाव स्पष्ट होता है |  ऐसे करने से आचार्य श्रीवैष्णव सम्प्रदाय ज्ञान न होने वालों को भी आल्वार-महात्माओं का परिचय देते हैं |

आचार्य अपने भाष्य में ऐसे लिखे हैं :

साधव: – उक्तलक्षण-धर्मशीला वैष्णवाग्रेसरा:, मत्समाश्रयणे प्रवृत्ता: मन्नामकर्म-स्वरूपाणां वाङ्मनसागोचारतया मद्दर्शनेन विना स्वात्मधारणपोषणादिकमलभमाना: क्षणमात्रकालं कल्पसहस्रं मन्वाना: प्रशिथिल-सर्वगात्रा भवेयुरिति मत्स्वरूप-चेष्टितावलोकनालापादिदानेन तेषां परित्राणाय |

धर्मशीलाः – वे  धर्म नियमों को आचरित करने वाले हैं | धर्म का अर्थ सामान्य धर्म या विशेष वैष्णव धर्म हो सकता है | सामान्य धर्म का अर्थ लेने पर “यदा यदा हि धर्मस्य” श्लोक से सङ्गति है | वैष्णव धर्म का अर्थ लेने पर भाष्य का “वैष्णवाग्रेसरा:” पद से सङ्गति है |

वैष्णवाग्रेसरा: – वैष्णवों में अग्रगण्य हैं | यही मुख्य लक्षण है | आचार्य के सम्प्रदाय में आल्वार सर्वोत्तम वैष्णव माने जाते हैं | यामुनाचार्य भी स्तोत्र रत्न में शठकोप मुनि को प्रपन्न वैष्णवों के कुलपति कहलाते हैं |

मत्समाश्रयणे प्रवृत्ता: – जो मुझे (कृष्ण) संसारनिस्तरण के लिए आश्रय मानते हैं | यह विवरण आल्वारों के वचन – “तुयररु चुडरडि तोलुदु”, “आलिवण्ण ! निन् अडियिनै अडैन्देन्”, एत्यादि पर आधारित है |

मन्नामकर्म-स्वरूपाणां वाङ्मनसागोचारतया – आल्वार भगवान के दिव्य नाम और रूप का सात्क्षात्कार पहचानते हुए उनको वचन और चिन्तन से अपार मानते हैं | उनके वचनों में यह स्पष्ट है – “एनसोल्लि सोल्लुगेन्”, नेञ्जाल् निनैप्परिदाल् वेण्णैयूणेन्नुम् ईनच्चोल्ले!”, इत्यादि |

मद्दर्शनेन विना स्वात्मधारणपोषणादिकमलभमाना: – भगवद्दर्शन और अनुभव विना आल्वार पोषित नहीं बनते, न ही वे जी पाते हैं | यह उनके शब्द – “तोल्लैमालै कण्णारक्कण्डु कलिवदोर कादलुट्रार्क्कुम् उण्डो कण्कल् तुञ्जुदले”, “काणवाराय् एन्ड्रेन्ड्रु कण्णुम् वायुम् तुवर्न्दु” से सिद्ध है |

क्षणमात्रकालं कल्पसहस्रं मन्वाना: – क्षणमात्र काल के लिए भगवान और उनके अनुभव से वियोगित होने पर भी, उनको वह काल सहस्रकल्प जैसा प्रतीत होता है | “ओरुपगल् आयिरम् ऊलियालो”, “ऊलियिल् पेरिदाय् नालिगै एन्नुम्”, “ओयुम् पोलुदिन्ड्रि ऊलियाल् नीण्डदाल्”, इत्यादि वचनों से यह भाव हमें स्पष्ट निकलता है |

प्रशिथिल-सर्वगात्रा: – भगवदुनभव के सम्बन्ध और वियोग में आल्वार के सर्व अङ्ग शिथिल बनते हैं | अनुभव काल में आनन्द की तीव्रता और वियोग में दु:ख की तीव्रता शैथिल्य का कारण बनते हैं | यह स्वभाव इनके अनेक  वचनों से समझ सकते हैं जैसे – “कालालुम् नेञ्जलियुम् कण्चुललुम्”, कालुम् एला कण्णनीरुम् निल्ला उडल् सोर्न्दु नडुङ्गि कुरल् मेलुमेला मयिर्क्कूच्चमरा”, इत्यादि |

साधु वह बनता है जो धर्मशील है, जो वैष्णवाग्रेसर है, जो कृष्ण को ही आश्रय मानता है, जो भगवान के नाम और रूप को सात्क्षात्कार करते हुए उनको वचन और चिन्तन से अपार मानता है, जो भगवान को दर्शन किए विना नहीं जी पाता है, जो भगवान से क्षण काल वियोग को भी कल्प-सहस्र मानता है, जो अनुभव और वियोग में भिन्न कारणों से सर्वथा शिथिल बन जाता है|

ऐसे साधुओं का रक्षण करने के लिए ही भगवान अनेक अवतार लेते हैं | वे उन महात्माओं को अपना सात्क्षात्कार दर्शन को दिलाते हैं | अपने कार्यों से, अपने गुणों से, अपने दिव्य रूप से उनका पोषण करते हैं | भक्ति बीज का उत्पन्न और उस भक्ति सस्य का विकास उनके अवतार से सिद्ध होता है | ऐसे करने से वे आप को, सनातन धर्म को, जगत में स्थापित करते हैं |

आचार्य की महिमा

इस भाष्य द्वारा, श्रीरामानुजाचार्य गीता के वास्तविक हृदय को याद रखते हुए, सभी जनों को आल्वार जैसे आदर्श भक्तों का परिचय दिए हैं | भक्ति ही गीता का तात्पर्य है और आचार्य यह याद रखते हुए साधु शब्द भाष्य में महान भक्तों की व्याख्या आल्वारों के स्वभाव कथन से किए हैं | ऐसे करने से, गीतार्थ और आल्वारों की महिमा साथ साथ गोचर बनता है |

आधार – https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2018/02/04/dramidopanishat-prabhava-sarvasvam-6/

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – ८

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

नम्पिळ्ळै एवं एम्पेरुमान् सहित उभय नाच्चियार्

71) भक्तिमानुडैय भक्ति वैदमाय् वरुमतु । प्रपन्नुडैय भक्ति रुचि कार्यमायिरुक्कुम् । भक्तिपरनुक्कु साधनमायिरुक्कुम् । इवनुक्कु देहयात्रा शेषमायिरुक्कुम् ।

 भगवद्भक्ति (भगवद्रति) के कारण कृष्ण-तृष्ण-तत्त्वज्ञता से स्तव्य) — नम्माऴ्वार्

भक्त की भक्ति भक्ति-योग (भक्ति-शास्त्र) के नियमों के अनुसार ही होती है । परन्तु प्रपन्न के लिए भगवद्विषयोत्पन्नासक्ति ही भक्ति कहलाती है । साधना-भक्ति से भक्तिमान भगवान् को प्राप्त करता है । प्रपन्न के लिए, भक्ति का उपयोग स्वरूपानुरूप जीवन व्यापन मे होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामी मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ मे इन तत्त्वों को बहुत सुन्दर रूप से समझाया है । सूत्र 271 मे स्वामी कहते है ः- प्रपन्न के लिए भक्ति भगवद्विषयासक्तिरूप धारण करती है । श्रीवरवरमुनि स्वामी इस सूत्र व्याख्या मे कहते है जिस प्रकार अत्यन्त भूखा जैसे अन्नादि ग्रहण करता है ठीक वैसे ही भक्ति से ही एक प्रपन्न भगवद्कैङ्कर्य को यथारूप  से कर सकता है ।

72) भक्तिमानुक्कु पलत्तिल् स्रद्दै इल्लातपोतु तविरलायिरुक्कुम्, प्रपन्नुक्कु स्वरूप-प्रयुक्तमाय् वरुमतागैयाले ओरुकालम् तविरातायिरुक्कुम्

तिरुप्पाणाऴ्वार – पूर्णतया पेरियपेरुमाऴ् के प्रति आसक्त

भक्तिमान जब उपेय (लक्ष्य) के प्रति निरुत्साहित या रुचि या इच्छा को खोता है तो उसकी भक्ति मे रुकावट होती है अतः भक्ति सफलीकृत नही होती । चूँकि प्रपत्ति जीव के स्वरूपानुरूप है अतः एक बार करने से उस जीव की रुचि (मे रुकावट) प्रतिबंधित नही होती ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भक्तियोगानुयायी को प्रतिक्षण भगवद्चिन्तन करते रहना है । अगर गलती से भी एक क्षण के लिए भगवद्विस्मृति हो तो उसकी भक्ति मे बाधा आती है और अन्ततः रुक जाती है । चूँकि प्रपत्ति सिद्धोपाय (भगवान् ही उपायोपेय है और भगवान् अपने शरणागत की रक्षा करने मे सक्षम है) है अतः भगवान् को उपायोपेय स्वीकृति ही जीव (जो नित्य भगवद्दास है) का यथार्थ स्वरूप है ।

73) अवन् गुण निबन्धनमन्रु, अवनोट्टै सम्बन्धम् सत्ताप्रयुक्तमेङ्गै

जीवात्मा का परमात्मा से सम्बन्ध भगवद्गुणों पर आधारित नही है अपितु यह स्वाभाविक सम्बन्ध भगवच्छेषत्व (जो स्वरूपानुरूप) है के आधार पर है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः नम्माऴ्वार  तिरुवाय्मोऴि ५.३.५ “कडियन् कोडियन्  . . . आगिलुम् कोडिय एन् नेन्जम् अवन् एन्रे किडक्कुम् ” पासुर मे कहते है भगवान् पाषाण-हृदयी है फिर भी इस दास का मन आप पर ही केन्द्रित है और सदैव आप के ही मनन चिन्तन मे है । नम्पिळ्ळै स्वामी ईडु व्याख्या मे अनसूया और श्री सीता देवी के संवाद का उदाहरण देते है । जब अनसूया कहती है कि ” एक पतिव्रता स्त्री के लिए उसका पति साक्षात् भगवान् है ” तो भगवती सीता कहती है –  सभी का ऐसा विचार है कि मै भगवान् श्रीरामचन्द्र के दिव्य गुणाधार पर उनके प्रति आसक्त हूँ । अगर मेरे स्वामी स्वगुणों को त्याग दे और बदसूरत भी हो जाए फिर भी उनके प्रति मेरी आसक्ती को नही त्यागूँगी । पर मै स्वकथन का निरूपण नही कर सकती क्योंकि मेरे प्रिय स्वामी कदाचित भी स्वगुणों का त्याग नही करेंगे । पिळ्ळै लोकाचार्य इसी तत्त्व को श्रीवचनभूषण के 111वें सूत्र मे कहते है ” गुण कृत दास्यत्तिलुम् काट्टिल् स्वरूप प्रयुक्तमान दास्यमिरे प्रधानम्” अर्थात् स्वरूपारूप भगवच्छेषत्व, गुणानुरूप भगवच्छेषत्व की तुलना मे श्रेष्ठ है । अगर मान लिया जाए कि यह भगवच्छेषत्व गुणानुरूप है तो जिस दिन यह गुण नज़र नही आयेंगे उस दिन (समय) दासत्व को छोड़ देंगे और इसी को वास्तविक आत्महत्या कहते है । परन्तु यह स्वाभाविकानुरूप (जो अपरिवर्तनशील है) है तो हम इसका (भगवच्छेषत्व का) परित्याग कदापि नही करेंगे ।

74) भगवद्विषयत्तिलोरडिवर निन्रवर्गळ् स्लाकनीयर्

जो कोई भी भगवान् के प्रति छोटा सा कार्य (करता) (कदम उठाता) है वह सदा कीर्तन (प्रशंसा) के योग्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः इस भौतिक जगत् मे जीवों के लिए जब इन्द्रिय तृप्ति के अनेकानेक साधन है तो उन जीवों मे अगर एक भी जीव भगवान् के प्रति आसक्त हो, वह सदा प्रशंसा के योग्य है । ऐसे आसाक्त अगर किसी श्रीवैष्णव का नित्य मार्गदर्शन प्राप्त हो तो वह अतीव शीघ्रता और सरलता से स्वस्वरूप ज्ञान प्राप्त करता है और सद्व्यवहार से स्वस्वरूप को समझता है ।

75) अत्तलैयाले वरुमतोऴियत् तान्तामोन्रै आशैयप्पडुगैकूडप्पऴि

सब कुछ भगवदेच्छा (भगवान् की इच्छा) अनुसारेण होना चाहिए । स्वमनोरथ पूर्ती भगवान् से याचना करना स्वदोष है । सदैव भगवद्मुखोल्लास से कार्य करना चाहिये।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् शेषी (स्वामी) है और जीव शेष (किंङ्कर) है । स्वामी को इच्छा कर आशीर्वाद देना चाहिए जो उस (दास) (सेवक) के लिए अनुकूल हो । शेषी होने की वजह से जीव का स्वतन्त्र इच्छा होना दोषयुक्त है और स्वरूप नाश कारक है ।

76) उडैयवने नम् कार्यत्तुक्कुक्कडवन्

भगवान् स्वामी है और जीवात्मा उनका सेवक है । शरणागतों का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः आत्मा देह द्वारा कार्य करता है और इन्हीं कार्यों को करने का मार्गदर्शन आत्मा देता है । भगवान् जीवात्मा का आन्तरिक आत्मा के रूप मे आवास करते है और यही जीव उनका शरीर । अतः शरीर रूपी जीव का पालन करना भगवान् का कर्तव्य है । पिळ्ळै लोकाचार्य मुमुक्षुप्पडि ग्रन्थ के चरमश्लाक विवरण 258 वें सूत्र इसी विषय को समझाते हुए कहते है ःः भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने कहा है – “मोक्षयिष्यामि” अर्थात् ” उद्धार करूँगा ” “मै रक्षा करूँगा” । सूत्र मे स्वामी कहते है – ” इनि उन्कैयिलुम् उन्नैक्काट्टित्तरेन् एन् उडम्बिल् अऴुक्कै नाने पोक्किक् कोळ्ळेनो ” । इस सूत्र व्याख्या मे श्रीवरवरमुनि कहते है – अब तक तुम (अर्जुन) स्वयं को स्वतन्त्र मानते थे ऐसा भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा । परन्तु अब तुम परतन्त्र मानकर (जैसे देह आत्मा पर निर्भर होता है उसी प्रकार) मुझ मे शरणागति किये । वरवरमुनि स्वामी कहते है यहाँ अर्जुन का भ्रम (दोष) निवारण कर्तव्य भगवान् का है और अर्जुन का शुद्धी एवं उद्धार का फलस्वरूपी भगवान् ही हैं।

77) वस्तुवुक्कु गुणत्तालेयिरे उत्कर्षम्  । अन्द गुणाधिक्यमेङ्गेयुण्डु, अङ्गेयिरेयेत्तम् (अङ्गेयिरेयेट्रम्)

एक वस्तु के प्रति उत्कर्ष का कारण उस वस्तु मे उपलब्ध विशेष गुण ही है । जब ऐसे गुणाधिक्यता हो तो ऐसे गुण उत्कृष्टता (विशिष्टता) प्राप्त करते है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः भगवान् मे मुख्यतः दो विशेष गुण है – पहला कि वह विशिष्ट असंख्य कल्याण गुणों का भण्डार राशि है और दूसरा असद् गुणों के विपरीत है वह । इसी कल्याण गुणों के सान्निध्य की वजह से उनकी वन्दना (स्तुति) सभी करते है ।

78) शेषभूतन् स्वरूपम् पेट्ट्रडिमै सेइगै शेषिक्कु पेट्ट्रिरे

जैसा कहा गया है “मेय्याम् उयिर् निलै” (तिरुवाय्मोऴि तनिया) – अर्थात् भगवद्मुखोल्लास तभी होता है जब जीव भगवच्छेशत्व को स्वीकार कर भगवद्सेवा करें । ऐसा करने पर भगवान् को अत्यन्तहर्ष प्राप्त होता है ।

अनुवादक टिप्पणी ःः कहा गया है – “चेतन लाभं ईश्वरनुक्कु” अर्थात् जब भगवद्सम्पत्ति जीव भगवद् निष्ठा मे परिपूर्ण रूप मे सिद्ध होता है, भगवान् ही इससे लाभ प्राप्त करते है ।

भगवान् ही जीव को मोक्ष प्राप्ति के सम्मुख लाने के लिए नित्य संसार की सृष्टि कर, विभिन्न अवतार लेकर, आऴ्वार एवं आचार्य रूप मे इस दिव्य ज्ञान का प्रसार करते है । अन्ततः यह कार्य से जब उनकी सम्पत्ति की शुद्धि होती है तो यह उनके लिए ही श्रेयस्कर है ।

79)  स्वनिकर्षम् सोल्लुगै ज्ञानकायम् । ईश्वरोऽहं एन्रिरुक्कै अज्ञान कार्यम् ।

जैसे अमुदानर (तिरुवरङ्ग स्वामी) रामानुज नूत्तन्दादि के 48वे पासुर मे कहते है – –  स्वदोष गुणानुसन्धान ही असली पहचान है सच्चे आत्मज्ञान की । अर्थात् मुझ समान कोई तुच्छ नही है ।

मै ईश्वर हूँ कहना अज्ञानता और अहं कारणोत्पन्न है ।

80) तीर्थङ्गळिळे वर्त्तिक्किर सत्त्वङ्गळुक्कु पापम् पोगिरतिल्लैयिरे ज्ञानमिल्लामैयाले

कहते है की तीर्थ स्थलों के जलों मे रहने वाले विभिन्न जीवों का आत्मोद्धार नही होता है क्योंकि उनको स्वरूपानुरूप ज्ञान नही होता है अतः दोष निवारण नही होता है । केवल और केवल स्वरूपानुरूप ज्ञान से ही जीव दोषों से मुक्ति पाता है । अतः केवल तीर्थ जल मे स्नान मात्र से उद्धार नही होता ।

अनुवादक टिप्पणी ःः उदाहरणार्थ गङ्गा मे कोई स्नान करता है तो उसको यह ज्ञान होना चाहिये कि यह दिव्य गङ्गाजल का उद्भव भगवान् श्रीमन्नारायण के दिव्य चरणारविन्दों के चरणामृत से हुआ है जो इस सम्पूर्ण जगत् के सर्वरक्षक है । जब तक ऐसा ज्ञान वर्धन विचार नही होता है और केवल सोचता है कि यह सिर्फ दिव्य नदी जल है तो कोई उद्धार नही होता है ।

पूर्ण लिङ्क यहाँ उपलब्ध है : https://srivaishnavagranthamshindi.wordpress.com/divine-revelations-of-lokacharya/

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

आधार – http://ponnadi.blogspot.in/2013/08/divine-revelations-of-lokacharya-8.html

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कैशिक माहात्म्य (कैशिक पुराण का माहात्म्य)

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नम:
श्रीमते रामानुजाय नम:
श्रीमद्वरवरमुनये नम:
श्रीवानाचल महामुनये नम:

यह हिन्दि लेख, ” कथा-सङ्ग्रह ” (सङ्क्षिप्त कथा वर्णन) जो ” कैशिक-महात्म्य ” नामक ग्रन्थ से उद्धृत है जिसका संस्करण श्रीमान् उ.वे कृष्णस्वामी य्यङ्गार (जो श्रीवैष्णव सुदर्शन के मुख्य संपादक है) ने किया है । यह वराह-पुराणान्तर्गत कैशिक-पुराण कि कथा का सङ्क्षिप्त वर्णन है ।

यह लेख “श्रीमन्नम्पाडुवान्” के जीवन का वर्णन करती है जो तिरुक्कुरुन्गुडि एम्पेरुमान् (भगवान्) – नम्बि पेरुमाळ् (भगवान्) के परम पावन भक्त थे । इसी वर्णन मे एकादशि कि रात को इनका एक ब्रह्म राक्षस से वार्तालाप भी उपलब्ध है ।

ब्रह्म राक्षस — वह सद्ब्राह्मण जो पूर्व जन्म मे यागेत्यादि मे गलति कर राक्षस रूप मे पैदा हुआ हो ।

बहुत समय पहले, पृथ्वी (धरती) प्रलयजाल (कारणजल) मे डूब गयी थी । उस समय, धरती को बचाने भगवान् श्रीमन्नारायण ने वराह रूप धारण कर, इस कारणजल मे कूद गये । ब्रह्माण्ड के दीवारों मे फसी धरती को अपने तेज़ दन्तों (जो गजदन्त समान दिखे) से रक्षा कर, धरती को यथारूप व्यवस्थित करने के लिये योग्य क्षक्ति प्रदान कर, श्रीभूमि पिराट्टि (भगवान् कि मुख्य पत्नी जो धरती कि मुख्य देवी है) को सराहते हुए आलिङ्गन किये । उस समय श्रीभूदेवी धरती पर त्रस्त समस्त चेतनों के प्रति कृपा दर्शाते हुए अपने स्वामी भगवान् श्रीमन्नारायण श्रीवराह रूपावतार से नम्र निवेदन की – हे भगवन् ! आपने अपनी निर्हेतुक कृपा से मुझ दासी की रक्षा की है । इस धरातल पर रहने वाले समस्त चेतनों (मेरे पुत्रों / पुत्रियों) का सुगम उद्धार हेतु मार्ग दर्शन करावें । भगवान् तुरन्त बोले – हे देवी ! मेरा नामोच्चारण ही सरल और सुगमोपाय है । इसी से इनका समस्त कल्याण व उद्धार होगा । इस उपलक्ष मे, मै तुमको एक सरल सद्भक्त नम्पाडुवान् की महिमा प्रस्तुत करूँगा जिससे नामोच्चारण (नाम-सङ्कीर्तन) कि महिमा प्रकाशित स्वत: होगी ।

यह दिव्य चरित्र गाथा भगवान् ने इस प्रकार से बताया :

भगवान् तिरुक्कुरुन्गुडि नामक दिव्यदेश मे स्वपत्नी समेत (श्री-भू सहित) अर्चारूप मे कृपावशात वास कर रहे है । इस दिव्यदेश के भीतर प्रान्त मे, एक चाण्डाल वंश (यह चातुर्वर्ण के अन्तर्गत् नही है) मे जन्मे भगवान् के महद्भक्त । इनको बचपन से ही भगवान् का नाम-सङ्कीर्तन करने का बहुत बडा शौक था । अत: इस प्रकार से प्रेरित भगवद्भक्त, प्रतिदिन रात्रि समय मे, इस दिव्य देश के अर्चारूप भगवान् को वीना-गान संयुक्त अपनी भक्ति को भगवन्नाम सङ्कीर्तन के जरिये, शास्त्र सम्मत दूरी से, दिव्य देश के वासियों के उठने से पहले स्वकैङ्कर्य (नाम-सङ्कीर्तन) कर चले जाते थे । अत: इस प्रकारेण आप श्री पाडुवान् के नाम से विख्यात हुए । पाडुवान् — जो मधुर गान गाता है । भगवान् ने स्वयं आप श्री को नम्पाडुवान् कि उपाधि देकर आपके नाम-सङ्कीर्तन के स्वारस का अनुभव करने लगे । अत: इस प्रकार से बहुत समय तक नित्य रात्रि समय मे भगवद्-कैङ्कर्य मे अपने आप को सम्लग्न किया ।

एक समय, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी की रात मे, जागरण-व्रत हेतु तिरुक्कुरुन्गुडि भगवान् के प्रति प्रगतिशील नम्पाडुवान् की भेंट एक ब्रह्मराक्षस से हुई । यह ब्रह्मराक्षस अपनी भूख मिताने के लिये इन्तेज़ार कर रहा था । अचानक आप श्री को देखकर वह सन्तुष्ट हो गया कि उसको उसका आहार स्वयं चल कर आया है । अत: यही निवेदन ब्रह्मराक्षस ने आप श्री के समक्ष रखा और आप से परस्पर चर्चा कर अपना जीवन वृत्तान्त बताया कि वह पिछले जन्म मे सोम शर्मा नाम का ब्राह्मण था और जिसने यज्ञ-यागादि मे त्रुटि कर ब्रह्मराक्षस रूप धारण किया । तब आप श्री ने उसको सराहते हुए कहा – हे ब्रह्मराक्षस ! आपकी बातों से बहुत प्रसन्न हुआ । आपकी महती कृपा से आज मै अपने प्राण त्याग सकता हूँ । लेकिन एक बात है कि मै अभी आपकी इच्छा पूर्ति नही कर सकूँगा । मै नित्य रात्रि को समीप मे स्थित भगवान् के मन्दिर जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन करता हूँ । मेरा यह सुवसर छोडने पर मजबूर न करें और मुझे जाने की आज्ञा दे । मुझे मेरा स्वगान से जागरण-व्रत सम्पूर्ण कर, भगवान् को सन्तुष्ट कर आने दे । मै अवश्य आवूँगा । यह मेरा वचन है । ब्रह्मराक्षस ने कहा : हे नम्पाडुवान् ! यह तुमहारा कोई छल लग रहा है । अगर तुमको छोड दूँ तो तुम मुझसे छुटकारा प्राप्त कर सकते हो और पुनः लौटोगे नही । यह सुनकर आप श्री ने इस ब्रह्मराक्षस को आश्वासन देते हुए इस प्रकार कहा :

अगर मै नही लौटा तो निम्नलिखित पापों के फल का अधिकाधिक फल मुझे प्राप्त हो :

१) असत्यता का पाप (श्लोक ३३)
२) कामवासना से आवृत अन्यों कि पत्नियों के साथ अवैध सम्बन्ध का पाप (श्लोक ३४)
३) जब मै और कोई अन्य भोजन करते समय भोजन मे भेदभाव दिखाने का पाप (श्लोक ३५)
४) ब्राह्मण को दान मे स्थल दे कर पुनः उससे छीनने का पाप (श्लोक ३६)
५) युवनावस्था कि लडकी का सम्भोग करना और बुढापे उसमे दोष देखकर उसका परित्याग करने का पाप (श्लोक ३७)
६) पित्रु-तर्पण के दिन स्वपत्नी का सम्भोग का पाप (श्लोक ३८)
७) उस व्यक्ति का अपमान करना जिसने भोजन प्रदान किया है वह पाप (श्लोक ३९)
८) अपनी बेटी का विवाह करने का वचन देना और तत्पश्चात् उस व्यक्ति से उसका विवाह न करना का पाप (श्लोक ४०)
९) षष्ठी, अष्टमी, अमावास्य, चतुर्दशि के दिन बिना स्नान किये भोजन ग्रहण करने का पाप (श्लोक ४१)
१०) दान करने का वादा कर दान नही करने का पाप (श्लोक ४२)
११) स्वयं के मित्र की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखना जिसका बहुत बडा एहसान स्वयं पर हो का पाप (श्लोक ४३)
१२) स्वाचार्य एवं राजा की पत्नी के साथ अवैध सम्बन्ध रखने का पाप (श्लोक ४४)
१३) दो स्त्रियों से विवाह करना और तदुपरान्त एक का पक्षपात करने का पाप (श्लोक ४५)
१४) एक पतिव्रता स्त्री का यौवनावस्था मे त्यागना (जो पूर्णतया निर्भर है) का पाप (श्लोक ४६)
१५) उस गोवृन्द को रोकना का पाप जो जल पीने के लिये जा रहे है (श्लोक ४७)
१६) ऐसे पूर्वपीढी कृत पञ्च महापापों (जैसे ब्राह्मण हत्या) का फल (श्लोक ४८)
१७) अन्य देवी-देवताओं की पूजा करने का पाप (श्लोक ४९)
१८) अन्य देवी-देवताओं को श्रीमन्नारायण के तुल्य मानने का पाप (श्लोक ५०)

जब तब अठारहवाँ पाप के बारे मे नही बताया, तब तक ब्रह्मराक्षस पूर्वोक्त पापों को नही माना । जब आप श्री ने अठारहवाँ पाप के बारे मे बताया, ब्रह्मराक्षस को पूर्ण विश्वास हुआ क्योंकि यह ऐसा महामहापाप जिसे करने से हर एक जीव इस सम्सार चक्र मे नित्य बन्धित हो जाता है । ऐसे विश्वास से ब्रह्मराक्षस ने आप श्री को छोडकर आपके वापसी की प्रतीक्षा करने लगा ।

अनुवादक टिप्पणी : अठारहवाँ पाप – अन्य देवतान्तरों को भगवान् श्रीमन्नारायण के तुल्य मानना महद्पाप है । इस पूराण का महदुदेश्य यही है कि ज्ञानी जन इसको जानकर इसका पूर्ण परित्याग करे ।

अत: इस प्रकारेण वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् अपने प्रिय भगवान् के समक्ष जाकर भगवन्नामसङ्कीर्तन कर, भगवान् को प्रसन्न किये और स्वदेह त्याग की अन्तिम इच्छा से ब्रह्मराक्षस की ओर अति शीघ्रता से चले । पुनः स्वाहार को देखकर प्रसन्न ब्रह्मराक्षस ने आप श्री की महिमा को जान गया । ब्रह्म राक्षस ने वचन बद्ध श्रीमन्नम्पाडुवान् से उनके मधुर गान के फल को माँगा । श्रीमन्नम्पाडुवान् ने यह सुनकर उत्तर दिया – यह तो असम्भव है श्रीमन् ! मुझे पता नही आपको इसका फल भी दे पावूँगा कि नही क्योंकि वह स्वकैङ्कर्य के प्रति किछु भी नही चाहते थे । पुनः पुनः निवेदन करने पर उनके एक गान का फल देने के लिये राज़ी हो गये आप श्री । इस प्रकार कैशिक छन्द मे गान का फल प्राप्त कर यह ब्रह्म राक्षस मुक्त हो गया । इस स्थिति से मुक्त ब्रह्मराक्षस ने राक्षस देह त्यागकर, परलोक प्राप्त किया । तदनन्तर पुनः स्वकैङ्कर्य प्राप्त कर श्रीमन्नम्पाडुवान् भगवन्नाम-सङ्कीर्तन सेवा मे सम्लग्न हुए और अन्तत: भगवद्धाम प्राप्त किये ।

यह दिव्य चरित्र का वर्णन श्रीमन्नारायण (वराह भगवान्) ने स्वपत्नी श्रीभूदेवी को किया । अत: इस प्रकारेण यह सङ्क्षिप्त वर्णन सम्पूर्ण हुआ ।

इस पुराण का पाठ अनेक दिव्यदेशों मे इस दिन किया जाता है । तिरुक्कुरुन्गुडि दिव्य देश मे नाटक रूप मे यह दिव्य चरित्र दर्शाया जाता है ।

इस पुराण का मङ्गल श्लोक :

नमस्तेस्तु वराहाय लीलोद्धराय महीम् ।
कुरमध्यतोऽयस्य मेरु:गणगणायथे ॥

अर्थात् : मै उन वराह भगवान् को भजता हूँ, जिनने इस भू (धरातल) को बिना विशेष प्रयास से उठा लिया और जिनकी तुलना मे मेरुपर्वत तिनके के समान है ।

यही भाव पेरिय तिरुमोऴि ४.४.३ – ” शिलम्बिनिडैच् चिरु परैपोल् पेरिय मेरु तिरुक्कुरुळम्बिल् कणकणप्पा ” मे है ।

प्रलयोदन्वदुत्तीर्णम् प्रपद्येऽहम् वसुन्धराम् ।
महावराह दम्श्ट्राग्र मल्लीकोसमधुव्रतां ॥

मै उन भूदेवी के शरणागत हूँ जिनको महावराह भगवान् ने कारणजल से उठाया, और उनके (भगवान् के) मल्लिका पुष्प तुल्य दन्तों मे कृष्णवर्ण भौंरे के समान है ।

श्रीपराशर भट्ट ने इस पुराण की व्याख्या लिखी है और इस महद्कार्य के लिये उनको भी प्रणाम करते है :

श्रीपराशर भट्टार्यः श्रीरङ्गेश पुरोहित: ।
श्रीवत्साङ्कसुत: श्रीमान् श्रेयसेऽमेस्तु भूयसे ॥

(वह) श्रीपराश्रभट्ट स्वामी मुझे सभी शुभ प्रदान करे, (जो) श्रीरङ्ग भगवान् के पुरोहित है, (जो) श्रीवत्साङ्क (कूरेश) के सत्पुत्र है और जो कैङ्कर्यश्री भाव से सर्वदा पुरित है ।

आऴ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं
जीयर् तिरुवडिगळे शरणं

अडियेन् सेट्टलूर कार्तीक श्रीहर्ष रामानुज दास

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लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां – २

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

लोकाचार्य स्वामीजी की दिव्य-श्रीसूक्तियां

<< पूर्व अनुच्छेद

११) प्राप्याभासङ्गगळिलु प्रापगाभासङ्गळिलुम् नेगिऴ्न्तु अवनैयोऴिन्त एल्लावत्तलुम् ओरु प्रयोअनमिन्रिक्के इरुक्क वेणुम् 

वरमंगै नायिका , श्रीदेवी , भूमि देवी, आण्डाळ समेत श्री वानमामलै दैवनायक पेरुमाल , नाँगूनेरी

यथार्थ : भगवान के अलावा अन्य कोई भी साधन असल मे प्राप्य ध्येय नही है | भगवान के अलावा अन्य साधन असल मे सही मार्ग नही है | अत: शरणागत ऐसे मनगढंत विचारों को मन से निकाल दे और विश्वास एवं श्रद्धा पूर्वक मान ले कि भगवान ही उपाय (साधन) है | यही जीवात्मा के लिये सही और उच्चतम स्थिति है |

१२) परमशेषियैक् कण्डार् द्वारशेषिगळ् अळविल् निल्लारगळिरे

परमपदनातन

यथार्थ : एम्पेरुमान (भगवान), जिसका ना कोई तुल्य है और ना तो कोई इससे बडा है, ही असल मे सही शेषि है (सबका मालिक है ) | अन्य देव जैसे ब्रह्मा, शिव, इन्द्र इत्यादि द्वारशेषि है अर्थात् अन्तरयामीब्रम्ह (भगवान) के द्वारा नियमित रूप से विशेष कार्यों जैसे सृष्टि निर्माण, सृष्टि विनाशक मे कार्यरत हैं| भगवान उसको स्वयं प्रत्यक्ष रूप से आशीर्वाद देते हैं जो उनके शरणगत हैं| भगवान उसको भी अपना आशीर्वाद देते है जो अन्य देव शरणागत हैं लेकिन परोक्ष रूपेण अर्थात् उन देवताओं द्वारा जिनके परमात्मा भगवान स्वयं हैं| अत: ऐसे भगवान के यथार्थ स्वरूप को जानने वाला शरणार्थी कदापि अन्य देवान्तर भ्रम मे नही पडेगा और शरणागत को ऐसे भ्रम मे नही पडना चाहिये |

१३) अवन् ताने कत्त आऴ्वार्गळ् कण्डाप्पोले काण्बार्क्कुक् कणलामित्तनै अल्लतु स्वयत्नत्ताल् काण्बार्क्कु अरियप्पोमो

आळ्वार

भावार्थ : एम्पेरुमान् (भगवान) ने स्वयं अपने निर्हेतुक कृपा से स्वयं का स्वभाव, दिव्य मङ्गल स्वरूप, विशिष्ट गुण, सम्पत्ति (नित्य / लीला विभूति) इत्यादि का विशेष दर्शन आळ्वार को कराया और अत: ऐसे प्रेम युक्त स्थिति मे आळ्वार ने भगवद् स्वरूप का दर्शन किया | स्वप्रयत्न से ऐसे भगवद् सम्बन्धी विषयों को जानना नामुमकिन है | केवल भगवद्-कृपा से ही ऐसे विषय जान सकते हैं|

१४)   आश्रयणीयन् अवने !! ब्रह्मरुद्रादिगळ् आश्रयणीयर् अल्लर्

भावार्थ : भगवान श्रीमन्नारायण ही एक मात्र आश्रय है | ब्रह्म, रुद्र इत्यादि आश्रय नही है |

१५) मुक्तरुम् नित्यरुम् ताङ्गळुम् अनुभवित्तु अवनैयुम् आनन्दिप्पिप्परगळ् बद्धर् ताङ्गळ् आनन्दियादे अवनै आनन्दिप्पिप्परगळ्

भावार्थ : मुक्त एवं नित्य जीव, भगवद् धाम मे आनन्दित रहकर,  भगवान श्रीमन्नारायण को आनन्द प्रदान करते हैं | बद्ध जीव (सम्सार मे)  दु:ख भोगते हुए भगवद् लीला मे भाग लेकर भगवान श्रीमन्नारायण को आनन्द प्रदान करते हैं |

१६) सर्वेश्वरन् त्रिविध चेतनरैयुलम् स्वरूपनुरूपमाग अडिमै कोळ्ळा निन्रान्

भावार्थ : भगवान श्रीमन्नारायण (सर्वेश्वर, परमेश्वर) त्रिविध (तीन) प्रकार के चेतन (मुक्त, नित्य, बद्ध जीव) से अपने स्वरूपानुरूप के अनुसार सेवा स्वीकार करते हैं|

१७) विरोधियैप् पोक्कि उज्जीविप्पिक्कैयिरे अवतारङ्गळुक्कु प्रयोजनम्

भावार्थ : भगवान श्रिय:पति के अवतार रहस्य का कारण भगवद्-भक्तों का उद्धार एवं भक्तों के विपरीत आसुरी भाव रखने वालों का नाश करना है |

अनुवादक टिप्पणी :: इसी मूल अङ्ग को स्वामी पिळ्ळैलोकाचार्य अपने श्रीवचन दिव्य शास्त्र मे दर्शाते हुए कहते हैं – भगवान श्रीमन्नारायण के अवतार एवं अवतारों मे दृश्यमान उनके अद्भुत कार्यों का कारण केवल भागवतों के प्रति कृत्य अपचार ही है |

१८) कर्म सम्सृष्टरान चेतनर्क्कु कर्म सम्बन्धमत्तु (सम्बन्धमट्रु) अनुभिविक्कु मुन् तिरुमेनियिळे नेन्जै वैक्कप् पोगातिरे

भावार्थ : बद्ध जीव (संसारी) इस भौतिक जगत् मे कर्म के बन्धित हैं | वासतविकता मे भगवान श्रीमन्नारायण के दिव्य अर्चा स्वरूप इतने सुन्दर एवं आकर्षक है कि केवल दर्शन मात्र से ही प्रत्येक जीव के विविध दोषों एवं दु:खों का निवारण कर सकते हैं| अत: ऐसे दिव्यानुभूति के लिये प्रत्येक जीव का कर्म विहीन होना चाहिये (अर्थात कर्म शून्यता) |

१९) शेषवस्तुवुक्कु शेषत्वम् निरुपकमानाल् निरूपकत्तैयोऴिय निरूप्य सिद्धि इल्लै

भावार्थ : निरूपकम् –> अर्थात् जो निव स्वभाव को दर्शाता है | निरूप्यं –> जिसको सिद्ध किया गया हो |

जीव का भगवद शेषत्व (दासत्व भाव) का निर्धारण केवल उसके सेवा भाव युक्त कार्यों से होता है | उसका स्वभाव उसके दासत्व भाव युक्त सेवा से सिद्ध होता है | अत: जो भगवान की सेवा नही करते, वो चेतन (जीवात्मा) के योग्य सिद्ध नही होते और अन्तत: ये सभी भी जड (अचेतन) की श्रेणी मे ही आयेंगे |

२०) पारतन्त्रिय रसम् अरिवार्क्कु स्वातन्त्रियम् अनर्थम्

भावार्थ : पारतन्त्रिय -> भगवान के आधीन (नियन्त्रण) मे रहना |

उन सभी के लिये स्वातन्त्रय (स्वतन्त्र) भाव (मै स्वतन्त्र हूँ) घातक (अनर्थ) है जिनने भगवद् पारतन्त्रिय भाव (मै भगवद् दास हूँ – मै भगवान के अधीन हूँ) का रासास्वादन किया है |

अडियेन् सेट्टलूर सीरिय श्रीहर्ष केशव कार्तीक रामानुज दास

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आचार्य निष्ठा

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद् वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

e-book – https://1drv.ms/b/s!AiNzc-LF3uwygn9RD8hEBmJPCroZ

प्रस्तुत लेख को, प्रारम्भ मे श्रीरामानुज दर्शन ई-पुस्तिका के सम्पादकीय मे सम्पादित किया था | विभिन्न भाषाओं मे, गुरु-परम्परा के वैभव सूची का संग्रहण, इस लिन्क http://acharyas.koyil.org/ पर उपलब्ध किया गया है | कृपया इस लिन्क पर क्लिक कर इसका दर्शन करे |

प्रस्तुत लेख – ” आचार्य निष्ठा “, श्रीवैष्णव सत्साम्प्रदाय का, बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विषेश तत्त्व है | कृपया अब हमारे पूर्वाचार्यों के जीवन चारित्र से, इस विषय पर चर्चा करते हुए इसका रसपान करेंगे |

थाई मास अनुभवम्

थाई मास मे, हम श्री वैष्ण्व जन, तिरुमलिशै आल्वार (श्रीभक्तिसार स्वामीजी), कुरुहै कावलप्पन, कूरेश स्वामी, एम्बार (श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी) का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते है । यहाँ हम अब श्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के सम्बन्ध से देखेंगे ।

हमने पिछले महिने कि पत्रिका में आचार्य निष्ठा का सुन्दर तत्त्व को श्रीगोदाम्बाजी, श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्रीरामानुज स्वामीजी में देखा। यहा हम अब श्रीकुरेश स्वामीजी और श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी के सम्बन्ध में देखेंगे।

श्रीकुरेश स्वामीजी अपना सारा धन दान किया और श्रीरामानुज स्वामीजी कि शरणागति कि और आजीवन माधुकरम का अभ्यास किया। वह पुनरेकिकरण के मानवीकरण थे। उन्होने धनवान होने के बावजूद अपने आचार्य के साथ रहकर उनकी सेवा करने के लिये एक क्षण भी नहीं सोचा और अपना सारा धन दान कर दिया। वह बहुत बड़े ज्ञानी थे परन्तु कभी भी अपने आचार्य या किसी के सामने अपने ज्ञान कि बढाई नहीं कि। वह हमेशा नम्रता से रहते थे। इसलिये तिरुवरंगत्तु अमुधानार अपने श्रीरामानुजनूत्तंदादि में उनकी इस तरह प्रशंसा करते है “मोळियैक् कडक्कुम पेरुम् पुघळान्” (उनकी प्रशंसा शब्दो से नहीं कि जा सकती)। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने यतिराज विंशति में भी यही समझाते है “वाचामगोचर महागुणदेशिकाग्रचकूराधिनाथ”।

श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी भी एक बड़े आचार्य निष्ठा वाले थे। वह श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी के शिष्य थे। एक बार उन्होंने अपने आचार्य के लिये बिछोना लगाया और स्वयं उसे जाचने के लिए उसपर सोये। श्रीरामानुज स्वामीजी ने यह देखकर चकित हो गये। उन्होंने श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी से पूछा “आपकी हिम्मत कैसे हुयी अपने आचार्य के बिस्तर पर सोने कि? यह गलत है”। श्रीगोविंदाचार्य स्वामीजी ने शान्त रीती से उत्तर दिया “मे यह निश्चिंत करना चाहता हूँ कि मेरे आचार्य का बिस्तर आराम दायक है- इसलिये मैंने उसपर स्वयं पहिले सोकर जाँचकर देखा। अगर इसके लिये मुझे पाप भी लगता है तो ठीक है”। अपने को पाप लगाने के डर से भी उन्होंने अपने आचार्य के आराम का पूर्ण ध्यान रखा। यह सुनकर श्रीरामानुज स्वामीजी सुखद हो गये। श्रीवरवर मुनि स्वामीजी अपने उपदेश रत्नमाला में यही तत्त्व कहते है “ तेशारूम् शिष्चनवन् शीर् वड़िवै आशयुड़न् नोक्कुमवन ” – सबसे श्रेष्ठ शिष्य अपने आचार्य का पवित्र देह कि सेवा / सुरक्षा प्रेम से करेगा।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

माघ मास अनुभवम्

माघ महिने में हम श्रीकुलशेखर स्वामीजी, श्रीराममिश्र स्वामीजी, श्रीमालाधार स्वामीजी, श्रीकांचीपूर्ण स्वामीजी, श्रीधनुर्दास स्वामीजी का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं। आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम श्रीमालाधार स्वामीजी और श्रीधनुर्दास स्वामीजी के आनंदमय रूप को देखेंगे ।

श्रीराममिश्र स्वामीजी अपने आचार्य श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी के साथ रहते थे और उन्होने १२ वर्ष तक उनकी निरन्तर सेवा कि। उस समय श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी कि धर्मपत्नी परमपद धाम को पधार गयी – इसीलिये श्रीराममिश्र स्वामीजी ने अपने आचार्य कि तिरुमाली और उनके बच्चो का पूर्ण रूप से ध्यान रखा। एक बार जब श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी कि कन्याये कावेरी नदि से स्नान कर लोट रही थी तो रास्ते में किचड़ आ गया और वह आगे बढ़ने से डर गयी। उसी वक्त श्रीराममिश्र स्वामीजी वहाँ सीधे लेट गये और उनको अपने उपर से जाने को कहकर किचड़ पार करवाया। यह सुनकर श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें बड़े प्यार से आशिर्वाद प्रदान किया। श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजीने बहुत प्रसन्न होकर श्रीराममिश्र स्वामीजी को पूछा की उन्हें क्या चाहिये और श्रीराममिश्र स्वामीजी कहा की उन्हें अपने आचार्य कि सेवा चाहिये। यह सुनकर बहुत प्रसन्न होकर श्रीपुण्डरीकाक्ष स्वामीजी ने उन्हें द्वय महामन्त्र का अर्थ सहित उपदेश किया क्योंकि जब भी आचार्य अपने शिष्य के बर्ताव से प्रसन्न होते है तो उन्हें यह उपदेश देते है, यह प्रचलित है।

श्रीधनुर्दास स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी के कृपा पात्र थे। वह और उनकी पत्नी हेमाम्बाजी श्रीरंगनाथ भगवान के बड़े भक्त हुए और श्रीरामानुज स्वामीजी के आदर्श शिष्य हुए। दोनों श्रीरामानुज स्वामीजी को पूर्णत: समर्पित थे और यह बतलाया कि कैसे एक आदर्श पति-पत्नी गृहस्थाश्रम में रहते हुए भगवद-भागवत-आचार्य का कैंकर्य कर सकते है। श्रीधनुर्दास स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी को बहुत प्रिय थे और यह कहा जाता है कि जब भी श्रीरामानुज स्वामीजी स्नान कर कावेरी नदी से लौटते तो इन्हीं के हाथ का सहारा लेकर आते थे। श्रीधनुर्दास स्वामीजी का बड़े बड़े विद्वानों और भक्त जैसे श्रीकुरेश स्वामीजी गुण गान करते थे। हेमाम्बाजी भी बड़ी विद्वान थी और अपने सिद्धान्तों को अच्छी तरह जानती थी और बहुत बार इसका प्रदर्शन भी किया।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

फाल्गुन मास अनुभवम्

फाल्गुन महिने में हम श्रीरंगनायकी अम्माजी, तिरुवरंगत्तु अमुधनार, श्रीवेदांती स्वामीजी, आदि का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं। उत्तरफाल्गुन वह दिन है जब दोनों श्रीरंगनाथ भगवान और श्रीरंगनायकी अम्माजी हम पर कृपा करते है और श्रीरामानुज स्वामीजी कि शरणागति उनके तरफ सब के उद्धार के लिये याद कराती है।

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम तिरुवरंगत्तु अमुधनार और श्रीवेदान्ति स्वामीजी के आनंदमय रूप को देखेंगे।

तिरुवरंगत्तु अमुधनार श्रीरंगम में श्रीरंगनाचियार सन्निधि मे सेवा करते थे। श्रीरामानुज स्वामीजी ने श्रीकुरेश स्वामीजी के जरिये उन्हें नियुक्त किया, सुधारा और बाद में उन्हें श्रीकुरेश स्वामीजी का शिष्य बनाया। अमुधनार ने पूरी तरह बदल जाने के बाद श्रीरामानुजनूत्तंदादि को संकलित किया। प्रबन्ध के प्रारंभ  मे श्रीवरवर मुनि स्वामीजी इस ग्रन्थ को प्रपन्न गायत्री ऐसे गुणगान किया। यह प्रबन्ध श्रीरामानुज स्वामीजी का ही गुणगान करता है और यह बताता है कि श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमल ही हमारा अंत मे उद्धार करेंगे। अमुधनार नाहीं आल्वार थे और नाहीं उनके प्रबन्ध भगवान का गुणगान करते थे फिर भी यह प्रबन्ध दिव्यप्रबन्ध का एक भाग माना गया है और आल्वारों के पाशुरों के बराबर माना गया है। अमुधनार कि श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति निष्ठा उनके शब्द (श्रीरामानुजनूत्तंदादि) और उनके काम (तायार सन्निधि कि पूर्ण सेवा श्रीरामानुज स्वामीजी को देना) दोनों से समझा जा सकता है।

श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी ने श्रीवेदान्ति स्वामीजी को सुधारा। अंत मे सब कुछ छोड़कर वह श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी के शिष्य हुए और उनकी पूर्ण सेवा में लग गये। बहुत से दृष्टांतों  में उन्होंने पूर्ण शरणागति और एक शिष्य का उसके आचार्य के तरफ आचरण प्रदर्शित किया हैं। सन्यास आश्रम ग्रहण करने के पश्चात उनको एक प्रश्न आया कि अगर उनका यह आश्रम उन्हें उनके आचार्य (जो गृहस्थ थे) सेवा से वंचित रखेगा तो उन्होंने उत्तर दिया कि ऐसा हैं तो आचार्य सेवा के लिये वह यह आश्रम हीं छोड़ देंगे।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

चैत्र मास अनुभवम्

चैत्र महिने में हम श्रीमधुरकवि स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीदाशरथी स्वामीजी, श्रीअनंताल्वान स्वामीजी, श्रीबालधन्वी गुरु (इलयविल्ली), श्रीप्रणतार्तिहराचार्य स्वामीजी, श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी, श्रीएंगलाज़्हवान, श्रीनदातुर अम्माल, श्रीपिल्लै लोकं जीयर, आदि का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं।

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम इनके महान आनंदमय रूप को देखेंगे।

उपदेश रत्नमाला में १० आल्वारों के बारें में चर्चा करने के पश्चात श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, श्रीरामानुज स्वामीजी, श्रीगोदाम्बाजी और श्रीमधुरकवि स्वामीजी के बारें में चर्चा करते हैं। १० आल्वार भगवान से कि गयी भक्ति कि स्तुति करते थे, जबकी श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्री गोदाम्बाजी उनके आचार्य श्रीशठकोप स्वामीजी और श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी से कि गयी भक्ति कि स्तुति करते थे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने श्रीरामानुज स्वामीजी को भी उनके आचार्य श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी और श्रीमहापुर्ण स्वामीजी के प्रति भक्ति के कारण इसी आचार्य निष्ठा कि श्रेणी में रखा है।

श्रीरामानुज स्वामीजी के सभी शिष्य महान थे उनकी श्रीरामानुज स्वामीजी के प्रति आचार्य निष्ठा महान थी। श्रीदाशरथी स्वामीजी केवल श्रीरामानुज स्वामीजी की आज्ञा पाकर एक सहायक के रूप में श्रीमहापूर्ण स्वामीजी के पुत्री के तिरुमाली गये। श्रीअनन्ताल्वान स्वामीजी भी श्रीरामानुज स्वामीजी कि आज्ञा पाकर तिरुमला गये और वहाँ भगवान वेंकटेश कि पुष्पसेवा की। श्रीबालधन्वी गुरु (इलयविल्ली) ने श्रीरामानुज स्वामीजी का परमपद समाचार प्राप्त कर तुरन्त अपने प्राण त्याग दिये। श्रीआंध्रपूर्ण स्वामीजी भगवान से ज्यादा श्रीरामानुज स्वामीजी कि प्रशंसा करते थे। श्रीरामानुज स्वामीजी द्वारा श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी का सम्मान कड़े धुप में हो रहा था यह श्रीप्रणतार्तिहराचार्य स्वामीजी सहन नहीं कर सके और उन्होंने श्रीरामानुज स्वामीजी को उपर उठा लिया इसलिये श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी ने उन्हें श्रीरामानुज स्वामीजी का रसोईय्या नियुक्त किया। यह हमारे लिये आचार्य निष्ठा के उत्तीर्ण उदाहरण हैं।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

वैशाख मास अनुभवम्

वैशाख महिने में हम श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीलक्ष्मीनारायण भगवान, श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी, श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी, श्रीपराशर भट्टर स्वामीजी, श्रीवेदव्यास भट्टर स्वामीजी, श्रीशैलेश स्वामीजी आदि का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं।

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम इन के महान आनंदमय रूप को देखेंगे।

अंतिमोपाय निष्ठा में श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी के जीवन चरित्र से एक सुन्दर प्रसंग दर्शाया गया है – एक बार जब श्रीरामानुज स्वामीजी श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी से यह पुछते है “उन्हें कुछ अच्छे उपदेश दिजीए जिसके शरण वो हो सके”। श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी कुछ समय के लिये आंखे बन्द करते है और कहते है “हम श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के पास शिक्षा ले रहे थे। जब स्वामीजी नदी मे स्नान करके उपर आते थे तब उनकी पीठ का पिछला हिस्सा चमकते हुए ताम्बे के बर्तन जैसे दिखाई देता था। मैं कभी भी उस दिव्य तेज दृष्टी मे ही शरण लेता था। तुम भी उसी को अपना शरण मानो” – यह घटना बहुत प्रसिद्ध है और यह दर्शाता हैं कि शिष्य को आचार्य के दिव्य रूप का ही ध्यान करना चाहिये। यह कहा जाता है कि तिरुक्कोष्टीयूर मंदिर के गोपुर के उपर रहकर श्रीगोष्ठीपूर्ण स्वामीजी हमेशा श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी का ध्यान करते थे और यामुनैतुरैवर यह मंत्र का जाप करते थे।

उसी तरह श्रीशैलेश स्वामीजी भी कूर कुलोत्तमा धासर से जुड़े हुए थे जिन्होंने उन्हें श्रीपिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के निर्देश अनुसार हमारे सम्प्रदाय के बहुत से मुख्य तत्त्व सिखाये है।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

आषाढ़ मास अनुभवम्

आषाढ़ महिने में हम श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी, श्रीनाथमुनि स्वामीजी, श्रीतिरुक्कण्णमंगैयांडान्, श्रीकृष्णपाद स्वामीजी और वाधि केसरी अझगिया मणवाल का वार्षिक तिरुनक्षत्र मनाते है।

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम इन महान जन के बारें में देखेंगे ।

श्रीकृष्णपाद स्वामीजी श्रीलोकाचार्य स्वामीजी के समर्पित शिष्य थे। वह पूर्णत: अपने आचार्य को समर्पित थे और उनकी हमेशा सेवा करते थे। हालाकि वें ग्रहस्त थे परन्तु उनको अपने वैवाहिक जीवन में बिल्कुल भी रुचि न थी। इस चिन्ता से श्रीकृष्णपाद स्वामीजी कि माताजी श्रीलोकाचार्य स्वामीजी के पास जाकर यह बात समझायी। श्रीलोकाचार्य स्वामीजी अपने शिष्य को वैवाहिक जीवन व्यतित करने और धार्मिक बच्चे को जन्म देने को कहते है। श्रीलोकाचार्य स्वामीजी और श्रीरंगनाथ भगवान कि कृपा से श्रीकृष्णपाद स्वामीजी कि पत्नी ने दो दिव्य पुत्र को जन्म दिया। दोनों आजीवन ब्रह्मचारी रहे और केवल आचार्य और आल्वारों के दिव्य तत्त्व विचार से हमारे सत सम्प्रदाय को बहुत उच्च स्थान तक लेगये।

उसी तरह वाधि केसरी अझगिया मणवाल जीयर शुरू में बहुत सीधे और श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै (जो श्रीकालिवैरिदास स्वामीजी के एक प्रिय शिष्य थे) के ज्यादा शिक्षित शिष्य में न थे। श्रीपेरियावाच्चान पिल्लै कि निर्हेतुक कृपा से वाधि केसरी अझगिया मणवाल जीयर एक बहुत बड़े विद्वान बन गये और श्रीसहस्त्रगीति, भगवद गीता का शब्द श: अर्थ लिखा और कई ग्रन्थ का भी।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

कर्कट मास अनुभवम्

इस कर्कट मास में हम श्रीगोदाम्बाजी, श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी और प्रतिवादि भयंकर अण्णा स्वामीजी का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं। आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम इन के महान आनंदमय रूप को देखेंगे।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी सभी आल्वारों और श्रीरामानुज स्वामीजी के तिरुनक्षत्र और अवतार स्थल को उपदेश रत्न माला में दर्शाया है। इस तरह करते समय वें श्रीगोदाम्बाजी के साथ श्रीमधुरकवि स्वामीजी और श्रीरामानुज स्वामीजी कि भी चर्चा करते है यह जानकर भी कि वह स्वयं भू-देवी का अवतार है। तीनों ही आचार्य निष्ठा है (पूर्णत: आचार्य पर निर्भर)। श्रीगोदाम्बाजी नाचियार तिरुमोलि में यह कहती है “वित्तुचित्तर तंगल देवराई वल्लपरिसु वरुविप्परेल अतु काण्दुमे” (जब श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी अपने भगवान को उनके सन्मुख लायेंगे तब में उनके दर्शन करूंगी)। श्रीमधुरकवि स्वामीजी कि श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति आचार्य निष्ठा भी सब जानते है और श्रीरामानुज स्वामीजी कि अपनी आचार्य श्रीशठकोप स्वामीजी, श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी और खासकर श्रीमाहापूर्ण स्वामीजे के प्रति समर्पण सब जानते है।

श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी भी अपने स्तोत्ररत्न में नाथमुनि स्वामीजी के प्रति पूर्णत: समर्पण कि घोषणा करते है। शुरू में “नाथमुनयेत्र परत्र चापि” (मैं इस संसार और दूसरे संसार में श्रीनाथमुनी स्वामीजी के प्रति समर्पित हूँ)। और अन्त में यह कहकर समाप्त करते है “अकृत्रिमत्व… पितामहं नाथमुनिं… ” (मुझे मेरे दादाजी श्रीनाथमुनि स्वामीजी के लिये स्वीकार करो नाहीं मेरे कर्मों के लिये)।

अन्त: में प्रतिवादि भयंकर अण्णा स्वामीजी भी यह बताते है श्रीवरवर मुनि स्वामीजी को कि वह जो श्री विशिष्टाद्वैत को ललकारेंगे उनको पीड़ा पहूंचाएंगे परंतु श्रीवैष्णवों के अधीन रहेंगे।

इसलिये हम सब इन महान जन से आचार्य निष्ठा कि प्रार्थना करते है।

श्रावण मास अनुभवम्

इस श्रावण मास में हम श्रीरंगनाथ भगवान, श्रीपेरियवाच्चान पिल्लै, श्रीनायनाराच्चान पिल्लै और अप्पन तिरुवेंकट रामानुज एम्बार जीयर स्वामीजी का वार्षिक तिरुनक्षत्र उत्सव मनाते हैं

आचार्य निष्ठा के विषय को आगे बढाते हुए हम श्रीरंगनाथ भगवान कि आचार्य निष्ठा को देखेंगे।

श्रीमन्नारायण स्वतन्त्र होने के बावजूद अनेक आचार्य / गुरु को अपनाया दूसरों को मार्ग दिखाने हेतु। भगवद्गीता में उन्होंने एक गुरु कि आवश्यकता, उनकी सेवा करना और उनसे सत्य सिखने पर विशेष ज़ोर दिया। उन्होंने यह सब अवतार लेकर कर बताया।

श्रीराम का अवतार लिया तो उन्होंने श्रीवशिष्ठजी और श्रीविश्वामित्रजी के पास शिक्षा ग्रहण किया। वह भी उन्हें संतुष्ट कर न सका। कृष्णावतार में साण्डिपनी मुनि से शिक्षा ग्रहण किया। यह भी उन्हें संतुष्ट कर न सका। श्रीरामानुज स्वामीजी के समय श्रीरामानुज स्वामीजी ने तिरुवेंकटमुडैयान (श्रीनिवास) को शंख/चक्र प्रधान किया जब तर्क वितर्क हो गया उनके पहिचान को लेकर (इस तरह भगवान ने श्रीरामानुज स्वामीजी को आचार्य रुप में स्वीकार किया क्योंकि शंख/चक्र लेना पञ्च संस्कार का एक भाग है जो जीवात्मा को अपना पहिचान देती है)। तिरुक्कुरुंगुड़ी नम्बी भी श्रीरामानुज स्वामीजी को अपना आचार्य माना और उनसे मंत्रोपदेश ग्रहण किया और श्रीवैष्णव नम्बी के नाम से प्रसिद्ध हुए। फिर भी भगवान श्रीरंगनाथ पूर्ण रुप से संतुष्ट न हुए क्योंकि उनमें शिष्य के पूरे गुण प्राप्त नहीं हुए। जब श्रीवरवरमुनि स्वामीजी श्रीरंगम पधारे श्रीरंगनाथ भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए यह सोचकर कि श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उनके लिए सर्वश्रेष्ट आचार्य होंगे। इसलिये उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को आज्ञा दि कि उन्हें श्रीसहस्त्रगीति पर प्रवचन (व्याख्या) करें ताकि एक प्रामाणिक आचार्य के पास रहकर वह सत्य को सीख सके। प्रवचन के समापन के पश्चात (आनि तिरुमूलम के समय) श्रीरंगनाथ भगवान ने अपने आचार्य को “श्रीशैलेश दयापात्रं” तनिया से संभोधित किया। यह भी नहीं उन्होंने यह तनियन का प्रचार प्रसार किया और यह आज्ञा किये कि दिव्य प्रबन्ध के शुरू और अन्त में इस तनियन को बोलना है। उन्होंने सबसे बहुमूल्य धन श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को प्रधान किया – सेश पर्यंगम। क्योंकि यह परम्परा है शिष्य अपनी बहुमूल्य वस्तु अपने आचार्य को प्रधान कर उनका गौरव करता है। अत: श्रीरंगनाथ भगवान श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य रुप में स्वीकार कर बहुत संतुष्ट हुए।

इसलिये, हम सभी पूर्वोक्त, आचार्य निष्ठा, की प्रार्थना, स्वयं श्रीरंगनाथ भगवान से करेंगे ।

अडियेन केशव रामानुज दासन्

आधार: http://ponnadi.blogspot.in/2015/08/acharya-nishtai.html

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जीयर तिरुवडिगले शरणम्

श्री:
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवर मुनये नमः
श्री वानाचल महामुनये नमः

मूल लेखक (तमिल) श्री उभय वेदान्त विभूषित रामकृष्ण ऐयंगार

आल्वार तिरुनगरी तिरुमलै नल्लान चक्रवर्ती श्री उभय वेदान्त विभूषित रामकृष्ण ऐयांगर स्वामीजी एक ग्रेट उभय वेदान्त विद्वान हुये जो इस लीला विभूति में पिछले शतक में बिराजें।उनका तमिल और संस्कृत भाषाओंपर अद्वितीय प्रभुत्व था।अपने वाचिक कैंकर्य में उन्होने श्रीवैष्णव संप्रदाय के अधिकतम गहरे तत्त्वोंपर अनेक कालक्षेप किए हैं।उन्होने पूर्वाचार्योंके दो दिव्य ग्रंथोंपर व्याख्यान भी लिखे हैं।प्रथम “स्वर्ण कुंचिका” जो श्री पाराशर भट्टर स्वामीजी के “गुण रत्न कोषम्” पर उत्कृष्ट व्याख्यान है। द्वितीय “अमूध विरून्थु”है श्री तिरुवरंगथु अमूधनार स्वामीजी के “श्री रामानुज नूट्रन्दादि/प्रपन्न गायत्री”का विस्तृत विश्लेषण है। श्री स्वामीजी के ये दोनों ग्रंथ हमारे सत संप्रदाय के सार को प्रदर्शित करते हैं।

उन्होने तमिल में छोटे लेख भी लिखे हैं। उनका एक लेख पढ़नेका भाग्य हुआ, जो लेख तिरुवल्लीकेन्नि मंत्र पुष्प भाष्य ऐयंगार स्वामीजी के शताभिषेक माला स्मरणिका में छपा था। अति पवित्रता, सरल तमिल भाषा, उत्कृष्ट शब्द प्रवाह, और अति महत्त्वपूर्ण विषय ये सब उस लेख को विशेष बनाते हैं और हमारे आचार्य कोईल सेल्वा श्री वरवरमुनी स्वामीजी के वैभव का परम आनंद हमे प्राप्त होता है।दास सभी के लाभ के लिए इस लेख को हिन्दी में भाषांतरित करनेका प्रयत्न कर रहा है। श्री स्वामीजी के अपने सुंदर शब्दोंमें लेख पढ़ने का अनुभव करनेकी तुलना इस भाषांतरित लेख से नहीं हो सकती। फिर भी यह भाषांतर से पाठक गण कम से कम मूल लेखक का भाव समझने का प्रयास कर सकेंगे यह आशा है।

श्री शठकोप स्वामीजी, श्री रामानुज स्वामीजी, श्री वरवरमुनी स्वामीजी के “सहसरगिती” से संबन्धित विशेष वैभव का वर्णन इस लेख में सुंदर रीति से वर्णित है। यह लेख श्री रंगनाथ भगवान का अपने परम प्रिय आचार्य श्री वरवरमुनी स्वामीजी के प्रति परम अनुरक्ति तथा कृतज्ञता को प्रदर्शित करता है।

मूल लेख देखें: मूल लेख और् http://ponnadi.blogspot.in/2013/02/jiyar-thiruvadigale-charanam.html

इस प्रस्तावना के पश्चात अब लेख की ओर बढ़ेंगे:

श्रीमन्नारायण ही सर्वोच्च भगवान है । सभी संवेदनशीलजीवों के पिता है । लेकिन अनेक दिनों से किसी को पिता के रूप में अपनाना चाहते थे । दशरथजी के पुत्र के रूप में अवतार लेकर उनकी इच्छा पूर्ति हुयी । जगत पिता रहते हुये भी दशरथजी के पुत्र के रूप में अवतार लेकर चक्रवर्ती श्रीराम के नाम से प्रसिद्ध हुये । भगवान सभी गुणों से परिपूर्ण है । भगवान स्वयं दशरथजी को पिता के रूप में स्वीकार किये है तो हम लोग दशरथजी के गुणों का वर्णन कैसे कर सकेगें ? कालीदासजी एक श्लोक के द्वारा दशरथजी का वर्णन करते है,“अनेना कथिता राज्ञ गुनना दशरथस्य ही; प्रसूधिं चकमैयस्मिन त्रैलोक्य प्रभावोपीयत”

जो अपने इस शरीर को देते है वे पिता है । जो स्वरूप ज्ञान कराते है वे आचार्य है । आचार्य पिता से भी ज्यादा सराहनीय है । पिता द्वारा दिया गया शरीर अनित्य है और आचार्य द्वारा दिया गया स्वरूप ज्ञान नित्य है । श्रीमन्नारायण भगवान भी आचार्यों में एक है , जो की अपने गुरु परम्परा में प्रथम स्थान पर विराजमान है । भगवान के कोई आचार्य नहीं थे , इसलिये भगवान अपने लिये आचार्य बनाना चाहते थे । वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार करके अपनी इच्छा को पूर्ण किया । जो पूर्ण जगत के आचार्य है , सर्वज्ञ है , ऐसे भगवान वरवरमुनि स्वामीजी के शिष्य बन गये है, तो वरवरमुनि स्वामीजी का वैभव कितना होगा ?

भगवान के अनेक अवतारों में पिता तो थे, लेकिन उनके वचनों के अनुसार “ पीतरम रौचयामास तधा दशरथम नृपम ”, अत्यन्त आनन्द के साथ दशरथजी को पिता के रूप में स्वीकार किया । वैसे ही भगवान के आचार्य तो थे ( जैसे वशीष्ठजी , सान्दिपनीजी ) लेकिन वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार करने के लिये अत्यन्त उत्सुकता थी इसलिये अपने अर्चावतार के स्वरूप में अर्चा समाधी को भी भंग कर दिया ।

वामन भगवान कश्यप ऋषी के पुत्र के रूप में अवतार लिये , महाबली से भीक माँगने के लिये अपने पिता को छोड़कर चले गये । दशरथजी के पुत्र श्रीराम उनके साथ ही रहते हुये सेवा किया करते थे । वशीष्ठजी के साथ गुरुकुल में रहते हुये 12 वर्ष की आयु तक उन्होने अध्ययन किया । चित्रकूट में रहते हुये अपने गुरु वशीष्ठजी की अयोध्या लौटने की आज्ञा का उल्लंघन करते हुये उनके साथ तर्क भी किया । कृष्ण भगवान ने सान्दिपनी ऋषि के आश्रम में रहकर 64 दिनों में 64 कलाओं को सीखा । शिष्य को आचार्य के सन्निधि में रहने की मर्यादा को बनाये रखने के लिये मात्र उन्होने कुछ दिनों तक सान्दिपनी ऋषि के आश्रम में वास किया और बाद में वहाँ से चले गये । कुछ दिनों तक आचार्य के सन्निधि में थे लेकिन उनको उत्सुकुता नहीं थी और वहाँ पर रहते हुये उन्होने अपनी श्रेष्ठता को दिखाया ( अपने आचार्य के पुत्र को लाकर )। सान्दिपनीजी को गुरु दक्षिणा के रूप में उनके पुत्र को देकर अत्यन्त विशेष कार्य किया ।

लेकिन जब रंगनाथ भगवान ने वरवरमुनि स्वामीजी को आचार्य के रूप में स्वीकार किया तब पूर्ण रूप से सहस्त्रगीति के ईडु ( द्वय महामंत्र का विस्तार रूप से पूर्ण व्याख्यान है ) कालक्षेप को एक वर्ष तक अत्यन्त श्रद्धा के साथ सुना । वेदांताचार्य न्यास तिलकम में कहते है “ दत्ते रंगी निजमपी पदमं देशिक आदेशकांक्षी ” ,श्री रंगनाथ भगवान अपने आचार्य की आज्ञा और इच्छानुसार अपने चरणारविन्दो ( परमपद ) को अनेक लोगो के लिये उपलब्ध कराया । कृष्ण भगवान ने सांदीपनी ऋषि के आश्रम में अध्ययन के लिये रहने का सिर्फ नाटक किया , लेकिन रंगनाथ भगवान ने अर्चावतार में ऐश्वर्य आदि गुणों को ध्यान न देते हुये अत्यन्त श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ एक शिष्य की तरह कालक्षेप सुना ।

सांदीपनी ऋषि के पुत्र जिनकी मृत्यु अनेक वर्षों पूर्व हुयी थी उनको भगवान कृष्ण ने पुनः लौटाया । रंगनाथ भगवान ने अपनी वर्चस्व को भूलकर अपने आचार्य वरवरमुनि स्वामीजी को अत्यन्त सुन्दर तनियन का निवेदन किया , जिसका प्रारम्भ “ श्रीशैलेश दयापात्रम …..” से होता है , भगवान तनियन का निवेदन करते हुये अत्यन्त भावुक हो गये और अन्य किसी वस्तु को भेंट करना भूल गये । यह तनियन रामानुज स्वामीजी के तनियन   “ योनित्यमच्युत…….” के जैसे बड़ी नहीं है । वरवरमुनि स्वामीजी के द्वारा सहस्त्रगीति के कालक्षेप को सुनकर भगवान श्रीरंगनाथ परमानन्द से अत्यन्त भावुक होकर पिघल गये और एक बड़े श्लोक की भी रचना नहीं कर सके ।

वशिष्ट और सांदीपनी ऋषि भगवान के विभवावतार में आचार्य बने । वरवरमुनि स्वामीजी अर्चावतार भगवान के आचार्य बनकर विशेष उदाहरण दिया । अनेक आल्वार और आचार्य अर्चावतार भगवान के आचार्य बने लेकिन वरवरमुनि स्वामीजी जैसे विशेष उदाहरण कोई भी नहीं है ।

श्री शठकोप स्वामिजी

आचार्य हृदय में अजगीय मणवाल पेरुमाल नायनार कहते हैं की श्री शठकोप स्वामिजी सहस्रगिती (जो अर्चावतार भगवान पर केन्द्रीकृत है)में भगवान को निर्देश देते हैं और भगवान एक योग्य शिष्य के रूप में श्रीशठकोप स्वामीजी के निर्देश का पालन करते है । गोदम्बाजी कृष्ण भगवान को उत्थापन के बाद कहती है “ उनक्के नामाल्शे य्वोम् ” याने “हम सिर्फ आपके ही शेषी है ।” अभी तक भगवान को वरवरमुनि स्वामीजी की तरह कोई भी पूर्ण ग्रंथ का कालक्षेप नहीं किये है ।

तिरुक्कनमंगई भक्तवत्सल भगवान परकाल स्वामीजी के पासूरों ( जो की संगीत के साथ जोड़े गये है ) “ निंत नक्कूम कुरीप्पागिल कर्कालाम कवियीन पोरुल्थनै ” आल्वार कहते है “अगर आपको इच्छा है तो मेरे पासूरों को सीख सकते है ” और भगवान को सलाह देने की इच्छा भी व्यक्त करते है । पेरियावाचन पिल्लै अपने व्याख्यान में कहते है “ क्या भगवान आलवार से सीखना नहीं चाहते है ?” पेरियावाचन पिल्लै के दिव्य वचन –
स्वतः सर्वज्ञानाय इरुणमातिरुन्ताई पौगातू इन्नौडे अधीकारीक्किल अरीयलाम । ओरु

वशिष्ठनौड सान्दीपनीयौड़े तलनीनरु अधीकारीक्कक्कदव अवनुक्कू

तिरुमंगै आल्वारोड़े अधिकारिक्कै तल्वो ?

अगर आप गर्व से अपने आप को सर्वज्ञ ( जो सब कुछ जानता है ) समझते है तो , आप मुझसे कुछ भी नहीं जान सकते है । अगर आप में विनम्रता है तो आप मुझसे जान सकते है । भगवान विनम्रता से वशिष्ठजी , सान्दीपनी ऋषि से ( जो स्वयं अपने बल पर ज्ञान प्राप्त किये है ) अध्ययन किया था तो आलवारों के ( जिनको भगवान की कृपा से ज्ञान प्राप्त हुआ ) द्वारा अध्ययन करने से उनके चरित्र को

अभी तक अर्चावतार में भगवान ने आलवारों द्वारा अध्ययन करने की इच्छा को प्रकट किया है लेकिन अध्ययन किया है या नहीं मालूम नहीं । ( अनुवादक टिप्पणी : तिरुक्कनमंगई भगवान कि अभिलाषा पूर्ति करने के लिये कलिवैरिदास स्वामीजी कलियन के अवतार और पेरियावाचन पिल्लै को कृष्ण भगवान के अवतार बताये गये जो विभवातार में हुये है अर्चावतार में नहीं हुये है ।)

रामानुज स्वामीजी

रामानुज स्वामीजी को आलवारों कि गोष्ठी में समान स्तर पर माना जाता है । अर्चावतार में भगवान अनेक संदर्भों में रामानुज स्वामीजी के शिष्य बने है । तिरुमला में वेंकटेश भगवान रामानुज स्वामीजी द्वारा संस्कृत वेद के सार को सुना , जो कि वेदार्थ संग्रह के रूप में संग्रहीत है । तिरुमला मंदिर में अभी भी हम लोग रामानुज स्वामीजी के दर्शन ज्ञान / उपदेश मुद्रा में करते है । रामानुज स्वामीजी वेंकटेश भगवान को शंख चक्र प्रदान करके शिष्य के रूप में स्वीकार किया ।

तिरुक्कुरुगुंडी में भगवान ने रामानुज स्वामीजी द्वारा शिष्य के रूप में द्वय महा मंत्र का उपदेश सुना और श्रीवैष्णव नम्बि के नाम से जाने जाते है ।

वदवेंकटवन ( द्राविद देश के उत्तर भाग के वेंकटेश भगवान ) संक्षेप में संस्कृत वेद के सार को सुना । तेन्नरंगन ( द्राविड देश के दक्षिण भाग के रंगनाथ भगवान ) द्राविड वेद के सार को अत्यन्त विस्तार से श्रीवरवरमुनि स्वामीजी द्वारा सुना जो कि 36000 ईडु व्याख्यान के रूप में प्रसिद्ध हुआ । अनेक संदर्भों में हम देखते है श्रीरंगनाथ भगवान श्री रामानुज स्वामीजी द्वारा गद्यत्रय का व्याख्यान सुने थे , वे सहस्त्रगीति की व्याख्या भी सुन सकते थे , लेकिन क्यों नहीं सुने ?

ईडु व्याख्यान जो द्रामीडोपनिषद के नाम से प्रसिद्ध है उस समय उपलब्ध नहीं था । ईडु व्याख्यान को कलिवैरीदास स्वामीजी के द्वारा भी सुन सकते थे , लेकिन नहीं सुना । क्योंकि वे वरवरमुनि स्वामीजी के द्वारा ही इस व्याख्यान का आनंद लेना चाहते थे । वरवरमुनि स्वामीजी ने श्रीरंगनाथ भगवान की अनेक दिनों की इच्छा को पूर्ति किया ।

श्री वरवरमुनी स्वामीजी

हम समझ सकते है की भगवान के संकल्पानुसार सहस्त्रगीति के व्याख्यान को सुनने की इच्छा पूर्ति करने के लिये रामानुज स्वामीजी का अवतार द्रविड़ देश के उत्तर भाग में श्रीपेरुम्बूदूर में हुआ और उन्होने वेदान्त के सार को स्थापित किया, वरवरमुनि स्वामीजी का अवतार द्रविड़ देश के दक्षिण भाग में आलवार तिरुनगरी में हुआ और उन्होने द्राविड वेद को प्रस्तुत किया, वरवरमुनि स्वामीजी के आचार्य श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी ने द्राविड वेद पर ध्यान देने के लिये आज्ञा कि थी ।

वरवर मुनि स्वामीजी का वैभव अवर्णनीय है , स्वयं श्री रंगनाथ भगवान ईडु महाव्याख्यान के कालक्षेप को स्वामीजी द्वारा श्रवण किया । अब रंगनाथ भगवान अंतिम दिन शातुमुरै के समय में तनियन का निवेदन कैसे किये देखेगें ।

सहस्त्रगीति में श्री रंगनाथ भगवान का वैभव प्रकाशित होता है । हम लोगो के लिये सहस्त्रगीति के भीतरी अर्थ को समझना कठीन है । मधुरकवि स्वामीजी शठकोप स्वामीजी द्वारा सहस्त्रगीति को सीधा सुना था । उनके बुद्धिमान प्रकृति के कारण वे सहस्त्रगीति के सार को जान सके । लेकिन मधुरकवि स्वामीजी कहते है शठकोप स्वामीजी के विशेष कृपा के कारण सहस्त्रगीति का सार जान पाये । उनके दिव्य वचन “ वेधात्तीन उतपोरुल निर्कपाड़ी एन्नेन्यचूल निरुत्तिनान ” याने शठकोप स्वामीजी ने मेरे हृदय में वेद के सार को स्थापित किया है । पूर्ण वेदो का अर्थ ही भगवान है जैसे “ वैदप पोरुलेयन वैंगतवा ” वेदो का सार भगवान के भक्त ( भागवत ) है । मधुरकवि स्वामीजी को ज्ञात हुआ की शठकोप स्वामीजी भागवतों के दास बनाना चाहते है । शठकोप स्वामीजी को भागवत के रूप में जानकर मधुरकवि स्वामीजी उनके दास बन गये ।

मधुरकवि स्वामीजी कहते है शठकोप स्वामीजी को छोड़कर वे दूसरे किसी को जानते भी नहीं है । सहस्त्रगीति के समापन में “ आलवार तिरुवडिगले शरणम ” बोला जाता है । इसका अर्थ है मै आलवार के चरणारविन्दो का ही आश्रय लेता हूँ । यामुनाचार्य स्वामीजी कहते है “ परत्र चापि,नित्यं यदीय चरणो शरणम प्रपद्ये ” याने इस लोक में और अन्य लोक मै श्री नाथमुनी स्वामीजी के चरणो की शरण ग्रहण करता हूँ । मधुरकवि स्वामीजी के बाद नाथमुनी स्वामीजी ने शठकोप स्वामीजी द्वारा सहस्त्रगीति को सीखा, प्रपन्न कुल के सामने उसको प्रस्तुत भी किया और सहस्त्रगीति के अंत मेँ “ आलवार तिरुवडिगले शरणम ” अनुसंधान करने की प्रथा को प्रारम्भ किया ।

रामानुज स्वामीजी ने सहस्त्रगीति के ऊपर व्याख्यान लिखने की प्रथा ( पिल्लान को व्याख्यान करने के लिये आज्ञा दी ) को प्रारम्भ किया । सहस्त्रगीति पर कालक्षेप गोष्ठी भी किया । उस समय रामानुज स्वामीजी को शठकोप के चरणारविन्दो के रूप मेँ स्वीकार किया । शठकोप स्वामीजी के चरणारविन्दो पर अपने जीवन को केन्द्रित किया । रामानुज स्वामीजी को वेदो के सार रूप मेँ भी स्वीकार किया । प्रबंध गोष्ठी के समापन मेँ “ आलवार तिरुवडिगले शरणम ” के साथ “येम्पुरमानार तिरुवडिगले  शरणम ” बोलने की प्रथा को प्रारम्भ किया । वेदान्तदेशिक स्वामीजी कहते है प्रपन्नों के लिये भगवान से ज्यादा रामानुज स्वामीजी मुख्य है ।

आज के दिनों मेँ शठकोप स्वामीजी और रामानुज स्वामीजी के वैभव वर्णन के साथ “ जीयर तिरुवड़ीगले शरणम ” भी अनुसंधान किया जाता है ,जिसका अर्थ है वरवरमुनि स्वामीजी के चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ । यह प्रथा श्रीरंगनाथ भगवान को अत्यंत प्रिय है क्योंकि भगवान ने स्वयं श्री वरवरमुनि स्वामीजी की तनियन का निवेदन किया और आज्ञा किया की जहाँ पर भी प्रबंध गोष्ठी का अनुसंधान होता है वहाँ पर प्रारम्भ और अंत मेँ तनियन का निवेदन होना चाहिये ।

जीयर ( बिना किसी उपसर्ग के ) याने वरवरमुनि स्वामीजी को संबोधित करता है ।  कई बार वनमामलै जीयर , पट्टरपिरान जीयर से अलग समझने के लिये पेरीय जीयर ( बड़े / महान ) भी कहा जाता है ।

शठकोप स्वामीजी , रामानुज स्वामीजी और जीयर ये तीनों भागवत है , जो की वेदों का सार है ( द्राविद वेद और संस्कृत वेद ) । रामानुज स्वामीजी शठकोप स्वामीजी के चरणारविन्द के स्वरूप मेँ है , वरवरमुनि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी के अवतार है , इन तीनों की महिमा समान स्तर पर है । इसलिये वरवरमुनि स्वामीजी के समय के विद्वानों ने इन तीनों को वेदों के सार रूप मेँ जानकर प्रबंध गोष्ठी के अंत मेँ “ आलवार तिरुवडिगले शरणम, येम्पुरमानार तिरुवडिगले शरणम ,जीयर तिरुवड़ीगले शरणम ” अनुसंसधान करना प्रारम्भ किया ।

शठकोप स्वामीजी सहस्त्रगीति को जन्म देनेवाली माता है , “इनरा मुथल ताय ” , रामानुज स्वामीजी सहस्त्रगीति को पालन पोषण करनेवाली माता के रूप मेँ है , “वलार्थत इधथाय ” और वरवरमुनि स्वामीजी सहस्त्रगीति का विस्तार से व्याख्यान करने वाले माता के रूप मेँ है , “ इत्तुप पेरुक्कर ”। इनके वैभव को जानते हुये प्रबंध गोष्ठी के अंत मेँ इन तीनों महाभागवतों के महिमा के सार का अभिवादन करने लगे ।

इसके अलावा भगवान, भागवत और आचार्य ही वेदो का उदेश्य है, भगवान वेदों का बाहरी अर्थ है और भागवत / आचार्य भीतरी अर्थ है । “ गुरुदेव परब्रम्ह ” के अनुसार सभाविक रूप से आचार्य और भागवत भी है । इस प्रकार आचार्य, भगवान , भागवत और आचार्य के रूप मेँ है । अन्य आचार्यों से यह आचार्य भिन्न भी है । यह तीनों आचार्य विशेष रूप से उद्धारक आचार्य ( जो हमे इस संसार से निकालकर परमपद मेँ पहुंचाते है ) । पूर्ण जानकारी के लिये “चरमोपाय निर्णय उद्धारक आचार्य”  और “चरमोपाय निर्णय” देखे । विद्वानों द्वारा इन तीनों आचार्यों को वेदों का सार बताया गया है ।

“ आलवार येम्पुरमानार जीयर तिरुवड़ीगले शरणम ” ऐसे भी अनुसंसधान किया जाता है । जीवन चरित्र से समझकर वर्णन किया जाता है की तीनों आचार्यों के अवतार स्थल आलवार तिरुनगरी है । सहस्त्रगीति के 5.2.1 पाशूर मेँ शठकोप स्वामीजी रामानुज स्वामीजी का वर्णन करते है “ पोलिग पोलिग पोलिग ……. कलियुम केड़ुम कंडु कोणमिन ”। शठकोप स्वामीजी मधुरकवि स्वामीजी को अपने अर्चा विग्रह प्रदान करने के पहिले भविष्यदाचार्य का अर्चा विग्रह प्रदान किया और मधुरकवि स्वामीजी ने उस रामानुज स्वामीजी के अर्चा विग्रह की सेवा किये । वररमुनी स्वामीजी ने भविष्यदाचार्य के अर्चा विग्रह को अलग मंदिर बनाकर सेवा किये । आज भी दर्शन कर सकते है । आलवार तिरुनगरी ( जिससे भगवान, आलवार और आचार्यों का संबंध है ) में रामानुज स्वामीजी ने भविष्यदाचार्य के रूप मेँ 4000 वर्ष पूर्व श्री पेरुम्बुदूर के पहिले ही अवतार लिया । ( अनुवादक टिप्पणी : शठकोप स्वामीजी और वरवरमुनि स्वामीजी का अवतार आलवार तिरुनगरी मेँ हुआ है )

रंगनाथ भगवान सहस्त्रगीति के आरंभ मेँ प्रकट होते है ऐसा बाह्य अर्थ है । सहस्त्रगीति का भीतरी अर्थ है की वरवरमुनि स्वामीजी ही सर्वश्रेष्ठ है । रंगनाथ भगवान के चरणारविन्द ( जिससे पूर्ण ब्रम्हान्ड को मापा ) बाह्य अर्थ का सार है और वरवरमुनि स्वामीजी के श्रीचरणारविन्द भीतरी अर्थ का सार है । वरवरमुनि स्वामीजी द्वारा बाह्य और भीतरी अर्थ के सार को सुनने के बाद रंगनाथ भगवान आश्चर्य चकित होते है की “ इससे भी सरल अर्थ मेँ कैसे वर्णन किया जा सकेगा ।” शठकोप स्वामीजी की सराहना करते हुये आभार भी व्यक्त नहीं कर सके और शातूमूरै के समय मेँ “ श्रीशैलेश दयापात्रम ” तनितन का निवेदन किया ( जो की सभी मंत्रो का आभूषण है ) श्री देवराज स्वामीजी द्वारा वरवरमुनि स्वामीजी शतकम के 63 वें श्लोक में है ।

आत्मा णात्मब्रमितिविरहात् पत्युरत्यण्तदूरः

गोरे तापत्रिदयगुहरे कूर्न्णमाणोजणोयम्

पादच्चायाम् वरवरमुने! प्रापितोयत्प्रसादात्

तस्मै देयम् तदिहकिमिव स्रीणिदेर् वर्त्तते ते

श्री वरवरमुनि स्वामीजी को आभार व्यक्त कैसे करेगें जिन्होने संसारियों को ( जो अपने आप को भगवान से दूर रखते है , जिन्हे शरीर और आत्मा मेँ अंतर मालूम नहीं है , इस संसार के त्रिविध ताप से पीड़ित है ) श्रीरंगनाथ भगवान के श्रीचरणों का आश्रय लेने के लिये प्रोत्साहित किया । श्रीरंगनाथ भगवान भी वरवरमुनि स्वामीजी की कृपा का बदला नहीं चुका सकते है । देवराज स्वामीजी कहते है भगवान इतने भावुक हो गए थे की तनियन का निवेदन छोड़कर और कुछ निवेदन भी नहीं कर पाये ।

इस श्लोक मेँ “ पद छाया ” शब्द उसमे पद याने श्री चरण जो उपाय को और छाया जो उपेय को संबोधित करते है । यहाँ पर रंगनाथ भगवान के श्रीचरणों को उपाय और शांत छाया जो की हमारे सभी दर्द मिटाकर आराम देनेवाले उपेय के रूप मेँ है । पहले सहस्त्रगीति के बाह्य अर्थ मेँ भगवत शेषत्व (भगवान के शेष बनाकर रहना) को बताया गया । “ पद छाया ” के द्वारा सहस्त्रगीति के भीतरी अर्थ में भागवत शेषत्व ( भागवत / आचार्य के शेषी बनकर रहना ) को बताया गया है । जो अत्यंत पढे लिखे विद्वान है वे भीतरी अर्थ मेँ वरवरमुनि स्वामीजी को संबोधित करते है । श्लोक के रूप में कहा गया है “ विष्णु शेषी तदीय शुभगुणानिलयो विग्रह श्रीशठारी : श्रीमान रामानुजार्य पदकमलयुगम बाती रमयम तदीयम ”,शठकोप स्वामीजी को भगवान के दिव्य अवतार के रूप मेँ जाना जाता है , रामानुज स्वामीजी को शठकोप स्वामीजी के श्रीचरणों के रूप मेँ जाना जाता है और रंगनाथ भगवान के श्रीचरणों के रूप मेँ भी जाना जाता है । श्रीवरवरमुनि स्वामीजीको रामानुज स्वामीजी पर अपार निष्ठा और निर्भरता है । यतीन्द्र प्रवणर ( वरवरमुनि स्वामीजी जो रामानुज स्वामीजी से संलग्न है ) रामानुज स्वामीजी के छाया के समान है ।

इस प्रकार श्री रंगनाथ भगवान ने “ श्रीशैलेश दयापात्रम ……….” तनियन की रचना करके समर्पित किया ।

  • वरवरमुनि स्वामीजी के वैभव को स्थापित किया , जिन्होने अनेक लोगो में परिवर्तन लाया है , जो की इस संसार में लिप्त थे, जिनको शरीर और आत्मा में अंतर मालूम नहीं था उनको शास्त्र के सारतम भाग याने भागवतों के परतंत्र कर दिया ( पूर्ण रूप से भागवतों पर अवलम्ब रहना )
  • वरवरमुनि स्वामीजी को अपनी कृतज्ञता व्यक्त किया ( कालक्षेप सुनकर आचार्य के रूप में स्वीकार किया )

प्रबंध गोष्ठी के प्रारम्भ में और अंत में इस तनियन का अनुसंधान करने के लिये रंगनाथ भगवान ने आज्ञा कि ।

“ हरि ” ही वेदों का सार है इसे संकेत करने के लिये संस्कृत वेद के प्रारम्भ में और अंत में हरी का निवेदन किया जाता है । द्राविड वेद का भीतरी अर्थ भागवत शेषत्व है, रमज्यामातृ मुनि जो कि भागवत शेषत्व का प्रतीक है । इसलिये भगवान कि इच्छानुसार द्राविड़ वेद के प्रारम्भ और अंत में तनियन का अनुसंधान किया जाता है । संस्कृत वेद सब लोगों के लिये समान है । इसलिये बाहरी अर्थ याने “ हरी ” है , उसको प्रारम्भ में और अंत में निवेदन किया जाता है । परम सात्विक लोग ( परम वैष्णव ) वेद के भितरि अर्थ को जानने के लिये हरि और प्रणव के गहराई तक जाते है । (सामान्य लोग भगवान का स्मरण करके रुक जाते है ) पूर्ण द्राविड वेद का उदेश्य सिर्फ परम वैष्णवों के लिये ही है , इसलिये भगवान श्रीवैष्णवों को आज्ञा करते है की वरवरमुनि स्वामीजी की तनियन को प्रारम्भ में और अंत में निवेदन करना । संस्कृत वेद सिर्फ भगवान को ही बताता है क्योंकि उसमे संसार और मोक्ष दोनों वर्णित है । द्राविड वेद में सिर्फ भगवत कैंकर्य को केन्द्रित करता है । यहाँ पर रम्यजामात्रुमुनी को आभार प्रकट करना उचित है क्योंकि वे सिर्फ मोक्ष के मार्ग को ही बताते है ।

श्री वरवरमुनी स्वामीजी ने अपने आप को शास्त्रोंके सारतम ज्ञान का मुख्य स्रोत इस रूप में कभी भी सामान्य जनोंमें प्रकाशित नहीं किया, परन्तु जो शिष्य उनसे शिक्षा प्राप्त किए थे उन्हे यह पूर्ण रूप से ज्ञात था। उन्होने वो गुह्यतम ज्ञान अपने आप में सुरक्षित रखा। परम कृपानिधान श्री रंगनाथ भगवानने भविष्य में भी सभी को श्री वरवरमुनी स्वामीजी का दिव्य वैभव का ज्ञान हो इस उद्देश्य से श्री वरवरमुनी स्वामीजी को तनियन अर्पण की,“श्रीशैलेश दयापात्रं …” और आदेश भी दिया की यह तनियन द्रविड़ वेदोंके पाठ के पूर्व और अंत में निवेदन करना चाहिए। (हमारे उज्जीवन के लिए)

फलत:, आज भी श्री रंगनाथ भगवान के दिव्य आदेश से हम सभी दिव्य प्रबंध (तथा दिव्य प्रबंध संबन्धित ग्रंथ जैसे व्याख्यान, रहस्य ग्रंथ, ई.) के पाठ के सम्पन्न होनेपर “जीयर तिरुवडिगले शरणम” ऐसा निवेदन करते हैं।

“जीयर तिरुवडिगले शरणम”

ऐसा निवेदन करते हैं।

इसी तरह श्री महा विद्वान अलवार तिरुनगरी तिरुमलै नल्लान चक्रवर्ती का यह सुंदर लेख सम्पन्न हुआ।

श्री उ. वे. रामकृष्ण ऐयंगार स्वामी

Source: http://ponnadi.blogspot.in/2013/02/jiyar-thiruvadigale-charanam.html

अडियेन श्रीराम रामानुज श्रीवैष्णवदास